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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

4/28/07

मन, बुध्दी और अंहकार पर रखें अपनी नज़र-चिन्तन

हमारा शरीर पांच तत्वों-पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नी से मिलाकर बना है यह सब जानते है पर इनकी प्रकृति का साथ हमारे अन्दर तीन और भी प्रकृति हमारे देह में अपना कार्य करती है यह है-मन, बुध्दी और अहंकार । हम पांच के बारे में जानते हैं क्योंकि उनका अस्तित्व सामने प्रत्यक्ष दिखाई देता है पर अन्य तीन का आभास हम नहीं कर पाते जो कि हमारे इस देह और जीवन का संचालन करते हैं। देह को निर्माण करने वाले पंच तत्त्व मूर्त रुप से दिखते है पर उनका भाव मूक और स्थिर है जबकि मन, बुध्दी और अहंकार का भाव अमूर्त रुप है और वाचाल होने के साथ चलायमान है । वह हमें कहीं का कहीं घुमाता है और हम सोचते हैं कि हम घूम रहे हैं, वह हमसे कर्म कराते हैं और हम सोचते हैं कि हम करतार हैं। यह भ्रम जीवन भर भर बना रहता है और हम सोचते हैं कि हमारा देहधारी जीवन ही सत्य है, और जब हम चेतना आती है तब तक हमारी सारी इन्द्रियां व्यथित हो चुकीं होती है और हम अपने जीवन को नये तरीके से जीने और समझने का अवसर खो चुके होते हैं । लोग कहते हैं अध्यात्म की तरफ बुढ़ापे में जाना चाहिए जबकी आध्यात्म केवल भगवान् की भक्ती ही करने तक ही सीमित नहीं है वरन युवावस्था में अपने अपने कार्य और दायित्व निर्वहन की शक्ति भी देता है। पर वह अवस्था आदमी अपने देहाभिमान में गुजार देता है और बुढापे में आदतों में बदलाव लाना कठिन ही नहीं असंभव हैं। अध्यात्म का किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है, हाँ लोगों ने अपने कर्म कांडों को ही अध्यात्म मानकर उसमे लिप्त हो जाते हैं अपने अहं और युवास्था में तो इन्हीं कर्म कांडों का निर्वहन कर समझते हैं कि हमने अपना विश्वास पा लिया है।
हम अपने भ्रमों को विश्वास समझते है और उसे दूसरों को सुनाकर यह चाहते हैं कि वह भी उस विश्वास को अपनाए और नहीं अपनाता तो हमें बुरा लगता है - यह अंहकार का भाव हर इन्सान में रहता है और आज विश्व में तो तनाव देख रहे हैं वह इसी का परिणाम है। लोग कहते हैं के बुढ़ापे में अध्यात्म की तरफ जाना चाहिऐ जबकि देखा जा रहा है धर्म ही नहीं वरन अन्य राजनीतिक सिध्दान्तों के नाम पर युवाओं को बर्गालाकर उन्हें आतंकवादी बनाया जा रहा है इसका कारण यह है कि माता-पिता अपने बच्चे को यह सोचकर धर्म की शिक्षा नहीं देते के कहीं वह दुनियां के कर्मों से विरक्त नहीं हो जाये और वृद्धावस्था में उनकी सेवा से परे न हो जाये- उनका यह मोह उन्हें यह बात नहीं सोचने देता के हमारे लड़के का भी मन है और उसे कहीं इस तरह लगाना चाहिए कि उसके विचारों में पवित्रता बनी रहे । वह उसे केवल दुनियां की उतनी ही बातें बताते हैं जिससे उनकी स्वार्थ्सिध्द हो सके, और फिर जब उनका बुढ़ापा आता है तो पता लगता है बेटा तो अपनी बहु के इशारे पर चल रहा है- और तब उनके अन्दर निराशा का भाव पैदा हो जाता है। इसके अलावा यह भी होता है कि बाहर के लोग अपने हित साधने के लिए उन्हें गलत शिक्षा देकर गलत रास्ते पर पहुंचा देते हैं।
हम अपने विश्वासों के साथ जब यह अहंकार पाल लेते हैं कि वही श्रेष्ठ है तो वह एक भ्रम बन जाता है। ऐसा हो सकता है कि हम एक ही ईश्वर में आस्था रखते हौं पर वह हमारे मन में अलग-अलग स्वरूपों में स्थित हो और हम एक दुसरे के विश्वास को अलग समझते हैं -और विश्वास से भ्रम की तरफ चले जाते हैं, इसके लिए जिम्मेदार है हमारे मन में बैठा अहंकार जो शाश्वत सत्य को कभी पहचानने नहीं देता है। हम इसी वजह से अपने लिए मित्र कम शत्रू ज्यादा जुटाते हैं और कुछ तो ऐसे मित्र भी हम नहीं पहचान पाते जो हमारे सामने तो मैत्री भाव का प्रदर्शन करते हैं पर उनके मन में कभी न कभी हानि हानि पहुंचाने की दुर्भावना आती है। इसीलिये हमें अपने अन्दर बैठे अहंकार को पहचानने का प्रयास करना चाहिए।
हमारा बुद्धि तत्व एक ऎसी शय है जिस पर हर कोई अधिकार करना चाहता है। समझदार आदमी यही प्रयास करते हैं कि दुसरे की बुद्ध को प्रभावित कर उसे अपने अनुकूल कर अपने हित साध सके। आज के उपभोक्तावादी युग में आप जो विज्ञापन देख रहे हैं उसमें सारा प्रयास यही होता है कि आम आदमी की बुध्दी को प्रभावित कर अपने उत्पाद बेचे जा सकें । यह तो उनका खुला व्यापार है इसीलिये उसे गलत नहीं ठहराया जा सकतापर पुराने समय में आदमी की बुध्दी पर नियत्रण रखने के लिए राज्य, धर्म, भाषा और स्वर्ग-नरक के नाम पर ऐसे सिध्दान्तों की स्थापना की गयी ताकी वह एक नेतृत्व के अंतर्गत अनुशासित होकर रहे। कालांतर में जब कुछ विश्वासों की पोल खुलने लगी तो उन्हें भय दिखाकर जारी रखने का प्रयास किया गया और जरूरत पड़ने पर राज्दंड का प्रयोग भी किया गया। अब समय बहुत निकल चुका है पर विश्वासों ,विचारधाराओं और धार्मिंक आस्थाओं को इस तरह स्थापित किया गया है आदमी उनसे अपने को अलग इसीलिये नहीं करता कि उसे उस पर विश्वास है बल्कि वह अविश्वास या असहमति जताकर उस समूह या समाज से प्रथक किये जाने के भय से चुप रहता है जिसके नाम पर उसकी पहचान है। यही कारण है कि धरम, जात,भाषा, तथा राजनीतिक समूहों का शीर्ष नेतृत्व उनकी भावनाओं का दोहन कर रहा है।
इसीलिये हमें अपने बुध्दी पर इस तरह नियंत्रण करने के साथ ही मन और अहंकार पर भी दृष्टि रखना चाहिए ताकी हम सामान्य ढंग से अपने जैसे ही लोगों के साथ हिलमिल कर रह सकें। शेष अगले अंकों में ।

1 comment:

रंजू भाटिया said...

अच्छा लगा इस विषय पर पढ़ना ...

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