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6/15/11

खग्रास चंद्रग्रहण एक सामान्य प्राकृतिक घटना है-हिन्दी महालेख (khagras chandragrahan-hindi mahalekh

    दुनियां में सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण आते रहते हैं। बरसों से हम देख रहे हैं पर इतनी चर्चा कभी नहीं होती थी। बचपन में बुजुर्गों के पहले ही पता चल जाता था कि अमुक तारीख को सूर्य ग्रहण या चंद्रग्रहण है। उस दिन कुछ सावधानी बरतने की बात कही जाती पर वह आज के टीवी चैनलों की तरह महाबहस का विषय नहीं होती थी। सच कहें तो सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण को सामान्य घटना ही माना जाता था। कहीं आतंक या डर का माहौल नहीं देखा। आजकल   टीवी चैनलों ने दोनों ग्रहणों का बाज़ारीकरण कर दिया है।
         कह रहे हैं कि डरो नहीं, खूब देखो। कुछ परेशानी नहीं है। इन चैनलों पर बहस के लिये आने वाले वही लोग होते हैं जो पहले भी आते रहे हैं। खगोलशास्त्र से जुड़ी इन घटनाओं पर चर्चा करने के लिये ज्योतिषी बुलाये जाते हैं। फिर उनका मुकाबला करने के लिये कुछ आधुनिक विज्ञान समर्थक भी होते हैं। प्रचार इस तरह किया जाता है कि जैसे हिन्दू समाज में ही अंधविश्वास हो और पश्चिमी विज्ञान एकदम प्रमाणिक है। यह सब देखकर हम तो यह सोचते हैं कि भारतीय हिन्दू समाज इतना अविकसित ओर पिछड़ा नहीं है जितना आधुनिक ज्ञानी समझते हैं। देखा जाये तो हमारी श्रीमद्भागवत गीता के प्रचलन में आने के बाद भारतीय समाज शायद दुनियां का इकलौता समाज है जो समय के साथ आगे बढ़ता जाता है। यह अलग बात है कि प्रगतिशील और जनवाद से जुड़े विद्वानों का सभी जगह बाहुल्य है जिनकी यह मनोवृत्ति है कि संपूर्ण भारतीय अध्यात्म दर्शन को अवैज्ञानिक तथा समाज को जड़ साबित कर अपनी चेतना की व्यवसायिक धारा प्रवाहित की जाये। फिर उनके साथ बहस करने वाले भारतीय अध्यात्म के ज्ञानी भी कुछ इस तरह पेश आते हैं जैसे कि अंधविश्वास का समर्थन कर रहे हों। पेशेवर ज्योतिषी अपने प्रचार क्रे लिये आते हैं तो उनका मुकाबला करने पेशेवर बहसकर्ता आते हैं। चर्चा कराने वाले उद्घोषक का तो कहना भी क्या? निरपेक्ष दिखने की कोशिश इस तरह करते हैं जैसे कि लग रहा हो कि किसी विषय पर सहमति या असहमति न देना ही उनकी योग्यता का प्रमाण हो।
       भारत के हिन्दी टीवी चैनलों में कार्यरत उद्घोषकों का यह भाग्य है कि भारतीय अध्यात्म की व्यापकता ही उनको इस तरह के कार्यक्रम प्रदान करती है। जिसमें ढेर सारे ग्रंथ हैं और उसमें जीवन के हर पक्ष के साथ -जिसमें मनुष्य तथा अन्य जीव भी शािमल हैं-प्रकृति के रहस्यों पर भी प्रकाश डाला गया है। जबकि अन्य दर्शनों में अन्य जीवों की उपेक्षा कर केवल मानव जीवन पर ही अधिक लिखा और बोला जाता हैं। कुछ बातें मनुष्य समाज के संचालन से संबंधित होती हैं।
        प्रकृति के रहस्यों पर पश्चिम तो अब दृष्टिपात कर रहा है जबकि भारतीय अध्यात्म दर्शन में बहुत पहले ही इस पर लिखा गया है। हमने पंचांगों में सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण की तारीखें देखी हैं जो कि यकीनन पश्चिमी विज्ञान से नहीं ली गयीं। पहले लोग अखबार पढ़े बिना बताते थे कि अमुक दिन चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण है।
बहरहाल भारत के टीवी चैनल अपने व्यवसायिक उद्देश्यों की पूर्ति अपने अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर कर लेते हैं यह अलग बात है कि अपने चश्में से समाज को अधंविश्वासी समझने वाले उद्घोषक अपने को भले ही चालाक समझें पर हम सब जानते हैं कि उनकी अदायें ऐसी न हों तो शायद उनका काम भी न चले।
       पिछली बार के पूर्ण सूर्यग्रहण की याद आती है जब कहा गया है कि उसे देखना ठीक नहीं है और देखना है तो विशेष प्रकार के चश्में से देखें। सामान्य रंगीन चश्में से काम नहीं चलेगा। हम आज भी सामान्य काले चश्में से दोपहर मेें तपते हुए सूर्य को आसानी से देख पाते हैं। तब यह सवाल आता है कि ग्रहण के समय जब सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है तो वह सामान्य से अधिक खतरनाक कैसे हो सकता है। उस समय खूब सूर्यगं्रहण देखने वालेचश्में बिके थे उसमें कुछ तो नकली भी बताये गये थे। तय बात है कि बाज़ार ने ही ऐसा प्रचार करवाया होगा ताकि वह अपने उत्पाद बेच सके। वैसे तो इष्ट दिवस, मित्र दिवस, पितृदिवस, मातृदिवस तथा प्रेम दिवस जैसे पश्चिमी दिवसों को भारतीय प्रचार माध्यम अपने प्रायोजक बाज़ार के लिये विज्ञापन प्रसारित कर उसके लिये ग्राहक जुटाते हैं। वैसे ही भारतीय त्यौहारों के साथ सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण भी उनके लिये विज्ञापन प्रसारण के बीच में कार्यक्रम की सामग्री बन जाते हैं।
      वैसे चर्चाओं में शामिल लोग भारतीय समाज को फालतु समझते हैं पर लोगों को लगते स्वयं फालतू हैं-हम नहंी मानते क्योंकि पता है कि यह सब कमाई करने और प्रचार पाने के लिये बहस करने आते हैं।
हम यह खग्रास चंद्रग्रहण देख पायेंगे कि पता नहीं। यह लेख लिखने के तत्काल बाद ही सोने का प्रयास करेंगे। अगर बीच में नींद टूटी तो छत पर देखने जायेंगे कि कैसा है खग्रास चंद्रग्रहण। जहां हानि लाभ, दुःख सुख, और जीवन मरण का सवाल है तो वह इस संसार का हिस्सा हैं। जब तक देह हैं तो विकार आयेंगें। भूख लगेगी, प्यास लगेगी। कभी जीभ किसी नये स्वाद के लिये चीत्कार करेगी। जिस तरह सत्य अनंत है वैसे ही माया भी अनंत है। सत्य सूक्ष्म है और उसे ध्यान आदि के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है तो माया इतनी व्यापक है कि उसके चक्र में फंसे तो सभी हैं पर समझ नहीं पाते। खेलती माया है और आदमी सोचता है कि मैं खेल रहा हूं।
      जहां तक चर्चाओं का सवाल है तो भारतीय अध्यात्म इतना विशाल है कि जिस विषय पर चाहो बहस कर लो। जहां चार बुजुर्ग मिलते हैं किसी न किसी धर्मग्रंथ पर बहस करने लगते हैं। सभी अपना ज्ञान सुनाते हैं पर सुनता कौन है पता नहीं। सभी बोलते हैं। यही हाल टीवी चैनलों का है पर वहां के उद्घोषक तमाम तरह के तामझाम और आकर्षण मे घिरे होते हैं इसलिये उनको विद्वान माना जाता है। यह अलग बात है कि उनकी महाबहस-यह शब्द आज तक हमारे समझ में नहीं आया-अध्यात्मिक में वास्तविक रुचि रखने वालों के लिये हास्य का विषय होती है।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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1/16/10

मनु संदेश-बुद्धिहीन को दंड का उपयोग करना नहीं आता (rajya aur dand-hindu dharma sandesh)

स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें। एक बात याद रखें कि बुद्धिमान, ज्ञानी और विद्वान लोगों की समझ से ही समाज, राष्ट्र और धर्म संकट से उबर सकता है। ऐसे लोगों की उपेक्षा से समाज गर्त में चला जाता है और राष्ट्र पर संकट आते रहते हैं।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.wordpress.com

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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

1/6/08

बाबा रामदेव को चुनौती देने से अच्छा है उनसे इलाज करवाएं

इंडियन मेडिकल एसोसियेशन I.M.A. ने योग गुरु रामदेव के इस बयान का विरोध किया है जिसमें उन्होने कहा था की डाक्टर लोगों की बीमारियों को बढाचढा का बताते हैं। ई।M।आ। ने बाबा को चुनौती भी दी है कि वह अस्पतालों में जाकर केंसर पीडितों का इलाज करके बताएं।

यहाँ पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं प्रतिदिन योग साधना करता हूँ पर बाबा रामदेव का मैं शिष्य नहीं हूँ पर वह जिस तरह लोगों में योग साधना और अन्य विषयों पर चेनता जागृत कर कर रहे हैं उसका समर्थक हूँ और कुछ ऐसे विषय भी हैं जिनसे मेरी सहमति नहीं होती पर इसके बावजूद मानता हूँ कि वह इस भारतीय समाज के लिए जो कर रहे हैं वह बहुत आवश्यक है। इसलिए जब मैंने I.M.A.आ।द्वारा उनकी आलोचना पढी तो मुझे लगा कि शायद वह उनकी bat समझ नहीं पाए। बाबा ने जो कहा है वही आम लोग भी कहते हैं और उन्होने तो केवल दोहराया भर है।

ऐसा नहीं है कि पहले लोग बीमार नहीं पड़ते थे पर अपने गली मोहल्लों में ही इलाज कराकर सही होते और आज भी लोग उनके पास जाते हैं। वजह यह है कि छोटी-मोटी बीमारी वही ठीक हो जाती है। अगर अधिक पढे-लिखे डाक्टर होते हैं तो तमाम तरह के टेस्ट कराने में लोगों का समय और पैसे बर्बाद कर देते हैं। हर बार बीमारी बड़ी होने का अंदेशा डाल देते हैं और आदमी उनके पास जाने से घबडाता है। उच्च रक्तचाप और मधुमेह तो वैसे भी दिमागी तनाव से होते हैं और अगर किसी को अपनी इन बीमारियों के बारे में पता चले तो वैसे ही उसका मनोबल गिर जाता है। इधर डाक्टर दवाएं लिखते जाते और कहते भी जाते-''आप चिंता मत करो'।

मधुमेह के मरीज जो मरीज खाने के पहले और बाद गोली लेने के चिंता करते हैं और चिंता तो वैसे भी शरीर की दुश्मन मानी जाती है-ऐसे में यह समझ में नहीं आता कि गोली क्या काम करेगी। चिकित्सा विज्ञान कहता है कि हमारा शरीर बहुत लोचदार है और कई तरह के समायोजन स्वयं ही करता है अगर गोली लेने के बाद किसी को खाना पचा तो वह गोली लेने के कारण पचा या 'अब खाना पच जायेगा' इस चिता से मुक्त होने के कारण पचा कोई नहीं बता सकता।

यह सब दिमागी खेल है यह तो सभी मानते हैं। फिर I.M.A. के पास इस बात की क्या गारंटी है कि देश के सभी डाक्टर दूध के धुले हैं और अपने व्यवसाय के लिए बीमारी को बढाचढा कर नही बताते। इसलिए उन्हें बाबा रामदेव की आलोचना से पहले देश में जो डाक्टरों के बारे में धारणा व्याप्त है उस पर विचार करना चाहिए।
बाबा रामदेव को कैसर अस्पतालों में जाकर मरीजो को इलाज करने की चुनौती देने से पहले तो उनको इस बात का जवाब देना चाहिए कि क्या वह अपने अस्पतालों में आये मरीजों के अलावा कहीं किसी का इलाज करने जाते हैं?क्या उनको जब पता लगता है कि दूर-दराज के गावों में कोई कैसर का मरीज है तो वहाँ जाते हैं? वैसे भी जिसको डाक्टरों ने कैंसर बता दिया तो उसका मनोबल तो वैसे ही टूट जाता है और बिना मनोबल के योग साधना शुरू कोई नहीं कर सकता। अगर वह बाबा को यह कहकर चुनौती देते हैं कि 'वह तो योगी हैं और उन्हें जाना चाहिए' तो मैं उनको बता तूं जिस भारतीय दर्शन की ईजाद योग है वह यह भी कहता है कि अगर 'कमल जल से दूर है तो सूर्य भी उसको जीवन प्रदान नहीं कर सकता'। आदमी के जीवन के लिए यह मनोबल भी जल की तरह है और बाबा को चुनौती देने वाले अपने यहाँ से ही ऐसे मरीज जिनके बारे में डाक्टरों को पता लगता है कि उसे कैंसर है तो उसे बिना बताये ही बाबा रामदेव के शिविर में ले जाएं और अपनी दवाईयां देकर वहाँ योगासन के साथ उसका इलाज करें तब उनकी विश्वसनीयता बढेगी-जैसा कि खुद I.M.A.ने कहा भी है कि वह योग के प्रभाव को स्वीकार करती हैं।

11/3/07

मनु स्मृति:दूसरे के अधीन होना दु:खकारक

१.जो कार्य दूसरों के अधीन रहकर ही किये जा सकते हैं उनको पूरी तरह त्याग देना ही श्रेयस्कर है, तथान अपने अधीन सभी कार्यों का अनुष्ठान पूरे प्रयत्न करना चाहिए।

२.जो कुछ दूसरे के अधीन है, वह सब दु:ख है और जो अपने वश में है वही सुख है। यही सुख-दुख के लक्षण हैं।

३.जिस कार्य से मन की शांति तथा अंतरात्मा को प्रसन्नता प्राप्त हो, उसे करने का पूरा प्रयत्न करना चाहिऐ, परन्तु जिस कार्य से मन में अशांति होती है उसे त्याग देना ही अच्छा है।

४.परमात्मा की सता में अविश्वास रखना, वेदों की निंदा करना, देवताओं की अवज्ञा, शत्रुता-विरोध, पाखण्ड, अंहकार, क्रोध करना तथा स्वभाव में उग्रता होना ऐसे दोष हैं, जिनका त्याग करना चाहिऐ।
५.किसी के द्वारा अपराध हो जाने पर क्रोधवश उसे पीटने के लिए डंडा नहीं उठाना चाहिए, व्यक्ति को केवल अपने पुत्र या शिष्य को शिक्षित करने की मर्यादा निभाने के लिए ही उसे पीटने का अधिकार है।

9/15/07

श्री गणेश जी को कोटि-कोटि नमन

महाभारत ग्रंथ की रचना के साथ वेद्व्यास जी का नाम जुडा हुआ है, पर इस बात की चर्चा बहुत कम ही होती है उसके लेखक तो भगवान श्री गणेश जी ही थे। भगवान ब्रह्मा जी के आदेश पर श्री वेदव्यास से ने यह ग्रंथ लिखने के लिये ही गणेश जी का स्मरणं किया था। वह प्रकट हुए तो वेदव्यास जी ने उनसे आग्रह किया कि मैं महाभारत की कथा बोलता जाऊंगा और आप लिखते जाईयेगा।
श्री गणेश जी बहुत प्रसंन हुए और बोले-' मैं लिखता जाऊंगा पर मेरी कलम नहीं रुकना चाहिये।'
वेदव्यास जी ने उनकी बात मान ली साथ ही कहा-'आप भी सोच समझ कर लिखियेगा।'
आज हम जिस श्रीमदभागवत गीता का जो विश्व व्यापी प्रभाव देख रहे हैं वह महाभारत ग्रंथ का ही एक भाग है और कहना चाहिये कि सबसे महत्वपूर्ण भी है। भारत के विद्वान मनीषियों ने इसे सोच-विचारकर महाभारत से प्रथक करने का निर्णय किया क्योंकि इसमें शाश्वत सत्य का जो उदघाटन किया गया है उसको देखते हुए आवश्यक भी था।
श्रीमदभागवत गीता की चर्चा आज पूरे विश्व में होती है और यही कारण है कि भगवान श्री क्रुष्ण का नाम जहां घर-घर में जाना जाता पर कई लोगों को तो यह भी पता नहीं कि इस पवित्र ग्रंथ को विश्व में स्थापित करने का श्रेय श्री गणेश जी की कलम को भी है। महर्षि वेदव्यास का नाम तो फ़िर भी चर्चा में आता है पर श्री गीता के नाम से तो कभी श्री गणेश जी का नाम जोडा ही नहीं जाता।महाभारत जैसा इतना बृहद ग्रंथ लिखने के बावजूद उस पर अपना नाम तक उन्होने अंकित नही किया। भगवान श्री कृष्ण ने जिस निष्काम भाव से कर्म करने का जो उपदेश दिया उसके एक प्रतीक श्री गणेश जी भी है, आमतौर से ऐसी चर्चा बहुत कम लोग करते है। श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया वही महर्षि वेद्व्यास जी ने बोला और गणेश जी ने लिखा केवल इसलिये ही उनको बुद्धि का देवता नहीं माना जाता बल्कि उन्होने कई ऐसे उदाहरण भी प्रस्तुत किये जिससे इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि मनुष्य की बुद्धि ही उसकी पहचान है। अपनी बुद्धि से वह जैसे कर्म करेगा वैसी ही उसकी मानव समाज में पहचान होगी। जब देवताओं में सर्वश्रेष्ठ कहलाने के लिये पूरी दुनिया की परिक्रमा करने की होड लगी तब वह बहुत देर तक वहीं अपने माता-पिता के पास बैठे रहे और फ़िर उठे और उनकी परिक्रमा कर वहीं बैठ गये और विजेता घोषित किये गये। इसी कारण उन को पूजा में सबसे पहले स्थान मिला। कभी उनके क्रोध कराने या युद्ध में भाग लेने की चर्चा भी नही आती। अन्य देवताओं द्वारा युद्ध में भाग लेने और अपनी शक्ति के द्वारा उसमें विजय प्राप्त करने के ढेर सारे प्रसंग है पर श्री गणेश जी बौद्धिक् शौर्य से सारे संसार को पल भर में जीतने के पराक्रम के कारण सारे विश्व में शुभ का प्रतीक बन गये। अगर उनके चरित्र को देखें तो मनुष्य में बुद्धि तत्त्व की कितनी प्रधानता हो सकती है इसका ज्ञान मिलता है
अगर हम देखें तो वास्तव में मनुष्य अपनी ही बुद्धि के अनुसार ही अच्छे और बुरे कर्म करता है। इसी कारण हमेशा ही यह कहा जाता है कि अपनी बुद्धि में अच्छे विचार और संस्कार धारण करो तो स्वतः ही अच्छे काम करोगे। हमने देख होगा कि वैसे तो धनवान, उच्च पदासीन लोग सदैव सम्मान पाते हैं पर जब विपत्ति आती है तब सलाह्-मशविरा के लिये बुद्धिमान लोगों की शरण ली जाती है और वह उसका निवारण भी करते हैं। यही कारण है कि बौद्धिक शौर्य के प्रतीक भगवान श्री गणेश जी विघ्न निवारक भी माना जाता है और इसलिये कोई शुभ कार्य प्रारम्भ होने से पहले उनकी स्तुति की जाती है। मन में यह भाव रहता है कि चूंकि कोई भी काम बौद्धिक चातुर्य के बिना सम्पंन नही हो सकता इसलिये श्री गणेश जी का स्मरणं किया जाता है।
गणेश चतुर्थी के इस पावन पर्व पर हमें यह याद रखना चाहिये कि शिव्-पार्वती पुत्र श्री गणेश महाराज न केवल शुभ के प्रतीक हैं बलिक उनसे यह प्रेरणा भी मिलती है कि अपने जीवन का लक्ष्य अगर पाया जा सकता है तो वह केवल बौद्धिक शौर्य, धैर्य और संयम से पाया जा सकता है। अपनी सफ़लता के लिये किसी को गिराने, अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिये दूसरे की निंदा करने और अपनी उपलब्धि की लिये दूसरे का अधिकार छीनने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही सहजता, सरलता और शांति से अपना कार्य संपन्न करने की प्रेरणा भी मिलती है।
भगवान गणेश सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणों के ईश माने जाते हैं। गुणों का ईश ही प्रणवस्वरूप 'ॐ' है। प्रणवस्वरूप 'ॐ' में गणेश जी की मूर्ति सदा स्थित रहती है। अत: 'ॐ' गणेश जी की प्रणवाकार मूर्ति है, जो वेद मन्त्र के प्रारंभ में रहती है। इसीलिये 'ॐ' को गणेश जी की साक्षात मूर्ति मानकर वेदों के पढने वाले सबसे पहले 'ॐ' का उच्चारण करते हैं। श्री गणेश जीं को मेरा कोटि-कोटि नमन।

9/12/07

स्मृतियां तो तनाव पैदा करती है

काल का विभाजन तीन प्रकारों -भूत, भविष्य, और वर्तमान-में किया गया है। इनमें भविष्य का हमें पता ही नहीं होता कि क्या होने वाला है, इसी तरह वर्तमान इतनी तेजी से भूतकाल में परिवर्तित हो रहा है कि हमें पता ही नहीं लगता कि प्रत्येक क्षण भूतकाल में चला जाता है। इसीलिये कभी-कभी सन्देह होता है कि वर्तमान काल को माना भी जाये कि नहीं। इस हालत में ले-देकर विचार करने के लिए हमारे पास भूतकाल ही रह जाता है।

अगर हम थोडा मनन करें तो लगेगा के हम तो केवल भूतकाल के बारे में ही अधिक सोचते हैं या फिर भविष्य की चिंताओं में ही खोये रहते हैं। इसलिये कहा भी जाता है कि मन के पक्षी के दो पंख है-भूत और भविष्य जिसके सहारे वह उड़ता है। अगर उसके यह दो पंख काट दो तो वह उड़ना बंद कर देगा और मनुष्य कालातीत स्थिति में पहुच जायेगा। यह कालातीत स्थिति ही स्वरूप स्थिति (आत्म साक्षात्कार ) की स्थिति है।

अगर थोडा विचार किया जाये कि किस प्रकार भूतकाल की स्मृतियों से अपने को मुक्त करें? हम भूतकाल की अपने लिए प्रिय और सुखद स्मृतियों को सदैव याद रखना चाहते और जो दु:खद स्मृतियां हैं उन्हें भूलना चाहते हैं, यह संभव नहीं है। जिस तरह हम इन्टरनेट पर कोई एक शब्द टाईप का रख दें तो उससे संबधित सारी वेब साईट आ जाती है और उनमें कई सारी हमारे काम की नहीं होती और हम उन्हें अनदेखा करने का प्रयास करते हैं। मस्तिष्क भी एक तरह से प्राकृतिक कंप्यूटर है यह हम सब जानते हैं। जब हम उसमें अपने अन्दर मौजूद स्मृतियों का बटन दबाते हैं तो वह भी स्मृतियां भी चली आती हैं जो हमें अच्छी नहीं लगती और जिनसे हमारे दिमाग में तनाव उत्पन्न होता है। इसलिये हमें सब स्मृतियों को भूलना होगा-अच्छी और बुरी दोनों । महर्षि अष्टावक्र कहते हैं -'सर्वविस्मरणादृते' सब कुछ भूलना होगा। आचार्य रजनीश स्मृति को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु मानते थे।

स्मृति हमेशा भूतकाल की होती है। जो बातें बीत चुकी हैं, जो विषय समाप्त हो चुके हैं, जो लोग हमारे सामने से जा चुके हैं या जिनका निधन हो गया है उन्हीं की स्मृति हमारे मानस पटल पर होती है। यह स्मृति हमेशा ही हमें परेशान करती है। भूतकाल के क्षणों में अर्थात मरे क्षणों में ही अपना समय बिताना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। हमारे प्रत्येक कार्य में ऊर्जा का क्षरण होता है और भूतकाल के चिन्तन और मनन में हमारी ऊर्जा व्यर्थ ही जाती है। यदि हम इसी ऊर्जा का प्रयोग ध्यान में करें तो हमें बहुत लाभ हो सकता है। हमको मन को रोकने में, ध्यान करने में बहुत ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो भूतकाल के चिन्तन में व्यर्थ चली जाती है।

अब विचार इस बात का उठता है कि हम अपनी इन भूतकाल की स्मृतियों से कैसे मुक्ति पायें।इसका उपाय यह है कि जैसे-जैसे मन में ये स्मृतियां आयें उन्हें ध्यान से देखते रहें। केवल ध्यान दें और उनके अच्छे या बुरे होने का विचार ना करें। यह नित्य ध्यान से देखें कि ये तो बीती हुईं है अर्थात यह तो मरी हुईं है इनकी अब कोई दैहिक या भौतिक सत्ता नहीं। यह तभी संभव है जब आपका चित्त शांत हो और चित्त तभी शांत रह सकता है जब हम ध्यान करें। ऐसा करने पर ही वह कालातीत अवस्था ( आत्म साक्षात्कार) की स्थिति प्राप्त होगी। यह एक सर्वश्रेष्ठ उपाय है अगर किया जाये तो जीवन में प्रसन्नता का अनुभव किया जा सकता है।

8/18/07

अधर्म से हुआ विकास क्षणिक रुप से ही लाभदायक

  1. भजन, निद्रा, भय और मैथुन की प्रवृति मनुष्य और पशुओं में ऐक समान होती है पर धर्म ही ऐक ऐसा विषय है जो दोनों को प्रथक करता है।
  2. समस्त प्राणियों को परलोक में अपनी सहायता के लिए धर्म का शनै:शनै: उसी प्रकार संचय करना चाहिए जैसे दीमक बांबी का संचय कर लेती है।
  3. पुराणों का मत है कि ईश्वर प्रसाद ही कर्मों का फल है और कर्ता को फल देकर ही रहता है
  4. मनुष्य की सात्विक प्रवृति को ही धर्म कहते हैं। मनीषियों का कथन है कि मन के द्वारा हे किया हुआ धर्म श्रेष्ठ है।
  5. सभी प्राणी जिस सुख की इच्छा रखते हैं वह धर्म से ही उत्पन्न होता है।
  6. धर्म का पालन करते हुए जो धन प्राप्त होता है वही सच्चा धन है
  7. अधर्म की आचरण से मनुष्य को जो विकास या वृद्धि दिखाई देती है वह क्षणिक होती है। मनुष्य अधर्म से विकास कि ओर बढ़ता दिखाई देता है और उसको इसमें कल्याण होता भी दिखता है। वह अपने शत्रुओं को भी परास्त करता है पर अंतत: स्वयं समूल नष्ट हो जाता है।

5/19/07

एक भक्त की कलम से

NARAD:Hindi Blog Aggregatorहर व्यक्ति के मन में उसके इष्ट का वास होता है, यह अलग बात है कि कोई उसे जानता है और कोई नही । जब आदमी बच्चा होता है तब उसके माता पिता जिस इष्ट की आराधना करते हैं, धीरे धीरे वह उसके मन में दाखिल होकर उसका स्वामी हो जाता है। हां, अपने कामकाज और अन्य कारणों से आदमी उसके प्रति उदासीन हो जाता है पर जब उसकी कोई उसकी चर्चा करता है तो उसका मन प्रफुल्लित हो उठता है-और अगर कोई उसकी निंदा करे तो उसे गुस्सा आ जाता है। चूंकि अधिकांश लोग इस संसार में ही ज्यादा मन लगाते हैं तो अपने इष्ट की तरफ से ध्यान हटा लेते हैं और उनकी मन स्थिति कमजोर हो जाती है और अगर उसे कोई यह कहे के अमुक आदमी ने तुम्हारे इष्ट का अपमान किया है तू वह उत्तेजित हो जाते है । अब कुछ नाराज होकर तथाकथित रुप से शाब्दिक रुप से अपने क्रोध का प्रदर्शन कर रह जाते हैं तो कुछ अपनी शार्रीरिक शक्ति का उपयोग करने लग जाते हैं। भारत का आदमी धर्म के बारे में बहुत संवेदनशील है और यहां इसी वजह से धर्म के ठेकेदार ज्यादा ही है जो गाहे-बगाहे अपने स्वार्थों के लिए ऐसे फसाद कराते रहते हैं जिससे उनका प्रभाव न केवल अपने समाज में बल्कि दुसरे समाजों में भी बना रहे । यही कारण है कि विश्व में आध्यात्मिक गुरू कहलाने के बावजूद हमारे देश के लोगों की छबि रूढ़ वादी और अंधविश्वास के कारण अच्छी नहीं बनी है।

जो मेरा इष्ट है वही तुम्हारा भी इष्ट है यह हम सब मानते हैं, फिर आख़िर यह झगडा क्यों होता है? केवल इसीलिये हे न कि उसके स्वरूप हम अलग देखते हैं। हम दावा करते हैं कि हम अपने इष्ट को मानते है पर हम उस इष्ट को अपने हृदय में धारण कितना करते हैं यह कभी सोचा ही नहीं । नाम लेकर नामा बटोरने चल पड़ते है और सोचते हैं कि हो गया हमारा जीवन धन्य ! हमारे देश में अनेक महापुरुष हुए हैं कुछ को अवतार कहा जाता है तो कुछ को संत । यहां बता दें के हमारे समाज में संत और अवतार का दर्जा समान माना जाता है। क्योंकि संतों को गुरुओं के रुप में मान्यता मिलती है और कहा जता है कि गुरू ही गोविन्द के दर्शन कराते हैं इसीलिये वह बडे हैं। अवतारी पुरुष भी गुरू का सम्मान करना ही धर्म और भक्ती का एक हिस्सा मानते हैं-और यह बातें वही समझ पा ता है जो अपने इष्ट और गुरू को धारण करे। हमारे देश में कई गुरूओं के कई चेले मिल जाएंगे और अपने गुरुओं और इष्ट का बखान करेंगे जैसे आध्यात्म की बात न करके वाक्युध्दु कर रहे हौं । अपनी भक्ती अपने मन में रखने की बात होती है लोग चिल्लाकर उसका बखान करते है और होता यह कि कई जगह तो इस बात पर बात-बात में सामुहिक झगडा हो जाता है किसका इष्ट बड़ा है।

मैं अपने इष्ट और गुरू के बारे में मानता हूँ कि कोई उनके अपमान करने की ताकत ही नहीं रखता ! वजह साफ है कि मैं जानता हूँ कि मेरे इष्ट और गुरू मेरे मन में है कोई उन्हें देख ही नहीं सकता तो अपमान क्या खाक करेगा। अगर कोई व्यक्ति मुझसे आकर कहे कि अमुक व्यक्ति ने तुम्हारे गुरू और इष्ट का अपमान किया है तो मेरे अन्दर कोई प्रतिक्रिया नहीं होगी -क्योंकि मैं समझता हूँ कि उस व्यक्ति के मन में कुछ ऐसा है जो वह अपना स्वार्थ सिध्द करना चाहता है-अगर सच्चा भक्त होता तो वहाँ से उठकर चल देता जहाँ निंदा रह रही थी। वह मुझसे अगर यह कहेगा कि तुम्हारा और मेरा इष्ट और गुरू है एक है और चलकर उस निंदक से लड़ते हैं तो भी मैं उसकी बात पर ध्यान नही दूंगा क्योंकि जिस इष्ट को मैंने धारण किया है उसके चरित्र से सीखा है कि आदमी को सहज भाव का त्याग नहीं करना चाहिए और युध्द अस्त्र-शस्त्र से नहीं बल्कि कुशलता से जीते जाते है और कभी कभी तो एसी कुशलता दिखानी चाहिए कि बिना हिंसा के ही युध्द जीत लिया जाये। मेरे गुरू ने मुझे सिखाया है कि दुष्ट लोग ही संतों और दुसरे के इष्ट पर आक्षेप करते हैं और वह लोग अपने पापों का बोझ इतना बड़ा लेते हैं कि एक दिन खुद उसके तले दबकर भारी तकलीफ में आ जाते हैं।

कुल मिलाकर भक्ती बाहर दिखने की चीज नहीं है वह तो अपने मन में धारण करने के लिए है क्योंकि उससे हमारे विचार और भाव शुध्द रहते है। हमारे इष्ट और गुरू का कोई अपमान भी कर सकता है यह मानने का मतलब ही यही है कि हमारे भक्ति-भाव में कहीं कोई कमी है जो हम उत्तेजित हो जाते हैं। अपमान एक खराब शब्द है तो उससे हम सुने ही क्यों ? जितने भी गुरू हुए हैं वह यही कहते हैं कि बुरा मत कहों, बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो -क्या हमें अपने इष्ट और गुरुओं की बात नहीं माननी चाहिए । मैं अपने जैसे भक्तों से मुखातिब हूँ जो बडे भावुक होते हैं और उम्मीद हैं वह मेरी बात समझ ही गये होंगें - भले ही उनके गुरू और इष्ट का स्वरूप अलग हो पर हैं तो भक्त ही न ! जो भक्ती के अलावा और किसी बात पर ध्यान नहीं देते और कुछ लोग उनकी इस तल्लीनता में भंग डालने के लिए ऐसे मसले लाते है जिससे उनकी भक्ती और समाज की शांति में खलल पडे। ऐसे भक्तो को मेरा प्रणाम इस सलाह के साथ कि वह अपने भक्ती में तल्लीन रहें किसी की बातों में न आयें ।

5/9/07

हिंदू धर्म में ज्ञान के साथ विज्ञान भी मौजूद है

NARAD:Hindi Blog Aggregator पिछले कयी दिनों से देश में धर्म को लेकर अनेक तरह के विचार व्यक्त किये जा रहे हैं। एक खास बात जो सामने आ रही है युवा वर्ग में धर्म के प्रति रुझान बढ रहा है । इसका मुख्य कारण यह है कि आजकल घरों में उनको ऐसा धार्मिक माहौल नहीं मिल रहा जैसे पहले वाली पीढ़ी को मिलता था, इसके अलावा उन्हें बाल्यावस्था में ही ऐसे भौतिक साधन मिल रहे हैं जिनसे अमेरिकी अब अपने यहां बोरियत अनुभव करने लगे हैं , उनसे उकताने के बाद जब युवक और युवतियां कहीं अध्यात्म पर चर्चा सुनते है तो उन्हें नवीन भाव का अनुभव होता है ।हालांकि आज के अनेक धर्म गुरू केवल अपनी स्वार्थ सिध्दी के कारण ही इस क्षेत्र मैं हैं , उनका उद्देश्य केवल अर्थोपाजन करना ही है न कि धार्मिक परंपराओं को बढ़ाने के लिए प्रयास करना -यही कारण है कि जितने भी धर्म गुरू हैं वह करोड़ों में खेल रहे हैं , फिर भी किया क्या जाये ? युवक-युवतियों को अपनी उकताहट दूर करने तथा मन में शांति के लिए उनके पास इन संतों के प्रवचन सुनने का अलावा कोई चारा भी तो नहीं है।
मैं देश में चल रहे माहौल को जब देखता हूँ जिसमें हिदू धर्म के प्रति लोगों के मन में तमाम विचार आते हैं पर उनका कोई निराकरण करने वाला कोई नहीं है। धर्म के नाम पर भ्रम और भक्ती के नाम पर अंधविश्वास को जिस तरह बेचा जा रहा है, वह चिंता का विषय है । विरोध करने पर आदमी को नास्तिक और तर्क देने पर कडी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। हिंदू धर्म की को पूरी दुनिया सम्मान की दृष्टि से देखती है पर अपने ही देश में धर्म के ठेकेदोरों ने लोगों की बुध्दी का दोहन केवल अपने तुच्छ स्वार्थों की खातिर कर इसको बदनाम कर दिया। हिंदू धर्म के तमाम ग्रंथ हैं और उनमें कुछ ऎसी तमाम बातें है जो उस समय ठीक थीं जिस समय वह कहीं और लिखी गयी थीं, समय के साथ लोग उनसे बिना कहे दूर होते गये। पर जीवन के आर्थिक, सामाजिक , स्वास्थ्य और विज्ञान की दृष्टि से जितना हमारे ग्रंथों में हैं उतना किसी अन्य धर्म में नहीं है। हाँ, इस धर्म को बदनाम करने के लिए इसके विरोधी केवल उन बातों को ही दोहराते हैं जो किन्हीं खास घटनाओं या हालतों में लिखीं गयी थीं और आज अप्रासंगिक हो गयी हैं और लोग उन्हें अब दोहराते ही नहीं है। अब आप लोग कहेंगे कि इतनी सारी पुस्तकों के कारण ही हिंदु धर्म के प्रति भ्रांति फैली है तो मैं आपको बता दूं कि सारे ग्रंथों का सार श्रीमद्भागवत गीता में है। जिसने गीता पढ़ ली और उससे ज्यादा समझ ली उसे कुछ और पढने की जरूरत ही नहीं है। यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई संत या सन्यासी नहीं हूँ न बनूंगा क्योंकि गीता पढने वाला कभी सन्यास नही लेता । वैसे भी आजकल केवल धर्म का ज्ञान होना इतना जरूरी नहीं जितना धर्म के व्यापार के लिए अच्छे प्रबंधक साथ में न रखना । इस पर ज्यादा प्रकाश विस्तार से मैं बाद में डालूँगा , आज मैं ज्ञान सहित विज्ञान वाले इस ग्रंथ में जो भृकुटी पर ध्यान रखने की बात कही गयी है वह कितनी महत्वपूर्ण है-उसे बताना चाहूंगा । शायद भारत में भी कभी इस बात की चर्चा नही हुई कि हिंदु धर्म की सबसे बड़ी ताकत क्या है जो इतने सारे आक्रमणों के बावजूद यह बचा रहा है। अगर लोगों को यह लगता है कि हिंदू कर्म कान्ड भी धर्म का हिस्सा हैं तो मैं आपको बता दूं कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहीं भी कर्मकांड के महत्व की स्थापना नहीं की । उन्होने गीता में ध्यान के सिध्दांत की जो स्थापना की वह आज के युग में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ध्यान वह शक्ति है जो हमें मानसिक और शारीरिक रुप से मजबूत करती है जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है। मैं अपने हिसाब से ध्यान की व्याख्या करता हूँ ।
अब तो अनेक पश्चिमी विद्वान् भी मानने लगे हैं हिंदूं की असली शक्ति उनके ध्यान में है, और ज्ञान का केंद्र श्रीमदभागवत गीता में है ।
ध्यान क्या है पहले इस बात को समझ लें । हम सोते हैं और नींद लग जाती है तो लगता है आराम मिल गया पर आजकल की व्यस्त जिन्दगी में तमाम तरह के ऐसे तनाव हैं जो पहले नहीं थे । पहले आदमी सीमित दायरे में रहते हुए शुध्द चीजों का सेवन करते हुए जीवन व्यतीत करते थे और उनकी चिताएँ भी सीमित थीं इसीलिये उनका ध्यान नींद में भी लग जाता था । शुध्द वातावरण का सेवन करने के कारण उन्हें न तो ध्यान की जरूरत महसूस हुई और न गीता के ज्ञान को समझने की। हालांकि मैं अपने देश के पूर्वजों का आभारी हूँ कि उन्होने धार्मिक भावनाओं से सुनते-सुनाते इसे अपनी आगे आने वाली पीढी को विरासत में सौंपते रहे । आज हमारे कार्य के स्वरूप और क्षेत्र में व्यापक रुप से विस्तार हुआ है और हम अपने मस्तिष्क के नसों को इतनी हानि पहुंचा चुके होते हैं कि हमें रात की नींद ही काफी नहीं लगती और हम बराबर तनाव महसूस करते हैं । रात में हम सोते हैं तब भी हमारा मस्तिष्क बराबर कार्य करता है और वह दिन भर की घटनाओं से प्रभावित रहता है। ध्यान हमेशा ही जाग्रत अवस्था में ही लगता है । ध्यान का मतलब है अपने दिमाग की सर्विस या ओवेर्हालिंग । जिस तरह स्कूटर कार मोटर सायकिल फ्रिज पंखा एसी और कूलर की सर्विस कराते हैं वैसे ही हमें खुद अपने दिमाग की भी करनी होगी। एक तरह से हमें अपना मनोचिकित्सक स्वयं ही बनना होगा। जिस बात का जिक्र मैंने शुरू में नहीं किया वह यह कि मुझे याद है जब चार वर्ष पूर्व किसी अखबार में पढा था कि एक अमेरिकी विज्ञानिक का मत है कि हिंदूओं कि सबसे बड़ी ताकत है ध्यान । फिर भी भारत के प्रचार माध्यमों ने इसे वह स्थान नहीं दिया जो देना चाहिए था । यहां मैं ध्यान की विधि बताना ठीक समझता हूँ । सुबह नींद से उठकर कहीं खुले में शांत स्थान पर बैठ जाएँ और पहले थोडा पेट को पिच्काये ताकी हमारे शरीर में से वायू विकार निकल जाएँ और फिर नाक पर दोनों ओर उंगली रखकर एक तरफ से बंद कर सांस लें और दूसरी तरफ से छोड़ें। ऐसा कम से कम बीस बार करें और दोनों तरफ से सांस लेने और छोड़ने का प्रयास करें । उसके बाद बीस बार अपने श्री मुख से ॐ शब्द का जाप करे और फिर बीस बार ही मन में जाप करें और धीरे अपने ध्यान को भृकुटी पर स्थापित करें। जो विचार आते हैं उन्हें आने दीजिए क्योंकि वह मस्तिष्क में मौजूद विकार हीं हैं जो उस समय भस्म हो रहे होते हैं। यह आप समझ लीजिये । धीरे धीरे अपने ध्यान को शून्य में जाने दीजिए-न जा रहा है तो बांसुरी वाले के स्वरूप को वहन स्थापित करिये -धीरे स्वयं ही आपको ताजगी का अहसास होने लगेगा । अपने ध्यान पर जमें रहें उसे भृकुटी पर जमे रहने दीजिए । ऐसा नहीं है कि केवल सुबह ही ध्यान किया जाता है आप जब भी तनाव और थकान अनुभव करे कहीं भी बैठकर यह करें। शुरूआत में यह सब थोडा कठिन और महत्वहीन लगेगा पर आप तय कर लीजिये कि मैं अपने को खुश रखने के लिए यह सब करूंगा ।कुछ लोग इसे मजाक समझेंगे पर यह मेरा किया हुआ अनुभव है। अगर मैं यह ध्यान न करूं तो इस तरह कंप्यूटर पर काम नहीं कर सकता जिस तरह कर रहा हूँ। कम्प्युटर, टीवी और मोबाइल से जिस तरह की किरणें उठती है उससे हमारे दिमाग को हानि पहूंचती है यह भी वही वैज्ञानिक बताते हैं जिन्होंने इसे बनाया है। शरीर को होने वाली हानि तो दिखती है पर दिमाग को होने वाली का पता नहीं लगता। ध्यान वह दवा है जो इसका इलाज करने की ताक़त की रखता है। ध्यान पर ऐसे अनेक प्रयोग किये गये हैं जिनसे पता लगता है वह आदमी के मन में एक स्फूर्ति पैदा करता है। शेष अगले अंकों में।

4/30/07

महायोगी की आलोचना से पूर्व आत्मविश्लेषण करें

भारत में आजकल एक फैशन हो गया है कि अगर आपको सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करनी हो तो हिंदू धर्म या उससे जुडे किसी संत पर आक्षेप कर आसानी से प्राप्त की जा सकती है। मुझे ऐसे लोगों से कोई शिक़ायत नहीं है न उनसे कहने या उन्हें समझाने की जरूरत है। अभी कुछ दिनों से बाबा रामदेव पर लोग प्रतिकूल टिप्पणी कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की होड़ में लगे है । इस समय वह भारत में ही नहीं वरन पूरे विश्व में लोकप्रिय हो रहे हैं ,और मुझे नहीं लगता कि आजादी के बाद कोई व्यक्ति इतनी लोकप्रियता हासिल कर सका हो। सूचना तकनीकी में हम विश्व में उंचे स्थान पर हैं पर वहां किसी व्यक्ति विशेष को यह सम्मान नहीं प्राप्त हो सका है। बाबा रामदेव ने हिंदूं धर्म से योगासन, प्राणायाम, और ध्यान की जो विद्या भारत में लुप्त हो चुकी थी उसे एक बार फिर सम्मानजनक स्थान दिलाया है, उससे कई लोगों के मन में कुंठा उत्पन्न हो गयी है और वह योजनापूर्वक उन्हें बदनाम आकर रहे हैं।पहले यह मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने आज से चार वर्ष पूर्व जब योग साधना प्रारंभ की थी तब बाबा रामदेव का नाम भी नही सुना था। भारतीय योग संस्थान के निशुल्क शिविर में योग करते हुए लगभग डेढ़ वर्ष बाद मैंने उनका नाम सूना था। आज जब मुझसे कोई पूछता है "क्या तुम बाबा रामदेव वाला योग करते हो?मैं उनसे कहता हूँ -"हाँ, तुम भी किया करो ।कहने का तात्पर्य यह है इस समय योग का मतलब ही बाबा रामदेव के योग से हो गया है। मुझे इस पर कोई आपत्ति भी नहीं है क्योंकि मैं ह्रदय से चाहता हूँ कि योग का प्रचार और प्रसार बढ़े । मैं बाबा रामदेव का भक्त या शिष्य भी नहीं हूँ फिर भी लोगों को यह सलाह देने में मुझे कोई झिझक नहीं होती कि वह उनके कार्यक्रमों को देखकर योग सीखें और उसका लाभ उठाएं । इसमें मेरा कोई निजी फायदा नहीं है पर मुझे यह संतुष्टि होती है कि मैं जिन लोगों से योग सीखा हूँ वह गुरू जैसे दिखने वाले लोग नहीं है पर उन्होने गुरूद्क्षिना में इसके प्रचार के लिए काम करने को कहा था। बाबा रामदेव का समर्थन करने के पीछे केवल योग के प्रति मेरी निष्ठा ही नहीं है बल्कि यह सोच भी है कि योग सिखाना भी कोई आसान काम नहीं -योग शिक्षा वैसे ही भारत में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाई है और इसे विषय के रुप में स्कूलों में शामिल करने का बहुत विरोध हो रहा है ऐसे में लार्ड मैकाले की शिक्षा से स्वयं को विद्धान की पदवी से अलंकृत कर स्वयंभू तो योग के नाम से बौखला जाते हैं, और उनके उलुलजुलुल बयानों को मीडिया में स्थान भी मिलता है। कुछ दिन पहले बाबा रामदेव के शिविर में एक बीमार व्यक्ति की मौत हो गयी थी तो मीडिया ने इस तरह प्रचारित करने का प्रयास किया जैसे वह योग्साध्ना से मरा हो, जबकि उसकी बिमारी उसे इस हाल में लाई थी। उस समय एक सवाल उठा था कि अंगरेजी पध्दति से सुसज्जित अस्पतालों में जब कई मरीज आपरेशन टेबल पर ही मर जाते हैं तो क्या इतनी चीख पुकार मचती है और कोई उन्हें बंद करने की बात करता है। ट्रकों, कारों, और मोटर सायाकिलों की टक्कर में सैंकड़ों लोग मर जाते हैं तो कोई यह कहता है इन्हें बंद कर दो? और इन वाहनों से निकलने वाले धुएँ ने हमारे पर्यावरण को इस क़दर प्रदूषित किया है जिससे लोगों में सांस की बीमारियाँ बढ गयी है तो क्या कोई यह कहने वाला है कि विदेशों से पैट्रोल का आयत बंद कर दो?बाबा रामदेव ने हिंदूं धर्म से जुडी इस विधा को पुन: शिखर पर पहुंचाया है इसके लिए उन्हें साधुवाद देने की बजाय उनके कृत्य में छिद्र ढूँढने का प्रयास करने वाले लोग उनकी योग शिक्षा की बजाय उनके वक्तव्यों को तोड़ मरोड़ कर उसे इस तरह पेश करते हैं कि उसकी आलोचना के जा सके। जहाँ तक योग साधना से होने वाले लाभों का सवाल है तो उसे वही समझ सकता है जिसने योगासन, प्राणायाम , ध्यान और मत्रोच्चार किया हो। शरीर की बीमारी तो पता चलती है पर मानसिक और वैचारिक बीमारी का व्यक्ति को स्वयं ही पता नहीं रहता और योग उन्हें भी ठीक कर देता है। जहां तक उनकी फार्मेसी में निर्मित दवाओं पर सवाल उठाने का मामला है बाबा रामदेव कई बार कह चुके हैं वह बीमारियों के इलाज में दवा को द्वितीय वरीयता देते हैं, और जहाँ तक हो सके रोग को योग साधना से दूर कराने का प्रयास करते हैं। फिर भी कोई न कोई उनकी दवाए उठाकर लाता है और लगता है अपनी विद्वता दिखाने। आज तक कोई किसी अंगरेजी दवा का सैम्पल उठाकर नहीं लाया कि उसमे कितने साईट इफेक्ट होते हैं। इस देश में कितने लोग अंगरेजी बिमारिओं से मरे यह जानने की कोशिश किसी ने नहीं की।अब रहा उनके द्वारा हिंदू धर्म के प्रचार का सवाल तो यह केवल उनसे ही क्यों पूछा जा रहा है? क्या अन्य धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार नहीं कर रहे हैं। मैं केवल बाबा रामदेव ही नहीं अन्य हिंदू संतों की भी बात करता हूँ । जो लोग उन पर सवाल उठाते हैं वह पहले अपना आत्म विश्लेषण करें तो उन्हें अपने अन्दर ढ़ेर सारे दोष दिखाई देंगे। दो या तीन घंटे तक अपने सामने बैठे भक्तो और श्रोताओं को-वह भी बीस से तीस हज़ार की संख्या में -प्रभावित करना कोई आसान काम नहीं है। यह बिना योग साधना, श्री मद्भागवत का अध्ययन और इश्वर भक्ती के साथ कडी तपस्या और परिश्रम के बिना संभव नहीं है । उनकी आलोचना केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो उन जैसा हो। इसके अलावा उनसे यह भी निवेदन है कि आलोचना से पहले कुछ दिन तक योग साधना भी करके देख लें ।

4/28/07

मन, बुध्दी और अंहकार पर रखें अपनी नज़र-चिन्तन

हमारा शरीर पांच तत्वों-पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नी से मिलाकर बना है यह सब जानते है पर इनकी प्रकृति का साथ हमारे अन्दर तीन और भी प्रकृति हमारे देह में अपना कार्य करती है यह है-मन, बुध्दी और अहंकार । हम पांच के बारे में जानते हैं क्योंकि उनका अस्तित्व सामने प्रत्यक्ष दिखाई देता है पर अन्य तीन का आभास हम नहीं कर पाते जो कि हमारे इस देह और जीवन का संचालन करते हैं। देह को निर्माण करने वाले पंच तत्त्व मूर्त रुप से दिखते है पर उनका भाव मूक और स्थिर है जबकि मन, बुध्दी और अहंकार का भाव अमूर्त रुप है और वाचाल होने के साथ चलायमान है । वह हमें कहीं का कहीं घुमाता है और हम सोचते हैं कि हम घूम रहे हैं, वह हमसे कर्म कराते हैं और हम सोचते हैं कि हम करतार हैं। यह भ्रम जीवन भर भर बना रहता है और हम सोचते हैं कि हमारा देहधारी जीवन ही सत्य है, और जब हम चेतना आती है तब तक हमारी सारी इन्द्रियां व्यथित हो चुकीं होती है और हम अपने जीवन को नये तरीके से जीने और समझने का अवसर खो चुके होते हैं । लोग कहते हैं अध्यात्म की तरफ बुढ़ापे में जाना चाहिए जबकी आध्यात्म केवल भगवान् की भक्ती ही करने तक ही सीमित नहीं है वरन युवावस्था में अपने अपने कार्य और दायित्व निर्वहन की शक्ति भी देता है। पर वह अवस्था आदमी अपने देहाभिमान में गुजार देता है और बुढापे में आदतों में बदलाव लाना कठिन ही नहीं असंभव हैं। अध्यात्म का किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है, हाँ लोगों ने अपने कर्म कांडों को ही अध्यात्म मानकर उसमे लिप्त हो जाते हैं अपने अहं और युवास्था में तो इन्हीं कर्म कांडों का निर्वहन कर समझते हैं कि हमने अपना विश्वास पा लिया है।
हम अपने भ्रमों को विश्वास समझते है और उसे दूसरों को सुनाकर यह चाहते हैं कि वह भी उस विश्वास को अपनाए और नहीं अपनाता तो हमें बुरा लगता है - यह अंहकार का भाव हर इन्सान में रहता है और आज विश्व में तो तनाव देख रहे हैं वह इसी का परिणाम है। लोग कहते हैं के बुढ़ापे में अध्यात्म की तरफ जाना चाहिऐ जबकि देखा जा रहा है धर्म ही नहीं वरन अन्य राजनीतिक सिध्दान्तों के नाम पर युवाओं को बर्गालाकर उन्हें आतंकवादी बनाया जा रहा है इसका कारण यह है कि माता-पिता अपने बच्चे को यह सोचकर धर्म की शिक्षा नहीं देते के कहीं वह दुनियां के कर्मों से विरक्त नहीं हो जाये और वृद्धावस्था में उनकी सेवा से परे न हो जाये- उनका यह मोह उन्हें यह बात नहीं सोचने देता के हमारे लड़के का भी मन है और उसे कहीं इस तरह लगाना चाहिए कि उसके विचारों में पवित्रता बनी रहे । वह उसे केवल दुनियां की उतनी ही बातें बताते हैं जिससे उनकी स्वार्थ्सिध्द हो सके, और फिर जब उनका बुढ़ापा आता है तो पता लगता है बेटा तो अपनी बहु के इशारे पर चल रहा है- और तब उनके अन्दर निराशा का भाव पैदा हो जाता है। इसके अलावा यह भी होता है कि बाहर के लोग अपने हित साधने के लिए उन्हें गलत शिक्षा देकर गलत रास्ते पर पहुंचा देते हैं।
हम अपने विश्वासों के साथ जब यह अहंकार पाल लेते हैं कि वही श्रेष्ठ है तो वह एक भ्रम बन जाता है। ऐसा हो सकता है कि हम एक ही ईश्वर में आस्था रखते हौं पर वह हमारे मन में अलग-अलग स्वरूपों में स्थित हो और हम एक दुसरे के विश्वास को अलग समझते हैं -और विश्वास से भ्रम की तरफ चले जाते हैं, इसके लिए जिम्मेदार है हमारे मन में बैठा अहंकार जो शाश्वत सत्य को कभी पहचानने नहीं देता है। हम इसी वजह से अपने लिए मित्र कम शत्रू ज्यादा जुटाते हैं और कुछ तो ऐसे मित्र भी हम नहीं पहचान पाते जो हमारे सामने तो मैत्री भाव का प्रदर्शन करते हैं पर उनके मन में कभी न कभी हानि हानि पहुंचाने की दुर्भावना आती है। इसीलिये हमें अपने अन्दर बैठे अहंकार को पहचानने का प्रयास करना चाहिए।
हमारा बुद्धि तत्व एक ऎसी शय है जिस पर हर कोई अधिकार करना चाहता है। समझदार आदमी यही प्रयास करते हैं कि दुसरे की बुद्ध को प्रभावित कर उसे अपने अनुकूल कर अपने हित साध सके। आज के उपभोक्तावादी युग में आप जो विज्ञापन देख रहे हैं उसमें सारा प्रयास यही होता है कि आम आदमी की बुध्दी को प्रभावित कर अपने उत्पाद बेचे जा सकें । यह तो उनका खुला व्यापार है इसीलिये उसे गलत नहीं ठहराया जा सकतापर पुराने समय में आदमी की बुध्दी पर नियत्रण रखने के लिए राज्य, धर्म, भाषा और स्वर्ग-नरक के नाम पर ऐसे सिध्दान्तों की स्थापना की गयी ताकी वह एक नेतृत्व के अंतर्गत अनुशासित होकर रहे। कालांतर में जब कुछ विश्वासों की पोल खुलने लगी तो उन्हें भय दिखाकर जारी रखने का प्रयास किया गया और जरूरत पड़ने पर राज्दंड का प्रयोग भी किया गया। अब समय बहुत निकल चुका है पर विश्वासों ,विचारधाराओं और धार्मिंक आस्थाओं को इस तरह स्थापित किया गया है आदमी उनसे अपने को अलग इसीलिये नहीं करता कि उसे उस पर विश्वास है बल्कि वह अविश्वास या असहमति जताकर उस समूह या समाज से प्रथक किये जाने के भय से चुप रहता है जिसके नाम पर उसकी पहचान है। यही कारण है कि धरम, जात,भाषा, तथा राजनीतिक समूहों का शीर्ष नेतृत्व उनकी भावनाओं का दोहन कर रहा है।
इसीलिये हमें अपने बुध्दी पर इस तरह नियंत्रण करने के साथ ही मन और अहंकार पर भी दृष्टि रखना चाहिए ताकी हम सामान्य ढंग से अपने जैसे ही लोगों के साथ हिलमिल कर रह सकें। शेष अगले अंकों में ।

4/7/07

घर से बाहर रोज निकलते हैं, कभी दिल से भी निकलें

अगर हम घर में लगातार बैठे रहते हैं तो एक समय ऐसा आ जाता है कि हमें बोरियत होने लगती है। हमें लगता है कि हम थक गये हैं , तब हमारा मन विचलित हो जाता है, हम सोचने लगते हैं कि कहीं बाहर घूमे आयें, और फिर हम वहां से निकल पड़ते हैं। जब घूम कर घर लौटते हैं तो वही घर हमें स्वर्ग लगाने लगता है जो पहले नरक की तरह लग रहा था। यह जो हमारे शरीर में मन है वह बहुत चचल है हम उसके हर इशारे पर नाचते हैं पर हमें पता ही नहीं लगता कि हमें कोइ नचा रहा है । हम अपने मन के दास बने रहते हैं पर लगता है हम स्वतंत्र हैं। मन चला रहा है और हम सोचते हैं कि हम चल रहे हैं। हम पूरी ज़िन्दगी इसी भ्रम में निकालते हैं कि हम कर रहें हैं पर करवाता मन है। सारा जीवन भौतिक वस्तुओं के संग्रह में निकाल देते हैं और खुश नही रह पाते । हमेशा एक खालीपन घेरे रहता है। पहले यह समझ लें कि हम हैं क्या? हम एक आत्मा है जो इस शरीर में स्वतंत्र विचरण करना चाहती है। वह पाने में नहीं त्याग में खुश होती है । वह ऐसे प्रेम की भूखी है जो निस्वार्थ हो। वह इस देह से ऐसा काम कराना चाहती है जो लोक और परलोक में भी हितकर हो और समस्त्जीवों के लिए हितकर हो।
हमें प्रकर्ति ने बुध्दी बहुत दीं है पर हम उसका दस प्रतिशत ही उपयोग कर पाते हैं। हम लोगों में भी यह पूरा दस प्रतिशत वह लोग ही इस्तेमाल कर पाते हैं जो दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। वर्ना तो लोग जिस तरह शरीर से शरीएर से आलसी होते हैं उतने ही दिमाग से भी होते हैं। कई बार ऐसा मौका आता है कि हम अपने ही लोगों पर झल्लाने लगते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि हम व्यर्थ ही ज़िन्दगी बरबाद कर रहें हैं। हम ऐसे लोगों से भी चिढ जाते हैं जिन्हे हम सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। दरअसल हम झूठे प्रेम और ममता मोह से अपने दिमाग में इतने विकार एकत्रित कर चुके होता हैं कि उसकी नसों में रक्त प्रवाह अव्रुध्द होने लगता है और फिर वह तनाव में आ जाता है । कहते हैं कि स्वस्थ आदमी के शरीर मैं ही स्वस्थ दिमाग रहता है। स्वस्थ शरीर का मतलब है जिसमें रक्त प्रवाह सब जगह पहुंचे। जैसे ही रक्त प्रवाह अव्रुध्द होने लगता है शरीर बीमार पड़ने लगता है। और हम मानसिक अवसाद का शिकार होने लगते हैं।
हम जिसे अपना ह्रदय या आत्मा समझते हैं वह हमारा मन है और झल्ला रहा है वह हमारी आत्मा, ह्रदय या कहें दिल है जो इन सांसारिक पदार्थों को इस्तेमाल करने से सन्तुष्ट नही हो सकता । वय एक तो परमात्मा की भक्ती से प्र्स्न्न्न होता है या निष्काम पेम, स्वर्थाराहित दया से हे उसे सन्तोष मिलता है। जिस तरह हमारा दिमाग एक जगह बैठकर घबडा जाता है वैसे ही हमारी आत्मा भी केवल इस देह का बोझ उठाते घबडा जाता है। हम समझ नहीं पाते उसकी व्याकुलता को।
आख़िर इसका उपाय क्या है ? क्योंकि अगर उपाय नहीं बताएँगे तो फिर इस चर्चा का कोइ मतलब नहीं रहेगा । इतनी चर्चा करने का मतलब यह था कि पहले उस हालत पर विचार कर लें जो हमारे साथ होती है पर हम उसे बयां करने के लिए शब्द नहीं ढूँढ पाते और तकलीफ भोगेते रहते है। इसका उपाय है चयन। कहीं एकांत, शांत और खुले स्थान पर हम सुखासन में बैठाकर ध्यान लगाएं । ध्यान यानी क्या? इसमें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। बस बैठाकर अपने आँखें बंद कर लें और सारा ध्यान नाक के ऊपर रखें आपके अन्दर जो विचारों का क्रम आयेगा उससे परेशान न होन- दरअसल वह विचार नहीं है , उसे तो अच्छा ही समझें। जैसे चाहे हम मिठाई खायें या करेला वह पेट में जाकर गंदगी में बदल जाता हैवैसे जो हम अच्छा या बुरा देखते हैं और सुनते है वह हमारे ख़ून में जाकर गंदगी में बदल जाता है। इन सबको निकलना जरूरी है। हम मित्र देखें या शत्रू ख़ून में जाकर दोनों का प्रभाव एक जैसा ही होता जैसा ही होता है। ध्यान में विचार आने का मतलब है कि जो हमारे दिमाग में आ रहा है वह गंदगी है और उस समल वहभस्म हो रहा है। शेष अगले अंकों में ।

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