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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

1/18/08

धर्म बेचने वालों का नारा है "अहंकार छोड़ दो"(सर्वशक्तिमान-२)

धर्म बेचने वालों का नारा है अंहकार छोड़ दो. उनकी बात सुनकर लोग खुश हो जाते हैं. पांच तत्वों से बनी इस देह में मन बुद्धि और अहंकार ही वह तत्व हैं जिनके हर जीव इस धरती पर विचरण करता है.आपने कुछ ऐसे लोग देखने होंगे जो पागल होते हैं. आप उनसे कुछ भी कहें पर वह आपकी बात पर ध्यान नहीं देंगे. मन उनके पास भी है और बुद्धि भी पर नहीं है तो अहंकार. वह खाते-पीते हैं और बात करते हुए मुस्कराते हैं पर फिर खामोश भी हो जाते हैं. उनके पास अपने मनुष्य होने का अहंकार नहीं है और वह निरीह हो जाते हैं और हर कोई उन पर तरस खाता है.

कई बार आपने देखा होगा ऊंचे मंचों पर बैठे साधू-संत अपने भक्तों से कहते हैं''अहंकार छोड़ दो". आर फिर मुस्कराते हुए लोगों की तरफ देखते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा राज उजागर किया है. लोग भी खुश हो जाते हैं कि उन्होने कोई बडे रहस्य से पर्दा उठाया है. उनका धर्म बेचना व्यवसाय है यह बात जानते हुए भी उसे धारण नहीं कर पाते और उनके पास जाते हैं वजह मन हो गया खाली और बुद्धि से काम लेना नहीं है तो अहंकार है कहाँ जो वह आत्ममंथन करे. विचार करे कि इस देह से अहंकार कभी जा नहीं सकता. निरंकार की उपासना करने की जा सकते हैं पर निरंकार रहा नहीं जा सकता.

मंच पर बैठ संत जो बोलते हैं और उसके बाद क्या होते हैं यह कई लोग जानते हैं. अभी जब सात बाबा रंगे हाथों काले धन को सफ़ेद बनाते हुए पकडे गए थे उनमें एक एस बाबा भी थे जो कई बार कृष्ण कथा करते हुए श्रीगीता के बारे में बोलते हैं और एक ही नारा-अंहकार मत करो. उनकी बातों में जो अंहकार था वह देखने योग्य था और में तो उनके तारीफ करूंगा को उन्होने अपने अहंकार को नियंत्रित किया और धर्म के शिखर पर जाकर विराजमान हुए. आखरी व्यवसाय चाहे कोई भी हो उसे चलाने के लिए कई तरह की चालाकी की आवश्यकता होती है उसमें अहंकार पर नियंत्रण रखना जरूरी होता है.
सभी बाबाओं के बडे आश्रम हैं और उनमें फाईव स्टार होटलों जैसी सुविधाएं है आम भक्त उनसे इतनी आसानी से नहीं मिल सकता जितना किसी धनी व्यक्ति कि लिए संभव है. वह कहते है कि' मन को स्वच्छ रखो और बुद्धि को सात्विक क्योंकि इनको देह से अलग नहीं किया जा सकता. फिर अंहकार छोड़ने का नारा वह क्यों लगाते हैं? भगवान् श्री कृष्ण तो कहते हैं कि तीन गुणों से -सात्विक, राजसी और तामस- परे हो जाये वही योगी है. वह इन्द्रियों पर नियंत्रित करने के लिए कहते हैं जिसका आशय यह है कि अंहकार को भी वैसे ही काबू में रखा जाये जैसे बुद्धि और मन को. अहंकार देह का एक हिस्सा है जो उसके नष्ट होते तक रहता है. उस पर नियंत्रण तो किया जा सकता है पर छोडा नहीं जा सकता.

धर्म बेचने वाले तथाकथित संतों को अहंकार पर नियंत्रण की विधि नहीं मालुम इसलिए उसे छोड़ने का नारा लगते हैं-अंहकार पर नियंत्रण की विधियां मालुम होती तो वह धर्म बेचने का व्यवसाय ही नहीं कर पाते. सबसे बड़ी बात यह हैकि भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के ज्ञान का केवल अपने भक्तों में प्रचार की अनुमति दी है और यह चाहे जहाँ उसे सुनाने लगते हैं. इस तरह देश के लोगों की मानसिकता को ही गुलाम बना दिया है . इसी कारण हमारे देश के लोगों को वाद और नारों पर चलने का लिए अभ्यास हो गया है और इसलिए यह देश बरसों तक गुलाम रहा और आज भी गुलामी से रह रहा है. जिनके पास थोडी बहुत चतुराई हैं वह यहाँ शासन उन्हीं लोगों के सहारे करते हैं जो धर्म के नाम पर नारे लगाते हैं. (क्रमश:)

1 comment:

Mired Mirage said...

हम्म ! बात सोचने की है ।
घुघूती बासूती

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