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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

1/19/08

अंहकार छोड़ना नहीं उसे सही दिशा देना है

मन से मोह, बुद्धि से विचारों में विकार और अंहकार से अज्ञान उत्पन्न होता है पर मन और बुद्धि से काम करने की सीख सबको दी जाती है अहंकार के साथ क्यों नही? यह तीन प्रुकृतियाँ हैं और जब तक देह हैं उसमें इनको रहना ही है और त्यागना है तो तीनों से विरक्त होना है। श्रीमद भागवत गीता में सांख्य योग की चर्चा है पर उसे खारिज भी किया है। श्री मदभागवत गीता का पूरा सन्देश जीवन को सदैव सक्रिय रखने का प्रेरक है न कि सन्यास के लिए।
हमारे देश की हिन्दी भाषा के स्वर्ण काल को भक्ति काल भी कहा गया है और इसमें संत कबीर दास और रहीम का दर्शन भी लगभग श्रीमद भागवत गीता के संदेशों जैसा ही पर उसमे भक्ति को अधिक महत्व दिया गया है। उस समय के इन ग्यानी महानुभावों ने अंधविश्वास और रूढ़वादिता का जमकर विरोध किया क्योंकि उनकी उपस्थित में कुछ लोग इस समाज को गलत दिशा में ले जा रहे थे। समाज को गलत दिशा देने वालों ने आदमी के अन्दर मौजूद अहंकार के तत्व का उपयोग किया। देश में गरीब और अमीर के, उच्च वर्ग और निम्न वर्ग और तमाम तरह के जातीय विभाजन में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ लोगों ने संतों को चोला धारण किया और पहुंच गए लगों के बीच यह नारा लेकर' अहंकार छोड़ दो"। सबको लगा कि दूसरे के लिए कह रहे हैं इसलिए ताली बजाने लगे क्योंकि मन और बुद्धि का अस्तित्व आदमी को अपने अन्दर दिखता है जबकि अहंकार इन दोनों को बाहर ले जाने वाली पृकृति है इसलिए वह नहीं दिखती।
जिन्होंने ऐसी ढोंगी संतों सो सुना उनको लगा कि इनके मापदंड से तो हम ठीक हैं हम में तो कोई अंहकार नहीं है दूसरे ही खराब हैं। मेरा मानना है कि मन किसी विषय को दृष्टिपात करता है और बुद्धि उस पर चिन्त्तन, मनन और अनुसंधान करती है और अहंकार उसके निष्कर्षों को बाहर ले जाता है। हमें अपने इसी अहंकार की साथ जीना है तो उसे सही दिशा में ले जाना चाहिए।
अगर किसी के मन में आता है कि'मेरे पास अधिक धन है" यह अंहकार से उपजा अज्ञान हैं क्योंकि यहाँ किसी का कुछ नहीं है। अब ऐसा सोचने वाले आदमी अगर अपनी बुद्धि को कष्ट नहीं देगा तो यही अहंकार से उपजा अज्ञान अन्दर रहकर उसे त्रास देगा क्योंकि उस धन से बहुत कुछ खरीदा जा सकता पर सब कुछ नहीं-मन का सुख तो कतई नहीं खरीदा जा सकता। अत: अन्दर बैठा अहंकार से उपजा अज्ञान उसे तकलीफ देगा। बेहतर होगा वह अपने आसपास ऐसे लोगों में उसे दान करे जिनको उनकी जरूरत हो। इससे भी भी आगे में कहूँगा के कभी आपको लगे कि मेरे पास पांच सौ रूपये के नोटों के बीच दस रूपये हैं और..........दस रूपये का क्या........ इस अहंकार से उत्पन्न अज्ञान के विसर्जन के लिए किसी दुकान पर जाओ एक डबल रोटी खरीदो और जाकर कहीं मजदूर बस्ती में किसी बच्चे को दे दो। किसी भिखारी को दे दो। कहते हैं कि कई लोगों को भीख मांगने की आदत होती है और उनको भीख मत देखो पर तुम इसे मत देखो। क्योंकि वास्तव में वही भिखारी लोग हैं जिनके पास अंहकार नहीं है और तुम अपना हिस्सा उसे दे दो। मेरा मानना है कि जिस तरह किसी पागल आदमी में बुद्धि का तत्व काम होता है वैसे ही भिखारी में अहंकार के तत्व का अभाव होता है. आप कहेंगे यह भीख देकर तो अहंकार छोड़ने वाली बात है। नहीं जब तुम ऐसा करोगे तब तुम्हारे पास फिर अंहकार के रूप में फिर और कोई बात आयेगी। अंहकार के रूप में आ रहे विचार तो उसकी धाराएं है जिनका मूल उदगम स्थल तो हमारी देह ही है। वह इससे अलग नहीं हो सकता। यह अहंकार से जो धारा है उसे बहने दो एक ऐसी अपनी बुद्धि से ज्ञान की दिशा की तरफ ले जाओ जो किसी को लाभ पहुँचाती है। तुम उसकी दिशा तय कर सकते हो पर उसका उद्गम स्थल नहीं नष्ट नहीं कर सकते।

मैं हिन्दी भाषा का लेखक हूँ और मैंने अंतर्जाल पर ब्लोग बनाया है। यह अंहकार से उपजा विचार है और क्या मैं इस रोक सकता था? अगर रोकता तो क्या मैं लिख सकता था। मैं उसे दिशा देने की कोशिश करता हूँ। अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो लिखूंगा कैसे है। मान लीजिये आज मैं लिखना बंद कर दूं तो भी यह अंहकार नहीं जायेगा और अगर मैं उसे दिशा नहीं दूंगा तो वह फिर अपना काम स्वयं करेगा। कैसे? जहाँ कहीं भी बात होगी में अपने अंतरजाल पर लिखने की चर्चा करूंगा? या कई बार अपने ब्लोग खोलकर देखूंगा। अब तो बहुत लिख चुका अब इससे अधिक क्या लिखना-यह भाव आ जायेगा। यकीन करिये में अपने फुरसत के बेहतर क्षण किसी मूर्खतापूर्ण काम में नष्ट करूंगा। मतलब तब अंहकार से उपजा अज्ञान मेरे समय को कई ऐसी जगह नष्ट करेगा जो मुझे मानसिक सुख नहीं पहुंचाते. ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं है लिख कर कुछ नया सीखने का विचार क्या बुरा है। मैं लेखक हूँ पर इतनी अधिक सक्रियता कभी नहीं रही जितनी अब है पर कुछ नया सीखने को मिल रहा है। वाद और नारों पर समाज के चलने, उसके जज्बातों के व्यापार में फंसने और धर्म के नाम पर पाखण्ड को मैंने बहुत करीब से देखा है और मुझे और निराशा तब होती है जब शिक्षित लोग भी हथियार डालकर अपने से काम पढे-लिखे लोगों के अंधविश्वासों के सामने सिर झुकाते हैं तब लगता है कि उनको अहंकार पर दृष्टिपात करते हुए उसे सही दिशा में काम करना चाहिए क्योंकि आप उसे अपने से अलग कर नहीं सकते। (क्रमश:)

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