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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

1/16/08

सर्वशक्तिमान ने जीवन बनाया पर नियम नहीं

सर्वशक्तिमान ने इस धरती पर जीवन का निर्माण इस तरह किया है कि उसका संचालन स्वत: होता रहे पर उसने कोई नियम नहीं बनाया. चालाक लोगों ने उसके नाम पर अनेक ऐसी पुस्तकें और उनका ज्ञान प्रकट किया जो उसने नहीं किया. प्रत्येक जीव की देह पांच तत्वों से बनी और उसमें मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे तत्व स्वत: आये और उसका संचालन करते हैं. आदमी की देह में ऐसा लचीलापन है जिससे वह अपने मन, बुद्धि और अहंकार का अपने अनुसार अच्छा उपयोग कर सकता है क्योंकि वह बन्दर के बाद ऐसा जीव है जिसके पास अपने हाथ भी है और अन्य जीवों में ऐसा नहीं है. एक समय आदमी भी पशुओं जैसा जीवन जीता था पर जैसे-जैसे उसे अपने अन्दर स्थित शक्तियों का अहसास होता चला गया वैसे-वैसे वह अन्य जीवों के मुकाबले अपने जीवन के रहन-सहन में परिवर्तन करता गया.

यहीं से शुरू हुआ मनुष्य में विभाजन और वह शासक और शासित दो वर्गों में बंटता गया-मनुष्य लड़ते तो पहले भी थे और अब भी लड़ रहे है एक-दूंसरे से. यह कोई नियम नहीं कि वह आपस में न लडे. सर्वशक्तिमान ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया. उसने तो केवल जीवन और मृत्यु का नियम बनाया है सुख-दु:ख का नहीं. क्योंकि मनुष्य में यह बुद्धि है कि वह तय करे कि उसे सुख के साथ जीना है या दु:ख के साथ. दूसरे को दु:ख देकर तुम सुखी नहीं रह सकते. तुम दूसरे को गाली दोगे वह तुम्हें देगा. तुम दूसरे को अपमानित करोगे वह तुम्हें करेगा वह तुम्हें करेगा. तुम लोगों को मारने का काम करोगे तो तुम्हें भी कोई मारेगा. यह सर्वशक्तिमान का बनाया नियम नहीं है यह तो एक स्वाभाविक जीवन नियम है.

जो लोग कहते हैं कि यह नियम सर्वशक्तिमान ने बनाया है वह डरपोक हैं या आलसी. क्या यह सब जो अच्छी बाते कह रहे हो उसने कभी कही हैं. नहीं तुम डरते हो और तुम में आत्मविश्वास की कमी है. तुम यह खुद क्यों नहीं कहते कि किसी के साथ अच्छा व्यवहार करने से अपने को भी अच्छा व्यवहार मिलेगा. क्या तुम आलसी हों जो अच्छी बातें सोचने की बजाय दूसरे से अच्छी बातें सीखने को कह रहे हो. अगर तुम्हें कोई अच्छी बात कहनी है तो उसे दूसरे के हवाले से क्यों कहते हो अपने हवाले से क्यों नहीं कहते? अगर दूसरे से कुछ तुम सीख कर कोई विचार व्यक्त करते हो तुम आलसी हो अपना आत्ममंथन नहीं करते और अपनी बुद्धि को आराम से रहने देना चाहते. ''मुझे किसी पर दया दिखाना चाहिए" यह ख्याल अपने आप क्यों नहीं करते. तुम्हें कई बार ऐसा लगता है कि अगर मैं अपने हवाले से अच्छी बात कहूंगा तो लोग यकीन नहीं करेंगे या उस प्रभाव नहीं पड़ेगा तो तुम समझ लो कि डरपोक हो क्योंकि तुमने अपने मन, बुद्धि, और अंहकार का सही विश्लेषण नहीं किया.

कहते हैं कि आदमी को अहंकार नहीं करना चाहिए पर देह है तो अहंकार तो रहेगा. हम उसके बिना चल नहीं सकते. हाँ अहंकार रखो कि तुम एक शक्तिशाली व्यक्ति हो तभी तुम किसी की सहायता कर सकते हो तुम अपने लोगों की रक्षा कर सकते हो. जब तुम किसी को अकारण मारते हो, अपमानित करते हो, दुख देते हो वह वह तुम्हारा अहंकार नहीं है बल्कि कायरता है. अगर देह है तो अहंकार भी रहेगा. हम सो रहे होते हैं और मच्छर काटते हैं तो हम उसे अपने हाथ से भगाते हैं और अगर अहंकार नहीं होगा तो हम उसे भगाएंगे कैसे? अगर अंहकार नहीं करोगे तो आत्म-मंथन नहीं कर सकोगे. दरअसल विद्वान लोग अपने पद, धन और सम्मान के नशे में चूर के अपराधों को अहंकार में किया बताते हैं वह दरअसल उनकी कायरता और आत्म विश्वास की कमीं के कारण होते हैं-लोभ और लालच के कारण होते हैं. अगर उनमें मनुष्य होने का अहंकार होता तो वह ऐसे काम करता है. लोगों कहते हैं कि अमुक व्यक्ति अंहकार के कारण हम से बात नहीं करता पर मैं कहता हूँ कि वह कायर आत्महीनता के भाव से ग्रसित है इसलिए तुमसे बात नहीं करता. उसके पास शब्द नहीं है कि तुमसे बात नहीं करता. तुम भी वैसे ही क्योंकि तुम ऐसा सोच रहे हो और अपने मनुष्य देह में स्थित अहंकार की तरह दृष्टिपात करोगे तो तुम्हें लगेगा कि जो उसके पास है और वही तुम्हारे पास है फिर वह तुमसे धनी और बड़ा कैसे हो सकता है? (क्रमश:)

2 comments:

महेंद्र मिश्रा said...

बहुत बढ़िया आलेख

महावीर said...

बहुत सुंदर आलेख है. यह सत्य ही कहा है कि 'अगर अहंकार नहीं करोगे तो आत्म-मंथन नहीं कर सकोगे.'
आत्म-मंथन से ही मनुष्य को अहंकार और कायरता के अंतर का आभास होता है. अगली पोस्ट की प्रतीक्षा है.

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