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6/29/08

विरक्ति से अनुरक्ति की ओर श्री ललित मोहन त्रिवेदी-समीक्षा

वैसे तो अंतर्जाल और निजी जीवन में बहुत मित्र हैं पर मेरे अंतर्मन में विचरते लेखक के मित्र बहुत ही कम हैं। ऐसे में दो मित्रों-अंतर्जाल पर श्रीसमीर लाल ‘उड़न तश्तरी’ और निजी जीवन में श्री ललितमोहन त्रिवेदी-का मेरे हृदय में विशेष स्थान है। मुझे नियमित रूप से पढ़ने वाले पाठक और ब्लाग लेखक श्री समीर लाल के ‘उड़न तश्तरी’ और श्री ललित मोहन त्रिवेदी के ‘अनुरक्ति’ब्लाग के बीच में मेरे ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’ और दीपक बापू कहिन’ (इन दोनों ब्लाग/पत्रिकाओं को मैं अपना मुख्य प्रवक्ता मानता हूं) को रखकर तभी सहज भाव से समझ पायेंगे जब मैं इस पर लिखूंगा।

मेरे निजी जीवन के मित्र श्री ललित मोहन त्रिवेदी अंततः लंबी प्रतीक्षा के बाद न केवल अंतर्जाल पर लिखने के लिये प्रस्तुत हुए बल्कि एक तरह से उन्होने पिछले कई वर्षों से हिंदी में लेखन के प्रति जो विरक्ति का भाव रखा हुआ था अब अनुरक्ति के साथ दोबारा शुरूआत कर रहे हैं। उड़न तश्तरी ने ‘चिट्ठा चर्चा’ में दीपक बापू कहिन के लिये लिखा था कि यह ब्लाग हिंदी ब्लाग जगत में नये अलख जगायेगा। उस समय उसे पढ़कर मैं मुस्करा कर रहे गया क्योंकि मैं एक बात जानता था कि अंतर्जाल पर मेरा एक मुकाम होगा और यह आत्मविश्वास मुझे श्री ललित मोहन त्रिवेदी की मित्रता के कारण ही प्राप्त हुआ था। उनकी और मेरी मित्रता बीस वर्ष पूर्व पुरानी है। चार पांच वर्ष तक तो नियमित मुलाकातों के बावजूद मुझे नहीं मालुम था कि यह कोई लेखक या कवि हैं। हां उनकी शक्ल सोवियत संघ के नेता लेनिन की तरह लगती थी और बातचीत में उनका सहज और गंभीर वार्तालाप मुझे प्रभावित करता था।
एक बार उनके एक कवि मित्र ने एक काव्य संग्रह प्रकाशित किया और उसके लिये समीक्षा का दायित्व श्री ललित मोहन त्रिवेदी को सौंपा। उन्होंने उस पर समीक्षा लिख कर मुझे दिखाई तो मैं दंग रह गया। मैंने उनसे कहा-‘‘ मैंने वह पुस्तक नहीं देखी पर अगर आप इसे राष्ट्रीय समाचार पत्र पत्रिकाओं में भेजें तो वह इसे अवश्य प्रकाशित करेंगे और वह पुस्तक केवल इसलिये लोकप्रियता अर्जित करेगी क्योंकि उस पर इतनी जोरदार समीक्षा लिखी गयी है।’
बाद में मैं उनके साथ ही एक कवि सम्मेलन में गया तो उनकी सस्वर गीत सुनकर इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उनसे कहा-‘आप तो अच्छे लेखक और कवि हैं फिर भी कभी कहीं आपका नाम चर्चा में नहीं सुना।’

इसकी वजह उन्होने अपना आलस बताया-इस बात की चर्चा उन्होंने अपने ब्लाग पर प्रोफाइल में भी की हैं। उन्होंने अपने कुछ रचित गीत दिखाये तो मैंने कहा कि ताज्जुब है यह कभी रेडियो पर नहीं सुनाई देते। जबकि यह वाकई ऐसे गीत है जो अगर संगीत से जुड़ जायें तो कई लोगों की जुबान पर चढ़ जायेंगे।
बहरहाल उनकी हमारी मित्रता अब तक चलती रही है। उनसे प्रेरित होकर मैंने भी गीत और दोहे लिखकर उनको दिखाये। उन्होने मुझसे स्पष्ट कहा कि‘तुम्हारे कथ्य बहुत दमदार हैं पर यह गीत नहीं हैं। तुम छंदबद्ध लिखने की बजाय मुक्त कविता लिखा करो। सबसे अच्छा यह है कि गद्य लिखा करो क्योंकि जहां कथ्य की प्रधानता हो वहां उसका इस्तेमाल भी अच्छा है।’

उनसे इस चर्चा के बाद ही मैंने तय किया कि अब अपने लिखने में गद्य रचनाओं को ही प्रधानता दूंगा। मैंने उनको अपने कुछ गद्य रचनाएं प्रकाशन के लिये भेजने से पहले उनको दिखाये और उस पर उन्होंने अपना मंतव्य दिया। कुछ रचनाओं को उन्होंने ठीकठाक कहा तो कुछ पर वह भी भौंचक्क रह गये और वह मेरे चिंतन वाले आलेख हुआ करते थे। उन्होंने चिंतन को सराहा था इसलिये अपने प्रथम दो ब्लाग में पहले का नाम मैंने दीपक भारतदीप का चिंतन उनकी वजह से लिखा क्योंकि यह विचार मैंने उनसे ही लिया था। प्रसंगवश अंतर्जाल पर कुछ लेखकों को हाइकू लिखते देखकर मैंने वह लिखने का प्रयास किया था। उड़न तश्तरी ने भी लिखा‘आपकी कविता दमदार है पर वह हाइकू नहीं है।’

ऐसा झटका मुझे श्री ललित मोहन त्रिवेदी जी गीत और दोहे के विषय में दे चुके थे। मतलब यह इन दोनों महानुभावों की वजह से इन दोनों विधाओं पर मैं कभी लिखने वाला नहीं हूं। जब अंतर्जाल पर कवितायें लिखनी शुरू की तो मैं बड़े बेमन से लिख रहा था और इसकी चर्चा मैंने श्री त्रिवेदी जी से की तो उन्होंने कहा कि ‘आप तो अपने कथ्य के साथ आगे बढ़ते रहें। मैंने आपको गीत और दोहे के लिये टोका था पर मुक्त कविता तो आप लिखते रहिये। किसी भी रचना मुख्य विषय उसका कथ्य है। अगर आप व्याकरण की दृष्टि से बहुत अच्छी रचना लिखें पर अगर कथ्य प्रभावी न हो तो फिर क्या फायदा? उसी तरह अगर आप का कथ्य प्रभावपूर्ण है तो यह महत्वपूर्ण नहीं रह जाती कि आप विधा में लिख रहे है।
मैंने उनको बताया था कि गद्य इतने बड़े हो जाते हैं कि उनको अंतर्जाल पर पढ़ना कठिन है उपरोक्त संबंध में उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाते हुए यह बात कही। अभी तक वह अपने वेबसाइट/ब्लाग पर दो गीत लिख चुके हैं। हां, उनको अपने रचनायें चोरी होने की आशंका रहती है और मैंने तो उनसे कहा भी था कि ‘मैं तो अपनी रचनाओं की चोरी के लिये तरस रहा हूं पर आपको शायद इसके लिये अधिक प्रतीक्षा न करनी पड़े क्योंकि आप जिस तरह के गीत लिखते हैं उसकी चोरी की संभावना बहुत लगती है। एसी रचनाएं लिखना हर किसी के बूते का नहीं है।’

ऐसे में जब हिंदी ब्लाग जगत के लोग निरंतर उनकी रचनाओं को देखेंगे तो कहीं उसका उपयोग होने पर वह उनको बता सकते हैं। अक्सर मैं अपनी समीक्षा में लिखता हूं कि ‘लेखक के मित्रों को यह कम और आलोचकों को अधिक लगे तो खेद है‘, यह भाव श्री ललित मोहन त्रिवेदी जी की उसी समीक्षा को पढ़ने के परिणाम है। उन्होंने मुझसे कहा था कि किसी दूसरे साहित्यकार या लेखक की रचनाओं पर समीक्षा लिखने वाले ही पूर्ण साहित्यकार होते हैं। यही कारण है कि मैं भी यहां अंतर्जाल पर ब्लाग लेखकों पर समीक्षा लिखता हूं। मुझे यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि उन जैसी समीक्षा मैं तो नहीं लिख सकता।
श्री ललित मोहन त्रिवेदी जी न केवल लिखते अच्छा है बल्कि बातचीत में भी बहुत प्रभावित करते हैं। अपने जीवन में लिखा भले कम ही हो पर वार्तालाप में उनके जीवन के संस्मरण भी किसी रचना से कम नहीं होते। मैं जब सुनता हूं तो लगता है कि उनको पढ़ रहा हूं और वह दृश्यव्य भी हो रहे हैं।
उनका अंतर्जाल पर लिखना शूरू करना इसलिये बहुत अच्छा लगा क्योंकि वह अगर मुझे निरंतर लिखने को प्रेरित नहीं करते तो शायद मैं अंतर्जाल पर भी लिखने का विचार नहीं करता। मैं चाहूंगा कि वह अपने गीतों से अंतर्जाल पर हिंदी को रोशन करें। एक आखिर बात मैं हमेशा कहता हूं कि कोई लेखक कम या अधिक प्रसिद्ध होता है पर छोटा या बड़ा नहीं कहा जा सकता। गीता विधा में सिद्ध हस्त श्री ललित मोहन त्रिवेदी जी अधिक प्रसिद्ध नहीं हैं पर मेरा दावा है कि उन जैसे गीतकार उंगलियों पर गिनती करने लायक होंगे। जब मैं अंतर्जाल या बाहर कोई काव्य देखता हूं तो अक्सर उनकी तुलना त्रिवेदी जी की रचनाओं से करता हूं और कई मशहूर लेखकों की रचनायें भी उनके सामने कम स्तर की लगती हैं।

बस एक बात है कि उनको लिखने के लिये निरंतर प्रेरित करने की आवश्यकता है। यह काम मैं तो करूंगा ही अंतर्जाल के अन्य मित्रों और पाठकों से भी यह अपेक्षा करूंगा कि वह यह जिम्मा उठायें क्योंकि उनके गीत तथा अन्य रचनायें अंतर्जाल पर हिंदी की श्रीवृद्धि करेंगे यह मेरा विश्वास है। वह मेरे एक ऐसे मित्र है जो अनेक अवसरों पर न केवल सहयोग करते हैं बल्कि प्रेरित करते है। उनसे ही सीखकर उन्हें ही यह समीक्षा समर्पित करता हूं।
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दीपक भारतदीप


www.lmtrivedi.blogspot.com

5/10/08

अध्यात्म का ज्ञान और सांसरिक उत्पाद मिलने का एक ही स्थान

भारत में अधिकतर लोगों का अध्यात्म के प्रति झुकाव स्वाभाविक कारणों से होता है। मात पिता और अन्य बुजुर्गों की प्रेरणा से अपने देवताओं की तस्वीरों के प्रति उनका आकर्षण इतना रहता है कि बचपने में ही उनके अध्ययने की किताबों और कापियों पर उनकी झाकियां देखी जा सकतीं हैं। मुझे याद है कि बचपन में जब कापियां खरीदने जाता तो भगवान की तस्वीरों की ही खरीदता था। एक बार अपनी मां से पैसे लेकर एक मोटी कापी लेने बाजार गया वहां पर भगवान की तस्वीर वाली कापी तो नहीं मिली हां एक कापी पर ‘ज्ञान संचय’ छपा था वह खरीद ली। वह घर लाया तो ‘ज्ञान’ शब्द ने दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि उस कुछ ऐसे ही लिखना शुरू कर दिया। फिर एक छोटी कहानी लिखने का प्रयास किया। तब मैंने सोचा कि इस पर तो मैं कुछ और लिखूंगा और विद्यालय का काम उस पर न करने का विचार किया। इसलिये फिर अपनी मां से दूसरी कापी लेने बाजार गया और अपने मनोमुताबिक भगवान जी की तस्वीर वाली किताब ले आया। वह ज्ञान संचय वाली किताब मुझे लेखक बनाने के काम में आयी।

आशय यह है कि पहले बाजार लोगों की भावनाओं को भुनाता था और ऐसी देवी देवताओं की तस्वीर वाली किताबें और कापियां छापता था जिससे लोग खरीदें। बाजार आज भी यही करता है और मैं उस पर कोई आक्षेप भी नहीं करता क्योंकि उसका यही काम है पर उसके सामने अब दूसरा संकट है कि आज के अनेक अध्यात्मिक संतों ने अपना ठेका समझकर अनेक वस्तुओं का उत्पादन और वितरण अपने हाथ के लिया है जिनका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं और इस तरह उसने बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की बिक्री में से बहुत बड़ा भाग छीन लिया है। दवायंे, कैलेंडर, पेन, चाबी के छल्ले, डायरी और कापियां भी ऐसे आध्यात्मिक संस्थान बेचने लगे हैं जिन्हें केवल प्रचार का काम करना चाहिए।

उस दिन एक कापी और किताब बेचने वाले मेरे मित्र से मेरी मुलाकात हुई। मैं स्कूटर पर उसकी दुकान पर गया और कोई सामान उसे देने के लिये ले गया। उससे जब मैंने धंधे के बारे में पूछा तो उसने बातचीत में बताया कि अब अगर अध्यात्म लोग पेन, डायरियां और कापियां बेचेंगे तो हमसे कौन लेगा? अब तो संतों के शिष्य अधिक हो गये हैं और वह कापियां और पेन बेचते हैं। अगर कहो तो उनके भक्त घर पर भी दे जाते हैं।

मै सोच में पड़ गया क्योंकि मात्र पंद्रह मिनट पहले ही मुझे मेरे एक साथी ने एक रजिस्टर दिया था और और वह अध्यात्मिक संस्थान द्वारा प्रकाशित था। उस पर अध्यात्मक संत का चित्र भी था। मैनें उससे कई बार ऐसा रजिस्टर लिया है। वह और उस जैसे कई लोग आध्यात्मिक संस्थाओं को उत्पादों को सेवा भाव से ऐसी वस्तुऐं उपलब्ध कराते हैं। देखा जाये तो वह अध्यात्मिक कंपनियों के लिये भक्त लोग मुफ्त में हाकर की भूमिका अपने भक्ति भाव के कारण निभाते हैं। कई जगह इन अध्यात्मिक संस्थानों की बसें अपने उत्पाद बेचने के लिये आतीं हैं। कई संस्थान अपनी मासिक पत्रिकायें निकालते हें लोग पढ़ें या नहीं पर भक्ति भाव के कारण खरीदते हैं। इस तरह जहां घरों में पहले साहित्यक या सामाजिक पत्र पत्रिकाओं की जगह थी वहां इन धार्मिक पत्रिकाओं ने ले ली है। शायद कुछ हंसें पर यह वास्तविकता है कि पहले और अब का यह फर्क मेरा बहुत निकट से कई घरों में देखा हुआ है।

अधिक विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है कि दवाओं से लेकर चाबी के छल्ले बेचने वाले अध्यात्मिक संस्थानों की वजह से भी हमारे देश के छोटे कामगारों और व्यवसायियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई है। हम अक्सर विदेशी और देशी कंपनियों पर लघु उद्योगों को चैपट करने का आरोप लगाते हैं पर देखा जाय तो उत्पादन से लेकर वितरण तक अपने भक्तों की सहायता से काम करने वाले इन अध्यात्मिक संस्थाओं ने भी कोई कम क्षति पहुंचाई होगी ऐसा लगता नहीं है। हमारा यह विचार कि हिंदी के पाठक कम हैं इसलिये पत्र-पत्रिकायें कम पढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः उनकी जगह इन पत्रिकाओं ने समाप्त कर दी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ जो पाठक बढ़े उन पर इन आध्यात्मिक पत्रिकाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया। इनके प्रचार प्रसार की संख्या का किसी को अनुमान नहीं है पर मैं आंकड़ों के खेल से इसलिये परे रहता हूं क्योंकि जो सामने देख रहा हूं उसके लिये प्रमाण की क्या जरूरत हैं। अधिकतर घरों में मैंने ऐसी आध्यात्मिक पत्रिकायें और अन्य उत्पाद देखे हैं और लगता है कि अगर यह अध्यात्मिक संस्थान उन वस्तुओं के उत्पाद और वितरण से परे रहते तो शायद रोजगार के अवसर समाज में और बढ़ते।

अपने अध्यात्मिक विषयों में मेरी रुचि किसी से छिपी नहीं है मै अंधविश्वास और अंध भक्ति में यकीन नहींे करता और मेरा स्पष्ट मत है कि अध्यात्म के विषयों का अन्य विषयों के कोई संबंध नहीं है। अगर आप ज्ञान और सत्संग का प्रचार कर रहे हैं तो किसी अन्य विषय से संबंध रखकर अपनी विश्वसीनयता गंवा देते हैं। यही वजह है कि आजकल लोग संतों पर भी जमकर आक्षेप कर रहे हैं। मै संतों पर आक्षेप के खिलाफ हूं पर जिस तरह अध्यात्मिक संस्थान अन्य सांसरिक उत्पादों के निर्माण और वितरण का कार्य छोटे लोगों को रोजगार के अवसरों को नष्ट कर रहे हैं उसके चलते किसी को ऐसे आक्षेपों से रोकना भी मुश्किल है। अगर लोगों के किसी कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तो उस पर आक्षेप करना उनका अधिकार है।

बाजार अगर लोगों की भावनाओं को भुनाता है तो उससे बचने के लिये लोगों को अध्यात्म का ज्ञान कराकर बचाया जा सकता है पर अगर अध्यात्मिक संस्थान ही इसकी आड़ में अपना बाजार चलाने लगें तो फिर उनको अध्यात्म ज्ञान देना भी कठिन क्योंकि उनके चिंतन और अध्ययन की बौद्धिक क्षमता का हरण उनके कथित गुरू अपने उपदेशों से पहले कर चुके हैं।
adhyatm, alekh, bharat, chintan, megazine, अभिव्यक्ति, अर्थशास्त्र, संस्कार, हिंदी संपादकीय

4/4/08

मनुस्मृति:सड़ी-गली और कम तौल कर वस्तु न बेचें

नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमर्हति
न चासारं न च नयूनं न दूरेण तिराहितम्


एक वस्तु के स्थान पर दूसरी, सड़ी गली, तोल में कम, परे से ठीक दिखने वाली पर खराब तथा ढकी हुई वस्तु नहीं बेचना चाहिए। जिस समय ग्राहक को वस्तु बेची जाये तो उसे उसकी वास्तविकता बता देना चाहिए।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस घोर कलियुग में तो व्यापार मेंे कदम-कदम पर धोखे हो रहे हैं। अब तो यह इतना खुलेआम होने लगा कि यह कहना कठिन है कि व्यापार में अब ईमानदारी नाम की भी रह गयी है। धोखाधड़ी को चतुराई और लुट को लोग व्यापार कहने लगे हैं। व्यापारी तो अब सब हो गये है-यहां तक कि साधू संत भी अपनी चीजें बेच रहे हैं और आश्रमों के नाम पर फाइव स्टार होटल बना रहे हैं। धर्म का केवल नाम रह गया है। उसमें भी तमाम तरह की धोखाधड़ी हो रही है। इस पर छोटे लोगों की क्या कहें बड़े-बड़े व्यापारी भी वह सब कर रहे हैं जिसे हमारे धर्मशास्त्रों ने वर्जित किया है। हालत यह है कि इधर ग्राहक से पैसे एंेठते हैं उधर तमाम तरह के दान देकर आयकर से छूट लेते हैं। सच तो यह है कि मनुस्मृति को शायद इसलिये प्रचलन से बाहर कर दिया गया है कि वह कई तरह के कटु सत्य दिखाते हुए आदमी की सही राह पर चलने के लिये प्रेरित करती है।

मनु स्मृति में मनुष्यों में सात्विकता का भाव स्थापित किया गया है। उसमें जीवन के हर पहलु पर विचार प्रकट किया गया है। व्यापार में नैतिकता की बात करने वाली इस पुस्तक में ग्राहक को न ठगने की हिदायत दी गयी है जबकि आजकल अनेक तरह के विज्ञापन धार्मिक स्थानों पर ऐसेी वस्तुओं के लिये भी किये जाते है जो वास्तव में वैसी नहीं होती जैसी की प्रचारित की जाता है। हम भारतवासी बहुत भावुक होते हैं और साधुसंतो पर विश्वास करते है। इसलिये कई तरह के ठगने वाले व्यापार उनकी आड़ में भी हो रहे है।

इसके बावजूद हमें अपने आचरण पर दृष्टि डालनी चाहिए और अगर हम व्यापार कर रहे हैं या सेवा कर रहे हैं तब हमें नैतिकता का पालन करना चाहिए।

3/6/08

आज महाशिवरात्रि है

आज महाशिवरात्रि का पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। भगवान् शिव हमारे आराध्य देवता हैं और हिन्दू आध्यात्म में उनको सत्य स्वरूप माना जाता है। हमारे देश के लोग अनेक देवताओं की पूजा करते हैं और भगवान् शिव सब देवताओं के भी भगवान् हैं। उनको सत्य स्वरूप इसलिए भी माना जाता है क्योंकि उनका चरित्र ही शाश्वत सत्य के निकट दिखाई देता है।

समुद्र मंथन के समय विष पीकर उन्होने पृथ्वी पर जीवन का मार्ग प्रशस्त किया। उसके बाद भागीरथ की तपस्या से प्रभावित होकर श्री गंगा जी को प्रथ्वी पर लाने से पहले अपनी जटाओं में धारण कर उसके वेग से बचाया। अपने भक्तो की संक्षिप्त तपस्या से ही प्रसन्न होने के कारण उन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है। आज उनका लोग स्मरण कर उनसे इसी तरह पृथ्वी पर जीवन की रक्षा की आशा करते हैं।

उन भगवान् शिव जी को मैं नमन करता हूँ और अपने मित्रों, पाठको और साथियों को शुभकामनाएँ देता हूँ।

2/2/08

आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं (सर्वशक्तिमान-३)

भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और आध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ:: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता। मैं स्वयं ही इस बात का उदाहरण देता हूँ। तमाम तरह के आध्यात्म ग्रंथ मैने बचपन में ही पढ़े और आज भी बड़ी रूचि के साथ पढ्ता हूँ। जब मेरी उम्र आठ साल थी तबा पडोस में रहने वाले एक पन्डित जी की बहू से मेरी माताजी ने पढ़ने के लिए तुलसीदास जी की श्री राम चरितमानस ली थी। मैं भी उसे पढ़ने लगा। मैने उसे धार्मिक भावना से नहीं कहानी की दृष्टि से पढ़ा। उसे कई बार पढ़ा। एक दिन पन्डित जी ने अपनी बहू से वह माँगी तो उसने उनको बताया की ''वह पडोस का लड्का है न वह उसे पढता है।''
उन्होने मुझे बुलाया और कहा'जब पढ़ लो तो वापस कर देना, पर इसको आदर से रखना। तुम इससे बहुत कुछ सीखोगे।''

फिर कभी उन्होने वह मुझसे वापस नहीं माँगी और जब हमने वह मकान खाली किया तब मैं उनको वापस कर आया, पर तब तक मेरे अंदर वह बीज अनुकुरित हो चुका था जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। फिर तो मैने वाल्मीकि रामायण को पढ़ना शुरू किया और अपने जेब खर्च से मैं वह सब धार्मिक किताबें ले आया जो भारतीय अध्यात्म का आधार स्तंभ हैं। आज जब मैं किसी आध्यात्म विषय पर लिखता या बोलता हूँ तो अधिकतर लोग विद्वान होने का अहसास पाल लेते हैं। अब यह मैं नहीं जानता की ऐसा है कि नहीं पर मुझे अपने तर्क भी गढने की आदत भी है और में भी कभी-कभी ऐसे सत्संगों में जाता हूँ पर कुछ नया सुनने से अधिक कोई विचार नहीं आता. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इतना ज्ञान तो मैं किताबों में पड़ चुका हूँ पर फिर भी वहाँ जाना मुझे अच्छा लगता है। इसलिए जब आज कल के तथाकथित बाबा लोग भारत के प्राचीनतम परंपरा के महिमा की बात करते हैं तो ऐसा लगता है की कोई ग्राहकों का समूह उनके सामने खड़ा है जिसे वह भारतीय आध्यात्म- जिसका कोई पेटेंट नहीं है- उसे बेच रहे हैं। वह हमेशा ही शिष्य को सिखाते रहते हैं और वह सीखता नहीं है और हर ख़ास मौके पर उनके दर्शन करने चला जाता है और वहाँ हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट अपने धर्म का पालन करता है जिसका भारत की प्राचीन गुरु-परंपरा से कोई लेना-देना हो मुझे नहीं लगता। एक बात अपने निष्कर्ष के तौर पर कहना चाहता हूँ कि आज के तथाकथित गुरुओं को एकलव्य जैसा शिष्य चाहिऐ जो उनको आज के युग में अपना अंगूठा काटकर न भेंट करे-क्योंकि उससे उनकी आश्रम फाईव स्टार आश्रमों थोडे ही बन पायेगा- बल्कि दूसरों को अंगूठा दिखाकर जुटाए पैसे से उनको भेंट दे पर अर्जुन जैसा शिष्य नहीं चाहिए जो दुष्कर्म करने वालों का समर्थन करने पर उनका प्रतिवाद करे। इन संतो और भक्तों को पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं है भले ही कितना भी बखान कर लें. (क्रमश:)

1/24/08

हिन्दी के पुरुष लेखकों के सम्मान के लिए महिलाओं का अलग वर्ग रखना जरूरी

इस समय अंतर्जाल पर लिखे जाने वाले हिन्दी ब्लोग के संबंध में जो तथाकथित रूप से जो सम्मान घोषित हुए उनमे महिलाओं का मनोबत बढाने के बात हुई और महिलाओं ने ही इसका विरोध हुआ कि उनके लिए कोई अलग वर्ग बनाया जाये। इसके बावजूद उनके तर्क पर कोई ध्यान नहीं दे रहा क्योंकि वाद और नारों पर चलते इस समाज ने तर्क बहुत काम सुने जाते हैं।

आज यह संयोग ही है कि मैं इस विषय पर लिखने की सोच रहा था कि उससे पहले अपने ब्लोग देखते हुए एक अन्य ईमेल पर गया, जहाँ मैं बहुत कम जाता हूँ । वहाँ अभिव्यक्ति की संपादिका पूर्णियां बर्मन जी का एक सन्देश मिला जिसमें उन्होने मेरा एक व्यंग्य अपनी पत्रिका में छपने की सूचना दी थी। अगर यह सन्देश नहीं भी मिलता तो भी मैं अपनी बात उनसे ही शुरू करता। प्रसंग यही था कि क्या वाकई अंतर्जाल पर महिलाओं के मनोबल को बढाने का काम हो रहा है या इस भय से उनको अलग किया जा रहा है कि उनकी वजह से कुछ तथाकथित बडे ब्लोगर या लेखक सम्मानित होने से रह जायेंगे। सत्य तो यह है कि अंतर्जाल पर हिन्दी सजाने और संवारने के लिए जो काम महिलाओं ने किया है वह पुरुष समुदाय से कई कदम आगे हैं। उनके लेखन के विषय पुरुषो से कहीं अधिक सुरुचिपूर्ण और प्रस्तुतीकरण में परिपक्वता है। कम से कम मुझे तो यही लगता है। हालांकि हिन्दी के व्यापक क्षेत्र को देखते हुए अभी भी महिलाओं की अंतर्जाल पर संख्या नगण्य है पर जितनी है वह महत्वपूर्ण ध्यान देनें योग्य है.

मेरी रचनाएं अभी तक तीन अंतर्जाल पत्रिकाओं पर छप चुकी हैं इनमें 'हिन्दी नेस्ट' और ''अभिव्यक्ति'' का संपादन कार्य महिलाओं के जिम्मे हैं। मेरा अंतर्जाल पर लेखक के रूप में प्रवेश ही महिलाओं द्वारा अपने संपादन का दायित्व अच्छी तरह निभाने के कारण हुआ है। सद्दाम को फांसी देने के संबंध में मेरा आलेख हिन्दी नेस्ट में प्रकाशित हुआ था जो कि अंतर्जाल पर मेरी पहले पोस्ट थी। उसके बाद अभिव्यक्ति-अनुभूति में व्यंग्य और कविता छपी। यहाँ मैं यह भी बता दूं कि आज से डेढ़ वर्ष पूर्व मेरे एक कवि मित्र ने मुझे अभिव्यक्ति का पता दिया था और वहीं नारद को देखते हुए आगे बढ़ जाता था और सोचता कि संपादिका ने इनके लिए अपनी पत्रिका पर कोई ऐसी जगह बना रखी है जहाँ बैठकर यह लोग चर्चा करते हैं। बहरहाल बाद में भी संपादिका पूर्णिया बर्मन जी ने मेरे ब्लोग से रचनाएं लीं। दो पत्रिकाओं का जिस तरह संचालन कर रही हैं उसे देखकर मुझे ताज्जुब होता है और मेरे लिए यह कहना मुशिकल हो जाता है कि महिलाओं का मनोबल बढाने के लिए पुरुषों के किसी खास प्रकार के कार्य करने का दिखावा करने की जरूरत है-केवल खामोशी से उनकी सक्रियता देखने के अलावा उन्हें और कुछ करने की जरूरत नहीं है - क्योंकि इसके उलट महिलाएं ही यहाँ मनोबल बढा रही हैं।

जो ऐसे महिलाओं का मनोबल बढाने की बात कर रहे हैं वह केवल अपने प्रचार के लिए कर रहे हैं ताकि अंतर्जाल के बाहर अपने आपको ब्लोगरों का नेता साबित कर सकें। क्योंकि महिलाएं जिस मनोयोग से अंतर्जाल पर पत्रिकाओं के संपादन और ब्लोग लेखन में जिस तरह अपने प्रयास कर रहीं है उनका मनोबल बढाने का नाटक करने की बजाय अपने आपको समझाने की जरूरत है कि वह वाकई बहुत अच्छा काम कर ही हैं और पुरुष समुदाय को उनसे सीखान चाहिऐ.

ब्लोग पर महिलाओं की उपस्थिति कम है पर जितनी है उनकी पोस्टों की गुणवता और दूसरे ब्लोग लेखकों का मनोबल बढाने के लिए कमेन्ट लगाने की सक्रियता को देख कर तो मुझे लगता है कि वह उसमें भी बहुत आगे हैं। अच्छे ब्लोग लेखक के बारे में मेरा विचार है कि 'अच्छा लिखने वाला और अपने साथियों का कमेन्ट लगाकर उनका मनोबल बढाने वाला ही अच्छा ब्लोगर है। केवल एक चीज से कोई अच्छा ब्लोगर नहीं माना जा सकता है'। अगर आप मुझसे इस समय देश के तीन हिन्दी ब्लोगरों के नाम पूछेंगे तो उसमें सबसे पहले तीन महिलाएं ही हैं। वह केवल न अच्छा लिखतीं है बल्कि दूसरों का हौंसला भी बढ़ाती है। जो वरिष्ठ ब्लोगर हैं और उनके विरुद्ध मैंने ही मोर्चा खोला था पर वह इस बात को महसूस करते हैं-क्योंकि उनकी काबलियत को इस मामले मैं मैं भी मानता हूँ। उन्होने एक कथित सम्मान में अपनी भुमिका निभाई थी और मेरे सहित कुछ लोगों ने उकी कार्यप्रणाली पर आपत्ति उठाई थी. यह अलग बात हैं कि वह खुद अपनी सफाई में किसी वरिष्ठ ब्लोगर को सम्मानित करने की मजबूरी दिखाने की बजाय महिलाओं के मनोबल बढाने की बात कर गए और उसका उलटा प्रभाव पडा।

अब कुछ महिला ब्लोग लेखिकाओं के इस विचार की बात करें जिसमें वह यहाँ अपनी उपेक्षा की बात करतीं है। मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। हो सकता है पुरुष ब्लोगरों की अधिकता और महिलाओं के ब्लोग पर सावधानी से अपनी बात लिखने की उनकी सहज भावना की वजह से ऐसा उनको लगता है। पुरुष ब्लोगर एक दूसरे के ब्लोग पर कभी-कभी मजाक और असहमति में भी कमेन्ट लिखते हैं पर जब महिलाओं के ब्लोग पर होते हैं तो उन्हें कई बार अपने संस्कारों की वजह से सतर्कता रखनी पड़ती है। जहाँ तक पाठक संख्या का सवाल है तो करीब सबका के एक जैसा ही हाल है अत: उन्हें अपने साथ उपेक्षित व्यवहार की शिकायत नहीं करना चाहिऐ। जहाँ तक लिखने के स्तर का सवाल है तो कम- अधिक सभी हैं चाहे महिला हों या पुरुष। इसके अनुपात की दृष्टि से अच्छी ब्लोग लेखिकाओं की संख्या पुरुषो के अनुपात से अधिक है। अगर इस हिन्दी ब्लोग जगत में अच्छे लेखन के मामले मुझे महिलाओं की चुनौती का सामना नहीं करना होता तो शायद मेरा सारा रास्ता आसान हो जाता। मैं एक लेखक हूँ और हमेशा वास्तविक धरातल पर खडा रहता हूँ। मुझे कौन सर्वश्रेष्ट ब्लोग के लिए वोट चाहिए, पर क्योंकि ऐसे सम्मानों पर व्यंग्य और हास्य कविताएँ लिखता हूँ तो सोचता हूँ कि कम से कम उन्हें अपने विचारों से अवगत कराता चलूँ। मैं कई बार महिला ब्लोगरों की पोस्ट पढता हूँ तू मुझे लगता है कि उनसे बेहतर लिखने की चुनौती मेरे सामने हैं।

हाँ एक आग्रह करूंगा कि वह अपने लिए अलग श्रेणी का विरोध न करें। वजह इससे तो कुछ वरिष्ठ ब्लोगरों को सम्मान नहीं मिल पाएगा क्योंकि महिलाओं का लेखन और सक्रियता कहीं पुरुषों से अधिक है। पुरुषों का मनोबल बढाने के लिए उन्हें अलग से पुरस्कार देना आवश्यक है, अगर सब निराश होकर भाग गए तो आप लोगों को पाठक कहाँ से मिलेंगे और अपने शब्द कमेन्ट के रूप में बिखेरने के लिए ब्लोगर कहाँ मिलेंगे। उन्हें पुरस्कार अलग से मिलने से मुझे हास्य कविता लिखने का अवसर मिलता है। अगर आपके ब्लोग उनमें शामिल होंगे तो मुझे असुविधा होगी क्योंकि अपने से अधिक योग्य महिला हो या पुरुष उस पर हास्य लिखना अपनी फिल्म पिटवाना है। कम से कम पुरुष ब्लोगरों के पुरस्कार देखकर मेरे मन में हास्य का भाव तो पैदा होता है क्योंकि वह वाकई महिला ब्लोगरों से बहुत पीछे हैं। मेरे मन में बात थी वह सबके सामने रख दी, मैं कोई ढोंग नहीं करता, इसलिए पुरस्कार या सम्मान पर कोई हास्य कविता लिखूं उसे कदापि अपनी तरफ न लें-ऐसा मेरा आग्रह है। मैं कोइ अतिरिक्त सम्मान का प्रदर्शन नहीं कर सकता क्योंकि अपने घर में भी महिलाओं से ऐसे ही सहज ढंग से बात करता हूँ और किसी महिला के आत्म सम्मान को ठेस पहुचाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगता पर पुरुष समुदाय उनकी आड़ ले रहा है यही उनको बता रहा हूँ। मैं तो वैसे भी अपने स्तर के ब्लोगरों से सम्मान नहीं ले सकता क्योंकि यह मुझे मजाक लगता है. वह दे सकते हैं तो बस अपना प्यार. इसलिए कहता हूँ कि अगर अंतर्जाल पर हिन्दी लिखने वाले पुरुषों का सम्मान देकर मनोबल बढाना है तो महिलाओं का वर्ग अलग रखना जरूरी है क्योंकि योग्यता के आधार पर सब पुरस्कार तो उनके पास चले जायेंगे.

1/19/08

अंहकार छोड़ना नहीं उसे सही दिशा देना है

मन से मोह, बुद्धि से विचारों में विकार और अंहकार से अज्ञान उत्पन्न होता है पर मन और बुद्धि से काम करने की सीख सबको दी जाती है अहंकार के साथ क्यों नही? यह तीन प्रुकृतियाँ हैं और जब तक देह हैं उसमें इनको रहना ही है और त्यागना है तो तीनों से विरक्त होना है। श्रीमद भागवत गीता में सांख्य योग की चर्चा है पर उसे खारिज भी किया है। श्री मदभागवत गीता का पूरा सन्देश जीवन को सदैव सक्रिय रखने का प्रेरक है न कि सन्यास के लिए।
हमारे देश की हिन्दी भाषा के स्वर्ण काल को भक्ति काल भी कहा गया है और इसमें संत कबीर दास और रहीम का दर्शन भी लगभग श्रीमद भागवत गीता के संदेशों जैसा ही पर उसमे भक्ति को अधिक महत्व दिया गया है। उस समय के इन ग्यानी महानुभावों ने अंधविश्वास और रूढ़वादिता का जमकर विरोध किया क्योंकि उनकी उपस्थित में कुछ लोग इस समाज को गलत दिशा में ले जा रहे थे। समाज को गलत दिशा देने वालों ने आदमी के अन्दर मौजूद अहंकार के तत्व का उपयोग किया। देश में गरीब और अमीर के, उच्च वर्ग और निम्न वर्ग और तमाम तरह के जातीय विभाजन में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ लोगों ने संतों को चोला धारण किया और पहुंच गए लगों के बीच यह नारा लेकर' अहंकार छोड़ दो"। सबको लगा कि दूसरे के लिए कह रहे हैं इसलिए ताली बजाने लगे क्योंकि मन और बुद्धि का अस्तित्व आदमी को अपने अन्दर दिखता है जबकि अहंकार इन दोनों को बाहर ले जाने वाली पृकृति है इसलिए वह नहीं दिखती।
जिन्होंने ऐसी ढोंगी संतों सो सुना उनको लगा कि इनके मापदंड से तो हम ठीक हैं हम में तो कोई अंहकार नहीं है दूसरे ही खराब हैं। मेरा मानना है कि मन किसी विषय को दृष्टिपात करता है और बुद्धि उस पर चिन्त्तन, मनन और अनुसंधान करती है और अहंकार उसके निष्कर्षों को बाहर ले जाता है। हमें अपने इसी अहंकार की साथ जीना है तो उसे सही दिशा में ले जाना चाहिए।
अगर किसी के मन में आता है कि'मेरे पास अधिक धन है" यह अंहकार से उपजा अज्ञान हैं क्योंकि यहाँ किसी का कुछ नहीं है। अब ऐसा सोचने वाले आदमी अगर अपनी बुद्धि को कष्ट नहीं देगा तो यही अहंकार से उपजा अज्ञान अन्दर रहकर उसे त्रास देगा क्योंकि उस धन से बहुत कुछ खरीदा जा सकता पर सब कुछ नहीं-मन का सुख तो कतई नहीं खरीदा जा सकता। अत: अन्दर बैठा अहंकार से उपजा अज्ञान उसे तकलीफ देगा। बेहतर होगा वह अपने आसपास ऐसे लोगों में उसे दान करे जिनको उनकी जरूरत हो। इससे भी भी आगे में कहूँगा के कभी आपको लगे कि मेरे पास पांच सौ रूपये के नोटों के बीच दस रूपये हैं और..........दस रूपये का क्या........ इस अहंकार से उत्पन्न अज्ञान के विसर्जन के लिए किसी दुकान पर जाओ एक डबल रोटी खरीदो और जाकर कहीं मजदूर बस्ती में किसी बच्चे को दे दो। किसी भिखारी को दे दो। कहते हैं कि कई लोगों को भीख मांगने की आदत होती है और उनको भीख मत देखो पर तुम इसे मत देखो। क्योंकि वास्तव में वही भिखारी लोग हैं जिनके पास अंहकार नहीं है और तुम अपना हिस्सा उसे दे दो। मेरा मानना है कि जिस तरह किसी पागल आदमी में बुद्धि का तत्व काम होता है वैसे ही भिखारी में अहंकार के तत्व का अभाव होता है. आप कहेंगे यह भीख देकर तो अहंकार छोड़ने वाली बात है। नहीं जब तुम ऐसा करोगे तब तुम्हारे पास फिर अंहकार के रूप में फिर और कोई बात आयेगी। अंहकार के रूप में आ रहे विचार तो उसकी धाराएं है जिनका मूल उदगम स्थल तो हमारी देह ही है। वह इससे अलग नहीं हो सकता। यह अहंकार से जो धारा है उसे बहने दो एक ऐसी अपनी बुद्धि से ज्ञान की दिशा की तरफ ले जाओ जो किसी को लाभ पहुँचाती है। तुम उसकी दिशा तय कर सकते हो पर उसका उद्गम स्थल नहीं नष्ट नहीं कर सकते।

मैं हिन्दी भाषा का लेखक हूँ और मैंने अंतर्जाल पर ब्लोग बनाया है। यह अंहकार से उपजा विचार है और क्या मैं इस रोक सकता था? अगर रोकता तो क्या मैं लिख सकता था। मैं उसे दिशा देने की कोशिश करता हूँ। अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो लिखूंगा कैसे है। मान लीजिये आज मैं लिखना बंद कर दूं तो भी यह अंहकार नहीं जायेगा और अगर मैं उसे दिशा नहीं दूंगा तो वह फिर अपना काम स्वयं करेगा। कैसे? जहाँ कहीं भी बात होगी में अपने अंतरजाल पर लिखने की चर्चा करूंगा? या कई बार अपने ब्लोग खोलकर देखूंगा। अब तो बहुत लिख चुका अब इससे अधिक क्या लिखना-यह भाव आ जायेगा। यकीन करिये में अपने फुरसत के बेहतर क्षण किसी मूर्खतापूर्ण काम में नष्ट करूंगा। मतलब तब अंहकार से उपजा अज्ञान मेरे समय को कई ऐसी जगह नष्ट करेगा जो मुझे मानसिक सुख नहीं पहुंचाते. ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं है लिख कर कुछ नया सीखने का विचार क्या बुरा है। मैं लेखक हूँ पर इतनी अधिक सक्रियता कभी नहीं रही जितनी अब है पर कुछ नया सीखने को मिल रहा है। वाद और नारों पर समाज के चलने, उसके जज्बातों के व्यापार में फंसने और धर्म के नाम पर पाखण्ड को मैंने बहुत करीब से देखा है और मुझे और निराशा तब होती है जब शिक्षित लोग भी हथियार डालकर अपने से काम पढे-लिखे लोगों के अंधविश्वासों के सामने सिर झुकाते हैं तब लगता है कि उनको अहंकार पर दृष्टिपात करते हुए उसे सही दिशा में काम करना चाहिए क्योंकि आप उसे अपने से अलग कर नहीं सकते। (क्रमश:)

1/16/08

सर्वशक्तिमान ने जीवन बनाया पर नियम नहीं

सर्वशक्तिमान ने इस धरती पर जीवन का निर्माण इस तरह किया है कि उसका संचालन स्वत: होता रहे पर उसने कोई नियम नहीं बनाया. चालाक लोगों ने उसके नाम पर अनेक ऐसी पुस्तकें और उनका ज्ञान प्रकट किया जो उसने नहीं किया. प्रत्येक जीव की देह पांच तत्वों से बनी और उसमें मन, बुद्धि और अहंकार ऐसे तत्व स्वत: आये और उसका संचालन करते हैं. आदमी की देह में ऐसा लचीलापन है जिससे वह अपने मन, बुद्धि और अहंकार का अपने अनुसार अच्छा उपयोग कर सकता है क्योंकि वह बन्दर के बाद ऐसा जीव है जिसके पास अपने हाथ भी है और अन्य जीवों में ऐसा नहीं है. एक समय आदमी भी पशुओं जैसा जीवन जीता था पर जैसे-जैसे उसे अपने अन्दर स्थित शक्तियों का अहसास होता चला गया वैसे-वैसे वह अन्य जीवों के मुकाबले अपने जीवन के रहन-सहन में परिवर्तन करता गया.

यहीं से शुरू हुआ मनुष्य में विभाजन और वह शासक और शासित दो वर्गों में बंटता गया-मनुष्य लड़ते तो पहले भी थे और अब भी लड़ रहे है एक-दूंसरे से. यह कोई नियम नहीं कि वह आपस में न लडे. सर्वशक्तिमान ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया. उसने तो केवल जीवन और मृत्यु का नियम बनाया है सुख-दु:ख का नहीं. क्योंकि मनुष्य में यह बुद्धि है कि वह तय करे कि उसे सुख के साथ जीना है या दु:ख के साथ. दूसरे को दु:ख देकर तुम सुखी नहीं रह सकते. तुम दूसरे को गाली दोगे वह तुम्हें देगा. तुम दूसरे को अपमानित करोगे वह तुम्हें करेगा वह तुम्हें करेगा. तुम लोगों को मारने का काम करोगे तो तुम्हें भी कोई मारेगा. यह सर्वशक्तिमान का बनाया नियम नहीं है यह तो एक स्वाभाविक जीवन नियम है.

जो लोग कहते हैं कि यह नियम सर्वशक्तिमान ने बनाया है वह डरपोक हैं या आलसी. क्या यह सब जो अच्छी बाते कह रहे हो उसने कभी कही हैं. नहीं तुम डरते हो और तुम में आत्मविश्वास की कमी है. तुम यह खुद क्यों नहीं कहते कि किसी के साथ अच्छा व्यवहार करने से अपने को भी अच्छा व्यवहार मिलेगा. क्या तुम आलसी हों जो अच्छी बातें सोचने की बजाय दूसरे से अच्छी बातें सीखने को कह रहे हो. अगर तुम्हें कोई अच्छी बात कहनी है तो उसे दूसरे के हवाले से क्यों कहते हो अपने हवाले से क्यों नहीं कहते? अगर दूसरे से कुछ तुम सीख कर कोई विचार व्यक्त करते हो तुम आलसी हो अपना आत्ममंथन नहीं करते और अपनी बुद्धि को आराम से रहने देना चाहते. ''मुझे किसी पर दया दिखाना चाहिए" यह ख्याल अपने आप क्यों नहीं करते. तुम्हें कई बार ऐसा लगता है कि अगर मैं अपने हवाले से अच्छी बात कहूंगा तो लोग यकीन नहीं करेंगे या उस प्रभाव नहीं पड़ेगा तो तुम समझ लो कि डरपोक हो क्योंकि तुमने अपने मन, बुद्धि, और अंहकार का सही विश्लेषण नहीं किया.

कहते हैं कि आदमी को अहंकार नहीं करना चाहिए पर देह है तो अहंकार तो रहेगा. हम उसके बिना चल नहीं सकते. हाँ अहंकार रखो कि तुम एक शक्तिशाली व्यक्ति हो तभी तुम किसी की सहायता कर सकते हो तुम अपने लोगों की रक्षा कर सकते हो. जब तुम किसी को अकारण मारते हो, अपमानित करते हो, दुख देते हो वह वह तुम्हारा अहंकार नहीं है बल्कि कायरता है. अगर देह है तो अहंकार भी रहेगा. हम सो रहे होते हैं और मच्छर काटते हैं तो हम उसे अपने हाथ से भगाते हैं और अगर अहंकार नहीं होगा तो हम उसे भगाएंगे कैसे? अगर अंहकार नहीं करोगे तो आत्म-मंथन नहीं कर सकोगे. दरअसल विद्वान लोग अपने पद, धन और सम्मान के नशे में चूर के अपराधों को अहंकार में किया बताते हैं वह दरअसल उनकी कायरता और आत्म विश्वास की कमीं के कारण होते हैं-लोभ और लालच के कारण होते हैं. अगर उनमें मनुष्य होने का अहंकार होता तो वह ऐसे काम करता है. लोगों कहते हैं कि अमुक व्यक्ति अंहकार के कारण हम से बात नहीं करता पर मैं कहता हूँ कि वह कायर आत्महीनता के भाव से ग्रसित है इसलिए तुमसे बात नहीं करता. उसके पास शब्द नहीं है कि तुमसे बात नहीं करता. तुम भी वैसे ही क्योंकि तुम ऐसा सोच रहे हो और अपने मनुष्य देह में स्थित अहंकार की तरह दृष्टिपात करोगे तो तुम्हें लगेगा कि जो उसके पास है और वही तुम्हारे पास है फिर वह तुमसे धनी और बड़ा कैसे हो सकता है? (क्रमश:)

1/10/08

समाज को साथ लिए बिना भारतीय धनपतियों का सम्मान विदेश में नहीं हो सकता

विश्व में भारतीय लोगों की आर्थिक शक्ति बढ़ रही है पर उनकी प्रतिष्ठा उस तरह नहीं बढ़ रही जैसी की पश्चिमी देशों के संपन्न लोगों की है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संगठनों पर उनका वैसा वर्चस्व नहीं है क्योंकि इसके लिए जिस प्रकार की शक्ति चाहिए वह उसे अर्जित नहीं कर पाए। वह अपने समाज पर नियंत्रण करने से प्राप्त होती है और ऐसा तभी संभव है जब आप अपनी धन-संपदा से कुछ हिस्सा उस पर बिना आर्थिक लाभ के चुकाएँ। अपने समाज के कुछ लोगों के साथ उसके संगठनों को भी शक्तिशाली बनाकर उन पर नियंत्रण करें।
जिन भारतीयों के विदेश में संपन्न होने की इस देश में कुछ लोग अक्सर चर्चा करते रहे हैं उन्होने वहाँ किसी नये स्त्रोतों का निर्माण नहीं किया है बल्कि वहीं मौजूद स्त्रोतों का इस्तेमाल कर आर्थिक शिखर पर पहुँचे हैं। कुछ ऐसे भी संपन्न लोग हैं जो देश में ही हैं पर उन्होने विदेश में भी आर्थिक शक्ति अर्जित की है। टीवी चैनलों और अन्य प्रचार माध्यमों मे उनकी चर्चा होती है पर सामान्य लोगों में उनकी कोई चर्चा नहीं होती। वजह! समाज के लिए वह ऐसे धनपति हैं जिनका समाज को उनके संपन्न ढाँचे से कोई आर्थिक और सामाजिक लाभ नहीं है क्योंकि उन्होने अपने समाज को विकसित करने के लिए कुछ करना तो दूर उसे सतत संचालन में भी कोई भूमिका नहीं दिखाई देती।
भारतीय आध्यात्म को समृद्ध करने वाले सभी महापुरुषों ने धन और वस्तुओं के दान की बहुत सरल व्याख्या की है। जिन महापुरुषों ने दान के महत्व को प्रतिपादित किया है उनके मन में यही बात रही है कि समाज में धनी लोग ग़रीबो और असहायों को सहायता प्रदान करें ताकि उसका सुचारू संचालन होता र्हे। यह अलग बात है कि कुछ लोगों ने अगले जन्म में लाभ मिलने के अंधविशवासों को जोड़कर लोगों को भ्रमित किया और लोग अब यह दान कर्मकांडों पर अपना धन कुपात्र लोगों को देकर नरक जाने से बचना चाहते हैं। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान बघारने वाले भी दान को इस तरह प्रचारित करते हैं कि जैसे उनको दिया गया दान ही असली पुण्य है जबकि श्रीगीता में सुपात्र को दिया गया दान भी फलीभूत बताया गया है और उसमें जन्म आदि की कोई शर्त नहीं है । आज के सन्दर्भ में इस दान को मैं निष्प्रयोजन विनियोजन के रूप में कहता हूँ। भारतीय पूंजीपति अगर कुछ क्षेत्रों में निष्प्रयोजन विनियोजन करते तो उनका नाम होता। कैसे?
१.वह ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ्ने के लिए आर्थिक सहायता दें जिनसे उसका नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करने की संभावना हो।
२।वह ऐसे संगठन और संस्थाओं को योगदान दें जो उनकी विश्व स्तर पर सामाजिक साख बनाने में मदद कर सकें।
३.वह अंतर्जाल पर अपने सर्च इंजन और वेब साईटों का निर्माण करें और उनको इतना व्यापक बनाने के लिए धन का विनिवेश करें ताकि उसमें उनेक समाज की भागीदारी बढ़े। इसके साथ अंतर्जाल पर सक्रिय पत्रिकाओं को मदद दें ताकि इसमें उनके योगदान की चर्चा यहाँ और बाहर दोनों जगह हो।


भारतीय धनपति इस बात से संतुष्ट हैं की उनके पास फिल्मी अभिनेताओं, सामाजिक और धार्मिक संगठनों के लोगों का जमाबडा है, टीवी चैनलों और अख़बारों में उनका प्रचार हो रहा है और यही सामाजिक प्रतिष्ठा का परिचायक तो ग़लतफहमी में हैं। समाज में इज़्ज़त तभी है जब कोई ग़रीब आदमी जिसे आपने धन नहीं दिया वह भी उनको याद करे। इस मामले मने कुछ ऐसे धनाढ्य लोगों के नाम लिए जा सकते हूँ जिन्हें सामान्य लोग आज भी सम्मान से देखते हैं। माननीय जे. आर. डी टाटा, घनश्याम दास बिरला और कैसेट किंग गुलशन कमार को आज भी लोग सम्मान से याद करते हैं टाटा ने जहाँ अस्पताल बनवाए और खेलों में भी अपना योगदान दिया, स्व. घनश्यादाम दास बिरला ने कई जगह धार्मिक तीर्थों पर धमर्शालाएँ और मंदिर बनवाए स्व. गुलशन कुमार ने कटरा में वैष्णोदेवी पर लंगर चलवाए। ऐसे कई लोग हैं जो वैष्णो देवी गये पर उनके लंगर में कुछ भी नहीं खाया फिर भी आज उनको याद करते हैं। हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बात से सहमत न हों पर यह एक वास्तविकता है कि साहूकार वही है जो समाज के लिए किसी न किसी तरह के लिए व्यय करता है।

हमारे आध्यात्म में दान को जो महत्व दिया गया है उसकी कुछ लोगों ने भिखारियों और कर्मकांडों तक ही सीमित रख कर जो व्याखाया की है उससे समाज को तो कोई फायदा नहीं हुआ उल्टे समाज और धर्म बदनाम हुआ सो अलग.
आप इन विदेशियों पर टिप्पणी तो कर सकते हैं पर बताईये किसी नयी आधुनिक चीज़ के निर्माण पर भारत के इन धनपतियों के नाम कोई सृजन किया हुआ कोई कार्य कहीं लिखा हुआ है? आज अंतर्जाल पर जितनी भी सुविधाएँ हैं वह अंग्रेजी वेब साईटों की वजह से हैं। जिस इंडिक या एनी टूल से हम लोग हिन्दी लिख रहे हैं उसको लाने वाली तो एक विदेशी वेब साईट गूगल ही है-अगर देश में कोई टूल बना होगा तो वह भी किसी उत्साही व्यक्ति ने अपना श्रम और समय खर्च कर बनाया होगा। ब्लॉग भी भी विदेशी वेब साईटों के द्वारा दिए गये हैं और अगर हम बात करते हैं कि हिन्दी के विकास की तो इसमें देश के धनपतियों का योगदान आज भी नगण्य है। वह हिन्दी फिल्मों में विनिवेश करते हुए अपने आसपास अभिनेता और अभिनेत्रियों का जमघट लगा सकते हैं जिनको परदे के बाहर हिन्दी बोलना भी नहीं आता हैं पर किसी ने भी अंतर्जाल पर भारतीय भाषाओं के लेखकों को लिखने के लिए क्या कोई सहायता दी हैं? आज जो लेखक इस पर लिख रहे हैं वह इंटरनेट पर अपने कनेक्शन पर पैसा खर्च कर रहे हैं और क्या कोई ऐसी टेलीफ़ोन कंपनी आगे नहीं आई जो इसके लिए उन्हें सुविधा दे। लिखना कोई आसान काम नहीं है पर जो अपने शौक की वजह से लिख रहे हैं तो एक उपभोक्ता की तरह ही न! अंतरजाल पर जो पत्रिकाएँ निकल रहीं है उसके संपादक निष्काम भाव से अकेले जूझ रहे हैं पर क्या किसी धनपति के दिमाग़ में यह आया की इन लोगों को सहायता दें। हाँ, बड़े अख़बार अपने तामझाम लेकर यहाँ आए हैं पर अंतर्जाल पर जो स्वतन्त्र रूप से लिख रहे हैं उसको देखकर मुझे नहीं लगता की वह किसी अख़बार से काम है, कई बार तो यहाँ ऐसे विचार पढ़ने को मिल जाते हैं लो अखबारों में नहीं मिलते।
आप क्रिकेट में ही देख लें। भारत की आर्थिक शक्ति पर ही पूरा विश्व का क्रिकेट चल रहा है और आईसीसीआआई के अंपायर पैनल में भारत के अंपायर ही नहीं हैं। कहते हैं की भारत के अंपायर स्तरीय नहीं हैं? देश के चयनकर्ता कहते हैं की देश में प्रतिभा नहीं है? क्या ऐसी बातों से देश का सम्मान विश्व में बढ़ सकता है: अगर भारत का आम आदमी पूरे विश्व के लिए एक आर्थिक दोहन किए जाने वाला उपभोक्ता है तो यहाँ के जो ख़ास लोग हैं-जिन पर देश के प्रचार माध्यम गर्व करते हुए थकते नहीं है- वह भी वहाँ कोई साहूकार नहीं माने जाते-उनके हैसियत वहाँ एक कुशल प्रबंधक से अधिक नहीं है। यहाँ उनके विज्ञापनों पर चलने वाले टीवी चैनल और अख़बार उनका कितना भी गुणगान कर लें पर समाज को साथ लेकर न चलने की वजह से विश्व की मीडिया में उन्हें कोई सम्मान नहीं है। भारत के कितने भी धनपति बाहर जाकर भले ही संपन्न हो जाये पर सम्मानीय हों पर पर वे अमेरिका के फ़ोर्ड और बिल गैट्स नहीं हो क्योंकि उनको अपने समाज का वैसा समर्थन प्राप्त नहीं है।

1/9/08

निष्काम और सहज भाव से लिखते जाओ, इंकलाब आते रहेंगे

लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर बिना लिखे भी कौनसा आ जाता है। इन्कलाब लाने वाले नारे तो ख़ूब लगाते हैं पर उसका स्वरूप क्या है और उसको लाने के लिए क्या योजना है कोई नहीं बता सकता। बस नारे लगते हैं 'इन्कलाब लाओ', 'इन्कलाब लाना है' और इन्कलाब लाकर रहेंगे। गरीबों,शोषितों और मज़दूरों के संरक्षकों के लिए यह एक पसंदीदा नारा रहा है। जहाँ तक ब्लोग से इंकलाब आने का सवाल है तो इन पर लोग लिख रहे हैं यही क्या इंकलाब है कि उनके पास एक स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के लिए एक साधन है. विदेशों में अगर कोई चीज बनाई जाती है तो उसका भारतीय अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं और ब्लोग का भी यही होने वाला है।

इन्कलाब का सीधा अर्थ लें तो उसे कह सकते हैं कि बदलाव, यह बदलाव दो प्रकार का होता है एक तो प्रकृति स्वाभाविक रुप से मानवीय स्वभाव के साथ-साथ समाज की आर्थिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रवृतियों में बदलाव लाती है-और उसकी एक सतत प्रक्रिया है जो अनवरत चलती है पर हमें पता भी नहीं लगती है। दूसरा लोग स्वयं अपने प्रयासों से परिवर्तन लाते हैं और इसके लिए कहीं सामूहिक आंदोलन तो कहीं इसके लिए चरणबद्ध अभियान चलाये जाते हैं। इनमें इन्कलाब या क्रान्ति शब्द सामूहिक राजनीतिक आंदोलन से ही जोडा जाता है और इनमें सोवियत संघ की लाल क्रान्ति और चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति सबसे ज्यादा मशहूर है और हमारे देश के कुछ लोग लंबे समय तक इस देश में ऐसा ही करने का सपना संजोये रहे भारतीय समाज की स्थितियाँ ऎसी रहीं कि उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। अब सोवियत संघ और चीन भी खुलेपन के तरफ बढ़ गये हैं। वहाँ इंकलाब लाया गया और अब वह उससे पीछे हट रहे हैं क्योंकि जोर जबरदस्ती लाया गया इंकलाब कभी भी सफल नहें होता और प्राकृति स्वयं परिवर्तन लाती हैं इसलिए अगर कहा जाता है कि ब्लोग इंकलाब नहीं ला सकते तो उसमें एक निराशाजनक अभिव्यक्ति लगती है.
लिखने से बदलाव नहीं आते यह एक सत्य बात है पर बिना लिखे भी बदलाव नहीं आते यह भी उतना ही सत्य है। यह जो लोग इस समय निज पत्रक (ब्लोग) लिखे रहे हैं उनकी विषय वस्तू से कोई बदलाव नही आएगा पर उनके लिखने की जो प्रक्रिया है और उसमें लोग जैसे-जैसे जुड़ते जायेंगे लोगों की प्रवृति में भी बदलाव आ सकता है इस संभावना को नकारना गलत होगा।हमारे देश में लिखना लोग पेशे की तरह बहुत कम लोग अपनाते हैं यह अलग विचारणीय बात है पर जो लोग लिखते हैं वह अपने भावों में सामजिक संदर्भों को व्यक्त जरूर करते हैं। निज पत्रक (ब्लोग)लेखकों की बढती संख्या इस बात का प्रमाण है को लोग अपनी अभिव्यक्ति के लिए इसे एक साधन के रुप में देख रहे हैं ।
महर्षि बाल्मीकि और वेदव्यास ने जब अपनी रचनायें प्रस्तुत की होंगीं उस समय समाज में किसी बदलाव के लिए प्रस्तुत नहीं की होंगीं पर उनकी रचनाओं का जो समाज पर प्रभाव है उसे हम आज भी देख सकते हैं , उन लोगों ने अपने कार्य और दायित्व को निष्काम और सहज भाव से निभाया तो उसका प्रभाव यह हुआ कि भगवान् श्री राम और श्री कृष्ण आज भी हमारे ह्रदय के नायक हैं। हिंदी भाषा में भक्ति काल को स्वर्णकाल भी कहा जाता है क्योंकि उस समय कबीर, तुलसी,सूरदास, मीरा, रहीम और रसखान तथा अन्य कवियों ने जो रचनाएं इस देश को दीं वह केवल भक्ति से संबंधित नहीं है बल्कि जीवन के सत्यों को उदघाटित भी करती हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। आज जो आध्यात्म के मनीषी हैं वह अपने प्रवचनों में उनको सुनाकर लोगों पर प्रभाव डालते हैं। कुछ लोग उस काल को भक्ति आंदोलन भी कहते है । उस समय कोई इन मनीषियों ने एक झंडे तले इस आंदोलन को नहीं चलाया था पर उनकी रचनाओं ने ही उस काल को एक आंदोलन के रुप में स्थापित किया। इनके लिखने या कहने का उद्देश्य समाज में बदलाव लाना नहीं था पर वह आया और आज समाज में इनकी रचनाओं की चर्चा होती है।
भारत के इन मनीषियों जैसा कोई बन ही नहीं सकता, कम से कम पैसा लेकर लिखने वाला तो कतई नहीं। हाँ, इनकी रचनाओं को दुहराकर या उनके क्रम में अपनी रचना कर इस समाज में निरंतर बदलाव की प्रक्रिया में शामिल हो सकता है, वैसे भी भारतीय समाज बहुत उदार माना जाता है जो परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए चलता है बशर्ते वह उसके अनुरूप हौं और उस पर थौपे न जाएँ । निज पत्रक (ब्लोग) वैसे ही हैं जैसे समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ ,टीवी चैनल और अन्य मध्यम । इसके लेखक भी वैसे ही हैं-इनके लिए कोई अलग से संज्ञा ढूँढने की आवश्यकता नहीं है ।कहने वाले तो यह भी कहते हैं संचार माध्यम भी कोई इन्कलाब या बदलाव नहीं ला सकते, और यकीनन निज पत्रक (ब्लोग) लेखकों पर भी यह विचार लागू होता है।
समाज में बदलाव की प्रक्रिया चलती रहती है और लिखना भी। किसी के लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर इसीलिये लिखना बंद भी तो नहीं किया जा सकता-आख़िर आत्म अभिव्यक्ति के लिए इससे बेहतर कौनसा साधन है। निष्काम और सहज भाव से लिखते रहो तो इन्कलाब या बदलाव भी आयेगा नहीं आया तो इस बात का अफ़सोस तो नहीं होगा कि हमने कोई प्रयास नहीं किया। अगर हमारे लिखे बग़ैर बदलाव आया तो हमें भी यह अफ़सोस होगा कि हमने लिखा क्यों नहीं । समाज में बदलाव के प्रक्रिया के साथ लिखना भी जारी रहना चाहिए। हमारे लिखने से समाज में इन्कलाब या बदलाव आये या नहीं हमारे अन्दर तो आ ही सकता है।

1/4/08

मध्यम वर्ग अपने तनाव से मुक्त होना ही नहीं चाहता

समाज में जो अंदरूनी तनाव है उसे कोई सीधे व्यक्त नहीं कर रहा है। जिन लोगों के पास धन-संपदा वह उसकी रक्षा के लिए जूझ रहा है और जिसके पास नहीं है वह अपने अभावों को जीते हुए जैसे-तैसे जीवन निर्वाह करते हुए अपने सामाजिक दायित्यों पूरे कर लेता है। मुख्य समस्या तो सबसे अधिक मुखर मध्यम वर्ग के साथ है। वह अपने को गरीब कहलाना नहीं चाहता और अमीरों की जमात में बैठने की उसकी औकात नहीं है।अपमान वह झेलना नहीं चाहता और सम्मान उसे मिलता नहीं है। इस समस्या का हल यह है की मध्यम वर्ग के लोग एक-दूसरे के साथ जुडे और यह स्वीकार कर लें कि उनको एक दूसरे का सम्मान और सहयोग करने का अलावा और कोई चारा नहीं है।

यह कहना आसान है पर जब जमीन पर देखते हैं तो कई ऐसे धार्मिक, सामाजिक, भाषाई और जातीय विभाजन है जिसकी सीमाओं को तोड़ने का साहस इस वर्ग में नहीं है-सत्य तो यह है कि वह इनकी पहचान का आरोप है। हमारे देश का आध्यात्म कहता है की देह नश्वर है पर इसी देह का सबसे अधिक अभिमान माध्यम वर्ग में ही है। हमारे देश में जन्म, मृत्यु और विवाह के कर्मकांड इतने कठिन बना दिए गए हैं कि उनके निर्वहन में मध्यम वर्ग अपना पूरा जीवन दे देता है पर उससे मुक्त नहीं होना चाहता-अपने पास आर्थिक सामर्थ्य होने के बावजूद वह इन पर खर्च करता है।

मिटटी की इस देह के मिटने के बाद भी जो चला गया उसके सम्मान में तेरहवीं और श्राद्ध की परंपरा किस तर्क पर आधारित है यह पता नहीं। शादी के लायक बेटा है तो उस पर इतना अहंकार कि उसका वर्णन करना कठिन है और बेटी है तो मध्यम वर्ग का आदमी गरीब ही हो जाता है। पहले उसे पढाये-लिखाये और गृह कार्य में दक्ष बनाये और फिर उसके दहेज़ के लिए पैसा एकत्रित करे। दो देह में मौजूद आत्माओं के मिलन के लिए कितने गीत होते हैं पर उससे पहले जो सौदेबाजी होती हैं वह व्यापार से कम नहीं होती। उस समय लगता है कि काहे की संस्कृति और काहे के संस्कार? सब ढकोसला है।

जो परिवार मध्यम वर्ग का है और उसका लड़का रोजगारशुदा है तो वह दहेज़ के लिए किसी धनी परिवार के रिश्ते का इन्तजार करता है। मध्यम वर्गीय पिता के लिए अपने वर्ग के ही किसी लडकी के पिता का बोझ हल्का करने के इरादे से दहेज़ की दर काम करने का उसका इरादा नहीं होता। इस तरह जिस मध्यम वर्ग को समाज का मजबूत आधार माना जाता है वही अपनी हालतों से जूझ रहा है।

यह आश्चर्य समाज में जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र तथा अन्य आधारों पर विभाजन हुआ है उनका नेतृत्व भले ही उसके उच्च वर्ग के लोगों के पास रहता है पर उसका अस्तित्व बनाए रखने में माध्यम वर्ग की भूमिका बहुत होती है, पर अब परंपराओं और रूढियों को बोझ वह जबरन ढो रहा है, इस आशा में कि वह इसकी आड़ में अपनी प्रतिष्ठा बढे और उसका उसे आर्थिक लाभ हो-और वह भी पुत्र का विवाह में धनी परिवार में हो यही संभावना होती है। कुछ लोगों को शायद होता भी हो पर उसका कोई स्थाई नहीं होता, पर इसके बावजूद माध्यम वर्ग अपने दिमागी तनाव से मुक्त नहीं होना चाहता।

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