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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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7/16/08

अध्यात्म और धर्म अलग अलग विषय हैं-आलेख (2)

अध्यात्मिक ज्ञान जिस व्यक्ति को होता है उसका मानसिक तथा बौद्धिक शोषण कतई नहीं किया जा सकता है। अध्यात्म ज्ञान कोई अधिक व्यापक नहीं है पर उसका अर्थ समझकर उसे धारण करना बहुत कठिन है। वैसे एक बात स्पष्ट है कि समस्त धार्मिक विचाराधाराऐं अध्यात्मिक ज्ञान के आधार को ही मजबूत करने का दावा करती हैं पर वह उसमें अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषय इस तरह जोड़ दिये गये हैं कि सामान्य मनुष्य भ्रमित हो जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान जो कि सत्य का साक्षी है उसकी चर्चा तो पूरे विश्व में होती है पर उसका अध्ययन, चिंतन और मनन कितने लोग करते हैं और उसमें भी कितने उसे धारण कर पाते हैं? यह अलग चर्चा का विषय है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार करने वाले कथित संतों ने अनेक प्रकार की चमत्करिक कहानियां तथा सांसरिक विषय उसमें इस तरह जोड़े हैं कि उसका मूल स्वरूप ही किसी की समझ में नहीं आता।

भारत में अध्यात्मिक ज्ञान का दावा रखने वाले तो बहुत मिल जायेंगे पर उसके सूक्ष्म रूप का किसी को पता नहीं है। अपने व्यवसाय, नौकरी तथा खेती से निराश होने पर अक्सर लोग कहते हैं कि ‘हमारा काम हैं कर्म करना और फल देना तो परमात्मा का का है।’ सुनने में यह कितना अच्छा लगता है। कहने वाले तो यही कहेंगे कि यह श्रीगीता में ऐसा ही कहा गया है।
श्रीगीता में केवल कर्म की बात नहीं कही गयी बल्कि निष्काम कर्म की बात कही गयी है। जब कोई कहता है कि ‘हमने अपना काम किया और फल देना तो परमात्मा का काम है’ तो यह उसके निष्काम होने का प्रमाण नहीं है क्योंकि अपने कर्म के साथ कहीं न कहीं उसके फल पाने की इच्छा प्रकट होती है।’

पहले तो कर्म का फल का स्वरूप ही समझ में आना चाहिये तभी तो आदमी निष्काम भाव से कार्य कर सकता है। दरअसल निष्काम भाव से कर्म करना ही जीवन से विषादों से मुक्ति दिलाने का उपाय है और लोग निष्काम भाव से काम न करें इसलिये उनको उसका उपदेश दिया जाता है पर प्रेरित तो उस सांसरिक फल के लिये ही किया जाता है जो उनके जीवन और विचारों को सीमित दायरों में बांध देता है। वह सांसरिक पदार्थों की फल समझते हैं जिनका उपयोग भी वह यही करते हैं। अगर कोई मनुष्य नौकरी कर रहा है तो उसका वेतन, व्यवसायी है तो उसका लाभ और मजदूर है तो उसकी मजदूरी क्या फल है? नहीं अगर यह फल है तो फिर वह इसका उपयोग वह अकेला कहां करता है? मनुष्य द्वारा भौतिक मुद्रा अर्जित करना फल नहीं है क्योंकि वह उसे भी तो अपने तथा परिवार के ऊपर ही व्यय करता है। कोई अपने बच्चे की फीस भर रहा है तो कोई अपनी पत्नी का इलाज करा रहा है तो कोई मकान बनवा रहा है। कोई अपने पिता को दे रहा है तो कोई माता को दे रहा है। कभी भाई की मदद कर रहा है। भला इस धनोपब्धि को फल कैसे कहा जाता है। जब वह अपने हाथ से कहीं से धन लेता है तो वह फल नहीं बल्कि अपने कर्तव्यों और दायित्वों के निर्वाह के लिये लेता है। यह धन लेना उसका कर्तव्य है न कि फल! धन प्राप्त करना आपका कर्म है और व्यय करना भी-उसे फल कैसे कहा जा सकता है।

दूसरी बात तो छोडिये जो दुनियां भर का ज्ञान बघार रहे हैं वह भी इसमें से अपने लिये दान मांगते हैं और बताते हैं कि यह आपकी धार्मिक जिम्मेदारी है। सीधा आशय यह है कि आपने जो धन कमाया वह तो आपके कर्म का दायित्व बढ़ाता है और आप उसे कहीं अन्य व्यय कर अपना कर्तव्य निबाहते हैं। जब तक देह है उसे बनाये रखने के लिये व्यय करते हैं पर यह तो हमारा कर्म है। यह फल कहां से कहा जा सकता है?

सवाल यह है कि फिर फल क्या है? फल है हम अपने जीवन में शांति से रह पायें और जब देह त्याग करने का समय आये तो शांति और संतोष के साथ मोक्ष प्राप्त करें। यही असली फल है जिसकी तरफ ले जाने की ताकत केवल भारतीय अध्यात्म के ज्ञान में ही हैं। पहले उस सांसरिक फल का स्वरूप भी समझ लें। अगर हमने किसी से माह भर कार्य करने, अथवा वस्तु बेचने या मजदूरी करने पर किसी से धन मांगा तो क्या वह फल मांगना है। नहीं! यह तो उसे अपने सांसरिक कर्तव्य का निर्वाह करने के लिये प्रेरित करने का प्रयास है जिससे हम अपने आगे के कर्तव्य का निर्वाह कर सकें। मतलब यह कि अगर कोई अध्यात्म का ज्ञान रखता है तो वह अपने कर्तव्य निर्वाह के लिये धन प्राप्त करना फल नहीं बल्कि कर्तव्य ही हैै। यह अलग बात है कि जिन लोगों को पैसा देना नहीं होता वह कह देते हैं-‘क्या, तुम ज्ञानी होकर पैसा मांगते हो।’ याद रखना अध्यात्म का ज्ञान होने का आशय यह कदापि नहीं कि आदमी सांसरिक विषयों को त्याग कर भागने की तैयारी कर ले। एक सामान्य व्यक्ति और अध्यात्मिक ज्ञानी व्यक्ति के बस दृष्टिकोण में अंतर होता है। सामान्य व्यक्ति अपनी धनोपब्धि पर ही प्रसन्न होकर रह जाता है तो उसके जाने पर उसे भारी कष्ट होता है। इसके विपरीत अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला धन मिलने पर उसे फल मानते हुए उसमें लिप्त नहीं होता। सामान्य व्यक्ति एक के बाद दूसरी और दूसरी उपलब्धि के पीछे भागता है और अपने पूरे जीवन में शांति से नहीं बैठ पाता और न मनुष्य देह का सुख उठा पाता है जबकि ज्ञानी अपने लिये शांति से जीने के पल जुटा लेता है और फिर दृष्टा की तरह इस संसार में मानव देह होने का वह आनंद भी उठाता है।

अगर आप देखें तो सारे धर्म तमाम तरह के कर्मकांड प्रतिपादित करते हैं जिनका निर्वाह उसी धनोपलब्धि से किया जा सकता है जो हमने प्राप्त की है। सभी धर्मों के गुरू उसी धन पर अपनी नजरें गड़ाये हुए स्वर्ग में टिकिट रिजर्वेशन करने की गारंटी अपने भक्तो को देते हैं। उनका संदेश तो यही होता है कि ‘ला! माल ला! और ले जा स्वर्ग का टिकिट!

सभी आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि ‘देने वाला तो वही है’, ‘उसकी इच्छा के बिना यहां कुछ भी नहीं हो सकता’ और सभी के मन की इच्छा वही पूरी करता है’। ऐसा कहकर वह सांसरिक उपलब्धियोें को ही फल बताते हैं। कुल मिलाकर सभी धर्मों के कर्मकांड पैसा खर्च कर फल दिलाने के सिद्धांत पर आधारित हैं। जबकि भारतीय अध्यात्म बिना किसी सांसरिक फल के योग साधना और प्राणायम कर देह और मन के विकार दूर करने तथा ध्यान और प्रार्थना के आधार शांति का वह फल दिलाने वह ज्ञान है जो देह रहते और बाद में भी आदमी को संतोष प्रदान करता है। समस्या है गुरू की। श्रीगीता में भी गुरू का गुणगान है जिसका सबसे अधिक प्रचार वह कथित संत करते हैं जिन्होंने गीता के ज्ञान को समझा नहीं पर स्वयं गुरू बनने की लालसा में वह अपने भक्तों को वह अवश्य बताते हैं। अपने भक्तों का अध्यात्म का ज्ञान वह कभी नहीं देते। हां, अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषयों में उलझा कर अपनी भक्त का हृदय फिर उसी सांसरिक दलदल में फंसा देते हैं जहां वह कमल की तरह खिलने की इच्छा रहकर आता है। यह केवल भारतीय धर्मगुरूओं का ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में यही हाल है। धर्म के नाम शोषण केवल इसलिये हो रहा है क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान को सभी दबाये रखना चाहते है ताकि उसके मूल स्वरूप से लोग अवगत न हों।
श्रीगीता में अध्यात्म का जो ज्ञान है वह अनुपम है पर उसे कथित साधु संत अपने हिसाब से व्याख्या इस तरह करते हैं कि वह स्वयं ही अपने भक्तों में भगवान के रूप में स्थापित रहें। अब यह उनकी चालाकी भी हो सकती है या ऐसा भी कि वह स्वयं ही उस ज्ञान को धारण नहीं कर पाते और अपनी यही कमी छिपाने के लिये तमाम तरह के चुटकुले, कहानियां तथा सांसरिक विषयों की प्रधानता पर ही अधिक प्रवचन करते हैं। शेष अगले अंक में

4/12/08

जिस्म की भूख पर हैं सब खामोश-हिन्दी शायरी

किसी भूखे को रोटी खिलाने का
उनकी किताबों में कोई इलाज नहीं
ढेर सारे कसूरों की सजाएं है
कसूरवार की मजबूरी समझने का
कोई कहीं रिवाज नहीं
जमाने को सिखाते हैं तमाम तरीके
जन्नत में जाने के
अपनी हकीकतो से दूर
ख्वाबों में जाने के
सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया
फिर भी उसके नाम पर सुनाते हैं
चंद किताबें पढ़कर फैसले
इंसान की भूख को पढ़ने का
कहीं कोई मिजाज नहीं
सभी को मोहब्बत का पैगाम देते हैं
पर जिस्म की भूख पर है खामोश
क्योंकि उस पर किसी का बस नहीं
अरे, ऊपर वाले का नाम लेकर
दुनियो को उसके दस्तूर पर चलाने वालों
उससे पूछ का बताओ
भूखा अगर रोटी की चोरी करे
तो उसकी सजा क्यों होना चाहिए
अगर वह इंसान के पेट में भूख नहीं बनाता तो
मान लेते उसका होगा वजूद
इस धरती पर भी कहीं

2/27/08

आदमी की पहचान का प्रश्न-हिन्दी आलेख

प्रत्येक आदमी की जो पहचान है वह उसकी जाति, धर्मा, भाषा, क्षेत्र से है और हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते। यह पहचान आखिर छिपाई कैसे जा सकती है? कहीं किसी विशेष पहचान के लोगों की बहुतायत है तो वहाँ अल्पसंख्या वाले अपने को कमजोर अनुभव करते हैं और कभी उनको इसके लिए जलील भी होना पड़ता है। इस पर तमाम तरह के बुद्धिजीवी लोग अपने ख्याल रखते हैं-'ऐसा नहीं होना चाहिए' 'यह ग़लत है' और 'इस अन्याय को रोकना चाहिए'। इसके साथ ही बड़ी-बड़ी बहस होती हैं। मगरा नतीजा धाक के तीन पात। ऐसे विवाद कोई किसी एक देश में होते हैं यह बात नहीं बल्कि ऐसे संघर्षों से पूरी दुनिया का इतिहास भरा पडा है।


बहस करना विचार व्यक्त करना अलग बात है और समस्या के हल के लिए ईमानदारी से काम करना अलग बात है। हम हर पहचान के आदमी को सम्मान देने की बात तो करते हैं पर क्या वह पहचान किसी वास्तविक धरातल पर दिखाईं देती हैं? कभी इस पर विचार नहीं करते। आख़िर हम अपनी दूसरों की पहचान को देखते ही क्यों हैं? कोई अमुक, धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र का आदमी है-इस बात पर नज़र डालते ही क्यों हैं? हम तय कैसे करते हैं और कोई हमारे बारे में कैसे तय करता है? हम परंपरा से अलग होकर यह क्यों नहीं कहते कि यहाँ किसी को उसकी वर्त्तमान रूप में प्रचलित पहचान से नहीं देखा जाना चाहिए। जब तक अपनी और दूसरों की वर्तमान प्रचलित पहचान के साथ चलेंगे तब तक समाज में विवाद और फ़साद कम नहीं होंगे। विश्व के किसी इलाक़े में बहुसंख्यक पहचान वाले अपने समूहों से कम त्रस्त नहीं होते पर उनका गुस्सा जब सामूहिक रूपसे उतरता है को उसका सबसे अधिक शिकार पृथक पहचान वाले अल्प संख्या वाले लोगों के समूह बनते हैं-पर इसमें आम आदमी नहीं बल्कि उन लोगों के समूह प्रमुख जिम्मेदार होते हैं क्योंकि जब अपने सदस्यों पर नियंत्रण नहीं रख पाते तब वह उनका ध्यान बंटाने के लिए ऐसे विवाद खड़े करते हैं ताकि अपने नेतृत्व की कमी छिपाने के लिए लोगों का ध्यान कहीं ओर लगाया जाये।हम कहते हैं कि लोगों को उसकी प्रचलित पहचान से मत देखो तो सवाल है की जब हम सबके मन में है यानि हमारे खून में है तो उससे अलग कैसे हुआ जा सहकता है।

पहले हम पाश्चात्य विज्ञान की बात कर लें। उसके अनुसार हम जो देखते, सुनते अनुभव करते हैं वह हमारे रक्त मे स्थापित हो जाता है और जब अवसर आता है तब वह स्वत सामने आता है। किसी का चेहरा और शब्द वैसे के वैसे ही नहीं हम आत्मसात करते वरन वह हमारे शरीर में मौजूद रक्त के कणों में वह सब विलीन हो जाता है। इसका आशय यह है यह जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की पहचान हमारे खून में होती है। उसका कोई भौतिक स्वरूप हमारी देह में नहीं होता. जब कान से शब्द सुनते, आँखों से दृश्य देखते और स्पर्श से अनुभव करते हुए वह पहचान हमारी बुद्धि में आती है।

उसी तरह हमारा दर्शन भी कहता है की हमारी इंद्रियाँ रूप, शब्द, स्पर्श, गंध और रस से ग्रहण करती हैं और वही देह में विकार भी पैदा करतीं हैं। हम अनेक बार तमाम तरह की पहचान के लोगों पर अन्याय के मसले पर मुखर होते हुए उनकी संज्ञा अपने आधार पर तय कर देते हैं। क्या वह एक वास्तविकता है? नहीं! यह एक भ्रम है। कम से कम हमारा दर्शन तो यही कहता है। मनुष्य देह में वह विकार हैं जो उसे अन्याय और दूसरे पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित करते हैं। हमने कभी किसी के साथ अन्याय नहीं किया किसी और ने किया पर हम कभी नहीं करेंगे इसकी गारंटी कौन दे सकता है। गुण ही गुणों को बरतते हैं और जब हमारा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण ही नहीं है तो हम कैसे कह सकते हैं की 'उसने किया है और हमने किसी पर अन्याय नहीं किया"। कभी हम भी अपने अहंकार में आकर वह सब कर सकते हैं जो किसी और ने किया होता है।

हम बचपन से लेकर बड़े होते हैं-तब अपने माता-पिता और गुरुओं से ही समाज को विभाजित करने वाले शब्द सीखते हैं। कई तरीके की अच्छी और बुरी विचारधाराएँ उनके कथनों को सुनते हुए हमारी स्मृतियों में बस जातीं ऑरा हमा उनसे कभी अलग नहीं हो पाते और उनसे अलग होने के लिए हमें नया अध्ययन करने की आवश्यकता होती है पर उसका ना तो अवसर मिलता है और न आवश्यकता-इच्छा अनुभव होती है। समय अनुसार उस पर चलते जाते हैं। सिद्धांतों की बात बहुत करते हैं पर उससे अलग नहीं हो सकते इसलिए ऐसी बहसों में उलझ जाते हैं जो बाद में निरर्थक साबित होतीं हैं ।

कुल मिलाकर हमारे मन में समाज, व्यक्ति, भाषा, जाति, और भाषा को लेकर हमारे अंदर पूर्वाग्रह इस तरह स्थापित हो जाते हैं कि हम उनको अपनी पहचान समझने लगते हैं। जब तक इनसे मुक्त होने का मन नहीं बनाएँगे तब तक विभिन्न समाजों में द्वंद्व और विवाद बने रहेंगे यह अलग बात है कि कभी हम स्वयं इसका हिस्सा होंगे तो कभी बाहर बैठकर चर्चा करेंगे। (शेष फिर कभी)

2/2/08

आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं (सर्वशक्तिमान-३)

भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और आध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ:: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता। मैं स्वयं ही इस बात का उदाहरण देता हूँ। तमाम तरह के आध्यात्म ग्रंथ मैने बचपन में ही पढ़े और आज भी बड़ी रूचि के साथ पढ्ता हूँ। जब मेरी उम्र आठ साल थी तबा पडोस में रहने वाले एक पन्डित जी की बहू से मेरी माताजी ने पढ़ने के लिए तुलसीदास जी की श्री राम चरितमानस ली थी। मैं भी उसे पढ़ने लगा। मैने उसे धार्मिक भावना से नहीं कहानी की दृष्टि से पढ़ा। उसे कई बार पढ़ा। एक दिन पन्डित जी ने अपनी बहू से वह माँगी तो उसने उनको बताया की ''वह पडोस का लड्का है न वह उसे पढता है।''
उन्होने मुझे बुलाया और कहा'जब पढ़ लो तो वापस कर देना, पर इसको आदर से रखना। तुम इससे बहुत कुछ सीखोगे।''

फिर कभी उन्होने वह मुझसे वापस नहीं माँगी और जब हमने वह मकान खाली किया तब मैं उनको वापस कर आया, पर तब तक मेरे अंदर वह बीज अनुकुरित हो चुका था जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। फिर तो मैने वाल्मीकि रामायण को पढ़ना शुरू किया और अपने जेब खर्च से मैं वह सब धार्मिक किताबें ले आया जो भारतीय अध्यात्म का आधार स्तंभ हैं। आज जब मैं किसी आध्यात्म विषय पर लिखता या बोलता हूँ तो अधिकतर लोग विद्वान होने का अहसास पाल लेते हैं। अब यह मैं नहीं जानता की ऐसा है कि नहीं पर मुझे अपने तर्क भी गढने की आदत भी है और में भी कभी-कभी ऐसे सत्संगों में जाता हूँ पर कुछ नया सुनने से अधिक कोई विचार नहीं आता. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इतना ज्ञान तो मैं किताबों में पड़ चुका हूँ पर फिर भी वहाँ जाना मुझे अच्छा लगता है। इसलिए जब आज कल के तथाकथित बाबा लोग भारत के प्राचीनतम परंपरा के महिमा की बात करते हैं तो ऐसा लगता है की कोई ग्राहकों का समूह उनके सामने खड़ा है जिसे वह भारतीय आध्यात्म- जिसका कोई पेटेंट नहीं है- उसे बेच रहे हैं। वह हमेशा ही शिष्य को सिखाते रहते हैं और वह सीखता नहीं है और हर ख़ास मौके पर उनके दर्शन करने चला जाता है और वहाँ हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट अपने धर्म का पालन करता है जिसका भारत की प्राचीन गुरु-परंपरा से कोई लेना-देना हो मुझे नहीं लगता। एक बात अपने निष्कर्ष के तौर पर कहना चाहता हूँ कि आज के तथाकथित गुरुओं को एकलव्य जैसा शिष्य चाहिऐ जो उनको आज के युग में अपना अंगूठा काटकर न भेंट करे-क्योंकि उससे उनकी आश्रम फाईव स्टार आश्रमों थोडे ही बन पायेगा- बल्कि दूसरों को अंगूठा दिखाकर जुटाए पैसे से उनको भेंट दे पर अर्जुन जैसा शिष्य नहीं चाहिए जो दुष्कर्म करने वालों का समर्थन करने पर उनका प्रतिवाद करे। इन संतो और भक्तों को पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं है भले ही कितना भी बखान कर लें. (क्रमश:)

1/19/08

अंहकार छोड़ना नहीं उसे सही दिशा देना है

मन से मोह, बुद्धि से विचारों में विकार और अंहकार से अज्ञान उत्पन्न होता है पर मन और बुद्धि से काम करने की सीख सबको दी जाती है अहंकार के साथ क्यों नही? यह तीन प्रुकृतियाँ हैं और जब तक देह हैं उसमें इनको रहना ही है और त्यागना है तो तीनों से विरक्त होना है। श्रीमद भागवत गीता में सांख्य योग की चर्चा है पर उसे खारिज भी किया है। श्री मदभागवत गीता का पूरा सन्देश जीवन को सदैव सक्रिय रखने का प्रेरक है न कि सन्यास के लिए।
हमारे देश की हिन्दी भाषा के स्वर्ण काल को भक्ति काल भी कहा गया है और इसमें संत कबीर दास और रहीम का दर्शन भी लगभग श्रीमद भागवत गीता के संदेशों जैसा ही पर उसमे भक्ति को अधिक महत्व दिया गया है। उस समय के इन ग्यानी महानुभावों ने अंधविश्वास और रूढ़वादिता का जमकर विरोध किया क्योंकि उनकी उपस्थित में कुछ लोग इस समाज को गलत दिशा में ले जा रहे थे। समाज को गलत दिशा देने वालों ने आदमी के अन्दर मौजूद अहंकार के तत्व का उपयोग किया। देश में गरीब और अमीर के, उच्च वर्ग और निम्न वर्ग और तमाम तरह के जातीय विभाजन में अपनी पैठ बनाने के लिए कुछ लोगों ने संतों को चोला धारण किया और पहुंच गए लगों के बीच यह नारा लेकर' अहंकार छोड़ दो"। सबको लगा कि दूसरे के लिए कह रहे हैं इसलिए ताली बजाने लगे क्योंकि मन और बुद्धि का अस्तित्व आदमी को अपने अन्दर दिखता है जबकि अहंकार इन दोनों को बाहर ले जाने वाली पृकृति है इसलिए वह नहीं दिखती।
जिन्होंने ऐसी ढोंगी संतों सो सुना उनको लगा कि इनके मापदंड से तो हम ठीक हैं हम में तो कोई अंहकार नहीं है दूसरे ही खराब हैं। मेरा मानना है कि मन किसी विषय को दृष्टिपात करता है और बुद्धि उस पर चिन्त्तन, मनन और अनुसंधान करती है और अहंकार उसके निष्कर्षों को बाहर ले जाता है। हमें अपने इसी अहंकार की साथ जीना है तो उसे सही दिशा में ले जाना चाहिए।
अगर किसी के मन में आता है कि'मेरे पास अधिक धन है" यह अंहकार से उपजा अज्ञान हैं क्योंकि यहाँ किसी का कुछ नहीं है। अब ऐसा सोचने वाले आदमी अगर अपनी बुद्धि को कष्ट नहीं देगा तो यही अहंकार से उपजा अज्ञान अन्दर रहकर उसे त्रास देगा क्योंकि उस धन से बहुत कुछ खरीदा जा सकता पर सब कुछ नहीं-मन का सुख तो कतई नहीं खरीदा जा सकता। अत: अन्दर बैठा अहंकार से उपजा अज्ञान उसे तकलीफ देगा। बेहतर होगा वह अपने आसपास ऐसे लोगों में उसे दान करे जिनको उनकी जरूरत हो। इससे भी भी आगे में कहूँगा के कभी आपको लगे कि मेरे पास पांच सौ रूपये के नोटों के बीच दस रूपये हैं और..........दस रूपये का क्या........ इस अहंकार से उत्पन्न अज्ञान के विसर्जन के लिए किसी दुकान पर जाओ एक डबल रोटी खरीदो और जाकर कहीं मजदूर बस्ती में किसी बच्चे को दे दो। किसी भिखारी को दे दो। कहते हैं कि कई लोगों को भीख मांगने की आदत होती है और उनको भीख मत देखो पर तुम इसे मत देखो। क्योंकि वास्तव में वही भिखारी लोग हैं जिनके पास अंहकार नहीं है और तुम अपना हिस्सा उसे दे दो। मेरा मानना है कि जिस तरह किसी पागल आदमी में बुद्धि का तत्व काम होता है वैसे ही भिखारी में अहंकार के तत्व का अभाव होता है. आप कहेंगे यह भीख देकर तो अहंकार छोड़ने वाली बात है। नहीं जब तुम ऐसा करोगे तब तुम्हारे पास फिर अंहकार के रूप में फिर और कोई बात आयेगी। अंहकार के रूप में आ रहे विचार तो उसकी धाराएं है जिनका मूल उदगम स्थल तो हमारी देह ही है। वह इससे अलग नहीं हो सकता। यह अहंकार से जो धारा है उसे बहने दो एक ऐसी अपनी बुद्धि से ज्ञान की दिशा की तरफ ले जाओ जो किसी को लाभ पहुँचाती है। तुम उसकी दिशा तय कर सकते हो पर उसका उद्गम स्थल नहीं नष्ट नहीं कर सकते।

मैं हिन्दी भाषा का लेखक हूँ और मैंने अंतर्जाल पर ब्लोग बनाया है। यह अंहकार से उपजा विचार है और क्या मैं इस रोक सकता था? अगर रोकता तो क्या मैं लिख सकता था। मैं उसे दिशा देने की कोशिश करता हूँ। अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो लिखूंगा कैसे है। मान लीजिये आज मैं लिखना बंद कर दूं तो भी यह अंहकार नहीं जायेगा और अगर मैं उसे दिशा नहीं दूंगा तो वह फिर अपना काम स्वयं करेगा। कैसे? जहाँ कहीं भी बात होगी में अपने अंतरजाल पर लिखने की चर्चा करूंगा? या कई बार अपने ब्लोग खोलकर देखूंगा। अब तो बहुत लिख चुका अब इससे अधिक क्या लिखना-यह भाव आ जायेगा। यकीन करिये में अपने फुरसत के बेहतर क्षण किसी मूर्खतापूर्ण काम में नष्ट करूंगा। मतलब तब अंहकार से उपजा अज्ञान मेरे समय को कई ऐसी जगह नष्ट करेगा जो मुझे मानसिक सुख नहीं पहुंचाते. ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं है लिख कर कुछ नया सीखने का विचार क्या बुरा है। मैं लेखक हूँ पर इतनी अधिक सक्रियता कभी नहीं रही जितनी अब है पर कुछ नया सीखने को मिल रहा है। वाद और नारों पर समाज के चलने, उसके जज्बातों के व्यापार में फंसने और धर्म के नाम पर पाखण्ड को मैंने बहुत करीब से देखा है और मुझे और निराशा तब होती है जब शिक्षित लोग भी हथियार डालकर अपने से काम पढे-लिखे लोगों के अंधविश्वासों के सामने सिर झुकाते हैं तब लगता है कि उनको अहंकार पर दृष्टिपात करते हुए उसे सही दिशा में काम करना चाहिए क्योंकि आप उसे अपने से अलग कर नहीं सकते। (क्रमश:)

1/10/08

समाज को साथ लिए बिना भारतीय धनपतियों का सम्मान विदेश में नहीं हो सकता

विश्व में भारतीय लोगों की आर्थिक शक्ति बढ़ रही है पर उनकी प्रतिष्ठा उस तरह नहीं बढ़ रही जैसी की पश्चिमी देशों के संपन्न लोगों की है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संगठनों पर उनका वैसा वर्चस्व नहीं है क्योंकि इसके लिए जिस प्रकार की शक्ति चाहिए वह उसे अर्जित नहीं कर पाए। वह अपने समाज पर नियंत्रण करने से प्राप्त होती है और ऐसा तभी संभव है जब आप अपनी धन-संपदा से कुछ हिस्सा उस पर बिना आर्थिक लाभ के चुकाएँ। अपने समाज के कुछ लोगों के साथ उसके संगठनों को भी शक्तिशाली बनाकर उन पर नियंत्रण करें।
जिन भारतीयों के विदेश में संपन्न होने की इस देश में कुछ लोग अक्सर चर्चा करते रहे हैं उन्होने वहाँ किसी नये स्त्रोतों का निर्माण नहीं किया है बल्कि वहीं मौजूद स्त्रोतों का इस्तेमाल कर आर्थिक शिखर पर पहुँचे हैं। कुछ ऐसे भी संपन्न लोग हैं जो देश में ही हैं पर उन्होने विदेश में भी आर्थिक शक्ति अर्जित की है। टीवी चैनलों और अन्य प्रचार माध्यमों मे उनकी चर्चा होती है पर सामान्य लोगों में उनकी कोई चर्चा नहीं होती। वजह! समाज के लिए वह ऐसे धनपति हैं जिनका समाज को उनके संपन्न ढाँचे से कोई आर्थिक और सामाजिक लाभ नहीं है क्योंकि उन्होने अपने समाज को विकसित करने के लिए कुछ करना तो दूर उसे सतत संचालन में भी कोई भूमिका नहीं दिखाई देती।
भारतीय आध्यात्म को समृद्ध करने वाले सभी महापुरुषों ने धन और वस्तुओं के दान की बहुत सरल व्याख्या की है। जिन महापुरुषों ने दान के महत्व को प्रतिपादित किया है उनके मन में यही बात रही है कि समाज में धनी लोग ग़रीबो और असहायों को सहायता प्रदान करें ताकि उसका सुचारू संचालन होता र्हे। यह अलग बात है कि कुछ लोगों ने अगले जन्म में लाभ मिलने के अंधविशवासों को जोड़कर लोगों को भ्रमित किया और लोग अब यह दान कर्मकांडों पर अपना धन कुपात्र लोगों को देकर नरक जाने से बचना चाहते हैं। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान बघारने वाले भी दान को इस तरह प्रचारित करते हैं कि जैसे उनको दिया गया दान ही असली पुण्य है जबकि श्रीगीता में सुपात्र को दिया गया दान भी फलीभूत बताया गया है और उसमें जन्म आदि की कोई शर्त नहीं है । आज के सन्दर्भ में इस दान को मैं निष्प्रयोजन विनियोजन के रूप में कहता हूँ। भारतीय पूंजीपति अगर कुछ क्षेत्रों में निष्प्रयोजन विनियोजन करते तो उनका नाम होता। कैसे?
१.वह ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ्ने के लिए आर्थिक सहायता दें जिनसे उसका नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर करने की संभावना हो।
२।वह ऐसे संगठन और संस्थाओं को योगदान दें जो उनकी विश्व स्तर पर सामाजिक साख बनाने में मदद कर सकें।
३.वह अंतर्जाल पर अपने सर्च इंजन और वेब साईटों का निर्माण करें और उनको इतना व्यापक बनाने के लिए धन का विनिवेश करें ताकि उसमें उनेक समाज की भागीदारी बढ़े। इसके साथ अंतर्जाल पर सक्रिय पत्रिकाओं को मदद दें ताकि इसमें उनके योगदान की चर्चा यहाँ और बाहर दोनों जगह हो।


भारतीय धनपति इस बात से संतुष्ट हैं की उनके पास फिल्मी अभिनेताओं, सामाजिक और धार्मिक संगठनों के लोगों का जमाबडा है, टीवी चैनलों और अख़बारों में उनका प्रचार हो रहा है और यही सामाजिक प्रतिष्ठा का परिचायक तो ग़लतफहमी में हैं। समाज में इज़्ज़त तभी है जब कोई ग़रीब आदमी जिसे आपने धन नहीं दिया वह भी उनको याद करे। इस मामले मने कुछ ऐसे धनाढ्य लोगों के नाम लिए जा सकते हूँ जिन्हें सामान्य लोग आज भी सम्मान से देखते हैं। माननीय जे. आर. डी टाटा, घनश्याम दास बिरला और कैसेट किंग गुलशन कमार को आज भी लोग सम्मान से याद करते हैं टाटा ने जहाँ अस्पताल बनवाए और खेलों में भी अपना योगदान दिया, स्व. घनश्यादाम दास बिरला ने कई जगह धार्मिक तीर्थों पर धमर्शालाएँ और मंदिर बनवाए स्व. गुलशन कुमार ने कटरा में वैष्णोदेवी पर लंगर चलवाए। ऐसे कई लोग हैं जो वैष्णो देवी गये पर उनके लंगर में कुछ भी नहीं खाया फिर भी आज उनको याद करते हैं। हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बात से सहमत न हों पर यह एक वास्तविकता है कि साहूकार वही है जो समाज के लिए किसी न किसी तरह के लिए व्यय करता है।

हमारे आध्यात्म में दान को जो महत्व दिया गया है उसकी कुछ लोगों ने भिखारियों और कर्मकांडों तक ही सीमित रख कर जो व्याखाया की है उससे समाज को तो कोई फायदा नहीं हुआ उल्टे समाज और धर्म बदनाम हुआ सो अलग.
आप इन विदेशियों पर टिप्पणी तो कर सकते हैं पर बताईये किसी नयी आधुनिक चीज़ के निर्माण पर भारत के इन धनपतियों के नाम कोई सृजन किया हुआ कोई कार्य कहीं लिखा हुआ है? आज अंतर्जाल पर जितनी भी सुविधाएँ हैं वह अंग्रेजी वेब साईटों की वजह से हैं। जिस इंडिक या एनी टूल से हम लोग हिन्दी लिख रहे हैं उसको लाने वाली तो एक विदेशी वेब साईट गूगल ही है-अगर देश में कोई टूल बना होगा तो वह भी किसी उत्साही व्यक्ति ने अपना श्रम और समय खर्च कर बनाया होगा। ब्लॉग भी भी विदेशी वेब साईटों के द्वारा दिए गये हैं और अगर हम बात करते हैं कि हिन्दी के विकास की तो इसमें देश के धनपतियों का योगदान आज भी नगण्य है। वह हिन्दी फिल्मों में विनिवेश करते हुए अपने आसपास अभिनेता और अभिनेत्रियों का जमघट लगा सकते हैं जिनको परदे के बाहर हिन्दी बोलना भी नहीं आता हैं पर किसी ने भी अंतर्जाल पर भारतीय भाषाओं के लेखकों को लिखने के लिए क्या कोई सहायता दी हैं? आज जो लेखक इस पर लिख रहे हैं वह इंटरनेट पर अपने कनेक्शन पर पैसा खर्च कर रहे हैं और क्या कोई ऐसी टेलीफ़ोन कंपनी आगे नहीं आई जो इसके लिए उन्हें सुविधा दे। लिखना कोई आसान काम नहीं है पर जो अपने शौक की वजह से लिख रहे हैं तो एक उपभोक्ता की तरह ही न! अंतरजाल पर जो पत्रिकाएँ निकल रहीं है उसके संपादक निष्काम भाव से अकेले जूझ रहे हैं पर क्या किसी धनपति के दिमाग़ में यह आया की इन लोगों को सहायता दें। हाँ, बड़े अख़बार अपने तामझाम लेकर यहाँ आए हैं पर अंतर्जाल पर जो स्वतन्त्र रूप से लिख रहे हैं उसको देखकर मुझे नहीं लगता की वह किसी अख़बार से काम है, कई बार तो यहाँ ऐसे विचार पढ़ने को मिल जाते हैं लो अखबारों में नहीं मिलते।
आप क्रिकेट में ही देख लें। भारत की आर्थिक शक्ति पर ही पूरा विश्व का क्रिकेट चल रहा है और आईसीसीआआई के अंपायर पैनल में भारत के अंपायर ही नहीं हैं। कहते हैं की भारत के अंपायर स्तरीय नहीं हैं? देश के चयनकर्ता कहते हैं की देश में प्रतिभा नहीं है? क्या ऐसी बातों से देश का सम्मान विश्व में बढ़ सकता है: अगर भारत का आम आदमी पूरे विश्व के लिए एक आर्थिक दोहन किए जाने वाला उपभोक्ता है तो यहाँ के जो ख़ास लोग हैं-जिन पर देश के प्रचार माध्यम गर्व करते हुए थकते नहीं है- वह भी वहाँ कोई साहूकार नहीं माने जाते-उनके हैसियत वहाँ एक कुशल प्रबंधक से अधिक नहीं है। यहाँ उनके विज्ञापनों पर चलने वाले टीवी चैनल और अख़बार उनका कितना भी गुणगान कर लें पर समाज को साथ लेकर न चलने की वजह से विश्व की मीडिया में उन्हें कोई सम्मान नहीं है। भारत के कितने भी धनपति बाहर जाकर भले ही संपन्न हो जाये पर सम्मानीय हों पर पर वे अमेरिका के फ़ोर्ड और बिल गैट्स नहीं हो क्योंकि उनको अपने समाज का वैसा समर्थन प्राप्त नहीं है।

1/9/08

निष्काम और सहज भाव से लिखते जाओ, इंकलाब आते रहेंगे

लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर बिना लिखे भी कौनसा आ जाता है। इन्कलाब लाने वाले नारे तो ख़ूब लगाते हैं पर उसका स्वरूप क्या है और उसको लाने के लिए क्या योजना है कोई नहीं बता सकता। बस नारे लगते हैं 'इन्कलाब लाओ', 'इन्कलाब लाना है' और इन्कलाब लाकर रहेंगे। गरीबों,शोषितों और मज़दूरों के संरक्षकों के लिए यह एक पसंदीदा नारा रहा है। जहाँ तक ब्लोग से इंकलाब आने का सवाल है तो इन पर लोग लिख रहे हैं यही क्या इंकलाब है कि उनके पास एक स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के लिए एक साधन है. विदेशों में अगर कोई चीज बनाई जाती है तो उसका भारतीय अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं और ब्लोग का भी यही होने वाला है।

इन्कलाब का सीधा अर्थ लें तो उसे कह सकते हैं कि बदलाव, यह बदलाव दो प्रकार का होता है एक तो प्रकृति स्वाभाविक रुप से मानवीय स्वभाव के साथ-साथ समाज की आर्थिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रवृतियों में बदलाव लाती है-और उसकी एक सतत प्रक्रिया है जो अनवरत चलती है पर हमें पता भी नहीं लगती है। दूसरा लोग स्वयं अपने प्रयासों से परिवर्तन लाते हैं और इसके लिए कहीं सामूहिक आंदोलन तो कहीं इसके लिए चरणबद्ध अभियान चलाये जाते हैं। इनमें इन्कलाब या क्रान्ति शब्द सामूहिक राजनीतिक आंदोलन से ही जोडा जाता है और इनमें सोवियत संघ की लाल क्रान्ति और चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति सबसे ज्यादा मशहूर है और हमारे देश के कुछ लोग लंबे समय तक इस देश में ऐसा ही करने का सपना संजोये रहे भारतीय समाज की स्थितियाँ ऎसी रहीं कि उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। अब सोवियत संघ और चीन भी खुलेपन के तरफ बढ़ गये हैं। वहाँ इंकलाब लाया गया और अब वह उससे पीछे हट रहे हैं क्योंकि जोर जबरदस्ती लाया गया इंकलाब कभी भी सफल नहें होता और प्राकृति स्वयं परिवर्तन लाती हैं इसलिए अगर कहा जाता है कि ब्लोग इंकलाब नहीं ला सकते तो उसमें एक निराशाजनक अभिव्यक्ति लगती है.
लिखने से बदलाव नहीं आते यह एक सत्य बात है पर बिना लिखे भी बदलाव नहीं आते यह भी उतना ही सत्य है। यह जो लोग इस समय निज पत्रक (ब्लोग) लिखे रहे हैं उनकी विषय वस्तू से कोई बदलाव नही आएगा पर उनके लिखने की जो प्रक्रिया है और उसमें लोग जैसे-जैसे जुड़ते जायेंगे लोगों की प्रवृति में भी बदलाव आ सकता है इस संभावना को नकारना गलत होगा।हमारे देश में लिखना लोग पेशे की तरह बहुत कम लोग अपनाते हैं यह अलग विचारणीय बात है पर जो लोग लिखते हैं वह अपने भावों में सामजिक संदर्भों को व्यक्त जरूर करते हैं। निज पत्रक (ब्लोग)लेखकों की बढती संख्या इस बात का प्रमाण है को लोग अपनी अभिव्यक्ति के लिए इसे एक साधन के रुप में देख रहे हैं ।
महर्षि बाल्मीकि और वेदव्यास ने जब अपनी रचनायें प्रस्तुत की होंगीं उस समय समाज में किसी बदलाव के लिए प्रस्तुत नहीं की होंगीं पर उनकी रचनाओं का जो समाज पर प्रभाव है उसे हम आज भी देख सकते हैं , उन लोगों ने अपने कार्य और दायित्व को निष्काम और सहज भाव से निभाया तो उसका प्रभाव यह हुआ कि भगवान् श्री राम और श्री कृष्ण आज भी हमारे ह्रदय के नायक हैं। हिंदी भाषा में भक्ति काल को स्वर्णकाल भी कहा जाता है क्योंकि उस समय कबीर, तुलसी,सूरदास, मीरा, रहीम और रसखान तथा अन्य कवियों ने जो रचनाएं इस देश को दीं वह केवल भक्ति से संबंधित नहीं है बल्कि जीवन के सत्यों को उदघाटित भी करती हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। आज जो आध्यात्म के मनीषी हैं वह अपने प्रवचनों में उनको सुनाकर लोगों पर प्रभाव डालते हैं। कुछ लोग उस काल को भक्ति आंदोलन भी कहते है । उस समय कोई इन मनीषियों ने एक झंडे तले इस आंदोलन को नहीं चलाया था पर उनकी रचनाओं ने ही उस काल को एक आंदोलन के रुप में स्थापित किया। इनके लिखने या कहने का उद्देश्य समाज में बदलाव लाना नहीं था पर वह आया और आज समाज में इनकी रचनाओं की चर्चा होती है।
भारत के इन मनीषियों जैसा कोई बन ही नहीं सकता, कम से कम पैसा लेकर लिखने वाला तो कतई नहीं। हाँ, इनकी रचनाओं को दुहराकर या उनके क्रम में अपनी रचना कर इस समाज में निरंतर बदलाव की प्रक्रिया में शामिल हो सकता है, वैसे भी भारतीय समाज बहुत उदार माना जाता है जो परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए चलता है बशर्ते वह उसके अनुरूप हौं और उस पर थौपे न जाएँ । निज पत्रक (ब्लोग) वैसे ही हैं जैसे समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ ,टीवी चैनल और अन्य मध्यम । इसके लेखक भी वैसे ही हैं-इनके लिए कोई अलग से संज्ञा ढूँढने की आवश्यकता नहीं है ।कहने वाले तो यह भी कहते हैं संचार माध्यम भी कोई इन्कलाब या बदलाव नहीं ला सकते, और यकीनन निज पत्रक (ब्लोग) लेखकों पर भी यह विचार लागू होता है।
समाज में बदलाव की प्रक्रिया चलती रहती है और लिखना भी। किसी के लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर इसीलिये लिखना बंद भी तो नहीं किया जा सकता-आख़िर आत्म अभिव्यक्ति के लिए इससे बेहतर कौनसा साधन है। निष्काम और सहज भाव से लिखते रहो तो इन्कलाब या बदलाव भी आयेगा नहीं आया तो इस बात का अफ़सोस तो नहीं होगा कि हमने कोई प्रयास नहीं किया। अगर हमारे लिखे बग़ैर बदलाव आया तो हमें भी यह अफ़सोस होगा कि हमने लिखा क्यों नहीं । समाज में बदलाव के प्रक्रिया के साथ लिखना भी जारी रहना चाहिए। हमारे लिखने से समाज में इन्कलाब या बदलाव आये या नहीं हमारे अन्दर तो आ ही सकता है।

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