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2/8/14

बेईमानी का हिस्सा-हिन्दी व्यंग्य कविता(baimani ka hissa-hindi vyangya kavita)



अपने गुनाहों पर नज़र किसकी जाती है,
दूसरे की गलती ही गुनाह हो जाती है।
कहें दीपक बापू इंसान की जुबान बाहर ही बोलती है,
अंदर बैठी नीयत कभी अपना हिसाब नहीं तोलती है,
सभी दावा करते अपनी ईमानदारी का अपने बयान में,
बेईमान छिपी है तलवार की तरह सभी की म्यान में,
जब तक कोई पकड़ा न जाये साहुकार की कहलाता है,
समय का पंजा गढ़ जाये तो मजबूरी हर कोई बताता है,
सच्चाई यह है कि  गरीबी किसी को नहीं भाती है,
बदकिस्मती मानते लोग जिनके हिस्से बेईमानी नहीं आती है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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2/2/14

सिंह से अधिक प्रेम करने वाले लोग नन्हीं बकरी को मिलते हैं-संत कवियित्री सहजोबाई के दर्शन पर आधारित चिंत्तन(singh se adhik prem karne wale log bakri ko milte hain-sant kaviyitri sahajobai ke darshan par aadharit chinttan)




      जीवन में भौतिक साधनों का होना आवश्यक है पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उनका संचय इतना किया जाये कि संभालना कठिन हो। अनेक लोग यह सपना देखते हैं कि उनको कोई राजपद मिल जाये या इतनी संपदा का संचय उनके पास हो ज कि समाज पर उनका स्वाभाविक रूप से शासन चले-वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बने। यह राजसी प्रवृत्ति मनुष्य में स्वाभाविक रूप से रहती है कि वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से ही संतुष्ट नहीं रहता वरन् वह दूसरों से अपनी पूजा भी करवाना चाहता है। यह तो एक मान्य तथ्य है कि सामूहिक रूप से लोग उसका ही सम्मान करते हैं जो किसी राजपद पर प्रतिष्ठित हो जिससे दंड आदि का भय हो  या इतना धनी हो कि उससे मदद की आशा की जा सके।  इस वजह से अनेक लोग खास इंसान  बनने की जद्दोजेहद में लगे रहते हैं। कुछ लोगों को भाग्य साथ भी देता है और वह अपना ऊंचा लक्ष्य प्राप्त भी कर लेते हैं। यह अलग बात है कि बाद में अपने वैभव की रक्षा करने में ही उनका जीवन नष्ट हो जाता है। छिन जाने का भय उनके रातों की नींद हराम किये रहता है। इसके विपरीत सामान्य मनुष्य भले ही अपनी हालातों से संघर्ष करता है पर उसके मन में कोई भय नहीं रहता।
संत कवियित्री सहजोबाई कहती हैं कि
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साहन कूं तो भय घना, ‘सहजो’ निर्भय रंक।
कुंजर को पग बेड़ियां, चींटी फिरै निशंक।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-धनवान हमेशा भयभीत रहता है जबकि गरीब को अपनी किसी वस्तु के खोने की आशंका नहीं रहती। हाथी मूल्यवान होता है इसलिये उसके पांव में बेड़िया रहती है जबकि चींटी स्वतंत्र विचरण करती है।
अभिमानी नाहर बड़ो, भरमत फिरत उजाड़।
‘सहजो’ नन्हीं बकरी, प्यार करै संसार।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जंगल का राजा होकर भी सिंह अकेला ही जंगल में फिरता है उसके पास भय के कारण उसक पास कोई नहीं जाता जबकि छोटी बकरी जहां भी हो उसे प्यार करने वाले बहुत होते हैं।
      जीवन की यही सच्चाई है कि सांसरिक विषयों के संचय में जितनी प्रवीणता होगी उतना भी भौतिक भंडार भी भरेगा पर उसके साथ ही भय की भावना भी बलवती होगी। इतना ही नहीं जितना अपने शक्तिशाली, प्रतिभाशाली और सुंदर होने पर अहंकार करेंगे उतना ही अपने लिये संकट भी बुलायेंगे।  शक्तिशाली के पास तो कोई दूसरा मनुष्य भय के कारण पास नहीं आता तो प्रतिभाशाली व्यक्ति से हर कोई काम लेना चाहता है इस बात की चिंता किये बिना कि उसे कितनी परेशानी होती है।  उसी तरह सुंदर स्त्री का अहंकार देखकर हर कोई उसे अपने नाम की बेड़ी डालना चाहता है। आजकल स्त्रियों के साथ बढ़ते अपराध मनुष्य में व्याप्त स्वाभाविक उस हिंसक प्रवृत्ति का ही परिचायक है जो प्रणय निवेदन में नाकाम होने या नारी सुलभ चंचलता के कारण अपमानित होने  पर बदला लेने के लिये प्रेरित करती है।
      कहने का अभिप्राय यही है कि अति सर्वदा वर्जयते।  धन, पद, प्रतिष्ठा की अधिकता भी भय पैदा करने वाली होती है जो कि स्वाभाविक है। इसलिये अपनी स्थिति से संतोष करना ही एक श्रेष्ठ कला है।  इतना ही नहीं अगर अन्य लोगों से धन, पद और प्रतिष्ठा अधिक भी हो तो उसे दूसरों के सामने बघार कर उसमें कुंठा का भाव नहीं लाना चाहिए।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/26/14

अराजकता से बचने के लिये ही करते हैं जनगणमन मंत्र का जाप-26 जनवरी गणतंत्र(arakata se bachne ke liye hi karte hain janagan matra ka jap-special hindi article or lekh on 26 january and republic day)



      26 जनवरी गणतंत्र का दिन बीत गया। हर बार की तरह इस बार भी शासकीय, अशासकीय तथा सामाजिक स्तर पर अनेक कार्यक्रम हुए। अध्यात्मिक चिंत्तकों के लिये 26 जनवरी गणतंत्र दिवस तथा 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस राष्ट्रीय महत्व के तो होते हैं पर सामाजिक रूप से वह इनको अधिक प्रभावी नहीं अनुभव कर पाते। भौतिक रूप से 65 वर्ष में बहुत कुछ बदला है पर अध्यात्मिक रूप से जो पतन हुआ है उसका आंकलन करने का प्रयास कोई नहीं करता। मुख्य बात यह है कि समस्याओं को लेकर सार्वजनिक चिंत्ताओं को पहले निराशा फिर आक्रोश में बदलने वाले लोग जब जनगण के मंत्र के सहारे पद पर पहुंच जाते हैं तब वह कुछ कर नहीं पाते।  चिंत्ताओं का निराकरण चिंत्तन से होता है पर पद पर बैठने के बाद आसपास सुविधाओं का जो संग्रह होता है उससे अच्छे खासे आदमी की बुद्धि भ्रष्ट होने के बाद किसी से वैचारिक प्रक्रिया में शामिल होने की अपेक्षा करना एक मजाक लगता है।
      जब हृदय में राष्ट्रवादी विचारों का क्रम आता है तब लगता है कि जब तक इस देश में अंग्रेजी शिक्षा, राज्यप्रणाली तथा बौद्धिक प्रकृत्ति यहां स्थापित रहेगी तब तक हमारे  देश का उद्धार नहीं हो सकता। जब चिंत्तन अध्यात्मिक दौर में आता है तब यह देखकर संतोष होता है कि अंग्रेजी एक स्वचालित राज्य प्रबंध प्रणाली छोड़ गये जिसकी वजह से देश ऐसे ही चलता रहेगा। जणगणमन के मंत्र से राजकीय शिखर पदों पर पहुंचे लोगों को राज्य प्रबंध प्रणाली के सुचारू संचालन में अधिक बुद्धि नहीं लगानी पड़ती।  अगर यह न होती तो शायद प्रजा के लिये अधिक कठिनाई होती।  जनगण के तांत्रिकों को केवल इस प्रबंध प्रणाली को देखना भर है उसमें बदलाव करने का नारा भले ही वह देते हों पर करते नहीं। अच्छा है! कहीं अगर उसमें बदलाव करते हुए कोई ऊंच नीच हो जाये तो फिर जो अराजकता फैलेगी उसे रोकना कठिन है। इस राज्य प्रणाली के दोषों पर जनगण की चिंत्ताओं को अपना स्वर देकर अनेक लोग महान हो गये पर वह वैसे ही बनी रही। जो आया उसी राह चला।  पक्ष विपक्ष एक दूसरे पर व्यवस्था में दोष पैदा करने का आरोप लगाते रहे पर खैरियत है कि प्रबंध प्रणाली से छेड़छाड़ नहीं हुई। अगर एक करता तो दूसरा अपने ढंग से दूसरी तरह  करता। तब पूरी प्रबंध व्यवस्था अस्पष्ट तथा विवादपूर्ण हो जाती।  नहीं बदली तो वह यथावत है। देश में राज्य व्यवस्था है, यही आभास बहुत है।
      यहां गरीब, मजदूर तथा बेबस लोगों का एक बहुत बड़ा निम्न वर्गीय समुदाय है। जिसके उद्धार के लिये 65 साल से प्रयास हुए पर कुछ होता दिख नहीं रहा। अनेक बुद्धिमान, उत्साही तथा उदार लोगों ने इस निचले तबके के लिये बीड़ा उठाया।  अनेक राजकीय पदों पर पहुंचे तो कुछ ने अपनी अदाकारी से सम्मान पाये।  इस वर्ग का उद्धार होना भी नहीं था। इस वर्ग के लोगों में से कुछ लोगों उच्च वर्ग में आये पर बढ़ती जनसंख्या ने उनके उद्धार को फीका कर दिया।  निम्न वर्ग परेशान है पर संतुष्ट है कि राज्य व्यवस्था है वरना उसकी जिंदगी अधिक कठिन हो जाती।  कुछ उत्साही मानते हैं कि देश में अराजकता पैदा भी हो तो निम्न वर्ग को फर्क क्या पड़ता है? यह फिक्र तो उच्च वर्ग को ही करना चाहिये। इस तर्क की आलोचना को व्यापक रूप देने के लिये मूर्खतापूर्ण, कुतर्क या बकवाद शब्द जोड़ने  में डर लगता है क्योंकि इस देश में कुछ संगठन अराजकता में एक तरह की  क्रांति का संभावना देखते हैं। 
      इन संगठनों के शीर्ष पदों पर जिनमें उच्च वर्गों के वह लोग शामिल है जिनके पास सारी भौतिक सुविधायें हैं पर कहीं राजसी पद या वहां बैठे शिखर पुरुष की निकटता प्राप्त करने का भावनाऐं हैं।  संभवत इन संगठनों में वह लोग हैं जो आधुनिक राजपुरुषों के निवास स्थान, संपत्ति, उनको मिलने वाले सम्मान, प्रचार माध्यमों में उनके बयानों को सुर्खियों मिलने तथा साथ चलने वाले सुरक्षा कर्मियों को देखकर वैसा ही स्थान पाने का मोह पाल लेते हैं।  स्थापित राजनीतिक संगठनों में अपने लिये ऐसी संभावना न देखकर वह जणगणमन मंत्र का जाप कर प्रजा में व्याप्त निराशा को आक्रोश और फिर उसे अपने लिये समर्थन में बदलकर  उच्च पद पाने का प्रयास करते हैं।  उन्हें लगता है कि वह अराजकता का दाव खेलें पर प्रजा साथ नहीं देती तो वह कौम को मुर्दा होने की बात कहते हैं।
      जनगणमन का मंत्र हम क्यों जाप रहे हैं? इस प्रश्न का जवाब ही अराजकता के समर्थक लोगों को समझना चाहिये। अमीर हो या गरीब सभी को जान प्यारी है। राजा को भगवान के बाद दर्जा इसलिये नहीं दिया जाता है, कि वह उसका अवतार होता है बल्कि वह धरती पर भगवान की तरह खड़ा रहता है इसलिये उसे माना जाता है। हमारे इस अध्यात्मिक दर्शन के संदेश की मजाक उड़ाना सहज है पर उसे समझना जरूरी है।  मनुष्य इस धरती का सबसे कमजोर पर बुद्धिमान जीव है। उसके पास बुद्धि बहुत है पर विवेक सभी के पास नहीं होता।  आदमी का मन उसे देवता भी बना सकता है और राक्षस भी-तीसरी स्थिति यह है कि सामान्य मनुष्य ही बना रहे जिनकी संख्या इस धरती पर ज्यादा होती है।  इस मनुष्य जाति में उत्साही लोगों  के  दो रूपों में बदलने की  ही संभावना रहती है। देवता बना मनुष्य सामान्य मनुष्य के लिये वरदान तो राक्षस अभिशाप बन जाता हैं भगवान ने तो इस धरती पर भेज दिया पर मनुष्य समुदाय ने राजा का निर्माण स्वयं अपनी रक्षा के लिये किया।  पागल कुत्ता अनेक लोगों को काट सकता है पर सामान्य कुत्ता उत्तेजित होने पर केवल समाने आये व्यक्ति पर दांत गड़ाता है।  शेर की भूख शांत होने के बाद वह शिकार नहंी करता।  जगल में हजारों हिरण विचर सकते हैं। आदमी अपना पांव पास न लाये तो सांप नहीं काटता। इंसान की स्थिति अलग है। अगर उसे भय न हो तो वह कुछ भी कर सकता है।  इस भय को जिंदा रखने के लिये ही राजा का निर्माण हुआ।  राजा को भगवान का प्रतिनिधि इसलिये नहीं माना गया कि लोग अंधविश्वासी है बल्कि वह यह सोचते हैं कि भगवान ने प्रकृत्ति की व्यवस्था का निर्माण किया है मनुष्य का समाज के रूप में निर्माण में राजा उसे चलाता है।
      अमीर ही नहीं वरन् गरीब, मजदूर और बेबस भी चाहता है कि राज्य कुछ उसे न दे पाये पर कम से कम बना रहे ताकि कोई दूसरा मनुष्य अनावश्यक रूप से उसे परेशान न करे।  अपराध होते हैं पर विश्व में मनुष्यों की संख्या को देखते हुए वह नगण्य हैं। लोग रोटी चाहते हैं पर उससे ज्यादा जिंदगी का रहना पसंद करते हैं। अभावों के बाद संपन्नता की वह आशा करते हैं, कुछ लोगों की होती है पर जिनकी नहीं होती वह सभी बागी नहीं हो जाते। उनकी आशाओं को सपना दिखाकर उनका समर्थन लेकर उच्च पद की ख्वाहिश करने वालों को कम से कम अराजकता का बखान इसलिये भी नहीं करना चाहिये कि लोग उनकी इस बात को पसंद नहीं करते हैं।  याद रखें अराजकता से बचने के लिये ही  भारत में जनगणमन मंत्र का जाप हर वर्ग का आदमी करता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

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1/21/14

विषयों के गुणों में आसक्ति का त्याग ही वैराग्य-पतंजलि योग साहित्य(patanjali yog sahitya-vishayon ke gunon mein aasakti ka tyag hee vairagya)



      हमारे देश में वैराग्य या सन्यास को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम प्रचलित हैं।  यह भ्रम पेशेवर गुरुओं ने ही प्रतिपादित किये हैं। सन्यास या वैराग्य कोई क्रिया नहीं वरन् एक मानसिक स्थिति है।  यदि यह देह है तो सांसरिक विषयों से संपर्क रखना आवश्यक है उनसे परे रहना संभव नहीं।  अपनी दैहिक आवश्यकताओं के लिये सभी को कर्म करना ही पड़ता है पर उनमे हमेशा  ही मन का लिप्त रहना अथवा खाली समय में भी उनका चिंत्तन करना अज्ञान का प्रमाण होता है।  हमें पेट पालने के लिये रोटी, पहनने के लिये कपड़े और रहने के लिये छत चाहिये।  भगवत्कृपा से वह मिल भी जाती हैं पर उनमें स्वाद, रंग और आकर्षण का बोध न रखना ही वैराग्य है। जो मिल रहा वही पहनकर तन ढंकना, जो खाने को मिला उसी को स्वादिष्ट मानकर खाना और जैसी छत मिली उसमें ही संतुष्ट रहना भी वैराग्य है। एक तरह से कहें कि संतोष ही सच्चा वैराग्य है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-देखे तथा सुने गये विषयों में तृष्णारहित मन की जो वशीकरण नामक स्थिति है वही वैराग्य है।
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।
      हिन्दी में भावार्थ-पुरुष में तत्वज्ञान से जो प्रकृति गुणों में आसक्ति का सर्वथा अभाव हो जाना है वही वैराग्य है।
      श्रीमद्भागवत गीता में सांख्ययोग यानि सन्यास को एक अत्यंत कठिन तथा अनावश्यक विषय बताते हुए कर्मयोग को भी उसका एक रूप माना गया है।  श्रीमद्भागवत गीता में संख्यभाव में रत रहने का आशय कम से कम हमारी दृष्टि से तो यह है कि मनुष्य अपनी समस्त इंद्रियों को निष्क्रिय रखे-न सांस ले, न देखे, न सोच, न  सुने और बोले-यह स्थिति अत्यंत कठिन है हालांकि पुरातन इतिहास में ऐसे अनेक महान ऋषि हुए भी हैं जिन्होंने इस विधा में महारथ प्राप्त किया पर ऐसे विरले ही होते हैं।  कर्मयोग में विषयों से परे होकर  मन की लिप्तता का त्याग करना ही सन्यास जैसा फल देने वाला मान गया है। हमने देखा है कि बाज़ार में विलासिता की अनेक वस्तुओं के नित नित नये रूप आते हैं और लोग अगर अपना सामान थोड़ा भी पुराना हो उसे छोड़कर नये की तरफ दौड़े जाते हैं।  भौतिक युग में एक दूसरे से अधिक संपन्न दिखने की यह होड़ भी मानसिक बीमारियों को उत्पन्न होने का एक कारण है। इस प्रवत्ति का त्याग किया जाये तो भी प्रसन्नचित्त रहा जा सकता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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1/11/14

आम दरबार-हिन्दी व्यंग्य कविता(aam darbar-hindi vyangya kavita)



 लोगों ने बनाया है राजा
आम दरबार तो जरूर लगायेंगे,
मसले हल होना कठिन है
 फिक्रमंद होने का अहसास वह यूं ही जतायेंगे।
कहें दीपक बापू
नया जमाना आ गया है
तख्त पर बैठने के लिये
काबलियत होना जरूरी नहीं है,
चंद नारे लगाकर,
पुराने वादों से नये सपने जगाकर,
लोगों को भरमा ले कोई
भीड़  पहुंच जाती वहीं है,
जब तक उम्मीदों का आसमान रहेगा,
चांद तारे जमीन पर लाने की
हर आशिक माशुका से कहेगा,
बादशाह और आम इंसान की
जिंदगी की राहों में फर्क होता है,
एक गलती कर मुस्कराता है
दूसरे का बेड़ा गर्क होता है,
ज़माने की हुकुमत संभालें हैं जो लोग
मस्त रहेंगे तख्त पर बैठकर
जनता को नये सपने रोज दिखायेंगे
अपना दिल यूं ही बहलायेंगे।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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