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2/8/14

बेईमानी का हिस्सा-हिन्दी व्यंग्य कविता(baimani ka hissa-hindi vyangya kavita)



अपने गुनाहों पर नज़र किसकी जाती है,
दूसरे की गलती ही गुनाह हो जाती है।
कहें दीपक बापू इंसान की जुबान बाहर ही बोलती है,
अंदर बैठी नीयत कभी अपना हिसाब नहीं तोलती है,
सभी दावा करते अपनी ईमानदारी का अपने बयान में,
बेईमान छिपी है तलवार की तरह सभी की म्यान में,
जब तक कोई पकड़ा न जाये साहुकार की कहलाता है,
समय का पंजा गढ़ जाये तो मजबूरी हर कोई बताता है,
सच्चाई यह है कि  गरीबी किसी को नहीं भाती है,
बदकिस्मती मानते लोग जिनके हिस्से बेईमानी नहीं आती है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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2/2/14

सिंह से अधिक प्रेम करने वाले लोग नन्हीं बकरी को मिलते हैं-संत कवियित्री सहजोबाई के दर्शन पर आधारित चिंत्तन(singh se adhik prem karne wale log bakri ko milte hain-sant kaviyitri sahajobai ke darshan par aadharit chinttan)




      जीवन में भौतिक साधनों का होना आवश्यक है पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उनका संचय इतना किया जाये कि संभालना कठिन हो। अनेक लोग यह सपना देखते हैं कि उनको कोई राजपद मिल जाये या इतनी संपदा का संचय उनके पास हो ज कि समाज पर उनका स्वाभाविक रूप से शासन चले-वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बने। यह राजसी प्रवृत्ति मनुष्य में स्वाभाविक रूप से रहती है कि वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से ही संतुष्ट नहीं रहता वरन् वह दूसरों से अपनी पूजा भी करवाना चाहता है। यह तो एक मान्य तथ्य है कि सामूहिक रूप से लोग उसका ही सम्मान करते हैं जो किसी राजपद पर प्रतिष्ठित हो जिससे दंड आदि का भय हो  या इतना धनी हो कि उससे मदद की आशा की जा सके।  इस वजह से अनेक लोग खास इंसान  बनने की जद्दोजेहद में लगे रहते हैं। कुछ लोगों को भाग्य साथ भी देता है और वह अपना ऊंचा लक्ष्य प्राप्त भी कर लेते हैं। यह अलग बात है कि बाद में अपने वैभव की रक्षा करने में ही उनका जीवन नष्ट हो जाता है। छिन जाने का भय उनके रातों की नींद हराम किये रहता है। इसके विपरीत सामान्य मनुष्य भले ही अपनी हालातों से संघर्ष करता है पर उसके मन में कोई भय नहीं रहता।
संत कवियित्री सहजोबाई कहती हैं कि
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साहन कूं तो भय घना, ‘सहजो’ निर्भय रंक।
कुंजर को पग बेड़ियां, चींटी फिरै निशंक।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-धनवान हमेशा भयभीत रहता है जबकि गरीब को अपनी किसी वस्तु के खोने की आशंका नहीं रहती। हाथी मूल्यवान होता है इसलिये उसके पांव में बेड़िया रहती है जबकि चींटी स्वतंत्र विचरण करती है।
अभिमानी नाहर बड़ो, भरमत फिरत उजाड़।
‘सहजो’ नन्हीं बकरी, प्यार करै संसार।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जंगल का राजा होकर भी सिंह अकेला ही जंगल में फिरता है उसके पास भय के कारण उसक पास कोई नहीं जाता जबकि छोटी बकरी जहां भी हो उसे प्यार करने वाले बहुत होते हैं।
      जीवन की यही सच्चाई है कि सांसरिक विषयों के संचय में जितनी प्रवीणता होगी उतना भी भौतिक भंडार भी भरेगा पर उसके साथ ही भय की भावना भी बलवती होगी। इतना ही नहीं जितना अपने शक्तिशाली, प्रतिभाशाली और सुंदर होने पर अहंकार करेंगे उतना ही अपने लिये संकट भी बुलायेंगे।  शक्तिशाली के पास तो कोई दूसरा मनुष्य भय के कारण पास नहीं आता तो प्रतिभाशाली व्यक्ति से हर कोई काम लेना चाहता है इस बात की चिंता किये बिना कि उसे कितनी परेशानी होती है।  उसी तरह सुंदर स्त्री का अहंकार देखकर हर कोई उसे अपने नाम की बेड़ी डालना चाहता है। आजकल स्त्रियों के साथ बढ़ते अपराध मनुष्य में व्याप्त स्वाभाविक उस हिंसक प्रवृत्ति का ही परिचायक है जो प्रणय निवेदन में नाकाम होने या नारी सुलभ चंचलता के कारण अपमानित होने  पर बदला लेने के लिये प्रेरित करती है।
      कहने का अभिप्राय यही है कि अति सर्वदा वर्जयते।  धन, पद, प्रतिष्ठा की अधिकता भी भय पैदा करने वाली होती है जो कि स्वाभाविक है। इसलिये अपनी स्थिति से संतोष करना ही एक श्रेष्ठ कला है।  इतना ही नहीं अगर अन्य लोगों से धन, पद और प्रतिष्ठा अधिक भी हो तो उसे दूसरों के सामने बघार कर उसमें कुंठा का भाव नहीं लाना चाहिए।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

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1/26/14

अराजकता से बचने के लिये ही करते हैं जनगणमन मंत्र का जाप-26 जनवरी गणतंत्र(arakata se bachne ke liye hi karte hain janagan matra ka jap-special hindi article or lekh on 26 january and republic day)



      26 जनवरी गणतंत्र का दिन बीत गया। हर बार की तरह इस बार भी शासकीय, अशासकीय तथा सामाजिक स्तर पर अनेक कार्यक्रम हुए। अध्यात्मिक चिंत्तकों के लिये 26 जनवरी गणतंत्र दिवस तथा 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस राष्ट्रीय महत्व के तो होते हैं पर सामाजिक रूप से वह इनको अधिक प्रभावी नहीं अनुभव कर पाते। भौतिक रूप से 65 वर्ष में बहुत कुछ बदला है पर अध्यात्मिक रूप से जो पतन हुआ है उसका आंकलन करने का प्रयास कोई नहीं करता। मुख्य बात यह है कि समस्याओं को लेकर सार्वजनिक चिंत्ताओं को पहले निराशा फिर आक्रोश में बदलने वाले लोग जब जनगण के मंत्र के सहारे पद पर पहुंच जाते हैं तब वह कुछ कर नहीं पाते।  चिंत्ताओं का निराकरण चिंत्तन से होता है पर पद पर बैठने के बाद आसपास सुविधाओं का जो संग्रह होता है उससे अच्छे खासे आदमी की बुद्धि भ्रष्ट होने के बाद किसी से वैचारिक प्रक्रिया में शामिल होने की अपेक्षा करना एक मजाक लगता है।
      जब हृदय में राष्ट्रवादी विचारों का क्रम आता है तब लगता है कि जब तक इस देश में अंग्रेजी शिक्षा, राज्यप्रणाली तथा बौद्धिक प्रकृत्ति यहां स्थापित रहेगी तब तक हमारे  देश का उद्धार नहीं हो सकता। जब चिंत्तन अध्यात्मिक दौर में आता है तब यह देखकर संतोष होता है कि अंग्रेजी एक स्वचालित राज्य प्रबंध प्रणाली छोड़ गये जिसकी वजह से देश ऐसे ही चलता रहेगा। जणगणमन के मंत्र से राजकीय शिखर पदों पर पहुंचे लोगों को राज्य प्रबंध प्रणाली के सुचारू संचालन में अधिक बुद्धि नहीं लगानी पड़ती।  अगर यह न होती तो शायद प्रजा के लिये अधिक कठिनाई होती।  जनगण के तांत्रिकों को केवल इस प्रबंध प्रणाली को देखना भर है उसमें बदलाव करने का नारा भले ही वह देते हों पर करते नहीं। अच्छा है! कहीं अगर उसमें बदलाव करते हुए कोई ऊंच नीच हो जाये तो फिर जो अराजकता फैलेगी उसे रोकना कठिन है। इस राज्य प्रणाली के दोषों पर जनगण की चिंत्ताओं को अपना स्वर देकर अनेक लोग महान हो गये पर वह वैसे ही बनी रही। जो आया उसी राह चला।  पक्ष विपक्ष एक दूसरे पर व्यवस्था में दोष पैदा करने का आरोप लगाते रहे पर खैरियत है कि प्रबंध प्रणाली से छेड़छाड़ नहीं हुई। अगर एक करता तो दूसरा अपने ढंग से दूसरी तरह  करता। तब पूरी प्रबंध व्यवस्था अस्पष्ट तथा विवादपूर्ण हो जाती।  नहीं बदली तो वह यथावत है। देश में राज्य व्यवस्था है, यही आभास बहुत है।
      यहां गरीब, मजदूर तथा बेबस लोगों का एक बहुत बड़ा निम्न वर्गीय समुदाय है। जिसके उद्धार के लिये 65 साल से प्रयास हुए पर कुछ होता दिख नहीं रहा। अनेक बुद्धिमान, उत्साही तथा उदार लोगों ने इस निचले तबके के लिये बीड़ा उठाया।  अनेक राजकीय पदों पर पहुंचे तो कुछ ने अपनी अदाकारी से सम्मान पाये।  इस वर्ग का उद्धार होना भी नहीं था। इस वर्ग के लोगों में से कुछ लोगों उच्च वर्ग में आये पर बढ़ती जनसंख्या ने उनके उद्धार को फीका कर दिया।  निम्न वर्ग परेशान है पर संतुष्ट है कि राज्य व्यवस्था है वरना उसकी जिंदगी अधिक कठिन हो जाती।  कुछ उत्साही मानते हैं कि देश में अराजकता पैदा भी हो तो निम्न वर्ग को फर्क क्या पड़ता है? यह फिक्र तो उच्च वर्ग को ही करना चाहिये। इस तर्क की आलोचना को व्यापक रूप देने के लिये मूर्खतापूर्ण, कुतर्क या बकवाद शब्द जोड़ने  में डर लगता है क्योंकि इस देश में कुछ संगठन अराजकता में एक तरह की  क्रांति का संभावना देखते हैं। 
      इन संगठनों के शीर्ष पदों पर जिनमें उच्च वर्गों के वह लोग शामिल है जिनके पास सारी भौतिक सुविधायें हैं पर कहीं राजसी पद या वहां बैठे शिखर पुरुष की निकटता प्राप्त करने का भावनाऐं हैं।  संभवत इन संगठनों में वह लोग हैं जो आधुनिक राजपुरुषों के निवास स्थान, संपत्ति, उनको मिलने वाले सम्मान, प्रचार माध्यमों में उनके बयानों को सुर्खियों मिलने तथा साथ चलने वाले सुरक्षा कर्मियों को देखकर वैसा ही स्थान पाने का मोह पाल लेते हैं।  स्थापित राजनीतिक संगठनों में अपने लिये ऐसी संभावना न देखकर वह जणगणमन मंत्र का जाप कर प्रजा में व्याप्त निराशा को आक्रोश और फिर उसे अपने लिये समर्थन में बदलकर  उच्च पद पाने का प्रयास करते हैं।  उन्हें लगता है कि वह अराजकता का दाव खेलें पर प्रजा साथ नहीं देती तो वह कौम को मुर्दा होने की बात कहते हैं।
      जनगणमन का मंत्र हम क्यों जाप रहे हैं? इस प्रश्न का जवाब ही अराजकता के समर्थक लोगों को समझना चाहिये। अमीर हो या गरीब सभी को जान प्यारी है। राजा को भगवान के बाद दर्जा इसलिये नहीं दिया जाता है, कि वह उसका अवतार होता है बल्कि वह धरती पर भगवान की तरह खड़ा रहता है इसलिये उसे माना जाता है। हमारे इस अध्यात्मिक दर्शन के संदेश की मजाक उड़ाना सहज है पर उसे समझना जरूरी है।  मनुष्य इस धरती का सबसे कमजोर पर बुद्धिमान जीव है। उसके पास बुद्धि बहुत है पर विवेक सभी के पास नहीं होता।  आदमी का मन उसे देवता भी बना सकता है और राक्षस भी-तीसरी स्थिति यह है कि सामान्य मनुष्य ही बना रहे जिनकी संख्या इस धरती पर ज्यादा होती है।  इस मनुष्य जाति में उत्साही लोगों  के  दो रूपों में बदलने की  ही संभावना रहती है। देवता बना मनुष्य सामान्य मनुष्य के लिये वरदान तो राक्षस अभिशाप बन जाता हैं भगवान ने तो इस धरती पर भेज दिया पर मनुष्य समुदाय ने राजा का निर्माण स्वयं अपनी रक्षा के लिये किया।  पागल कुत्ता अनेक लोगों को काट सकता है पर सामान्य कुत्ता उत्तेजित होने पर केवल समाने आये व्यक्ति पर दांत गड़ाता है।  शेर की भूख शांत होने के बाद वह शिकार नहंी करता।  जगल में हजारों हिरण विचर सकते हैं। आदमी अपना पांव पास न लाये तो सांप नहीं काटता। इंसान की स्थिति अलग है। अगर उसे भय न हो तो वह कुछ भी कर सकता है।  इस भय को जिंदा रखने के लिये ही राजा का निर्माण हुआ।  राजा को भगवान का प्रतिनिधि इसलिये नहीं माना गया कि लोग अंधविश्वासी है बल्कि वह यह सोचते हैं कि भगवान ने प्रकृत्ति की व्यवस्था का निर्माण किया है मनुष्य का समाज के रूप में निर्माण में राजा उसे चलाता है।
      अमीर ही नहीं वरन् गरीब, मजदूर और बेबस भी चाहता है कि राज्य कुछ उसे न दे पाये पर कम से कम बना रहे ताकि कोई दूसरा मनुष्य अनावश्यक रूप से उसे परेशान न करे।  अपराध होते हैं पर विश्व में मनुष्यों की संख्या को देखते हुए वह नगण्य हैं। लोग रोटी चाहते हैं पर उससे ज्यादा जिंदगी का रहना पसंद करते हैं। अभावों के बाद संपन्नता की वह आशा करते हैं, कुछ लोगों की होती है पर जिनकी नहीं होती वह सभी बागी नहीं हो जाते। उनकी आशाओं को सपना दिखाकर उनका समर्थन लेकर उच्च पद की ख्वाहिश करने वालों को कम से कम अराजकता का बखान इसलिये भी नहीं करना चाहिये कि लोग उनकी इस बात को पसंद नहीं करते हैं।  याद रखें अराजकता से बचने के लिये ही  भारत में जनगणमन मंत्र का जाप हर वर्ग का आदमी करता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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1/21/14

विषयों के गुणों में आसक्ति का त्याग ही वैराग्य-पतंजलि योग साहित्य(patanjali yog sahitya-vishayon ke gunon mein aasakti ka tyag hee vairagya)



      हमारे देश में वैराग्य या सन्यास को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम प्रचलित हैं।  यह भ्रम पेशेवर गुरुओं ने ही प्रतिपादित किये हैं। सन्यास या वैराग्य कोई क्रिया नहीं वरन् एक मानसिक स्थिति है।  यदि यह देह है तो सांसरिक विषयों से संपर्क रखना आवश्यक है उनसे परे रहना संभव नहीं।  अपनी दैहिक आवश्यकताओं के लिये सभी को कर्म करना ही पड़ता है पर उनमे हमेशा  ही मन का लिप्त रहना अथवा खाली समय में भी उनका चिंत्तन करना अज्ञान का प्रमाण होता है।  हमें पेट पालने के लिये रोटी, पहनने के लिये कपड़े और रहने के लिये छत चाहिये।  भगवत्कृपा से वह मिल भी जाती हैं पर उनमें स्वाद, रंग और आकर्षण का बोध न रखना ही वैराग्य है। जो मिल रहा वही पहनकर तन ढंकना, जो खाने को मिला उसी को स्वादिष्ट मानकर खाना और जैसी छत मिली उसमें ही संतुष्ट रहना भी वैराग्य है। एक तरह से कहें कि संतोष ही सच्चा वैराग्य है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
-------------------------
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-देखे तथा सुने गये विषयों में तृष्णारहित मन की जो वशीकरण नामक स्थिति है वही वैराग्य है।
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।
      हिन्दी में भावार्थ-पुरुष में तत्वज्ञान से जो प्रकृति गुणों में आसक्ति का सर्वथा अभाव हो जाना है वही वैराग्य है।
      श्रीमद्भागवत गीता में सांख्ययोग यानि सन्यास को एक अत्यंत कठिन तथा अनावश्यक विषय बताते हुए कर्मयोग को भी उसका एक रूप माना गया है।  श्रीमद्भागवत गीता में संख्यभाव में रत रहने का आशय कम से कम हमारी दृष्टि से तो यह है कि मनुष्य अपनी समस्त इंद्रियों को निष्क्रिय रखे-न सांस ले, न देखे, न सोच, न  सुने और बोले-यह स्थिति अत्यंत कठिन है हालांकि पुरातन इतिहास में ऐसे अनेक महान ऋषि हुए भी हैं जिन्होंने इस विधा में महारथ प्राप्त किया पर ऐसे विरले ही होते हैं।  कर्मयोग में विषयों से परे होकर  मन की लिप्तता का त्याग करना ही सन्यास जैसा फल देने वाला मान गया है। हमने देखा है कि बाज़ार में विलासिता की अनेक वस्तुओं के नित नित नये रूप आते हैं और लोग अगर अपना सामान थोड़ा भी पुराना हो उसे छोड़कर नये की तरफ दौड़े जाते हैं।  भौतिक युग में एक दूसरे से अधिक संपन्न दिखने की यह होड़ भी मानसिक बीमारियों को उत्पन्न होने का एक कारण है। इस प्रवत्ति का त्याग किया जाये तो भी प्रसन्नचित्त रहा जा सकता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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1/11/14

आम दरबार-हिन्दी व्यंग्य कविता(aam darbar-hindi vyangya kavita)



 लोगों ने बनाया है राजा
आम दरबार तो जरूर लगायेंगे,
मसले हल होना कठिन है
 फिक्रमंद होने का अहसास वह यूं ही जतायेंगे।
कहें दीपक बापू
नया जमाना आ गया है
तख्त पर बैठने के लिये
काबलियत होना जरूरी नहीं है,
चंद नारे लगाकर,
पुराने वादों से नये सपने जगाकर,
लोगों को भरमा ले कोई
भीड़  पहुंच जाती वहीं है,
जब तक उम्मीदों का आसमान रहेगा,
चांद तारे जमीन पर लाने की
हर आशिक माशुका से कहेगा,
बादशाह और आम इंसान की
जिंदगी की राहों में फर्क होता है,
एक गलती कर मुस्कराता है
दूसरे का बेड़ा गर्क होता है,
ज़माने की हुकुमत संभालें हैं जो लोग
मस्त रहेंगे तख्त पर बैठकर
जनता को नये सपने रोज दिखायेंगे
अपना दिल यूं ही बहलायेंगे।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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12/31/13

मनु स्मृति से संदेश-ओम (ॐ) शब्द का जाप स्थाई प्रभाव देने वाला (om shabd ka jap adhik prabhami-message from manu smriti)



            इस संसार में शब्दों का बहुत बड़ा जाल है पर उनमें केवल ओम (ॐ)शब्द ही परब्रह्म परमात्मा की अनुभूति कराता है। हमारे समाज में भौतिक संसार की उपलब्धि के लिये अनेंक प्रकार के कर्मकांड किये जाते हैं।  वेदों में बताये गये साकार तथ सकाम भक्ति के मार्ग पर चलने वाले धर्मभीरु लोग ओम शब्द के अध्यात्मिक महत्व को नहीं समझ पाते।  श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘शब्दों में श्रेष्ठ में ओम (ॐ) शब्द हूं।’ उसी तरह वह यह भी कहते हैं कि ‘छंदों में  गायत्री  छंद मैं ही हूं।
            ओम के जाप के बाद गायत्री मंत्र का निरंतर जाप किया जाये तो हृदय में एक स्फूर्ति की अनुभूति होती है। आमतौर से ओम शब्द तथा गायत्री शब्द का जाप प्रत्यक्ष रूप से फल भले न ही देते दिखें पर इसे जो अध्यात्मिक लाभ होता है उससे साधक के आंतरिक तथा बाह्य व्यक्तित्व में निखार आता है और वह सांसरिक कर्म में दृढ़ता से लिप्त हो जाता है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि
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क्षरन्ति सर्वाः वैदिक्यो जुहोतियजति क्रियाः।
अक्षरं तक्षरं ज्ञेयं ब्रह्म चैव प्रजापतिः।।
            हिन्दी में भावार्थ-वेदों में बताई गयी विधि से हवन और यज्ञ क्रियायें फल देने के बाद अपना प्रभाव खो बैठती है पर ब्रह्म का प्रतिपादक ओम (ॐ)का कभी नाश नहीं होता है।
            संत कबीर दास ने एक दोहा कहा है जिसकी पंिक्त यह है कि न सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठा’। दरअसल समाज में एक बहुत बड़ा वर्ग अपना समय सांसरिक विषयों में लित्प रहते हुए बिताता है या फिर उन पर आपसी वार्तालाप कर अपनी वाणी और शब्द बर्बाद करता है।  अनेक जगह तो बिना किसी कारण के विवाद हो जाता है। लोग अकारण ही हिंसा भी कर बैठते हैं।  हमारी इंद्रियों में जीभ का खेल बहुत बड़ा खेल है, इसे बहुत कम लोग जानते हैं। इसका कारण यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। हमारी समस्त इंद्रियां व्यथित होने पर बाहर की तरफ व्यक्त होने के लिये तत्पर हो जाती हैं। उन पर नियंत्रण करना आवश्यक है।  ऐसे में तन, मन और हृदय में ओम शब्द का जाप एक ऐसे भाव पैदा करता है जो आत्मनिंयत्रण में सहायक होता है। इसलिये जब कभी खाली समय मिले मुख से या फिर हृदय में ओम (ॐ) शब्द का जाप करना चाहिये।
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12/21/13

हमारे लिये तो राज्य प्रबंध चांद पर जाने से अधिक कठिन-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन(hamare liye to rajya prabandh chand par jane se adhik kathiy-hindi vyangya chinttan,hindi satire thought ’



                        आमतौर से हम जैसे फोकटिया निर्दलीय लेखकों के लिये देश की चुनावी राजनीति पर लिखना कठिन होता है। इसका कारण है कि यह राजनीति संगठनों के आधार पर चलती है और जो किसी संगठन विशेष से न जुड़ा है न उनसे कोई प्रतिबद्धता है वहां हम जैसे फोकटिया लेखक के लिये लिखना उबाने वाला काम भी होता है।  अलबत्ता भारतीय अध्यात्म लेखन करते हुए राजनीति के व्यापक अर्थ हमारी समझ में आ ही गये हैं। भारतीय अध्यात्म दर्शन में कर्म के तीन प्रकार माने गये है-सात्विक, राजसी तथा तामसी।  जिस नीति का संबंध ही राज्य से है वहां राजसी प्रवत्ति होने के कारण उसे राजसी कहा जाता है।  व्यक्ति को परिवार, समाज तथा देश में राजनीति के सहारे ही अपने राजसी लक्ष्य को पूरा करने का अवसर मिलता है। इसलिये राजनीति का अर्थ अत्यंत व्यापक है। चूंकि चुनावी राजनीति में अंततः मनुष्य ही सक्रिय होते हैं तो उनमें श्रेष्ठ राजसी प्रवृत्ति होना ही चाहिये यह हमारा मानना है।
            यह लेख हम दिल्ली प्रदेश सरकार के गठन पर चल विषय पर ही लिख रहे हैं।  हमारा किसी प्रकार का प्रत्यक्ष संबंध दिल्ली से नहीं है पर एक सामान्य नागरिक के नाते वहां होने वाले घटनाक्रम से पर विचार तो उठते ही रहते हैं। उस पर समाचार सुनने के नशेड़ी होने के कारण समाचार टीवी चैनल देखने से बाज नहीं आते। यह अलग बात है कि प्रचार माध्यम अपने विज्ञापन का समय पास करने के लिये ऐसे समाचार पूरे दिखाते हैं जो बोर करते हैं।
            दिल्ली में देश के दो बड़े राजनीतिक दलों के बीच एक नया दल आया है। चुनावी परिणामों के अनुसार  एक बड़ा राजनीतिक दल पहले स्थान पर तो दूसरा तीसरे स्थान पर ही है। दूसरे नंबर पर नया दल रहा।  प्रथम स्थान प्राप्त राजनीतिक दल ने सरकार बनाने से इंकार कर दिया।  यकीनन तीसरे स्थान पर रहे राजनीतिक दल से उसे समर्थन मिलना भी नहीं था।  पहले और तीसरे स्थान पर चल रहे राजनीतिक के बीच राष्ट्रीय स्तर पर दोनों के बीच प्रतिद्वंद्वता इस तरह की आम लोग भी यह मानते हैं कि उनके बीच प्रत्यक्ष सहयोग बन ही नहीं सकता। इसलिये नये दल को तीसरे दल का समर्थन मिलना एक तरह से तार्किक बात मानी जा सकती है। समस्या यह है कि नये दल के लोगों के पास कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है पर वह अपने तर्क से यह प्रमाणित करने का प्रयास कर रहे हैं कि वह कुप्रबंध दूर कर दिल्ली की व्यवस्था सुधार लेंगे। वह अनेक प्रकार के मंत्र बता रहे हैं। यहां यह भी बता दें कि मंत्र का आशय किसी लक्ष्य को पूरा करने के लिये अपनायी जाने वाली प्रक्रिया के सूत्र से है न कि जापने वाले मंत्र की किसी धारणा पर ध्यान रख रहे हैं।  अट्ठारह मंत्र तो इस दल ने बता ही दिये हैं।  सार्वजनिक प्रचार से विरोधी लोगों को भी इन मंत्रों का पता चल ही गया है।  संभव है विरोधियों ने मान लिया हो कि यह मंत्र तो बस जापने लायक ही हैं उनके आधार पर कोई काम होना कठिन है।  इस नये दल को राजनीतिक शास्त्र का ज्ञान नहीं है इसलिये प्रतिदिन अपने मंत्र बताता जा रहा है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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लोकप्रसिद्धमेवैतद्वारि वह्योर्नियामकम्।
उपायोपगृहीतेन तेनैव परिशोष्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-संसार में यहा कहावत है कि जल से अग्नि बुझ जाती है और उपाय करने से वही अग्नि भी जल को सुखा डालती है।
संरक्षेन्मन्बीजं हि तद्वीजं हि महीभुजाम्
यस्मिन्न भिन्ने ध्रुवं भेदो गुप्ते गुप्तिरनुत्तरा।
            हिन्दी में भावार्थ-अपने कार्य के मंत्र और रहस्य को सदैव गुप्त रखें यही राजनीति का मूल तत्व है। उसके खुल जाने पर पर कार्य में बाधा पैदा होती है इसलिये अपने मंत्र की रक्षा करें।
            हम इस दल में इसलिये रुचि लेते हैं क्योंकि इसके अधिकतर सदस्य अन्ना हजारे के कथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का भाग रहे हैं और कहीं न कहीं वही लोकप्रियता इनकी चुनावी सफलता का कारण रही है।  यह सही है कि देश के हालत ठीक नहीं है पर उसके अनेक कारण है जिनमें बढ़ती जनंसख्या तथा कुप्रबंध दोनों ही है। मान लीजिये कुप्रबंध की व्यवस्था से निपटा भी गया तो बढ़ती जनसंख्या का दबाव सहन करना कठिन है।  हजार लोगों से उनकी समस्याओं को दूरे करने का वादा कर पूरा किया तो पता लगा कि दो हजार लोग वही समस्या लेकर फिर सामने खड़े हो गये।  हमारा मानना है कि देश में पानी, बिजली और परिवहन की मूलभूत समस्यायें दूर हो जायें तो वैसे ही देश विकसित हो जायेगा मगर लोकलुभावन नारे लगाने वाले इसे याद नहीं रखते। एक अर्थशास्त्र का छात्र (विद्वान न समझें) होने के नाते हमारा मानना है कि पूंजीगत विषयों पर राजस्व का व्यय अधिक होना होना चाहिये और जनकल्याण के लिये एक सीमा तक ही बजट रखा जाना चाहिये।  देखा जा रहा है कि लोकतंत्र की वजह से लोगों का मन जीतने के लिये तात्कालिक जन कल्याण कार्यक्रमों पर अधिक और जनता को लंबे समय तक लाभ देने वाले पूंजीगत निर्माणों पर कम ध्यान दिया जा रहा है।  नये दल के लोगों को अर्थशास्त्र की समझ भी कम दिखती है क्योंकि वह प्रशासन से जुड़े खर्च के मसलों पर तो बोलते हैं पर अपने कार्यों के लिये बजट जुटाने के संबंध में उनका ज्ञान प्रमाणिक रूप से नहीं मिलता है। संभव है राजस्व जुटाने का विषय सार्वजनिक करने में उनको साहस नहीं हो क्योंकि यह अप्रिय होता है इसलिये वह बताना नहीं चाहते हों। मूल बात यह है कि सरकार का काम बजट से होता है और इस बीच में कोई बड़ा परिर्वतन विधानसभा में सहमति के बिना नहीं हो सकता।
             नये दल वालों की क्षमता पर एकदम संदेह करना ठीक नहीं है पर एक बात तय है कि राज्य प्रबंध एक गूढ़ विषय है और उसमें अर्थशास्त्र तथा उससे जुड़े राजनीति, समाज, प्रबंध तथा भूगोल शास्त्र की भी समझ होना ही चाहिये। नये दल के रणनीतिकार मानते हैं कि पुराने दलों ने ढंग से व्यवस्था नहीं संभाली। उनके नजरिये यह बात सही हो सकती है पर उनका यह दावा करना कि राज्य प्रबंध चांद पर जाने की तकनीकी से अधिक कठिन नहीं है, हास्याप्रद है।  हमारा मानना है कि तकनीकी ज्ञान के साथ ही किसी राज्य का समर्थन हो तो चांद पर जाना सरल है पर राज्य व्यवस्था को सहजता से चलाना अर्थ, समाज, राजनीतिक, प्रबंध तथा भूगोल शास्त्र के ज्ञान तथा कुशल प्रबंध की क्षमता के बिना उससे कहीं  कठिन ही नहीं वरन् असंभव है। हम यहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की बात नहीं करेंगे क्योंकि नये दल वालों के  लिये यह आजकल पढ़ने योग्य विषय नहीं है। बहरहाल हम इंतजार कर रहे हैं कि उनकी रणनीति किस तरह की होती है? समाचार चैनल दिल्ली के राजनीतिक घटनाक्रम को फिल्म की तरह चला रहे हैं तो हम भी मनोरंजन की दृष्टि से यह सभी देख रहे हैं। अपने पास ढेर सारे आईडिये सरकार चलाने के लिये हैं पर गनीमत है कि प्रसिद्धि नहीं मिली वरना हम भी ऐसे अनेक दावा करते तो चांद पर जाने से ज्यादा सरल लगते पर होते नहीं।  यह हम अपने लिये कह रहे हैं और हमारा कोई पाठक नये दल से जुड़ा हो तो वह इसे हमारी ही अयोग्यता समझे।  वैसे तो हमें यहां अधिक पढ़ा नहीं जाता और अध्यात्मिक पहचान के कारण राजसी विषयों से जुड़े लोग हमें वैसे भी नहीं पढ़ते इसलिये किसी ऐसे पाठक होने की संभावना नही है। हम नये दल वालों को कोई चुनौती देने लायक भी नहीं है क्योंकि दो वर्षों के प्रयासों से वह इतनी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं जबकि हम सात वर्ष से लगातार इंटरनेट पर लिखते रहने के बावजूद अपनी कोई पहचान नहीं बना सके।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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12/4/13

शब्दों के आपसी रिश्ते-हिन्दी कवितायें(shabdon ke rishtey-hindi poem's)



वफादारी की कसमें जो लोग खाते हैं,
धोखा देने के लिये पहले वही तैयार हो जाते हैं,
कहें दीपक बापू खिलौने बनते ही टूटने के लिये
चालाक इंसानों की नजर में दूसरे यही दर्जा पाते हैं।
....................
जिन पर वफा का भरोसा करते
वही गद्दारी पर उतर आते हैं,
करते हैं जो साथ निभाने का वादा
मुकरने में कभी नहीं शरमाते हैं।
कहें दीपक बापू
भुलाने के लिये कसमें खाई जाती है,
वादों की याद भूलने पर ही आती है,
शब्दों के आपस में
धरती और आकाश जैसे रिश्ते होते,
इसलिये कसमों के साथ गद्दारी
वादों के साथ धोखे जुड़ ही जाते हैं। 
--------------



लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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11/10/13

समाचारों का सुपर संडे-विशिष्ट हिन्दी रविवारीय आलेख (super sandya of hindi tv news chaila-special hindi article or editorial)



            समाचारों से जुड़े टीवी चैनलों को हर रविवार सुपर संडे स्पेशल के लिये सामग्री चाहिये। इस दिन उन्हें एक ऐसे विषय की तलाश रहती है जिस पर पर सनसनी और मनोरंजन के साथ चिंत्तन की चाशनी परोस सकें।  उस दिन अवकाश होता है और नौकरी पेशा मध्यम वर्ग के लोगों को अवकाश होता है जिनको बौद्धिक विलास के साथ ही मनोरंजक विषय प्रिय होता है।  यह मध्यम वर्ग चाहता है कि वह कुछ देश और समाज की चिंता के साथ मनोरंजन  करते हुए स्वयं को ही चिंत्तक होने का विश्वास दिलाये।
                        जिस तरह सारी बीमारियां पश्चिम से आई हैं उसी तरह हमारे प्रचार माध्यमों को सुपर संडे पर स्पेशल की बीमारी लग ही गयी है।  यह बीमारी हमने पश्चिम में देखी थी।  अमेरिका और ब्रिटेन में कुछ ऐसी घटनाओं को शुक्रवार तथा शनिवार को मूर्त रूप दिया जिनकी चर्चा पर वहां के टीवी चैनलों ने रविवार को खूब की।  तय बात है कि इसमें विज्ञापनों का समय खूब पास होता है।  यह चैनल धनपतियों के पास हैं और कभी कभी  काले धनपतियों से उनके रिश्ते होने का शक इसलिये भी होता है कि उन लोगों ने ही कुछ घातक घटनाओं को अंजाम दिलवाने का काम भी शुक्रवार तथा शनिवार को इसलिये ही किया ताकि रविवार को विशिष्ट सामग्री प्रसारित की जा सके। अब इस तथ्य को प्रमाणित करना तो कठिन है पर हिन्दी ब्लॉग जगत के एक पुराने ब्लॉगर ने रविवार के दिन ही कुछ खास घटनायें तथा दुर्घटनाऐं होने पर इसी तरह का शक जताया था।  रविवार के चयन पर संदेह जताते हुए उसने ऐसी कई घटनाओं की चर्चा की जिससे रविवार का दिन अमेरिका तथा ब्रिटेन में सुपर संडे बना। इस बात को कम से कम पांच वर्ष हो गये और तब तक भारतीय समाचार चैनलों में इस तरह की प्रवृत्ति नहीं देखी गयी थी।
                        हमें चैनलों के सुपर संडे के लिये सामग्री ढूंढने पर कोई आपत्ति नहीं है। मुश्किल यह होने वाली है कि चैनल अपनी सामग्री को सनसनीखेज बनाने के प्रयास में कहीं अपनी विश्वसनीयता न खो बैठें।  किसी के अपराध की जांच पुलिस करती है पर उसके विरुद्ध दर्ज मामले पर ही इन चैनलों में बहस कर उस अपराधी को दानव साबित करने का जो प्रयास होता है वह अजीब लगता है।  ऐसा लगता है कि प्रचार जगत के स्वामियों ने राजनीति, कला, साहित्य, अर्थ, फिल्म तथा धर्म के साथ ही दुनियां के उस हर क्षेत्र में अपने शिखर पुरुष स्थापित कर दिये हैं जो मनुष्य के मन से जुड़े हैं।  कभी कभी तो ऐसा लगता है कि कुछ शिखर पुरुष तो केवल प्रचार से ही बने हैं और जो स्वयं बने हैं वह भी इन प्रचारकों के लिये प्रिय बनने के लिये बेताव रहते हैं।  अनेक लोगों की  आंखें कैमरे ढूंढती हैं और उनकी वाणी तभी खुलती है जब उसे प्रसारण में जगह मिलने की संभावना हो।  स्वनिर्मित रचनाधर्मियों की कमी हो गयी है। यह सब भी ठीक होता पर निराशाजनक स्थिति यह है कि लोगों का मन निराश है। न चिंत्तन के लिये ढंग की सामग्री मिलती है न मनोरंजन के लिये कोई कार्यक्रम दिखता है।  लोगों को जबरन हंसाने, रुलाने और चिंत्तन के लिये मजबूर किया जा रहा है।
                        स्वतंत्ररूप से बौद्धिक चिंत्तन करने वालों के लिये तो कुछ बचा ही नहीं है पर जो समाचार आदि देखकर अपनी बात चर्चा में कहते हैं उन्हें भी लगता है कि अनेक विषय स्तरहीन हैं। जब से हमने ब्लॉग लिखन प्रारंभ किया है तब से बाहर लोगों से अपने मन की बात कहना कम ही कर दिया है। लिखने के लिये हमें भी विषय चाहिये इसलिये चाय की दुकानों, मंदिरों और उद्यानों में हम लोगों की चर्चा सुनते हैं। यह चर्चायें टीवी वाली बहसों पर आधारित होती हैं। टीवी के समाचारों पर लोगों की प्रतिक्रिया होती है।  उन्हें सुनकर मन ही मन मुस्कराते हैं।  इस मामले में प्रचार प्रबंधकों की तारीफ करना चाहिये कि वह समाज  को चिंत्तनशील रखने के लिये सतत सक्रिय रहते हुए  उसे संचालित रखने में सफल हो रहे हैं।  एक स्वतंत्र चिंत्तक होने के नाते हम मानते हैं कि लोकतंत्र में नेता के चयन की भूमिका में प्रजा सर्वोपरि है पर यह भी देख रहे हैं कि उसके मत को प्रभावित करने का काम भी बखूबी हो रहा है। प्रचार प्रबंधक दावा भले ही जनहित का करें पर उनकी चिंता इस बात की भी है कि राजकीय संस्थाओं में उनका प्रभाव अवश्य रहना चाहिये। यही कारण है कि राजस भाव वाले लोग अब टीवी पर अपना प्रचार देखने के लिये आतुर रहते हैं। उनको भी यह लगता है कि जनता मानस  लोकप्रिय होने का सबसे आसान तरीका पर्दे पर अपना चेहरा आते रहने से आसान होगा।
                        एक कथित संत को एक मामले में कई दिनों के प्रयास शुक्रवार को ही पकड़ा गया। उसी दिन तय हो गया कि शनिवार और रविवार उनकी वजह से सुपर रहने वाला है। उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी पर ही इतनी चर्चा हो गयी कि लगने लगा कि बस सजा दी जाना बाकी है।  यही काम प्रचार माध्यमों के हाथ में नहीं है वरना तो वह इस देश के पांच दस अपराधियों को सरेआम फंासी दे चुके होते। अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को जिस तरह इन प्रचार माध्यमों ने सहारा दिया उससे लोगों को लगा होगा कि प्रचार प्रबंधक वाकई जनहितैषी हैं पर सच बात यह है कि सुपर संडे की परंपरा वही से ही शुरु हुई।  उस समय ऐसा लग रहा था कि किसी चौराहे पर बनी फिल्म को सीधा प्रसारण हो रहा है। फिर अचानक थम गया। अन्ना का यह आंदोलन चला। बाकी पांच दिन तो मामला ठंडा रहता था पर शुक्रवार शाम से उत्तेजना वाली खबरें आती होती और शनिवार और बहस सामग्री से सुपर संडे बन जाता था।
                        समाचार चैनलों की समस्या यह है कि उनको मनोरंजन चैनलों से भारी चुनौती मिलती है। जब कोई खास समाचार न हो तो लोग समाचारों से मुंह फेर लेते हैं।   अगर वह इस तरह सुपर संडे न मनायें तो शायद उनकी प्रतिष्ठा समाप्त ही हो जाये।  भगवान जाने सच क्या है, पर इतना तय बात है कि इनके उठाये विषयों में दिखायी गयी  गंभीरता व्यवसायिक होती है यह तय बात है। बहसों का स्तर तो यह है कि तर्क वितर्क  कम  शोरशराबा अधिक होता है। बहस करने वाले करें तो ठीक इनके संचालक ही शोर मचाते हैं।  अपने उत्तर सुनने का अधिक सामर्थ्य इनमे नहीं दिखता। अधिक रुचिकर विषय पर होने वाली  बहस में एक ही तर्क के बाद विज्ञापन का अवरोध आ जाता है। तब यह साफ लगता है कि अपने चैनल की लोकप्रियता की अंधी दौड़ में सभी प्रचार प्रबंधक शामिल  हैं और उनके बहस संचालकों पर यह दबाव साफ दिखाई देता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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10/25/13

राजा तो केवल राजा ही होता है-हिन्दी अध्यात्मिक चिंत्तन लेख(raja to kewal raja hi hota hai-hindi adhyatmik chinttan,hindi adhyatmik chinttan lekh)



                        हमारे अध्यात्मिक दर्शन में भगवान को पूज्य और राजा को सम्माानीय माना गया है।  अनेक विद्वान  राजा को भगवान का ही प्रतिनिधि तक मानते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य समुदाय को हिंसक होने से रोकने के लिये राजा ही सबसे बड़े पहरेदार का काम करता है। राजा के पास अनेक प्रकार के दंड हैं जिनका वह प्रयोग प्रजा में अनियंत्रित लोगों की गतिविधियां रोकने के लिये करता है।  मनुष्य समुदाय को नियंत्रित करने के लिये अनेक कानून बनाये गये हैं। इसका कारण यह है कि इस धरती पर विचरने वाले अन्य जीव तो स्वतः ही अपने प्राकृतिक नियमों का पालन करते हैं पर मनुष्य की बुद्धि, देह और मन में इतना लचीलापन है कि उसे नियम बनाकर ही नियंत्रित करना पड़ता है। ऐसा न हो तो मनुष्य पशुओं से ज्यादा हिंसक हो जायें। पेट भरा हो तो शायद बड़ी मछली छोटी को न मारे तथा विश्राम कर रहा सिंह मृग से मुंह फैर ले पर इंसान की प्रवृत्ति ऐसी है कि न उसका पेट भरता है न मन!  धन और रोटी की बहुतायत होते हुए भी वह भविष्य के लिये चिंतित रहता है और हमेशा ही आक्रामक होकर इधर से उधर विचरता है।  उसकी यही सक्रियता अतिरूप लेकर उसे हिंसक बना द्रेती है।
                        राजा को भगवान मानना एक आदर्श राज्य की स्थिति है पर जहां हालत खस्ता है वहां प्रजा राजा को ही दैत्य मानने लगती है।  कहने का अभिप्राय है कि मनुष्य में राजा या राज्य प्रमुंख का दर्जा हमेशा ही ऊचा रहता है। उसके बाद जमीदार, साहुकार तथा अन्य छोटे पदासीन लोग आते हैं। आज के लोकतांत्रिक युग ने मनुष्य समाज की राज्य प्रणाली में अनेेक प्रकार के विरोधाभास उत्पन्न किये है।  स्थिति यह है कि अनेंक वामपंथी विद्वान आधुनिक लोकतंत्र को धनपतियों की छद्म तानाशाही का नाम देकर वाह वाही लूटते है। इसके पीछे वजह यह है कि आधुनिक लोकतंत्र में चुनाव से ही एक सीमित अवधि के लिये कोई भी राज्य प्रमुख पद पर आसीन होता है। चुनाव के लिये प्रचार और प्रबंधन मे ढेर सारा पैसा खर्च होता हैं।  यह पैसा धनपति ही राजसी व्यक्तियों को प्रदान करते है। जब कोई व्यक्ति राजसी पद पर पहुंचता है तब यही धनपति उसे अपनी उंगलियों पर नचाते हैं।  राजसी व्यक्ति की भी मजबूरी होती है क्योंकि उसे अगली बार फिर चुनाव लड़ना होता है।  वामपंथी बुद्धिजीवी मानते हैं कि विश्व में लोकतंत्र के नाम पर पूंजीपतियों के बूत ही सत्ता पर बैठते हैं। इतना ही नहीं अब तो अनेक सामाजिक विद्वान भी उनसे आगे बढ़कर अपराधिक तत्वों के समूहों की राजसी कर्म में लिप्त लोगों पर प्रभाव होने की बात करते हैं।  यही कारण है कि राजसी कर्म में लिप्त उच्च, मध्यम, और निम्न पद पर सक्रिय लोग कम इतराते हैं उससे अधिक तो वह अहंकार दिखाते है जो उनसे संपर्क का दावा करते है।  आजकल पहुंचे लोगों की बजाय उन तक पहुंच रखने वाले लोग समाज में अपने प्रभाव रखने का दावा करते हैं।
                        यह सब ठीक है पर राजा तो राजा होता है। जब तक उसके पूंछ मरोड़ी जाये ठीक है पर जब कोई उसकी गर्दन पर वार करेगा तो उसे अपने बचने की आशा भी नहीं करना चाहिये। पूंजीपति या अन्य बाहुबली लोग अनेक बार यही गलती करते हैं। उन्हें लगता है कि राजसी पुरुष उनके हाथ में है तो कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता यही कारण है कि वह उसके पद को अपना बंधुआ समझकर समाज में व्यवहार करते हैं जो अंततः उनके संकट का कारण बन जाता है।  अनेक पूंजीपति और बाहुबली राजनीति में प्रत्यक्ष सक्रिय नहीं है पर उनको लगता है कि हर राजसी पद उनकी जागीर है पर वह यह नहीं जानते कि राजा तो केवल राजा ही होता है। 
                        भारत में आजकल बहुत उथल पुथल है।  पिछले कुछ समय से अनेक पूंजीपतियों के विरुद्ध राज्य की कानूनी संस्थायें सक्रिय हुईं हैं।  अनेक के विरुद्ध मामले दर्ज हुए हैं। इसे लेकर उनके पालतू प्रचार समूह देश की आर्थिक प्रतिष्ठा पर संकट खड़ा करते हैं।  उनका मानना है कि सभी पूंजीपति विश्व में प्रतिष्ठत हैं और भारत की पहचान उनसे है।
                        हम उनसे सहमत नहीं है।  भारत की पहचान यहां के किसी आर्थिक शिखर पुरुष के कारण हो ही नहीं सकती। यहां की पहचान भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के कारण है जो त्याग का संदेश देता है। भोगी कभी बड़ा नहीं हो सकता भले ही वह कितना भी दावा कर ले।  दूसरी बात यह है कि पूंजीपतियों ने अपने समाज के साथ कभी मैत्रीपूर्ण व्यवहार नहीं किया। आर्थिक नीतियों और कार्यक्रमों को अपने हितों के अनुकूल बनवाने के बाद उन पर अमल के लिये राजसी पुरुषों पर दबाव डाला।  इस कारण आम इंसानों के हाथ से आर्थिक स्वामित्व निकलकर इन पूंजीपतियों के पास चला गया। लधु उद्योग तथा व्यापार में लोग निरुत्साहित हुए हैं। स्थिति यह है कि छोटे और मध्यम व्यापार में लगे लोगों के बच्चे नौकरियों के लिये लालाचित हैं।  इससे समाज का प्राचीन स्वरूप विघटित हुआ है।  अपने को समाज से प्रथक समझने वाले इन पूंजीपतियों पर जब संकट आया है तो वह विश्व बिरादरी में प्रतिष्ठा का वास्ता दे रहे हैं क्योंकि उनको पता है कि राष्ट्रीय समाज में हमारी विश्वसनीयता नहीं रही।  उन्हें यहां के लोगों से सहानुभूति नहीं मिलने वाली।  इधर राजसी पुरुषों को हर हाल में अपने ही समाज से जुड़े रहना है इसलिये वह अधिक देर तक इन पूंजीपतियों का साथ नहीं निभा सकते।  ऐसे में एक द्वंद्व चल रहा है।
                        राज्य का दायित्व निभाने वालों से हमेशा ही आम इंसान की रक्षा की आशा की जाती है।  वह अपने इस  कर्तव्य से हमेशा ही विमुख होकर नहीं चल सकते। यही बात धनपतियों और बाहुबलियों को समझ लेना चाहिये।  हमारे यहां कहा भी जाता है कि समाज के पहरेदार किसी के सगे नहीं होते और राजा सबसे बड़ा पहरेदार होता है इसलिये वह लंबे समय तक अपने ही सगे लोगों की अनियमित गतिविधियां बर्दाश्त नहीं कर सकता।


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10/15/13

अपने इष्ट के गुणों का भी स्मरण करें-हिन्दी चिंत्तन लेख (apne isht ke gunon ka bhee smaran karen-hindi chinttan lekh,hindi thought aritcle)



                        बुद्धि की देवी सरस्वती का वाहन हंस और धन की देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू माना जाता है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में इन धार्मिक प्रतीकों का  रहस्यमय माना जाता है। इस पर अनेक विद्वान अपने अपने ढंग से तर्क देते हैं।  कुछ कथाकार इन पर चर्चा चुटकुले की तरह करते हैं तो कुछ इसकी व्याख्या इस तरह करते हैं जो तार्किक तो लगे पर इसका रहस्य नहीं खोलती।  हमारा मानना है कि कहीं न कहंी इस तरह के प्रतीकों का सांकेतिक महत्व भी है जिन्हें समझा जाना चाहिये।
            हम पहले हंस के गुणों पर विचार  करें। हंस मोती खाता है। उसका खाना सात्विक है। अगर वह सात्विक भोजन करता है तो उसकी बुद्धि भी सात्विक होनी ही चाहिये। श्रीमद्भागवत गीता में भोजन के आधार पर ही सात्विक, राजसी और तामसी प्रवृत्तियों की पहचान दी गयी है।  सात्विक व्यक्ति की बुद्धि स्वतः शुद्ध रहती है। हंस का पक्षियों में श्रेष्ठ माना जाता है। इसलिये नहीं कि वह मोती खाता है बल्कि इससे उसकी बुद्धि श्रेष्ठ रहती है। श्रेष्ठ बुद्धि हंस की पहचान है।  यही कारण है कि अनेक ज्ञानी मानस हंस की उपाधि से विभूषित किये जाते हैं।
                        लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू है।  उल्लू रात में देखता है और सूरज की रौशनी में वह अंधा हो जाता है। सच बात तो यह है कि धन उनके पास ही बहुतायत मात्रा में आता है जो उसके लिये ही लालायित रहते हैं। संतोषी सदा सुखी रहता है पर हम भौतिकतवाद के सिद्धांत को देखें तो उसके पास धन अधिक नहीं हो सकता।  हमारे यहां एक अभिनेता एक विज्ञापन में प्रचार करते हुए यह बताता है कि संतुष्ट नहीं रहना चाहिये, वरन् असंतुष्ट व्यक्ति ही विकास करता है।  धन के लोभी कभी संतुष्ट नहीं होते। उल्लूओं की तरह हमेशा ही उनको ज्ञान के अंधेरे में रहकर ही विकास का मार्ग मिलता है।  धन के लिये आदमी जब सब कुछ दाव पर लगाता है तभी उसे उस तरह का वैभव मिलता है जिसे लक्ष्मी की कृपा कहा जाता है।  कहा भी जाता है कि लक्ष्मी संतों की दासी और लोभियों की स्वामिनी होती है।  लक्ष्मी जी उल्लू की सवारी करती हैं इसलिये उल्लू प्रकृत्ति के लोग ही उनका सानिध्य पाते हैं।  यह अलग बात है कि सामान्य लोग धनपतियों को ही विद्वान और बुद्धिमान मानते हैं।
                        वैसे विश्व में व्याप्त वातावरण के असंतुलन  ने हंसों तथा उल्लुओं की संख्या को सीमित कर दिया है।  लोभियों ने दोनों को ही नहीं छोड़ा है।  पेड़ पौधों को काटकर लोभियों ने पत्थर के जंगल खड़े कर दिये हैं और आदमी चूहों की तरह उनके पिंजरे में फंसता जा रहा है। प्रसंगवश चूहा गणेशजी की सवारी है।  गण्ेाश जी जहां समाज में सर्वश्रेष्ठ देवता की तरह पूजित हैं वहीं उनका वाहन चूहा थलचरों में सबसे निकृष्ट माना जाता है।  गणेश जी विवेक के प्रतीक हैं और विवेकवाान मनुष्य सहजता से कहीं किसी लोभी के जाल में सहजता से नहीं फंसता जबकि चूहा रोटी के टुकड़े की लालच में पिंजरे में जाकर कैदा होते देखा जा सकता है।  धन की लालच में फंसे लोगों को चूहा भी कहा जाता है।
                        इस तरह के विरोधाभास समाज में इसलिये देखे जाते हैंे क्योंकि लोगों ने बौद्धिक आलस्य की नीति अपना ली है। उनकी सोच केवल अपने मतलब तक ही सीमित है।  अपने लक्ष्य के लिये उन्हें जो मार्ग दिखाई देता है उसी पर ही वह चल पड़ते हैं।  देशकाल, समय, वातावरण तथा स्थितियों का आंकलन केवल ज्ञान साधक ही करते हैं।  अति सर्वत्र वर्जियते का सिद्धांत सभी जानते हैं पर अपने कृत्य की सीमा तय नहीं करते।  सबसे बड़ी बात तो भगवान के विभिन्न स्वरूपों को पूजते हैं पर उनके गुणों पर विचार नहीं करते। जो लोग चाहते है कि उनका जीवन सुखमय हो वह जिन देवों को पूजते हैं उनके गुणों पर भी मन ही मन आत्मचिंत्तन करें।  कहा जाता है कि जिस इष्ट का हम गुणों सहित स्मरण करते हैं वह हमारे अंदर भी आ ही जाते है।  अपने अंदर गुण स्थापित करने का यही तरीका श्रेष्ठ है। जहां तक निराकार ज्ञान साधकों का प्रश्न है वह ध्यान आदि के माध्यम से अपने अंदर अनेक गुणों का सृजन स्वयं ही कर लेते हैं।
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