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1/9/15

कातिल दिमाग-हिन्दी कविता(qatil dimag-hindi kavita)



कातिल दिमाग है जिसका
उसे शिकार का
कोई भी बहाना चाहिये।

हर मर्ज की दवा
मिल जाती बाज़ार में
बीमारी से मरने के लिये
जो तैयार है उसे
कोई भी बहाना चाहिये।

कहें दीपक बापू खूनखराबे पर
आमादा लोगों से
इंसानियत की उम्मीद बेकार है
जिन्हें जंग लड़ना है
हजारों तरीके ढूंढ लेते
हथियार चलाने के लिये
कोई भी बहाना चाहिये।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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12/24/14

मन माया और मय के खेल योग साधना से ही जीता जा सकता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(man aur maya ke khel yoga sadhana se hee jeete ja sakte hain-hindi thought article)



            हमारा मानना है कि मन, माया और मय के विचित्र खेल को योगी ही समझ सकता है। यह तीनों उतार चढ़ाव या कहा जाये अस्थिर प्रकृति के हैं। मन पता नहीं कब  कहां और कैसे मनुष्य को चलने के लिये बाध्य कर दे। माया पता नहीं कब हाथ आये और निकल जाये।  मय का नशा चढ़ता है फिर उतर भी जाता है। अंतर इतना है कि मनुष्य देह में स्थित मन ही है जो माया और मय के पीछे भागता है।  इस तरह उसे सहज लगता है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में कहा जाता है कि मन पर नियंत्रण कर उसका स्वामी होने मनुष्य  प्रसन्न रह सकता है पर वह इसके विपरीत स्वयं बंधुआ बन जाता है जिससे जीवन में उसकी स्थिति उस मोर की तरह हो जाती है जो नाचने के बाद अपने गंदे पांव देखकर रोता है। मनुष्य भी एक के बाद एक भौतिक उपलब्धि प्राप्त करता है पर तन और मन पर आयी थकावट उसे कभी अपनी ही सफलता का पूर्ण आनंद नहीं लेने देती। एक सामान मिलने पर वह  दूसरी, तीसरी और चौथी की कामना होने से  वह भागता रहता है।  चिंत्तन के लिये उसे समय ही नहीं मिलता। सामानों से सुख नहीं मिलता यह अंतिम सत्य है।  सुख कोई बाहर लटकी वस्तु नहीं है जो हाथ लग जाये।  सुख तो एक अनुभूति जो अंदर प्रकट होती है।
            इस संसार को समझने के लिये बाह्य विषयों पर दक्षता से अधिक अपनी ही इस देह रूपी क्षेत्र को जानने की आवश्यकता है। यह योग साधना से ही पूरी हो सकती है।  योग साधना का विषय ऐसा है जिसमें एक बार अगर सिद्धि मिल जाये तो फिर संसार के सभी विषयों का सत्य सहजता से समझा जा सकता है।  एक योग साधक के खाने का भूख से और पानी पीने का प्यास से संबंध नहीं होता। वह  भोजन दवा की गोली या कैप्सूल की तरह यह सोचते हुए उदरस्थ करता है कि कहीं आगे भूख आक्रमण न करे।  वह समय तय कर लेता है कि निश्चित समय पर वह भोजन करेगा चाहे भूख लगे या नहीं।  वह पानी भी दवा की तरह पीता है ताकि उससे प्राणवाणु सहजता से देह में प्रवाहित होती रहे।  एक पारंगत योग साधक भोजन और जल का सेवन करते हुए भी भूख प्यास के अधीन नहीं होता। इससे वह सांसरिक विषयों में भी दृढ़ता पूर्वक निर्लिप्त भाव से स्थित हो जाता है।
            मनुष्य के बाह्य चक्षु सदैव बाहर के विषयों पर केंद्रित रहते हैं इसलिये बुद्धि भी केवल उन्हीं का चिंत्तन करती है।  मन भी विषयों में इतना अभ्यस्त हो जाता है कि मनुष्य परमात्मा की कृपा से प्राप्त इस देह का महत्व नहीं समझ पाता।  देह के बाह्य विकार जल और साबुन से नष्ट किये जा सकते हैं पर अंदर स्थित दोषों के निवारण का उपाय केवल योग साधक ही कर सकता है। सच यह है कि देह के बाह्य विकार भी आंतरिक दोषों से उत्पन्न होते हैं।  आंतरिक दोषों से मन और बुद्धि भ्रमित होती है और अंततः तनाव चेहरे पर प्रकट होता ही है। ऐसा नहीं है कि योग साधक कभी विकार या तनाव ग्रस्त नहीं होते पर वह आसन, प्राणायाम तथा ध्यान की कला से उनका निवारण कर लेते हैं।
            हमारे देश में योग साधना सिखाने वाले बहुत से विद्वान और संस्थान सकिय  हैं पर भारतीय योग संस्थान के शिविरों में  सक्रिय विशारद निष्काम भाव से जिस तरह यह काम करते हैं वह प्रशंसनीय है। सबसे बड़ी बात यह कि वहां निशुल्क सेवा होती है।  शुल्क लेना और देना माया का ही रूप है। भारतीय योग संस्थान के साथ जुड़ने अनेक साधकों के विभिन्न कार्यक्रमों मिलने जो सुखद अनुभव होता उसका शब्दों में वर्णन करना संभव नहीं है।  इस तरह का सत्संग दुर्लभ होता है।  हम अन्य कार्यक्रमों में सामान्य लोगों से मिलते हैं तो सांसरिक विषयों पर उबाऊ चर्चा होती है पर योग साधकों से मिलने पर हुई योग विषय पर चर्चा अध्यात्मिक शांति मिलती है। तब यह ज्ञान सहज रूप से होता है कि माया, मन और मय के खेल से बचने के लिये योग साधना से बेहतर उपाय नहीं हो सकता।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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12/17/14

इंसानियत का प्रश्न-हिन्दी कविता(insaniya ka prashna-hindi poem)



चालाक और क्रूर इंसान के लिये

पूरा ज़माने के

सभी लोग खिलौना है।



कभी खून बहाते

दिल से उसमें नहाते

इंसानियत का प्रश्न

उनके सामने बौना है।



कहें दीपक बापू हथियारों पर

चलती है जिनकी जिंदगी

दया का अर्थ नहीं जानते,

खून और पानी में

अंतर नहीं मानते,

मिलाकर हाथ उनसे

अपना सुकून खोना है।
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12/12/14

यायावरी में अधिक आनंद-हिन्दी कविता(yayawari mein adhik anand-hindi poem)



डरे सहमे और

अकेलेपन से घबड़ाये लोग

समूह में रहते हैं।



समूह के सरदार

चाहे न हों असरदार

फिर भी उनमे मुख की तरफ

निहारते हुए

उनके नखरे सहते हैं।





कहें दीपक बापू यायावरी में

अधिक आनंद मिलता है,

बंधनों में तो मन

नियमों की चोट से हिलता है,

स्वर्ग इस धरती पर है

उन वीर पुरुषों के लिये

जीवन की धारा में

मुक्त भाव से जो बहते हैं।
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12/5/14

अपने अंदर गुण की स्थापना आवश्यक-हिन्दी चिंत्तन लेख(apne andar gun ki sthapna aavashyaka-hindi thought article)




            मनुष्य देह त्रिगुण से प्रभावित है, यह ज्ञान और विज्ञान का श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित सिद्धांत है।  इस सिद्धांत को रटकर सुनाने वाले बहुत हैं पर आशय समझने और समझाने वाले कहीं दिखाई नहीं देते।  अगर श्रीमद्भागव् गीता के सिद्धांतों का वैज्ञानिक पक्ष समझ लिया जाये तो फिर जीवन की धारा ही बदल जायेगी।
            हम अक्सर यह सोचते हैं कि अच्छा बोला, सुना और देखा जाये ताकि जीवन के वास्तविक आनंद की अनुभूति हो।  इसके लिये आवश्यक है हम यह माने कि हम आत्मा हैं और उस देह को धारण किये हैं जिसके ‘स्वयं’ होने का भ्रम बोध हो रहा है। आत्मा और देह में भेद का आभास भी योग साधना के निरंतर अभ्यास करने पर तब पाया जा सकता है जब हम इंद्रियों का संयोग करने के चरम शिखर पर पहुंच जाते हैं। मूल रूप से मन और बुद्धि देह का भाग हैं पर योग साधना से  जब आत्मा उनके संपर्क में आता है तब वह स्वयं भी विचार करता है।  वह निष्कर्ष निकालता है। अगर यह संयोग न हो तो आत्मा न तो विचार करता है न कोई निर्देश दे पाता है।  कष्ट आने पर यह सोचकर व्यथित होता है कि उसके पास मन और बुद्धि का अभाव है।  जब आत्मा का इंद्रियों से संयोग हो जाता है तब इस बात की अनूभूति हो जाती है कि बाह्य तत्वों के प्रभाव से ही कोई गुण अंदर आ सकता है।
            हम जब यह कहते हैं कि प्रेम से बोलना, अहिंसा में रत रहना तथा निर्लिप्त भाव से कर्म करना चाहिये। हमारे यहां कदम कदम पर ज्ञान बघारने वाले हैं पर फिर भी समाज मानवीय सिद्धांतों के पालन में पिछड़ रहा है।  योग विज्ञान से परे सद्गुणों का महत्व तो बखान करते हैं पर उनको धारण करने की कला नहीं आती।  हम शराबियों, जुआरियों तथा लोभियों  के बीच जीवन बिताते हुए  व्यसनों के दुष्प्रभाव बखान करते हैं।  फिल्म, टीवी अथवा मनोरंनज के साधनों मे समय बिताते हुएं और समाज के लिये अध्यात्मिक दर्शन आवश्यक मानते हैं।  जो ज्ञान कहीं से सुना तो दूसरे को सुना दिया। मान लेते हैं कि किसी ने ज्ञान सुनाया तो वह  हमने दूसरे को सुनाकर अपना धर्म निभाया इसलिये हम ज्ञानी हैं। धर्म का संबंध केवल कर्मकांडों से जोड़न के कारण ज्ञान के सिद्धांतों को धारण कर उस राह पर देह को चलाने की  हमारे अंदर शक्ति   तथा संकल्प का अभाव हो जाता है। श्रीमद्भागवत् गीता में धारणा शक्ति का वैज्ञानिक वर्णन किया गया है।
            हम अगर संकल्प धारण करें तो कुछ गुण आंतरिक तथा कुछ बाह्य तत्वों से जुड़कर प्राप्त कर सकते हैं। अच्छा बोलने के लिये वैसा पढ़ना और सुनना जरूरी है।  अच्छा देखने के लिये आंतरिक चक्षु के साथ देह का संपर्क करने पर ही यह इच्छा पूरी हो सकती है।  हम आत्ममुग्ध होकर यह कभी न सोचें कि हम गुणवान हैं।  हमें इस बात पर चिंत्तन करना चाहिये कि हमारे आसपास सक्रिय वातावरण, व्यक्ति, विषय और और वस्तु अगर दुष्प्रभाव डालने वाली है तो हम चाहें भी तो उससे बच नहीं सकते।  उनके संपर्क का दुष्प्रभाव हम पर पड़ता है पर आत्मचिंत्तन के अभाव में हम उसे देख नहीं सकते।  जब आत्मचिंत्तन करते हैं तब ऐसे तत्वों से संपर्क रखने का विचार छूट जाता है। यह ज्ञान इंद्रियां ही विषयों तथा गुण ही गुणों में बरतते का सिद्धांत समझने पर ही आता है। अपने अंदर गुण पैदा करने के लिये आसपास सक्रिय वातावरण, विषय, वस्तु तथा व्यक्तियों की  श्रेणी पर अवश्य विचार करना चाहिये।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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11/17/14

नये संकटमोचकों के नाटक-हिन्दी कविता(naye sankatmochokon ke natak-hindi poem)



सुनते थे संकट में

सर्वशक्तिमान हमेशा

भक्तों को बचाने आते हैं।


शायद यह सतयुग की बात होगी

कलियुग में इंसान से

 सर्वशक्तिमान बने लोग

अपने पाप छिपाने के लिये

भक्तों की भीड़

आश्रम पर लगाते हैं।


कहें दीपक बापू भक्ति का भ्रम

शराब और सिगरेट से

ज्यादा खराब होता है,

मन में बुरे इष्ट स्मरण से

मनुष्य का विवेक बर्बाद होता है,

मोह और माया के जाल में फंसे

कथित नये सर्वशक्तिमान

कभी संकट मोचक नहीं बनते

जब तक तबाह न हो जाये भक्त

बचाने का नाटक ही रचाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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11/8/14

चुबंन लेना और देना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख(chumban lena aur dena swasthya ke liye hanikarak-hindi vyangya chinttan lekh,kiss and love-hindi satire thought article)



         नई दिल्ली में इश्क के चुंबन का सार्वजनिक प्रदर्शन एक राष्ट्रवादी संस्था के  मुख्यालय पर एक युवा संगठन करवा रहा है जो उसके प्रतिद्वंद्वी या विरोधी विचाराधारा का पोषक माना जाता है।  इसमें शुद्ध राजनीति लक्ष्य दिख रहा है। यह प्रदर्शन केरल तथा पश्चिम बंगाल में सार्वजनिक रूप से चुंबन प्रदर्शन की घटनाओं  विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप हो रहा है जहां उस राष्ट्रवादी संस्था का प्रभाव अधिक नहीं है।  इसलिये कुछ लोगों को शक भी हो सकता है कि उत्तर भारत के युवाओं के हृदय में इस राष्ट्रवादी संस्था  के प्रति नकारात्मक भाव  पैदा करने के लिये किया जा रहा है। इसका कारण यह भी है कि टीवी  पर चल रही बहस में इसी प्रदर्शन में शामिल कुछ युवतियों ने सार्वजनिक रूप से इश्क प्रदर्शन को आपत्तिजनक माना।  हालांकि वह समाज पर भी आरोप लगाती रहीं। उनका अन्यमयस्क बयान इस बात का प्रमाण था कि वह प्रदर्शन में किसी विचार की बजाय अन्य प्रभाव में आयी हैं।
        आजकल इश्क को लेकर हमारे प्रचार माध्यम ज्यादा सजग हैं और जब कोई मामला होता है तो उन्हें खलपात्र के रूप में राष्ट्रवादी संस्था और नायक के रूप में प्रगतिशील या जनवादी संगठन प्रतिष्ठित करने होते हैं। हम जैसे अध्यात्मिक साधकों  के लिये ऐसी घटनायें  अपने ज्ञान तथा विज्ञान के सूत्रों के आधार सामाजिक चिंत्तन करने का अवसर पैदा करती हैं। हमें यह तो नहीं मालुम कि ‘प्यार, इश्क और लव युवा स्त्रियों और पुरुषों के बीच ही हो सकता है यह अन्य संबंधों में इनका अस्तित्व हो सकता है पर इतना जरूर मानते हैं कि प्रेम केवल परमात्मा से ही हो सकता है। इस जीवन में दैहिक तथा सांसरिक रिश्ते तो स्वार्थ के अनुसार बनते बिगड़ते रहते हैं। कहीं हम अपने स्वार्थ से रिश्ते बनाकर बाद में तोड़ते हैं तो कहीं हमारे साथ ऐसा ही प्रसंग सामने आता है-यह अलग बात है कि दूसरे के दर्द का पता नहीं होता पर अपने पर कराहने के अलावा कुछ नहीं कर पाते।
        इस पर चल रही बहस में तर्क हमने सुने तो यह देखकर हैरानी हुई कि इस प्रदर्शन के विरोधियों के पास जहां संस्कृति की रक्षा के नारे के अलावा कुछ नहीं होता तो समर्थकों के पास कथित स्वतंत्रता की दुहाई देते रह जाते हैं।  अब यह टीवी चैनलों ने शालीनता की सीमा तय की है यह सामाजिक विद्वान उससे आगे जाकर बहस नहीं करना चाहते इसका पता नहीं।  जहां तक चुंबन के दृश्य की बात है तो यह दृश्य तब श्रृंगार रस की अनुभूति कराता है जब कोई मां अपनी गोद कें बच्चे का लेती है।  विश्व में यही एक संबंध है जो परमात्मा और भक्त के संबंध की बराबरी कर सकता है।  मां के हृदय  बच्चे  के भाव को ं स्नेह होता है और बच्चे में  मां के प्रति भाव को सम्मान कहा जाता है।  यह दोनों शब्द प्रेम के सहधर्मी सकते हैं पर पर्यायवाची नहीं माना जा सकता है।
        बहरहाल शालीनता और अश्लीलता के बीच चल रहे इस वाद विवाद में हमारा मानना है कि बहस खुलकर होना चाहिये।  हमारा मानना है कि अगर किसी के कृत्य  से जब तक  अन्य व्यक्ति को दैहिक हानि नहीं पहुंचती तब तक राजकीय हस्तक्षेप नहीं हो।  मानसिक कष्ट पहुंचने वाली बात स्वीकार नहीं है।  लोग अपना मन स्वयं संभालें दूसरे का जिम्मा नहीं है।  अक्सर हम दैहिक व्यापार तथा जुआ में लिप्त लोगों के पकड़े जाने की बात हम सुनते हैं पर हमारा मानना है कि ऐसे लोग स्वयं के लिये ही संकट हैं।  अनेक बार मादक द्रव्य पदार्थों का सेवन करते हुए नाबालिग बच्चे भी पकड़े गये।  हमारा मानना है कि यह जिम्मा समाज और परिवार का है।  राज्य का काम है विकास तथा प्रजा की रक्षा जिनका इस तरह के अपराधों से कोई संबंध नहीं जिनमें लगा व्यक्ति दूसरे के लिये कम अपने और परिवार के लिये ज्यादा घातक है। समाज सुधारने से पहले व्यक्ति को सुधरा होना चाहिये और इसका सबसे बड़ा दायित्व परिवार का है।
        हमने देखा कि राष्ट्रवादी विचारकों के पास भी तर्क कम ही होते हैं। उन्हें यह पता है कि पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित एक वर्ग भारतीय परंपराओं का केवल नारों के आधार पर विरोध करता है। वह शांति से नारे लगाता है तो राष्ट्रवादी भी धर्म और संस्कृति का नारा प्रतिकार में लगा देता है। कभी कभी क्रोध का प्रदर्शन भी करता है जिससे अंततः अपने ही अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति अनभिज्ञता को उजागर करता है। प्यार के चुंबन लगाने वालों के पास जाकर उनसे ऐसा न करने की याचना करना या धमकाना व्यर्थ है उन्हें तो  यह बताना चाहिये कि चुंबन तो प्यार, लव या इश्क तो स्त्री पुरुष के प्राकृत्तिक संबंधों की पूरी फिल्म का प्रारंभ भर है उससे की आगे अगर कोई दृश्य हो तो वह भी दिखाओ। एक डेढ़ हजार प्रदर्शनकारी उसमें भी अधिकतर  अपने समाज सुधारक ठेकेदारों के बंधुआ बनकर आये लोग उनके विचार ही नहीं जानते, पीछे छिपे आत्म प्रचार पाने के उनकी भूख की समझ कहां से लायेगा?
        हमें पता है कि हमारे देश के लड़के और लड़कियां भले ही अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा में फंसे हैं पर फिर भी भारतीयता का भाव उनके अंदर समाप्त नहीं हुआ। ऐसे प्रदर्शन बड़े शहरों में वह भी प्रसिद्ध तथा आकर्षक स्थानों पर हो रहे हैं उससे यह तो साबित होता है कि भारतीयों में अभी अपने अध्यात्म का ज्ञान और जीवन की संस्कृति बनाये रखने का भाव अभी मरा नहीं है। विभिन्न दिवसों पर मंदिरों में जाकर अपनी धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत युवक युवतियों को देखकर यह बात कोई भी समझ सकता है। आखिरी बात यह कि चुंबन लेना या देना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है यह बात स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते रहे हैं। बरसों पहले हमने पढ़ा था कि चुंबन लेने वाला को तो कुछ नहीं देने वाले की पांच मिनट उम्र कम हो जाती है। प्रदर्शनकारियों के सामने यही नारा लगाना चाहिये कि ‘चुंबन लेना और देना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है’ न कि उसके सार्वजनिक प्रदर्शन पर रुदन या क्रोध करना चाहिये। 
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10/7/14

उम्र के आईने में-हिन्दी कविता(umar ke aaine mein-hindi poem)


अपनी जिंदगी
एक धारा में बहती
सभी को नज़र आती है।

यह अलग बात है
आंखें  तो टुकड़ों में ही
गुजरते पल संजो पाती है।

बुद्धि की गति
इतनी  हो गयी असंतुलित
गम पर निकलते आंसु
हास्य पर हंसी
कभी नहीं आती है।

कहें दीपक बापू बदहवास लोग
उम्र के आईने में देखते रहते
उनकी अपनी ही शक्ल
शनैः शनैः धुंधली हो जाती है।
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9/20/14

दृश्य और मानस-हिन्दी कविता(drishya aur manas-hindi poem)



समाचार चैनल देखो
लगता है पूरा ज़माना
विकास या विनाश के पीछे
भाग रहा है।

अध्यात्मिक चैनल पर
करते ध्यान तो लगता है
पूरा ज़माना ज्ञान की
प्रतीक्षा में जाग रहा है।

मनोरंजन चैनल पर जायें
ऐसा लगता है कि
पूरे ज़माने के हाथ
हथियार से सजे हैं
हर कोई गोली दाग रहा है।

कहें दीपक बापू लगाते ध्यान
आंखें बंद अदृश्य संसार
मस्तिष्क से पर होते विचार
शोर से मुक्त कान
मौन की अनुभूति मेें
प्रतीत होत है
ज़माने में हर इंसान के
हृदय में बसा शांति का राग है।
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