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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

6/15/07

नारद- अपनों से अपनी बात

इस समय मैं नारद पर चल रहे विवाद को देख रहा हूँ , मैंने पहले इस विषय से परे रहने का निर्णय लिया पर फिर लगा कि उन बातों की तरफ अपने मित्रों,साथियों और पाठको को ध्यान दिलाऊँ जिन पर किसी ने अपनी दृष्टि नहीं डाली-और डाली भी होगी तो मेरे ध्यान में नहीं आयी।

आपको अपने निज-पत्रकों (ब्लोग)में शीर्षकों में बल्कि दुसरे के यहाँ पर जाकर कमेन्ट लिखने में भी भाषा का ध्यान तो रखना ही होगा-भले भी उसका लेखक आपका बहुत अच्छा मित्र हो। आप उस पर जाने वाले अकेले व्यक्ति नहीं होते और उस पर अन्य लोग भी जाते हैं और पर उस कमेन्ट का भी प्रभाव होता है । स्वभाव और विचार की दृष्टि से सब लोग अलग-अलग होते हैं -अगर इस क्षेत्र में आकर किन्हीं लोगों का आपस में दोस्ताना हो गया तो अच्छी बात है पर टिप्पणी के वक्त उसे भूल जाये तो आप अपना और अपने उस मित्र का भला ही करेंगे । अगर उस पर किसी कमेन्ट का किसी भद्र पुरुष या महिला के दिमाग पर विपरीत प्रभाव पडा तो आप और उस मित्र का ब्लोग उनके लिए अगम्य और अपठनीय हो जाएगा । खासतौर से अगर इस बात का ख़्याल रखें कि इस क्षेत्र में महिलाये भी हैं और जो शिष्ट और सहज भाषा के उपयोग को अधिक पसंद करती हैं -हम पुरुषों से कहीं ज्यादा । आप अपना आलेख, काव्य या कमेन्ट लिख रहे हैं तो इस बात को ध्यान में रखें कि वह महिलाओं के दृष्टि भी उन पर पडेगी । किसी के निज-पत्रक (ब्लोग ) पर मजाक की बात लिखना भी मुझे गलत लगता है -क्योंकि यह उन पढने वालों के साथ अन्याय है जो इस पसंद नहीं करते। कोई अपने ब्लोग पर मजाक लिखता है -वह भी शालीनता की परिधि में-तो वह चलेगा पर आप भी उस पर शालीनता के साथ ही कमेन्ट करें। तो सही रहेगा ।

कुछ लोगों को मेरी यह बात अनर्गल लग सकती है ,पर मैं व्यवाहारिक बात कर रहा हूँ।कुछ लोग मजाक पर खामोश रह जाते हैं तो लगता है कि उसने हमारी बात को पसंद किया-यह बात समझ लेना चाहिऐ कि और मजाक न बने इसीलिये वह लोग विरोध नहीं करते।अपना मजाक उडवाना भला किसे पसंद आता है ।

निज पत्रकों के शीर्षकों में भी कुछ लोग विवाद उठा रहे हैं । मैं किसी विवाद में न पड़कर अपने मित्रों से कहना चाहूंगा कि हिंदी दुनिया की एक मात्र ऎसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है। हम जैसा लिख रहे हैं वैसा ही बोल रहे हैं-आपके निज पत्रक (ब्लोग)का शीर्षक आपके व्यक्तित्व की पहचान होता है। ऐसे कई लोग हैं जो उन्हें देखते हैं और प्रभावित होते हैं। अब किस पर क्या प्रभाव होता है वही बता सकता है, पर आप उनके बारे में सोचते हुए शीर्षक रखें तो अच्छा रहेगा-नारद के लोग भी बाद में आपत्ति उठाने की बजाय पहले ही उसमें सुधार करवाये तो ठीक रहेगा। तीखे शब्द अपना प्रभाव तीव्र रुप से डालते हैं पर अपनी आभा खोते भी जल्दी हैं । शब्द सहज हौं और भाव तीखा तो लोग उसकी वाह-वाह करते हैं क्योंकि वह हृदयंगम होते हैं ।

मैंने कुछ निज पत्रकों (ब्लोग)को देखा है, उन्हें सजाने में इतने मेहनत की गयी हैं कि दिल देखकर खुश हो जाता है, पर उनके शीर्षक देखकर लगता है कि उन्हें भी सहज और आकर्षक होना चाहिए था। लिखने में उन लोगों के प्रयास भी सराहनीय नहीं होते और भाषा सौन्दर्य भी इतना कि मन खुश जाये पर कभी-कभी उनके विषय निजी और संकुचित दायरे में देखकर निराशा होती है । मुझे लगता है के वह इससे बेहतर कर सकते हैं और पाठक के रुप में मुझे और भी मजा आ सकता है ।

"नारद" जब स्थापित हुआ होगा और आज जो उसका स्वरूप है इसे बीच में बहुत से परिवर्तन आये होंगे और भी आएंगे-हो सकता है इस जैसे और भी मंच बने ,पर इसका महत्त्व ख़त्म नहीं होने वाला । नारद के कर्णधारों में एक सज्जन मेरे लिए मित्र बन गये हैं-उनके सहयोग से मैं इस सीखते-सीखते इस मंच पर आया, हम कभी मिले नही है और वह कभी-कभार मेरे निज-पत्रक पर कमेन्ट देते रहते हैं। इसके बावजूद एक बात मैं स्पष्ट कहूंगा कि नारद की लेखकों को एक मंच पर लाने भले ही बहुत बड़ी भुमिका रही है पर अब वह इसे बिखेर नही सकता, क्योंकि जिन्हे एक दुसरे को पढने की आदत हो गयी है वह कहीं भी एक दुसरे को ढूँढ निकालेंगे, पर केवल हम इसीलिये अतिआत्म्विश्वास में इसकी अनदेखी करें तो वह गलत होगा। हम सब एक-दुसरे से जुडे हैं यह हमारा भाग्य है पर हमें एक दुसरे के जज्बातों पर ध्यान देना चाहिऐ -और खासतौर से वह महिला लेखकों की बढती संख्या देखकर हमे अपने शब्दों के चयन में सतर्कता बरतनी होगी -लिखने और कमेन्ट देने में भी । आप यह कह सकते हैं कि हमारा ब्लोग हैं हम कुछ भी लिखें पर अगर आपसे पूछा जाये कि आप अपने पढने वालों के जज्बातों का ख्याल करेंगे या नहीं ? आप यह सवाल अपने से करके देखे। आप नहीं करेंगे तो नारद के कर्णधारों को करना ही पडेगा ,यह अलग बात है कि ऎसी बातों के लिए कहीं न कहीं उनकी गलतिया को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ।

मैं एक लेखक हू और चाहता हूँ कि और लेखकों का-जो इस विवाद से त्रस्त हुए है -मनोबल बना रहे। इसीलिये यह लेख लिख रहा हूँ । यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि मेरे साथ सब लोगों का व्यवहार शिष्ट रहा है-किसी ने मेरे निज-पत्रक पर मजाक या कमेन्ट नहीं लिखा और मेरे लिए सब मित्र हैं और अगर मैं उन्हें अपने विचारों से अवगत नहीं कराऊँ तो भी तकलीफ होगी।

8 comments:

Shastri J C Philip said...

गजब का विश्लेषण है दीपक ! ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहो.

संजय बेंगाणी said...

सही है.

Aflatoon said...

लेखक के नाते निजी पत्रक लेखन पर आपके विचार हर प्रकार के लेखन के लिए अनुकरणीय हैं। साधुवाद।

Sanjeet Tripathi said...

बढ़िया लिखा है आपने!

अतुल शर्मा said...

बहुत ही सरलता से आपने समझाया। ऐसा ही होना चाहिए।

Sagar Chand Nahar said...

बिल्कुल सही कहा, मुझसे ज्यादा इस बात को कौन समझ सकता है।

Shrish said...

सही कहा दीपक जी। नारद द्वारा लिया गया निर्णय एकदम सही है जो कि समय की कसौटी पर कसा जाएगा।

रजनीश मंगला said...

सभ्य भाषा का उपयोग तो हर हाल में उपयुक्त है लेकिन इसके लिए बार बार महिलाओं का वास्ता दिया जाना कुछ ठीक नहीं लगता।

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