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6/15/11

खग्रास चंद्रग्रहण एक सामान्य प्राकृतिक घटना है-हिन्दी महालेख (khagras chandragrahan-hindi mahalekh

    दुनियां में सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण आते रहते हैं। बरसों से हम देख रहे हैं पर इतनी चर्चा कभी नहीं होती थी। बचपन में बुजुर्गों के पहले ही पता चल जाता था कि अमुक तारीख को सूर्य ग्रहण या चंद्रग्रहण है। उस दिन कुछ सावधानी बरतने की बात कही जाती पर वह आज के टीवी चैनलों की तरह महाबहस का विषय नहीं होती थी। सच कहें तो सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण को सामान्य घटना ही माना जाता था। कहीं आतंक या डर का माहौल नहीं देखा। आजकल   टीवी चैनलों ने दोनों ग्रहणों का बाज़ारीकरण कर दिया है।
         कह रहे हैं कि डरो नहीं, खूब देखो। कुछ परेशानी नहीं है। इन चैनलों पर बहस के लिये आने वाले वही लोग होते हैं जो पहले भी आते रहे हैं। खगोलशास्त्र से जुड़ी इन घटनाओं पर चर्चा करने के लिये ज्योतिषी बुलाये जाते हैं। फिर उनका मुकाबला करने के लिये कुछ आधुनिक विज्ञान समर्थक भी होते हैं। प्रचार इस तरह किया जाता है कि जैसे हिन्दू समाज में ही अंधविश्वास हो और पश्चिमी विज्ञान एकदम प्रमाणिक है। यह सब देखकर हम तो यह सोचते हैं कि भारतीय हिन्दू समाज इतना अविकसित ओर पिछड़ा नहीं है जितना आधुनिक ज्ञानी समझते हैं। देखा जाये तो हमारी श्रीमद्भागवत गीता के प्रचलन में आने के बाद भारतीय समाज शायद दुनियां का इकलौता समाज है जो समय के साथ आगे बढ़ता जाता है। यह अलग बात है कि प्रगतिशील और जनवाद से जुड़े विद्वानों का सभी जगह बाहुल्य है जिनकी यह मनोवृत्ति है कि संपूर्ण भारतीय अध्यात्म दर्शन को अवैज्ञानिक तथा समाज को जड़ साबित कर अपनी चेतना की व्यवसायिक धारा प्रवाहित की जाये। फिर उनके साथ बहस करने वाले भारतीय अध्यात्म के ज्ञानी भी कुछ इस तरह पेश आते हैं जैसे कि अंधविश्वास का समर्थन कर रहे हों। पेशेवर ज्योतिषी अपने प्रचार क्रे लिये आते हैं तो उनका मुकाबला करने पेशेवर बहसकर्ता आते हैं। चर्चा कराने वाले उद्घोषक का तो कहना भी क्या? निरपेक्ष दिखने की कोशिश इस तरह करते हैं जैसे कि लग रहा हो कि किसी विषय पर सहमति या असहमति न देना ही उनकी योग्यता का प्रमाण हो।
       भारत के हिन्दी टीवी चैनलों में कार्यरत उद्घोषकों का यह भाग्य है कि भारतीय अध्यात्म की व्यापकता ही उनको इस तरह के कार्यक्रम प्रदान करती है। जिसमें ढेर सारे ग्रंथ हैं और उसमें जीवन के हर पक्ष के साथ -जिसमें मनुष्य तथा अन्य जीव भी शािमल हैं-प्रकृति के रहस्यों पर भी प्रकाश डाला गया है। जबकि अन्य दर्शनों में अन्य जीवों की उपेक्षा कर केवल मानव जीवन पर ही अधिक लिखा और बोला जाता हैं। कुछ बातें मनुष्य समाज के संचालन से संबंधित होती हैं।
        प्रकृति के रहस्यों पर पश्चिम तो अब दृष्टिपात कर रहा है जबकि भारतीय अध्यात्म दर्शन में बहुत पहले ही इस पर लिखा गया है। हमने पंचांगों में सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण की तारीखें देखी हैं जो कि यकीनन पश्चिमी विज्ञान से नहीं ली गयीं। पहले लोग अखबार पढ़े बिना बताते थे कि अमुक दिन चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण है।
बहरहाल भारत के टीवी चैनल अपने व्यवसायिक उद्देश्यों की पूर्ति अपने अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर कर लेते हैं यह अलग बात है कि अपने चश्में से समाज को अधंविश्वासी समझने वाले उद्घोषक अपने को भले ही चालाक समझें पर हम सब जानते हैं कि उनकी अदायें ऐसी न हों तो शायद उनका काम भी न चले।
       पिछली बार के पूर्ण सूर्यग्रहण की याद आती है जब कहा गया है कि उसे देखना ठीक नहीं है और देखना है तो विशेष प्रकार के चश्में से देखें। सामान्य रंगीन चश्में से काम नहीं चलेगा। हम आज भी सामान्य काले चश्में से दोपहर मेें तपते हुए सूर्य को आसानी से देख पाते हैं। तब यह सवाल आता है कि ग्रहण के समय जब सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है तो वह सामान्य से अधिक खतरनाक कैसे हो सकता है। उस समय खूब सूर्यगं्रहण देखने वालेचश्में बिके थे उसमें कुछ तो नकली भी बताये गये थे। तय बात है कि बाज़ार ने ही ऐसा प्रचार करवाया होगा ताकि वह अपने उत्पाद बेच सके। वैसे तो इष्ट दिवस, मित्र दिवस, पितृदिवस, मातृदिवस तथा प्रेम दिवस जैसे पश्चिमी दिवसों को भारतीय प्रचार माध्यम अपने प्रायोजक बाज़ार के लिये विज्ञापन प्रसारित कर उसके लिये ग्राहक जुटाते हैं। वैसे ही भारतीय त्यौहारों के साथ सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण भी उनके लिये विज्ञापन प्रसारण के बीच में कार्यक्रम की सामग्री बन जाते हैं।
      वैसे चर्चाओं में शामिल लोग भारतीय समाज को फालतु समझते हैं पर लोगों को लगते स्वयं फालतू हैं-हम नहंी मानते क्योंकि पता है कि यह सब कमाई करने और प्रचार पाने के लिये बहस करने आते हैं।
हम यह खग्रास चंद्रग्रहण देख पायेंगे कि पता नहीं। यह लेख लिखने के तत्काल बाद ही सोने का प्रयास करेंगे। अगर बीच में नींद टूटी तो छत पर देखने जायेंगे कि कैसा है खग्रास चंद्रग्रहण। जहां हानि लाभ, दुःख सुख, और जीवन मरण का सवाल है तो वह इस संसार का हिस्सा हैं। जब तक देह हैं तो विकार आयेंगें। भूख लगेगी, प्यास लगेगी। कभी जीभ किसी नये स्वाद के लिये चीत्कार करेगी। जिस तरह सत्य अनंत है वैसे ही माया भी अनंत है। सत्य सूक्ष्म है और उसे ध्यान आदि के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है तो माया इतनी व्यापक है कि उसके चक्र में फंसे तो सभी हैं पर समझ नहीं पाते। खेलती माया है और आदमी सोचता है कि मैं खेल रहा हूं।
      जहां तक चर्चाओं का सवाल है तो भारतीय अध्यात्म इतना विशाल है कि जिस विषय पर चाहो बहस कर लो। जहां चार बुजुर्ग मिलते हैं किसी न किसी धर्मग्रंथ पर बहस करने लगते हैं। सभी अपना ज्ञान सुनाते हैं पर सुनता कौन है पता नहीं। सभी बोलते हैं। यही हाल टीवी चैनलों का है पर वहां के उद्घोषक तमाम तरह के तामझाम और आकर्षण मे घिरे होते हैं इसलिये उनको विद्वान माना जाता है। यह अलग बात है कि उनकी महाबहस-यह शब्द आज तक हमारे समझ में नहीं आया-अध्यात्मिक में वास्तविक रुचि रखने वालों के लिये हास्य का विषय होती है।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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5/10/08

अध्यात्म का ज्ञान और सांसरिक उत्पाद मिलने का एक ही स्थान

भारत में अधिकतर लोगों का अध्यात्म के प्रति झुकाव स्वाभाविक कारणों से होता है। मात पिता और अन्य बुजुर्गों की प्रेरणा से अपने देवताओं की तस्वीरों के प्रति उनका आकर्षण इतना रहता है कि बचपने में ही उनके अध्ययने की किताबों और कापियों पर उनकी झाकियां देखी जा सकतीं हैं। मुझे याद है कि बचपन में जब कापियां खरीदने जाता तो भगवान की तस्वीरों की ही खरीदता था। एक बार अपनी मां से पैसे लेकर एक मोटी कापी लेने बाजार गया वहां पर भगवान की तस्वीर वाली कापी तो नहीं मिली हां एक कापी पर ‘ज्ञान संचय’ छपा था वह खरीद ली। वह घर लाया तो ‘ज्ञान’ शब्द ने दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि उस कुछ ऐसे ही लिखना शुरू कर दिया। फिर एक छोटी कहानी लिखने का प्रयास किया। तब मैंने सोचा कि इस पर तो मैं कुछ और लिखूंगा और विद्यालय का काम उस पर न करने का विचार किया। इसलिये फिर अपनी मां से दूसरी कापी लेने बाजार गया और अपने मनोमुताबिक भगवान जी की तस्वीर वाली किताब ले आया। वह ज्ञान संचय वाली किताब मुझे लेखक बनाने के काम में आयी।

आशय यह है कि पहले बाजार लोगों की भावनाओं को भुनाता था और ऐसी देवी देवताओं की तस्वीर वाली किताबें और कापियां छापता था जिससे लोग खरीदें। बाजार आज भी यही करता है और मैं उस पर कोई आक्षेप भी नहीं करता क्योंकि उसका यही काम है पर उसके सामने अब दूसरा संकट है कि आज के अनेक अध्यात्मिक संतों ने अपना ठेका समझकर अनेक वस्तुओं का उत्पादन और वितरण अपने हाथ के लिया है जिनका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं और इस तरह उसने बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की बिक्री में से बहुत बड़ा भाग छीन लिया है। दवायंे, कैलेंडर, पेन, चाबी के छल्ले, डायरी और कापियां भी ऐसे आध्यात्मिक संस्थान बेचने लगे हैं जिन्हें केवल प्रचार का काम करना चाहिए।

उस दिन एक कापी और किताब बेचने वाले मेरे मित्र से मेरी मुलाकात हुई। मैं स्कूटर पर उसकी दुकान पर गया और कोई सामान उसे देने के लिये ले गया। उससे जब मैंने धंधे के बारे में पूछा तो उसने बातचीत में बताया कि अब अगर अध्यात्म लोग पेन, डायरियां और कापियां बेचेंगे तो हमसे कौन लेगा? अब तो संतों के शिष्य अधिक हो गये हैं और वह कापियां और पेन बेचते हैं। अगर कहो तो उनके भक्त घर पर भी दे जाते हैं।

मै सोच में पड़ गया क्योंकि मात्र पंद्रह मिनट पहले ही मुझे मेरे एक साथी ने एक रजिस्टर दिया था और और वह अध्यात्मिक संस्थान द्वारा प्रकाशित था। उस पर अध्यात्मक संत का चित्र भी था। मैनें उससे कई बार ऐसा रजिस्टर लिया है। वह और उस जैसे कई लोग आध्यात्मिक संस्थाओं को उत्पादों को सेवा भाव से ऐसी वस्तुऐं उपलब्ध कराते हैं। देखा जाये तो वह अध्यात्मिक कंपनियों के लिये भक्त लोग मुफ्त में हाकर की भूमिका अपने भक्ति भाव के कारण निभाते हैं। कई जगह इन अध्यात्मिक संस्थानों की बसें अपने उत्पाद बेचने के लिये आतीं हैं। कई संस्थान अपनी मासिक पत्रिकायें निकालते हें लोग पढ़ें या नहीं पर भक्ति भाव के कारण खरीदते हैं। इस तरह जहां घरों में पहले साहित्यक या सामाजिक पत्र पत्रिकाओं की जगह थी वहां इन धार्मिक पत्रिकाओं ने ले ली है। शायद कुछ हंसें पर यह वास्तविकता है कि पहले और अब का यह फर्क मेरा बहुत निकट से कई घरों में देखा हुआ है।

अधिक विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है कि दवाओं से लेकर चाबी के छल्ले बेचने वाले अध्यात्मिक संस्थानों की वजह से भी हमारे देश के छोटे कामगारों और व्यवसायियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई है। हम अक्सर विदेशी और देशी कंपनियों पर लघु उद्योगों को चैपट करने का आरोप लगाते हैं पर देखा जाय तो उत्पादन से लेकर वितरण तक अपने भक्तों की सहायता से काम करने वाले इन अध्यात्मिक संस्थाओं ने भी कोई कम क्षति पहुंचाई होगी ऐसा लगता नहीं है। हमारा यह विचार कि हिंदी के पाठक कम हैं इसलिये पत्र-पत्रिकायें कम पढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः उनकी जगह इन पत्रिकाओं ने समाप्त कर दी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ जो पाठक बढ़े उन पर इन आध्यात्मिक पत्रिकाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया। इनके प्रचार प्रसार की संख्या का किसी को अनुमान नहीं है पर मैं आंकड़ों के खेल से इसलिये परे रहता हूं क्योंकि जो सामने देख रहा हूं उसके लिये प्रमाण की क्या जरूरत हैं। अधिकतर घरों में मैंने ऐसी आध्यात्मिक पत्रिकायें और अन्य उत्पाद देखे हैं और लगता है कि अगर यह अध्यात्मिक संस्थान उन वस्तुओं के उत्पाद और वितरण से परे रहते तो शायद रोजगार के अवसर समाज में और बढ़ते।

अपने अध्यात्मिक विषयों में मेरी रुचि किसी से छिपी नहीं है मै अंधविश्वास और अंध भक्ति में यकीन नहींे करता और मेरा स्पष्ट मत है कि अध्यात्म के विषयों का अन्य विषयों के कोई संबंध नहीं है। अगर आप ज्ञान और सत्संग का प्रचार कर रहे हैं तो किसी अन्य विषय से संबंध रखकर अपनी विश्वसीनयता गंवा देते हैं। यही वजह है कि आजकल लोग संतों पर भी जमकर आक्षेप कर रहे हैं। मै संतों पर आक्षेप के खिलाफ हूं पर जिस तरह अध्यात्मिक संस्थान अन्य सांसरिक उत्पादों के निर्माण और वितरण का कार्य छोटे लोगों को रोजगार के अवसरों को नष्ट कर रहे हैं उसके चलते किसी को ऐसे आक्षेपों से रोकना भी मुश्किल है। अगर लोगों के किसी कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तो उस पर आक्षेप करना उनका अधिकार है।

बाजार अगर लोगों की भावनाओं को भुनाता है तो उससे बचने के लिये लोगों को अध्यात्म का ज्ञान कराकर बचाया जा सकता है पर अगर अध्यात्मिक संस्थान ही इसकी आड़ में अपना बाजार चलाने लगें तो फिर उनको अध्यात्म ज्ञान देना भी कठिन क्योंकि उनके चिंतन और अध्ययन की बौद्धिक क्षमता का हरण उनके कथित गुरू अपने उपदेशों से पहले कर चुके हैं।
adhyatm, alekh, bharat, chintan, megazine, अभिव्यक्ति, अर्थशास्त्र, संस्कार, हिंदी संपादकीय

1/9/08

निष्काम और सहज भाव से लिखते जाओ, इंकलाब आते रहेंगे

लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर बिना लिखे भी कौनसा आ जाता है। इन्कलाब लाने वाले नारे तो ख़ूब लगाते हैं पर उसका स्वरूप क्या है और उसको लाने के लिए क्या योजना है कोई नहीं बता सकता। बस नारे लगते हैं 'इन्कलाब लाओ', 'इन्कलाब लाना है' और इन्कलाब लाकर रहेंगे। गरीबों,शोषितों और मज़दूरों के संरक्षकों के लिए यह एक पसंदीदा नारा रहा है। जहाँ तक ब्लोग से इंकलाब आने का सवाल है तो इन पर लोग लिख रहे हैं यही क्या इंकलाब है कि उनके पास एक स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के लिए एक साधन है. विदेशों में अगर कोई चीज बनाई जाती है तो उसका भारतीय अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं और ब्लोग का भी यही होने वाला है।

इन्कलाब का सीधा अर्थ लें तो उसे कह सकते हैं कि बदलाव, यह बदलाव दो प्रकार का होता है एक तो प्रकृति स्वाभाविक रुप से मानवीय स्वभाव के साथ-साथ समाज की आर्थिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रवृतियों में बदलाव लाती है-और उसकी एक सतत प्रक्रिया है जो अनवरत चलती है पर हमें पता भी नहीं लगती है। दूसरा लोग स्वयं अपने प्रयासों से परिवर्तन लाते हैं और इसके लिए कहीं सामूहिक आंदोलन तो कहीं इसके लिए चरणबद्ध अभियान चलाये जाते हैं। इनमें इन्कलाब या क्रान्ति शब्द सामूहिक राजनीतिक आंदोलन से ही जोडा जाता है और इनमें सोवियत संघ की लाल क्रान्ति और चीन की सांस्कृतिक क्रान्ति सबसे ज्यादा मशहूर है और हमारे देश के कुछ लोग लंबे समय तक इस देश में ऐसा ही करने का सपना संजोये रहे भारतीय समाज की स्थितियाँ ऎसी रहीं कि उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। अब सोवियत संघ और चीन भी खुलेपन के तरफ बढ़ गये हैं। वहाँ इंकलाब लाया गया और अब वह उससे पीछे हट रहे हैं क्योंकि जोर जबरदस्ती लाया गया इंकलाब कभी भी सफल नहें होता और प्राकृति स्वयं परिवर्तन लाती हैं इसलिए अगर कहा जाता है कि ब्लोग इंकलाब नहीं ला सकते तो उसमें एक निराशाजनक अभिव्यक्ति लगती है.
लिखने से बदलाव नहीं आते यह एक सत्य बात है पर बिना लिखे भी बदलाव नहीं आते यह भी उतना ही सत्य है। यह जो लोग इस समय निज पत्रक (ब्लोग) लिखे रहे हैं उनकी विषय वस्तू से कोई बदलाव नही आएगा पर उनके लिखने की जो प्रक्रिया है और उसमें लोग जैसे-जैसे जुड़ते जायेंगे लोगों की प्रवृति में भी बदलाव आ सकता है इस संभावना को नकारना गलत होगा।हमारे देश में लिखना लोग पेशे की तरह बहुत कम लोग अपनाते हैं यह अलग विचारणीय बात है पर जो लोग लिखते हैं वह अपने भावों में सामजिक संदर्भों को व्यक्त जरूर करते हैं। निज पत्रक (ब्लोग)लेखकों की बढती संख्या इस बात का प्रमाण है को लोग अपनी अभिव्यक्ति के लिए इसे एक साधन के रुप में देख रहे हैं ।
महर्षि बाल्मीकि और वेदव्यास ने जब अपनी रचनायें प्रस्तुत की होंगीं उस समय समाज में किसी बदलाव के लिए प्रस्तुत नहीं की होंगीं पर उनकी रचनाओं का जो समाज पर प्रभाव है उसे हम आज भी देख सकते हैं , उन लोगों ने अपने कार्य और दायित्व को निष्काम और सहज भाव से निभाया तो उसका प्रभाव यह हुआ कि भगवान् श्री राम और श्री कृष्ण आज भी हमारे ह्रदय के नायक हैं। हिंदी भाषा में भक्ति काल को स्वर्णकाल भी कहा जाता है क्योंकि उस समय कबीर, तुलसी,सूरदास, मीरा, रहीम और रसखान तथा अन्य कवियों ने जो रचनाएं इस देश को दीं वह केवल भक्ति से संबंधित नहीं है बल्कि जीवन के सत्यों को उदघाटित भी करती हैं और आज भी प्रासंगिक हैं। आज जो आध्यात्म के मनीषी हैं वह अपने प्रवचनों में उनको सुनाकर लोगों पर प्रभाव डालते हैं। कुछ लोग उस काल को भक्ति आंदोलन भी कहते है । उस समय कोई इन मनीषियों ने एक झंडे तले इस आंदोलन को नहीं चलाया था पर उनकी रचनाओं ने ही उस काल को एक आंदोलन के रुप में स्थापित किया। इनके लिखने या कहने का उद्देश्य समाज में बदलाव लाना नहीं था पर वह आया और आज समाज में इनकी रचनाओं की चर्चा होती है।
भारत के इन मनीषियों जैसा कोई बन ही नहीं सकता, कम से कम पैसा लेकर लिखने वाला तो कतई नहीं। हाँ, इनकी रचनाओं को दुहराकर या उनके क्रम में अपनी रचना कर इस समाज में निरंतर बदलाव की प्रक्रिया में शामिल हो सकता है, वैसे भी भारतीय समाज बहुत उदार माना जाता है जो परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए चलता है बशर्ते वह उसके अनुरूप हौं और उस पर थौपे न जाएँ । निज पत्रक (ब्लोग) वैसे ही हैं जैसे समाचार-पत्र-पत्रिकाएँ ,टीवी चैनल और अन्य मध्यम । इसके लेखक भी वैसे ही हैं-इनके लिए कोई अलग से संज्ञा ढूँढने की आवश्यकता नहीं है ।कहने वाले तो यह भी कहते हैं संचार माध्यम भी कोई इन्कलाब या बदलाव नहीं ला सकते, और यकीनन निज पत्रक (ब्लोग) लेखकों पर भी यह विचार लागू होता है।
समाज में बदलाव की प्रक्रिया चलती रहती है और लिखना भी। किसी के लिखने से इन्कलाब या बदलाव नहीं आता पर इसीलिये लिखना बंद भी तो नहीं किया जा सकता-आख़िर आत्म अभिव्यक्ति के लिए इससे बेहतर कौनसा साधन है। निष्काम और सहज भाव से लिखते रहो तो इन्कलाब या बदलाव भी आयेगा नहीं आया तो इस बात का अफ़सोस तो नहीं होगा कि हमने कोई प्रयास नहीं किया। अगर हमारे लिखे बग़ैर बदलाव आया तो हमें भी यह अफ़सोस होगा कि हमने लिखा क्यों नहीं । समाज में बदलाव के प्रक्रिया के साथ लिखना भी जारी रहना चाहिए। हमारे लिखने से समाज में इन्कलाब या बदलाव आये या नहीं हमारे अन्दर तो आ ही सकता है।

12/23/07

शांति लाने का दावा

बारूद के ढेर चारों और लगाकर
हर समस्या के इलाज के लिए
नये-नयी चीजें बनाकर
आदमी में लालच का भूत जगाकर
वह करते हैं दुनिया में शांति लाने का दावा

बंद कमरों में मिलते अपने देश की
कुर्सियों पर सजे बुत
चर्चाओं के दौर चलते
प्रस्ताव पारित होते बहुत
पर जंग का कारवाँ भी
चल रहा है फिर भी हर जगह
होती कुछ और
बताते और कुछ वजह
जब सब चीज बिकाऊ है
तो कैसे मिल सकता है
कहीं से मुफ्त में शांति का वादा
बहाने तो बहुत मिल जाते हैं
पर कुछ लोग का व्यवसाय ही है
देना अशांति को बढावा

एक दुकान से खरीदेंगे शांति
दूसरा अपनी बेचने के लिए
जोर-जोर से चिल्लाएगा
फैलेगी फिर अशांति
जब फूल अब मुफ्त नहीं मिलते
तो बंदूक और गोली कैसे
उनके हाथ आते हैं
जहाँ से चूहा भी नहीं निकल सकता आजादी से
वहाँ कोहराम मचाकर
वह कैसे निकल जाते हैं
विकास के लिए बहता दौलत का दरिया
कुछ बूँदें वहाँ भी पहुंचा देता है
जहाँ कहीं शांति का ठेकेदार
कुछ समेट लेता है
जानते सब हैं पर
दुनिया को देते हैं भुलावा
न दें तो कैसे करेंगे शांति लाने का दावा

12/18/07

सुबह चलते-चलते

सुबह चलते-चलते
ख्याल बस यूं आया कि
कोई दर्द क्यों नहीं उभरता मन में
कि कविता लिख लूं
देखा अन्दर झाँक कर दो पाया
योग, ध्यान और प्रार्थना से उपजी
मन में ऊर्जा बहुत है
कोई पीडा उसके आगे नहीं टिक पाती

फिर सोचा
शाम ढलते -ढलते
बहुत कुछ हो जायेगा
कुछ दुख और दर्द का
भंडार एकत्रित हो जायेगा
तब कवि हृदय कुछ सोच पाएगा
सच है अगर इस दुनिया में दर्द
किसी को नहीं होता तो
कभी कविता जन्म नहीं ले पाती

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नोट-आज से सुबह चलते-चलते कभी कविताओं और संक्षिप्त टिप्पणियों के साथ नियमित प्रकाशित किया जायेगा ।

आज की टिप्पणी- ब्लोगर और साहित्यकार में यही अंतर होता है कि ब्लोगर की सूची में ब्लोग पर लिखने वाले साहित्यकारों का कभी नाम नहीं हो सकता और साहित्यकार की सूची में तो ब्लोगर और साहित्यकार किसी का नाम नहीं होता।

12/17/07

गांधीगिरी,गांधीवाद और गांधीमार्ग

गांधीगिरी, गांधीवाद और गांधी मार्ग या विचारधारा तीनों शब्दों का अर्थ भले ही एक जैसे लगते है पर मेरी दृष्टि में में इनका भावार्थ एक नहीं है। हो सकता है कि कुछ लोग मुझे रूढ़ समझें पर विशुद्ध रूप से हिन्दी क्षेत्र का होने के कारण हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे स्मृति पटल में इस तरह अंकित है कि हिन्दी भाषा के हर शब्द का अर्थ और भाव मेरे लिये सहज हो गया और मुझे किसी भी शब्द का भावार्थ समझने में कठिनाई नहीं होती ।

जब भी हिन्दी भाषा में किसी संज्ञा के साथ गिरी शब्द जुड़ता है तो वह उसके अर्थ के साथ उसके भाव और महत्त्व को कम करता है। दूसरे शब्दों में कहें कि यह उसे निम्नकोटि का भावार्थ प्रदान करता है। मैं किसी काम को लघु नहीं मानता क्योंकि अपने पेट के लिये रोजगार अर्जित करने के लिये कोई निम्न व्यसाय करने से निम्न नहीं होता है और हमारे देश में तो कई ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने इन्हीं निम्न व्यसायों से जुडे होने के बावजूद देश के आध्यात्म को ऐसी दिशा दी जिसके कारण देश आज विश्व्गुरु कहलाता है-पांडवों को भी अपने अज्ञातवास के दौरान निम्नकोटि के काम करना पड़े थे।

यहां इस चर्चा का उद्देश्य केवल भाषा और भाव का है। गिरी शब्द महत्वहीन व्यवसायों और संज्ञाओं में जोडा जाता है और कभी-कभी तो किसी नकारात्मक शब्द को प्रभावी बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है-जैसे उठाईगिरी, दादागिरी और गुंडागिरी। आजकल दो शब्द बहुत शब्द प्रचलित हैं जैसे चमचागिरी और नेतागिरी और इनका उच्चारण कोई उनका महत्व प्रतिपादित करना नहीं होता बल्कि किसी का मजाक उडाने के लिए भी किया जाता है। आपने कभी शिक्षकगिरी , चिकित्सकगिरी , व्यापारीगिरी और अधिकारीगिरी जैसे शब्द नहीं सुने होंगे। तात्पर्य यह है कि यह केवल किसी संज्ञा के मह्त्व को कम प्रदर्शित करता है। ऐसे में गांधी जी के आदर्शों को मानने वाला मुझ जैसा हिन्दीभाषी क्षेत्र का शख्स अपने आपको असहज अनुभव करता है।

अब गांधीवाद शब्द की चर्चा करें। वाद या नारे तो केवल लोगों को यह बताने के लिये हैं कि हम उनके अनुगामी हैं और उनके बारे में हम अधिक जानते हैं इसलिए हम जो कहते हैं वही मानो। अगर आप किसी भी वाद या नारे पर चलने वाले बुद्धिजीवी से उसका स्वरूप पूछें तो सब केवल रटे-रटाए नारे लगाने वाली बात कहेंगे। गरीबों और शोषितों को उठाना, महिलाओं को सम्मान दिलाना और जन कल्याण करना। सो इस पर बात अधिक क्या कहें । इन नारों और वाद पर मैं पहले भी बहुत कुछ लिख चुका हूं।
गांधी विचार या गांधी दर्शन शब्द से मेरा मन प्रुफ़ुल्लित हो जाता है। इस शब्द का प्रयोग जो व्यक्ति करता है उसके बारे में यही सोच हमारे मन में आता है यह वाकई उनके बारे में जानता है। गांधी जी ने ऐसा चरित्र जिया है जिस पर जितना भी लिख जाये कम है। उन्होने कोई अभिनय नहीं किया और न कोई ऐसा अभिनेता इस देश में हुआ कि उनके चरित्र को जी सके। हमारे देश के कुछ लोग वालीवुड का बहुत शोर मचाते हैं पर गांधीजी पर फ़िल्म बनाने वाला और उनका चरित्र निभाने वाला दोनों विदेशी थे। मतलब साफ़ है कि इस देश में उनके वाद पर बहुत चले पर दर्शन किसी ने नहीं अपनाया और ऐसा करते तो तब जब समझ में आता।

हाल में एक फ़िल्म बनी जिसमें एक अभिनेता ने गांधीगिरी की और गांधीजी के कुछ भक्त बहुत प्रसन्न हो गये। भाई लोगों को पता नहीं कि भाषा का शब्द, अर्थ और उसका भाव बहुत महत्वपूर्ण होता है। गांधीगिरी शब्द का भाव पहले समझो। इस देश की अधिकतर जनता गांव में रह्ती है वह कभी इसे उस भाव से नहीं लेगी जो तथाकथित गांधीवादी समझ रहे हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि हिन्दी क्षेत्रों में गिरी शब्द उसका महत्व कम तो करता ही उसको हास्याभिव्यक्ति भी प्रदान करता है। फ़िर मुंबई को छोड़कर आप किसी भी हिन्दी भाषी क्षेत्र में चले जायें वहां हिन्दी ऐसी नहीं है जैसी वालीवुड की है। उनके फ़िल्मों से हिन्दी का प्रचार तो हो सकता है पर लोग वैसी बोलते नहीं है जैसी उसमें देखते और सुनते हैं।फिल्मों ने देश के चरित्र पर दुष्प्रभाव डाला है पर भाषा अभी बची हुई है।
इस सबके विश्लेषण के साथ मेरा तो यही कहना है कि मैं हमेशा गांधी मार्ग या उनके दर्शन पर चलने के लिये ही कहूंगा क्योंकि गांधिगिरी शब्द मुझे असहज कर देता है और अपने जीवन में कभी भी उसका उच्चारण नहीं कर सकता। हो सकता है मैं गलत हूं पर क्या करूं मैने हिन्दी को जिस रूप में पढा है उसके आधार पर मेरी यह समझ बनी है हालांकि मैं यह दावा भी नहीं करता की मैं एक दम सही हूँ। हिन्दी भाषा में इतनी विशेषज्ञता नहीं है कि ऐसा दावा कर सकूं

11/12/07

ऐसे बनती है जोरदार खबर

उससे कहा गया की वह बहुत दिन से कोई खबर नहीं लाया है और आज अगर आज कोई खास नहीं लाया तो उसकी नौकरी भी जा सकती है।
वह दफ्तर से कैमरा लेकर निकला और बाहर खडा हो गया। उसने वहाँ पास से गुजरते एक आदमी से पूछा-"तुम आस्तिक हो या नास्तिक? जो भी हो तो क्यों? बताओ मैं तुम्हारा बयान और चेहरा अपने कैमरे से सबको दिखा चाहता हूँ।''
उस आदमी ने कहा-''मैं आस्तिक हूँ और अभी मंदिर जा रहा हूँ। बाकी वहाँ से लौटकर बताऊंगा।

वह चला गया तो दूसरा आदमी वहाँ से गुजरा तो उसने वही प्रश्न उससे दोहराया। उसने जवाब दिया-'मैं नास्तिक हूँ और अभी शराब पीने जा रहा हूँ। उसके कुछ पैग पीने के बाद ही बता पाऊंगा। तुम रुको मैं अभी आता हूँ।
वह अपना कैमरा लेकर टीवी टावर पर चढ़ गया। थोडी देर बाद दोनों लौटे। उसको न देखकर दोनों ने एक दूसरे से पूछा''वह कैमरे वाला कहाँ है?''
फिर दोनों का परिचय हुआ तो असली मुद्दा भी सामने आया। दोनों के बीच बहस शुरू हो गई और नौबत झगडे तक आ पहुची। दोनों अपनी कमीज की आस्तीन ऊपर कर झगडे की तैयारी कर रहे थे। उनके बीच गाली-गलौच सुनकर भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। उसमें से एक समझदार आदमी ने दोनों से पूछा''पहले यह बताओ की यह प्रश्न आया कहाँ से? किसने तुम्हें इस बहस में उलझाया।
दोनों इधर-उधर देखने लगे। तब तक वह कैमरा लेकर नीचे उतर आया। दोनों ने उसकी तरफ इशारा किया। उसने दोनों से कहा-'आप दोनों का धन्यवाद! मुझे मिल गयी आज की जोरदार खबर!
वह चला गया। दोनों हैरान होकर उसे देखने लगे। समझदार आदमी ने कहा-तुम दोनों भी घर जाओ और उसकी जोरदार खबर देखो। हम सबने देख ली, तुम नहीं देख पाए यह जोरदार खबर, क्योंकि तुम दोनों आस्तिक-नास्तिक के झगडे में व्यस्त थे तो कहाँ से देखते। वैसे हम भी जा रहे हैं क्योंकि यह खबर दोबारा देखकर भी मजा आयेगा।
दोनों वहीं हतप्रभ खडे रहे और भीड़ के सब लोग वहाँ से चले गए अपने घर वह आज की जोरदार खबर देखने।
(मौलिक एवं स्वरचित लघुकथा)

11/8/07

दीपावली पर सभी को शुभकामनाएं

दीपावली हर वर्ष आती है और समाज के हर वर्ग का सदस्य अपने ढंग से इसका आनंद उठता है। इन त्योहारों को सतत मनाने की प्रक्रिया इसलिए शुरू हुई ताकि लोगों को अपने धर्म और संस्कृति याद रखने में चिंतन करने में सहायता मिल सके और साथ में आनंद भी मिल सके। सभी त्यौहार मनाने के लिए लोग बडे उत्साहित रहते तो केवल आनंद उठाने के लिए चिंतन से उनका वास्ता नहीं रहता। बहुत कम लोग इस बात को याद रखने का प्रयास करते हैं कि वह त्यौहार किस उपलक्ष्य में मनाया जा रहा है।

दीपावली का त्यौहार भगवान् श्री राम के चौदह वर्ष बनवास समाप्त होने के वापस होने पर उनके अपने शहर में वापस आने पर अयोध्यावासियों ने जो खुशी मनायी थी उसके तारतम्य में यह शुरू हुआ। अयोध्यावासियों ने यह त्यौहार अपने राजा की वापसी पर मनाया था पर भारतीय जनमानस ने उन्हें भगवान् स्वरूप अपने हृदय स्थल में स्थापित कर इसे मनाना जारी रखा। अयोध्यावासियों ने भगवान् श्री राम के राज्य का भले ही क्षणिक भौतिक सुख का लाभ उठाया पर उनकी लीलाओं ने पूरे जनमानस में जो प्रभाव छोडा उन्हें हृदय नायक बना दिया।

भगवान श्रीराम ने राज्य किया पर उन्होने राज्य सुख का उपयोग अपने हित के लिए किया हो या उसके सुखों में डूबे रहे हों ऐसी चर्चा कहीं नहीं मिलती। उन्होने राज्य लक्ष्मी और उसके वैभव का उपयोग अपने लिए किया ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। मन,वचन और कर्म से वह समाज के लिए समर्पित रहे-इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोतम कहा जाता। जीवन भर एक पत्निव्रता रहने का व्रत उन्होने लिया और उसको निभाया। राज्य छोड़कर चौदह वर्ष खुशी के साथ वन में रहे पर सीताहरण प्रसंग में कुछ क्षणों को छोड़कर कभी विचलित नहीं हुए। धर्म स्थापना का काम फिर भी उन्होने शुरू किया। सच तो यह है कि वह एक सभ्य समाज की स्थापना का सन्देश उन्होने सबसे पहले दिया। वह नहीं चाहते थे कि लोग पशुओं की तरह असभ्यता से जीवन बिताएं। वह चाहते थे कि स्त्री को सम्मान से देखा जाये और सबको अपने मन के हिसाब से भगवान् की आराधना का अधिकार हो। उनके समय में राक्षस वनों में रहने वाले तपस्वियों के तप,ध्यान और यज्ञ-हवन आदि में बाधाएं पैदा करते थे और इसलिए उनका उन्होने संहार करना शुरू किया। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह राक्षसों की भक्ति विधि से कोई विरोध रखते थे। राजा होते हुए भी उन्होने सबके हित में अपना हित देखा-हो कि आज भी अनुकरणीय है।

ऐसे त्यौहारों के अवसर पर महापुरुषों की चर्चा करना भी जरूरी हैं जिनको स्मरण करते हुए यह त्यौहार मनाये जाते हैं। मैंने अपने अनेक लेखों में भगवान श्री राम के बारे चर्चा की है और मेरा कहना स्पष्ट है कि कई लोग चाहते हैं भगवान् श्री राम की जगह उनके इष्ट समाज के इष्ट बने ताकि वह अपना प्रभा समाज पर कायम कर सकें। कई लोगों में-को जिन्हें सब कुछ मिल जाता है पर समाज में भगवान् के रूप में स्थान नहीं मिलता- यह देखकर निराशा आती है कि उनका चरित्र वैसा नहीं हो सकता और वह भगवान् नहीं बन सकते। अपनी महत्वांकक्षा की पूर्ति न होने पर तमाम तरह के आक्षेप करते हैं या असितत्व पर सवाल उठाते हैं। यह भगवान् श्री राम की लीलाएं ही हैं कि उन्होने ऐसा चरित्र बहुत कठिनाईयाँ झेलते हुए भी व्यतीत किया और वह नैतिकता और मर्यादा के प्रतीक बन गए। उन भगवान् श्री राम को मेरा नमन और सब भक्तो को दीपावली के शुभकामनाएं।

10/7/07

चिट्ठा शब्द पर चर्चा

ब्लोग का मतलब जिस तरह चिट्ठा लिखा जा रहा है उसे सर्वमान्य तो नहीं माना जा सकता क्योंकि उसमें केवल आंकडे दर्ज होते हैं और अगर उसमें किसी भाषा के शब्द होते हैं भी हैं वह अंकों के सहायक होते हैं। ब्लोग का जन्म १९९९ में हुआ और इसके जन्मदाताओं का मुख्य उद्देश्य अपने संदेश संप्रेषण से था और उसमें भी उनके भाव अंक प्रधान नहीं बल्कि शब्द प्रधान थे। अगर हम इसे हिंदी में सही अनुवाद करना चाहते हैं तो पहले यह जानना जरूरी कौन इसका किस उद्देश्य से उपयोग कर रहा है। आम बातचीत में चिट्ठा शब्द का उपयोग हिसाब-किताब से ही लिया जाता है और उस्मने रचनात्मकता और सृजनशीलता का कहीं बोध नहीं होता जब कि हम यहाँ देख रहे हैं कि कई लोग इसका उपयोग अपने रचना धर्म को निभाने के लिए कर रहे हैं।
जब तक मैने वाणिज्य विषय में पढ़ना शुरू नहीं किया था तब तक चिट्ठा शब्द से मेरा वास्ता ही नहीं पढा था और मैने तब अपनी छोटी-छोटी कवितायेँ लिखने का अभ्यास शुरू भी कर दिया था। चिट्ठा शब्द मेरे सामने आया जब अपने लेखांकन का अध्ययन शुरू किया। उसमें इसे बेलेंस शीट कहा गया और हम हिंदी में उसे चिट्ठा ही कहते थे। इसका सीधा मतलब यह कि चिट्ठा अंक प्रधान है न कि शब्द प्रधान जबकि लोग रहे हैं वह तो अपने मनोभाव की शब्दों में अभिव्यक्ति कर रहे हैं। जब चिट्ठा शब्द आता है तो मेरे दिमाग में आंकडे घूमने लगते हैं। वैसे मैने ब्लोग और ब्लॉगर शब्द भी अंग्रेजी डिक्शनरी (शब्दकोश) में देखने का प्रयास किया पर वह नहीं मिला। मेरे लिए चिट्ठा शब्द केवल आंकड़ों के मायाजाल से अधिक कुछ नहीं है। इसलिये जब मैं लिखता हू तो सीधे ब्लोग ही लिख देता हूँ क्योंकि वह ज्यादा सहज लगता है। हिंदी भाषा की दृष्टि से भी चिट्ठा शब्द आंकड़ों से अधिक संबंधित लगता है। इसके लिए मैं हिंदी में निज पत्रक ही शब्द अधिक सुविधाजनक पाता हूँ और मुझे लगता है इसे ज्यादा लोकप्रियता तो पत्र या पत्रिका शब्द से ही मिल सकती है-जैसे-जैसे यह विधा लोकप्रिय होगी अपने साथ नए शब्द लाएगी इसमें कोई संशय नहीं है ।

जब मुझसे कोई मित्र पूछता है कि इन्टरनेट पर तुम जिस पर लिख रहे हो उसे क्या कहते हैं तो मैं कहता हूँ कि अंग्रेजी में ब्लोग और हिंदी में कहो तो 'निजी पत्रिका' पर लिखता हूँ। तब वह सहजता से समझ जाते हैं और किसी से कहूं कि यह चिट्ठा है तो उसका ध्यान आंकड़ों में खो जाता है। शुरूआत में जब मैने अपने ब्लोग बनाए तो उनमें पत्रिका शब्द कहीं न कहीं जरूर लिखा क्योंकि उस समय मुझे यह मालुम नहीं था कि इसे चौपालों पर चिट्ठा कहा जायेगा-वैसे भी इसे वहीं गढा गया है और अभी इस पर अभी आम लोगों की मुहर लगना बाकी है । मेरे विचारों में यह स्वतन्त्र पत्रकारिता की तरह है।
यह कोई विवाद खडा करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ, बल्कि मेरे लक्ष्य यह है कि हम इस शब्द के उन पहलुओं पर विचार करें जो इसकी प्रगति पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। जब हम किसी ने आदमी से कहेंगे कि चलो चिट्ठा लिखो तो उस पर इतना प्रभाव नहीं पडेगा पर अगर हम उससे कहेंगे कि इन्टरनेट पर अपनी पत्रिका निकालो तो उसमें उत्साह पैदा होगा। अभी मैं अपने मित्रों से वार्तालाप में इसे 'पत्रिका' ही कहता हूँ और वह इसे मान भी लेते हैं क्योंकि मेरे लेखन कार्य को देखते हुए इन्हें इस पर कोई हैरानी भी नहीं होती। कुछ लेखक मित्र है और इन्टरनेट पर लिखने का मन बना रहे हैं उनके सामने इसे पत्रिका कहकर ही प्रचारित करता हूँ, क्योंकि उनके सामने चिट्ठा शब्द का उपयोग करना मतलब शब्दों से हटाकर अंकगणित और लेखा में उलझाना ही होगा। वैसे भी मुख्य मतलब तो इन्टरनेट पर हिंदी को बढावा देना है इसे चिट्ठा कहो या निज पत्रक या पत्रिका क्या फर्क पड़ता है। अत: हमें समानार्थी शब्दों को भी ग्रहण करने के मनस्थिति बनानी चाहिए वैसे भी यह कारवाँ आगे बढते हुए नए शब्द गढ़ता जायेगा।

9/10/07

अच्छा लिखने की कोशिश

मैं कभी भी अच्छा लिखने का प्रयास ही नहीं करता क्योंकि अगर मैं एसा करूंगा तो एक भी लाईन नहीं लिख पाऊँगा-मेरा पूरा समय ही यह सोचते हुए निकल जाएगा कि क्या अच्छा लिखूं-अगर लिखूंगा नहीं तो कैसे पता लगेगा कि अच्छा लिखा कि नही और मैं उसे अच्छा मानूं तो भी क्या पढने वाले उसे मान लेंगे और अपनी रचना बुरी या निरर्थक किसे लगती है? अगर मैं यह तय करने लगूं कि मेरा लिखा अच्छा है या बुरा तो मैं अगली रचना भी नहीं कर पाऊँगा।

कोई भी लिखी गयी रचना अच्छी है या बुरी उसे पढने वाला ही तय कर सकता है और मैं दूसरे की रचनाओं को पढने में ही इस अधिकार का इस्तेमाल करता हूँ। मैं अच्छा लिखने की बजाय अच्छा सोचने और विषय की गहराई में जाने के प्रयास पर जोर देता हूँ और मानता हूँ कि अच्छे या निरर्थक का निर्णय पढने वाले पर ही छोड़ दूं।

लिखते हुए मेरा दिमाग केवल उसी विषय पर रहता है जिस पर लिख रहा हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि उसमे संबंधित तत्व पूरी तरह शामिल हो जाएँ और जब गहराई में पहुंचते ही जब शब्द और वाक्य स्वत:बाहर आने लगते हैं और तब मेरे लिए यह सोचना काठी होता है कि यह रचना किसको अच्छी लगेगी और किसको बुरी। ब्लोग पर मैं सीधे लिखता हूँ और इसीलिये मुझे लगता है कि अपने मूल स्वरूप में नहीं लिख पा रहा हू पर एसा लग रहा है कि धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए उसे पा लूंगा। रचना लिखने के बाद मैं उसके पीछे नहीं जाता यह पता करने के लिए कि उसके पढने वाले पर क्या प्रतिक्रिया हुई। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में जब मेरी रचनाएं छपती हैं तो उसे पढने वाले मेरे मित्र और परिचित उस पर स्वत: प्रतिक्रिया दें तो अलग बात हैं पर मैं कभी उनसे अपने रचनाओं की चर्चा तक नहीं करता हूँ क्योंकि मेरे लिखे और उसके छपने के बीच जो समय है उसमें मैं और भी बहुत लिख चुका होता हूँ। वह लोग खुद अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। मैं उनकी प्रतिक्रियाएँ सहजता से सुनता हूँ।


जब ब्लोग पर लिखना शुरू किया उसके तीन महीने बाद मैंने अपने ऐसे ही मित्र पाठकों को अपने ब्लोग के पते दिए और जब उन्होने यह ब्लोग देखे तो रचनाओं को पढ़कर वह लोग बहुत अप्रसन्न हुए उनका कहना था कि वह उस स्तर की नहीं है जिसके लिए मुझे जाना जाता है । मैंने उन्हें बताया कि यहां मुझे लिखते समय केवल अपने दिमागी विचारों पर ही नहीं बल्कि की बोर्ड की तरफ भी ध्यान रखना पड़ता है और साथ ही अपनी बिजली गुल होने की आशंका भी रहती है, और बहुत बड़ी रचनाएँ यहाँ लिखना मेरे लिए संभव नहीं हो पाता। तब उनका कहना था कि मुझे कागज़ पर लिखकर बाद में उसे टाईप करना चाहिऐ। मैंने एसा प्रयास किया तो अपने ही लिखे को पुन: टाईप करना मेरे को ऐक अत्यंत बोर करने वाला प्रयास लगा। अगर उसे सादा हिंदी फॉण्ट में टाईप करना होता तो मैं सहर्ष तैयार हो जाता पर युनिकोड में एसा करना मुझे बोर करने वाला काम लगता है- सबसे बड़ी दिक्कत वर्तनी की त्रुटियों से है। लिखने के बाद मैं सरसरी तौर से पढता हूँ और त्रुटियों में सुधार करता हूँ पर जब कभी उन्हें दूसरी बार पढता हूँ तो त्रुटियों को देखकर क्षोभ होता है। सादा हिंदी फॉण्ट में मैं इस तरह की गलतियां नहीं करता, कम से कम से वाक्य लिखने में तो बिल्कुल नहीं -यहाँ तो लिखते हुए वाक्य भी गलत हो जाते हैं और जब उन्हें ठीक करने बैठता हूँ तो लिखने से अधिक समय लग जाता है।

मेरे कुछ मित्र फिर भी यही चाहते है कि मुझे इन्टरनेट पर लिखना जारी रखना चाहिये। पन्द्रह मित्रों में दो एसे भी हैं जिन्हें लगता है कि रचनाएं छोटी है पर उतनी ही अच्छी जितनी पत्र-पत्रिकाओं में लिखता हूँ। मतलब यह कि प्रतिक्रियाओं को देखते हुए यह कहना कठिन है कि क्या अच्छा लिखा या क्या बुरा? ऐक बात और कि मैंने अपने मित्र और पाठकों से कोई राय स्वयं नहीं मांगी थी पर उनकी आदत है वह मेरे से मेरे लिखे पर जब भी मिलते हैं चर्चा अवश्य करते हैं। एसे मित्रों की समालोचना से मेरे अन्दर केवल इतना प्रभाव होता है कि अगली बार लिखते समय इस बात का प्रयास करता हूँ कि उन्हें इसका अवसर न मिले पर जब अपनी चरम स्थिति पर पहुँचता हूँ और वाक्य और शब्द अपनी स्वाभाविक गति से बाहर आते हैं तो सब भूल जाता हूँ क्योंकि मुझे विषयों की गहराई में आ जाने पर और कुछ ध्यान नहीं रह पाता।

प्रतिक्रियाएँ लिखने को प्रेरित करतीं है पर अच्छा या बुरा लिखना इस बात पर निर्भर करता है कि विषय के प्रति हम कितना गंभीर है। अक्सर लोगो लिखने के लिए लिखते हैं और चाहते हैं लोग उनकी वाहवाही करें, सीमित दायरे में ऎसी वाहवाही मिल भी जाती है पर जब आपको लिखने के लिए व्यापक दौरे में पाठक चाहिऐ तो आपको अपने विषय के प्रति गंभीर रहना चाहिऐ। मैंने जब इन्टरनेट पर लिखना शुरू किया था तो मुझे यह पता ही नहीं था कि पढने वालों से इतनी जल्दी रू-ब -रू होने की भी इसमें प्रक्रिया है और जिसे कमेन्ट कहते हैं। मैं कमेंट करने वालों को अपने पाठक मित्रों की तरह ही मानता हूँ-उन दोनों में अंतर है तो बस इतना कि मित्र लोग प्रत्यक्ष सामने प्रतिक्रिया देते है जबकि कमेंट लिखने वाले लिख कर विचार देते है- मुझे दोनों में आत्मीयता का भाव एक जैसा ही लगता है। । इससे मुझे प्रसन्नता होती है और लिखते समय कोशिश करता हूँ कि उन्हें अच्छा पढने का अवसर मिले पर बहुत जल्द यहाँ भी भूल जाता हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि किसी भी तरह अपनी यह पोस्ट पूरी करूं और अपने विषय में डूबे होने के कारण् वाक्य और शब्द धाराप्रवाह चले आते हैं और उनको रोकना कठिन होता है साथ ही विषय को सामाजिक् सरोकार से जोडने के प्रयास भी करना आवश्यक लगता है एसे में भावी प्रतिक्रिया का ध्यान रखना कठिन लगता है और अंततः उस रचना के सार्थक और निरर्थक होने का निर्णय पढ्ने वाले पर छोडना ही पडता है। अब अच्छा लिखा या बुरा वह जाने।

8/23/07

भाव, भावना और शब्द

जब हृदय के भाव शब्द बन जाते हैं
तब ऐक तस्वीर की तरह भाते हैं
अपनी भावनाओं को जो समझते हैं
वही उसे शब्दों के सुन्दरता से सजाते हैं
शब्द और भाव का सामंजस्य
इतना आसान नहीं है जितना लगता है
जब भाव होते हैं तब शब्दों के
मस्तिष्क में स्थित भण्डार पर
नजर नहीं जाती
पर जब शब्द लिखने या कहने का मन हो
तब भावों को अपने से परे पाते हैं

हर कहा और बोला गया शब्द
हमारे भावों का प्रतिबिंब कहलाता है
पर जिनको हम समझें
कोई और अर्थ वैसा न समझे
हमारे व्यक्तित्व का स्वरूप
लोगों की दृष्टि में बदल जाता हैं
तोल कर न बोले और कहे शब्द
हमें ही जिन्दगी में उलझाते हैं

जैसे भाव हैं हमारे
वैसे व्यक्त शब्द न हो पायें
तो भी लगता है कि हमने
जो कुछ लिखा और कहा
उससे बात नहीं बनी
अपने ही हृदय की तस्वीर
अस्पष्ट नजर आती है
अव्यक्त भाव धीरे-धीरे
दुर्गन्ध देने लगते हैं
और हम भीड़ में भी
स्वयं को अकेला पाते हैं
खेल सब नियत का है
अपने शब्द और बोलने के
साथ ही उसमें अमरत्व और अमृत का
प्रकट होते देखना चाहते
उसका कोइ अर्थ समझे इसका
इन्तजार नहीं कर पाते
अपने भाव और शब्द जोड़ नहीं पाते
अगर अपने शब्द और भावों को
जोड़ने में धैर्य धारण करें और
सहजता से उनके मिलन का दृश्य
अपने ही अंतर्मन में देखें
तभी अभिव्यक्ति कर पाएंगे
नहीं तो बोलने और लिखने का
मतलब स्वयं ही नहीं समझ पायेंगे
पता नहीं क्यों हम
इतनी बात क्यों नहीं समझ पाते हैं

8/7/07

दर्द यहाँ भी है और वहाँ भी

इधर रहकर उधर के
यहाँ के होकर वहाँ के
देश में बसते हुए
विदेश के देखते हैं लोग सपने
उकताए हुए रिश्ते लगते हैं अपने


उधर कोई स्वर्णमय मृग है
वहाँ कोई बसा स्वर्ग है
विदेश में हमारी गरज है
यह ख्याली पुलाव पकाता
आदमी पलायन के लिये
लगता है तड़पने
शरीर इधर पडा आत्मा भटके उधर
दिल यहाँ दिमाग वहां
देश में बैठे-बिठाए जागती आंखों से
विदेशों के काल्पनिक दृश्य
उसे लगते हैं अपने

अपनी जिंदगी के कड़वे सच से
अपनी ही आँखें चुराता
अपने अल्पज्ञान पर इतराता
पालता है ख्वाहिशें
इधर से चैन ज्यादा उधर मिलेगा
यहाँ है पीतल वहां सोने से नैन लडेगा
देश में मिलता है जीरो नंबर
विदेश में टेन में टेन मिलेगा
दौलत और शोहरत के ढ़ेर पर
बैठने के देखता सपने

झूठ के पुलिंदे बांधता
सच जानने की कोशिश से घबडाता
अनुमान के विमान उडाता
ज्ञान से जीं चुराता
यह सोचने की कोशिश नहीं करता
जिन्दा रहने के लिए संघर्ष
इधर भी है और उधर भी
रिश्तों की पीडा
यहाँ भी और वहाँ भी है
देश में रहते हुए
अपनी बेकद्री का दर्द सताता है
पर विदेश में यही पल
याद आते हैं अपने
कहानिया इधर भी हैं उधर भी
पात्रों के नाम यहाँ कुछ और
वहाँ कुछ और हो जाते हैं
देश छोड़ने से
अपने जजबात नहीं बदल जाते
गर्दिश में होना सितारे तो
विदेश में भी नहीं चमक पाते
पर दर्द और ग़मों से लड़ने की
ताकत पाते हैं घर में ही अपने

8/5/07

बिना ढूंढें ही दोस्त मिल पाते हैं

यूँ तो जिंदगी के इस सफर में
कदम-कदम पर हाथ मिलाने वाले
दोस्त मिल जाते हैं
साथ निभायें जो सदा
ऐसे कुछ नाम याद नहीं आते हैं


कोई ऐसा पेड नहीं मिलता
जिस पर प्यार और वफा के फल
लटके मिल जायें
हम वहाँ से तोड़कर खा जायें
हम करते हैं दूसरे से उम्मीद
पर कभी सोचा है कि हम
अपने दोस्तों से कितना निभाते हैं


फिर भी मैं निराश नहीं होता
क्योंकि प्यार और वफा के जज़्बात
कभी इस दुनियाँ में मर नहीं सकते
उम्मीद और अरमानो के रास्ते
हमेशा कभी बंद नहीं हो सकते
हर रोज मिलने वाले न निभायें
पल भर मिलने वाले दोस्त भी
अपनी वफा निभा जाते हैं
पर वह पल और दोस्त
हम भी कहाँ याद याद रख पाते हैं


दोस्तों का कोई एक दिन नहीं होता
उनकी कोई एक शाम नहीं होती
और उनके कोई एक रात तय नहीं होती
हजारो भ्रम पालते हुए सैंकडों
दोस्तों का जमघट लगाकर
कुछ पलों की मुलाकात में
जिंदगी भर के प्यार और वफा की
उम्मीद अपने दिल में जगाकर
स्वयं को ही धोखा दे जाते हैं
दोष जमाने को देते हैं
अपनी गलती अपने से ही छिपाते हैं


हर कदम पर
अपनी स्वार्थ सिद्धि का भाव
होता है हमारे अन्दर इसलिये
हर मिलने वाले में
दोस्ती ढूंढने लग जाते हैं

अपनी नीति और नीयत को देखो
लोगों को मुसीबत से
उबारना सीखो
दूसरे का दर्द अपना समझो
अपने सत्य पथ पर चलते रहो
यकीन करो इस दुनिया में
ढूंढें से नहीं बल्कि
बिना ढूँढे ही दोस्त मिल पाते हैं

अमेरिका और भारत का बोस पुराण एक जैसा

अमेरिका में किये तो गये ऐक सर्वेक्षण के अनुसार उस बोस को बहुत जल्दी तरक्की मिलती है जो अपने मातहतों का जीना हराम किये रहता है-मुझे इस पर ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ वजह! मानव प्रवृति सब जगह ऐक जैसी रहती है। जो बोस को तरक्की देते हैं वह बोस से बडे होते हैं और हर बडे व्यक्ति का यह स्वभाव रहता है कि छोटे को निम्न और बैईमान समझता है- जो व्यक्ति बोस के पद पर प्रतिष्ठत होता है उस अपने मातहतों पर जुर्म करना ही होता है ताकि वह अपने मालिक या कंपनी को जता सके कि वह भी एक बड़ा आदमी है।


हर मालिक के नजर में नौकर कामचोर और बैईमान होता है, और इतना ही नहीं वह कितना भी काम कर मालिक के नजर में उसका महत्व नहीं होता। यह केवल मालिक और नौकर का मामला ही नहीं वरन हर क्षेत्र में यही हालत है। अमीर के हृदय में अमीर के लिये ही जगह है-गीब तो उनके लिए इन्सार्नों की जाति से अलग कोई प्राणी होता है। मजदूर अपना खून-पसीना ऐक कर देते हैं पर उनका पारिश्रमिक ऐसे दिया जाता है जैसे भीख दी जा रही हो।

ऐसा नहीं है कि यह केवल आर्थिक और व्यापारिक क्षेत्रों में ही ही होता है वरन सामाजिक में भी यही हालात है। अगर कही चार रिश्तेदार मिलते हैं वहां पहले यही देखा जाता है आर्थिक स्तर में कौन कहाँ तक है और जो सबसे कम होता है उसे कम सम्मान मिलता है। कुछ मामलों में बातचीत करते हुए सतर्कता बरती जाती है कहीं वह अपने लिये सहायता के रूप में धन ना मांग ले और कहीं तो यह भी ध्यान दिया जाता है कहीं वह उनके घर का सामान ना उठाकर ले जाय। इसके अलावा उसकी मजाक भी बनाई जाती है। मतलब यह कि आर्थिक दृष्टि से छोटा व्यक्ति समाज में कहीं भी सम्मान का पात्र नहीं समझा जाता है-भले ही वह अमेरिका क्यों न हो।

आज मैने इसे विषय पर ऐक व्यंग्य कविता भी लिखी है उसके बाद मुझे यह समाचार पढ़ने को मिला जिन लोगों को भारत को अमेरिका जैसा बनाना है भले ही वह ऐसा मजाक में कह रहे हौं पर उन्हें इस तरफ अवश्य ध्यान देना चाहिये। भारत में ही नही सभी जगह यही हालत है। गरीबों और मजदूरों के मसीहा कार्ल मार्क्स ने कभी भारत के दर्शन भी नहीं किये फिर भी उसने उनके लिए लिखा इसका मतलब यह है कि ऐसा सब पश्चिमी देशो में भी होता रहा है।


मुद्दा केवल आर्थिक नहीं वरन मानवीय स्वभाव से जुडा हुआ है। हर बड़ा आदमी छोटे आदमी के ख़ून को गंदे पानी की तरह समझता है। गंदा पानी मैंने इसलिये कहा क्योंकि आजकल मिनरल वाटर के रुप में बिक रहा पानी भी इतना महंगा हो गया है कि उसे बेचने वाले भी नहीं पी पाते। अपने मातहत पर जुर्म करने वाले बोस को जल्दी प्रमोशन मिलने का सीधा मतलब यही है कि उसने गरीब और कमजोर के ख़ून को पसीने में बदलकर मालिको या कंपनी के लिए मिनरल वाटर का इंतजाम किया होगा। वैसे तो हरेक को दुसरे का ख़ून पानी की तरह लगता है पर उच्च वर्ग के लोगों के लिए निम्न वर्ग के लोगों को तो जन्मजात बंधुआ होने के लिए पैदा हुआ माना जाता है।

आप कहेंगे कि बात कहॉ से शुरू हुई थी कहाँ आकर पहुंच गयी। जनाब! आख़िर बॉस भी एक इन्सान होता है जो किसी मालिक या कंपनी का नौकर होता है जिसे अपने मातहत के बारे में सारे निर्णय करने का अधिकार सौंपा जाता है ताकि इस बारे में हुई हर बुराई के लिए उसे सीधे जिम्मेदार ठहराया जा सके। अगर वह अपने मातहत के प्रति दरियादिली दिखायेगा तो कंपनी या मालिक उसके प्रति तंगदिल हो जायेंगे। बडे आदमी की अहमियत भी तभी जानी जाती है जब वह छोटे आदमी के प्रति वह अपने शक्ति दिखाए , उसे प्रताडित करे और बिना या छोटी वजह पर बुरी तरह डांटे।


एक बोस ने अपने मातहत से कहा-"जाओ मेरे घर तक जाओ और मेरा तौलिया ले आओ।"

यह उसका काम नहीं था पर वह गया। उसने लाकर बोस को तौलिया दिया तो बॉस ने पूछा -"क्या तुम घर के अन्दर तक गये थे? मुझे घर से फोन आया था कि तुम अन्दर गये थे।"


मातहत ने कहा-"हाँ! तौलिया लेने के लिए अन्दर तो जाना पडेगा न!"


बोस ने कहा-'मैंने तुम्हें घर तक जाने के लिए कहा था न कि घर में। दूसरा यह कि तौलिया मांगकर तुम बाहर भी खडे रह सकते थे। आइन्दा ध्यान रखना।"


अगली बार बोस ने फिर उसे दूसरा सामान लेने के लिए घर भेजा और उसने वह लाकर दिया। बोस की पत्नी ने कई बार उसे घर आने के अन्दर आने के लिए कहा पर वह नहीं गया। बोस ने उससे कहा-"तुम हमारी श्रीमती के आदेश के बावजूद घर के अन्दर क्यों नहीं गये ? क्या मेरे घर के अन्दर कांटे लग रहे थे? आइन्दा ध्यान रखना।"


ऐसा कई बार हुआ। वह अन्दर जाता तो डांट खाता और नहीं जाता तो भी। वह बिचारा खामोशी से सब झेलता। आख़िर बोस की सेक्रेटरी ने बोस से पूछा-" आप हमेशा उसे डांटते रहते हैं? अन्दर जाता है तो। नहीं जाता है तो?"


बोस ने कहा-" मैं बोस हूँ । जब बाहर से मेरे सीनियर यहाँ इंस्पेक्शन के लिए आएंगे तब यह मेरी शिकायत करेगा और मेरा प्रमोशन हो जायेगा। इसकी शिकायत से लगेगा कि मैं बहुत कड़क मिजाज का आदमी हूँ। जब यह शिकायत करेगा यह मेरे घर जाने की बात भी बतायेगा तब सीनियर यही समझेंगे कि यह खुद किसी लायक नहीं है और इसलिये अपने बोस की बुराई कर रहा है।"

वही हुआ भी बोस का प्रमोशन हो गया और वह मातहत अब दुसरे बोस की सेवा भी इसी तरह करता है। मतलब यह कि भारत और अमेरिका का बोस पुराण भी एक समान है और जो लोग सोच रहे हैं कि वहाँ ऐसे बोस नहीं है वह गलती कर रहे हैं।

7/23/07

विश्वास के साथ ही जीना

अगर कभी आपके साथ विश्वासघात हुआ हो तो उसे भूल जाओ। नहीं भूलोगे तो अपने मस्तिष्क की नसों में अनावश्यक खिचाव पैदा करोगे और अंतत: उससे परेशानी तुम्हें ही होना है। जो हुआ है उसे अब तुम मिटा नहीं सकते, और जिसने विश्वासघात किया है वह तो तुम्हें भुलाकर बडे आनन्द से जीं रहा होगा फिर तुम अपने लिए अनावश्यक रुप से संकट क्यों बढ़ा रहे हो।


चाहे एक नहीं अनेक बार तुम्हारे साथ विश्वासघात हुआ हो फिर भी तुम विश्वास का साथ मत छोड़ना-अपने कर्तव्य से कभी नहीं डिगना। अपने कर्तव्य का निर्वहन करना हमारा धर्म है। फल देना नियति ने तय कर रखा है इसलिये उस पर छोड़ दो। विश्वास का प्रतिफल और विश्वासघात का दण्ड दोनों ही नियति ने तय कर रखे हैं। नियति के अपने नियम हैं और उसी के अनुसार वह चलती है, तुम अपने नियम पर चलो वह यह कि अपने कर्तव्य के अनुसार अपनी भूमिका निभाते जाओ ।

इस प्रथ्वी को देखो जो हम सबको पाल रही है और उसने हमारे जीवन निर्वाह के सारे साधन अपनी गोद में एकत्रित कर रखे हैं। केवल इसलिये कि हम यहाँ बहने वाली जीवन धारा के सतत प्रवाह में उसके सहयोगी हो सकें । क्या हमने कभी उसके लिए कुछ किया है अपना जीवन केवल स्वार्थों में ही बिता देते हैं। अगर कोई हमारे साथ विश्वास घात करता है तो उसमें उसका कोई स्वार्थ होता है और वह भी जीवन की धारा को प्रवाहित ही करता है। उसका हित साधन नियति ने तय किया है तो उसने यह भी तय किया कि जैसे जिसकी नीयत होगी वैसे ही उसके नतीजे भी होंगें।

क्या बबूल पर विश्वास किया जा सकता है। हाँ, अगर आप अपने घर के बाहर किसी पेड का पौधा लगाए तो उसके रक्षा के लिए बबूल के कांटे चारों और से लगा दें तो गाय , भैंस या बकरी जैसे पशु उसे नही खा पाएंगे। अगर आप ऐसे ही पौधे बो देंगे तो उन्हें वह सब खा जायेंगे। मतलब कि बबूल भी पाना विश्वास निभाता है।


इस विश्व में जीवन का आधार ही विश्वास है और वह है जीवन के प्रति निष्ठा! अगर अविश्वास के साथ चलेंगे तो वह प्रकृति के विरुद्ध होगा और उससे हमारा शरीर ही रुग्ण होगा और साथ ही बढेगा मानसिक संताप और हम अपने आपको ही एक तरह से दण्ड देंगे । अत: न केवल अपने जीवन में विश्वास को अपनाएं बल्कि स्वयं भी विश्वस्त बनने का प्रयास करें। कितना भी विश्वासघात हो हमें विश्वास का साथ नहीं छोड़ना चाहिऐ। हाँ सतर्क होना चाहिए पर अविश्वास के साथ नहीं बल्कि विश्वास के साथ। कोई धोकिहा न दे इसके लिए सतर्क रहना चाहिऐ पर कोई दे जाये तो सारी दुनियां को अविश्वसनीय नहीं बताना चाहिए ।

7/22/07

तुम भूत से क्यों डरते हो

तुम भूत से क्यों इतना डरते हो


जीते जागते आदमी को


अपने क्रूर इच्छाओं, कामनाओं,


वासनाओं और स्वार्थों की वजह


रौंदते चले जाते हो


कीड़े- मकौडे के तरह


पर भूत के भय से


तुम्हारी आँखें पथरा जाती हैं


पेड के पत्ते की तरह कांपते हो


जब किसी कमजोर को अपने


अरमानों तले कुचल जाते हो


और निरीह पर कभी शब्दों के


तो कभी लकड़ी के डंडे बरसाते



तब तुम्हारी रूह मृत होती है


जो तुम्हारे पापों का बोझ नहीं


उठा पाती और इसलिये तुम्हें


वही डराती है


जब रात में तुम अकेले होते हो

6/15/07

नारद- अपनों से अपनी बात

इस समय मैं नारद पर चल रहे विवाद को देख रहा हूँ , मैंने पहले इस विषय से परे रहने का निर्णय लिया पर फिर लगा कि उन बातों की तरफ अपने मित्रों,साथियों और पाठको को ध्यान दिलाऊँ जिन पर किसी ने अपनी दृष्टि नहीं डाली-और डाली भी होगी तो मेरे ध्यान में नहीं आयी।

आपको अपने निज-पत्रकों (ब्लोग)में शीर्षकों में बल्कि दुसरे के यहाँ पर जाकर कमेन्ट लिखने में भी भाषा का ध्यान तो रखना ही होगा-भले भी उसका लेखक आपका बहुत अच्छा मित्र हो। आप उस पर जाने वाले अकेले व्यक्ति नहीं होते और उस पर अन्य लोग भी जाते हैं और पर उस कमेन्ट का भी प्रभाव होता है । स्वभाव और विचार की दृष्टि से सब लोग अलग-अलग होते हैं -अगर इस क्षेत्र में आकर किन्हीं लोगों का आपस में दोस्ताना हो गया तो अच्छी बात है पर टिप्पणी के वक्त उसे भूल जाये तो आप अपना और अपने उस मित्र का भला ही करेंगे । अगर उस पर किसी कमेन्ट का किसी भद्र पुरुष या महिला के दिमाग पर विपरीत प्रभाव पडा तो आप और उस मित्र का ब्लोग उनके लिए अगम्य और अपठनीय हो जाएगा । खासतौर से अगर इस बात का ख़्याल रखें कि इस क्षेत्र में महिलाये भी हैं और जो शिष्ट और सहज भाषा के उपयोग को अधिक पसंद करती हैं -हम पुरुषों से कहीं ज्यादा । आप अपना आलेख, काव्य या कमेन्ट लिख रहे हैं तो इस बात को ध्यान में रखें कि वह महिलाओं के दृष्टि भी उन पर पडेगी । किसी के निज-पत्रक (ब्लोग ) पर मजाक की बात लिखना भी मुझे गलत लगता है -क्योंकि यह उन पढने वालों के साथ अन्याय है जो इस पसंद नहीं करते। कोई अपने ब्लोग पर मजाक लिखता है -वह भी शालीनता की परिधि में-तो वह चलेगा पर आप भी उस पर शालीनता के साथ ही कमेन्ट करें। तो सही रहेगा ।

कुछ लोगों को मेरी यह बात अनर्गल लग सकती है ,पर मैं व्यवाहारिक बात कर रहा हूँ।कुछ लोग मजाक पर खामोश रह जाते हैं तो लगता है कि उसने हमारी बात को पसंद किया-यह बात समझ लेना चाहिऐ कि और मजाक न बने इसीलिये वह लोग विरोध नहीं करते।अपना मजाक उडवाना भला किसे पसंद आता है ।

निज पत्रकों के शीर्षकों में भी कुछ लोग विवाद उठा रहे हैं । मैं किसी विवाद में न पड़कर अपने मित्रों से कहना चाहूंगा कि हिंदी दुनिया की एक मात्र ऎसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है। हम जैसा लिख रहे हैं वैसा ही बोल रहे हैं-आपके निज पत्रक (ब्लोग)का शीर्षक आपके व्यक्तित्व की पहचान होता है। ऐसे कई लोग हैं जो उन्हें देखते हैं और प्रभावित होते हैं। अब किस पर क्या प्रभाव होता है वही बता सकता है, पर आप उनके बारे में सोचते हुए शीर्षक रखें तो अच्छा रहेगा-नारद के लोग भी बाद में आपत्ति उठाने की बजाय पहले ही उसमें सुधार करवाये तो ठीक रहेगा। तीखे शब्द अपना प्रभाव तीव्र रुप से डालते हैं पर अपनी आभा खोते भी जल्दी हैं । शब्द सहज हौं और भाव तीखा तो लोग उसकी वाह-वाह करते हैं क्योंकि वह हृदयंगम होते हैं ।

मैंने कुछ निज पत्रकों (ब्लोग)को देखा है, उन्हें सजाने में इतने मेहनत की गयी हैं कि दिल देखकर खुश हो जाता है, पर उनके शीर्षक देखकर लगता है कि उन्हें भी सहज और आकर्षक होना चाहिए था। लिखने में उन लोगों के प्रयास भी सराहनीय नहीं होते और भाषा सौन्दर्य भी इतना कि मन खुश जाये पर कभी-कभी उनके विषय निजी और संकुचित दायरे में देखकर निराशा होती है । मुझे लगता है के वह इससे बेहतर कर सकते हैं और पाठक के रुप में मुझे और भी मजा आ सकता है ।

"नारद" जब स्थापित हुआ होगा और आज जो उसका स्वरूप है इसे बीच में बहुत से परिवर्तन आये होंगे और भी आएंगे-हो सकता है इस जैसे और भी मंच बने ,पर इसका महत्त्व ख़त्म नहीं होने वाला । नारद के कर्णधारों में एक सज्जन मेरे लिए मित्र बन गये हैं-उनके सहयोग से मैं इस सीखते-सीखते इस मंच पर आया, हम कभी मिले नही है और वह कभी-कभार मेरे निज-पत्रक पर कमेन्ट देते रहते हैं। इसके बावजूद एक बात मैं स्पष्ट कहूंगा कि नारद की लेखकों को एक मंच पर लाने भले ही बहुत बड़ी भुमिका रही है पर अब वह इसे बिखेर नही सकता, क्योंकि जिन्हे एक दुसरे को पढने की आदत हो गयी है वह कहीं भी एक दुसरे को ढूँढ निकालेंगे, पर केवल हम इसीलिये अतिआत्म्विश्वास में इसकी अनदेखी करें तो वह गलत होगा। हम सब एक-दुसरे से जुडे हैं यह हमारा भाग्य है पर हमें एक दुसरे के जज्बातों पर ध्यान देना चाहिऐ -और खासतौर से वह महिला लेखकों की बढती संख्या देखकर हमे अपने शब्दों के चयन में सतर्कता बरतनी होगी -लिखने और कमेन्ट देने में भी । आप यह कह सकते हैं कि हमारा ब्लोग हैं हम कुछ भी लिखें पर अगर आपसे पूछा जाये कि आप अपने पढने वालों के जज्बातों का ख्याल करेंगे या नहीं ? आप यह सवाल अपने से करके देखे। आप नहीं करेंगे तो नारद के कर्णधारों को करना ही पडेगा ,यह अलग बात है कि ऎसी बातों के लिए कहीं न कहीं उनकी गलतिया को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है ।

मैं एक लेखक हू और चाहता हूँ कि और लेखकों का-जो इस विवाद से त्रस्त हुए है -मनोबल बना रहे। इसीलिये यह लेख लिख रहा हूँ । यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि मेरे साथ सब लोगों का व्यवहार शिष्ट रहा है-किसी ने मेरे निज-पत्रक पर मजाक या कमेन्ट नहीं लिखा और मेरे लिए सब मित्र हैं और अगर मैं उन्हें अपने विचारों से अवगत नहीं कराऊँ तो भी तकलीफ होगी।

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