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4/12/09

योगाचार्य की आड़ में फूहड़ हास्य बेचने की कोशिश-आलेख

यह आश्चर्य की बात है कि टीवी चैनलों पर हास्य के कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिये भारत के विख्यात योगाचार्य के चैहरे और नाम लेते हुए कार्यक्रम प्रस्तुत किये जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि मनोरंजन कार्यक्रम बनाने वालों के पास कार्यक्रमों की कल्पना करने वाले बेहतर लेखकों और पटकथा लेखकों का अकाल पड़ गया है या फिर वह सस्ते और आसान तरीके से मनोरंजक कार्यक्रम करने में ही अपना कला साधना समझते हैं।

पिछले दिनो उन योगाचार्य के मिलते जुलते चैहरे वाले एक पात्र को एक कार्यक्रम में प्रस्तुत किया गया। उसने योगाचार्य की फूहड़ नकल की। बेहूदे ढंग से आसन बताये तो कथित रूप से दवाओं का नाम लेकर विक्रय का अभिनय भी किया। बाद में उसका एक अभिनेता से मिलते जुलते चेहरे वाले पात्र से नृत्य में मुकाबला कराया गया जिसमें वह पराजित हो गया। इस तरह कार्यक्रम निर्माता ने योगाचार्य और भारतीय योग साधना के प्रति हास्य के भाव को संतुष्ट किया। केवल यही कार्यक्रम नहीं है। अनेक धारावाहिकों में भी वाम देव और शामदेव-योगाचार्य से मिलते जुलते नाम-के नाम से पात्र सृजन कर उनके श्रीमुख और अभिनय से योग साधना का मजाक उड़ाया जाता है। यह हास्य नहीं बल्कि एकदम फूहड़ता है। इसमें व्यंग्य की अनूभूति तो कतई नहीं की जा सकती है क्योंकि वह हमेशा व्यंजना विधा में होता है।

वैसे समस्या यह भी हो गयी है कि लेखकों, कलाकारों, कवियों और चित्रकारों, कार्टूनिस्टों की कल्पना शक्ति अब प्रखर नहीं रही है। जिसे देखो वही समाज की ऊंचाई पर विराजमान पात्रों पर लिखना, बोलना और उनको चित्रित करना चाहता है। देखा जाये तो आज के सभ्य समाज में हर जगह ऊंचाई पर पहुंचा व्यक्ति नीचे से ही ऊपर जा रहा है इसलिये उसके गुण और दोष समाज का ही हिस्सा है-मतलब यह कि वह समाज के निचले और मध्यम तबके में भी मौजूद हैं। एक तरह से यह माने कि भारत का बौद्धिक वर्ग यह मानकर चल रहा है कि समाज के निचले तबके में कोई हास्य व्यंग्य या सामाजिक मूल्यों वाली कहानी तो हो ही नहीं सकती यही कारण है कि वह ऊंचे तबके को इंगित करते हुए उस पर व्यंग्य और आलेख लिख रहा है-यह भी कह सकते हैं कि कि उनका विज्ञापन कर रहा है। ऐसे में बाबाओं पर भी अगर कुछ व्यंग्यात्मक बनता है तो उसे यह बौद्धिक वर्ग उसे कतई नहीं छोड़ता।
इस तरह के व्यंग्यात्मक कार्यक्रमों पर इसलिये आपत्ति नहीं की जा रही कि भारतीय अध्यात्मिक विषय के प्रति हमारी कोई ऐसी प्रतिबद्धता है जो अंधा बना देती है जिससे आदमी हर अच्छी चीज को भी नकार देता है। सवाल तो यह उठाया जा रहा है कि टीवी चैनल और फिल्म निर्माता अपने हर कार्यक्रम में समाज को संदेश देने का दावा करते हैं पर वह योगाचार्य पर हास्य कार्यक्रम कर उनके द्वारा दिये जा रहे योग साधना के संदेश में क्या भ्रम पैदा नहीं कर रहे? क्या इस तरह वह कुछ लोगों के योग के प्रति अरुचि का भाव पैदा नहीं होगा?
सच बात तो यह है कि योगाचार्य पर हास्य कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले योग के विषय में कुछ नहीं जानते यह बात यह लेखक दावे से कह सकता है। जो व्यक्ति योग साधन करेगा वह कभी ऐसे विषय पर न तो व्यंग्य लिखेगा न ही कोई ऐसी रचना करेगा जिससे लोग उससे विरक्त हों। पता नहीं योगाचार्य के शिष्य ऐसे कार्यक्रम देख रहे हैं या नहीं। अगर देखते होते तो जरूर आपत्ति प्रस्तुत करते-हालांकि यह भी संभव है कि उनके शिष्यों ने यह सोचा हो कि चलो इस बहाने योगाचार्य जी का नाम तो हो रहा है। मुख्य विषय यह है कि इस तरह योगसाधना मजाक का विषय नहीं है।

अस्पतालों के बाहर जाकर देखिये कितनी भीड़ है। जहां जाईये वहीं लोग शारीरिक और मानसिक बीमारियों से ग्रसित हैं। अगर आप हमसे पूछें कि ‘आप योग साधना क्यों करते हैं?’
हमारा जवाब होगा-‘डाक्टर के पास न जाना पड़े इसलिये!
एक नहीं ऐसा अनेक उदाहरण हम आपको बता सकते हैं जिसमें रोगी से आदमी योगी होकर एक तरह से तर गया। एक व्यक्ति को छहः वर्ष पूर्व उच्च रक्तचाप की शिकायत हुई थी। उसने हमारे साथ ही योगसाधना शुरु की। उसका कहना है कि ‘अब मैं कहां चल रहा हूं, यह तो योगसाधना है जो चला रही है।’
यह मामला धार्मिक आस्थाओं की रक्षा से नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिबद्धताओं से जुड़ा है जिसका दावा टीवी धारावाहिकों के निर्माता और निर्देश करते हैं। क्या उनको लगता है कि योग साधना एक मजाक की चीज है? अगर हां, कहते हैं तो उनकी बुद्धि पर तरस आयेगा। कहने को तो योगाचार्य के एक डुप्लीकेट हैं जो वास्तव में योगसाधना सिखा रहे हैं पर उन पर कोई आपत्ति नहीं कर सकता क्योंकि उनका काम गंभीरता से भरा हुआ है।
हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि आप गलत इलाज से मरीज को और बीमार करने वाले प्रसंगों पर अपनी रचना या कार्यक्रम क्यों नहीं करते? इसके एक नहीं अनेकों उदाहरण यह लेखक अपनी आंखों से देख चुका है। पांच वर्ष पूर्व जब यह लेखक बीमार हुआ था तब डाक्टरों ने इतने टेस्ट करा लिये कि उनकी याद आते ही ऐसा लगता है कि अभी पद्मासन में बैठ जाये। हां, एक होम्योपैथी के डाक्टर ने जरूर हमारे पर्चे पर लिखा था ‘हाइपर एैसिडिटी’ मगर मधुमेह तथा अन्य बीमारियों के परीक्षण के बाद। एसा नहीं कि उसके बाद लेखक बीमार नहीं पड़ा पर बुखार और सिरदर्द जैसी बीमारियों का इलाज उसी योग साधना से किया जिसका मजाक वह लोग उड़ाते हैं।
बहरहाल योगाचार्य के चेहरे और नाम के आसरे हास्य बेचने वाले धारावाहिक निर्माताओं को पहले योगसाधना सीखना और करना चाहिये। वह जिस तरह का फूहड़पन योगाचार्य की आड़ में प्रस्तुत कर रहे हैं उससे बचने का उनके पास यही एक मार्ग है। सवाल धार्मिक आस्था से नहीं बल्कि उन निर्माताओं की स्वघोषित सामाजिक प्रतिबद्धता से जुड़ा है जिसका वह दावा करते हैं। हमें इस बात पर गुस्सा नहीं आता कि वह योगाचार्य पर हास्य क्यों प्रस्तुत कर रहें हैं बल्कि इस बात की चिंता होती है कि वह इस तरह योगसाधना को बदनाम कर समाज को उससे विरक्त न कर दें। यहां यह भी बता दें कि यह लेखक उन योगाचार्य का शिष्य नहीं है पर योग साधना के प्रति अपने अनुभव के कारण लगाव है और यह दावा भी कि ‘जीवन जीने की कला है योगसाधना’।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

3/1/09

योगशिक्षक होने का आशय अध्यात्मिक गुरु होना नहीं-आलेख

भारतीय योग एक प्राचीन ज्ञान है। हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण को योगेश्वर भी कहा जाता है। योगासन,प्राणयाम, और मंत्रजाप की प्रक्रियायें योग साधना का भाग मानी जाती है। योगसाधना के द्वारा अपने शरीर,मन और विचार के विकार निकालने के बाद मनुष्य श्रीगीता का अध्ययन करे तो उसमें पूर्णता आती है। महर्षि पतंजलि द्वारा योग के सूत्रों का प्रादुर्भाव हुआ था। भगवान श्री कृष्ण द्वार प्रदत्त सहज योग ज्ञान उसमें पूर्णता प्रदान करता है। इसलिये ही उनको योगेश्वर भी कहा जाता हैं।

वैसे तो पूरा भारतीय अध्यात्म ज्ञान ही स्वर्ण की खदान की तरह है पर योग और श्रीगीता का ज्ञान उसमें हीरे की तरह चमकते हैं। यही कारण है कि हमारे देश के अनेक कथित संत और गुरु उसकी चमक दिखाकर अपने हित साधते हैं। यहां हम योग साधना और उसके शिक्षकों की बात करें। पहले यहां यह स्पष्ट कर दें कि योग गुरू केवल वही कहला सकता है जो योगसाधना के अलावा श्रीगीता का भी ज्ञान रखता हो क्योंकि शरीर,मन और विचारों के विकार तो योगसाधना से निकल जाते हैं पर फिर लौटने लगते हैं। दिन भर में यह विकार एकतित्र होकर आदमी को फिर मोह माया में फंसा देते हैं। अगर गीता के सहजयोग का ज्ञान हो तो फिर विकार अपना स्थान कभी नहीं बना पाते हैं। हमारे देश में अनेक योग शिक्षक हैं जो योगासन सिखाते हुए अध्यात्मिक गुरु कहलाने लगते हैं। यह सामान्य लोगों का भ्रम है। यही कारण है कि योग साधना सिखाने वाले अनेक गुरु चंदा और दान का संग्रह कर अपने आश्रम बना लेते है। यह आश्रम और दवाईयां बेचने का व्यवसाय करना बुरी बात नहीं है पर यह कार्य साधु का चोला ओढ़कर नहीं करना चाहिये।
हमारे देश में एक प्रसिद्ध योग शिक्षक हैं। सच बात तो यह है कि उनके योग सिखाने के कार्य की जो प्रशंसा न करे उसे अज्ञानी ही माना जाना चाहिये। इन पंक्तियों के लेखक ने कई बार अपने पाठों में उनकी प्रशंसा की है। योग साधना जीवन में व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक रूप से शक्तिशाली बनाती है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि योग शिक्षक अपने आपको अध्यात्मिक गुरु कहने लगें। वह भी ठीक है पर देश के भौतिक विकास की बात करने का आशय यही है कि उनको अपने शिष्यों पर ही भरोसा नहीं है। अगर हम सीधी बात कहें कि अगर आप अगर देश के एक बहुत बड़े वर्ग के लोगों का योग शिक्षा से सुसज्जित करे दें तो फिर कुछ और सिखाने की आवश्यकता नहीं है। फिर तो योग साधना व्यक्ति का स्वचालित बना देती है और वह विकास के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान के पथ पर चलता ही जाता है। हमारे देश में कोई भी विचार व्यक्ति,समाज और देश के क्रम में चलता है जबकि पश्चिमी विचारा धारा ठीक इसके विपरीत है। यानि जब आप सीधे देश के विकास या उद्धार की बात करते हैं तो इसका आशय यह है कि आप उस पाश्चात्य विचाराधारा के क्रम में जा रहे हैं जिसका विरोध स्वयं ही करते हैं। अगर आप यह कहते हैं कि योग के द्वारा आप इस देश में आर्थिक,सामाजिक, और अध्यात्मिक विकास चाहते हैं तो फिर आपका कर्तव्य इतना ही है कि आप अधिक से अधिक लोगों को योग साधना से जोड़ें तो यह काम स्वचालित ढंग से हो जायेगा। अगर आप ऐसा नहीं करते तो इसका आशय यह है कि आपको अपने और अपने शिष्यों पर भरोसा नहीं है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि आपने श्रीगीता के ज्ञान का अध्ययन नहीं किया और किया तो समझा नहीं।

इस देश में जितना योग पुराना है उतना ही उसको सिखाने के लिये गुरु परंपरा भी है। योग साधना का चरम रूप वह है जिसमें व्यक्ति अपना घ्यान जाग्रतावस्था में उस निरंकार से जोड़ लेता है जिसके स्वरूप की कोई कल्पना भी नहीं की जा सकती। गुरु की शिक्षा की चरम सीमा वह है जिसमें उसका शिष्य उससे दूर होकर अपने प्रगति पथ पर चलता जाता है और उसके पास दोबारा लौटकर ज्ञान प्राप्त करने नहीं आता। लौटने का आशय यह है कि गुरु ने पूरा ज्ञान नहीं दिया। हम जिन योगाचार्य की बात कर रहे हैं उनको इस बात के लिये श्रेय दिया जाना चाहिये कि जब सभी चीजों का बाजारीकरण हो गया तब उन्होंने भी योग को वहां स्थापित किया। यह एक कठिन काम था पर उन्होंने किया। ऐसा नहीं है कि बाजार के बाहर कोई योग साधना सिखा नहीं रहा। भारतीय योग संस्थान एक ऐसी संस्था है जो देश ही नहीं विदेशों में भी योग साधना का काम बिना किसी लाभ के कर रही है। इन पंक्तियों के लेखक ने छह वर्ष पूर्व उसके शिविर में योगसाधना सीखी तो फिर पलट कर नहीं देखा-श्रीगीता का ज्ञान कितना विषद और सूक्ष्म है तब ही समझ में आया।

वह येागाचार्य जब श्रीगीता के संदेशों पर बोलते हैं तो हंसी आती है। श्रीगीता में कहीं भी देशभक्ति या विकास की बात नहीं कही गयी है। उसमें विज्ञान में रुचि लेने को कहा गया है पर धरती की कोई सीमा नहीं तय की। आप देखें कि इस समय पूरे विश्व का बाजार देश की सीमाओं को लांघकर इधर उधर फैल रहा है उस पर कोई टिप्पणी नहीं करता पर देश प्रेम की आड़ में लोगों के जज्बातों से खेलने का काम अब भी चल रहा है। योगाचार्य स्वयं ही विदेशों में योगसाधना सिखा रहे हैं तब वह अगर देश प्रेम की बात करते हैं तो फिर सवाल उठता है कि क्या वह केवल इस देश के ही गुरु हैं? भारतीय योग संस्थान निंरंतर अपने यहां योग साधकों में ही शिक्षकों का भी निर्माण करता जाता है ताकि यह क्रम निरंतर बना रहे। उन योगाचार्य ने केाई ऐसा प्रयास नहीं किया कि उनके बाद भी यह क्रम चले। दवाईयों और भक्तों के दान से उनको इतनी राशि मिली कि अपना आश्रम बना डाला। आप पूछिये कि जब यह आश्रम नहीं था तब क्या उनका काम नहीं चल रहा था। अब तो हमेशा ही कहते हैं कि ‘यहां आश्रम बनाऊंगा ओर वहां बनाऊंगा।’ इस पर हैरानी होती है।

सच बात तो यह है कि ईंट,पत्थरों और लोहे से बने यह आश्रम कभी न कभी ढहने हैं पर जो भारतीय योग तथा अध्यात्मिक ज्ञान है वह हमेशा ही शाश्वत रूप से बना रहेगा। महर्षि पतंजलि का कहीं कोई आश्रम नहीं दिखाई देता। कहते हैं कि वह अपने शिष्यों को पर्दे के पीछे से बैठकर बात करते थे क्योंकि उनके तेज को सहन करने की क्षमता किसी में नहीं थी। भगवान श्रीकृष्ण का कहीं कोई महल नहीं है पर उनका नाम पूरे विश्व में फैला है। हमारे देश के भक्तों के हृदयों में उनके महल इस तरह बने रहते हैं कि उनका कभी पतन नहीं होता। जब योग का नाम आता है तो महर्षि पतंजलि का नाम अवश्य लिया जाता है। श्रीगीता के ज्ञान पर वह प्रसिद्ध योग शिक्षक बोलते बहुत हैं पर समझते कितना है? यह अलग से चर्चा का विषय है।
निष्कर्ष यह है कि अगर आप योग साधना किसी से सीखते हैं तो मजे से सीखिये पर फिर पलटकर उसके पास मत जाईये। उसके बाद अगला लक्ष्य श्रीगीता को पढ़कर उसका ज्ञान प्राप्त करने में लगायें। याद रखिये। भगवान श्रीराम ने विश्वमित्र को अपना गुरु बनाया और उनसे शिक्षा प्राप्त की और फिर निकल पड़े अपने जीवन पथ पर। भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि संदीपनि से शिक्षा प्राप्त की और महाभारत युद्ध में श्रीगीता का ज्ञान स्थापित किया। गुरु कभी समाज का स्वये नायक न बनकर अपने शिष्यों को बनाते हैं। पुज्यनीय बने रहते हैं पर आजकल के अनेक अध्यात्मिक गुरु तो नायकों की तरह दिखना चाहते हैं और अपने आसपास फिल्मी तारिकाओं का इसलिये जमावड़ा लगाते हैं ताकि भक्तों पर प्रभाव बढ़े।
वह योगाचार्य पहले आसन सिखाने के लिये कोई व्यक्ति रखते थे पर अब स्वयं ही करते हैं। कहीं सुनने को मिला कि जो व्यक्ति करके दिखाता था वह उन योग शिक्षक की बराबरी का ही था पर योगाचार्य अब समाज में प्रसिद्ध हो गये था इसलिये उसे वह भाव नहीं दे रहे थे। शायद धन को लेकर मतभेद हो गये और वह उनका साथ छोड़ गये। अब उन योगाचार्य द्वारा आसन करने के बाद माईक पर बोलते हुए हांफने की आवाज टीवी पर सुनने को मिलती है। यह आवाज किसी भी व्यक्ति में नकारात्मक भाव पैदा करती है जो कि योग साधना के विपरीत है। सच बात तो यह है कि कहते हैं कि माया बड़े बड़े ज्ञनियों को अपने फंदे में फंसा लेती है। वह योगाचार्य जब आश्रम बनाने और देश और समाज के विकास की बात करते हैं तो ऐसे लगता है कि माया ने उन पर अपना प्रभाव दिखा दिया है। भले ही वह श्रीगीता के ज्ञान की बात करते हैं पर अगर उसके आधार वह आत्ममंथन करें तो उनको यह अनुभव होगा कि जिस माया को सामान्य आदमी अपनी जेब में और संत पांव तले रखते हैं वह उन पर सवारी कर रही है। मगर आत्म मंथन करना भी इतना आसान नहीं है जब यह भ्रम हो जाये कि हम ही परमज्ञानी हैं।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

12/27/07

उनकी रियलटी में न तो प्रेम है न झगडा

अपने रियलटी शो में वह इतना
रियल हो जाते हैं
कि घर के झगडे
टीवी के सामने लाते हैं
फिल्म के परदे पर
प्रेम करने वाले भी
जोरदार झगडा करते हुए
बहुत जल्दी अपनी औकात पर उतर जाते हैं
उनकी रियलटी में न तो प्रेम है न झगडा
सब जगह केवल झूठ बेचते नजर आते हैं
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