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11/5/10

छोटी खुशियों से बचाते हैं अपना घौंसला-हिन्दी कविता (chhoti khushiyan aur ghonsla-hindi kavita)

दिवाली की रात
पटाखों की गूंज रही है
आवाज चारों तरफ,
आकाश के अंधेरे को भी
धुंआ अधिक काला किये जा रहा है,
लगता है
खुशी साक्षात उतरकर जमीन पर आयी है।
सोचता हूं
कौन है वह लोग
जो देश की ग़रीबी पर
झूठे आंसु बहाते हैं,
उनकी मदद के नाम पर करते दलाली
ज़माने के आगे चंदे के लिये हाथ बढ़ाते हैं,
कौन है वह चित्रकार
जो देश की भुखमरी पर
बनाते हैं डराने वाली तस्वीर,
दुनियां को दिखाकर इनाम पाते
बदल देते अपनी तकद़ीर,
कौन है वह शायर जो
जो बेबसों पर हमदर्दी दिखाते हुए
लिख जाते हैं गज़ल,
लफ्जों के प्यासे अमीरों को
खुश करने के लिये दर्द सजाते
बात आम इंसान की
महफिलों के लिये ढूंढते महल,
आधे पेट भरे,
फटे कपड़े पहने,
जिनके हाथ में हैं पसीने के गहने,
गरीब और मज़दूर
अपने हाथों से ही छोटी छोटी खुशियां
यूं ही जुटा लेते हैं,
चाहे उनकी मदद रास्ते में
जज़्बात और हमदर्दी के दलाल उठा लेते हैं,
गरीबों और मज़दूरों की लाचारी से भी
बड़ी है उनके बाजूओं की ताकत
और दिल का हौंसला,
अभावों के हमले में भी
छोटी खुशियों से बचाते हैं अपना घौंसला,
हमदर्दी के सौदागरों ने यह
बात कभी नहीं समझाई,
किसी तरह की अपनी कमाई।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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4/6/10

इश्क और डॉलर-हास्य व्यंग्य कवितायें (ishq aur dollar-hasya vyangya kavita)

सच्चा प्यार जो दिल से मिले
अब कहां मिलता है,
अब तो वह डालरों में बिकता है।
आशिक हो मालामाल
माशुका हो खूबसूरत तो
दिल से दिल जरूर मिलता है।
----------
आज के शायर गा रहे हैं
इश्क पर लिखे पुराने शायरों के कलाम,
लिखने के जिनके बाद
गुज़र गयी सदियां
पता नहीं कितनी बीती सुबह और शाम।
बताते हैं वह कि
इश्क नहीं देखता देस और परदेस
बना देता है आदमी को दीवाना,
देना नहीं उसे कोई ताना,
तरस आता है उनके बयानों पर,
ढूंढते हैं अमन जाकर मयखानों पर,
जिस इश्क की गालिब सुना गये
वह दिल से नहीं होता,
डालरों से करे आशिक जो
माशुका को सराबोर
उसी से प्यार होता,
क्यों पाक रिश्ते ढूंढ रह हो
आजकल के इश्क में
होता है जो रोज यहां नीलाम।
----------

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3/11/10

शायदी यही विकास कहलाता है-हिन्दी कविता (it is devlopment-hindi satire poem)

कच्ची बस्तियों का उजड़ना
पत्थर के महलों का बसना ही
शायद यही विकास कहलाता है।
गांवों का बढ़ते बढ़ते शहर हो जाना
शहरों में दिलों का सिकुड़ जाना
शायद यही विकास कहलाता है।

नीयत का काला हो जाना,
बदनीयत को चतुराई जताना,
शायद यही विकास कहलाता है।

आजाद मजदूर का गरीब हो जाना
कलम के गुलाम का अमीर के साथ हो जाना
शायद यही विकास कहलाता है।

खुद की सोच से ही डर जाना
अमीर के इशारे पर
जमाने का जागना और सो जाना
शायद यही विकास कहलाता है।

कुदरत की सांसों को बादशाह का तोहफा कहना
दौलतमंदों के नखरों को आदत की तरह सहना
शायद यही विकास कहलाता है।

किसे समझायें कि
खुद को समझे बिना
जमाने को नहीं समझा जा सकता है
बंद कर दी अपनी अक्ल ताले में
तो कोई भी बिना जंजीरों के
भीड़ में भेड़ की तरह ले जायेगा तुम्हें
पर आंख और कान होते हुए भी
इंसान हो गये गुलाम
शायद यही विकास कहलाता है।
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1/17/10

तटस्थता-हिन्दी शायरी (Nutural coman men-hindi poem

आंगन में सांपों की

आपसी ज़ंग  देखकर

हम खामोश रहे।

हमें मालुम था कुछ देर बाद

दोनों ही थक कर चले जायेंगे

या आपस में लड़ते मुर्दे का रूप पायेंगे

अब समझ में आया कि

इतिहास की ज़ंगों में

आम इंसान तटस्थ क्यों रहे।

--------



एक मुकुट पहनेगा तभी

जब दूसरा सिंहासन से हटेगा।

इतिहास गवाह है कि

हुक्म करने की जंग में

जमाने का भला करने का दावा

हमेशा धोखा रहा है

आम इंसान के सामने खड़ा रहेगा

हमेशा तलवार का खौफ

लड़ा तो कोई ताज नहीं मिलेगा,

मरा तो कहीं नाम नहीं दिखेगा,

तटस्थ रहकर जान बचा ले आम इंसान

यही है बेहतर

जीत का फल

केवल इज्जतदारों में बंटेगा।

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12/26/09

दिन का दावा, रात का छलावा-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (din ka dava,rat ka chhalava-hindi vyangya kavieaen)

करते हैं जो दिन में

नैतिक आदर्श की बात,

बेशर्म बना देती है

उनको अंधियारी काली रात।

चेहरे की लालिमा को

उनके अंतर्मन का तेज न समझना

मेकअप भी निभाता है

चमकने में उनका साथ,

सूरज की रौशनी में

जिस सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरते

उसी की इज्जत पर रखते हैं रात को लात।।

---------------
खुल रही है समाज के ठेकेदारों की कलई

शरीर पर हैं सफेद कपड़े, नीयत में नंगई।

बरसों तक ढो रहा है समाज, सरदार समझकर

हाथ जोड़े खड़े मुस्कराते रहे, दिल जिनसे कुचले कई।।

नारी उद्धार को लेकर, मचाया हमेशा बवाल

मेहनताने में मांगी, हर बार रात को एक कली नई।

-------------

टूट रहा है विश्वास

मर रही है आस।

जिन्होंने दिये हैं नारी उद्धार पर

कई बार दिन में प्रवचन,

करते रहे वही हमेशा

काली रात के अंधियारे में काम का भजन,

देवी की तरह पूजने का दावा करते दिन में

रात को छलावा खेलें ऐसे, जैसे कि हो वह तास। 
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12/21/09

किश्तों में डूब न जायें जिंदगी-काव्यात्मक चिंतन (kishton par zindagi-kavay chitan)

आजकल कर्जे लेकर सामान खरीदने का एक रिवाज चल रहा है। अमीर न होने पर भी वैसा दिखने वालों की चाहत पूरा करना आसान हो गया है। किश्तों पर अपने लक्ष्य की किश्ती चलाना आसान लगता है पर उसे निभाना उतना सहज नहीं रह जाता। एक आम मध्यम या निम्न वर्गीय व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह अपनी आयसीमा आसानी से बढ़ा सके। उल्टे बढ़ती महंगाई से सभी का किचन व्यय बढ़ जाता है इधर किश्त और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी आने से संकट कभी भी गहरा सकता है।
दरअसल पाश्चात्य सभ्यता पूरी तरह से उपभोक्तावाद पर आधारित है। इसमें अमीर होने से अधिक वैसा दिखने के विश्वास पर आधारित है। कहा जाता है कि आकर्षक, चमत्कारी तथा चतुर दिखोगे तो दुनियां जीत लोगे। वैसे अपने यहां कहा जाता है कि चार्वाक ऋषि कह गये हैं कि ‘कर्ज लेकर खूब घी पियो’। उनका आशय कतई वैसा नहीं रहा होगा जैसा बताया जाता है। ऐसा लगता है कि उन्होंने व्यंग्य विनोद में किसी से कहा होगा जिसे एक कथन मान लिया गया। कर्ज लेकर घी पीना आसान नहीं है। आजकल तो कर्जे देने वाले उसके वसूल करने के तरीके भी जानते हैं। कई लोगों ने अग्रिम में ही अपने चैकों पर हस्ताक्षर कर कर्ज लिये और बाद में उनको सींखचों के पीछे जाना पड़ा।
दरअसल समाज में अमीर या आकर्षक दिखने की ललक एक भ्रम है। भले ही लोग कहते हैं कि ‘आजकल अमीरों की इज्जत है’, या ‘गरीब की भला कैसी इज्जत’, पर यह केवल छलावा है। दरअसल अगर आप जीवन सहजता से गुजारें और अपने अंदर कोई कला या गुण पैदा करें तो निश्चित रूप से आपका सम्मान होगा। जब सारी दुनियां पैसे के पीछे भाग रही है और आप भी तो फिर यह आशा क्यों करते है कि कोई आपका सम्मान करे।
आप ऐसी महफिलों में जाते हैं जहां दिखावा पंसद लोग अपनी हांकते हैं और आप भी हांक रहे हैं पर आपका कोई ऐसा गुण नहीं जिसे वहां दिखा सकें तब सम्मान की आशा क्यों करते हैं?
दरअसल आज के समय सबसे अधिक सुखी व्यक्ति वही है जो स्वतंत्रता पूर्वक सोचता और रहता है। वरना तो लोगों का मान, सम्मान तथा स्वाभिमान अपने से अधिक अमीर के यहां गिरवी है। सभी के ऊपर कोई न कोई है। अगर ऐसा न हो तो अमीर लोग क्यों मंदिरों में जाकर मत्था टेकते हैं।
कई बार मंदिरों में ऐसे लोगों को देखकर आश्चर्य होता है जिनके पास धन और वैभव का भंडार है पर वह मत्था टेकने वहां आते हैं। तब मन में ख्याल आता है कि ‘जब इस आदमी के पास सभी कुछ है फिर यह यहां क्यों आता है?’ तय बात है कि उनके पास मन की शांति नहीं है। यही मन की शांति जिसके पास है वही सबसे अधिक धनी है।
कहते हैं न कि आप बिस्तर खरीद सकते हो पर नींद नहीं! भोजन खरीद सकते हो पर भूख नहीं। मकान खरीद सकते हो पर आनंद नहीं। यह एक विचारणीय बात है। अंतिम सत्य यह है कि अगर आपको नींद अच्छी आती है, खाना जैसा भी मिले पच जाता है और जहां बैठे हैं वही आराम मिल रहा है तो फिर किसी प्रकार की अन्य अमीर रूप की कल्पना नहीं करें क्योंकि अमीर होने पर ऐसे सुख विदा भी हो जाते हैं। इस पर कहीं कर्जे ले लिये तो फिर जिंदगी भी दांव पर लग सकती है।
 इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां
ऊंची इमारत में माचिस जैसा
बड़ा खरीदने में डर लगता है।
रोज चढ़ूंगा सीढ़ियां
सिर पर कर्जे का बोझ लेकर
यह डर सताता है
ब्याज भी शत्रु जैसा नजर आता है
किश्तों में डूब न जायें
जिंदगी की किश्ती
भंवर सामने आता लगता है।
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12/19/09

कायर और कातिल-हिन्दी व्यंग्य कविता (kayar aur katil-hindi vyangya kavita)

 बंदूक बनाने वाले को

उसके विक्रय सलाहकार ने

बिक्री बढ़ाने का

मशविरा कुछ इस तरह दिया

‘शहर भर के कातिलों और लुटेरों को

अपनी बंदूकें इस्तेमाल के लिये

मुफ्त प्रदान कर दो,

चाहो तो कमीशन से भी उनका मुंह भर दो,

उनको अपना पेशा तो उनको करना है,

किसी तरह पेट भरना है,

जहां वारदात  होगी,

तुम्हारे बंदूक के इस्तेमाल की भी खबर होगी,

मुफ्त में विज्ञापन हो जायेगा,

हर कायर अपनी सुरक्षा के लिये

तुम्हारी बंदूक खरीदने आयेगा।

कत्ल और लूट की एक वारदात में

एक बंदूक का इस्तेमाल होगी

पर तुम्हारे यहां लाखों का सौदा चला आयेगा।।’’
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12/10/09

स्वर्ग और परियां किसने देखी-हिन्दी व्यंग्य कविता (svarg aur pariyan-hindi satire poem)



स्वर्ग की परियां किसने देखी

स्वयं जाकर

बस एक पुराना ख्याल है।

धरती पर जो मिल सकते हैं,

तमाम तरह के सामान

ऊपर और चमकदार होंगे

यह भी एक पुराना ख्याल है।

मिल भी जायें तो

क्या सुगंध का मजा लेने के लिये

नाक भी होगी,

मधुर स्वर सुनने के लिये

क्या यह कान भी होंगे,

सोना, चांदी या हीरे को

छूने के लिये हाथ भी होंगे,

परियों को देखने के लिये

क्या यह आंख  भी होगी,

ये भी  जरूरी  सवाल है।

धरती से कोई चीज साथ नहीं जाती

यह भी सच है

फिर स्वर्ग के मजे लेने के लिये

कौनसा सामान साथ होगा

यह किसी ने नहीं बताया

इसलिये लगता है स्वर्ग और परियां

बस एक ख्याल है।



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11/18/09

अखबार की सुर्खियों में-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (akhbar ke surkhiyan-hindi vyangya kavitaen)

 हमने कहा था

‘जख्म पर मरहम लगा दो’

उन्होंने नमक छिड़क दिया।

पीड़ा से हम कराहते रहे

उन्होंने कहा

‘कुछ जोर से कराहो

ताकि हम मरहम लगाकर

जमाने को बता सकें कि

हमने किसी का दर्द कम किया’।

------------

नजारे तो इस दुनियां में बहुत हैं

मगर लोगों को बस दंगल ही भाता ।

अपने मंगल की बजाय

दूसरे के अमंगल पर मजा आता।

जिंदगी खेल है नजरिये का

जैसी नजर

वैसा ही जमाना हो जाता।

तारीफ के लिये कौन करे

इंसानों का भला

शिकायत के लिये

मजबूर करने वालों का नाम

अखबार की सुर्खियों में ही नजर आता।

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11/14/09

राहत और परेशानी-व्यंग्य कवितायें (rahat aur pareshani- hindi vyangya kavitaen)

आसमान से बादल बरस रहे हैं
क्योंकि पेड़ पौधे, पक्षु और पक्षी
पानी को तरस रहे हैं।
आम इंसान को खुशफहमी है कि
देवता उस पर मेहरबान है
उनकी पूजा पर ही ध्यान है,
कुछ इनमें ऐसे भी है
जो राहत का करते हैं व्यापार
सूखा जाता देख उनका दिल झूलस रहे हैं।
-----------
अपने हर ख्वाब को
सच में बदलता देखकर भी
इंसान हताश हो जाता है,
अब नया कौनसा देखे
यह सोचकर परेशानी जुटाता है।

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11/9/09

हमदर्दी जताने की कला-व्यंग्य कविता (hamdardi ke kala-vyangya kavita)

हमदर्दी जताने की कला
हमें कभी नहीं आई
किसी का दर्द देखकर
मन रोया मन भर आंसु
पर आंखें दरिया न बन पाई।
शायद लोग दिमाग से सोचते हैं
इसलिये हमदर्दी के शब्द जल्दी ढूंढ लेते
दिल तक नहीं पहुंचता
दूसरे का दर्द
कर लेते हैं दिखावे में कमाई।
नहीं करना सीखा पाखंड
इसलिये दूसरे के घाव पर मरहम लगाकर भी
अपने लिये ओढ़ लेते हैं तन्हाई।

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10/26/09

मतलब के पैंतरे अधिक दिन नहीं चलते-व्यंग्य कविता (matlab ke dav-hindi kavita)

जो दूसरे का आशियाना उजाड़कर
उस जमीन पर अपना महल बनाते हैं।
समाज सेवा के लिये वही
भरी भीड़ में पुरस्कार पाते हैं।
करते हैं जो अपने कदम तले
मासूम जज़्बातों का कत्ल
वही देश भक्ति का नारा
बड़े जोर शोर से लगाते हैं।

जमाने के बदलाव की बात करने वाले
अपने सिर पर पुरानी किताबें ढोते हुए
तरक्की का संदेश सुनाते हैं।
रोज जमाने से बेवफाई करने वाले
लोगों का वफा के लिये जगाते हैं।
चीख रहे बड़े बड़े लोग
अपनी चैन की नींद के लिये
भीड़ में चेतना लाते हैं।
मतलब के पैंतरे अधिक दिन नहीं चलते
शायद इसलिये सभी लोग अनसुनी कर जाते हैं।
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10/22/09

प्रश्न वन-त्रिपदम (prashna van-tripadam)

मन में विष
किसमें नहीं होता
शुद्धि कहां है।

सोच से जड़
हो गये ये इंसान
बुद्धि कहां है।

जले शब्द
उगलते चूल्हे
वाणी कहां है।

सभी भिखारी
ढूंढ रहे हैं माल
दानी कहां है।

लंगड़ी भाषा
सिखाई गुरुओं ने
बोध कहां है।

शिक्षित झुंड
शहर में घूमता
शोध कहां है।

दर्द की दवा
मिलती कभी कभी
रोज कहां है।

प्रश्न वन
घना है चारों ओर
खोज कहां है।

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10/16/09

तरक्की और तबाही-व्यंग्य कविता (taraqi aur tabahi-hindi vyangya kavita)


जरुरतों की शयों का रोज शक्ल बदलना
दौलत के पहाड़ पर
इंसानों की चाहतों का चढ़ना
तरक्की का यह पैमाना नहीं होता।
इंसानों के जज़्बातों की उम्र
समय के साथ न बदलती हो
ख्यालों का चैहरा भी
हालातों के साथ नया नज़र न आये
तब यह तरक्की एक वहम होती है
चलती दुनियां तो दिखती
पर जमाना वहीं का वहीं होता है।
-----------------
घर में लाते जब कोई नया सामान
उसकी जगह छोड़ता हुआ
पुराना कबाड़ कहलाता है।
कमरे में दिखती है तरक्की
बुखारी में तबाही का मंजर नज़र आता है।
फिर भी किसे फिक्र है
तरक्की दिखाते है सभी को
तबाही का मंजर तो पर्दे में छिपाया जाता है।
.......................................

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10/14/09

बाज़ार के लिखे शब्दों पर होंठ हिलाते-व्यंग्य कविता (bazar ke shabd-hindi vyangya kavita)

अख़बारों में छपे बड़े बड़े शख्सों के
बयान अब आखों से आगे बढ़कर
दिल की गहराई में नहीं जाते.
ढेर सारा कागज़ का भंडार है चारों तरफ
उसे खाने के लिए अक्षर पक्षी चाहिए
स्याही की बह रही हैं धारा,
मिलना जरूरी है उसको भी किनारा,
बाज़ार के सौदागर केवल शय ही नहीं बेचते,
ज़माने पर काबू रखने का भी खेल खेलते,
उनका खामोश रहना जरूरी है
इसलिए बोलने के लिए वह इंसानी बुत लाते.
जो बाज़ार के लिखे शब्दों पर बस होंठ हिलाते.

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8/27/09

गरम कुर्सी-हिंदी हास्य कविता (hot seat of sach ka samana-hindi hasya kavita)

इश्क परवान चढ़ जाये
माशुका बीवी बन साथ निभाये
इसलिये आशिक ने कमाने के लिये
सच की पहचान करने वाली मशीन की
दुकान लगाई
और यह खबर माशुका को सुनाई।
सुनकर वह हो गयी पसीना पसीना
पूछने पर बोली
‘’यह कैसी दुकान लगायी।
अरे, तुमने सुना नहीं
इसके चक्कर में अमेरिका में
कितने घर बरबाद हुए हैं
फिर अपने देश में भी हो चुकी
कई लोगों की जगहंसाई।
कोई और काम ढूंढो
कहीं काम नहीं चला तो तुम
कभी खुद गरम कुर्सी (हाट सीट) पर बैठोगे
कभी मुझसे बैठने को कहोगे
कहीं हो न जाये तुम्हारे और मेरे बीच लड़ाई।’’

सुनकर आशिक हंसा और बोला
‘‘अरे, यह बात नहीं है
यह एकदम नयी चीज है
अपने देश का आदमी बस
नयी चीज चाहता है
अपने पुराने ज्ञान से भागता है
अभी तो दुकान पर बोर्ड ही लगा है
तब ढेर सारे लोग तो आ रहे हैं
अपनों का सच जानने उनको ला रहे हैं
जानते हैं सब
सच कड़वा होता है
कभी कभी दुश्मनी का बीज भी बोता है
फिर भी अंधे होकर
फैशन की दौड़ में जा रहे हैं
किसी का घर बिगड़े हमें क्या
अपनी रोजी निकलनी चाहिये
जहां तक तुम्हारे और मेरे बैठने की बात है
भला कोई हलवाई अपनी मिठाई खाता है
जो हम गरम कुर्सी पर बैठेंगे
बहुत सोचकर समझकर ही मैंने यह योजना बनाई।"

..................................
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8/7/09

ईमानदारी फिर कौनसी शय है-हास्य कविताएँ (imandari kaunsi shay hai-hasya kavita)

जैसे जैसे दौलत बढ़ती गयी
विश्वास कम होता गया।
वफादारी बिकती है बाजार में
फिर भी इंसान वफा से
महरूम होता गया।
................................
कहते हैं पैसे से बाजार में
सब मिलता है।
फिर भी खुश क्यों नहीं इंसान
दुनियां की हर शय मयस्सर है
गमों में डूबा दिखता है।
हर इंसान दिल की बात
कहते हुए रोते शब्द लिखता है।
.............................
सुना है बाजार में जो चीज कम दिखती
उसकी कीमत ऊंची मिलती।
कमबख्त! ईमानदारी फिर कौनसी शय है
जो लापता है फिर भी
किसी भाव में नहीं बिकती।
.........................

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7/4/09

इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम-हिंदी शायरी (hindi shayri)

अपने पेट के लिये करते हो काम
लेते हो पूरा दाम।
अपने खून को पसीने की तरह
बहते क्यों कराहते हो
कोई आकर हमदर्दी दिखाये
क्यों चाहते हो
दौलत के पत्थरों से
दया की उम्मीद क्यों जगाते हो
ओ! मेहनतकशों को
इज्जत दिलाने की ख्वाहिश रखने वालों
बसते हैं जहां जज्बातफरोश
उस महफिल में उनको
चमकाने का झूठा दिलासा क्यों दिलाते हो
अपने लहू से सींचते हैं जो
अपने ही रोटियों का गुलशन
उनको इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम।
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12/27/07

उनकी रियलटी में न तो प्रेम है न झगडा

अपने रियलटी शो में वह इतना
रियल हो जाते हैं
कि घर के झगडे
टीवी के सामने लाते हैं
फिल्म के परदे पर
प्रेम करने वाले भी
जोरदार झगडा करते हुए
बहुत जल्दी अपनी औकात पर उतर जाते हैं
उनकी रियलटी में न तो प्रेम है न झगडा
सब जगह केवल झूठ बेचते नजर आते हैं
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12/21/07

उदासी का साया

मन से मनुष्य कहलाया
चलता है उसी के इशारों पर
अन्दर बैठे अहंकार ने
स्वयं ही चलने का अहसास कराया
कह गए बडे-बडे सिद्ध
अपने मन को पहचानो
कभी नाचता है
कभी भागता है
कभी भक्ति भी चाहता है
स्वयं मनस्वी होकर चलो
यही सभी ने समझाया

पर आदमी नहीं समझता
अपनी बुद्धि और अंहकारवश
दूसरों में तलाशता अपने लिए अक्ल
माया के सिंहासन पर बैठे
बुतों के इर्दगिर्द देकर परिक्रमा देकर
बहुत सुकून अनुभव करता
तन की खुशी को ही मन की समझता
इसलिए हांक कर ले जाते है
इस ज़माने के उसे नये खैरख्वाह
रुपहले परदे पर देखे दृश्य को
असली समझता
नाम के मनुष्य बहुत हैं पर
सबका मन मुरझाया
जब तक चलते हैं दृश्य
गूंजता हैं कानों में भयानक शोर
तब तक चलता है
अकेले में छा जाता है उस पर उदासी का साया
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