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5/25/17

पतझड़ में सावन का सपना बिक जाता है-फेसबुक पर लिखी गयी व्यंग्य कवितायें (peom writhing ong Fecebook)

वह सजते हैं
बाज़ार में उन्हें जो सजना है।
सूरत चमकानी है
अपनी काली नीयत से जो बचना है।
---
मन का क्या
उसे तो मचलना है।
पैरों के इरादे जरूर देखना
कठिन राह पर जिन्हें चलना है।
-----
अपनी मस्ती में जीने की
आदत पुरानी हो गयी है
नयी अदा दिखाने की
चाहत ही खो गयी है।

पतझड़ में
सावन का सपना
बिक जाता है।
अभावों में
हमदर्दी के बाज़ार में
वादा ही टिक पाता है।
---
दूरदराज के अपने किस्से
सुनाकर भरमाते हैं।
अपने घर के हाल पर
वही बोलने में शरमाते हैं।
--
नया मुखौटा लगाकर
रोज नया वादा कर जाते हैं।
हर बार माल पार
पहले से ज्यादा कर जाते हैं।
-------
चंद चेहरे होते
जिनकी एक पल की नज़र
निहाल कर देती है।
पर थोड़ी तसल्ली भी
बेहाल कर देती है।
-----
अब कोई साथ निभाये
बड़ी बात होती है।
वरना तो यकीन की
रोज मात होती है।
------
सभी के अपने दाव हैं
कोई छिपकर कोई दिखकर
लगाता है।
जो जीता वहीं
सिकंदर कहलाता है।
--
महलों के मरीज-हिन्दी व्यंग्य कविता
----
शीत यंत्र में
अपनी देह
गर्मी से बचा रहे हैं।
दवा से
खाना पचा रहे हैं।
कहें दीपकबापू
पंचतारा अस्पतालों में
चिकित्सा के व्यवसायी
महलों के मरीज नचा रहे हैं।
-----------
उधारीकरण के दौर में
ठगों के भी मजे हैं।
मन के बीमार
ब्याज पर
शिकार की तरह सजे हैं।
-------
तश्तरी में सजाकर
कोई तोहफे की तरह
सम्मान नहीं देता।
नरक के भय बिना
कोई दान नहीं देता।
------
दौलत सब कुछ होती
अमीर चिंता में नहीं जीते।
मेहनतकश जिंदा नहीं होते
केवल हवा खाते पानी पीते।
--

9/25/16

किताबों के शब्द जिंदगी की चाल नहीं तय नहीं करते-दीपकबापूवाणी (kitabon ke shabd zindagi ki chal tay nahin karte-DeepakBapuWani)


मत पूछना हमारा पता-हिन्दी कविता
--------------------
अपने कंधों पर
स्वार्थों की अर्थी
ढोना आसान नहीं होता।

जब तक चलती सांस
दौलत से रिश्ता तोड़ना
आसान नहीं होता।

कहें दीपकबापू सब मित्रों से
मत पूछना कभी हमारा पता
अपनी लतों के
पीछे भागती भीड़ से
गुम होना आसान नहीं होता।
--------------
अमीरों की यह खुशफहमी है कि उनकी दुनियां ही में गरीब भी रहते हैं।
पैसे की जंजीर में बंधे अक्लमंद नहीं समझाते इसे नसीब भी कहते हैं।
-------------
इंसानों में स्वार्थ मे बनते संबंध, बुद्धिमान भावना के नहीं बांधे बंध।
‘दीपकबापू’ जिंदगी का सच न जाने, इश्क के दरिया में बहें जो अंध।।
----------------------------------------

बुद्धि के द्वार बंद जिनके वही समाज के महानायक बन जाते हैं।
अपनी सोच जो भूलते चतुर व्यापारियों के गायक बन जाते हैं।
--------------
धरती के पुत्र सभी कहलायें फिर भी टुकड़ों के सौदे किये जाते हैं।
फसल लहराते किसान अपना खेत धनपतियों के नाम किये जाते हैं।
--------------
हर दिन हर पल जिंदगी रंग बदले यह समझता कौन है।
राह चलने के लिये है जहां रुके वहां जिंदगी का मौन है।
-------------------
हम उसे अब कहां ढूंढें, अपना पता दिये बिना वह चला गया।
क्या आस करें, दिल में हमारे नाम की तख्ती भी जला गया।।
--------------
किताबों के शब्द जिंदगी की चाल नहीं तय नहीं करते।
स्वच्छंद पक्षी देखो हवाओं की चाल से भय नहीं भरते।
------------

8/17/16

चिंतायें बेचते महंगे दाम-हिन्दी कविता (Chintaey bechte Mahange Dam-HindiPoem)


सोचते सभी
मगर कर नहीं पाते
भलाई का काम।

कहते सभी निंदा स्तुति
मगर कर नहीं पाते
बढ़ाई का काम।

कहे दीपकबापू चिंत्तन से
जी चुराते मिल जाते 
हर जगह लोग
चिंतायें बेचते महंगे दाम
करते लड़ाई का काम।
------------

6/17/16

फल नहीं देता-हिन्दी व्यंग्य कविता(Fal nahin deta-HindiSatirePoem)



जिस दिल में
प्रेम बीज बोया नहीं
मान का फल नहीं देता।

भावनाओं का वृक्ष
सूख जाने पर
हमदर्दी का फल नहीं देता।

कहें दीपकबापू रूखेपन से
इंसान सुखा देता संबंध
बेचैनी बढ़ती हृदय की
कीमत लेकर भी बाज़ार में
कोई उम्मीद का फल नहीं देता।
-----------



2/26/12

दौलत के हाथ-हिन्दी कविता (daulat ke hath-hindi kavita,hand of maney-hindi poem)

उनके हाथ लंबे हैं,
क्योंकि वह दौलत के खंभे हैं,
लाचार हैं
इशारों से काम चलाते हैं,
झुक कर कुछ नहीं देख सकते
राह चलते हुए कंकड़ों से
टकराने पर भी लड़खड़ाते हैं।
कहें दीपक बापू
ऊंचाईयों पर सांस लेना कठिन है,
पहाड़ पर खौफ में ज़िंदगी
चाहे रात या दिन है,
दौलत और शौहरत की चाहत
जब पूरी होती है,
उसे बचाने में
काया की हिम्मत अधूरी होती है,
जिनके पेट बड़े हो गए बैठ बैठे
रोटी की भूख उनके लिए छोटी है,
दिल हो गए छोटे
मेहनतकशों के लिए उनकी नीयत खोटी है,
कर लेते हैं खुद को वह महलों में बंद
बाहर फैले बेबसी के माहौल देखने से
बस वह यूं ही बच पाते हैं।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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6/30/11

पुरानी कहानी-हिन्दी क्षणिकायें (purani kahani-hindi kshaniaen)

विकास की इमारत में
किसी मजदूर का खून
पसीना बनकर बह रहा है,
वह फिर भी गरीब है
उसका अभाव
पुराने शोषण की पुरानी कहानी कह रहा है।
------------
दौलतमंदों की तिजोरी में
जैसे जैसे रकम बढ़ती जायेगी,
कागजों पर पर गरीबी की रेखा
उससे ज्यादा चढ़ती नज़र आयेगी।
------------
यकीनन विकास बहुत हुआ है
पर हम वहीं खड़े हैं,
सभी कह रहे हैं
देश विकास की राह पर
दौड़ता जा रहा है
हम यकीन कर लेते है
देश बड़ा है
हम थोड़े ही बड़े हैं।
----------
विकास में अमीर
जमीन से आकाश पर चढ़ते हैं,
मगर गरीब हमेशा
अपनी पुरानी रोटी की
लड़ाई पुराने ढंग से ही लड़ते हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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11/5/10

छोटी खुशियों से बचाते हैं अपना घौंसला-हिन्दी कविता (chhoti khushiyan aur ghonsla-hindi kavita)

दिवाली की रात
पटाखों की गूंज रही है
आवाज चारों तरफ,
आकाश के अंधेरे को भी
धुंआ अधिक काला किये जा रहा है,
लगता है
खुशी साक्षात उतरकर जमीन पर आयी है।
सोचता हूं
कौन है वह लोग
जो देश की ग़रीबी पर
झूठे आंसु बहाते हैं,
उनकी मदद के नाम पर करते दलाली
ज़माने के आगे चंदे के लिये हाथ बढ़ाते हैं,
कौन है वह चित्रकार
जो देश की भुखमरी पर
बनाते हैं डराने वाली तस्वीर,
दुनियां को दिखाकर इनाम पाते
बदल देते अपनी तकद़ीर,
कौन है वह शायर जो
जो बेबसों पर हमदर्दी दिखाते हुए
लिख जाते हैं गज़ल,
लफ्जों के प्यासे अमीरों को
खुश करने के लिये दर्द सजाते
बात आम इंसान की
महफिलों के लिये ढूंढते महल,
आधे पेट भरे,
फटे कपड़े पहने,
जिनके हाथ में हैं पसीने के गहने,
गरीब और मज़दूर
अपने हाथों से ही छोटी छोटी खुशियां
यूं ही जुटा लेते हैं,
चाहे उनकी मदद रास्ते में
जज़्बात और हमदर्दी के दलाल उठा लेते हैं,
गरीबों और मज़दूरों की लाचारी से भी
बड़ी है उनके बाजूओं की ताकत
और दिल का हौंसला,
अभावों के हमले में भी
छोटी खुशियों से बचाते हैं अपना घौंसला,
हमदर्दी के सौदागरों ने यह
बात कभी नहीं समझाई,
किसी तरह की अपनी कमाई।
---------------

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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7/8/10

मुफ्त में समाज का दिल जीत लो-हास्य कविता (mufta men samaj ka dil jeet lo-hasya kavita)

बरसात के लिये यज्ञ करवाने की बात सुनकर
समाज सेवक जी की पत्नी प्रसन्न हो गयी
और बोली
‘धन्य भाग मेरे जो
आप बरसात होने के लिये यज्ञ करवा रहे हैं,
समाज में अपने साथ मेरी भी इज्जत बढ़वा रहे हैं,
चलो आपके मन में
जन कल्याण की बात तो आई,
मैंने तो अभी तक यही देखा कि
भले के नाम पर चंदा वसूलने के अलावा
किसी अन्य काम की सुधि नहीं आई।’

सुनकर समाज सेवक तमतमाये और बोले
‘यह सुबह सुबह क्या
जन कल्याण की बात कर दी,
अच्छे भले काम पर अपनी लात धर दी,
अरे भागवान,
इस यज्ञ के लिये ढेर सारा
चंदा लोगों से लिया है,
उसमें से कुछ खर्च करना जरूरी है
इसलिये सस्ते में यज्ञ का ठेका दिया है,
फिर यह अपने पुराने धंधे की नयी शुरुआत है
शायद बरसात जोरदार हो जाये,
कहीं बाढ़ अपनी रंगत जमाये,
न हो तो अकाल डाले अपनी छाया,
अपने लिये तो जुट जाये चंदे की माया,
पिछले साल घोटालों की वजह से
बंद कर दिया था चंदे का धंधा,
घोटालों की चर्चा से पास आ रहा था
बदनामी का फंदा,
वैसे चाहो तुम जनता में
अपने धार्मिक होने का ढिंढोरा पीट लो,
मुफ्त में समाज का दिल जीत लो,
मैं तो उन मेहमानों पर ध्यान दूंगा
जिनसे बाढ़ या अकाल के लिये चंदा लूंगा,
किसी का भला करते देखा था मुझे कभी
जो अभी ऐसी मूर्खतापूर्ण बात तुम्हारी बुद्धि में आई।
------------

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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4/6/10

इश्क और डॉलर-हास्य व्यंग्य कवितायें (ishq aur dollar-hasya vyangya kavita)

सच्चा प्यार जो दिल से मिले
अब कहां मिलता है,
अब तो वह डालरों में बिकता है।
आशिक हो मालामाल
माशुका हो खूबसूरत तो
दिल से दिल जरूर मिलता है।
----------
आज के शायर गा रहे हैं
इश्क पर लिखे पुराने शायरों के कलाम,
लिखने के जिनके बाद
गुज़र गयी सदियां
पता नहीं कितनी बीती सुबह और शाम।
बताते हैं वह कि
इश्क नहीं देखता देस और परदेस
बना देता है आदमी को दीवाना,
देना नहीं उसे कोई ताना,
तरस आता है उनके बयानों पर,
ढूंढते हैं अमन जाकर मयखानों पर,
जिस इश्क की गालिब सुना गये
वह दिल से नहीं होता,
डालरों से करे आशिक जो
माशुका को सराबोर
उसी से प्यार होता,
क्यों पाक रिश्ते ढूंढ रह हो
आजकल के इश्क में
होता है जो रोज यहां नीलाम।
----------

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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12/26/09

दिन का दावा, रात का छलावा-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (din ka dava,rat ka chhalava-hindi vyangya kavieaen)

करते हैं जो दिन में

नैतिक आदर्श की बात,

बेशर्म बना देती है

उनको अंधियारी काली रात।

चेहरे की लालिमा को

उनके अंतर्मन का तेज न समझना

मेकअप भी निभाता है

चमकने में उनका साथ,

सूरज की रौशनी में

जिस सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरते

उसी की इज्जत पर रखते हैं रात को लात।।

---------------
खुल रही है समाज के ठेकेदारों की कलई

शरीर पर हैं सफेद कपड़े, नीयत में नंगई।

बरसों तक ढो रहा है समाज, सरदार समझकर

हाथ जोड़े खड़े मुस्कराते रहे, दिल जिनसे कुचले कई।।

नारी उद्धार को लेकर, मचाया हमेशा बवाल

मेहनताने में मांगी, हर बार रात को एक कली नई।

-------------

टूट रहा है विश्वास

मर रही है आस।

जिन्होंने दिये हैं नारी उद्धार पर

कई बार दिन में प्रवचन,

करते रहे वही हमेशा

काली रात के अंधियारे में काम का भजन,

देवी की तरह पूजने का दावा करते दिन में

रात को छलावा खेलें ऐसे, जैसे कि हो वह तास। 
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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12/21/09

किश्तों में डूब न जायें जिंदगी-काव्यात्मक चिंतन (kishton par zindagi-kavay chitan)

आजकल कर्जे लेकर सामान खरीदने का एक रिवाज चल रहा है। अमीर न होने पर भी वैसा दिखने वालों की चाहत पूरा करना आसान हो गया है। किश्तों पर अपने लक्ष्य की किश्ती चलाना आसान लगता है पर उसे निभाना उतना सहज नहीं रह जाता। एक आम मध्यम या निम्न वर्गीय व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह अपनी आयसीमा आसानी से बढ़ा सके। उल्टे बढ़ती महंगाई से सभी का किचन व्यय बढ़ जाता है इधर किश्त और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी आने से संकट कभी भी गहरा सकता है।
दरअसल पाश्चात्य सभ्यता पूरी तरह से उपभोक्तावाद पर आधारित है। इसमें अमीर होने से अधिक वैसा दिखने के विश्वास पर आधारित है। कहा जाता है कि आकर्षक, चमत्कारी तथा चतुर दिखोगे तो दुनियां जीत लोगे। वैसे अपने यहां कहा जाता है कि चार्वाक ऋषि कह गये हैं कि ‘कर्ज लेकर खूब घी पियो’। उनका आशय कतई वैसा नहीं रहा होगा जैसा बताया जाता है। ऐसा लगता है कि उन्होंने व्यंग्य विनोद में किसी से कहा होगा जिसे एक कथन मान लिया गया। कर्ज लेकर घी पीना आसान नहीं है। आजकल तो कर्जे देने वाले उसके वसूल करने के तरीके भी जानते हैं। कई लोगों ने अग्रिम में ही अपने चैकों पर हस्ताक्षर कर कर्ज लिये और बाद में उनको सींखचों के पीछे जाना पड़ा।
दरअसल समाज में अमीर या आकर्षक दिखने की ललक एक भ्रम है। भले ही लोग कहते हैं कि ‘आजकल अमीरों की इज्जत है’, या ‘गरीब की भला कैसी इज्जत’, पर यह केवल छलावा है। दरअसल अगर आप जीवन सहजता से गुजारें और अपने अंदर कोई कला या गुण पैदा करें तो निश्चित रूप से आपका सम्मान होगा। जब सारी दुनियां पैसे के पीछे भाग रही है और आप भी तो फिर यह आशा क्यों करते है कि कोई आपका सम्मान करे।
आप ऐसी महफिलों में जाते हैं जहां दिखावा पंसद लोग अपनी हांकते हैं और आप भी हांक रहे हैं पर आपका कोई ऐसा गुण नहीं जिसे वहां दिखा सकें तब सम्मान की आशा क्यों करते हैं?
दरअसल आज के समय सबसे अधिक सुखी व्यक्ति वही है जो स्वतंत्रता पूर्वक सोचता और रहता है। वरना तो लोगों का मान, सम्मान तथा स्वाभिमान अपने से अधिक अमीर के यहां गिरवी है। सभी के ऊपर कोई न कोई है। अगर ऐसा न हो तो अमीर लोग क्यों मंदिरों में जाकर मत्था टेकते हैं।
कई बार मंदिरों में ऐसे लोगों को देखकर आश्चर्य होता है जिनके पास धन और वैभव का भंडार है पर वह मत्था टेकने वहां आते हैं। तब मन में ख्याल आता है कि ‘जब इस आदमी के पास सभी कुछ है फिर यह यहां क्यों आता है?’ तय बात है कि उनके पास मन की शांति नहीं है। यही मन की शांति जिसके पास है वही सबसे अधिक धनी है।
कहते हैं न कि आप बिस्तर खरीद सकते हो पर नींद नहीं! भोजन खरीद सकते हो पर भूख नहीं। मकान खरीद सकते हो पर आनंद नहीं। यह एक विचारणीय बात है। अंतिम सत्य यह है कि अगर आपको नींद अच्छी आती है, खाना जैसा भी मिले पच जाता है और जहां बैठे हैं वही आराम मिल रहा है तो फिर किसी प्रकार की अन्य अमीर रूप की कल्पना नहीं करें क्योंकि अमीर होने पर ऐसे सुख विदा भी हो जाते हैं। इस पर कहीं कर्जे ले लिये तो फिर जिंदगी भी दांव पर लग सकती है।
 इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां
ऊंची इमारत में माचिस जैसा
बड़ा खरीदने में डर लगता है।
रोज चढ़ूंगा सीढ़ियां
सिर पर कर्जे का बोझ लेकर
यह डर सताता है
ब्याज भी शत्रु जैसा नजर आता है
किश्तों में डूब न जायें
जिंदगी की किश्ती
भंवर सामने आता लगता है।
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12/19/09

कायर और कातिल-हिन्दी व्यंग्य कविता (kayar aur katil-hindi vyangya kavita)

 बंदूक बनाने वाले को

उसके विक्रय सलाहकार ने

बिक्री बढ़ाने का

मशविरा कुछ इस तरह दिया

‘शहर भर के कातिलों और लुटेरों को

अपनी बंदूकें इस्तेमाल के लिये

मुफ्त प्रदान कर दो,

चाहो तो कमीशन से भी उनका मुंह भर दो,

उनको अपना पेशा तो उनको करना है,

किसी तरह पेट भरना है,

जहां वारदात  होगी,

तुम्हारे बंदूक के इस्तेमाल की भी खबर होगी,

मुफ्त में विज्ञापन हो जायेगा,

हर कायर अपनी सुरक्षा के लिये

तुम्हारी बंदूक खरीदने आयेगा।

कत्ल और लूट की एक वारदात में

एक बंदूक का इस्तेमाल होगी

पर तुम्हारे यहां लाखों का सौदा चला आयेगा।।’’
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12/10/09

स्वर्ग और परियां किसने देखी-हिन्दी व्यंग्य कविता (svarg aur pariyan-hindi satire poem)



स्वर्ग की परियां किसने देखी

स्वयं जाकर

बस एक पुराना ख्याल है।

धरती पर जो मिल सकते हैं,

तमाम तरह के सामान

ऊपर और चमकदार होंगे

यह भी एक पुराना ख्याल है।

मिल भी जायें तो

क्या सुगंध का मजा लेने के लिये

नाक भी होगी,

मधुर स्वर सुनने के लिये

क्या यह कान भी होंगे,

सोना, चांदी या हीरे को

छूने के लिये हाथ भी होंगे,

परियों को देखने के लिये

क्या यह आंख  भी होगी,

ये भी  जरूरी  सवाल है।

धरती से कोई चीज साथ नहीं जाती

यह भी सच है

फिर स्वर्ग के मजे लेने के लिये

कौनसा सामान साथ होगा

यह किसी ने नहीं बताया

इसलिये लगता है स्वर्ग और परियां

बस एक ख्याल है।



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11/18/09

अखबार की सुर्खियों में-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (akhbar ke surkhiyan-hindi vyangya kavitaen)

 हमने कहा था

‘जख्म पर मरहम लगा दो’

उन्होंने नमक छिड़क दिया।

पीड़ा से हम कराहते रहे

उन्होंने कहा

‘कुछ जोर से कराहो

ताकि हम मरहम लगाकर

जमाने को बता सकें कि

हमने किसी का दर्द कम किया’।

------------

नजारे तो इस दुनियां में बहुत हैं

मगर लोगों को बस दंगल ही भाता ।

अपने मंगल की बजाय

दूसरे के अमंगल पर मजा आता।

जिंदगी खेल है नजरिये का

जैसी नजर

वैसा ही जमाना हो जाता।

तारीफ के लिये कौन करे

इंसानों का भला

शिकायत के लिये

मजबूर करने वालों का नाम

अखबार की सुर्खियों में ही नजर आता।

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11/14/09

राहत और परेशानी-व्यंग्य कवितायें (rahat aur pareshani- hindi vyangya kavitaen)

आसमान से बादल बरस रहे हैं
क्योंकि पेड़ पौधे, पक्षु और पक्षी
पानी को तरस रहे हैं।
आम इंसान को खुशफहमी है कि
देवता उस पर मेहरबान है
उनकी पूजा पर ही ध्यान है,
कुछ इनमें ऐसे भी है
जो राहत का करते हैं व्यापार
सूखा जाता देख उनका दिल झूलस रहे हैं।
-----------
अपने हर ख्वाब को
सच में बदलता देखकर भी
इंसान हताश हो जाता है,
अब नया कौनसा देखे
यह सोचकर परेशानी जुटाता है।

-------------
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11/9/09

हमदर्दी जताने की कला-व्यंग्य कविता (hamdardi ke kala-vyangya kavita)

हमदर्दी जताने की कला
हमें कभी नहीं आई
किसी का दर्द देखकर
मन रोया मन भर आंसु
पर आंखें दरिया न बन पाई।
शायद लोग दिमाग से सोचते हैं
इसलिये हमदर्दी के शब्द जल्दी ढूंढ लेते
दिल तक नहीं पहुंचता
दूसरे का दर्द
कर लेते हैं दिखावे में कमाई।
नहीं करना सीखा पाखंड
इसलिये दूसरे के घाव पर मरहम लगाकर भी
अपने लिये ओढ़ लेते हैं तन्हाई।

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10/26/09

मतलब के पैंतरे अधिक दिन नहीं चलते-व्यंग्य कविता (matlab ke dav-hindi kavita)

जो दूसरे का आशियाना उजाड़कर
उस जमीन पर अपना महल बनाते हैं।
समाज सेवा के लिये वही
भरी भीड़ में पुरस्कार पाते हैं।
करते हैं जो अपने कदम तले
मासूम जज़्बातों का कत्ल
वही देश भक्ति का नारा
बड़े जोर शोर से लगाते हैं।

जमाने के बदलाव की बात करने वाले
अपने सिर पर पुरानी किताबें ढोते हुए
तरक्की का संदेश सुनाते हैं।
रोज जमाने से बेवफाई करने वाले
लोगों का वफा के लिये जगाते हैं।
चीख रहे बड़े बड़े लोग
अपनी चैन की नींद के लिये
भीड़ में चेतना लाते हैं।
मतलब के पैंतरे अधिक दिन नहीं चलते
शायद इसलिये सभी लोग अनसुनी कर जाते हैं।
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10/22/09

प्रश्न वन-त्रिपदम (prashna van-tripadam)

मन में विष
किसमें नहीं होता
शुद्धि कहां है।

सोच से जड़
हो गये ये इंसान
बुद्धि कहां है।

जले शब्द
उगलते चूल्हे
वाणी कहां है।

सभी भिखारी
ढूंढ रहे हैं माल
दानी कहां है।

लंगड़ी भाषा
सिखाई गुरुओं ने
बोध कहां है।

शिक्षित झुंड
शहर में घूमता
शोध कहां है।

दर्द की दवा
मिलती कभी कभी
रोज कहां है।

प्रश्न वन
घना है चारों ओर
खोज कहां है।

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10/16/09

तरक्की और तबाही-व्यंग्य कविता (taraqi aur tabahi-hindi vyangya kavita)


जरुरतों की शयों का रोज शक्ल बदलना
दौलत के पहाड़ पर
इंसानों की चाहतों का चढ़ना
तरक्की का यह पैमाना नहीं होता।
इंसानों के जज़्बातों की उम्र
समय के साथ न बदलती हो
ख्यालों का चैहरा भी
हालातों के साथ नया नज़र न आये
तब यह तरक्की एक वहम होती है
चलती दुनियां तो दिखती
पर जमाना वहीं का वहीं होता है।
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घर में लाते जब कोई नया सामान
उसकी जगह छोड़ता हुआ
पुराना कबाड़ कहलाता है।
कमरे में दिखती है तरक्की
बुखारी में तबाही का मंजर नज़र आता है।
फिर भी किसे फिक्र है
तरक्की दिखाते है सभी को
तबाही का मंजर तो पर्दे में छिपाया जाता है।
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10/14/09

बाज़ार के लिखे शब्दों पर होंठ हिलाते-व्यंग्य कविता (bazar ke shabd-hindi vyangya kavita)

अख़बारों में छपे बड़े बड़े शख्सों के
बयान अब आखों से आगे बढ़कर
दिल की गहराई में नहीं जाते.
ढेर सारा कागज़ का भंडार है चारों तरफ
उसे खाने के लिए अक्षर पक्षी चाहिए
स्याही की बह रही हैं धारा,
मिलना जरूरी है उसको भी किनारा,
बाज़ार के सौदागर केवल शय ही नहीं बेचते,
ज़माने पर काबू रखने का भी खेल खेलते,
उनका खामोश रहना जरूरी है
इसलिए बोलने के लिए वह इंसानी बुत लाते.
जो बाज़ार के लिखे शब्दों पर बस होंठ हिलाते.

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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