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9/13/14

हमारी मौलिकता केवल हिन्दी से ही बच सकती है-14 सितम्बर हिन्दी दिवस पर विशेष संपादकीय लेख(hamari maulikta kewal hindi se hi bach saktee hai-A Special hindi editorial article on 14 september hindi day, hindi diwas, hibdi divas)



            14 सितम्बर 2014 रविवार को हिन्दी दिवस सरकारी तौर से मनाया जायेगा। इसमें अनेक ऐसे बुद्धिजीवी अपने प्रवचन करते मिल जायेंगे जो न केवल हिन्दी भाषा के प्रति हार्दिक भक्ति दिखायेंगे वरन् उसका महत्व भी प्रतिपादित करेंगे पर सच यह है कि उनके शब्द केवल औपचारिक मात्र होंगे।  अगर हम हिन्दी भाषी समुदाय की बात करें तो शायद ही वह आमजन कहीं इस दिवस में कोई दिलचस्पी दिखाये जो कि वास्तव में इसका आधार है। अनेक लोग इस लेखक के ब्लॉग पर यह टिप्पणी करते हैं कि आप हिन्दी के महत्व के बारे में बतायें।  यह ऐसे पाठों पर लिखी गयी हैं जो चार से छह वर्ष पूर्व लिखे गये हैैं।  तब हैरानी होती है यह सोचकर कि क्या वाकई उन लोगों को हिन्दी का महत्व बताने की आवश्यकता है जो पढ़े लिखे हैं।  क्या अंतर्जाल पर सक्रिय हिन्दी भाषी चिंत्तन क्षमता से इतना कमजोर हैं कि वह स्वयं इसके महत्व पर विचार नहीं करते।
            हैरानी तो इस बात पर भी होती है कि व्यवसायिक विद्वान आज भी हिन्दी के प्रचार प्रसार की बात करते हुए उसके पिछड़ेपन के लिये बाज़ार को बता देते हैं जो हिन्दी भाषियों का दोहन तो करता है पर उसके विकास पर जोर नहीं देता।  इतना ही नहीं बाज़ार पर अपने हिसाब से हिन्दी अंग्रेजी की मिश्रित हिंग्लिश का प्रचलन बढ़ाने का आरोप भी लगता है।  सबसे बड़ी बात तो यह कि हिन्दी की निराशाजनक स्थिति पर हमेशा बोलने वाले यह विद्वान बरसों से रटी रटी बतायें दोहराते हैं।  उनके पास हिन्दी को लेकर अपनी कोई योजना नहीं है और न ही हिन्दी  भाषी जनमानस में प्रवाहित धारा को समझने का कोई प्रयास किया जाता है।  वह अपने पूर्वाग्रहों के साथ हिन्दी भाषा पर नियंत्रण करना चाहते हैं। मुख्य बात यह कि ऐसे विद्वान हिन्दी को रोजी रोटी की भाषा बनाने का प्रयास करने की बात करते हुए उसमें अन्य भाषाओं से शब्द शामिल करने के प्रेरणा देते हैं।  उन्हें आज भी हिन्दी साठ साल पहले वाली दिखाई देती है जबकि उसने अनेक रूप बदले हैं और वह अब निर्णायक संघर्ष करती दिख रही है।
            हिन्दी आगे बढ़ी है।  एक खेल टीवी चैनल तो अब हिन्दी में सीधा प्रसारण कर रहा है और हम ऐसे अनेक पुराने क्रिकेट खिलाड़ियों को हिन्दी बोलते देखते हैं जिनके मुंह से अभी तक अंग्रेजी ही सुनते आये थे।  कपिल देव और  नवजोत सिद्धू के मुख से हिन्दी शब्द सुनना तो ठीक है जब सौरभ गांगुली, सुनील गावस्कर, अरुणलाल तथा संजय मांजरेकर जैसे लोगों से हिन्दी वाक्य सुनते हैं तो लगता है कि बाज़ार भी एक सीमा तक भाषा नियंत्रित करता है तो होता भी है।  रोजी रोटी से भाषा के जुड़ने का सिद्धांत इस तरह के परिवर्तनों से जोड़ा जा सकता है पर हमेशा ऐसा नहीं होता क्योंकि भाषा की जड़ों को इससे मजबूती नहीं मिलती क्योंकि बाज़ार को भाषा के विकास से नहीं वरन् उसक दोहन से मतलब होता है।
            अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा को  कम समर्थन मिलता है इससे यहां लिखने वालों के लिये रोजी रोटी या सम्मान मिलने जैसी  कोई सुविधाजनक प्रेरणा नहीं है पर परंपरागत क्षेत्रों में भी तो यही हाल है।  फिर भी वहां स्वांत सुखाय लिखने वाले ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो  हिन्दी की अध्यात्मिक धारा में प्रवाहित होने का आंनद लेते हैं। उन्हें व्यवसायिक धारा से जुड़कर शब्द और शैली पर समझौता करना पसंद नहीं है।  न ही दूसरे के निर्देश पर रचना की विषय सामग्री रचने  की उनमें इच्छा पैदा है। उनके लिये भाषा सांसरिक विषयों से अधिक अध्यात्मिक महत्व की है। उनका बेहतर चिंत्तन हिन्दी में होता है जिसकी अभिव्यक्ति हिन्दी में होने पर ही उनको संतोष होता है। हिन्दी में सोचकर अंग्रेजी में बोलने के लिये व्यावसायिक बाध्यता नहीं होती।  वैसे हमारा मानना है कि हिन्दी की ताकत ग्रामीण और मध्यम क्षेत्र के शहरी लोग हैं जिनका अंग्रेजी से कोई संबंध नहीं है।  वह हिन्दी से इतर कही बात को अनसुना कर देते हैं।  आज के लोकतांत्रिक तथा भौतिक युग की यह बाध्यता बन गयी है कि भारत क आम जनमानस को प्रभावित करने के लिये हिन्दी की सहायता ले। यही कारण है कि व्यवसायिक समूह हिन्दी से जुड़ रहे हैं जो कि हिन्दी के भविष्य के लिये अच्छे संकेत हैं।
            सबसे बड़ी बात यह कि  हमारी राय हिन्दी के विषय में अलग है।  वह ब्लॉग मित्र पता नहीं कहां लापता है जिसका यह सिद्धांत हमारे मन को भाया था कि हिन्दी एक नवीन भाषा है इसलिये वह बढ़ेगी क्योंकि यह संसार का सिद्धांत है कि नवीनता आगे बढ़ती है। उनका यह भी मानना था कि अंग्रेजी पुरानी भाषा इसलिये उसका पतन होगा।  हमारे यहां अंग्रेजी के प्रति मोह विदेशों में नौकरी की वजह से है।  सामाजिक विशेषज्ञ भले ही प्रत्यक्ष न कहें पर सच यह है कि श्रम निर्यातक देश के रूप में भारत में अंग्रेजी का महत्व इस कारण ही बना हुआ है क्योंकि यहां शिक्षित बेरोजगारों की संख्या ज्यादा है और उन्हें बाहर जाकर रोजगार ढूंढने या करने के लिये उसका ज्ञान आवश्यक माना जाता है। यह शर्त निजी व्यवसाय पर लागू नहीं होती क्योंकि पंजाब के अनेक लोग बिना अंग्रेजी के ही बाहर जाकर व्यवसायिक करते हुए फलेफूले हैं। बहरहाल विश्व में डूबती उतरती अर्थव्यवस्था अब नौकरियों की कमी का कारण बनती जा रही है।  इधर जापान से भारत में निवेश की संभावना से निजी छोटे उद्योग पनपने की संभावना है। ऐसे में लगता तो यही है कि नवीन भाषा होने के कारण हिन्दी वैश्विक भाषा बन ही जायेगी।  जिन्हें समय के साथ चलना है उन्हें हिन्दी का ज्ञान रखना जरूरी है क्योंकि इसके अभाव में अनेक लोग देश में ही अपनी वाणी के लिये परायापन अनुभव करने लगेंगे।
            इस हिन्दी दिवस पर सभी ब्लॉग लेखकों और पाठकों को बधाई।  हमारा यही संदेश तो यही है कि हिन्दी अध्यात्मिक भाषा है। इसमें चिंतन, मनन, अध्ययन और वाचन करने से ही हमारे विचार, व्यवहार और व्यक्तित्व की मौलिकता बचा सकते हैं।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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6/29/08

विरक्ति से अनुरक्ति की ओर श्री ललित मोहन त्रिवेदी-समीक्षा

वैसे तो अंतर्जाल और निजी जीवन में बहुत मित्र हैं पर मेरे अंतर्मन में विचरते लेखक के मित्र बहुत ही कम हैं। ऐसे में दो मित्रों-अंतर्जाल पर श्रीसमीर लाल ‘उड़न तश्तरी’ और निजी जीवन में श्री ललितमोहन त्रिवेदी-का मेरे हृदय में विशेष स्थान है। मुझे नियमित रूप से पढ़ने वाले पाठक और ब्लाग लेखक श्री समीर लाल के ‘उड़न तश्तरी’ और श्री ललित मोहन त्रिवेदी के ‘अनुरक्ति’ब्लाग के बीच में मेरे ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’ और दीपक बापू कहिन’ (इन दोनों ब्लाग/पत्रिकाओं को मैं अपना मुख्य प्रवक्ता मानता हूं) को रखकर तभी सहज भाव से समझ पायेंगे जब मैं इस पर लिखूंगा।

मेरे निजी जीवन के मित्र श्री ललित मोहन त्रिवेदी अंततः लंबी प्रतीक्षा के बाद न केवल अंतर्जाल पर लिखने के लिये प्रस्तुत हुए बल्कि एक तरह से उन्होने पिछले कई वर्षों से हिंदी में लेखन के प्रति जो विरक्ति का भाव रखा हुआ था अब अनुरक्ति के साथ दोबारा शुरूआत कर रहे हैं। उड़न तश्तरी ने ‘चिट्ठा चर्चा’ में दीपक बापू कहिन के लिये लिखा था कि यह ब्लाग हिंदी ब्लाग जगत में नये अलख जगायेगा। उस समय उसे पढ़कर मैं मुस्करा कर रहे गया क्योंकि मैं एक बात जानता था कि अंतर्जाल पर मेरा एक मुकाम होगा और यह आत्मविश्वास मुझे श्री ललित मोहन त्रिवेदी की मित्रता के कारण ही प्राप्त हुआ था। उनकी और मेरी मित्रता बीस वर्ष पूर्व पुरानी है। चार पांच वर्ष तक तो नियमित मुलाकातों के बावजूद मुझे नहीं मालुम था कि यह कोई लेखक या कवि हैं। हां उनकी शक्ल सोवियत संघ के नेता लेनिन की तरह लगती थी और बातचीत में उनका सहज और गंभीर वार्तालाप मुझे प्रभावित करता था।
एक बार उनके एक कवि मित्र ने एक काव्य संग्रह प्रकाशित किया और उसके लिये समीक्षा का दायित्व श्री ललित मोहन त्रिवेदी को सौंपा। उन्होंने उस पर समीक्षा लिख कर मुझे दिखाई तो मैं दंग रह गया। मैंने उनसे कहा-‘‘ मैंने वह पुस्तक नहीं देखी पर अगर आप इसे राष्ट्रीय समाचार पत्र पत्रिकाओं में भेजें तो वह इसे अवश्य प्रकाशित करेंगे और वह पुस्तक केवल इसलिये लोकप्रियता अर्जित करेगी क्योंकि उस पर इतनी जोरदार समीक्षा लिखी गयी है।’
बाद में मैं उनके साथ ही एक कवि सम्मेलन में गया तो उनकी सस्वर गीत सुनकर इतना प्रभावित हुआ कि मैंने उनसे कहा-‘आप तो अच्छे लेखक और कवि हैं फिर भी कभी कहीं आपका नाम चर्चा में नहीं सुना।’

इसकी वजह उन्होने अपना आलस बताया-इस बात की चर्चा उन्होंने अपने ब्लाग पर प्रोफाइल में भी की हैं। उन्होंने अपने कुछ रचित गीत दिखाये तो मैंने कहा कि ताज्जुब है यह कभी रेडियो पर नहीं सुनाई देते। जबकि यह वाकई ऐसे गीत है जो अगर संगीत से जुड़ जायें तो कई लोगों की जुबान पर चढ़ जायेंगे।
बहरहाल उनकी हमारी मित्रता अब तक चलती रही है। उनसे प्रेरित होकर मैंने भी गीत और दोहे लिखकर उनको दिखाये। उन्होने मुझसे स्पष्ट कहा कि‘तुम्हारे कथ्य बहुत दमदार हैं पर यह गीत नहीं हैं। तुम छंदबद्ध लिखने की बजाय मुक्त कविता लिखा करो। सबसे अच्छा यह है कि गद्य लिखा करो क्योंकि जहां कथ्य की प्रधानता हो वहां उसका इस्तेमाल भी अच्छा है।’

उनसे इस चर्चा के बाद ही मैंने तय किया कि अब अपने लिखने में गद्य रचनाओं को ही प्रधानता दूंगा। मैंने उनको अपने कुछ गद्य रचनाएं प्रकाशन के लिये भेजने से पहले उनको दिखाये और उस पर उन्होंने अपना मंतव्य दिया। कुछ रचनाओं को उन्होंने ठीकठाक कहा तो कुछ पर वह भी भौंचक्क रह गये और वह मेरे चिंतन वाले आलेख हुआ करते थे। उन्होंने चिंतन को सराहा था इसलिये अपने प्रथम दो ब्लाग में पहले का नाम मैंने दीपक भारतदीप का चिंतन उनकी वजह से लिखा क्योंकि यह विचार मैंने उनसे ही लिया था। प्रसंगवश अंतर्जाल पर कुछ लेखकों को हाइकू लिखते देखकर मैंने वह लिखने का प्रयास किया था। उड़न तश्तरी ने भी लिखा‘आपकी कविता दमदार है पर वह हाइकू नहीं है।’

ऐसा झटका मुझे श्री ललित मोहन त्रिवेदी जी गीत और दोहे के विषय में दे चुके थे। मतलब यह इन दोनों महानुभावों की वजह से इन दोनों विधाओं पर मैं कभी लिखने वाला नहीं हूं। जब अंतर्जाल पर कवितायें लिखनी शुरू की तो मैं बड़े बेमन से लिख रहा था और इसकी चर्चा मैंने श्री त्रिवेदी जी से की तो उन्होंने कहा कि ‘आप तो अपने कथ्य के साथ आगे बढ़ते रहें। मैंने आपको गीत और दोहे के लिये टोका था पर मुक्त कविता तो आप लिखते रहिये। किसी भी रचना मुख्य विषय उसका कथ्य है। अगर आप व्याकरण की दृष्टि से बहुत अच्छी रचना लिखें पर अगर कथ्य प्रभावी न हो तो फिर क्या फायदा? उसी तरह अगर आप का कथ्य प्रभावपूर्ण है तो यह महत्वपूर्ण नहीं रह जाती कि आप विधा में लिख रहे है।
मैंने उनको बताया था कि गद्य इतने बड़े हो जाते हैं कि उनको अंतर्जाल पर पढ़ना कठिन है उपरोक्त संबंध में उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाते हुए यह बात कही। अभी तक वह अपने वेबसाइट/ब्लाग पर दो गीत लिख चुके हैं। हां, उनको अपने रचनायें चोरी होने की आशंका रहती है और मैंने तो उनसे कहा भी था कि ‘मैं तो अपनी रचनाओं की चोरी के लिये तरस रहा हूं पर आपको शायद इसके लिये अधिक प्रतीक्षा न करनी पड़े क्योंकि आप जिस तरह के गीत लिखते हैं उसकी चोरी की संभावना बहुत लगती है। एसी रचनाएं लिखना हर किसी के बूते का नहीं है।’

ऐसे में जब हिंदी ब्लाग जगत के लोग निरंतर उनकी रचनाओं को देखेंगे तो कहीं उसका उपयोग होने पर वह उनको बता सकते हैं। अक्सर मैं अपनी समीक्षा में लिखता हूं कि ‘लेखक के मित्रों को यह कम और आलोचकों को अधिक लगे तो खेद है‘, यह भाव श्री ललित मोहन त्रिवेदी जी की उसी समीक्षा को पढ़ने के परिणाम है। उन्होंने मुझसे कहा था कि किसी दूसरे साहित्यकार या लेखक की रचनाओं पर समीक्षा लिखने वाले ही पूर्ण साहित्यकार होते हैं। यही कारण है कि मैं भी यहां अंतर्जाल पर ब्लाग लेखकों पर समीक्षा लिखता हूं। मुझे यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि उन जैसी समीक्षा मैं तो नहीं लिख सकता।
श्री ललित मोहन त्रिवेदी जी न केवल लिखते अच्छा है बल्कि बातचीत में भी बहुत प्रभावित करते हैं। अपने जीवन में लिखा भले कम ही हो पर वार्तालाप में उनके जीवन के संस्मरण भी किसी रचना से कम नहीं होते। मैं जब सुनता हूं तो लगता है कि उनको पढ़ रहा हूं और वह दृश्यव्य भी हो रहे हैं।
उनका अंतर्जाल पर लिखना शूरू करना इसलिये बहुत अच्छा लगा क्योंकि वह अगर मुझे निरंतर लिखने को प्रेरित नहीं करते तो शायद मैं अंतर्जाल पर भी लिखने का विचार नहीं करता। मैं चाहूंगा कि वह अपने गीतों से अंतर्जाल पर हिंदी को रोशन करें। एक आखिर बात मैं हमेशा कहता हूं कि कोई लेखक कम या अधिक प्रसिद्ध होता है पर छोटा या बड़ा नहीं कहा जा सकता। गीता विधा में सिद्ध हस्त श्री ललित मोहन त्रिवेदी जी अधिक प्रसिद्ध नहीं हैं पर मेरा दावा है कि उन जैसे गीतकार उंगलियों पर गिनती करने लायक होंगे। जब मैं अंतर्जाल या बाहर कोई काव्य देखता हूं तो अक्सर उनकी तुलना त्रिवेदी जी की रचनाओं से करता हूं और कई मशहूर लेखकों की रचनायें भी उनके सामने कम स्तर की लगती हैं।

बस एक बात है कि उनको लिखने के लिये निरंतर प्रेरित करने की आवश्यकता है। यह काम मैं तो करूंगा ही अंतर्जाल के अन्य मित्रों और पाठकों से भी यह अपेक्षा करूंगा कि वह यह जिम्मा उठायें क्योंकि उनके गीत तथा अन्य रचनायें अंतर्जाल पर हिंदी की श्रीवृद्धि करेंगे यह मेरा विश्वास है। वह मेरे एक ऐसे मित्र है जो अनेक अवसरों पर न केवल सहयोग करते हैं बल्कि प्रेरित करते है। उनसे ही सीखकर उन्हें ही यह समीक्षा समर्पित करता हूं।
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दीपक भारतदीप


www.lmtrivedi.blogspot.com

8/24/07

क्या यह मौसम पिकनिक का है?

हिंदी के मूर्धन्य कवियों ने अपनी काव्य रचनाओं में सदैव श्रृंगार रस की चाशनी में डुबोकर अपने लोकप्रिय रचनाएं प्रस्तुत की हैं। उनको पढने वाले लोगों के मस्तिष्क में वर्षा ऋतू की कल्पना इस तरह स्थापित है कि आज के युग में जब विश्व में पर्यावरण प्रदूषण और कम होते वनों की वजह से जो मौसम का मिजाज बिगडा और उसने इस ऋतू में जो नयी तकलीफें भारी गरमी और उमस के रुप में पैदा की हैं उसको झेलते हुए भी वह उसमें खोया रहता है, उसे यह पता ही नहीं कि जिस वर्षा ऋतू में वह यह सब झेल रहा है जिसकी काव्य कल्पनाएं उसके अंतर्मन में कहीँ आज भी हैं वह अब वैसा नहीं रहा जैसे पहले था।

उस उसमे के कवियों ने वर्षा ऋतू में प्रियतम और प्रेयसी के विरह और मिलन पर ही अपने शब्दों सौन्दर्य को इस तरह प्रस्तुत किया है कि उसकी कल्पना हृदय पटल पर अंकित हो जाती है। जबकि हम देखें तो वर्षा ऋतू अब उतनी सुहावनी नहीं रही जितनी उस समय रही होगी जब यह रचनाएँ हुई। कहीँ अगर वर्षा इतनी हो जाती है कि लोग छत पर चढ़कर नील गगन की छाया में अपने प्राण बचाते हैं तो कहीँ नाम को बरसता है और कहीँ तो वह भी नहीं। अख़बार उठाकर देख लें-इस ऋतू में केवल बाढ़ और कम वर्षा और अवर्षा की खबरों से पटे मिलेंगे।बाकी सब तो ठीक है पर गड़बड़ यह हुई कि हिंदी पढने वालों को यह ऋतू इतनी भाती है कि बस वह इसे इन्जोय करना चाहते हैं। कवियों ने तो प्रियतम और प्रियतमा के विरह और मिलन पर सावन को हरा किया और भादों को सुखाया पर पाठक लोग हर आयु में इसे सुन्दर मानते हुए इसमें आनन्द उठाते हैं।अब जिसे प्यार होगा उसे भला भूख और प्यास से क्या लेना देना? इसलिये न कवियों ने उन्हें खिलाया और न कहीँ पिकनिक पर भेजा। थोडा बहुत इधर-उधर दौडाया और कर दीं अपनी रचना । उस पर फिर इन फिल्म वालों ने भी कम नहीं किया। लोग हिंदी पढने से छूटे तो फिल्म के रंग में रंग गये और हो गयी पूरी वर्ष ऋतू सुहावनी। कई लोग जिन्होंने अपनी युवावस्था में पिकनिक न मनाई न सोचा अब पिकनिक पर निकलने लगे हैं। जब पिकनिक पर जाएँगे तो अनाप-शनाप खाएंगे ही तो पेट बिगडेगा। फिर कुछ युवक पीने-पिलाने में भी लिप्त हो जाते हैं। सब ठीक अगर वर्षा वैसी हो तो जैसी कवियों ने चित्रित की है। वह नहीं होता। और पिकनिक कभी कभी तकलीफ देह भी हो जाती है।

वर्षा ऋतू में हमारे पुराने विज्ञानं के अनुसार ज्यादा घूमना नहीं चाहिऐ। हालांकि कहा जाता है कि पहले पक्की सड़कें नहीं थी इसलिये यह नियम बनाया गया है पर सड़कें अब कौनसी दिखाई देती हैं और कहीँ तो रेल कि पटरियाँ भी डूब जाती हैं। ऐसे में कैसे कहा जाये कि केवल इसी वजह से उन्होने वर्षा ऋतू में पर्यटन को वर्जित किया था। तब हमारे साधूसंत पर्यटन बंद कर देते थे। भारतीय विज्ञानं के अनुसार इस मौसम में खाना भी कम पचता है , इसलिये खाना कम चाहिए। मगर नहीं साहब लोग इसी मौसम में ही अपने पेट से ज्यादा अत्याचार करते हैं। परिणाम स्वरूप आजकल के डॉक्टर इस ऋतू का इतना इन्तजार करते हैं कि प्रीतम और प्रेयसी भी नहीं करते होंगे। इस मौसम मैं ऐक-दो बिमारी ऎसी जरूर फैलती है जिसका नाम पहले नहीं सुना होता और पिछले साल तो हमने अपने शहर में ऐसा कोई घर नहीं देखा जहां का कोई आदमी बीमार न पडा हो। हमारा घर शहर से दूर कालोनी में है इसलिये वहां इसकी चर्चा नहीं थी। हालत यह हुई कि लोगों कि वर्षा ऋतू में मस्ती हुई हो या न हो पर ढंग से दिवाली किसी कि नहीं मनी।मुझे सबसे ज्यादा वह दिन बुरा लगता है जिस दिन किसी पिकनिक पर जाना होता है। मुझे आज तक कोई ऎसी पिकनिक याद नहीं जिसका वास्तविक रुप से मैंने आनन्द लिया हो। अधिकतर पिकनिक सामूहिक होती हैं और उनमें केवल इसलिये जाना पड़ता है क्योंकि हमारा वहां या तो अपना चन्दा किसी न किसी रुप से दिया होता है या ऐसी मित्र मंडली रहती है जिसके दबाव का सामना नहीं कर पाते। पिकनिक का जब कार्यक्रम दस -पन्द्रह दिन पहले बनता है तब मौसम अगर अच्छा न हो तो लोग कहते है कि तब तक तो बरसात बहुत हो जायेगी और इतनी गरमी नहीं होगी और अच्छा होता है तो कहते हैं कि अब तो मौसम भी अच्छा हो गया। जिस दिन पिकनिक हुई है उस दिन तो बस! उस मौसम का वर्णन किसी कवि ने नहीं किया है। सुबह तो सब ठीक लगता है पर जैसे सूर्य की किरणों में तीव्रता आती है वैसे ही जो उमस पड़ती हैं और वह असहनीय कष्ट देती है,वहां लोग बैठ नहाते हैं और उससे फिर उमस होती है तो चीत्कार करते हुए मौसम को गाली देते हैं। कुछ लोग पीते हैं मतलब सब काम उल्टे ही होते हैं। बारह बजे नाश्ता और फिर चार बजे खाना। मतलब जिस मौसम में शरीर को संभालकर चलना चाहिऐ उसी मौसम में सबसे ज्यादा खिलवाड़ लोग करते हैं। इस मौसम में वैसे ही आदमी को मानसिक संताप होता है और उसे जहाँ शांत होना चाहिये वहीँ वह अपनी खुशहाली के लिए आक्रामक हो जाता है। पिकनिक के दौरान नहाते हुए डूबने की घटनाएँ इसलिये भी होती हैं। मेरी जान -पहचान के लोगों में ही ऎसे कम से कम पन्द्रह प्रकरण तो मैं देख चुका हूँ। पिकनिक से जहां मन में प्रसन्नता का भाव लेकर लौटना चाहिऐ वहां से अगर थकावट लेकर लौटे तो फायदा ही क्या?मैं अपने पुराने विद्वानों की मान्यताओं को बहुत महत्व देने लगा हूँ-क्योंकि इस मौसम में अपने शरीर से अगर ज्यादा काम लेने का प्रयास किया तो और आराम किया तो भी वही हालत होगी, ऐसे में कोशिश यही करता हूँ कि इस मौसम में सबसे ज्यादा शारीरिक और मानसिक सतर्कता बरती जाये। भला यह भी क्या बात हुई कि पिकनिक पर ताश खेलते जाएँ और शरीर से इतना पसीना निकले कि उससे पोंछने वाले रुमाल तक इस क़दर भीग जाएँ कि उन्हें निचोडो तो वह पसीना ऐसे निकले जैसे नल बह रहा हो। हालांकि जिन कवियों ने सुन्दर शब्द और व्यल्रण से इस ऋतू को सजाया है उसमें कोई कमी नहीं है पर वह लोग ऐसी पिकनिक नहीं मनाने जाते थे न पीकर जल समूहों में डुबकी लगाते थे। अगर वह ऐसा करते तो ऐसी उत्कृष्ट कवितायेँ नही लिख सकते थे। उन्होने तो लिखकर ख़ूब आनन्द उठाया पर उन्हें पढने वालों का अब वर्षा ऋतू का ऐसा सुहावना मौसम नहीं मिल सकता।

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