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11/30/11

उपभोक्ता और किसान तो शोषण के लिये बना है-हिन्दी लेख (consumar and formers for earning-hindi article)

        किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर चल रही बहस में कई बातें दिलचस्प हैं। यकीनन अगर हम उनको सुने तो अपनी बात प्रभावी ढंग से न रख सकते हैं न सोच सकते हैं। जहां तक हमारी इस विषय पर अपनी सोच यह है कि अभी तक इससे देश के लाभ या हानियों पर किये गये अनुमान उस रूप में प्रकट नहीं होंगे जिस तरह व्यक्त किये जा रहे हैं।
            हम लाभ हानियों से अलग हटकर एक बात जरूर मानते हैं कि इस देश की समस्याओं का हल अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांतों के अनुरूप करने की बात तो यह कभी दिखाई नहीं दी। हम एक अर्थशास्त्री होने के नाते-अर्थशास्त्र हमारे अध्ययन के दौरान एक विषय रहा है इसलिये यह पदवी हमने स्वयंभू रूप से स्वयं धारण की है-मानते हैं कि अगर इस देश में राज्य प्रबंध अगर प्रत्येक गांव में स्वच्छ पानी, पक्की सड़क तथा बिजली की व्यवस्था कर ले तो इस देश में आर्थिक समस्यायें नगण्य रह जायेंगी। यह अलग बात है कि आज़ादी   के बाद इस पर भारी पैसा खर्च हुआ पर भ्रष्टाचार के कारण परिणाम शून्य ही रहा। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा तथा भुखमरी जैसी समस्यायें पूरी तरह से खत्म भले न हों पर वह गंभीर चिंता का विषय नहीं रहेगी। मूल बात कहें तो सरकार कल्याण के नाम पर दूसरे काम न भी करे तो चल जायेगा।
          यह कोई  अनिवार्य  शर्त नहीं हो सकती है कि गांव के विषय पर लिखने के लिये वहां पैदा होना जरूरी है। हम शहर में जन्मे हैं पर अनेक बार गांवों में जाने का अवसर मिला। उससे यह लगता है कि वहां मूलभूत सुविधाओं का पूर्णतः अभाव है। बरसात के दिनों में जब गांवों में सब्जी, गेंहु, चावल तथा दूध अधिक मात्रा में होता है तब वहां से उसे निकालकर शहर पहुंचाने के लिये कितनी मुश्किल होती है यह हमने स्वयं देखा है। उस समय अशुद्ध जल की वजह से बीमारी अपना रौद्र रूप दिखाती है तब यह गांव के मार्ग इस कदर नाले में बदल जाते हैं कि रात को किसी मरीज को गांव से बाहर पास के बड़े गांव या शहर ले जाना लगभग असंभव होता है। इसी कारण छोटी बीमारी में लोग वहां मर जाते हैं। गांव में अगर अस्पताल भी हो तो वहां चिकित्सक पहुंच नहीं सकता। वैसे सामान्य हालत में भी स्वास्थ्य कमी वहां पहुचंने से कतराते हैं। अगर आजादी के बाद हम देश के पूरे गांवों में शुद्ध जल, बिजली और पक्की सड़क जैसी सुविधायें नहीं पहुंच पाये तो यह संकट हमारी प्रबंध व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। शहरों के पास जो गांव हैं उनमें शायद ऐसा आधारभूत ढांचा मिल जाये पर जो दूर हैं उनकी समस्याओं पर कितना सोचा गया यह अलग से विचार का विषय है।
     विदेशी कंपनिंयां अगर भारत आ रही हैं तो वह कोई आधारभूत ढांचा नहीं बनायेंगी बल्कि उनका अपनी सुविधानुसार दोहन ही करेंगी। जहां आधारभूत ढांचा नहंी है वहां उनको उन्हीं बिचौलियों पर निर्भर रहना होगा जिनको हटाने की बात हो रही है। इधर हम सुन रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप गंभीर रूप से आर्थिक संकट में हैं और अब वहां विकासशील देशों के निचले स्तर पर जाकर कमाने की बात हो रही है। हमने अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को यह कहते हुए पढ़ा था कि हमें विदेशों में जाकर छोटे स्तर पर काम करना होगा। अमेरिका की विदेशमंत्राणी हेनरी क्लिंटन ने भी कहा था कि काम के बारे में भारतीयों से सीखना चाहिए।
          बहरहाल इस बहस में एक महत्वपूर्ण समाचार पर चर्चा किसी ने नहीं की कि अमेरिका ने पाकिस्तान के 28 सैनिकों को मार दिया जिससे दोनों देशों के बीच गंभीर तनाव है। पाकिस्तान ने अपना एक हवाई अड्डा अमेरिकी सेना से खाली करने को कहा है। इतना ही नही उसने संयुक्त राष्ट्र में भी यह मामला उठाया है। भारतीय प्रचार माध्यम इस पर खबर देकर चुप हो गये हैं। उनको शायद इसका अंदाजा नहीं है कि अंततः यह तनाव युद्ध में बदल सकता है। अगर पाकिस्तान अमेरिका के हाथ से निकल गया तो उसका राजनीतिक प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप से करीब करीब खत्म होने जैसा ही है। हमारा मानना है कि अमेरिका से अधिक मित्रता से अब कोई लाभ नहीं है। वह सामरिक रूप से शक्तिशाली है पर उसका आर्थिक ढांचा करीब करीब गड़बड़ाने लगा है। ऐसे में पाकिस्तान की राजनीतिक बगावत उसके सम्राज्य में आखिरी कील की तरह लग सकती है। देखा जाये तो पाकिस्तान अपने सहधर्मी देशों का एक तरह से प्रवेश द्वार है। भले ही वह एक सार्वभौमिक राष्ट्र की तरह दिखता है पर संक्रमण काल में उसकी सरकार की बैठक सऊदी अरब में होती है तो क्रमवार होने वाले क्रिकेट मैच दुबई या आबुधाबी में होते हैं। जिन दूसरे देशों की क्रिकेट टीमों का क्रम में पाकिस्तान का दौरा होता है वह दुबई या आबुधाबी में उसके साथ मैच खेलती हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ अमेेरिका का तनाव मध्यएशियाई देशों तक विस्तृत हो सकता है। यह देश एक तरह से अमेरिका की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं।
         बहरहाल अब बड़े विषयों पर बड़े विद्वानों की चर्चा सुनकर ऐसा लगता है कि निरपेक्ष या स्वतंत्र प्रेक्षकों की बातें दमदार होती हैं पर महत्व केवल संगठित विद्वानों को ही दिया जा रहा है। अनेक स्वतंत्र विद्वानों ने किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर अपनी राय बेबाकी रूप से रखी। वह इससे चिंतित नहीं है पर खुश भी नहीं है। जहां तक किसानों और उपभोक्ताओं के हित का प्रश्न है तो सवाल यह है कि इन दोनों रूपों में हर मनुष्य शोषित होता है और अगर उसे प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाये तो पूरी दुनियां का व्यापार ही ठप्प हो जाये। वाल मार्ट आये या नहीं यह समस्या शोषितों के आपसी द्वंद्व का विषय है। यह अलग बात है कि समय के अनुसार बाज़ार और प्रचार के अनुसार समाज का स्वरूप बदलता रहता है और उसे रोकना कठिन है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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8/7/11

अमेरिकी डॉलर का संकट-हिन्दी व्यंग्य लेख (trouble of american dollar-hindi satire thought article)

                  जब अमेरिका की अर्थव्यवस्था डगमगाती है तब विश्व के प्रचार माध्यम ऐसे जताते हैं कि सभी देशों के लोग कांप रहे हैं। दुनियां के उद्योगपति, पूंजीपति और प्रतिष्ठत लोगों के आर्तनाद तब प्रचार माध्यमों में सुनाई देता है गोया कह रहे हों कि ‘‘भगवान, अमेरिका को बचा लो।’
          वैसे तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि आखिर अमेरिका की अर्थव्यवस्था का रहस्य क्या है पर अभी   हाल ही में पता चला कि अमेरिका की जनप्रतिनिधि सभा सरकार को कर्ज लेने के संबंध में रियायतें देने से आनाकानी कर रही थी। यह जनप्रतिनिधि भी वहीं के हैं और सरकारी भी वहीं की। इसका मतलब यह अंदरूनी विवाद था जिस पर पूरे विश्व के बड़े लोग आंखों लगाये बैठे रहे कि कहीं अमेरिका का बाजा बजा तो अपनी भी बारात निकल जायेगी। दरअसल आजतक अमेरिका का बजट आज तक समझ में नहीं आया। अब पता लग रहा है कि दुनियां को धमकाने वाला अमेरिका ऊपर से नीचे तक कर्ज में डूबा है मगर फिर भी साहुकार कहलाता है।
       मूलतः भारत का अमेरिका से कोई आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा तथा वैचारिक संबंध नहीं है जिससे उसे सहोदर राष्ट्र कहा सके। प्रत्यक्ष उससे कोई शत्रुता वाली बात नहीं है वह इसी आधार पर ही मित्र कहा जाता है पर अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के साथ वह जो संबंध निभाता है वह एक तरह से दुश्मनी जैसा ही व्यवहार है। भारत की प्राकृतिक और खनिज संपदा, मानव संसाधन, अध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक शक्ति इतनी विशाल है कि उसे अमेरिका पर निर्भर रहने की आवश्यकता भी नहीं है तब यहां उसकी आर्थिक स्थिति डगमगाने पर चिंता करना व्यर्थ ही कहा जा सकता है पर जब हम देखते हैं कि हमारे यहां के प्रचार माध्यम उस पर विलाप कर रहे हों उस समय यह प्रश्न उठता है कि कहीं भारत के कुछ लोगों के वैयक्तिक आधार तो नहीं बिखर रहे है जिससे वह घबड़ा गये है। इस तरह का संदेह होने का कारण यह है कि डॉलर आज भी विश्व बाज़ार में विनिमय का साधन है। इसका मतलब यह है कि डॉलर उन लोगों के पास भी हो सकता है जो अमेरिका में नहीं है और जिन विदेशियों के पास है वह चाहेंगे कि अमेरिका बचा रहे ताकि उनका धन भी बचे। दूसरा यह कि दुनियां भर में आर्थिक लेनदेन का लेखा डॉलर में ही रखा जाता है। प्राकृतिक, खनिज और मानव संसाधन में अन्य देशों से कम धनी अमेरिका की मुद्रा डॉलर बहुत महंगी होती जा रही है। मान लीजिये किसी भारतीय के पास दस डॉलर हैं तो इसका मतलब यह समझें कि उसके पास पचास रुपये हैं। अगर डॉलर का रेट मान लीजिये 52 रुपये हो गया तो उसके 520 रुपये हो गये। अगर अमेरिका की घटती साख के साथ डॉलर कहीं आठ आने का हो गया तो उसके पास पांच रुपये रह जायेंगे। यही कारण है कि हमारे देश के शक्तिशाली आर्थिक पुरुष विदेशी बैंकों में अपना पैसा रखते रहे हैं क्योंकि डॉलर के भाव बढ़ने के साथ उनका रुपया वैसे ही बढ़ जाता है। अमेरिका कर्ज लेता है पर किससे और कहां से इसका पता नहीं लगता। फिर वह हथियार और आधुनिक तकनीकी बेचता है और उसके लिये भी सहायता देता है। देखा जाये तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आधार गोलमोल हैं जबकि इसके विपरीत भारतीय बजट संसद में हर तरह से स्पष्ट व्याख्या के साथ प्रस्तुत किया जाता है। फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन तथा उनकी तरह विकसित अन्य यूरोपीय राष्ट्र अमेरिका की परवाह नहीं करते। यहां तक कि उन्होंने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपना यूरो भी उतार दिया है पर चूंकि अमेरिका दूसरों के गोलमाल को भी अपने यहां समायोजित करता है इसलिये डॉलर आज भी अधिक पंसदीदा मुद्रा है। यही कारण है कि डॉलरधारी लोग अमेरिका के संपन्न और शक्तिशाली होने की न केवल कामना करते हैं बल्कि उसकी मदद को हर समय तैयार रहते हैं।
          कहा जाता है कि पुजारी की दौड़ सर्वशक्तिमान के दरबार तक, यह बात दुनियां भर के विकासशील देशों के आर्थिक शिखर पुरुषों पर लागू होती है। अब यह कहना मुश्किल है कि दुनियां भर के काले धनिक लोग अमेरिका को चला रहे हैं या वही उनका संरक्षक है। अगर अमेरिकी डॉलर विश्व में विनिमय का प्रमुख मुद्रा का रूप खो बैठे तो रुपये के मुकाबले उसकी गिरावट कितनी होगी अंदाजा नहीं है। कम से कम भारतीय रुपया एक डॉलर से कम तो कभी रहने वाला नहीं है। दरअसल डॉलर का मूल्य अधिक होने का कारण है यह भी है कि दुनियां भर के छात्र, शिक्षक, इंजिनीयर, व्यापानी तथा फिल्मकार अमेरिका जाते हैं। अमीरों के लिये अमेरिका एक स्वर्ग जैसा है। वह अमेरिका जाते हैं तो उनको डॉलर चाहिए। तय बात है कि डॉलर की मांग अधिक रहती है। मांग और आपूर्ति के नियम से उसका मूल्य अधिक रहना ही है। फिर वह लोग वहां अधिक जाते हैं वहां की वस्तुओं और सेवाओं की कीमत भी बढ़ती है। अनेक बार अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगाता है तो उसे चेताया जाता है कि अंततः हानि उसकी ही होनी है। बाद में वह प्रतिबंध हटा लेता है या ढीला कर देता है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था विदेशी देशों पर आधारित है यह बात उसके कर्ज लेकर घी पीने की आदत से पता चल ही जाती है।
               आम भारतीय को इसकी बिल्कुल परवाह नहीं है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में गिरावट है कि नहीं पर इतना तय है कि कहीं न कहीं उसके परिश्रम से अर्जित धन अमेरिका को भी सहारा देता है। अगर कुछ भारतीय अमेरिका न जायें न उससे सामान खरीदें तो शायद डॉलर बुरी हालत में आ जाये। डॉलर का अधिक भाव होने से हमारी चीजें और श्रम उसे सस्ता पड़ता है। जबकि उसकी चीजें और सेवायें हमें महंगी पड़ती हैं। इस तरह हमारे श्रमिक और छोटे व्यापारी घाटे में ही रहते हैं। बहरहाल 1971 में पाकिस्तान के लिये सातवां बेड़ा भेजने की घटना कभी भूली नहीं जा सकती इसलिये आज भी अमेरिका को इस देश के आमलोगों को वैसा मित्रभाव नहीं मिलता जैसा कि उसके स्वदेशी प्रशंसक चाहते हैं। वैसे प्रकृति के कुछ नियम हैं। कछुआ और खरगोश की दौड़े में कछुआ इसलिये जीता क्योंकि वह धीरे धीरे चला था। भारत को हम कछुआ कहेंगे और अमेरिका को खरगोश। भारत धीरे धीरे ही विश्व के राजनीतिक पटल पर उठा रहा है और आगे उसका भविष्य उज्जवल रहने वाला है जबकि अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध में जापान पर परमाणु बम गिराने के बाद दुनियां में तेजी से उभर कर आया। अब वह शनैःशनै पतनोन्मुख होता दिख रहा है। लगता है कि अफगानिस्तान का युद्ध उसे ले डूबेगा। अमेरिकी रणनीतिकार वहां से निकलने की सोच रहे हैं पर जिस तरह वहां अभी हाल अमेरिकी के सील सैनिकों की मौत हुई है वह उसकी सामरिक शक्ति को भी चुनौती मिलने लगी हैं। यह सील सैनिक उसी समूह के हैं जिन्होंने पाकिस्तान में घुसकर दुनियां के सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मारा था। बहरहाल अमेरिका भी एक विशालकाय जहाज है भले ही भंवर में फंस गया है पर डूबने में बहुत समय लेगा।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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3/20/11

लीबिया पर अमेरिकी हमला और होली पर भारतीय टीवी चैनलों का शुतुरमुर्गीय दृष्टिकोण-हिन्दी व्यंग्य लेख (ostrichm attitude on libiya in indian media-hindi vyangya lekh and thought)

दुनियां के पांच बड़े देशों में से तीन ने-अमेरिका, फ्रांस, और ब्रिटेन-अपने मित्र देशों के साथ मिलकर लीबिया पर हमला कर दिया है। अगर भारत में होली का पर्व नहीं होता तो आज शायद यही विषय चर्चा के केंद्र में रहता-कम से कम हम जैसे फोकटिया दर्शकों और चिंतकों का तो यही मानना है। जिन दो बड़े देशों ने इस हमले से पहले लीबिया से मुंह फेरा है वह एक चीन दूसरा रूस। संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में लीबिया पर हमले के लिये हरी झंडी दिलाने वाले प्रस्ताव पर यह दोनों देश अपने मित्रों के साथ अनुपस्थित रहे जबकि कुछ दिनों पहले तक दोनों ही गद्दाफी और लीबिया को राजनीतिक तौर से खुला समर्थन दे रहे थे।
भारतीय समाचार पत्रों, चैनलों तथा बुद्धिमान लोगों की पूरी खुफियगिरी धरी की धरी रह गयी। इस हमले से पहले किसी ने ऐसे हमले का अनुमान नहीं बताया गया। इधर सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पास हुआ और उधर मित्र देश हमले के लिये चल पड़े और बमबारी शुरु कर दी। लीबिया की आम जनता के कथित यह पक्षधर वहां सामान्य नागरिक को नहीं मारेंगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। भारतीय समाचार पत्र पत्रिकाऐं तथा टीवी चैनल होली और क्रिकेट से फुरसत नहीं पा सके। क्या करें, दिन को चौबीस घंटे से बढ़़ाकर अड़तालीस का नहीं कर सकते। ऐसा भी नहीं है कि चंद्रमा से कहें कि इतना पास आ गये हो तो जरा रात को बड़ा कर दो यानि कि दिन हो ही नहीं ताकि हम रात्रिकालीन समय का भी दिन का तरह उपयोग कर सके। न ही यह कह सकते हैं कि इधर धरती की ओट में इस तरह छिप जाओ कि दिन का दिन ही रहे ताकि रात्रि न होने से लोग निद्रा की बीमारी से मुक्त होकर उनके विज्ञापन देखते रहें।
इस समय होली तथा क्रिकेट में विज्ञापनों से भारतीय समाचार माध्यमों को जोरदार कमाई हो रही है। इधर कामेडी के भी एक नहीं चार चार सर्कस शुरु हो गये हैं। फिल्मी अभिनेता अब छोटे पर्दे पर कामेडी करने के लियेे उतर आये हैं। समाचार चैनल अपना आधा घंटा कामेडी के नाम कर मनोरंजन चैनलों को विस्तापिरत रूप बन गये हैं। मतलब यह कि वह हर मिनट कमाई कर रहे हैं इसलिये उनके पास फुरसत कहां कि लीबिया पर हमले के विषय का इस्तेमाल करें।
रविवार का दिन और वह भी होली का। क्रिकेट का मैच हो तो फिर कहना ही क्या? पूरा दिन विज्ञापन के लिये है। कमबख्त, यह लीबिया का विषय कहां फिट करें। जापान की सुनामी में कमाया अभी ठिकाने लगा नहंी है। पहले रेडियम फैलने की बात चली। जापान में गर्म हो रहे परमाणु संयंत्र को इंसानी प्रयास ठंडा नहीं कर पा रहे थे पर प्रकृति को दया आ गयी। भूकंप तथा सुनामी परेशान लोगों के लिये प्रकृति ने वहां बर्फबारी कर दी। इतनी ठंड कर दी कि परमाणु संयंत्र अब ठंडे हो गये। पंच तत्वों ने जहां पहले संकट खड़ा किया वही उसको निपटान करने भी आये। भारत में प्रचार माध्यमों पर सुनामी जारी रही क्योकि होली, क्रिकेट और कामेडी को दौर चल रहा है।
भारतीय टीवी चैनलों का कहना था कि ‘जापान की सुनामी की आड़ में गद्दाफी ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली क्योंकि उसने दुनियां का ध्यान हटते ही अपने लोगों पर बमबारी कर दी।’
यहां तक कहा कि गद्दाफी का सुनामी ने बचाया। यह सब बकवास था। भारतीय समाचार टीवी चैनल सोचते हैं कि उनकी आंख अगर बंद है तो सारा संसार सो रहा है। यह शुतुरमुर्गीय दृष्टिकोण होली का सबसे बड़ा मजाक है। जिस समय भारतीय चैनल क्रिकेट और होली में व्यस्त थे तभी सुरक्षापरिषद में लीबिया पर उड़ान पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पास हुआ और हमला भी हो गया। इस समय भारतीय प्रचार माध्यमों के पास विज्ञापनों की सुनामी का प्रकोप है इसलिये वह लीबिया पर हमले के विषय पर बासी बहस शायद तब करेंगे जब वर्तमान विषयों से मुक्ति पा लेंगे।
सचिन के सैंकड़े का सैंकड़ा लगेगा या नहीं! बीसीसीआई की क्रिकेट टीम जीतकर अपने प्रशंसकों को होली का तोहफा देगी या नहीं! धोनी अपने नये स्पिनर को खिलायेंगे या नहीं! होली और क्रिकेट पर बहस में उलझे टीवी चैनलों के पास इतना समय कहां से आ सकता है कि वह लीबिया पर अमेरिकी हमले का अध्ययन करें जिसके परिणाम भारत को आगे अवश्य प्रभावित करेंगे। लीबिया के शिखर पुरुष गद्दाफी ने भारत से समर्थन पाने के लिये जबरदस्त कोशिश की थी। क्यों? भारत को सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता मिलने पर ढेर सारी प्रसन्नता दिखाने वाले बुद्धिजीवियों अपने चिंतन से इस बात को समझ नहीं पाये कि अपने विरुद्ध सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव पर भारत का समर्थन पाने के लिये ही गद्दाफी ने यह सब किया। प्रसंगवश चीन और सोवियत संघ के साथ भारत भी अनुपस्थित रहा। तय बात है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इसका व्यापक प्रभाव होगा। वैसे लीबिया भारत के लिये तेल की दृष्टि से व्यवसायिक हितों वाला भले ही रहा हो पर राजनीतिक दृष्टि से कभी अधिक निकट नहीं रहा। इसके बावजूद भारत का उसके प्रति जो रवैया है उसके प्रति विश्व का दृष्टिकोण कैसा रहेगा, यह आगे देखने वाली बात होगी।
संभव है कि सारे प्रायोजित राजनीतिक विशेषज्ञ होली खेलने के बाद क्रिकेट में व्यस्त हों या फिर टीवी चैनल वाले सोचते हों कि अभी तो मुफ्त में काम चल रहा है तो क्यों गैर मनोरंजक विशेषज्ञों पर पैसा खर्च किया जाये? वैसे यह विशेषज्ञ उनसे पैसा लेते होंगे इसमें भी शक है क्योंकि प्रचार माध्यमों की वजह से उनको मूल्यवान कार्य और कार्यक्रम मिलते हैं। फिर लीबिया जैसा जटिल विषय एकदम प्रतिक्रिया देने लायक बन भी नहीं सकता क्योंकि उससे पहले बुद्धिजीवियों को अपने शिखर पुरुषो के इशारे का इंतजार होगा जिनके पास होली की वजह से फुरसत अभी नहीं होगी। हमारे देश में गद्दाफी का विरोध तो प्रगतिशील और जनवादी बुद्धिजीवी वैसे भी कर रहे थे पर चूंकि मामला अमेरिकी हमले का है तो उनको अपने दृष्टिकोण पर फिर से विचार करना पड़ेगा। दक्षिणपंथियों के लिये वैसे भी गद्दाफी कोई प्रिय व्यक्ति नहीं रहा है। ऐसे में हमें इंतजार है कि लीबिया पर विचाराधाराओं से जुड़े बुद्धिजीवियों की क्या प्रतिक्रिया होती है? आशा है होली और क्रिकेट से फुरसत पाने के बाद इन प्रचार माध्यमों को अपनी विज्ञापन की नदी के सतत प्रवाह के लिये यह शुतुरमुर्गीय दृष्टिकोण बदलना ही पड़ेगा।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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11/30/10

विकिलीक्स के मनोरंजक खुलासे-हिन्दी लेख (wikileeks ke manoranjak khulase-hindi lekh)

हमारे देश में ऐसी बहुत बड़ी आबादी है जिसकी दिलचस्पी अमेरिका में इतनी नहीं है जितनी प्रचार माध्यम या विशिष्ट वर्ग के लोग लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जनसामान्य जागरुक नहीं है या समाचार पढ़ने या सुनने के उसके पास समय नहीं है। दरअसल देश के प्रचार माध्यम से जुड़े लोग यह मानकर चलते हैं कि गरीब, ठेले वाले, खोमचे वाले या तंागे वाले उनके प्रयोक्ता नहीं है और इसलिये वह पढ़े लिखे नौकरी या व्यवसाय करने वालों को ही लक्ष्य कर अपनी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यह उनका अज्ञान तथा अव्यवसायिक प्रवृत्ति का परिणाम है। शायद कुछ बुद्धिमान लोग बुरा मान जायें पर सच यह है कि समाचार पढ़ना तथा राजनीतिक ज्ञान रखना गरीबीया अमीरी से नहीं जुड़ा-यह तो ऐसा शौक है जिसको लग जाये तो वह छूटता नहीं है। चिंतन क्षमता केवल शिक्षित या शहरी लोगों के पास होने का उनका विचार खोखला है। कई बार तो ऐसा लगता है कि ग्रामीण और शिक्षित वर्ग का ज्ञान कहीं  अधिक है। सीधी बात कहें तो अमेरिका ने 1971 में भारत पाक युद्ध के समय अपना सातवां बेड़ा भारत के खिलाफ उतारने की घोषणा की थी और यह बात आज भी आम भारतीय के जेहन में है और वह उस पर यकीन नहीं करता। विकिलीक्स से बड़े शहरों के बुद्धिजीवी चौंक गये हैं पर उनमें कुछ ऐसा नहीं है कि आम भारतीय जनमानस प्रभावित या चिंतित हो।
विकिलीक्स ने अमेरिकी सरकार के गोपनीय दस्तावेजों का खुलासा किया है। यह एक बहुदेशीय वेबसाईट है। अनेक पत्रकार इसमें अपने पाठ या पोस्ट रखते हैं और उनकी जांच के बाद उनको प्रकाशित किया जाता है। अपनी भद्द पिटते देखकर अमेरिकी सरकार इसके विरुद्ध कार्यवाही करने में लगी है। वह अन्य देशों से इसे अनदेखा करने का आग्रह कर रही है। दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रचार की जिम्मेदारी लेने वाले अमेरिकी रणनीतिकार अब ठीक उलट बर्ताव कर रहे हैं।
अमेरिका की विदेश मंत्री हेनरी क्लिंटन ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारत के दावे का मखौल उड़ाने के साथ ही हमारे देश के विशिष्ट वर्ग की जासूसी करने को कहा है। बात तो यह है कि अमेरिका अपनी आर्थिक विवशताओं के चलते ही भारत को पुचकार रहा है वरना उसकी आत्मा तो खाड़ी देश और उनके मानस पुत्र पाकिस्तान में ही बसती है। इसलिए अपनी साम्राज्यवादी भूख मिटाने तथा हथियार बिकवाने के लिये पाकिस्तान को भी साथ रख रहा है। अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में फैले आतंकवाद से निपटने में भारतीय हितों की उसे परवाह नहीं है। उसका दोगलापन कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर चौंका जाये। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता भी अब कितनी प्रासंगिक है यह भी हमारे लिये विचार का विषय है। ब्राजील, जापान, जर्मनी के साथ भारत को इसमें स्थाई सदस्यता दी भी गयी तो उसमें वीटो पॉवर का अधिकार मिलेगा इसमें संदेह है-कुछ प्रचार माध्यमों में इस आशय का समाचार बहुत पहले पढ़ने को मिला था कि अब नये स्थाई सदस्यों को इस तरह का अधिकार नहीं मिलेगा। बिना वीटो पॉवर की स्थाई सदस्यता को कोई मतलब नहीं है। यह अलग बात है कि अमेरिकी मोह में अंधे हो रहे प्रचार कर्मी उसकी हर बात को ब्रह्म वाक्य की तरह उछालते हैं। तब ऐसा भी लगता है कि वह अपने देश के जनमानस की बजाय पश्चिमी अप्रवासी भारतीयों को लिये अपने प्रसारण कर रहे हैं। अभी हाल ही में भारत के सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता पर भी जिस तरह खुश होकर यह प्रचार माध्यम चीख रहे थे वह हास्यप्रद था क्योंकि यह क्रमवार आधार पर नियम से मिलनी ही थी। समाचारों पर बहुत समय से रुचि लेने वाले आम पाठक यह जानते हैं कि अनेक अवसरों पर भारत को यह सदस्यता मिली पर उसकी बात सुनी नहीं गयी।
इस चर्चा में विकीलीक्स के खुलासे चिंतन से अधिक मनोरंजन के लिये है। जिस तरह विदेशी राष्ट्रों के लिये संबोधन चुने गये हैं उससे भारतीय टीवी चैनलों के हास्य कलाकारों की याद आती है। यह अलग बात है कि यह कलाकार पेशेवर होने के कारण अमेरिकी रणनीतिकारों से अधिक शालीन और प्रभावी शब्द इस्तेमाल करते हैं। विकिलीक्स ने अमेरिकी रणनीतिकारों के दोहरेपन को प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया है जो कि एक असामान्य घटना है। अमेरिकी जो कहते हैं और सोचते हैं इस पर अधिक माथा पच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। सच तो यह है कि विकिलीक्स के खुलासे देखकर कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अमेरिका एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बल्कि पूंजीवाद का उपनिवेश है जो व्यापार या बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। चाहे किसी भी देश के पूंजीपति या विशिष्ट वर्ग के लोग हैं अपने क्षेत्र में उसे कितनी भी गालियां देते हों पर अपनी संतान या संपत्ति वहां स्थापित करने में उनको अपनी तथा भविष्य की पीढ़ी की सुरक्षा नज़र आती है। तय बात है कि वह कभी वहां के रणनीतिकारों के निर्देश पर चलते हैं तो कभी उनको चलाते हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों की भी क्या कहने? एक ग्राहक कुछ मांगता है दूसरे से उसकी आपूर्ति करवाते हैं। दूसरा कहे तो तीसरे से करवाते हैं। खुलासों से पता लगता है कि खाड़ी देश दूसरे के परमाणु संयत्र पर अमेरिका को हमले के लिये उकसा रहा है। मतलब यह कि अमेरिका अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा है या पूंजीतंत्र के शिखर पुरुष अपने क्षेत्र में उसे घसीट रहे हैं, यह अब चर्चा का विषय हो सकता है। ऐसे में अमेरिकी रणनीतिकारों के औपचारिक या अनौपचारिक बयानों, कमरे में या बाहर की गयी टिप्पणियों तथा कहने या करने में अंतर की चर्चा करना भी समय खराब करना लगती है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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3/30/10

बैठे ठाले लिख दिया-हिन्दी हास्य व्यंग्य (hasya vyanga in hindi)

कभी कभी तो लगता है कि अपना ही दिमाग चल गया है। संभव है कंप्यूटर पर काम करते हुए यह हुआ हो या लगातार लिखने की वजह से अपने अंदर कुछ अधिक आत्मविश्वास आ गया है जो हर किसी की बात गलत नज़र आती है। यही कारण है कि अंग्रेजी भाषा और रोमन लिपि को लेकर अपने दिमाग में देश के विद्वानों के मुकाबले सोच उल्टी ही विचरण कर रही है। विद्वान लोगों को बहुत पहले से ही अं्रग्रेजी में देश का भविष्य नज़र आता रहा है पर हमें नहंी दिखाई दिया। अपनी जिंदगी का पूरा सफर बिना अंग्रेजी के तय कर आये। इधर अंतर्जाल पर आये तो रोमनलिपि में हिन्दी लिखने की बात सामने आती है तब हंसी आती है।
सोचते हैं कि लिखें कि नहीं। इसका एक कारण है। हमारे एक मित्र पागलखाने में अपने एक अन्य मित्र के साथ उसके रिश्तेदार के साथ देखने गये थे। वहां उन्होंने अपना मानसिक संतुलन जांचने के वाले दस प्रश्न देखे जो वहां बोर्ड पर टंगे थे। उसमें लिखा था कि अगर इन प्रश्नों का जवाब आपके मन में ‘हां’ आता है तो समझ लीजिये कि आपको मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। उनमें एक यह भी था कि आपको लगता है कि आप हमेशा सही होते हैं बाकी सभी गलत दिखते हैं।’
यानि अगर हम यह कहें कि हम सही हैं तो यह मानना पड़ेगा कि हमें मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। अगर हम यह कहें कि देश के सभी लोगों का भविष्य अंग्रेजी से नहीं सुधर सकता या रोमन लिपि में हिन्दी लिखने वाली बात बेकार है तो यह विद्वानों के कथनों के विपरीत नज़र आती है। तब क्या करें?
श्रीमद्भागवत गीता में भी एक बात कही है कि‘बहुत कम ज्ञानी भक्त होते है।’ हजारों में कोई एक फिर उनमें भी कोई एक! मतलब अकेले होने का मतलब मनोरोगी या पूर्ण ज्ञानी होना है। अपने पूर्ण ज्ञानी होने को लेकर कोई मुगालता नहीं है इसलिये किसी आम राय के विरुद्ध अपनी बात लिखने से बचते हैं। मगर कीड़ा कुलबुलाता है तो क्या करें? तब सोचते हैं कि लेखक हैं और ज्ञानी न होने के विश्वास और मनोरोगी होने के संदेह से परे होकर लिखना ही पड़ेगा।
इस देश का विकास अंग्रेजी पढ़ने से होगा या जो अंग्रेजी पढ़ेंगे वही आगे कामयाब होंगे-यह नारा बचपन से सुनते रहे। पहले अखबार पढ़कर और अब टीवी चैनलों की बात सुनकर अक्सर सोचते हैं कि क्या वाकई हमारे देश के कथित बुद्धिजीवियों को देश की आम जनता की मानसिकता का ज्ञान है। तब अनुभव होता है कि अभी तक जिन्हें श्रेष्ठ बुद्धिजीवी समझते हैं वह बाजार द्वारा प्रयोजित थे-जो या तो कल्पित पात्रों के कष्टों का वर्णन कर रुलाते हैं या बड़े लोगों के महल दिखाकर ख्वाब बेचते रहे हैं।
बचपन में विवेकानंद की जीवनी पढ़ी थी। जिसमे यह लिखा था कि शिकागो में जैसे ही उन्होंने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा ‘ब्रदर्स एंड सिस्टर’
वैसे ही सारा हाल तालियों से गूंज उठा। उसके बाद तो उनकी जीवनी में जो लिखा था वह सभी जानते हैं। उन महान आत्मा पर हम जैसा तुच्छ प्राणी क्या लिख सकता है? मगर इधर अंतर्जाल पर उनके प्रतिकूल टिप्पणी पढ़ने का अवसर मिला तो दुःख हुआ। भाई लोग कोई भी टिप्पणी किसी भी सज्जन के बारे में लिख जाते हैं-अब यह पता नहीं उनकी बात कितनी सच कितली झूठ।
बहरहाल इस स्वामी विवेकानंद की जीवन के प्रारंभ मेें ही इस तरह का वर्णन अब समझ में आता है।
ऐसा लगता है कि उन महान आत्मा का जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए बाजार द्वारा लोगों को यह प्रायोजित संदेश दिया गया कि ‘भई, अंग्रेजी पढ़ लिखकर ही आप अमेरिका या ब्रिटेन को फतह कर सकते हो।’
बात यहीं नहीं रुकी। कोई अमेरिका में नासा में काम कर रहा है तो उससे भारत का क्या लाभ? ब्रिटेन के हाउस और कामंस में कोई भारतीय जाता है तो उससे आम भारतीय का क्या वास्ता? इस बारे में रोज कोई न कोई समाचार छपता है? मतलब यह कि यहां आपके होने या होने का केाई मतलब नहीं है।
दरअसल अंग्रेजी के विद्वान-अब तो हिन्दी वाले भी उनके साथ हो गये हैं-कहीं न कहीं अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये अमेरिका और ब्रिटेन के सपने यहां बेचते हैं। कुछ लोगों ने तो यह टिप्पणी भी की है कि अंग्रेजी में विज्ञान है और उससे जानने के लिये उसका ज्ञान होना जरूरी है। अब तो हमारे दिमाग में यह भी सवाल उठने लगा है कि आखिर अंग्रेजी में कौनसा विज्ञान है? चिकित्सा विज्ञान! आधुनिक चिकित्सकों के पास जाने में हमें खौफ लगता है इसलिये ही रोज योग साधना करते हैं। एक नहीं दसियों मरीजों के उदाहरण अपनी आंखों से देखे हैं जिन्होंने डाक्टरों ने अधिक बीमार कर दिया। यह रिपोर्ट, वह रिपोर्ट! पहले एड्स बेचा फिर स्वाइन फ्लू बेचा। मलेरिया या पीलिया की बात कौन करता है जो यहां आम बीमारी है। परमाणु तकनीक पर लिखेंगे तो बात बढ़ जायेगी। भवन निर्माण तकनीकी की बात करें तो यह इस देश में अनेक ऐसे पुल हैं जो अंग्रेजों से पहले बने थे। लालकिला या ताजमहल बनने के समय कौन इंजीनियरिंग पढ़ा था?
अब सवाल करें कि इस देश के कितने लोग बाहर अंग्रेजी के सहारे रोजगार अर्जित कर रहे हैं-हमारे पास ऐसी कई कहानियां हैं जिसमें ठेठ गांव का आदमी अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रंास पहंुच गया और अंग्रेजी न आने के बावजूद वह वहां जम गया। विभाजन के बाद सिंध और पंजाब से आये अनेक लोगों ने यहां आकर हिन्दी सीखी और व्यापार किया। वह हिन्दी या उर्दू सीखने तक वहां नहीं रुके रहे। अब भी देश के तीन या चार करोड़ लोग बाहर होंगे। 115 करोड़ वाले इस देश के कितने लोगों का भविष्य अंग्रेजी से बन सकता है? कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया में कितने भारतीय जा पायेंगे? इसका मतलब यह है कि आज की तारीख में 115 पंद्रह करोड़ लोग तो भारतीय ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पहली सांस यहां ली तो अंतिम भी यही लेंगे। अरे, कार बनाने की इंजीनियरिंग सीख ली, रोड बनाने की भी तो सीखी है! मगर क्या हुआ। एक से एक नयी कार बाजार में आ गयी है पर सड़कों के क्या हाल है?
मतलब यह है कि आप एक या दो करोड़ लोगों के भविष्य को पूरे देश का भविष्य नहीं कह सकते। अंग्रेजी सीखने से दिमाग भी अंग्रेजी हो जाता है। ऐसा लगता है कि दिमाग का एक हिस्सा काम ही नहंी करता। भ्रष्टाचार और अपराध पर बोलते सभी हैं पर अपने कर्म किसी को नहीं दिखाई देते। अंग्रेजी दो ही लोगों की भाषा है-एक साहब की दूसरी गुलाम की! तीसरी स्थिति नहीं है। अंग्रेजी यहां क्यों सिखा रहे हो कि अमेरिका में नास में जाकर नौकरी करो या हाउस कामंस में बैठो। यहां तो सभी जगह वंशों का आरक्षण किया जाना है। पहले व्यापार में ही वंश परंपरा थी पर अब तो खेल, फिल्म, समाजसेवा, कला तथा पत्रकारिता में भी वंश परंपरा ला रहे हैं। जिसके पास पूंजी है वही अक्लमंद! बाकी सभी ढेर! अंग्रेजी पढ़ोगे तो ही बनोगे शेर। मतलब अधिक योग्य हो तो अंग्रेजी पढ़ो और बाहर जाकर गुलामी करो! यहां तो वंशों का आरक्षण हो गया है।
अमेरिका और ब्रिटेन आत्मनिर्भर देश नहीं है। दोनों के पास विकासशील देशों का पैसा पहुंचता है। विकासशील देशों की जनता गरीब हैं पर इसलिये उनके यहां के शिखर पुरुष अपना पैसा छिपाने के लिये इन पश्चिमी देशों की बैंकों को भरते हैं। फिर तेल क्षेत्रों पर इनका कब्जा है। ईरान पर ब्रिटेन का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है पर अन्य तेल उत्पादक देशों पर अमेरिका का सीधा नियंत्रण है। अमेरिका का अपना व्यापार कुछ नहंी है सिवाय हथियारों के! अमेरिका इसी तेल क्षेत्र पर वर्चस्व बनाये रखने के लिये तमाम तरह की जीतोड़ कोशिश कर रहा है। इस कोशिश में उसे फ्रंास की मदद की जरूरत अनेक बार पड़ती है। कभी अकेला लड़ने नहीं निकलता अमेरिका। वैसे अमेरिका इस समय संघर्षरत है और अगर उसका एक शक्ति के रूप में पतन हुआ तो वहां जाकर ठौर ढूंढने से भी लाभ नहीं रहेगा। सबसे बड़ी बात है कुदरत का कायदा। कल को कुदरत ने नज़र फेरी और ब्रिटेन और अमेरिका का आर्थिक, राजनीतिक तथा सामरिक रूप से पतन हुआ तो अंग्रेजी की क्या औकात रह जायेगी? फिर इधर चीन बड़ा बाजार बन रहा है। जिस तरह उसकी ताकत बढ़ रही है उससे तो लगता है कि चीनी एक न एक दिन अंग्रेजी को बेदखल कर देगी। तब अपने देश का क्या होगा? कुछ नहीं होगा। इस देश में गरीबी बहुत है और यही गरीब धर्म, भाषा तथा नैतिक आचरण का संवाहक होता है उच्च वर्ग तो सौदागर और मध्यम वर्ग उसके दलाल की तरह होता है। गरीब आदमी अपनी तंगहाली में भी हिन्दी और देवानगारी लिपि को जिंदा रख लेगा। मगर उन लोगों की क्या हालत होगी जो स्वयं न तो अंग्रेज रहे हैं और हिन्दी वाले। उनकी पीढ़ियां क्या करेंगी? कहीं अपने ही देश में अजनबी होने का ही उनके सामने खतरा न पैदा हो जाये। सो अपना कहना है कि क्यों अंग्रेजी को लेकर इतना भ्रम फैलाते हो। कहते हैं कि इस देश को दूसरे देशों के समकक्ष खड़ा होना है तो अंग्रेजी भाषा सीखों और हिन्दी के लिये रोमन लिपि अपनाओ। पहली बात तो वह जगह बताओ जहां 113 करोड़ लोगों को खड़ा किया जा सके-अरे, यह अमेरिका में नासा में काम करने या इंग्लैंड के हाउस आफ कामंस में बैठने से भला क्या इस देश की सड़कें बन जायेगी? फिर क्या सभी वहां पहुंच सकते हैं क्या? कल इस पर लेख लिखा था, पर दिल नहीं भरा तो बैठे ठाले यह लिख लिया!

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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