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8/7/11

अमेरिकी डॉलर का संकट-हिन्दी व्यंग्य लेख (trouble of american dollar-hindi satire thought article)

                  जब अमेरिका की अर्थव्यवस्था डगमगाती है तब विश्व के प्रचार माध्यम ऐसे जताते हैं कि सभी देशों के लोग कांप रहे हैं। दुनियां के उद्योगपति, पूंजीपति और प्रतिष्ठत लोगों के आर्तनाद तब प्रचार माध्यमों में सुनाई देता है गोया कह रहे हों कि ‘‘भगवान, अमेरिका को बचा लो।’
          वैसे तो आज तक यह समझ में नहीं आया कि आखिर अमेरिका की अर्थव्यवस्था का रहस्य क्या है पर अभी   हाल ही में पता चला कि अमेरिका की जनप्रतिनिधि सभा सरकार को कर्ज लेने के संबंध में रियायतें देने से आनाकानी कर रही थी। यह जनप्रतिनिधि भी वहीं के हैं और सरकारी भी वहीं की। इसका मतलब यह अंदरूनी विवाद था जिस पर पूरे विश्व के बड़े लोग आंखों लगाये बैठे रहे कि कहीं अमेरिका का बाजा बजा तो अपनी भी बारात निकल जायेगी। दरअसल आजतक अमेरिका का बजट आज तक समझ में नहीं आया। अब पता लग रहा है कि दुनियां को धमकाने वाला अमेरिका ऊपर से नीचे तक कर्ज में डूबा है मगर फिर भी साहुकार कहलाता है।
       मूलतः भारत का अमेरिका से कोई आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा तथा वैचारिक संबंध नहीं है जिससे उसे सहोदर राष्ट्र कहा सके। प्रत्यक्ष उससे कोई शत्रुता वाली बात नहीं है वह इसी आधार पर ही मित्र कहा जाता है पर अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के साथ वह जो संबंध निभाता है वह एक तरह से दुश्मनी जैसा ही व्यवहार है। भारत की प्राकृतिक और खनिज संपदा, मानव संसाधन, अध्यात्मिक ज्ञान और सांस्कृतिक शक्ति इतनी विशाल है कि उसे अमेरिका पर निर्भर रहने की आवश्यकता भी नहीं है तब यहां उसकी आर्थिक स्थिति डगमगाने पर चिंता करना व्यर्थ ही कहा जा सकता है पर जब हम देखते हैं कि हमारे यहां के प्रचार माध्यम उस पर विलाप कर रहे हों उस समय यह प्रश्न उठता है कि कहीं भारत के कुछ लोगों के वैयक्तिक आधार तो नहीं बिखर रहे है जिससे वह घबड़ा गये है। इस तरह का संदेह होने का कारण यह है कि डॉलर आज भी विश्व बाज़ार में विनिमय का साधन है। इसका मतलब यह है कि डॉलर उन लोगों के पास भी हो सकता है जो अमेरिका में नहीं है और जिन विदेशियों के पास है वह चाहेंगे कि अमेरिका बचा रहे ताकि उनका धन भी बचे। दूसरा यह कि दुनियां भर में आर्थिक लेनदेन का लेखा डॉलर में ही रखा जाता है। प्राकृतिक, खनिज और मानव संसाधन में अन्य देशों से कम धनी अमेरिका की मुद्रा डॉलर बहुत महंगी होती जा रही है। मान लीजिये किसी भारतीय के पास दस डॉलर हैं तो इसका मतलब यह समझें कि उसके पास पचास रुपये हैं। अगर डॉलर का रेट मान लीजिये 52 रुपये हो गया तो उसके 520 रुपये हो गये। अगर अमेरिका की घटती साख के साथ डॉलर कहीं आठ आने का हो गया तो उसके पास पांच रुपये रह जायेंगे। यही कारण है कि हमारे देश के शक्तिशाली आर्थिक पुरुष विदेशी बैंकों में अपना पैसा रखते रहे हैं क्योंकि डॉलर के भाव बढ़ने के साथ उनका रुपया वैसे ही बढ़ जाता है। अमेरिका कर्ज लेता है पर किससे और कहां से इसका पता नहीं लगता। फिर वह हथियार और आधुनिक तकनीकी बेचता है और उसके लिये भी सहायता देता है। देखा जाये तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के आधार गोलमोल हैं जबकि इसके विपरीत भारतीय बजट संसद में हर तरह से स्पष्ट व्याख्या के साथ प्रस्तुत किया जाता है। फ्रांस, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन तथा उनकी तरह विकसित अन्य यूरोपीय राष्ट्र अमेरिका की परवाह नहीं करते। यहां तक कि उन्होंने अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपना यूरो भी उतार दिया है पर चूंकि अमेरिका दूसरों के गोलमाल को भी अपने यहां समायोजित करता है इसलिये डॉलर आज भी अधिक पंसदीदा मुद्रा है। यही कारण है कि डॉलरधारी लोग अमेरिका के संपन्न और शक्तिशाली होने की न केवल कामना करते हैं बल्कि उसकी मदद को हर समय तैयार रहते हैं।
          कहा जाता है कि पुजारी की दौड़ सर्वशक्तिमान के दरबार तक, यह बात दुनियां भर के विकासशील देशों के आर्थिक शिखर पुरुषों पर लागू होती है। अब यह कहना मुश्किल है कि दुनियां भर के काले धनिक लोग अमेरिका को चला रहे हैं या वही उनका संरक्षक है। अगर अमेरिकी डॉलर विश्व में विनिमय का प्रमुख मुद्रा का रूप खो बैठे तो रुपये के मुकाबले उसकी गिरावट कितनी होगी अंदाजा नहीं है। कम से कम भारतीय रुपया एक डॉलर से कम तो कभी रहने वाला नहीं है। दरअसल डॉलर का मूल्य अधिक होने का कारण है यह भी है कि दुनियां भर के छात्र, शिक्षक, इंजिनीयर, व्यापानी तथा फिल्मकार अमेरिका जाते हैं। अमीरों के लिये अमेरिका एक स्वर्ग जैसा है। वह अमेरिका जाते हैं तो उनको डॉलर चाहिए। तय बात है कि डॉलर की मांग अधिक रहती है। मांग और आपूर्ति के नियम से उसका मूल्य अधिक रहना ही है। फिर वह लोग वहां अधिक जाते हैं वहां की वस्तुओं और सेवाओं की कीमत भी बढ़ती है। अनेक बार अमेरिका भारत पर प्रतिबंध लगाता है तो उसे चेताया जाता है कि अंततः हानि उसकी ही होनी है। बाद में वह प्रतिबंध हटा लेता है या ढीला कर देता है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था विदेशी देशों पर आधारित है यह बात उसके कर्ज लेकर घी पीने की आदत से पता चल ही जाती है।
               आम भारतीय को इसकी बिल्कुल परवाह नहीं है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में गिरावट है कि नहीं पर इतना तय है कि कहीं न कहीं उसके परिश्रम से अर्जित धन अमेरिका को भी सहारा देता है। अगर कुछ भारतीय अमेरिका न जायें न उससे सामान खरीदें तो शायद डॉलर बुरी हालत में आ जाये। डॉलर का अधिक भाव होने से हमारी चीजें और श्रम उसे सस्ता पड़ता है। जबकि उसकी चीजें और सेवायें हमें महंगी पड़ती हैं। इस तरह हमारे श्रमिक और छोटे व्यापारी घाटे में ही रहते हैं। बहरहाल 1971 में पाकिस्तान के लिये सातवां बेड़ा भेजने की घटना कभी भूली नहीं जा सकती इसलिये आज भी अमेरिका को इस देश के आमलोगों को वैसा मित्रभाव नहीं मिलता जैसा कि उसके स्वदेशी प्रशंसक चाहते हैं। वैसे प्रकृति के कुछ नियम हैं। कछुआ और खरगोश की दौड़े में कछुआ इसलिये जीता क्योंकि वह धीरे धीरे चला था। भारत को हम कछुआ कहेंगे और अमेरिका को खरगोश। भारत धीरे धीरे ही विश्व के राजनीतिक पटल पर उठा रहा है और आगे उसका भविष्य उज्जवल रहने वाला है जबकि अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध में जापान पर परमाणु बम गिराने के बाद दुनियां में तेजी से उभर कर आया। अब वह शनैःशनै पतनोन्मुख होता दिख रहा है। लगता है कि अफगानिस्तान का युद्ध उसे ले डूबेगा। अमेरिकी रणनीतिकार वहां से निकलने की सोच रहे हैं पर जिस तरह वहां अभी हाल अमेरिकी के सील सैनिकों की मौत हुई है वह उसकी सामरिक शक्ति को भी चुनौती मिलने लगी हैं। यह सील सैनिक उसी समूह के हैं जिन्होंने पाकिस्तान में घुसकर दुनियां के सबसे खूंखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मारा था। बहरहाल अमेरिका भी एक विशालकाय जहाज है भले ही भंवर में फंस गया है पर डूबने में बहुत समय लेगा।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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11/30/10

विकिलीक्स के मनोरंजक खुलासे-हिन्दी लेख (wikileeks ke manoranjak khulase-hindi lekh)

हमारे देश में ऐसी बहुत बड़ी आबादी है जिसकी दिलचस्पी अमेरिका में इतनी नहीं है जितनी प्रचार माध्यम या विशिष्ट वर्ग के लोग लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जनसामान्य जागरुक नहीं है या समाचार पढ़ने या सुनने के उसके पास समय नहीं है। दरअसल देश के प्रचार माध्यम से जुड़े लोग यह मानकर चलते हैं कि गरीब, ठेले वाले, खोमचे वाले या तंागे वाले उनके प्रयोक्ता नहीं है और इसलिये वह पढ़े लिखे नौकरी या व्यवसाय करने वालों को ही लक्ष्य कर अपनी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यह उनका अज्ञान तथा अव्यवसायिक प्रवृत्ति का परिणाम है। शायद कुछ बुद्धिमान लोग बुरा मान जायें पर सच यह है कि समाचार पढ़ना तथा राजनीतिक ज्ञान रखना गरीबीया अमीरी से नहीं जुड़ा-यह तो ऐसा शौक है जिसको लग जाये तो वह छूटता नहीं है। चिंतन क्षमता केवल शिक्षित या शहरी लोगों के पास होने का उनका विचार खोखला है। कई बार तो ऐसा लगता है कि ग्रामीण और शिक्षित वर्ग का ज्ञान कहीं  अधिक है। सीधी बात कहें तो अमेरिका ने 1971 में भारत पाक युद्ध के समय अपना सातवां बेड़ा भारत के खिलाफ उतारने की घोषणा की थी और यह बात आज भी आम भारतीय के जेहन में है और वह उस पर यकीन नहीं करता। विकिलीक्स से बड़े शहरों के बुद्धिजीवी चौंक गये हैं पर उनमें कुछ ऐसा नहीं है कि आम भारतीय जनमानस प्रभावित या चिंतित हो।
विकिलीक्स ने अमेरिकी सरकार के गोपनीय दस्तावेजों का खुलासा किया है। यह एक बहुदेशीय वेबसाईट है। अनेक पत्रकार इसमें अपने पाठ या पोस्ट रखते हैं और उनकी जांच के बाद उनको प्रकाशित किया जाता है। अपनी भद्द पिटते देखकर अमेरिकी सरकार इसके विरुद्ध कार्यवाही करने में लगी है। वह अन्य देशों से इसे अनदेखा करने का आग्रह कर रही है। दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रचार की जिम्मेदारी लेने वाले अमेरिकी रणनीतिकार अब ठीक उलट बर्ताव कर रहे हैं।
अमेरिका की विदेश मंत्री हेनरी क्लिंटन ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारत के दावे का मखौल उड़ाने के साथ ही हमारे देश के विशिष्ट वर्ग की जासूसी करने को कहा है। बात तो यह है कि अमेरिका अपनी आर्थिक विवशताओं के चलते ही भारत को पुचकार रहा है वरना उसकी आत्मा तो खाड़ी देश और उनके मानस पुत्र पाकिस्तान में ही बसती है। इसलिए अपनी साम्राज्यवादी भूख मिटाने तथा हथियार बिकवाने के लिये पाकिस्तान को भी साथ रख रहा है। अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में फैले आतंकवाद से निपटने में भारतीय हितों की उसे परवाह नहीं है। उसका दोगलापन कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर चौंका जाये। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता भी अब कितनी प्रासंगिक है यह भी हमारे लिये विचार का विषय है। ब्राजील, जापान, जर्मनी के साथ भारत को इसमें स्थाई सदस्यता दी भी गयी तो उसमें वीटो पॉवर का अधिकार मिलेगा इसमें संदेह है-कुछ प्रचार माध्यमों में इस आशय का समाचार बहुत पहले पढ़ने को मिला था कि अब नये स्थाई सदस्यों को इस तरह का अधिकार नहीं मिलेगा। बिना वीटो पॉवर की स्थाई सदस्यता को कोई मतलब नहीं है। यह अलग बात है कि अमेरिकी मोह में अंधे हो रहे प्रचार कर्मी उसकी हर बात को ब्रह्म वाक्य की तरह उछालते हैं। तब ऐसा भी लगता है कि वह अपने देश के जनमानस की बजाय पश्चिमी अप्रवासी भारतीयों को लिये अपने प्रसारण कर रहे हैं। अभी हाल ही में भारत के सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता पर भी जिस तरह खुश होकर यह प्रचार माध्यम चीख रहे थे वह हास्यप्रद था क्योंकि यह क्रमवार आधार पर नियम से मिलनी ही थी। समाचारों पर बहुत समय से रुचि लेने वाले आम पाठक यह जानते हैं कि अनेक अवसरों पर भारत को यह सदस्यता मिली पर उसकी बात सुनी नहीं गयी।
इस चर्चा में विकीलीक्स के खुलासे चिंतन से अधिक मनोरंजन के लिये है। जिस तरह विदेशी राष्ट्रों के लिये संबोधन चुने गये हैं उससे भारतीय टीवी चैनलों के हास्य कलाकारों की याद आती है। यह अलग बात है कि यह कलाकार पेशेवर होने के कारण अमेरिकी रणनीतिकारों से अधिक शालीन और प्रभावी शब्द इस्तेमाल करते हैं। विकिलीक्स ने अमेरिकी रणनीतिकारों के दोहरेपन को प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया है जो कि एक असामान्य घटना है। अमेरिकी जो कहते हैं और सोचते हैं इस पर अधिक माथा पच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। सच तो यह है कि विकिलीक्स के खुलासे देखकर कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अमेरिका एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बल्कि पूंजीवाद का उपनिवेश है जो व्यापार या बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। चाहे किसी भी देश के पूंजीपति या विशिष्ट वर्ग के लोग हैं अपने क्षेत्र में उसे कितनी भी गालियां देते हों पर अपनी संतान या संपत्ति वहां स्थापित करने में उनको अपनी तथा भविष्य की पीढ़ी की सुरक्षा नज़र आती है। तय बात है कि वह कभी वहां के रणनीतिकारों के निर्देश पर चलते हैं तो कभी उनको चलाते हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों की भी क्या कहने? एक ग्राहक कुछ मांगता है दूसरे से उसकी आपूर्ति करवाते हैं। दूसरा कहे तो तीसरे से करवाते हैं। खुलासों से पता लगता है कि खाड़ी देश दूसरे के परमाणु संयत्र पर अमेरिका को हमले के लिये उकसा रहा है। मतलब यह कि अमेरिका अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा है या पूंजीतंत्र के शिखर पुरुष अपने क्षेत्र में उसे घसीट रहे हैं, यह अब चर्चा का विषय हो सकता है। ऐसे में अमेरिकी रणनीतिकारों के औपचारिक या अनौपचारिक बयानों, कमरे में या बाहर की गयी टिप्पणियों तथा कहने या करने में अंतर की चर्चा करना भी समय खराब करना लगती है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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9/19/10

क्रिकेट में फिक्सिंग का मौसम और हिन्दी ब्लॉग-हिन्दी व्यंग्य (cricket match and hindi blog-hindi vyangya)

क्रिकेट शुरु हो गयी तो ब्लाग पिटना शुरु हो गये। हिन्दी दिवस के एक दिन पहले अनेक ब्लागों ने जमकर हिट पाये तब कहना पड़ा कि ‘थैंक्स हिन्दी, चलो एक दिन ही सही ब्लागों पर हिट तो दिलवाये। अगले दिन ब्लाग सामान्य स्थिति में लौटे पर फिर अचानक पाठ तथा पाठ पठन संख्या एकदम गिर गयी। समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हुआ? क्या यह तूफान गुज़र जाने के बाद की शांति है-जी हां तूफान आने से पहले शांति होती है तो उसके गुज़र जाने पर भी उन जगहों पर शांति दिखाई देती है जहां इंसान और पशु नहीं बसते। ब्लाग को पिटता देखकर कुछ ऐसा भी लगा कि जैसे तेज बरसात होने के बाद अचानक बंद हो जाती है और धूप निकलते ही गर्मी होने लगती है। उससे फिर बरसात होती है, फिर शीतलता का अहसास होने लगता पर ब्लाग पर अगले कुछ दिनों तक हिन्दी दिवस के एक दिन पूर्व जैसे हिट मिलने की संभावना अब नहींे है क्योंकि क्रिकेट का मौसम कम से कम एक या डेढ़ महीना चलेगा। पिछले तीन वर्षों का अनुभव यह बताता है कि हिन्दी अंतर्जाल का हिन्दी पाठकों एक बहुत बड़ा वर्ग उस समय कम हो जाता है जब कोई क्लब स्तरीय प्रतियोगिता-चाहे वह भारत में हो या बाहर-होती है।
इधर पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों का भी फिक्सिंग का मौसम चल रहा है। एक मैच से निकलते नहीं है कि दूसरा मैच फिक्स कर लेेते हैं। उन्होंने फिक्सिंग के नये नये तरीके ईजाद कर लिये हैं। हर बाल पर फिक्सिंग करने का उन्होंने जो तरीका निकाला है वह नया जरूर लगता है पर इसका अनुमान क्रिकेट के कुछ जानकार आम लोग पहले ही कर चुके थे जब अखबारों में यह समाचार आया था कि अब सट्टेबाज किसी मैच की बजाय उसकी गतिविधियों पर ही दांव खिलवायेंगे। जहां दो देश मैच खेलते हैं वहां की जनता की भावनायें भी जुड़ जाती हैं और जब पोल खुलती है तो खिलाड़ियों की इज्ज़त धूल मे मिल जाती है इसलिये उसकी गतिविधियों पर ही दांव खेले जाते हैं। फिर अंतर्राष्ट्रीय मैचों में खिलाड़ियों पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाये गये कि मोबाईल नहीं रख सकते या किसी से मिल नहीं सकते। इसलिये क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया-जिसमें खिलाड़ी अपनी मर्ज़ी के खुद मालिक होते हैं।  प्रचार माध्यमों ने उनका पूरा साथ देकर इन क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं को लोकप्रिय बना दिया ताकि उनको विज्ञापन से धन तथा विषय सामग्री प्रस्तुत करने के लिये दृश्य मिलते रहें-टीवी समाचार चैनलों का एक में से आधा घंटा क्रिकेट के दृश्यों तथा चर्चा पर ही आधारित होता है। अब इन पर सट्टा तो लगता है पर चूंकि इससे कोई भावनायें नहीं जुड़ी हैं इसलिये कोई ध्यान नहीं देता। ऐसे भी समाचार आये कि इन प्रतियोगिताओं के अनेक मैच फिक्स होते हैं पर कोई बावेला नहीं मचता।
बीस ओवरीय पद्धति पर आधारित इन मैचों के लिये दर्शक अब एक दिवसीय मैचों से अधिक हो गये हैं। इतना ही नहीं लोग राष्ट्रप्रेम की भावना से परे होकर केवल चौके छक्के देखने में मशगूल हो जाते है। सभी लोग दांव नहीं खेलते पर कुछ लोग तो शायद ऐसे हैं जिनका खेल में कम अपने लाभ में अधिक ध्यान रहता है। स्पॉट फिक्सिंग’ यानि मौके पर दांव लगाने के प्रचलन से खिलाड़ियों के साथ ही उनके अदृश्य प्रायोजकों को भी फायदा है। दूसरी बात यह कि फंस जाने पर आम जनता से नाराजगी का खतरा भी नहीं है। कह सकते हैें कि ‘हमने कोई देश की प्रतिष्ठा थोड़े ही दांव पर लगायी है।’
पिछली बार भारत में हुई क्लब स्तरीय प्रतियोगिता को लेकर इतना बावेला बचा। अनेक सरकारी विभाग सक्रिय हुए। राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट नियंत्रण करने वाले संगठन आग बबूला होते दिखे मगर नतीजा ढाक के तीन पात। एक मुर्गा है पाकिस्तान जिसको चाहे हलाल कर लिया जाता है क्योंकि वह आतंकवाद के नाम पर भी वैसे भी बदनाम है। अभी एक विदेशी अखबार ने दावा किया था कि दुनियां भर के 29 खिलाड़ी स्पॉट फिक्ंिसग में शामिल हैं और ये उन सभी देशों से संबंधित हैं जो क्रिकेट खेलते हैं। मतलब अकेले पाकिस्तानी इसमें शामिल नहीं हैं-इसका प्रमाण यह भी है कि इस मामले में दलाली करने वाले लोग दुबई और भारत में रहने वाले बताये जाते हैं।
पाकिस्तान का एक खिलाड़ी शाहिद अफ्रीदी काफी जीवट वाला माना जाता है। इंग्लैंड के खिलाफ एक दिवसीय श्रृंखला में कप्तानी करते हुए उसकी टीम दो एक दिवसीय मैच हार गया। पाकिस्तान की यह दोनों हार शक के दायरे में नहीं आयी। तीसरे एक दिवसीय मैच में पाकिस्तान जीता तो वह मैच शक के दायरे में आ गया। बताया गया कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की दौड़ दर यानि रन रेट शकशुबहे वाली है। इस मैच में अफरीदी रन आउट हो गया। हम फिक्स मैच देखने का मज़ा उठाने के ख्याल से आजकल पाकिस्तानियों के मैच देखते हैं पर अफ़रीदी का इस तरह आउट होना अपने को हज़म नहीं हुआ।
गेंद आसमान से उड़ती हुई विकेटकीपर के पास आ रही थी और अफ़रीदी बल्ला हवा में लहराते हुए दौड़ रहा था जैसे मन ही मन ही दुआ कर रहा हो कि विकेटकीपर जल्दी उसे आउट कर दे जिससे बाहर बैठे उसके अदृश्य प्रायोजक खुश हो जायें। फिर भी दौड़ने में कुछ जल्दी कर गया। वह तो गनीमत है कि तीसरे कैमरे की आंख ने उसे आउट न होने से बचा लिया। जब गेंद विकेट में लगी अफ़रीदी का बल्ला अंदर पर हवा में था। अफरीदी को संदेह का लाभ मिलने का खतरा था जो टल गया। कम से कम पाकिस्तानियों ने इस बार फिक्सिंग में देश भक्ति दिखाई और मैच जीत लिया। सारी दुनियां को भी बता दिया कि स्पॉट फिक्ंिसग के बावजूद मैच जीता जा सकता है। अन्य देशों के खिलाड़ी उससे सीख सकते हैं।
मैच समाप्ति पर जब इनाम बंट रहे थे तब उद्घोषक ने अफ़्रीदी से पूछा गया कि ‘क्या वह सुस्त दौड़ से रन आउट हुआ?’
उसने कहा-‘हां!
हमें यह सुस्ती भी उस समय फिक्स लगी थी जब वह दिखाई गयी थी। अब तो पूरा मैचा ही संदेह के घेरे में आ गया है। वैसे फिक्स मैच देखने में भी मज़ा है यह पहली बार पता चला। हमें यह पता था कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों के पास इस मैच में जीतने के अलावा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि पहले दो मैच हारने के बाद यह तीसरी हार बाकी श्रृंखला का मज़ा खराब कर देती। ऐसे में स्पॉट फिक्सिंग या रन रेट फिक्सिंग  में दांव लगाने वाले लोगों की संख्या कम हो जाती। लोग अक्सर एक सवाल पूछते हैं कि आखिर पाकिस्तानी खिलाड़ी ही क्यों फिक्ंिसग में फंसते हैं। इसका सीधा जवाब यह है कि उनके पास न तो विज्ञापन हैं न ही रैम्प में नाचने की सुविधा। अपने पड़ौसी देश भारत तथा मित्र देश श्रीलंका के खिलाड़ियों के मुकाबले उनके पास धन केवल इसी रास्ते आ सकता है। दूसरी बात यह कि वह मैच जीतने की कुब्बत रखते हैं इसलिये उनका हारना भी बिक जाता है। रन आउट होना फिक्स किया तो क्या मैच भी तो जीता। ऐसे कुब्बत भला कोई दूसरे देश के खिलाड़ी दिखा सकते हैं? पाकिस्तानियों को जीत भी फिक्स करना आती है! भला कौन उनकी इस चालाकी को चुनौती दे सकता है। एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि उनकी फिटनैस पर कोई सवाल नहीं उठाता जबकि भारतीय टीम में कभी पांच छह खिलाड़ियों के अनफिट होने की बात कही जाती है। इसका प्रमाण है कि 40 बरस के उनके कौच गैरी कर्स्टन ने स्टेडियम में छह चक्कर लगाये जबकि भारतीय धुरंधर एक दो में ही हांफने लगे थे। यह बात प्रचार माध्यम ही बताते हैं। पाकिस्तानियों के हारने के साथ जीतने का भी अभ्यास करना है इसलिये वह फिटनेस का ध्यान रखते होंगे। यही कारण है कि उन्होंने भीष्म पितामह की तरह अपनी इच्छा के बिना न हारने और न जीतने का वरदान ले लिया है।
आखिरी सवाल यह है कि कहीं तीसरे मैच में हारना कहीं गोरों ने भी तो फिक्स नहीं किया था? दोनों टीमों के खेल से तो ऐसा ही लगता है कि परिणाम का निर्धारण पाकिस्तानी ही कर सकते हैं। इस मामले में उनको चुनौती मिल सकती है तो आस्ट्रेलिया की टीम ही है जिसके कुछ खिलाड़ी हमेशा ही संदेह के दायरे में रहते हैं।
वैसे प्रचार माध्यमों में किसी प्रतियोगिता या मैच के बाद ही फिक्सिंग की चर्चा होती है। तब लगता है कि हमने वक्त बरबाद किया। वैसे यह मानकर चला जाये कि सारे मैच फिक्स होते हैं तो फिर उनको निष्काम भाव से देखा जा सकता है क्योंकि तब जीत की खुशी के भ्रम या हार के तनाव से आदमी मुक्त होता है। रहा ब्लागों के पिटने का सवाल तो क्लब स्तरीय प्रतियोगताओं के समय यह होना ही था। अलबत्ता हमें इन प्रतियोगताओं का ध्यान तब आता है जब ब्लाग पिटने लगते हैं और उसका देखते हुए चिंता लगती है। अब तो यह मान लिया है कि फिक्सिंग का मौसम हमारे ब्लाग के लिये विश्राम का मौसम होता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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8/1/08

अध्यात्म और धर्म अलग अलग विषय हैं-आलेख (3)

धर्म क्या है? शायद कई लोग नहीं बता पायेंगे? अनेक युद्ध धर्म के नाम पर हुए पर किस धर्म के लिये। महाभारत युद्ध किस धर्म की रक्षा के लिये लड़ा गया था? इस पर अनेक व्याख्यायें मिल जायेंगी। वर्तमान में लोग अनेम धर्मों के नाम बताने लगेंगे-जो कि केवल भ्रम है। धर्म वह है जो मनुष्य द्वारा धारण किया जाता है। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि मनुष्य द्वारा अपनी इस देह धारण करने के बाद जो कर्तव्य अपने लिये स्वयं या स्वाभाविक रूप से स्वतः निर्धारित हो जाते हैं वही धर्म है कि न कर्मकांडों का निर्वहन जैसा प्रचारित किया जाता है। एक व्यक्ति के रूप में मनुष्य द्वारा स्वीकार यह स्वतः निर्धारित कर्तव्य या धर्म कई प्रकार का हो सकता है। एक पुरुष के लिये पिता,पुत्र,पति, भ्राता,मित्र तथा अन्य संबंधों के निर्वाह के लिये कर्तव्य का निर्वहन ही धर्म है। एक स्त्री के लिये माता, पुत्री,बहिन, पत्नी तथा अन्य रूप में कर्तव्य निर्वहन करना ही धर्म का स्वरूप कहा जा सकता है।

महाभारत युद्ध की बात करें तो देखा जाये सभी पक्ष कर्तव्य विमुख हो रहे थे। जिसका चर्म रूप था द्रोपदी का चीरहरण। महाभारत काल में परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह न करना ही अधर्म कहा गया है। धर्म की कोई अन्य संज्ञा वहां नहीं दिखाई देती-आशय यह है कि धर्म का कोई एक नाम नहीं है। भगवान श्रीराम ने भी धर्म की रक्षा के लिये ही युद्ध किये पर किसी धर्म विशेष का नाम रामायण मे भीं नहीं आता। रावण का विधर्मी इसलिये कहा जाता है कि वह अपनी शक्ति के अहंकार में इतना मतवाला हो रहा था कि यज्ञ और हवन करने वाले ऋषियों पर हमले कर उनका सहंार करता था। वह स्वयं भी भगवान शिव का उपासक था पर अन्य देवों के उपासकों पर हमले करने की प्रवृत्ति के कारण वह अधर्मी करार दिया गया। यहंा विचाराधाराओं का वैसा ही द्वंद्व दिखाई देता है जैसा आजकल हो रहा है। एक तरह वह स्वयं भगवान शिव की भक्ति कर रावण ने वरदान प्राप्त किया पर उसे अन्य लोगों द्वारा यज्ञ हवन और अन्य तरीके से पूजा करना सहन नहीं था। उसने उन पर हमला किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अन्य देवों की उपासना हो। भगवान श्रीराम ने उसके अनेक राक्षसों को सीताहरण से पहले ही मार गिराया था और वह भी इसलिये क्योंकि वह दूसरों की पूजा विधि विधाने को रोकने का प्रयास कर रहे थे। इसका आशय यह नहीं है कि भगवान श्रीराम को उसके इष्ट भगवान शिव की उपासना से कोई द्वेष था बल्कि वह स्वयं ही भगवान शिव का सम्मान करते थे। तात्पर्य यह है कि धर्म का रूप यह भी कि कोई किसी की भी उपासना करे पर दूसरे के पूजा विधान से द्वेष न करे।

वर्तमान में जो प्रचलित धर्म हैं उनमें भी वह सब बातें हैं जो सदियों से कही जाती हैं पर उनको नाम दिये गये हैं ताकि उसे एक छत बनाकर लोगों की भीड़ वहां एकत्रित कर उनका आर्थिक और राजनीतिक दोहन किया जा सके। आम आदमी के पास इतना समय नहीं होता कि वह बड़े राजनीतिक ग्रंथ पढ़कर उनका अर्थ समझ सके इसलिये सभी धर्मों में कथित बिचोलिये हैं जो इन किताबों से पढ़कर उनके बारे में लोगों को बताते हैं। इनमें भी कर्मकांडों का वह भाग सुनाकर उसका अनुकरण इसलिये कराया जाता है कि ताकि वह एक समूह में रह सके और दूसरे समूह से अलग दिखें। जब कोई बड़ी वारदात होती है तो आपने सफाई सुनी होगी कि सभी धर्म प्रेम, दया, और अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है, आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, आतंकवादी की कोई जाति नहीं होती, उसकी कोई भाषा नहीं होती, आदि आदि। इसे आप उन समूहों के शीर्षस्थ लोगों की चालाकी भी कह सकते हैं जो वारदात के बाद उनको अपने समूहों या समाजों के बारे में अच्छा कहने का अवसर मिल जाता है।

सच तो यह है कि धारण किया जाने वाले धर्म का कोई नाम नहीं होता क्योंकि वह कर्तव्य के रूप में देह के साथ जुड़ा रहता है और जिसका नाम लेते हैं वह केवल एक भ्रम के अन्य कुछ भी नहीं है।

‘आध्यात्म अपने अंतर्मन की यात्रा है’ अनुरक्ति ब्लाग के ललित मोहन त्रिवेदी ने यही पिछले लेख में अपनी टिप्पणी करते हुए लिखा था। यह यात्रा बहुत सरल भी है और कठिन भी। कठिन यह तय करना है कि हम अपने अंतर्मन की यात्रा करें या नहीं और जब करने निकलें तो फिर बाहर के झंझटों से आदमी स्वतः परे हो जाता है। वह अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होता पर उनका तनाव अपने ऊपर नहीं आने देता। समय के अुनसार अपना धर्म निभाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने वाले का मन अपने निंयत्रण में रहता है इसलिये उसको कोई भटका नहीं सकता पर जिनको नहीं हैं वह अपने समाजों और समूहों के शीर्षस्थ लोगों को आव्हान पर चाहे जो करने को तैयार हो जाते हैंं। किसी भी धर्म में अध्यात्म ज्ञान का प्रावधान नहीं है। प्रेम, अहिंसा, और दया के उपदेश तो सभी में दिया गया है पर साथ ही अपनी सांसरिक परेशानियों में सर्वशक्तिमान को याद करने की सलाह भी दी जाती है। काम सिद्ध हो जाये तो उसका धन्यवाद नहीं हो तो कह देते हैं उसकी मर्जी पर किसका बस चलता हैं यह मनुष्य को मानसिक रूप से पंगु करने का प्रयास है जिसमें सभी धर्मों के प्रचारक सफल रहते हैं और इस संसार में धार्मिक कहलाकर अपनी पूजा कराते हैं। इसलिये भारतीय अध्यात्म विश्व में सभी जगह स्वीकार किया जा रहा है क्योंकि वह जीवन और सृष्टि के रहस्यों के ज्ञान से भरा पड़ा है-याद रखें भारतीय अध्यात्म में भी किसी भी धर्म का नाम नहीं दिया गया है न ही कर्मकांडों को ही सर्वोपरि बताया गया है। उनका सारांश यही है कि जीवन को सहज भाव से जीते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करो यही धर्म है और इसका ज्ञान ही अध्यात्म है। शेष फिर कभी
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

7/16/08

अध्यात्म और धर्म अलग अलग विषय हैं-आलेख (2)

अध्यात्मिक ज्ञान जिस व्यक्ति को होता है उसका मानसिक तथा बौद्धिक शोषण कतई नहीं किया जा सकता है। अध्यात्म ज्ञान कोई अधिक व्यापक नहीं है पर उसका अर्थ समझकर उसे धारण करना बहुत कठिन है। वैसे एक बात स्पष्ट है कि समस्त धार्मिक विचाराधाराऐं अध्यात्मिक ज्ञान के आधार को ही मजबूत करने का दावा करती हैं पर वह उसमें अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषय इस तरह जोड़ दिये गये हैं कि सामान्य मनुष्य भ्रमित हो जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान जो कि सत्य का साक्षी है उसकी चर्चा तो पूरे विश्व में होती है पर उसका अध्ययन, चिंतन और मनन कितने लोग करते हैं और उसमें भी कितने उसे धारण कर पाते हैं? यह अलग चर्चा का विषय है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार करने वाले कथित संतों ने अनेक प्रकार की चमत्करिक कहानियां तथा सांसरिक विषय उसमें इस तरह जोड़े हैं कि उसका मूल स्वरूप ही किसी की समझ में नहीं आता।

भारत में अध्यात्मिक ज्ञान का दावा रखने वाले तो बहुत मिल जायेंगे पर उसके सूक्ष्म रूप का किसी को पता नहीं है। अपने व्यवसाय, नौकरी तथा खेती से निराश होने पर अक्सर लोग कहते हैं कि ‘हमारा काम हैं कर्म करना और फल देना तो परमात्मा का का है।’ सुनने में यह कितना अच्छा लगता है। कहने वाले तो यही कहेंगे कि यह श्रीगीता में ऐसा ही कहा गया है।
श्रीगीता में केवल कर्म की बात नहीं कही गयी बल्कि निष्काम कर्म की बात कही गयी है। जब कोई कहता है कि ‘हमने अपना काम किया और फल देना तो परमात्मा का काम है’ तो यह उसके निष्काम होने का प्रमाण नहीं है क्योंकि अपने कर्म के साथ कहीं न कहीं उसके फल पाने की इच्छा प्रकट होती है।’

पहले तो कर्म का फल का स्वरूप ही समझ में आना चाहिये तभी तो आदमी निष्काम भाव से कार्य कर सकता है। दरअसल निष्काम भाव से कर्म करना ही जीवन से विषादों से मुक्ति दिलाने का उपाय है और लोग निष्काम भाव से काम न करें इसलिये उनको उसका उपदेश दिया जाता है पर प्रेरित तो उस सांसरिक फल के लिये ही किया जाता है जो उनके जीवन और विचारों को सीमित दायरों में बांध देता है। वह सांसरिक पदार्थों की फल समझते हैं जिनका उपयोग भी वह यही करते हैं। अगर कोई मनुष्य नौकरी कर रहा है तो उसका वेतन, व्यवसायी है तो उसका लाभ और मजदूर है तो उसकी मजदूरी क्या फल है? नहीं अगर यह फल है तो फिर वह इसका उपयोग वह अकेला कहां करता है? मनुष्य द्वारा भौतिक मुद्रा अर्जित करना फल नहीं है क्योंकि वह उसे भी तो अपने तथा परिवार के ऊपर ही व्यय करता है। कोई अपने बच्चे की फीस भर रहा है तो कोई अपनी पत्नी का इलाज करा रहा है तो कोई मकान बनवा रहा है। कोई अपने पिता को दे रहा है तो कोई माता को दे रहा है। कभी भाई की मदद कर रहा है। भला इस धनोपब्धि को फल कैसे कहा जाता है। जब वह अपने हाथ से कहीं से धन लेता है तो वह फल नहीं बल्कि अपने कर्तव्यों और दायित्वों के निर्वाह के लिये लेता है। यह धन लेना उसका कर्तव्य है न कि फल! धन प्राप्त करना आपका कर्म है और व्यय करना भी-उसे फल कैसे कहा जा सकता है।

दूसरी बात तो छोडिये जो दुनियां भर का ज्ञान बघार रहे हैं वह भी इसमें से अपने लिये दान मांगते हैं और बताते हैं कि यह आपकी धार्मिक जिम्मेदारी है। सीधा आशय यह है कि आपने जो धन कमाया वह तो आपके कर्म का दायित्व बढ़ाता है और आप उसे कहीं अन्य व्यय कर अपना कर्तव्य निबाहते हैं। जब तक देह है उसे बनाये रखने के लिये व्यय करते हैं पर यह तो हमारा कर्म है। यह फल कहां से कहा जा सकता है?

सवाल यह है कि फिर फल क्या है? फल है हम अपने जीवन में शांति से रह पायें और जब देह त्याग करने का समय आये तो शांति और संतोष के साथ मोक्ष प्राप्त करें। यही असली फल है जिसकी तरफ ले जाने की ताकत केवल भारतीय अध्यात्म के ज्ञान में ही हैं। पहले उस सांसरिक फल का स्वरूप भी समझ लें। अगर हमने किसी से माह भर कार्य करने, अथवा वस्तु बेचने या मजदूरी करने पर किसी से धन मांगा तो क्या वह फल मांगना है। नहीं! यह तो उसे अपने सांसरिक कर्तव्य का निर्वाह करने के लिये प्रेरित करने का प्रयास है जिससे हम अपने आगे के कर्तव्य का निर्वाह कर सकें। मतलब यह कि अगर कोई अध्यात्म का ज्ञान रखता है तो वह अपने कर्तव्य निर्वाह के लिये धन प्राप्त करना फल नहीं बल्कि कर्तव्य ही हैै। यह अलग बात है कि जिन लोगों को पैसा देना नहीं होता वह कह देते हैं-‘क्या, तुम ज्ञानी होकर पैसा मांगते हो।’ याद रखना अध्यात्म का ज्ञान होने का आशय यह कदापि नहीं कि आदमी सांसरिक विषयों को त्याग कर भागने की तैयारी कर ले। एक सामान्य व्यक्ति और अध्यात्मिक ज्ञानी व्यक्ति के बस दृष्टिकोण में अंतर होता है। सामान्य व्यक्ति अपनी धनोपब्धि पर ही प्रसन्न होकर रह जाता है तो उसके जाने पर उसे भारी कष्ट होता है। इसके विपरीत अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला धन मिलने पर उसे फल मानते हुए उसमें लिप्त नहीं होता। सामान्य व्यक्ति एक के बाद दूसरी और दूसरी उपलब्धि के पीछे भागता है और अपने पूरे जीवन में शांति से नहीं बैठ पाता और न मनुष्य देह का सुख उठा पाता है जबकि ज्ञानी अपने लिये शांति से जीने के पल जुटा लेता है और फिर दृष्टा की तरह इस संसार में मानव देह होने का वह आनंद भी उठाता है।

अगर आप देखें तो सारे धर्म तमाम तरह के कर्मकांड प्रतिपादित करते हैं जिनका निर्वाह उसी धनोपलब्धि से किया जा सकता है जो हमने प्राप्त की है। सभी धर्मों के गुरू उसी धन पर अपनी नजरें गड़ाये हुए स्वर्ग में टिकिट रिजर्वेशन करने की गारंटी अपने भक्तो को देते हैं। उनका संदेश तो यही होता है कि ‘ला! माल ला! और ले जा स्वर्ग का टिकिट!

सभी आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि ‘देने वाला तो वही है’, ‘उसकी इच्छा के बिना यहां कुछ भी नहीं हो सकता’ और सभी के मन की इच्छा वही पूरी करता है’। ऐसा कहकर वह सांसरिक उपलब्धियोें को ही फल बताते हैं। कुल मिलाकर सभी धर्मों के कर्मकांड पैसा खर्च कर फल दिलाने के सिद्धांत पर आधारित हैं। जबकि भारतीय अध्यात्म बिना किसी सांसरिक फल के योग साधना और प्राणायम कर देह और मन के विकार दूर करने तथा ध्यान और प्रार्थना के आधार शांति का वह फल दिलाने वह ज्ञान है जो देह रहते और बाद में भी आदमी को संतोष प्रदान करता है। समस्या है गुरू की। श्रीगीता में भी गुरू का गुणगान है जिसका सबसे अधिक प्रचार वह कथित संत करते हैं जिन्होंने गीता के ज्ञान को समझा नहीं पर स्वयं गुरू बनने की लालसा में वह अपने भक्तों को वह अवश्य बताते हैं। अपने भक्तों का अध्यात्म का ज्ञान वह कभी नहीं देते। हां, अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषयों में उलझा कर अपनी भक्त का हृदय फिर उसी सांसरिक दलदल में फंसा देते हैं जहां वह कमल की तरह खिलने की इच्छा रहकर आता है। यह केवल भारतीय धर्मगुरूओं का ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में यही हाल है। धर्म के नाम शोषण केवल इसलिये हो रहा है क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान को सभी दबाये रखना चाहते है ताकि उसके मूल स्वरूप से लोग अवगत न हों।
श्रीगीता में अध्यात्म का जो ज्ञान है वह अनुपम है पर उसे कथित साधु संत अपने हिसाब से व्याख्या इस तरह करते हैं कि वह स्वयं ही अपने भक्तों में भगवान के रूप में स्थापित रहें। अब यह उनकी चालाकी भी हो सकती है या ऐसा भी कि वह स्वयं ही उस ज्ञान को धारण नहीं कर पाते और अपनी यही कमी छिपाने के लिये तमाम तरह के चुटकुले, कहानियां तथा सांसरिक विषयों की प्रधानता पर ही अधिक प्रवचन करते हैं। शेष अगले अंक में

6/8/08

जीन चलते हैं पर गुण तो गुण में ही बरतते हैं-आलेख (1)

पश्चिमी विज्ञान मानव शरीर में स्थित जीन के आधार पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत करता है जबकि यही विश्लेषण भारतीय दर्शन ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं‘ के आधार पर करता है। पश्चिमी विश्लेषण मनुष्य के स्वभाव में उन जीनों के प्रभाव का वर्णन करते हैं जबकि भारतीय दर्शन उनको गुणों का परिणाम कहकर प्रतिपादित करता है।
मनुष्य की पहचान उसका मन है और देह में स्थित होने के कारण उसमें विद्यमान गुण या जीन से प्रभावित होता है इसमें संशय नहीं हैं। जब शरीर में कोई भीषण विकार या पीड़ा उत्पन्न होती है तब मन कहीं नहीं भाग पाता। उस समय केवल उससे मुक्ति की अपेक्षा के अलावा वह कोई विचार नहीं। करता। मन में विचार आते हैं कि ‘अमुक पीड़ा दूर हो जाये तो फिर मैं एसा कुछ नहीं करूंगा जिससे यह रोग फिर मुझे घेरे।’
कभी अपने आप तो कभी दवा से वह ठीक हो जाता है पर फिर उसका मन सब भूल जाता है। व्यसन करने वाले लोग इस बात को बहुत अच्छी तरह जानते हैं। जब अपने व्यसन की वजह से भारी तकलीफ में होते हैं तब सोचते हैं कि अब इसका प्रभाव कम हो तो फिर नहीं करेंगे।’

ऐसा होता नहीं है। व्यसन कर प्रभाव कम हाते े ही वह फिर उसी राह पर चलते हैं। अपने ज्ञान के आधार पर मै यह कह सकता हूं कि‘शुरूआत में व्यसन आदमी किसी संगत के प्रभाव में आकर करता है फिर वही चीज-शराब और तंबाकू-मनुष्य के शरीर में अपना गुण या जीन स्थापित कर लेती है और आदमी उसका आदी हो जाता है। याद रहे वह गुण व्यसन करने से पहले उस आदमी में नहीं होता।



पश्चिमी विज्ञान कहता है कि आदमी में प्रेम, घृणा, आत्महत्या, चिढ़चिढ़ेपन तथा अन्य क्रियाओं के जीन होते हैं पर वह यह नहीं बताता कि वह जीन बनते कैंसे हैं? भारतीय दर्शन उसको स्पष्ट करता है कि मनुष्य में सारे गुण खाने-पीने के साथ ही दूसरों की संगत से भी आते हैं। मेरा मानना है कि मनुष्य सांसें लेता और छोड़ता है और उससे उसके पास बैठा आदमी प्रभावित होता है। हां, याद आता है कि पश्चिम के विज्ञानी भी कहते हैं कि सिगरेट पीने वाले अपने से अधिक दूसरे का धुंआ छोड़कर हानि पहुंचाते हैं। इसका अर्थ यह है कि विकार वायु के द्वारा भी आदमी में आते हैं। अगर आप किसी शराबी के पास बैठेंगे और चाहे कितनी भी सात्विक प्रवृत्ति के हों और उसकी बातें लगातार सुन रहे हैं तो उसकी कही बेकार की बातें कहीं न कहीं आपके मन पर आती ही है जो आपका मन वितृष्णा से भर देती है। इसके विपरीत अगर आप किसी संत के प्रवचन-भले ही वह रटकर देता हो-सुनते हैं तो आपके मन में एक अजीब शांति हो जाती है। अगर आप नियमित रूप से किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें जिसे आप ठीक नहीं समझते तो ऐसा लगेगा कि वह आपके तनाव का कारण बन रहा है। कहने का तात्पर्य यह है कि पांच तत्वों-प्रथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु- से बनी यह देह इनके साथ सतत संपर्क में रहती है और उनके परिवर्तनों से प्रभावित होती है और इसके साथ ही उसमें मौजूद मन, बुद्धि और अहंकार की प्रकृति भी प्रभावित होती है। इन परिवर्तनों से मनुष्य की देह में जीन या गुणों का निर्माण और विसर्जन होता है और वह उसका प्रदर्शन वह बाहर व्यवहार से कराते हैं।
पश्चिम के विद्वान इन जीन को लेकर विश्लेषण करते हुए उनके उपचार के लिए अनुसंधान करते हैं। अनेक तरह के आकर्षक तर्क और सुसज्तित प्रयोगशालाओं से निकले निष्कर्ष पूरे विश्व में चर्चा का विषय बनते हैं और भारतीय अध्यात्म को पूरी तरह नकार चुके हमारे देश के विद्वान अखबार, टीवी चैनलो, रेडियो और किताबों उनका प्रचार कर यहां ख्याति अर्जित करते हैं। हां, लोग सवाल करेंगे कि भारतीय अध्यात्म में भला इसका इलाज क्या है?

हमारा अध्यात्म कहता है लोग तीन तरह के होते हैं सात्विक, राजस और तामस। यहां उनके बारे में विस्तार से चर्चा करना ठीक नहीं लगता पर जैसा आदमी होगा वैसा ही उसका भोजन और कर्म होगा। वैसे ही उसके अंदर गुणों का निर्माण होगा।

श्रीगीता के सातवों अध्याय के (श्लोक आठ) अनुसार आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा जो स्वभाव से ही मन को प्रिय हो ऐसा भोजन सात्विक को प्रिय होते हैं।

नौवें श्लोक के अनुसार कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक, दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार राजस पुरुष को प्रिय होते हैं।


दसवें श्लोक के अनुसार -अधपका, रसरहित, दुर्गंधयुक्त, बासी और उच्छिष्ट तथा अपवित्र है वह भोजन तामस को प्रिय होता है।



पश्चिम के स्वास्थ्य विज्ञान के अनुसार देह की अधिकतर बीमारियां पेट के कारण ही होती हैं। यही विज्ञान यह भी कहता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। हमारा अध्यात्म और दर्शन भी यही कहता है कि गुण ही गुण को बरतते है। इसके बावजूद पश्चिमी विज्ञान और भारतीय अध्यात्म में मौलिक अंतर है। पश्चिमी विज्ञान शरीर और मन को प्रथक मानकर अलग अलग विश्लेषण करता है। वह मनुष्य की समस्त क्रियाओं यथा उठना, बैठना, चलना और कामक्रीडा आदि को अलग अलग कर उसकी व्याख्या करता है। इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म या दर्शन मनुष्य को एक इकाई मानता है और उसके अंदर मौजूद गुणों के प्रभाव का अध्ययन करता है। अगर योग की भाषा के कहें तो सारा खेल ‘मस्तिष्क में स्थित ‘आज्ञा चक्र’ का है। पश्चिमी विज्ञान भी यह तो मानता है कि मानसिक तनाव की वजह से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं और वह उनका इलाज भी ढूंढता है पर जिन मानसिक विकारों से वह उत्पन्न होते हैं और मनुष्य की देह में अस्तित्वहीन रहें ऐसा इलाज उसके पास नहीं है।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान केवल धर्म प्रवचन के लिऐ नहीं है वह जीवन की वास्तविकताओं पर आधारित है। यह मनुष्य के देह और मन में स्थित विकारों को दूर करने के लिए केवल शब्दिक संदेश नहीं देता बल्कि योगासन, प्राणायम और ध्यान के द्वारा उनको दूर करने का उपाय भी बताता है। अध्यात्म यानि हमारी देह में प्राणवान जीव आत्मा और उससे जानने की क्रिया है ज्ञान। अन्य विचाराधारायें आदमी को प्रेम, परोपकार और दया करने के का संदेश देती हैं पर वह देह में आये कैसे यह केवल भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान ही बताता हैं। अगर सुबह उठकर योगासन, प्राणायम, और ध्यान किया जाये तो देह में वह जीन या गुण स्वयं ही आते है जिनसे आदमी प्रेम, परोपकार और दया करने लगता है। देह और मन के विकार को निकाले बिना आदमी को सही राह पर चलने का उपदेश ऐसा ही है जैसे पंचर ट्यूब में हवा भरना।
अगर कोई आदमी बीमार होता है तो डाक्टर कहते हैं कि चिकनाई रहित हल्का भोजन करो जबकि भारतीय दर्शन कहता है कि चिकना, रसयुक्त स्थिर भोजन ही सात्विक है। इसका अर्थ यह है कि डाक्टर जिनको यह भोजन मना कर रहा है उनमें विकार ही इस सात्विक भोजन के कारण है। ऐसा भोजन करने के लिये परिश्रम करना जरूरी है पर आजकल धनी लोग इसे करते नहीं है। श्रीगीता कहती है कि अकुशल श्रम से सात्विक लोग परहेज नहीं करते। आजकल के लोग अकुशल श्रम करने में संकोच करते हैं और यही कारण है कि लोगों में आत्म्विश्वास की कमी होती जा रही है और ऐसे जीन या दुर्गुण उसमें स्वतः आ जाते हैं जो उसे झूठे प्रेम,पुत्यकार की भावना से उपकार और कपटपूर्ण दया में लिप्त कर देते हैं। कुल मिलाकर पश्चिमी विज्ञान की खोज जीन चलते हैं जबकि भारतीय दशैन की खोज ‘गुण ही गुण बरतते हैं। वैसे देखा जाये तो देश में जितनी अधिक पुस्तकें पश्चिमी ज्ञान से संबंधित है भारत के पुरातन ज्ञान उसके अनुपात में कम है पर वह वास्तविकता पर आधारित हैं। संत कबीर दास जी के अनुसार अधिक पुस्तकें पढ़ने से आदमी भ्रमित हो जाता है और शायद यही कारण है कि लोग भ्रमित होकर ही अपना जीवन गुजार रहे हैं। इस विषय पर इसी ब्लाग पर मै फिर कभी लिखूंगा क्योंकि यह आलेख लिखते समय दो बार लाईट जा चुकी है और मेरा क्रम बीच में टूटा हुआ था इसलिये हो सकता है कि विषयांतर हुआ हो पर उस दौरान भी मैं इसी विषय पर सोचता रहा था। बहुत सारे विचार है जो आगे लिखूंगा।

5/10/08

अध्यात्म का ज्ञान और सांसरिक उत्पाद मिलने का एक ही स्थान

भारत में अधिकतर लोगों का अध्यात्म के प्रति झुकाव स्वाभाविक कारणों से होता है। मात पिता और अन्य बुजुर्गों की प्रेरणा से अपने देवताओं की तस्वीरों के प्रति उनका आकर्षण इतना रहता है कि बचपने में ही उनके अध्ययने की किताबों और कापियों पर उनकी झाकियां देखी जा सकतीं हैं। मुझे याद है कि बचपन में जब कापियां खरीदने जाता तो भगवान की तस्वीरों की ही खरीदता था। एक बार अपनी मां से पैसे लेकर एक मोटी कापी लेने बाजार गया वहां पर भगवान की तस्वीर वाली कापी तो नहीं मिली हां एक कापी पर ‘ज्ञान संचय’ छपा था वह खरीद ली। वह घर लाया तो ‘ज्ञान’ शब्द ने दिमाग पर ऐसा प्रभाव डाला कि उस कुछ ऐसे ही लिखना शुरू कर दिया। फिर एक छोटी कहानी लिखने का प्रयास किया। तब मैंने सोचा कि इस पर तो मैं कुछ और लिखूंगा और विद्यालय का काम उस पर न करने का विचार किया। इसलिये फिर अपनी मां से दूसरी कापी लेने बाजार गया और अपने मनोमुताबिक भगवान जी की तस्वीर वाली किताब ले आया। वह ज्ञान संचय वाली किताब मुझे लेखक बनाने के काम में आयी।

आशय यह है कि पहले बाजार लोगों की भावनाओं को भुनाता था और ऐसी देवी देवताओं की तस्वीर वाली किताबें और कापियां छापता था जिससे लोग खरीदें। बाजार आज भी यही करता है और मैं उस पर कोई आक्षेप भी नहीं करता क्योंकि उसका यही काम है पर उसके सामने अब दूसरा संकट है कि आज के अनेक अध्यात्मिक संतों ने अपना ठेका समझकर अनेक वस्तुओं का उत्पादन और वितरण अपने हाथ के लिया है जिनका अध्यात्म से कोई संबंध नहीं और इस तरह उसने बाजार में बिकने वाली वस्तुओं की बिक्री में से बहुत बड़ा भाग छीन लिया है। दवायंे, कैलेंडर, पेन, चाबी के छल्ले, डायरी और कापियां भी ऐसे आध्यात्मिक संस्थान बेचने लगे हैं जिन्हें केवल प्रचार का काम करना चाहिए।

उस दिन एक कापी और किताब बेचने वाले मेरे मित्र से मेरी मुलाकात हुई। मैं स्कूटर पर उसकी दुकान पर गया और कोई सामान उसे देने के लिये ले गया। उससे जब मैंने धंधे के बारे में पूछा तो उसने बातचीत में बताया कि अब अगर अध्यात्म लोग पेन, डायरियां और कापियां बेचेंगे तो हमसे कौन लेगा? अब तो संतों के शिष्य अधिक हो गये हैं और वह कापियां और पेन बेचते हैं। अगर कहो तो उनके भक्त घर पर भी दे जाते हैं।

मै सोच में पड़ गया क्योंकि मात्र पंद्रह मिनट पहले ही मुझे मेरे एक साथी ने एक रजिस्टर दिया था और और वह अध्यात्मिक संस्थान द्वारा प्रकाशित था। उस पर अध्यात्मक संत का चित्र भी था। मैनें उससे कई बार ऐसा रजिस्टर लिया है। वह और उस जैसे कई लोग आध्यात्मिक संस्थाओं को उत्पादों को सेवा भाव से ऐसी वस्तुऐं उपलब्ध कराते हैं। देखा जाये तो वह अध्यात्मिक कंपनियों के लिये भक्त लोग मुफ्त में हाकर की भूमिका अपने भक्ति भाव के कारण निभाते हैं। कई जगह इन अध्यात्मिक संस्थानों की बसें अपने उत्पाद बेचने के लिये आतीं हैं। कई संस्थान अपनी मासिक पत्रिकायें निकालते हें लोग पढ़ें या नहीं पर भक्ति भाव के कारण खरीदते हैं। इस तरह जहां घरों में पहले साहित्यक या सामाजिक पत्र पत्रिकाओं की जगह थी वहां इन धार्मिक पत्रिकाओं ने ले ली है। शायद कुछ हंसें पर यह वास्तविकता है कि पहले और अब का यह फर्क मेरा बहुत निकट से कई घरों में देखा हुआ है।

अधिक विस्तार से समझाने की आवश्यकता नहीं है कि दवाओं से लेकर चाबी के छल्ले बेचने वाले अध्यात्मिक संस्थानों की वजह से भी हमारे देश के छोटे कामगारों और व्यवसायियों की रोजी रोटी प्रभावित हुई है। हम अक्सर विदेशी और देशी कंपनियों पर लघु उद्योगों को चैपट करने का आरोप लगाते हैं पर देखा जाय तो उत्पादन से लेकर वितरण तक अपने भक्तों की सहायता से काम करने वाले इन अध्यात्मिक संस्थाओं ने भी कोई कम क्षति पहुंचाई होगी ऐसा लगता नहीं है। हमारा यह विचार कि हिंदी के पाठक कम हैं इसलिये पत्र-पत्रिकायें कम पढ़ी जा रही हैं। वस्तुतः उनकी जगह इन पत्रिकाओं ने समाप्त कर दी है। बढ़ती जनसंख्या के साथ जो पाठक बढ़े उन पर इन आध्यात्मिक पत्रिकाओं ने उन पर नियंत्रण कर लिया। इनके प्रचार प्रसार की संख्या का किसी को अनुमान नहीं है पर मैं आंकड़ों के खेल से इसलिये परे रहता हूं क्योंकि जो सामने देख रहा हूं उसके लिये प्रमाण की क्या जरूरत हैं। अधिकतर घरों में मैंने ऐसी आध्यात्मिक पत्रिकायें और अन्य उत्पाद देखे हैं और लगता है कि अगर यह अध्यात्मिक संस्थान उन वस्तुओं के उत्पाद और वितरण से परे रहते तो शायद रोजगार के अवसर समाज में और बढ़ते।

अपने अध्यात्मिक विषयों में मेरी रुचि किसी से छिपी नहीं है मै अंधविश्वास और अंध भक्ति में यकीन नहींे करता और मेरा स्पष्ट मत है कि अध्यात्म के विषयों का अन्य विषयों के कोई संबंध नहीं है। अगर आप ज्ञान और सत्संग का प्रचार कर रहे हैं तो किसी अन्य विषय से संबंध रखकर अपनी विश्वसीनयता गंवा देते हैं। यही वजह है कि आजकल लोग संतों पर भी जमकर आक्षेप कर रहे हैं। मै संतों पर आक्षेप के खिलाफ हूं पर जिस तरह अध्यात्मिक संस्थान अन्य सांसरिक उत्पादों के निर्माण और वितरण का कार्य छोटे लोगों को रोजगार के अवसरों को नष्ट कर रहे हैं उसके चलते किसी को ऐसे आक्षेपों से रोकना भी मुश्किल है। अगर लोगों के किसी कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तो उस पर आक्षेप करना उनका अधिकार है।

बाजार अगर लोगों की भावनाओं को भुनाता है तो उससे बचने के लिये लोगों को अध्यात्म का ज्ञान कराकर बचाया जा सकता है पर अगर अध्यात्मिक संस्थान ही इसकी आड़ में अपना बाजार चलाने लगें तो फिर उनको अध्यात्म ज्ञान देना भी कठिन क्योंकि उनके चिंतन और अध्ययन की बौद्धिक क्षमता का हरण उनके कथित गुरू अपने उपदेशों से पहले कर चुके हैं।
adhyatm, alekh, bharat, chintan, megazine, अभिव्यक्ति, अर्थशास्त्र, संस्कार, हिंदी संपादकीय

2/27/08

आदमी की पहचान का प्रश्न-हिन्दी आलेख

प्रत्येक आदमी की जो पहचान है वह उसकी जाति, धर्मा, भाषा, क्षेत्र से है और हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते। यह पहचान आखिर छिपाई कैसे जा सकती है? कहीं किसी विशेष पहचान के लोगों की बहुतायत है तो वहाँ अल्पसंख्या वाले अपने को कमजोर अनुभव करते हैं और कभी उनको इसके लिए जलील भी होना पड़ता है। इस पर तमाम तरह के बुद्धिजीवी लोग अपने ख्याल रखते हैं-'ऐसा नहीं होना चाहिए' 'यह ग़लत है' और 'इस अन्याय को रोकना चाहिए'। इसके साथ ही बड़ी-बड़ी बहस होती हैं। मगरा नतीजा धाक के तीन पात। ऐसे विवाद कोई किसी एक देश में होते हैं यह बात नहीं बल्कि ऐसे संघर्षों से पूरी दुनिया का इतिहास भरा पडा है।


बहस करना विचार व्यक्त करना अलग बात है और समस्या के हल के लिए ईमानदारी से काम करना अलग बात है। हम हर पहचान के आदमी को सम्मान देने की बात तो करते हैं पर क्या वह पहचान किसी वास्तविक धरातल पर दिखाईं देती हैं? कभी इस पर विचार नहीं करते। आख़िर हम अपनी दूसरों की पहचान को देखते ही क्यों हैं? कोई अमुक, धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र का आदमी है-इस बात पर नज़र डालते ही क्यों हैं? हम तय कैसे करते हैं और कोई हमारे बारे में कैसे तय करता है? हम परंपरा से अलग होकर यह क्यों नहीं कहते कि यहाँ किसी को उसकी वर्त्तमान रूप में प्रचलित पहचान से नहीं देखा जाना चाहिए। जब तक अपनी और दूसरों की वर्तमान प्रचलित पहचान के साथ चलेंगे तब तक समाज में विवाद और फ़साद कम नहीं होंगे। विश्व के किसी इलाक़े में बहुसंख्यक पहचान वाले अपने समूहों से कम त्रस्त नहीं होते पर उनका गुस्सा जब सामूहिक रूपसे उतरता है को उसका सबसे अधिक शिकार पृथक पहचान वाले अल्प संख्या वाले लोगों के समूह बनते हैं-पर इसमें आम आदमी नहीं बल्कि उन लोगों के समूह प्रमुख जिम्मेदार होते हैं क्योंकि जब अपने सदस्यों पर नियंत्रण नहीं रख पाते तब वह उनका ध्यान बंटाने के लिए ऐसे विवाद खड़े करते हैं ताकि अपने नेतृत्व की कमी छिपाने के लिए लोगों का ध्यान कहीं ओर लगाया जाये।हम कहते हैं कि लोगों को उसकी प्रचलित पहचान से मत देखो तो सवाल है की जब हम सबके मन में है यानि हमारे खून में है तो उससे अलग कैसे हुआ जा सहकता है।

पहले हम पाश्चात्य विज्ञान की बात कर लें। उसके अनुसार हम जो देखते, सुनते अनुभव करते हैं वह हमारे रक्त मे स्थापित हो जाता है और जब अवसर आता है तब वह स्वत सामने आता है। किसी का चेहरा और शब्द वैसे के वैसे ही नहीं हम आत्मसात करते वरन वह हमारे शरीर में मौजूद रक्त के कणों में वह सब विलीन हो जाता है। इसका आशय यह है यह जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की पहचान हमारे खून में होती है। उसका कोई भौतिक स्वरूप हमारी देह में नहीं होता. जब कान से शब्द सुनते, आँखों से दृश्य देखते और स्पर्श से अनुभव करते हुए वह पहचान हमारी बुद्धि में आती है।

उसी तरह हमारा दर्शन भी कहता है की हमारी इंद्रियाँ रूप, शब्द, स्पर्श, गंध और रस से ग्रहण करती हैं और वही देह में विकार भी पैदा करतीं हैं। हम अनेक बार तमाम तरह की पहचान के लोगों पर अन्याय के मसले पर मुखर होते हुए उनकी संज्ञा अपने आधार पर तय कर देते हैं। क्या वह एक वास्तविकता है? नहीं! यह एक भ्रम है। कम से कम हमारा दर्शन तो यही कहता है। मनुष्य देह में वह विकार हैं जो उसे अन्याय और दूसरे पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित करते हैं। हमने कभी किसी के साथ अन्याय नहीं किया किसी और ने किया पर हम कभी नहीं करेंगे इसकी गारंटी कौन दे सकता है। गुण ही गुणों को बरतते हैं और जब हमारा अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण ही नहीं है तो हम कैसे कह सकते हैं की 'उसने किया है और हमने किसी पर अन्याय नहीं किया"। कभी हम भी अपने अहंकार में आकर वह सब कर सकते हैं जो किसी और ने किया होता है।

हम बचपन से लेकर बड़े होते हैं-तब अपने माता-पिता और गुरुओं से ही समाज को विभाजित करने वाले शब्द सीखते हैं। कई तरीके की अच्छी और बुरी विचारधाराएँ उनके कथनों को सुनते हुए हमारी स्मृतियों में बस जातीं ऑरा हमा उनसे कभी अलग नहीं हो पाते और उनसे अलग होने के लिए हमें नया अध्ययन करने की आवश्यकता होती है पर उसका ना तो अवसर मिलता है और न आवश्यकता-इच्छा अनुभव होती है। समय अनुसार उस पर चलते जाते हैं। सिद्धांतों की बात बहुत करते हैं पर उससे अलग नहीं हो सकते इसलिए ऐसी बहसों में उलझ जाते हैं जो बाद में निरर्थक साबित होतीं हैं ।

कुल मिलाकर हमारे मन में समाज, व्यक्ति, भाषा, जाति, और भाषा को लेकर हमारे अंदर पूर्वाग्रह इस तरह स्थापित हो जाते हैं कि हम उनको अपनी पहचान समझने लगते हैं। जब तक इनसे मुक्त होने का मन नहीं बनाएँगे तब तक विभिन्न समाजों में द्वंद्व और विवाद बने रहेंगे यह अलग बात है कि कभी हम स्वयं इसका हिस्सा होंगे तो कभी बाहर बैठकर चर्चा करेंगे। (शेष फिर कभी)

10/19/07

शब्द का नकाब

अपने चरित्र पर लगे काले दागों से
जो लोग घबडाते हैं
वही अपना सच छुपाने के लिए
शब्दों का नकाब लगाते हैं
यूं तो शब्द सौन्दर्य की रचना
उनके लिए खेल होता है
पर उनके अर्थों में ढूंढो तो
खोखले भाव सहजता से
सामने आते हैं
शब्दों के नकाब में उनके सच को
पकड़ने के लिए दिल की नहीं
होती है दिमाग की जरूरत
क्योंकि उनके शब्द भावना से नहीं
निज स्वार्थ के लिए रचे जाते हैं

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