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1/25/13

गणतंत्र (जनतंत्र) दिवस का विश्वरूपम-हिन्दी लेख (gantantra(jantantra diwas ka vishvarrpam-hindi lekh)

         गणतंत्र दिवस पर लिखा गया एक लेख इंटरनेट पर जबरदस्त हिट ले रहा है।  25 जनवरी 2012  को लिखे गये इस लेख का लिंक ही दे रहे है।  उस लेख की बातें दोहराने का कोई अर्थ यहां नहीं है।  उस लेख पर एक पाठक ने लिख दिया कि यह बोरिंग लेख है।  उसने सच कहा।  जब कोई लेख मस्तिष्क की गहराईयों में डूबकर लिखा जाता है तो उसे पढ़ना भी उसी तरह पड़ता है।  तय बात है कि लेखक और पाठक को गहराईयों में जाकर ही कुछ मिल सकता है। इंटरनेट पर चिंत्तन के रूप में लिखे गये लेखों में इसी तरह कह टिप्पणियां झेलने को तैयार भी रहना चाहिए। अगर कोई हमारा लेख झेल रहा है तो हमें भी टिप्पणियां भी झेलनी ही पड़ती हैं।  एक लेखक के रूप में हमारा स्वयं का मानना है कि उस लेख में कोई असाधारण बात नहीं थी।  अब आ गया  25 जनवरी 2013, लगता है कि इस बार भी हम ऐसा कुछ नहीं लिख सकते जो कि असाधारण हो।
         इस गणतंत्र की पूर्व संध्या पर हमारे सामने खड़ी है कमल हासन की फिल्म ‘विश्वरूपम’ जिसे प्रतिबंधों और  विरोध का सामना करना पड़ा है।  अभी तक यह तय करना कठिन है कि यह विरोध सैद्धांतिक है या व्यवसायिक। कमल हासन ने इस विरोध के जवाब में कहा है कि ‘यह तो सांस्कृतिक आतंकवाद’ है। इस सांस्कृतिक आतंकवाद की बात अनेक लोग पहले भी चुके हैं पर कमल हासन जैसे महान फिल्मकार के श्रीमुख से निकला यह शब्द अनेक लोगों को हिलाने वाला है।  जहां तक कमल हासन के व्यक्तित्व का प्रश्न है तो भारत में उनकी छवि अत्यंत धवल है।  महान फिल्मकार पर निर्विववाद व्यक्त्तिव के स्वामी कमाल हासन की ‘विश्वरूपम’ पर प्रतिबंध इस देश के अनेक लोगों को नाखुश कर सकता है।  सवाल यह है कि फिल्म पर प्रतिबंध और विरोध का कोई ऐसा पहलू भी है जिसे कोई नहीं देख रहा है।  कुछ लोगों ने अपना यह संदेह जता दिया है कि इस फिल्म के प्रति कुछ लोगों की व्यवसायिक सहानुभूति है जो इसका विरोध प्रायोजित करा रहे हैं।
       कमल हासन का कहना है कि जब फिल्म को अनुमति देने वाली संस्था की अनुमति मिल गयी तो कुछ लोग उसका विरोध  अपने पूर्ण समुदाय का प्रतिनिधि होने का दावा करते हुए कैसे कर सकते हैं।
      प्रतिप्रश्न भी सामने आया है कि आखिर सार्वजनिक प्रदर्शन से पूर्व  यह फिल्म किसी समुदाय विशेष के चालीस  ठेकेदारों को दिखाई क्यों गयी थी?
     कमल हासन भले आदमी है पर 94 करोड़ से बनी इस फिल्म से कमाने का विचार करने वाले व्यक्ति या समूह की रुचि इस पर विवाद खड़ा कर अधिक धनार्जन के लिये किया गया निश्चय भी हो सकता है।  प्रत्यक्ष रूप से कमलहासन अकेले इस फिल्म के स्वामी हैं पर पर्दे के पीछे उसके अनेक स्वामी भी हो सकते हैं।  ऐसे में एक धर्म विशेष के ठेकेदारों को विरोध के लिये प्रायोजित करने का विचार अगर किसी स्तर पर हुआ हो तो कोई बड़ी बात नहीं है।  दूसरी बात यह भी है कि  कमल हासन का वितरकों से विवाद पहले भी चल रहा है।  कमल हासन अपनी फिल्म पूरी दुनियां को एक साथ दिखाने के लिये इसे उन टीवी चेनलों को भी सौंपना चाहते थे जो आम दर्शकों से सीधे जुड़े हैं।  फिल्म के वितरक अपनी कमाई कम होने की आशंका से इस वैश्विक प्रदर्शन के  विरोधी हैं।  इसका मतलब यह है कि कहीं न कहीं फिल्म व्यवसाय से जुड़ा कोई ऐसा वर्ग भी हो सकता है जो ‘विश्वरूप’ को वैश्विक प्रदर्शन होने से रेाकना चाहता हो।
      कमाल हासन महान फिल्मकार हैं और उनकी आर्थिक हानि न हो इस पर सब सहमत हैं पर फिल्म पर प्रतिबंध या विरोध पर अलग अलग तर्क सामने आये हैं।  बहस चलते चलते गणतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी तक पहुंच गयी है।  कमल हासन स्वयं किसी विवाद में पड़ना या खड़े होना चाहें यह तो नहीं लगता पर उनके संपर्क सूत्रों के बारे में यह दावा नहीं किया जा सकता।  यह फिल्म आज नहीं तो कल प्रदर्शित होगी, यह बात तय है।  आतंकवाद से संबंधित विषय  पर अनेक फिल्में बन चुकी हैं।  धर्मों पर प्रहार करते हुए भी फिल्में बनती हैं। अभी हिन्दी में एक फिल्म बनी थी ‘ओ माई गॉड’। इसमें हिन्दू धर्म का विषय चुना गया था।  कुछ हिन्दू संगठनों ने इस पर आपत्ति की थी पर आमजनों ने इस फिल्म को बड़ी रुचि के साथ देखा।  सच कहें तो यह फिल्म हम जैसे अध्यात्म चिंतकों को अत्यंत पसंद आयी।  हमारा मानना है कि अध्यात्मिक ज्ञान  और धर्म को प्रथक प्रथक बताने वाली यह वैसी फिल्म थी जिस पर अनेक भारतीय चिंत्तक अपनी बात कहते रहे हैं।  एक तरफ हिन्दू धर्म पर प्रहार था तो वहीं श्रीमद्भागवत गीता का महत्व भी बताया गया।  शुद्ध रूप से मनोंरजक फिल्म थी।  उसने समाज में कोई परिवर्तन भले नहीं किया पर उसका विषय अनेक लोगों को पसंद आया।  यही कारण है कि हिन्दू धर्म के समर्थक कमल हासन की फिल्म ‘विश्वरूपम’ का  बचाव  करते हुए यही कह रहे हैं कि हमने भी तो अपने धर्म पर प्रहार करती हुई एक फिल्म झेली है तो दूसरे समुदायों में विरोघ कैसे हो सकता है?  अक्षय कुमार, मिथुन चक्रवर्ती, परेश रावल और गोविंद नामदेव ने इस फिल्म में जो अभिनय किया वह रोमांचित करने वाला है।  ऐसी फिल्मों को रोकना अनुचित है।  हम क्या मानते हैं कि आस्था के नाम पर लोगों को बरसों पुराने अंधविश्वासों में जीने की आदत पड़ी रहे?  क्या हम लोकतंत्र में  लोगों की आस्था बचाने के नाम पर सड़े गले समाज का अस्तित्व बनाये रखना चाहते हैं।  दूसरी बात यह कि धर्म को चौराहै का विषय मानना ही गलत है। जिसे मानना है अपने घर में माने। सड़क पर उसकी आस्था बचाने का काम राज्य को नहीं करना चाहिए।
    हम गणतंत्र के नाम पर धर्मतंत्र की रक्षा करने का लक्ष्य नहीं रखें तो अच्छा है।  हम कमाल हासन के सांस्कृतिक आतंकवाद वाली बात का समर्थन नहीं करते क्योंकि 94 करोड़ से बनी इस फिल्म के प्रचार के लिये इसका विरोध व्यवसायिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिये भी हो सकता है पर चंद लोगों को किसी धर्म का ठेकेदार मानने के हम भी विरोधी हैं।  हालांकि प्रचार माध्यमों से यह  जानकारी मिली  है कि इस फिल्म को पहले ही समुदाय विशेष के ठेकेदारों को दिखाया गया था। ऐसी हालत  फिल्म से जुड़े लोगों को ही इसका जवाब भी देना होगा जो कमल हासन ने किया है।  
    बहरहाल प्रत्यक्ष रूप से गणतंत्र या अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़ा यह कोई बड़ा विषय है हमें नहीं लगता पर बाज़ार और उसके प्रचार समूहों के लिये विज्ञापन प्रसारित करने के लिये बहस के रूप में  प्रसारण सामग्री दिलाने में इसका बहुत बड़ा योगदान रहेगा यह बात तय है।  
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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7/15/12

निर्मल बाबा से कौन डर रहा था-हिन्दी लेख (nirmal baba se kaun dar rahaa thaa-hindi lekh)

            निर्मल बाबा का प्रचार कम हो गया है। उनके समागमों का तूफानी गति से चलने वाला विज्ञापन अब अनेक चैनलों में दिखाई नहीं देता है। उनके बारे में कहा गया कि वह समाज में अंधविश्वास फैला रहे हैं। लोगों को उनकी समस्याओं के निराकरण के लिये आईस्क्रीम, रसगुल्ले और समौसा खाने के इलाज बता कर पैसा वसूल कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि निर्मल बाबा का प्रचार केवल उनके विज्ञापनों के कारण हो रहा था जिसके लिये वह सभी हिन्दी समाचार चैनलों को भारी भुगतान कर रहे थे। मतलब यह कि उनका प्रचार स्वप्रायोजित होने के साथ अतिरेक से परिपूर्ण था। अचानक ही हिन्दी समाचार चैनलों को लगा कि निर्मल बाबा तो अंधविश्वास फैला रहे हैं तो उन्होंने उनके विरुद्ध प्रचार शुरु किया। लंबे समय तक यह चैनल विरोधाभास में सांस लेते रहे। एक तरफ निर्मल बाबा का विज्ञापन चल रहा था तो दूसरी तरफ चैनल वाले अपना समय खर्च कर उस पर बहस कर रहे थे-यह अलग बात है कि उस समय भी निर्मल बाबा के खलनायक साबित करते हुए वह दूसरे विज्ञापन चला कर पैसा वसूल कर रहे थे। निर्मल बाबा को अंधविश्वास का प्रवर्तक बताकर इन चैनलों ने अपने ही प्रायोजित बुद्धिजीवियों से बहस कराकर व्यवसायिक सिद्धांतों के प्रतिकूल जाने का साहस करते हुए उनमें भी अतिरेक से पूर्ण सामग्री प्रस्तुत की।
              बहरहाल निर्मल बाबा का जलवा कम हो गया है और यह सब उन हिन्दी समाचार चैनलों की वजह से ही हुआ है जिन्होंने विज्ञापन लेते समय केवल अपना लाभ देखा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन टीवी चैनलों ने वास्तव में क्या कोई समाज के प्रति भक्ति दिखाते हुए निर्मल बाबा के विरुद्ध दुष्प्रचार कर कोई साहस का काम किया है या फिर निर्मल बाबा के प्रचार से मिलने वाले धन से अधिक कहीं उनकी हानि हो रही थी जिससे वह घबड़ा गये थे। इसी वजह से समाज को जाग्रत करने के लिये कथित रूप से अभियान छेड़ दिया था। 
           निर्मल बाबा पिछले कई महीनों से छाये हुए थे। हमने देखा कि उनकी चर्चा सार्वजनिक स्थानों पर होने लगी थी। स्थिति यह थी कि देश के ज्वलंत राजनीतिक विषयों से अधिक लोग निर्मल बाबा की चर्चा करने लगे थे। महंगाई और मिलावट से परेशान समाज के लिये निर्मल बाबा का समागम एक मन बहलाने वाला साधन बन गया था। देखने वालों की संख्या बहुत थी पर इसका मतलब यह कतई नहीं लिया जाना चाहिए कि सभी उनके शिष्य बन गये थे। फिर हम यह भी देख रहे थे महंगाई, बेरोजगारी, दहेजप्रथा तथा पारिवारिक वातावरण की प्रतिकूलता से परेशान लोगों की संख्या समाज में गुणात्मक रूप से बढ़ी है जिससे लोग राहत पाने के लिये इधर उधर ताक रहे थे। ऐसे में हर चैनल पर छाये हुए निर्मल बाबा की तरफ अगर एक बहुत दर्शक वर्ग आकर्षित हुआ तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं थी। इससे हमारे देश के बुद्धिजीवियों को कोई परेशानी भी नहीं थी मगर समस्या यह थी कि टीवी का एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग केवल निर्मलबाबा के समसमों की तरफ खिंच गया था। उस दौरान आईपीएल जैसी क्रिकेट प्रतियोगिता तथा टीवी के यस बॉस कार्यक्रम की चर्चा सार्वजनिक स्थानों से गायब हो गयी थी। निर्मल बाबा ने चैनलों से अपने समागमों के विज्ञापन का समय भी इस तरह लिया था कि वह एक न एक चैनल पर आते ही थे। स्थिति यह लग रही थी कि लोग चैनलों पर उन समागमों के प्रसारण का समय इस तरह याद रखते थे जैसे कि सारे चैनल ही निर्मलबाबा के खरीदे हुए हों। हमारा अनुमान तो यह है कि निर्मल बाबा से मिलने वाले आर्थिक लाभ से कहीं उनको अपने अन्य प्रसारणों पर हानि होने का डर था। उनके अन्य कार्यक्रम की लोकप्रियता इस कदर गिरी होगी कि उनके विज्ञापनादाताओं को लगा होगा कि वह बेकार का खर्च रहे हैं। प्रचार प्रबंधकों से स्पष्ट कहा होगा कि वह या तो निर्मल बाबा का विज्ञापन प्रसारित करें या हमारे लिये दर्शक बचायें। 
            हमने निर्मल बाबा के कार्यक्रंम देखे थे। हमारे अंदर केवल मनोरंजन का भाव रहता था। अगर अंधविश्वास की बात की जाये तो हिन्दी चैनल वाले स्वयं ही अनेक तरह के ऐसे प्रसारण कर रहे हैं जो विश्वास और आस्था की परिधि में नहीं आते। निर्मल बाबा को कोई सुझाव हमारे दिमाग में नहीं आता था। देखा और भूल गये। दरअसल इस विषय पर बहुत पहले लिखना था पर समय और हालातों ने रोक लिया। एक योगसाधक और गीता पाठक होने के नाते हमें पता है कि कोई भी मनुष्य अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बिना इस संसार में सहजता से संास नहीं ले सकता। संसार के विषयों में लिप्त आदमी सोचता है कि मैं कर्ता हूं यही से उसक भ्रम प्रारंभ होता है जो अंततः उसे अंधविश्वासों की तरफ ले जाता है। संसार के काम समय के अनुसार स्वतः होते हैं और उनके लिये अधिक सोचना अपनी सेहत और दिमाग खराब करना है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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4/5/12

अनफ़िट और फ्लाप क्रिकेट खिलाड़ियों का सफल शो बनी लीग प्रतियोगिता-हिन्दी लेख ( entertainment gameof flop cricket player)

            देश में क्रिकेट लीग प्रतियोगिता प्रारंभ हो गयी है। अगले 54 दिन तक देश के अनेक मनोरंजन प्रिय लोगों के लिये यह आरामदायक स्थिति है। हैरानी इस बात की है कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों के दौरान हृदय में देशभक्ति का का भाव लेकर देखने वाले लोग अब ऐसी स्थानीय स्तर के प्रतियोगिता भी मनोरंजन के लिये देखने लगे है। अभी बीसीसीआई की टीम ने विश्व क्रिकेट कप जीता था। फाइनल में सचिल तेंदुलकर फ्लाप रहा है। वीरेद्र सहवाग भी जल्दी चलता बना। मगर बाद में विराट कोहली, गौतम गंभीर और कप्तान धोनी ने अपने पराक्रम से मैच निकाल ही लिया। कहने को सभी ने सचिन तेंदुलकर की वाहवाही की मगर पुराने क्रिकेट प्रेमी जानते हैं कि सचिन कभी ऐसे मौके पर काम नहीं आता। खासतौर से जब स्कोर का पीछा करना हो सचिन अधिकतर ही फ्लाप रहा है। अगर दूसरी पारी में स्कोर का पीछा करते हुए विजय हासिल करने वाले मैचों की संख्या गिनी जाये तो विराट कोहली ने कम समय में ही सचिन से अधिक काम कर दिखाया होगा।
                इसके बावजूद सचिन के लिये बाज़ार और प्रचार माध्यमों के प्रबंधक जनता में भले ही दीवानगी बनाये रखना चाहते हों पर वह सफल नहीं हो पा रहे। सचिन को भारत रत्न दिलाने के लिये भी जोरदार अभियान चल रहा है पर हमारा मानना है कि कपिल देव और धोनी इसके दावेदार है। इतिहास हमेशा विजेता नायकों को मानता है और सचिन ने अपने नायकत्व में भारत के लिये कोई कमाल नहीं किया। बहरहाल बाज़ार और प्रचार माध्यमों ने अब लीग स्तरीय प्रतियोगिताओं को अपनी कमाई का साधन बना लिया है। इसका आयोजन इस तरह किया जाता है कि उसके लिये मैदान के अलावा टीवी प्रसारण पर भी दर्शक उपलब्ध हों। इस समय देश के स्कूलों में इम्तहान के बाद अवकाश का समय होता है। इसके अलावा गर्मियों की वजह से लोगों का सड़कों पर आवागमन दिन के दौरान कम होता है। सभ्रांत मध्यम वर्गीय परिवार के लोग घर या कार्यालय स्थल पर अंदर पड़े होते हैं। शाम को उनके लिये मनोंरजन का साधन आवश्यकता बन जाता है और यह लीग मैच वही काम कर रहे हैं। फिर नयी पीढ़ी के लोगों के लिये इस अवकाश के समय में मनोरंजन का होना आवश्यक होता है। इसी पीढ़ी के लोगों में अनेक भटकाव का शिकार होकर सट्टा वगैरह भी लगाते हैं। इस तरह एक नंबर और दो नंबर दोनों प्रकार के धंधे करने वालों को अच्छी कमाई होती है।
               सच बात तो यह है कि अनेक खिलाड़ियों को बीसीसीआई की अंतर्राष्ट्रीय टीम से इसलिये हटाया गया ताकि उनको  लीग प्रतियोगिता में लाया जा सके तो कुछ लोगों को इसलिये खिलाया जा रहा है ताकि इस प्रतियोगिता का आकर्षण बना रहे। यही कारण है कि बीसीसीआई टीम में अनेक अनफिट खिलाडी खेल रहे हैं। एक बात हम यहां बता दें कि क्रिकेट में फिटनेस बल्लेबाजी और गेंदबाजी से नहीं वरन् क्षेत्ररक्षण तथा विकेट के बीच दौड़ से देखी जाती है। इसमें बीसीसीआई टीम के खिलाड़ी अत्यंत कमजोर हैं।
          इसके उदाहरण बहुत हैं पर गैरी कर्टसन ने इसे प्रत्यक्ष प्रस्तुत किया। एक बार एक मैदान में उन्होंने बीसीसीआई टीम खिलाड़ियों को अपने साथ दौड़ाया। वह कोच थे और उनकी उम्र भी भारतीय खिलाड़ियों से अधिक थी मगर उस स्टेडियम के उन्होंने चार चक्कर बड़े आराम से लगाये जबकि कोई भी भारतीय खिलाड़ी वह दौड़ पूरी नहीं कर सका। सभी थोड़ा दौड़े पर हांफ रहे थे जबकि गैरी कर्टसन चार चक्कर लगाने के बाद भी आरामदायक स्थिति में दिख रहे थे।
             इसके बावजूद यह हकीकत है कि बीसीसीआई टीम के खिलाड़ी अन्य देशों से अधिक अमीर हैं। हमारे अध्यात्म दर्शन में कहा भी जाता है कि अमीरों की प्राणशक्ति कम होती हैं। अन्य देशों के खिलाड़ी भी अमीर हैं पर वह व्यवायिक प्रवृत्ति के होते हैं इसलिये उनकी प्राणशक्ति अधिक होती हैं। जब हम इस लीग प्रतियोगिता को देखते हैं तो हैरानी होती है कि फ्लाप लोगों का यह मनोरंजक प्रदर्शन हिट हो जाता है। इस पर हम दो बातें कह सकते हैं कि एक तो यह कि लोगों को मनोरंजन और खेल में अंतर करना नहीं आता। दूसरी बात यह कि शायद उनके पास अधिक विकल्प नहीं है या फिर उनमें रुचियों का अभाव है। सच बात तो यह है कि अंतराष्ट्रीय मैच अनेक खिलाड़ी केवल इसलिये खेल रहे हैं क्योंकि उनके आका क्रिकेट खेल की अंतर्राष्ट्रीय छवि बनाये रखना चाहते हैं वरन् तो यह लीग प्रतियोगिता उनकी पहली पसंद है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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3/3/12

चुनाव परिणाम में चमत्कार की आशा-हिन्दी व्यंग ( chunam parinam aur chamtkar-hindi vyanga, result of election and miricle-hindi satire)

मतदाता खुद चमत्कार नहीं करते-हिन्दी व्यंग्य
लेखक दीपक भारतदीप
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                  चुनाव के समय नेताओं के आचरण पर अनेक तरह के कटाक्ष देखने को मिलते हैं मगर आम मतदाता पर कोई कुछ नहीं लिखता। यह मान लिया जाता है कि वह तो चेतन को धारण करने वाला जड़ वस्तु है। जैसा कहा जाएगा वैसा वह बिना हील हुज्जत के करेगा। स्थिति यह है हास्य कवि और व्यंग्यकार चुनावों के मौसम में नेताओं पर अनेक हास्य और व्यंग्य लिखकर और सुनाकर वाहवाही लूटते हैं। ऐसे में हम जैसे लोग धारा से अलग होकर लिखने की फिराक में रहते हैं। फोकटिया हैं इसलिए लिखने का मन नहीं करता। सोचते हैं कि कोई दूसरा लिखे तो हमारी भड़ास स्वयमेव ही ठंडी हो जाएगी। जब ऐसे नहीं होता तो लाचार और मजबूर होकर खुद ही लिखने बैठ जाते हैं। तनाव से मुक्ति का यह मार्ग भी कि आप अपने अंदर चल रही हलचल को बाहर अभिव्यक्त करें। फिर हम जैसे लेखक तो आत्ममुग्ध होते ही हैं जिनको लगता है कि चार लोगों में चर्चा कर क्या अपनी तौहीन कराएं सो कहीं लिखकर चाप दें। चापना इसलिए लिखा क्योंकि हमारे यहाँ छापना केवल दूसरों के अखबारों में ही होता है। बाकी लिखकर अपने यहाँ रख लिया तो उसे चापना ही कह सकते हैं।
         कुछ लोग पूछें कि मतदाताओं पर भला क्या लिखा जा सकता है? वह तो निरीह प्राणी है। हम नहीं मानते कि एक आम मतदाता के रूप में निरीह प्राणी है। कहते हैं कि गीदड़ कि तरह बरसों जीने से अच्छा है कि शेर कि तरह एक दिन जिया जाए। बाकी लोगों के क्या कहें हम स्वयं ही कभी मतदान के दिन शेरदिली का परिचय नहीं दे पाये। हम नहीं दे पाये तो बाकी लोग तो दे ही सकते थे, यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं। हाँ ! इस तरह दूसरों पर दोष देकर अपने आपको बारी कर देने में भी जिंदगी का सुख अनुभव होता है।
           इधर पाँच राज्यों में चुनाव समाप्त हुए तो संभावित परिणामों के विश्लेषण भी आ गए। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, इसमें हमारी दिलचस्पी नहीं है। कोय नृप हो हमें क्या हानि की तर्ज पर चलकर अनेक लोगों ने सुख पाया हम भी ले रहे हैं। नेताओं पर हास्य व्यंग्य करना हमें आता नहीं है। इधर यह भी लगता है कि एक आम मतदाता के रूप में हम स्वयं भी कम हास्यास्पद काम कम नहीं करते हैं।
             जब टीवी चैनलों पर इन चुनावों के संभावित परिणामों पर विश्लेषण सुने तो लगा कि आम मतदाता के मानस का विश्लेषण इस तरह हो रहा है जैसे वह जड़ हो। वह जाति के आधार पर मत डालेगा। अपने पूरे दिन में आने वाली समस्याओं से दूर होकर अपने धर्म को बचाने के लिए दूसरों के बहकावे पर वोट डालेगा। लब्बोलुवाब यह कि वह देश राज्य और शहर में परिवर्तन के लिए आम मतदाता स्वयं कोई चमत्कार नहीं करेगा। हाँ, एक विद्वान ने जो कहा उसका आशय यही था।
         वह विद्वान सही था या गलत इस पर हम कुछ नहीं कहेंगे, मगर एक एक बात तय है वाकई हमने आम मतदाताओं को कभी ऐसा चमत्कार करते नहीं देखा कि प्रायोजित प्रवाहित धाराओं से अलग कोई अप्रायोजित धारा बही हो। केवल एक दिन शेर की तरह जीने का अवसर मिलता है पर क्या बहुमत में उसका कभी प्रभाव दिखा है। लोग चार पाँच बुरों में एक कम बुरा चुनता है। यहाँ तक कि उसका निर्णय अपने आत्मविवेक से नहीं बल्कि प्रचलित संगठित प्रचार माध्यमों के प्रभाव में करता है। यही कारण है कि कभी ऐसा नहीं सुना गया कि कोई कम प्रचारित असंगठित उम्मीदवार जीतने का चमत्कार कर सका हो। मतलब यह कि जो लोग पाँच बरस तक यह उम्मीद करते हैं कि उनके हित के लिए कोई चमत्कार करे वह एक दिन का अवसर आने पर स्वयं कुछ नहीं करते। बस, संगठित प्रचारित धाराओं में बहते हुए चमत्कार कि सोचता है। कौन समझाये कि आधुनिक लोकतंत्र में चमत्कार बहुमत करता है न कि कोई एक व्यक्ति। भ्रष्टाचार को एक लोकपाल हटा देगा, यह भ्रम अपने यहाँ खूब चल रहा है। यह भ्रम फैलाने वाले भी नेताओं पर बरसते हैं पर मतदाता से चमत्कार को नहीं कहते क्योंकि वह एक आम आदमी है जिसका भीड़ में भेड़ की तरह करना है। अगर वाकई मतदाता चमत्कार करने लगे तो फिर यहाँ किसी भी आंदोलन से कोई महापुरुष नहीं बनेगा। भावावेश में आम इंसान आकर उनके पीछे भी चल पड़ता है। इस आशा के साथ कि शायद कोई चमत्कार हो जाएगा।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/9/12

फेसबुक पर वार्तालाप में भाषा का तोतलापन अखरता है-हिन्दी लेख (fecebook par vartalap mein bhasha ka totlapan akharta hai-hindi lkeh)

        फेसबुक पर आज की पीढ़ी ही नहीं बल्कि पुराने लोग भी सक्रिय हैं पर उनमें अधिकतर लेखक नहीं है इसलिये हिन्दी साहित्य की परंपराओं के ज्ञान का उनमें अभाव है। ऐसे में नयी पीढ़ी के लोगों से यह अपेक्षा तो करना कठिन है कि वह उन्हें समझ सकें खासतौर से जब वह स्वरचनाकर्म से अधिक कट पेस्ट यानि किसी का पाठ उठाकर अपने पृष्ठ पर रखने के आदी हों। हमारे प्रचार माध्यमों ने तो नयी पीढ़ी में यह बात स्थापित कर दी है कि ब्लॉग, ट्विटर या फेसबुक पर केवल आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, फिल्म, टीवी तथा कला क्षेत्र के शिखर पुरुष ही लिखते हैं और उनकी ही परवाह करना चाहिए। आम लेखक तो फोकटिया हैं और उनकी कोई बात सम्मानीय या पठनीय नहीं है।
       यही कारण कि फेसबुक तथा ब्लॉग पर जब हमने अपनी रचनायें बिना नाम के देखीं तो वहां प्रतिकूल टिप्पणियां लिखीं। ऐसा लगता है कि बजाय प्रतिकूल टिप्पणियां करने के साथ उनको यह बात समझाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में साभार रचनायें लेने की परंपरा है। उसमें लेखक का नाम अवश्य दिया जाता है। जिन टीवी चैनलों के पास किसी खास समाचार का दृश्यव्य प्रसारण नहीं है वह दूसरे से साभार लेते हैं। हालांकि यह उदाहरण समझाने के लिये पर्याप्त या उचित नहीं है। हिन्दी टीवी चैनल साभार प्रसारण लेते हैं पर वह या तो विदेशी चैनल का या फिर देश का अंग्रेजी चैनल हो। मतलब यह कि हिन्दी वाले की हिन्दी से सोतिया डाह तो रहती ही है। यह बात इंटरनेट पर भी दिखाई देती है जब चोरी के पाठ प्रकाशित होते दिखते हैं।
         बहरहाल फेसबुक पर एक वेबसाईट संचालिका ने हमसे अपने पाठ प्रकाशित करने की अनुमति मांगी तो हमने उसे सहर्ष नाम प्रकाशित करने की शर्त पर दी। उसने ऐसा किया भी! उसकी इस क्रिया पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। दरअसल उसने भ्रष्टाचार पर उस कविता को ही लिया जो कि हमारी इस विषय पर लिखी गयी सबसे हिट कविता है। इसी कविता ने एक नहीं दो ब्लॉग को हिट बना रखा है। हमें यह देखकर हैरानी हो रही है कि केवल ब्लॉग को नियमित या अपडेट बनाये रखने के लिये लिखी गयीं कविताओं ने अधिक पाठक जुटायें हैं बनिस्बत उन बड़े लेखों के जो बड़े मनोयोग से लिखे गये। इसका कारण यह भी है कि नयी पीढ़ी के युवा ज्यादा समय खराब करने के थोड़े समय में अधिक पढ़ना चाहता है। वह कहानी भी कविता में पढ़ना चाहता है। अगर विषय गंभीर हो तो एक लघु कथा लिखने से काम चल सकता है पर हास्य हो तो कविता ही ठीक जमती है।
          हमें इंटरनेट पर सक्रियता से जहां खुशी मिली वहीं इस बात का दुःख भी होने लगा है कि नयी पीढ़ी भाषा के लिहाज से तोतली हो रही है। रोमन लिपि में अंग्रेजी और हिन्दी का मिश्रण प्रसन्नता नहीं दे सकता। हैरानी की बात है कि हिन्दी टूलों की उपलब्धता के चलते यह हो रहा है। खासतौर से जब यह जीमेल पर ही उपलब्ध हो और प्रयोक्ता उसके उपयोग में असमर्थ हों। लड़के लड़कियां अगर यह सोच रहे हैं कि वह अभिव्यक्त होकर कोई बड़ा नाम करेंगे तो वह गलतफहमी में हैं। फेसबुक पर लिखने के बाद प्रतिक्रियायें मिल जाती हैं पर कालांतर में वह भी बोरियत लगने लगेगी। फेसबुक पर तो यह आशा करना ही बेकार है कि कोई अपने अभिव्यक्त होने की लंबी पारी खेल सकता है। इससे अच्छा तो यह है कि ब्लॉगर या वर्डप्रेस पर ब्लॉग लिखकर प्रयास करना श्रेयस्कर है। फेसबुक में केवल अपने समूहों से जुड़े हुए लोग ही साथी होते हैं जबकि ब्लॉग एक सार्वजनिक पत्रिका की तरह उपयोग में लाये जा सकते हैं। जिन युवक युवतियों में मन में हिन्दी लिखने का आनंद प्राप्त करने की इच्छा है वह फेसबुक के साथ ही ब्लॉग जरूर बनायें। कुछ समय तक उनको टिप्पणियां मिलेंगी पर बाद में बंद हो जायेंगी मगर सर्च इंजिनों में वह हमेशा जीवंत बना रहेगा। ऐसे में अगर केवल अपने अंदर बैठे लेखक को जिंदा रखने के लिये एकांत यात्रा करनी होगी। हालांकि ब्लॉग पर फेसबुक की तरह लिखना अधिक परिणामदायक नहीं रहेगा ऐसे में हिन्दी टूलों के साथ प्रभावी हिन्दी का भी ज्ञान रखना होगा। वह केवल पुराने लेखकों की रचनाओं से मिल सकता है। नये लेखकों ने तो अंग्रेजी का मिश्रण करना प्रारंभ कर दिया है।      
              फेसबुक पर पिछले एक दो महीने से हम अधिक सक्रिय रहे हैं। वहां अपने ब्लॉग के लिंक देखने अक्सर जाना होता है। अनेक महानुभावों ने संपर्क किया है। उनसे चैट में भाषा का तोतलापन अखरता है। हम आपसी संवाद पर अपने साथियों पर कोई आक्षेप नहीं कर रहे पर इतना तय है कि यह रोमन लिपि में लिखना या पढ़ना हमको तोतलापन लगता है। चूंकि लेखक हमेशा भावुक होता है इसलिये हमारे लिये वार्तालाप के समय टिप्पणियां करना ठीक नहीं लगता। यह सही है कि ऐसे संवाद के समय शीघ्रता होती है इसलिये कही दूसरी जगह से कट पेस्ट करने में देरी करना अच्छा नहीं लगता है पर अभ्यास हो जाये तो कुछ भी असहज नहीं है। हिन्दी तो फिर भी सरलता से लिखी जाती है पर चीनी लिखने में कठिन है मगर फिर भी चीन के नागरिक उसमें लिखते हुए संकोच नहीं करते। हमारा उद्देश्य आक्षेप करना नहीं बल्कि नयी पीढ़ी के लोगों को यह समझाना है कि भाषा की कमी उनकी अभिव्यक्ति को कमजोर बनाने के साथ विचार को क्षणिक आवेग के रूप में प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात आत्मीयता का वैसा संबंध वह कभी नहीं बना सकती जैसे कि हमारे अपने साथ ब्लॉग लेखकों के साथ प्रभावी हिन्दी के कारण बने।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
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12/28/11

अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) के लिये आत्ममंथन का समय-हिन्दी लेख (anna hazare ke liye atmamanthan sa samay-hindi lekh or article)

              अन्ना हज़ारे ने अपना अनशन तथा जेलभरो आंदोलन फिलहाल स्थगित कर अच्छा ही किया है। जब हम अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात करते हैं तो उसके राजनीतिक पक्ष की चर्चा अधिक होती है और सामाजिक पक्ष पीछे रह जाता है। हमने जब भी इस पर लिखा है सामाजिक पक्ष को अधिक छूने का प्रयास किया है। एक बात के लिये यह आंदोलन हमेशा याद रखा जायेगा कि इसने संपूर्ण देश के समस्त समाजों के सभी लोगों को चिंत्तन और मनन के विवश किया। मूल प्रश्न भ्रष्टाचार से जुड़ा होने के बावजूद ऐसे अनेक विषय हैं-जिनका संबंध कहीं न कहीं उससे है-जिन पर चर्चा हुई। जब हम भ्रष्टाचार की बात करते हैं तो आमतौर से सरकारी क्षेत्र के भ्रष्टाचार की बात होती है पर उद्योग, व्यापार, कला, तथा धर्म के क्षेत्र के कदाचार छिप जाता है। संभव है हम जैसे चिंतकों के इस मत से कम ही लोग सहमत होंगे कि हमारे समाज का यह सामान्य दृष्टिकोण ही ऐसे भ्रष्टाचार के लिये जिम्मेदार हैं जिसमें धन को सर्वाधिक महिमामय माना जाता है। सिद्धांतों की बात करना सभी को अच्छी लगती है पर जहां धन का मामला आये वहां सभी की आंख बंद हो जाती है।
             अपने आंदोलन के अकेले शीर्षक अन्ना साहेब हैं पर उनके विस्तार में अनेक प्रश्न चिन्ह थे। किसी पाठ में फड़कते शीर्षक के साथ बहुत सारे शब्द होते हैं जिनमें विषय से जुड़े सार का सार्थक होना आवश्यक है। इसके अभाव में शीर्षक एक नारा होकर रह जाता है। हम जैसे गीता साधकों के लिये यह आंदोलन अध्ययन और अनुसंधान के लिये बहुत महत्वपूर्ण रहा है। इस दौरान हमने केवल अन्ना के वाक्यों के साथ ही उनकी पर्दे पर दिख रही गतिविधियों को बहुत ध्यान से देखा। अन्ना के बारे में दूसरे लोग और दूसरे लोगों के बारे मे अन्ना क्या कह रहे हैं इसमें हमने दिलचस्पी नहीं रखी बल्कि अन्ना अपने इस आंदोलन से इस समाज के लिये क्या नया ढूंढ रहे हैं यह प्रश्न हमेशा हमारे लिये महत्वपूर्ण रहा है। अन्ना के स्वास्थ्य की चिंता हमेशा रही और हमारा मानना है कि ज्ञानी और ध्यानी अनशन जैसी हल्की गतिविधि से तब तक दूर रहें जब तक यह आवश्यक न हो। आंदोलनों और अभियानों का शांतितिपूर्ण प्रदर्शन करना ठीक है पर अनशन जैसी गतिविधि विचलित कर देती है।
               अन्ना ने जब अपना अनशन स्थगित किया तो प्रचार माध्यम उनका मखौल उड़ा रहे हैं। इन्हीं प्रचार माध्यमों ने उनके इसी आंदोलन पर अपने विज्ञापनों का समय पास कर कमाई की। टीवी चैनलों को इतने सारे दर्शक मिले होंगे कि वह कल्पनातीत होगा। हमारा मानना तो यह है कि यह आंदोलन ही आम जनमानस को भरमाने के लिये आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुषों का एक योजनाबद्ध प्रयास था। टीवी चैनलों में शामिल हुए जिन बुद्धिजीवियों ने उनके मुंबई में कम भीड़ होने की जो बात कही है वह इसी का ही परिणाम है। लोकपाल या जनलोकपाल से इतर बहस इस पर चल रही है कि क्या अन्ना साहेब का जादू खत्म हो गया है। तो क्या यह जादू चल रहा था?
          अन्ना मूलतः अकेले थे पर उनके पीछे अनेक ज्ञात अज्ञात संगठन आये जिनके अपने अपने लक्ष्य थे। जनलोकपाल उनका नारा था जो संसद में लोकपाल का बिल पास होते ही फ्लाप हो गया। अन्ना के अनेक साथियों को लगा कि उनका नारा अब चलने वाला नहीं है। यकीनन अन्ना ने यह सब देखा होगा। अन्ना ने बहुत कुछ कहा पर हमें लगता है कि उन्होंने बहुत कुछ नहीं भी कहा। उनके सामने अनेक ऐसे सत्य अदृश्य रूप में प्रकट हुए होंगे जिनको देखकर वह आश्चर्यचकित हुए होंगे। वह उनको देखते होंगे पर उनका बयान करना उनके लिये कठिन रहा होगा। वह ऐसे सात्विक पुरुष हैं जो राजस पुरुषो के क्षेत्र में घुसकर उनको त्रास देता है। अभी तक उन्होंने राजस पुरुषों से जो द्वंद्व किया था उसमें भी उनके विरोधी राजस पुरुषों की सहायता लेते रहे होंगे। एक को परास्त किया तो दूसरा विजेता बना होगा। इस बार वह राजस पुरुषों के विशाल समूह से लोह लेने निकले थे और धीरे धीरे उनके इर्दगिर्द अपने राजसी वृत्ति के लोगों का आंकड़ा कम होता जा रहा था। राजस पुरुष पराक्रमी होते हैं जबकि सात्विक पुरुषों को पराक्रम की आवश्यकता नहीं होती। यदि राजस पुरुषों के विशाल समूह से सामना करना हो तो पहले अपने पराक्रम का भी परीक्षण करना चाहिए। अन्ना ने यह बात अब जाकर अनुभव की होगी। हम नहीं मानते कि अन्ना हारकर बैठ जायेंगे। दूसरी बात यह भी लगती है कि वह अपने वर्तमान राजस पुरुषों के साथ लेकर अपना अभियान चलने वाले भी नहीं है।
        हम जब अन्ना हजारे के अभियान से राजनीतिक पक्ष से हटकर उसका सामाजिक पक्ष देखते हैं तो लगता है कि अन्ना हजारे की त्यागी छवि जनमानस में है। इसलिये भविष्य में उनको समर्थन नहीं मिलेगा यह सोचना बेकार है। मुश्किल यह है कि अन्ना हजारे को बौद्धिक वर्ग का समर्थन अधिक नहीं मिला। इसका कारण यह है कि इस देश ने कई आंदोलन और उसके परिणाम देखे हैं जिससे निराशावादी दृष्टिकोण उभरता है। अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़े स्वयं सेवी और उनके संगठनों की निष्ठा को लेकर लोगों के मन में अनेक संदेह थे। देश के बौद्धिक समाज से जुड़े अनेक लोगों के लिये वह किसी भी दृष्टि से स्वयंसेवक नहीं थे। समाज सेवा में उनकी भूमिका धनपतियों और आमजनमानस के बीच उनकी भूमिका मध्यस्थ की थी। वैसे हमारा मानना है कि अन्ना को अपना अभियान राजनीति से जुड़े विषय से हटकर समाज में फैले अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और भेदभाव मिटाने के लिये प्रारंभ करना चाहिए। हालांकि यह कहना कठिन है कि इसके लिये उनको प्रायोजक मिलेगा या नहीं। एक बात तय रही कि बिना प्रायोजन के ऐसे आंदोलन चल नहीं सकते।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
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12/20/11

श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगाने पर चर्चा-हिन्दी लेख (disscusion in bain on shri madabhagwat gita on russia-hindi lekh or article)

                समाचार तो यह है कि श्रीमद्भागवत गीता पर प्रतिबंध लगाने के लिये रूस के एक शहर में की अदालत में याचिका दायर की गयी है। यहां इस समाचार को लेकर गीता के विषय में संशय उठ रहे हैं। जिस तरह भगवान श्रीराम के विभिन्न रूप हैं उसी तरह श्रीगीता ने भी अपने भक्तों के अनुरूप धारण कर लिये हैं। भगवान श्रीराम के स्वरूप का प्रश्न है तो अनेक प्रचलित हैं-बाल्मीकी के राम, दशरथ पुत्र राम, कौशल्या के राम, तुलसी के राम-उनमें सबसे श्रेष्ठ रूप माना गया है घट घट में बसे राम! महाभारत युद्ध के समय श्रीकृष्ण ने अपने सखा अर्जुन को जो तत्वज्ञान दिया था वह श्रीमद्भागतगीता के रूप में स्मरण किया जाता है। मूलतः यह वेदव्यास रचित महाभारत ग्रंथ का एक महत्वपूर्ण भाग है। अगर कहें अगर श्रीमद्भागत गीता वाला अंश नहीं होता तो शायद ही कोई महाभारत काल को याद करता। यह भी संभव है कि अगर यह अंश न होता तो भगवान श्रीकृष्ण ने भी वह प्रतिष्ठा अर्जित नहीं की होती जो आज तक अक्षुण्ण बनी हुई है। हम इससे भी आगे जाकर यह कहें कि आज हमारे देश की विश्व में अध्यात्म गुरु की जो छवि है वह श्रीमद्भागवत गीता के कारण ही है तो गलत न होगा। गीता के तत्वज्ञान के रूप में कोई बदलाव नहीं आया पर जिन भगवत्भक्तों ने इसकी साधना से कृपा पायी उन्होंने अपना जीवन इसके प्रचार में इस सीमा तक समर्पित कर दिया कि उनके शब्दों के संचय समूह भी गीतातुल्य सम्मानीय बन गये। उनके साथ उन महापुरुषों के नाम भी जुड़े। ऐसे में अनेक महापुरुषों के नाम से गीता का नाम जुड़ा है। उन महापुरुषों के शब्द संचय समूहों में श्रीमद्भागवत गीता शीर्षक सर्वोपरि है पर उपशीर्षक में कहीं न कहीं उनके स्वयं या आश्रम के नाम जुड़े हुए हैं। नहीं भी जुड़े हैं तो प्रतीक चिन्ह उनकी प्रथक गीता होने की पहचान देते हैं।
               दस बरस पूर्व जब हमें योगसाधक के रूप में ज्ञान पाने की जिज्ञासा जागी तो हमने गोरखपुर प्रेस की अपने घर में रखी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन प्रारंभ किया। उसमें हर पाठ के साथ उसके अध्ययन की महत्ता तथा पुण्य का प्रभाव भी प्रकाशित था। हम तो श्रद्धा के साथ पढ़ते थे। एक दिन हमें एक ब्राह्मण मित्र मिला। वह हमारी तरह ही साहित्यक रुचि वाला है। अध्यात्म में उसकी रुचि शायद इतनी नहंी है पर पारिवारिक पृष्ठभूमि के नाते उसका ज्ञान की कमी भीनहीं थी। उसे हमने अपनी गीता साधना की चर्चा की तो उसने हमसे कहा‘भाई साहब, आप श्रीमद्भागवत गीता का वही प्रकाशन पढ़ें जिसमें केवल श्लोकों के अनुवाद हों कि साथ में महात्म्य हो। उसमें उसके अध्ययन का महत्व आदि नहीं बताया गया हो। तभी आप समझ पायेंगे वरना आप दूसरी तरह की कहानियों में अपनी ऊर्जा नष्ट करेंगें।’’
            हम हैरान रह गये। बात यह थी कि हम महत्त्ता बताने वाली जिन कहानियों को साथ में पढ़ रहे थे उसमें कोई एक भी पाठ नहीं था जिसमें ब्राह्मण पात्र न हो। ऐसे में उस मित्र की बात थोड़ी चौंकाने वाली लगी मगर जब हमने नयी श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना प्रारंभ किया तो लगा कि वास्तव में मित्र के हृदय से यह बात भगवत्कृपा की उपज थी। उस दिन हमने अपने मित्र से जब इस बात की चर्चा करते हुए श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की वर्तमान संदर्भ में व्याख्यान प्रस्तुत किया तो उसने जो कहा वह लिखना अपने मुंह मियां मिट्ठु बनना होगा।
              नियमित योग क्रिया से निवृत होने के बाद गीता की साधना करना हमारे दिन का सबसे स्वर्णिम समय होता है। अब यहां हम श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा करने नहीं जा रहे पर जो लिख रहे हैं वह कहीं न कहीं उनसे प्रभावित है।
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           इस्कॉन नाम की एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जो भगवान श्रीकृष्ण के संदेशों का प्रचार करती है। उसके आश्रमों में हमारा जाना हुआ है। हम उनमें कोई दोष नहीं देखते। देखने वाले देखते भी हैं। हम देखते हैं सुनते हैं पर लिप्त नहीं होते। सुना देख और भूल गये। उनके संस्थान से प्रकाशित श्रीमद्भागवत का एक संस्करण हमारे पास भी है। इसका अनुवाद विश्व के अनेक भाषाओं के इसलिये हुआ है क्योंकि इस्कॉन ने अनेक देशों में अपना स्थान बनाया है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम तथा भगवान शिवजी के अनेक भक्तों ने विश्व में उनका प्रचार किया है पर संगठित रूप से यह काम इस्कॉन ने किया है उतना शायद ही कोई कर सका हो। अनेक भारतीय संतों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है पर इससे भारतीय अध्यात्म का प्रचार कम उनकी छवि अधिक बनी है। इस्कॉन की जो कार्यशैली हमने देखी है उसमें दोष हम नहीं देखते पर इतना तय है कि श्रीमद्भागवत गीता के प्रचार में उनकी भूमिका हो सकती है वह उसमें वर्णित तत्वज्ञान के दर्शन उसमें नहीं होते। इस्कॉन के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद की कृपा से श्रीमद्भागवत यथारूप प्रस्तुत की गयी है पर उसमें व्याख्या ज्यादा है। हमने नहीं पढ़ी पर उसमें कुछ आपत्तिजनक हो सकता है इस पर यकीन नहीं है। अनुवाद करने या पढ़ने वालों की समझ का फेर हो सकता है। इस फेर में कोई नाराज हो गया तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जब आत्मा जीवन धारण करता है तो वह सत्य लगता है पर होता तो झूठ है। देहधारी जीव विवादास्पद हो जाते हैं पर आत्मा निर्विवाद है।  यही स्थिति तत्वज्ञान की है। वह सूक्ष्म है जब उसे व्याख्या देकर व्यापक बनाया जाता है तो वह देहधारी जीव की तरह विवादस्पद हो जाता है। यह समझ का फेर अपने देश में ही बहुत सारे गीता सिद्धों को भी है कि श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान अत्यंत गूढ़ है जबकि एक बार अगर श्रीमद्भागवत हृदय में आत्मसात होना प्रारंभ हो तो एक जीवन के प्रति स्वयमेव दृष्टिकोण अन्य लोगों से प्रथक हो जाता है। यह अलग बात है कि कथित गीता सिद्ध इसे रहस्यमय कहकर स्वयं को ज्ञानी साबित करते हैं जैसे उनको समझ में सब कुछ आ गया है। कुछ लोग इस बात से नाराज हो सकते हैं कि मगर गीता सिद्ध अपना ज्ञान दिखाने उन लोगों के पास नहीं जाते जिनकी उसमें रुचि नहीं है। न ही सार्वजनिक रूप से श्रीमद्भागवत गीता पर प्रवचन करते हैं। गीता सिद्ध संगठन बनाकर नहीं चलते क्योंकि वह हंस होते हैं। संगठन तो कौए बनाकर चलते हैं।
               अब तो प्रश्न हैं एक तो क्या इस्कॉन की श्रीमद्भागवत पर प्रतिबंध लगाने की बात है या मूल रूप से गोरखपुर प्रेस जैसे प्रकाशन से जुड़ी श्रीमद्भागवत गीता को भी उसमें शामिल किया गया है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि क्या श्रीमद्भागवत गीता के शब्द उच्चारण पर ही प्रतिबंध लगाने का विचार हो रहा है या उसके श्लोकों के स्थानीय भाषा में अनुवाद पर भी रोक लगेगी। एक रूसी नेता ने भारत में इस विषय पर हो रहे प्रदर्शन पर कहा कि श्रीमद्भागवत गीता का प्रवेश हमारे देश में दो सौ वर्ष पहले ही हो गया था। इससे तो लगता है कि रूस में इसके इतने अनुवाद हो चुके होंगे कि उनको रोकना संभव नहीं होगा।
         जिस तरह का इसमें तत्वज्ञान है और आधुनिक विज्ञान उसके सामने फीका है उसे देखकर तो यह लगता है कि इसका प्रचार वहां स्वयमेव बढ़ेगा। इस विवाद की भारत में चर्चा करने का मतलब इसलिये भी नहीं है क्योंकि यह तत्वज्ञान है इसे कोई नहीं बदल सकता। जहां तक हम जैसे आम गीता साधकों की भावनाओं के आहत होने का प्रश्न है तो यह एक भुलावा है। यह प्रचार माध्यमों के लिये समय पास करने के लिये अच्छा विषय बन गया है।
           हमारा मानना है कि श्रीमद्भावगत गीता में मनोरंजन नहीं है। जिसकी रुचि नहीं है उसे अहंकारवश गीता का ज्ञान देना भी तामस बुद्धि का परिचायक है। जिसकी भगवान श्रीकृष्ण में भक्ति नहीं है उसके सामने तो इसका नाम लेना भी निरर्थक है। अगर कोई यह सोचकर कि श्रीमद्भागवत गीता से ज्ञान मिल जाये ताकि लोगों के सामने अपने ज्ञानवान होने का प्रदर्शन करूं और वह इसे पढ़ने लगे तो जल्दी बोर हो जायेगा। संभव है कि वह अर्थ रटकर उसे सुनाने लगे पर इसका आशय यह कतई नहीं कि वह ज्ञानी है। सच्चे गीता साधक श्रीमद्भागवत गीता शब्द सुनकर न तो भावविभोर होते हैं न उसकी निंदा सुनकर विचलित होते हैं। उनके लिये यह विवाद एक हल्की मुस्कराहट लाने से अधिक प्रभाव नहीं रखता। मान अपमान से परे होने के गुण का महत्व आखिरी श्रीगीता में ही बताया गया है। ऐसी श्रीमद्भागवत गीता और उसके सृजनकर्ता भगवान श्रीकृष्ण का कोई अपमान भी कर सकता है या किसी में इतनी औकात है यह गीता सिद्ध नहीं मानते। ऐसा करने वालों का जो हश्र होगा उसकी कल्पना वही कर सकते हैं जो तत्वज्ञानी हैं।
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12/9/11

फेसबुक, ब्लॉग और ट्विटर पर सक्रियता में खास और आम जनमानस-हिन्दी लेख (facebook,blog,twitter and coman man-hindi lekh or article)

            अगर हम व्यक्ति की अभिव्यक्ति को उसके अंतर्मन की सही स्थिति माने तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि वह वैसा ही जैसा शब्द लिखता है या बोलता है। बोलना लिखने से ज्यादा आसान है इसलिये लोग बोलते ज्यादा लिखते कम हैं। इस पर जब लिखने की बाध्यता हो तब कोई भी आदमी चिंता में पड़ जाता है और उसका चिंत्तन हवा होकर उसे शून्य में धकेल देता है। हम बात कर रहे है इंटरनेट पर अभद्र शब्द लिखकर नाम कमाने वालों की उस प्रवृत्ति का, जो अब आम हो गयी है। गाली गलौच और या खालीपीली का मजाक इस बात को दर्शाता है कि आदमी में विवेक की कमी है। फेसबुक, ट्विटर, ब्लाग या वेबसाईटों पर अनेक बार ऐसे शब्द देखने को मिलते है जब लगता है कि अविवेकी लोगों का एक बहुत बड़ा समूह इंटरनेट पर अपनी भड़ास निकालने के लिये सक्रिय हो गया है। इनसे निजात पाना संभव नहीं है पर इतना तो अवश्य किया जा सकता है कि इनकी टिप्पणियों को अपने पृष्ठों पर जगह ही नहीं दी जाये।
             पहले ब्लाग, फिर ट्विटर और ऑरकुट पर लोगों की सक्रियता इतनी नहीं थी पर अब फेसबुक ने एक तरह से आम जनमानस को इससे जोड़ दिया है। देखा जाये तो ब्लॉग पर लोगों की सक्रियता कम हो गयी है पर वास्तव में अपनी बात को प्रमाणिक ढंग से कहने वालों के लिये वही एक जोरदार जगह बनी हुई है। जिन लोगों को टिप्पणियों का इंतजार नहीं है और न ही व्यवसायिक रूप से अपनी सफलता दिखाने की बाध्यता है उनके लिये ब्लॉग पर लिखना स्वयं की रचना करने की भूख शांत करने का एक शानदार माध्यम है। फेसबुक ने नयी पीढ़ी को तेजी से इंटरनेट की तरफ आकर्षित किया है। इसका कारण यह है कि उसमें आपसी संपर्क, संवाद, तथा संदेश प्रेषण का यह एक जोरदार माध्यम बना है। त्वरित प्रतिक्रिया के साथ ही अपने आत्मीय, प्रिय तथा मैत्री संपर्कों को निरंतर सक्रियता देखकर एक प्रसन्नता का अनुभव होता है। इस लेखक ने बहुत दिनों तक फेसबुक पर खाता बनाकर उसे देखा तक नहीं पर अपने कुछ प्रियजनों के साथ जब संपर्क हुआ तो ऐसा कोई दिन नहीं होता कि उसे न देखते हों। पहले फेसबुक के प्रति उदासीनता का भाव इसलिये था क्योंकि वहां अपने खालीपन को बिताने का कोई विषय नहीं था। कुछ आत्मीय जनों की सक्रियता देखकर प्रसन्नता होती है। यह एक आम व्यक्ति की स्थिति है पर जब हम अपने लेखकीय स्वरूप के साथ इंटरनेट पर आते हैं तब फेसबुक एकदम सीमित साधन लगता है। आत्मीय, प्रिय तथा मै़त्री भाव वाले लोग हमारे साहित्यरूप से स्नेह नहीं करते बल्कि व्यक्तिगत व्यवहार के प्रति उनका आकर्षण होता है। ऐसे में उनके साथ हास्य कवितायें, निबंध, लेख तथा व्यंग्य जैसे विषय साझा करना अपने को ही मजाक लगता है। हमारी रचना का उद्देश्य अपने साथ जुड़े पाठकों तक अपना संदेश पहुंचाना होता है जो हमारी व्यक्तिगत छवि नहीं देख पाते। एक लेखक वाह वाह या हाय हाय की परवाह किये बिना ही आगे बढ़ सकता है। ऐसे में व्यक्तिगत संपर्क उसके लिये सीमित दायरा होता है पर आम जनमानस अपने समूह के साथ जुड़ना ही एक जोरदार माध्यम बन जाता है।
          बहरहाल फेसबुक ने अनेक प्रकार के समूह बनाये हैं। इन समूहों की वजह से व्यवसायिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक संगठनों ने इसमें घुसकर अपना हित साधने का लक्ष्य बना लिया है। तय बात है कि यह संगठन आपस में प्रतिस्पर्धा रखते है और उनके अनुयायी एक दूसरे के साथ शाब्दिक द्वैरथ करते हुए कभी कभार मर्यादा का उल्लंघन कर जाते हैं। इन संगठनों के साथ जुड़े लोगों में आमजनमानस के मुकाबले कहीं अधिक आत्मविश्वास है इसलिये वह अपनी अभिव्यक्ति में गुस्सा खुलकर व्यक्त करते हैं तो गाली गलौच और मजाक भी कर जाते हैं। आम जनमानस ऐसा नहीं कर सकता। खासतौर से प्रबुद्ध वर्ग का व्यक्ति हमेशा अपनी छवि को लेकर जस तरह सतर्क रहता है इसलिये वह ऐसी हरकतें नहीं कर सकता। हम अपनी छह साल के अनुभव इंटरनेट पर सबकुछ जानने का दावा तो नहीं कर सकते पर इतना अवश्य कहेंगे कि इंटरनेट पर पेशेवर वर्ग ने ही अश्लीलता को प्रोत्साहन दिया है। एक तरह से उन्होंने यह संदेश दिया है कि अगर आप गाली गलौच कहीं नहीं दे सकते या गुस्सा व्यक्त करने का आपके पास कोई मंच नहीं है तो आप इंटरनेट पर इसके लिये एकांत साधना कर सकते हैं। यह अलग बात है कि इस एकांत साधना पर इन्हीं व्यवसायिक इंटरनेट कर्मियों की नज़र रहती है। संभवत यह पेशेवर इंटरनेट कंपनियों, टेलीफोन उपक्रमों तथा प्रचार समितियों के हो सकते हैं जो शायद ब्लॉग, टिवट्र और फेसबुक पर प्रारंम्भिक टिप्पणियां कर प्रयोक्ता को प्रोत्साहित करने का काम करते हैं। इसके बाद आता है राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा साहित्यक संगठनों तथा उनके शिखर पुरुषों के अनुयायियों का जो अपने द्वैरथ का संचालन यहां कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि इन लोगों ने मर्यादा की सीमाओं का उल्लंघन किया है इसलिये अब इंटरनेट पर पर नियंत्रण की बात कर रही है। कुछ लोगों को लगता है कि यह नियंत्रण इस हद तक जा सकता है कि आमआदमी की प्रतिक्रिया का मंच-ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक, ऑरकुट, तथा वेबसाईटें-टूट भी सकता है। अगर ऐसा है तो दुर्भाग्यपूर्ण होगा क्योंकि अंततः संगठित इंटरनेट प्रयोक्ता तो फिर अपने पुराने मंच-टीवी, अखबार तथा आम सभाऐं-ढूंढ लेंगे पर आम आदमी का क्या होगा जो ऐसे द्वैरथों में पहले तो पड़ता नहीं अगर पड़ता है तो अपनी औकात में रहता है। वह मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता पर उसके साथ अमर्यादित विषय सामग्री इस तरह साझा की जाती है कि उसे समझ में नहीं आता कि वह उसे कैसे रोके-याद रखने वाली बात यह है कि अनेक लोग इस बात को नहीं जानते कि वह अपने यहां आयी सामग्री को प्रतिबंधित कैसे करें?
     वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने अपनी छवि से ढेर सारे ऐसे इंटरनेट प्रयोक्ताओं को जोड़ रखा है जो आम श्रेणी में आते हैं। ऐसे लोग इन पर इन दोनों महानुभावों पर इंटरनेट के चश्में से नज़र रखते हैं पर वह इनके समर्थन में अमर्यादित सीमाओं के पार नहीं जा सकते। अगर कोई सीमा के पार जा रहा है तो यह बात तय है कि वह संगठित क्षेत्र का प्रयोक्ता है जिसे अपने साथ अनेक लोगों के साथ होने का आत्मविश्वास है। आमजनमानस में यह आत्मविश्वास नहीं होता कि वह गाली गलौच का इस्तेमाल करे या फिर किसी बड़ी हस्ती की मजाक उड़ाये। अतः इंटरनेट पर नियंत्रण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि आम जनमानस के मन में कोई आतंक न पैदा हो। अगर ऐसा हुआ तो इंटरनेट से लोग दूर होना प्रारंभ कर देंगे तब जो हानि होगी उसका आभास अभी नहीं है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
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11/30/11

उपभोक्ता और किसान तो शोषण के लिये बना है-हिन्दी लेख (consumar and formers for earning-hindi article)

        किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर चल रही बहस में कई बातें दिलचस्प हैं। यकीनन अगर हम उनको सुने तो अपनी बात प्रभावी ढंग से न रख सकते हैं न सोच सकते हैं। जहां तक हमारी इस विषय पर अपनी सोच यह है कि अभी तक इससे देश के लाभ या हानियों पर किये गये अनुमान उस रूप में प्रकट नहीं होंगे जिस तरह व्यक्त किये जा रहे हैं।
            हम लाभ हानियों से अलग हटकर एक बात जरूर मानते हैं कि इस देश की समस्याओं का हल अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांतों के अनुरूप करने की बात तो यह कभी दिखाई नहीं दी। हम एक अर्थशास्त्री होने के नाते-अर्थशास्त्र हमारे अध्ययन के दौरान एक विषय रहा है इसलिये यह पदवी हमने स्वयंभू रूप से स्वयं धारण की है-मानते हैं कि अगर इस देश में राज्य प्रबंध अगर प्रत्येक गांव में स्वच्छ पानी, पक्की सड़क तथा बिजली की व्यवस्था कर ले तो इस देश में आर्थिक समस्यायें नगण्य रह जायेंगी। यह अलग बात है कि आज़ादी   के बाद इस पर भारी पैसा खर्च हुआ पर भ्रष्टाचार के कारण परिणाम शून्य ही रहा। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा तथा भुखमरी जैसी समस्यायें पूरी तरह से खत्म भले न हों पर वह गंभीर चिंता का विषय नहीं रहेगी। मूल बात कहें तो सरकार कल्याण के नाम पर दूसरे काम न भी करे तो चल जायेगा।
          यह कोई  अनिवार्य  शर्त नहीं हो सकती है कि गांव के विषय पर लिखने के लिये वहां पैदा होना जरूरी है। हम शहर में जन्मे हैं पर अनेक बार गांवों में जाने का अवसर मिला। उससे यह लगता है कि वहां मूलभूत सुविधाओं का पूर्णतः अभाव है। बरसात के दिनों में जब गांवों में सब्जी, गेंहु, चावल तथा दूध अधिक मात्रा में होता है तब वहां से उसे निकालकर शहर पहुंचाने के लिये कितनी मुश्किल होती है यह हमने स्वयं देखा है। उस समय अशुद्ध जल की वजह से बीमारी अपना रौद्र रूप दिखाती है तब यह गांव के मार्ग इस कदर नाले में बदल जाते हैं कि रात को किसी मरीज को गांव से बाहर पास के बड़े गांव या शहर ले जाना लगभग असंभव होता है। इसी कारण छोटी बीमारी में लोग वहां मर जाते हैं। गांव में अगर अस्पताल भी हो तो वहां चिकित्सक पहुंच नहीं सकता। वैसे सामान्य हालत में भी स्वास्थ्य कमी वहां पहुचंने से कतराते हैं। अगर आजादी के बाद हम देश के पूरे गांवों में शुद्ध जल, बिजली और पक्की सड़क जैसी सुविधायें नहीं पहुंच पाये तो यह संकट हमारी प्रबंध व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। शहरों के पास जो गांव हैं उनमें शायद ऐसा आधारभूत ढांचा मिल जाये पर जो दूर हैं उनकी समस्याओं पर कितना सोचा गया यह अलग से विचार का विषय है।
     विदेशी कंपनिंयां अगर भारत आ रही हैं तो वह कोई आधारभूत ढांचा नहीं बनायेंगी बल्कि उनका अपनी सुविधानुसार दोहन ही करेंगी। जहां आधारभूत ढांचा नहंी है वहां उनको उन्हीं बिचौलियों पर निर्भर रहना होगा जिनको हटाने की बात हो रही है। इधर हम सुन रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप गंभीर रूप से आर्थिक संकट में हैं और अब वहां विकासशील देशों के निचले स्तर पर जाकर कमाने की बात हो रही है। हमने अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को यह कहते हुए पढ़ा था कि हमें विदेशों में जाकर छोटे स्तर पर काम करना होगा। अमेरिका की विदेशमंत्राणी हेनरी क्लिंटन ने भी कहा था कि काम के बारे में भारतीयों से सीखना चाहिए।
          बहरहाल इस बहस में एक महत्वपूर्ण समाचार पर चर्चा किसी ने नहीं की कि अमेरिका ने पाकिस्तान के 28 सैनिकों को मार दिया जिससे दोनों देशों के बीच गंभीर तनाव है। पाकिस्तान ने अपना एक हवाई अड्डा अमेरिकी सेना से खाली करने को कहा है। इतना ही नही उसने संयुक्त राष्ट्र में भी यह मामला उठाया है। भारतीय प्रचार माध्यम इस पर खबर देकर चुप हो गये हैं। उनको शायद इसका अंदाजा नहीं है कि अंततः यह तनाव युद्ध में बदल सकता है। अगर पाकिस्तान अमेरिका के हाथ से निकल गया तो उसका राजनीतिक प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप से करीब करीब खत्म होने जैसा ही है। हमारा मानना है कि अमेरिका से अधिक मित्रता से अब कोई लाभ नहीं है। वह सामरिक रूप से शक्तिशाली है पर उसका आर्थिक ढांचा करीब करीब गड़बड़ाने लगा है। ऐसे में पाकिस्तान की राजनीतिक बगावत उसके सम्राज्य में आखिरी कील की तरह लग सकती है। देखा जाये तो पाकिस्तान अपने सहधर्मी देशों का एक तरह से प्रवेश द्वार है। भले ही वह एक सार्वभौमिक राष्ट्र की तरह दिखता है पर संक्रमण काल में उसकी सरकार की बैठक सऊदी अरब में होती है तो क्रमवार होने वाले क्रिकेट मैच दुबई या आबुधाबी में होते हैं। जिन दूसरे देशों की क्रिकेट टीमों का क्रम में पाकिस्तान का दौरा होता है वह दुबई या आबुधाबी में उसके साथ मैच खेलती हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ अमेेरिका का तनाव मध्यएशियाई देशों तक विस्तृत हो सकता है। यह देश एक तरह से अमेरिका की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं।
         बहरहाल अब बड़े विषयों पर बड़े विद्वानों की चर्चा सुनकर ऐसा लगता है कि निरपेक्ष या स्वतंत्र प्रेक्षकों की बातें दमदार होती हैं पर महत्व केवल संगठित विद्वानों को ही दिया जा रहा है। अनेक स्वतंत्र विद्वानों ने किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर अपनी राय बेबाकी रूप से रखी। वह इससे चिंतित नहीं है पर खुश भी नहीं है। जहां तक किसानों और उपभोक्ताओं के हित का प्रश्न है तो सवाल यह है कि इन दोनों रूपों में हर मनुष्य शोषित होता है और अगर उसे प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाये तो पूरी दुनियां का व्यापार ही ठप्प हो जाये। वाल मार्ट आये या नहीं यह समस्या शोषितों के आपसी द्वंद्व का विषय है। यह अलग बात है कि समय के अनुसार बाज़ार और प्रचार के अनुसार समाज का स्वरूप बदलता रहता है और उसे रोकना कठिन है।
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11/20/11

स्वामी रामदेव को समझाने की बजाय खुद समझें-हिन्दी लेख (swami ramdev and patanjali yog sasnthan in haridwar-hindi lekh or article)

            आज सुबह अपनी ही आनंद नगर कॉलोनी के पर्यटन में पतंजलि योग संस्थान के सानिध्य में आयोजित एक सात दिवसीय योग शिविर का उद्घाटन शिविर को देखने का अवसर मिल गया। बाबा रामदेव तो नहंी थे पर उनकी अनुपस्थिति कोई मायने भी नहीं रखती क्योंकि जो योग साधना का अभ्यास करवा रहे थे वह योग्य शिक्षक लगे। सिंहासन और हास्यासन का आनंद पूरी तरह लिया। यह आनंद तब दोगुना लिया जा सकता है आप योग साधना निरंतर करते हों। भारतीय योग संस्थान के योग शिविर में-जो वह बिना किसी प्रचार के आयोजित करता है-भी इस तरह का योगाभ्यास कराया जाता है पर वहां कम लोग ही पहुंचते हैं। इसका कारण यह है कि उसके शिविरों में कोई प्रसिद्ध हस्ती का नाम नहीं जुड़ा। पतंजलि योग संस्थान के नाम से स्वामी रामदेव का नाम जुड़ा हैै और यही कारण है कि उसके शिविर अधिक से अधिक लोग जुटा लेते हैं। यह अलग बात है कि वह स्थाई नहीं होते जबकि भारतीय योग संस्थान के शिविर नियमित रूप से चलते हैं।
यह लेखक न तो बाबा रामदेव का शिष्य है न ही उनका समर्थक पर इसके बावजूद उनके योग प्रचार से प्रसन्नता होती है। इस प्रसन्नता का कारण समाज के प्रति निष्काम प्रेम है। नौ बरस नितांत योग साधना कर चुकने के बाद आदमी का मन कैसे होता है, यह वही समझ सकता है जिसने किया हो। दूसरी बात यह भी है कि चार बरस से श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन के बाद इस बात का अनुभव हुआ कि जब तत्वज्ञान का आभास हो जाता है तब आदमी निरंकार दृष्टा होकर चिंतन करता है। ऐसे में शुभकर्म करने वाला कोई अन्य व्यक्ति क्यों न हो तत्वज्ञानी उसकी प्रशंसा करेगा।
        दरअसल यह लेख अगर एक दिन पहले लिखते तो शायद इस शिविर की चर्चा नहीं होती। इस लेख को लिखने का मूल उद्देश्य स्वामी रामदेव के कृत्तिव पर प्रकाश डालना जरूरी है। यह विचार स्वामी अग्निवेश के एक टीवी चैनल पर साक्षात्कार को देखने सुनने के बाद आया।
         पहले स्वामी अग्निवेश की बात कर लें। वह 73 वर्ष के हैं यह बात कल उनके श्रीमुख से पता चली। इसका मतलब यह कि वह अन्ना हजारे से एक वर्ष छोटे हैं। अग्निवेश जी की आयु देखकर मन श्रद्धा से इसलिये भर गया क्योंकि उनके चेहरे और देह से वह इतनी बड़ी आयु के नहीं दिखते। उन्होंने इसका राज संयम बरतने को बताया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान अपने ही साथियों के प्रति उनका जो बर्ताव टीवी चैनलों पर दिखाया गया उससे उनकी छवि खलनायक की बनी। इतना ही नहीं अमरनाथ को लेकर हिन्दू समाज पर उनकी टिप्पणी ने भी उनकी छवि खराब की थी। चूंकि हमने पहले भी कहा है कि बाज़ार और प्रचार समूह अपने प्रायोजित आदमी की छवि बनाने और बिगाड़ने का काम करते हैं और स्वामी अग्निवेश कहीं न कहीं उनके ही नायक हैं। संभव है कि स्वामी अग्निवेश को इसका आभास न हो बल्कि उनके पर्दे के पीछे सक्रिय साथी उनकी गतिविधियों का जिम्मा लेकर काम चला रहे हों पर यह तय है कि कहीं न कहीं उनके साथ बाज़ार का समर्थन है। यही कारण है कि छवि खराब होने के बाद उसे सुधारने के लिये उनको बिग बॉस में लाया गया और अब तमाम तरह के साक्षात्कार प्रसारित हो रहे हैं। हमने अपने पहले के पाठों में उनकी आलोचना की है पर कल के साक्षात्कार ने उनके प्रति हमारे मन में आकर्षण पैदा किया। सबसे पहले तो उनकी इस बात के लिये प्रशंसा कर चाहिए कि उन्होंने अपने संयम से आयु को मात दी है। मतलब उनसे भी सीखने लायक कुछ है। उन्होंने एक बात स्वीकार की कि अहंकारवश उन्होंने अपने साथियों के प्रति भूल की तो उनके साथी भी अहंकार में रहे हैं। उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया पर प्रकृतियों से द्वंद्व की बात मानी। वह आर्यसमाजी हैं यह भी एक अच्छी बात लगी। उन्होंने गीता का अध्ययन किया है यह भी लगा। अखरी तो बस एक बात वह यह कि वह बाबा रामदेव के प्रति दुराग्रह रखते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने स्वामी रामदेव के एक निकटस्थ आदमी से कहा था कि वह व्यापार से अलग होकर काम करें वरना उनके विरोधी गलतियां निकालकर बदनाम करेंगे।
        इसी साक्षात्कार में तीनों महिला संचालनकर्ता बार बार ढोंगी साधुओं का जिक्र इस तरह कर रही थीं जैसे कि भक्तों से पैसा लेने वाला हर साधु ढोंगी हो। इतना ही नहीं वह इस तरह बोल रही थीं कि आधुनिक साज सज्जा से काम करने वाले सारे संत केवल पैसे से काम रहे हों। स्वामी अग्निवेश भी लगता है कि इससे सहमत थे। हमारी बात यहीं से शुरु होती है।
        हम यहां बता दें कि श्रीमद्भागवत गीता में कहीं नहीं लिखा हुआ है कि माया से परे रहो। सांसरिक कर्म से विरक्त होना ही सन्यास है। दरअसल श्रीगीता में कहा गया कि हमें दृष्टा और देह के ंअंतर को समझते हुए आत्मिक रूप से कहीं भी सांसरिक विषयों में लिप्त नहीं होना चाहिए। धन से दूर रहने की बात इसलिये भी गलत लगेगी क्योंकि उसमें दान आदि करने का भी महत्व बताया गया है। स्वामी अग्निवेश कहते हैं कि वह किसी को शिष्य नहीं बनाते। यह अच्छी बात है पर जो शिष्य बनाते हैं उन पर उनको आक्षेप करने का अधिकार नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि हम स्वामी अग्निवेश के अनेक कृत्यों से सहमत न होने के बावजूद उनके गुणों की चर्चा कर रहे हैं। यह श्रीगीता के ज्ञान की ही देन है। स्वामी अग्निवेश धर्मं के नाम पर ढोंग के विरोधी हैं। हम भी हैं। इसके बावजूद हम कर्मकांडियों के प्रति घृणा भाव नहीं रखते। यह घृणा मनुष्य के नकारात्मक भाव का प्रमाण है जो उसे दायरों में बांध देती है। स्वामी अग्निवेश को अधिक शिष्य मिलने भी नहीं थे। उनके साथ जो लोग भी है तो वह समर्थक होंगे प्रशंसक नहीं। अमरनाथ यात्रा पर उनकी टिप्पणियां सार्वजनिक रूप से व्यक्त करना हमें पसंद नहीं था। दूसरे की भक्ति पर आक्षेप करना अहंकार भाव दिखाना है जो तामस बुद्धि का परिचायक है। आयु में अग्निवेश हम से बड़े हैं इसलिये उनके प्रति हमारे मन में सम्मान है पर जहां अध्यात्म की बात आती है तो सबसे पहले यह देखना ही पड़ता है कि आदमी अपने ज्ञान के साथ कितना समय बिता रहा है।
      कुछ लोग शायद हमसे नाराज होंगे यह जानकर कि हम तो किसी भी साधु या संत को ढोंगी कहने के बाद मन में पछताते हैं। इसका कारण भी बताये देते हैं कि हम में इतनी कुब्बत नहंी है कि हम स्वामी रामदेव, आसाराम बापू, सुधांशु महाराज तथा मोरारी बापू की तरह अध्यात्म की शक्ति के सहारे इतनी भीड़ जुटा लें। जो भीड़ जुटती है उसमें सभी को अज्ञानी कहना भी तामस बुद्धि का परिचायक है क्योंकि हम स्वयं भी कुछ अच्छा सुनने की खातिर वहां जाते हैं। अगर कभी अवसर मिला तो स्वामी अग्निवेश की सभा सुनने भी जा सकते हैं यह जानते हुए कि वह हमारे मन को अप्रिय लगने की बात कर सकते है। हमारे अंदर ज्ञान और गुण की चाह है पर अपने ज्ञान के कारण यह यकीन भी है कि हम स्वामी अग्निवेश में भी ढूंढ निकाल सकते हैं। अगर धार्मिक संतों के पास काला धन है तो स्वामी अग्निवेश जी के कार्यक्रमों के आयोजक भी दूध के धुले नहीं हो सकते। इसके बावजूद हमें स्वामी अग्निवेश ने प्रभावित किया यह बात मानने में संकोच नहीं है। वह अरविंद केज़रीवाल के और अन्ना हजारे के प्रति कोई कठोर बात करते हुए झिझक रहे थे जो कि उनके मर्यादित स्वभाव का प्रमाण है।
       चाहे योग शिविर हो या प्रवचन का कार्यक्रम उनके आयोजन पर पैसा खर्च होता है। सीधी बात कहें तो माया का खेल है तो माया से ही जीता जा सकता है। हमारा समाज इसके लिये खर्च करने को तैयार भी रहता है। एक समय था जब फिल्म, क्रिकेट और टीवी ने लोगों के मन को बांध दिया पर फिर लोग ऊब गये तो यही अध्यात्म संत उनके काम आये। एक आयु के बाद जब आदमी थकने लगता है तब वह आसरा ढूंढता है। यह आश्रम, मंदिर तथा दरबार उसके लिये एक आसरा बन जाते हैं। इनके निर्माण पर पैसा खर्च होता है और इसके लिये भक्तों से दान या सहायता लेनी पड़ती है। स्वामी अग्निवेश सत्य के ज्ञानी है पर माया के खेल से अनभिज्ञ है। ज्ञानी तो इस देश में बहुत लोग हैं पर अधिक भीड़ सभी के पास नहीं जाती। माया भी बहुत लोगों के पास है पर सभी संतों की तरह नहीं पुजते। सीधी बात यह है कि जिसके पास ज्ञान का संग्रह और माया की शक्ति है वही बड़े प्रसिद्ध संत बन पाये हैं।
      स्वामी अग्निवेश बजाय अनर्गल विषयों पर में लगने के अगर आर्य समाज का ही विचार आगे बढ़ाते तो शायद बेहतर रहता। प्रसिद्ध की बात छोड़कर अगर योग्यता के आधार पर तुलना की जाये तो वह बाबा रामदेव के आगे बहुत छोटे लगते हैं। बाबा रामदेव ने जिस कदर योग साधना की पुनःप्रतिष्ठा की है वह अनुकरणीय है। उनके पतंजलि योग संस्थान का पूरे देश में काम चल रहा है। अब तो उन्होंने अनेक साधकों को शिक्षक होने योग्य भी बना दिया है। उनके शिविर लग रहे है। धन अगर नहीं होगा तो यह प्रचारतंत्र चलेगा कैसे? अलबत्ता हम स्वामी अग्निवेश से यह अपेक्षा जरूर करेंगे कि वह योग साधना की आलोचना करने की बजाय अपने नियम और संयम के विषयों पर लोगों को जागरुक करने का काम करें। भ्रष्टाचार केवल नारे लगाने या आंदोलन चलाने से हटने वाला नहीं है बल्कि लोगों में नियम और संयम से चलने की शिक्षा देने पर ही उसका निराकरण संभव है।
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11/5/11

एक पाठ ने ही अन्ना हजारे के ब्लॉग को उखाड़ दिया-हिन्दी लेख (one post destroyd anna hazare's blog-hindi lekh article)

                अन्ना हजारे ने अपना ब्लॉग बंद करने का निर्णय लिया है। वैसे तो इस देश में बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने उनका ब्लॉग देखा होगा क्योंकि उस पर पाठ प्रकाशित होता ही था कि प्रचार माध्यम उसे अपने मंच पर मुख्य समाचार की तरह उपयोग करते रहे जिसकी वजह से उसको देखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। ऐसे में ब्लॉग होने का प्रभाव बाजार समर्थित प्रचार माध्यमों पर ही पड़ेगा जिनके लिये सनसनी फैलाने वाला एक स्त्रोत कम हो जायेगा। वैसे यहां भी स्पष्ट कर दें कि इस देश में गहरा चिंत्तन करने वाले पहले अन्ना हजारे की टीम के सदस्यों पर वर्तमान बाज़ार से समर्थित होने का आरोप लगाते थे तो अब उनको अन्ना का संपूर्ण आंदोलन ही प्रायोजित दिख रहा है। श्री अन्ना हजारे का ब्लॉग बंद होने का फैसला उनकी दृढ़ मानसिक शक्ति पर प्रश्न खड़े करेगा इसमें संशय नहीं है।
         आखिर वह कौनसा पाठ है जिसमें ऐसा कुछ आ गया कि उनको लगा कि यह ब्लॉग बंद करना ही श्रेयस्कर है? अन्ना को अपने प्रचार के लिये वैसे ही किसी ब्लॉग की आवश्यकता नहीं थी तब क्या बाज़ार के प्रायोजन की वजह से उन्होंने इसे बनाया। दरअसल वर्तमान बाज़ार जिसे भी नायक बनाता है उसका ब्लॉग अवश्य फैशन के तौर पर जरूर बनवाता है। इससे वह एक तीर से दो शिकार करता है। एक तो नई पीढ़ी को अपने नायक की अंतर्जालीय छवि से घेरता है दूसरा यह कि टेलीफोन कंपनियों के कनेक्शन कम होने की संभावना बच जाते हैं जिनका खतरा उनको हमेशा बना रहता है। सीधी बात कहें तो अन्ना हजारे के पीछे कहीं न कहीं बाज़ार का प्रायोजन है और इसी कारण उनके यह ब्लॉग बना भी होगा। इसका लेखक भी उनका सहयोगी था जिसको वह अपनी बात लिख कर देते और वह उसे चिट्ठी के साथ टंकित कर प्रकाशित करता था। अनेक पाठ चर्चित हुए। जब अन्ना मौन थे तब ब्लॉग के माध्यम से वह जनता से जुड़े रहे। अब उनके ब्लॉगर सहयोगी ने उनकी एक अहस्ताक्षरित चिट्ठी के साथ एक पाठ प्रकाशित किया जिसमें अन्ना टीम के सदस्यों को अलोकतांत्रिक बताते हुए टीम में सदस्यों में बदलाव की बात कही है। अन्ना ने अपने ब्लॉगर से सहमत होने की बात से अब इंकार करते हुए बताया कि वह अपने विचार कहीं लिख लेते थे। एक समय उन्हें अपनी टीम के बारे में ऐसा विचार आया था तो लिख लिया पर उसे प्रेषित करने के लिये ब्लॉगर को नहीं दिया। उस ब्लॉगर को केवल हस्ताक्षरित पत्र प्रकाशित करने का अधिकार दिया था। अगर उनका यह स्पष्टीकरण सही माना जाये तो लगता है चूंकि वह ब्लॉगर उनका निकटस्थ है इसलिये ऐसा कागज उसके पास रह सकता है भले ही उसे प्रकाशन का अधिकार न मिला हो। अन्ना का यह विचार उसने अनाधिकार छापा है-यही स्पष्टीकरण अन्ना हजारे साहिब ने दिया है।
              गंभीर चिंतकों की नज़र में अन्ना ने पहली ऐसी रणनीतिक गलती की है जो उनके व्यक्तित्व में गिरावट दर्ज करेगी। जब देश में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात आती है तब अन्ना हजारे को एक महानायकत्व का दर्जा देने का प्रयास प्रचार माध्यम करते हैं। जब तक आंदोलन किनारे पर था तब लोगों ने उसका अधिक अध्ययन नहीं किया और उस समय अन्ना सारे निर्णय स्वयं करते हुए एक चतुर व्यक्ति लगे। जब यह लोगों की समंदरनुमा भीड़ में आया तब धीरे धीरे लगा कि अन्ना हजारे एक ऐसा शीर्षक है जिसमें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अनेक उपशीर्षकों के साथ एक बड़ा पाठ होगा। मतलब अन्ना हजारे एक नाम भर है। बाज़ार से प्रायोजित होने के प्रत्यक्ष प्रमाण भले न हो पर अन्ना टीम के सभी वरिष्ठ सदस्य ऐसे स्वयंसेवी संगठनों के कर्ताधर्ता हैं जो अपने कथित सामाजिक लक्ष्यों के लिये राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार से दान या चंदे के रूप में धन प्राप्त करते हैं। तय बात है कि बाज़ार का सामाजिक उद्देश्य लोगों को अपने हित में साधे रहना होता है। कम से कम आज के आधुनिक युग में कोई भी व्यवसायिक परिवार, संगठन या समूह धर्म के नाम दान या चंदा नहीं देता जब तब उसका कोई आर्थिक हित न पूरा होता हो। ऐसे में अन्ना की टीम के सहयोगी पेशेवर समाज सेवक हैं और उनसे यह अपेक्षा करना कि वह अपने चंदादाताओं का ध्यान नहीं रखेंगे यह सोचना गलत होगा।
          बहरहाल अन्ना के सहयोगी ब्लॉगर ने अन्ना टीम के उन्हीं सहयोगियों के बारे अन्ना के ही ऐसे विचार प्रकट किये जो प्रचार माध्यमों में समाचारों के दौरान उनकी मानसिक हलचल को बयान करते थे। हस्ताक्षर नहंी है इससे यह तो माना जा सकता है कि उनमें निर्णायक तत्व नहीं है पर इतना तय है कि उनके सहयोगियों की स्थिति अब डांवाडोल हो रही है। यह सच है कि मानसिक हलचल के समय विचारों का उतारचढ़ाव आता है। उनको स्थिर मानकर उन पर प्रतिक्रिया देना तब तक ठीक नहीं है जब उनमें व्यक्ति का निर्णायक तत्व प्रमाणित नहीं है। हम अन्ना साहब की सफाई को स्वीकार करते हैं पर ब्लॉग बंद करने का निर्णय इस बात को दर्शाता है कि वह डर गये हैं। जिन सहयोगियों की आलोचना ब्लॉग में है वह अगर तत्काल स्वयं ही अन्ना टीम से हट जायें तो उनका आंदोलन हाल ही टॉय टॉय फिस्स हो जायेगा। बाजार से पैसा जुटाने वाले उनके वर्तमान सहयोगियों को संगठित प्रचार समूह का समर्थन भी इसलिये मिला है क्योंकि कहीं न कहीं से उनको आपने धनदाताओं से ऐसे निर्देश मिले हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जनमानस में बना रहना चाहिए। इसके अलावा अन्य ने महानायकत्व की ऐसी छवि बना ली है जिसके निकट अन्य व्यक्तित्व पनप नहीं सकता। उन्होंने करीब करीब देश के सारे बड़े संगठनों से दूरी बना ली है। ऐसे में उनकी टीम के चार बलशाली सदस्य अगर उनका साथ छोड़ दें तो फिर अन्ना के लिये रालेगण सिद्धि से दिल्ली आना भी कठिन हो जायेगा। देश में सक्रिय बौद्धिक वर्ग तथा स्थापित सामाजिक संगठन अब अन्ना हजारे के आंदोलन को सक्रिय सहयोग  शायद ही दें।
         ऐसे में अपनी टीम के इन सदस्यों को प्रसन्न करने के लिये अन्ना हजारे ने ब्लॉग बंद करने का फैसला सुनाया पर इससे रूप से यह अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भी हमारे सामने आ गया है कि अन्ना अपने आंदोलन की स्थिति को जानते हैं। अपनी गांधी जैसी छवि बनते देखकर वह खुश हो रहे हैं और उनको लगता है कि उनकी वर्तमान टीम ही इसमें सबसे अधिक मददगार है। जहां तक आंदोलन के नतीजों का सवाल है इस पर हम पहले भी बहुत कुछ लिख चुके हैं। गांधीजी ने हिंसा होने पर अपना एक आंदोलन वापस ले लिया था पर इससे उनकी छवि एक अहिंसक रूप में बढ़ी थी जबकि अन्ना साहेब ने अपना ब्लॉग लेकर यह साबित किया कि एक पाठ ने ही उनके ब्लॉग को उखाड़ दिया जो कि उनकी मानसिक हलचल का परिणाम रहा।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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10/22/11

लीबिया के तानाशाह गद्दाफी की मौत, राजसी वृत्ति और कर्म करने वाले लोगों के लिये सबक-हिन्दी लेख

                लीबिया के तानाशाह गद्दाफी को आज से 42 वर्ष पूर्व अगर कोई अपनी उस प्रकार की मृत्यु की तस्वीर खींचकर बता देता तो वह कतई राजनीति में नहीं आता। लीबिया के सर्वोच्च पद पर रहते हुए उसने ढेर सारे सुख भोगे होंगे। उन सुखों की कल्पना तक उसने बचपन में नही की होगी। वह बेखटके अपने राज्य सुख भोगता रहा। इस दौरान अपनी शक्ति में मदांध होकर उसने अनेक ऐसे भी काम किये होंगे जो कि राजस पुरुष के हाथ से अहंकारवश हो ही जाते हैं। अगर उसे कोई भविष्यवाणी कर यह बता देता कि राज्य प्रमुख पद पर प्रतिष्ठित होने से उसको इस तरह की मौत मिलेगी तो वह हर हाल में रहना मंजूर करता पर राजनीति में नहीं आता। मिठाई खाने वाले को अगर यह बताया जाये कि उसकी मिठाई में जहर है तो वह उसे नहीं खायेगा। इंसान कितना भी भूखा हो पर पर उसमें जहर होने की सूचना उसे विरक्त कर देती है।
         ऐसा हमेशा होता नहीं है कि आदमी अपने कर्म फल का अनुमान करे। विश्व भर में अनेक ज्योतिषवेता हैं पर वह ऐसी भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि किसी की मौत दर्दनाक होगी या सहज। अनुमान से किसी की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो जाये पर उसके लिये संयोग जिम्मेदार होता है। इसके बावजूद श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि अंततः राजस कर्म का परिणाम अहंकार, लोभ तथा काम के कारण दुःख के रूप में प्रकट होता है। पहले तो सात्विक लोग राजस कर्म करते नहीं पर अगर करें तो वह सात्विक मार्ग पर नहीं चल सकते। अक्सर लोगों को लगता है कि राजकाज में संलग्न रहना ही राजस कर्म है पर ज्ञानी जानते हैं कि राजस भाव अधिकतर सभी लोगों में रहता है-यह अलग बात है कि कुछ लोग सहजता से राजसी कर्म करते हैं तो कुछ तामस प्रवृत्ति की सहायत लेते हैं जैसा कि गद्दाफी ने किया।
        मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि वह अपने सांसरिक कर्म से अन्य मनुष्यों पर शासन करना चाहता है। सभी लोग राजा बनकर प्रजा पर शासन करे यह जरूरी नहीं है पर अपने आसपास के लोगों से प्रशंसा पाने के लिये लालायित रहना भी इसी प्रवृत्ति का प्रतीक है। यही राजस भाव है जो कि अंततः सुख के बाद दुःख का कारण बनता है।
गद्दाफी को एकदम बेरहमी से मारा गया। इतनी बेरहमी से कोई आवारा कुत्ते को भी नहीं मारता। उसके शरीर में गोलियां लग चुकी थीं। वह खून से सराबोर था। उसे जब अस्पताल ले जाने की आवश्यकता थी तब लोग उसे पीट रहे थे। अगर इस तरह कोई व्यक्ति राह पर दुर्घटना के बाद मिले तो अनजान लोग भी उसकी सहायता के लिये आयेंगे जबकि गद्दाफी पिट रहा था। उसीे घायल तस्वीरें टीवी चैनलों पर दिखाकर बताया गया कि उसका खून गोलियां लगने के कारण निकल रहा था। देखा जाये तो गोलियां ताजा लगी थीं और जिस तरह उसकी स्थिति थी उसे देखकर प्रतीत होता था कि अगर उस समय भी वह अस्पताल ले जाया जाता तो बचता नहीं क्योंकि कालांतर में गोलियों की पीड़ा बढ़ने और रक्त स्त्राव से उसका जीवन नष्ट होना था। गद्दाफी के 42 वर्ष के सौभाग्य ने साथ छोड़ा तो पलभर का दुर्भाग्य उसके लिये मौत का संदेश ले आया।
        गद्दाफी की यह मौत अच्छे खासे आदमी को राजकाज के कर्म में लिप्त होने से रोक सकती है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि अमेरिका से मित्रता रखने वाले देशों के राज्यप्रमुखों को भी डरा सकती है। यह सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका पूरे विश्व का खैरख्वाह बन गया हैं मध्यएशिया के तेल उत्पादक देशों पर उसका नियंत्रण रहा है। जो भी वहां तानाशह है वह अभी तक किसी न किसी रूप में उसके हितचिंतक ही रहे हैं। इराक के सद्दाम हुसैन अमेरिका तो गद्दाफी ब्रिटेन के प्रिय रहे पर अंततः दोनों को बुरी मौत मिली। ऐसे में जिन लोगों को अमेरिका और ब्रिटेन से राजनीतिक या आर्थिक मदद मिलती है उन्हें यह समझना चाहिए कि पश्चिमी देश किसी के सगे नहीं है। उल्टे उनके निकट रहने से सारी कमजोरियां उनकी नज़र में आ जाती हैं और समय आने पर वह पुराने मित्र को निपटाने के लिये नये शत्रु खड़े कर बुरी हालत कर देते हैं। सद्दाम हुसैन और गद्दाफी को निपटाने क्रे लिये उनके ही देश में विरोधी खड़े किये। फिर पश्चिमी देशों ने पहले उनकी सेना को तहस नहस किया जिससे विद्रोहियों ने उनको निपटाया। दूसरी बात यह कि अगर अमेरिका या ब्रिटेन का एक बात पल्लू पकड़ा तो फिर उसे छुड़ाने का प्रयास करने की बजाय नियमित रूप उसे उनके सामने अपनी उपयोगिता साबित करना चाहिए।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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9/15/11

अमेरिकी साम्राज्यवादी और भारत के जनवादी बुद्धिजीवी-हिन्दी लेख (america aur indian indian janvadi buddhijivi-hindi lekh

         अमेरिका के प्रतिवेदनों पर भारतीय प्रचार माध्यम इतना हल्ला क्यों मचाता है? ऐसा लगता है अमेरिका दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस है जो उनका गोपनीय प्रतिवेदन लिखता है। मजे की बात यह है कि जिन लोगों का गोपनीय प्रतिवेदन प्रतिकूल होता है वह कभी उसका विरोध नहीं करते और जिनका प्रशंसनीय है वह उछलने लगते हैैं। कभी कभी तो यह देखकर हैरानी होती है कि शिखर पुरुषों के दिल का हाल उनके देश के लोग तक नहीं जान पाते पर अमेरिका राजनयिक को पता लग जाता है वह भी उनके ही श्रीमुख से! खंडन होना चाहिए पर होता नहीं। कई बार तो निंदा योग्य बयानों की भी निंदा नहीं होती।
          अभी तक वामपंथी बुद्धिजीवियों से अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोध करने का नारा सुनते थे मगर तब यह समझ में नहीं आता था कि आखिर यह है किस प्रकार का! दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवियों ने पूंजीवाद और अमेरिका का विरोध एक साथ किया है इसलिये हमेशा ही उनके बारे में भ्रमपूर्ण स्थिति रही है। चूंकि वामपंथी पूंजी पर राज्य के नियंत्रण की बात करते हैं तो भारतीय समाज उसे स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि राज्य के नियंत्रण से भी देश का कोई भला नहीं हुआ! फिर आज की कंपनी प्रणाली जरूर ब्रिटेन और अमेरिका की देन हो पर समाज में पूंजी और श्रम की अपनी स्वायत्ता तो भारतीय अर्थशास्त्र की ही देन है। राज्य को अनियंत्रित पूंजी के मद से उपजे अपराध तथा श्रम का शोषण रोकने का अधिकार तो भारतीय अर्थशास्त्र मानता है पर वह उनका निंयत्रणकर्ता होना उसमें स्वीकार नहीं है। यहीं आकर भारतीय समाज वामपंथियों से छिटक जाता है क्योंकि उसको लगता है कि उसकी आर्थिक और श्रमशील गतिविधियों पर राज्य का नियत्रंण नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोधक होने का दावा करने वाले वामपंथी कभी भारतीय समाज में स्थान नहीं बना पाये।
           दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी अमेरिकी साम्राज्य के भौतिक स्वरूप का ही बखान करते हैं। उसने जापान पर बम फैंका, उसने जर्मनी को रौंदा तथा वियतनाम पर हमला किया, तथा उसने अफगानिस्तान पर हमला किया तथा इराक पर हमला किया आदि बातें कहकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भारतीय समाज को आंदोलित करने का प्रयास किया मगर अभौतिक या अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने जो कारगुजारियां की इसकी चर्चा नहीं की।
             वामपंथी अब भी कहते हैं कि अमेरिका साम्राज्यवाद फैला रहा है! इसका मतलब वह केवल इतिहास में जीते हैं। सच बात तो यह है कि अमेरिका सभी जगह राज्य कर रहा है। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने हमेशा ही इतिहास सुनाया है-यह हो गया, वह हो गया, इसलिये अब यह होगा और वह होगा। प्रतिरोध करने के नाम पर चंद नारे लगा लिये और कभी कभार प्रदर्शन कर लिया। यह देखा ही नहीं कि अमेरिका धीरे धीरे अब दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस बनता जा रहा है।
         अपने प्रचार माध्यमों ने हद ही कर दी है। अमेरिका किसी भी देश के शिखर पुरुष का गोपनीय प्रतिवेदन जारी करता है तो अपने यहां के प्रचार माध्यम उसे ऐसे उठाये घूमते हैं जैसे कि इस नये वैश्विक ब्रह्मा ने कोई नयी बात कर दी हो। दरअसल हमारे देश के प्रचार माध्यमों का आधार पूंजी है और जिसका उद्गमा स्थल ऐसा लगता है अमेरिका है। सभी विकासशील देशों के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुष अमेरिका पैसा भेजते हैं पर वह विनिवेश होकर यहां आता है। आर्थिक और सामाजिक शिखर पुरुषों की बात तो छोड़िये हमारे देश के धार्मिक पुरुष भी अमेरिका के अनुयायी लगते हैं। इनमें से कई अपने शिष्यों को दर्शन देने अमेरिका जाते हैं।
        वामपंथी बुद्धिजीवी भारत में बढ़ती महंगाई का राज नहीं जान पाये। क्या उनको नहीं है कि इस देश में पांच सौ और हजार के नोट के लिये आसानी से प्रचलन में रहें इसके लिये महंगाई योजना पूर्वक बढ़ाई जा रही है। देश की कंपनियां आम जनमानस को अपनी जेब में पांच सौ और हजार के नोट जेब में घूमते देखना चाहती हैं। ऐसा लगता है कि भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व के विकासशील देशों में पेट्रोल की आड़ में महंगाई खेल हो रहा है। कम से कम भारत में तो स्थिति अजीब है। इधर सुनने में आ रहा था कि पेट्रोल के दाम गिरेंगे पर भारत कंपनियों ने फिर उसे बढ़ा दिया।
          भारत से रुपया बाहर जाता है तो डालर बन जाता है। अगर मान लीजिये किसी ने आज एक हजार रुपये अमेरिका या अन्य देश की बैंक में जमा किया तो उसके खाते में बीस डॉलर जमा होंगे। काला धन जमा करने वालों ब्याज तो मिलना दूर उनको रखने के पैसे भी देने पड़ते हैं-ऐसा हमने प्रचार माध्यमों में पढ़ा और सुना है। अगर भारतीय रुपया स्थिर रहा तो यह बीस डॉलर देश में आयेंगे एक हजार के रूप में। अगर रुपया गिरा तो विदेश में काला धन जमा करने वाला को ही लाभ होता है। समझ लीजिये साठ रुपये के मुकाबले एक डालर का मूल्य निर्धारित हुआ तो यह बीस डॉलर बारह सौ रुपये हो जायेंगे। इसी तरह भारतीय जमाकर्ता फायदे में रहेगा।
         फिर विदेश रुपया भेजने के लिये मोटी रकम होती होगी। अक्सर कहा जाता है कि हजार पांच सौ रुपये के नोट से मुद्रा का आवागमन सुविधाजनक होता है-यह अलग बात है कि हमारे यहां अभी भी अनेक लोग इसे देख भी नहीं पाते होंगे। अगर भेजी जाने वाली रकम सौ या पचास रुपये की होगी तो ढेर सारे ड्रम भर जायेंगे। इसलिये हजार रुपये का नोट ज्यादा उपयोगी है। मुश्किल दूसरी है कि हजार और पांच सौ के नोट छोटी वस्तुओं के खरीदने में अभी पूरी तरह सहायक नहीं है। इसलिये यह लगता है कि इस देश को हजार और पांच सौ नोट के लायक बनाया जा रहा है।
इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि हर क्षेत्र के शिखर पुरुष का ध्यान भारत पर कम अमेरिका पर अधिक रहता हैं। वहां का राष्ट्रपति क्या कह रहा है? वहां का अखबार क्या लिख रहा है? अमेरिका की भारत के शिखर पुरुषों बारे में क्या सोच है? इस पर भारतीय प्रचार माध्यम उछलते हैं। तय बात है कि प्रचार माध्यमों के मालिकों का कहीं न कहीं झुकाव अमेरिका के प्रति है तभी तो उनके कार्यकर्ता उसका प्रचार करते हैं।
        भारत के विकास का दावा संदेहास्पद भी इसी कारण से हो रहा है क्योंकि यहां सौ रुपये से ऊपर की मुद्रा का प्रचलन बढ़ रहा है। याद रखिये हमारी जानकारी के अनुसार किसी भी विकसित देश की मुद्रा सौ से अधिक की नहीं है।
दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी इतिहास का रोना रोते हुए अमेरिका को कोसते हैं पर नारों से आगे नही जाते। अपने वाद का झंडा उठाये हुए अमेरिका के रणनीतिकारों की चालाकियों को भांप नहीं पाते। वह भारतीय संदर्भों की बजाय विदेशी संदर्भों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। अमेरिका और कंपनी दैत्य किस तरह विश्व के आम जनमानस को त्रस्त कर रहा है इसका आभास नहीं है। अफगानिस्तान और इराक में उसकी सैन्य उपस्थिति पर हल्ला मचाने वाले भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी देश के अंदर ही स्थित अमेरिका के कंपनी दैत्य पर नज़र नहीं रख पाते। देश के आम आदमी को पांच सौ और हजार के नोट के उपयोग लायक बनाने की जो योजना चलती दिख रही है उसका आभास हमें इसलिये भी होता है कि दिन ब दिन महंगाई इस कदर बढ़ रही है कि आने वाले समय में समाज का निम्न मध्यम वर्ग भरभर्राकर ढहते हुए गरीबी की रेखा के नीचे जाता दिख रहा है। मध्यम वर्ग गरीब होता जा रहा है तो उच्च मध्यम वर्ग तरक्की कर अमीर बन गया है। यह विषम आर्थिक स्तर देश के समाज को किस तरह नष्ट करेगा इसका अनुमान किसी वामपंथी बुद्धिजीवी ने शायद ही किया हो।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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4/9/11

अन्ना हजारे के आंदोलन पर विशेष लेख-अभी तो बहुत लंबा सफर है (anna hazare ke andolan par vishesh lekh=abhi to lamba safar hai)

                       जब सारे देश में गांधीवादी नेता श्री अन्ना हजारे की मांगें मान लेने पर मोमबत्तियां जलाकर जीत का जश्न मनाया जा रहा है तब अन्ना हजारे आगे ‘बड़े आंदोलन‘ की तरफ इशारा कर रहे हैं। अन्ना हजारे के के चेहरे पर कहीं भी विजय का उन्माद नहीं दिखाई दे रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि अन्ना हजारे जिन मांगों को लेकर अनशन पर बैठे उनका पूरा होना विजय का प्रतीक नहीं  हैं बल्कि बल्कि हज़ारे आंदोलन का बंद शिविर से युद्ध मैदान में आना भर है। इससे देश में कोई बदलाव नहीं आने वाला बल्कि यह ऐसा अस्त्र लोगों के हाथ में आ गया है कि जिसका इस्तेमाल भी करना सीखना होगा। जनता को संबोधित करते हुए अन्ना हजारे का चेहरा कोई पढ़ सके तो यह साफ पता लग जायेगा कि वह खुश होने की बजाय आगे के लिये चिंत्तन कर रहे हैं।
              देश में अच्छे या बुरे अवसर पर मोमबत्तियां जलाकर अपने दुःख और खुशी की भावनाऐं व्यक्त का प्रचलन पश्चिम के आधार पर शुरु हो गया है पर यह बौद्धिक चिंत्तन के अभाव का प्रतीक है। कोई भी जनआंदोलन नारों के इर्दगिर्द सिमट जाता है तब उसमें गंभीर बदलाव की सोच नहीं दिखती है इसलिये वहां घोषणायें ही सफलता मान ली जाती हैं भले ही वह प्रत्यक्ष रूप से परिणाम के रूप में प्रकट नहीं होती। ऐसे में देश में जो भ्रष्टाचार पनपा है वह समाज में चेतना और आत्मविश्वास की कमी का परिणाम है। यह बात अन्ना हज़ारे जानते हैं और शायद यही कारण है कि वह भविष्य की रूपरेखा तैयार करने में लग गये हैं। वह जानते हैं कि भले ही प्रचार माध्यम अपने विज्ञापनों के लिये उनकी जीत पर मोमबत्तियां जलती दिखाने के साथ विश्व कप में बीसीसीआई की टीम की-जिसे भारत का ही प्रतिनिधि मान लिया जाता है-विश्व विजय से तुलना कर रहे हैं पर यह सब चौंचले हैं। उनके जनआंदोलन को गंभीर दौर से गुजरना बाकी है। जब देश में बदलाव लाने की बात हो रही हो तो गंभीर चिंत्तन तथा सतत सक्रियता ही कोई नतीजा दे सकती है।
                   अभी अन्ना हजारे जी के आंदोलन पर अधिक लिखना ठीक नहीं लगता क्योंकि हमें परिणामों का इंतजार रहेगा। यह परिणाम मिलने में भी अभी समय लग सकता है। मांगों को पूरी करने की घोषणा तथा परिणामों के बीच एक बहुत लंबा मार्ग है। अन्ना हजारे के साथ आंदोलन में बहुत सारे लोग खड़े हैं पर सवाल यह है कि उनमें से कौन कौन उपनेतृत्व की भूमिका निभा रहे हैं। वह लोग कौन है जो जननेता की छवि रखने वाले अन्ना हज़ारे जी के प्रवक्ता और प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय हैं। एक जन आंदोलन चलाने वाले नेता को ऐसा संगठन रखना पड़ता है। इस उपनेतृत्व की कार्यशैली आंदोलन की गतिविधियां प्रभावित होती है और ऐसे में मुख्य नेता के प्रबंधकीय कौशल की भी परीक्षा होती है कि वह कैसे उन पर सतत नियंत्रण करता है। जननेता वही बनता है जो वास्तव में समाज हित को समर्पित होने के साथ ही ईमानदार होता है पर जब वह बदलाव के लिये आंदोलन चलाता है तो उसे अपने सांगठनिक ढांचे को अपने सिद्धांतों के अनुरूप चलाने के लिये प्रबंधकीय कौशल का परिचय देना पड़ता है।
                  अन्ना हजारे ने स्वयं माना है कि जब वह महाराष्ट्र से दिल्ली आये तब उनको यह आशा बिल्कुल नहीं थी कि उनका आंदोलन पूरे देश में फैल जायेगा। हम जब उनको मिले जनसमर्थन की बात करते हैं तो वह केवल बौद्धिक समुदाय के इर्दगिर्द सिमटा दिखता है। आम आदमी के लिये हजारे कोई अच्छा कर रहे हैं पर क्या? उसे समझाना जरूरी है। वह परिणाम चाहते है। वह बदलाव की बयार तुरंत बहते देखना चाहते हैं और हम यह तो मानेंगे कि उसका समय अभी नहीं आया। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीत की घोषणा तो हो गयी पर उसे परिणाम के रूप में प्रकट होना शेष है। अन्ना सीधे, सच्चे और मस्त इंसान है। उनकी दृढ़ता प्रभावित करती है पर राजनीतिक कौशल का प्रमाणित होना बाकी है। अभी आंदोलन की शुरुआत है और उसके संगठन में अन्ना हज़ारे की बाद वाली पंक्ति के लोगों की योग्यता और बुद्धि के साथ ईमानादारी का प्रमाणित होना बाकी है। हमने जो नाम देखे हैं उनपर विवाद होना की संभावना पूरी है। वह कहीं न कहीं वर्तमान व्यवस्था से जुड़े हैं। कुछ लोग यह पूछ भी रहे हैं कि दूसरी पंक्ति के नेताओं की नियुक्ति क्या अन्ना हजारे ने की है या उपवास की कमजोरी के चलते कुछ लोगों ने अपने आप को स्थापित कर लिया है। याद रखें वह सभी लोग वर्तमान व्यवस्था से जुड़े रहकर लाभ लेते रहे हैं और उसमें मूल परिवर्तन की इच्छा अभी प्रमाणित नहीं है। ऐसे में इस जनआंदोलन के प्रति सशंकित हो सकते हैं पर निराशा नहीं  क्योंकि अभी तो बहुत सारे तूफानों से इस आंदोलन का गुजरना है फिर आज के शक्तिशाली प्रचार युग में कुछ छिपता नहीं है।
                       बहरहाल अन्ना हजारे के आंदोलन का मुंह खुला तो बहुत सारे जनआंदोलन उभरेंगे। कई नये चेहरे आयेंगे। अन्ना हजारे की मांगे मान लेने को विजय मान लेना सतही बौद्धिक चिंत्तन का प्रमाण है पर उनके साथ जो गंभीर चिंतक हैं वह खामोशी से सब देख रहे हैं। जो हाथ हिलाकर हिलाकर नाच रहे हैं उन्हें यह शायद अंदाज नहीं है कि आगे अभी और लड़ाई है। यहां अन्ना और उस संगठन के बीच अंतर की चर्चा नहंी की जिसके लोग उनके अनशन का लाभ उठाकर जनप्रतिनिधि बन गये हैं। ऐसा लगता है कि अन्ना एक व्यक्ति की तरह दिल्ली आये और उनके अनशन का नाम पर एक स्वयं सेवी संगठन उनका पिछलग्गू बनकर आगे आ गया। इस तरह एक जन आन्दोलनकारी नेता को पहले से ही मौजूद संगठन स्वाभाविक रूप से मिल गया हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है पर इतना जरूर बता दें कि अन्ना हजारे एक आंदोलन है और उनका संगठन उसका प्रतिनिधि बन गया है पर जब यह आंदोलन बढ़ेगा तब अन्ना की बात ही अंतिम होगी न कि उनके संगठन की। यह सही है कि यह संगठन बहुत समय से भ्रष्टाचार के विरुद्ध जूझ रहा है पर वह अन्ना हजारे नहीं है। अन्ना हजारे के साथ देश के जागरुक लोग जुड़े हैं वह उन्हीं की राय को अंतिम मानेंगे। ऐसे में उनकी राय देखकर ही आगे चलें यही अच्छा रहेगा। इस पर शेष आगे के लेखों में।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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