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5/14/11

क्रूर सजाओं से ही नारियों के प्रति अपराध रोकना संभव-हिन्दी लेख (crime against women and punishment-hindi article or lekh)

                  ईरान में अपनी प्रेमिका के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने वाले एक शख्स की आंखें फोड़ दी गयी हैं। ऐसा वहां की न्यायपालिका की सजा के आधार पर किया गया है। आमतौर से ईरान को एक सभ्य राष्ट्र माना जाता है और वहां ऐसी बर्बर सजा देना आम नहीं है। अलबत्ता कभी कभी धर्म आधार पर वहां ऐसे समाचार आते रहते हैं जिसमें सजायें दिल दहलाने वाली होती हैं। उनकी खूब आलोचना भी होती है। वहां की धर्म आधार व्यवस्था के अनुसार चोरी की सजा हाथ काटकर दी जाती है। इससे कुछ लोग सहमत नहीं होते। खासतौर से जब कोई बच्चा रोटी चुराते पकड़ा जाये और उसको ऐसी सजा देने की बात सामने आये तब यह कहना पड़ता है कि यह सजा बर्बर है। अपना पेट भरना हर किसी का धर्म है इसलिये धन चुराने और रोटी चुराने के अपराध में फर्क किया जाना चाहिए। मानवीय आधार पर कहें तो मजबूरीवश रोटी चुराना अपराध नहीं माना जा सकता।
अपनी प्रेमिका की आंखें फोड़ने वाले आशिक की आंखें फोड़ने की सजा को शायद कुछ लोग बर्बर मानेंगे पर सच बात यह है कि इसके अलावा अब कोई रास्ता दुनियां में नज़र नहीं आता। बात चाहे ईरान की हो या भारत की हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते क्रूर अपराधों की अनदेखी नहीं कर सकते। अब यहां पर कुछ मानवाधिकारी विद्वान दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। वह कहते हैं कि क्रूर सजा अपराध नहीं रोक सकती। अलबत्ता ऐसा दावा करने वाले फंासी जैसी सरल सजा पर ही सोचते हैं। फांसी से आदमी मर जाता है उसके बाद उसका कोई दर्द शेष नहीं रह जाता। हाथ काटना या आंख फोड़ना मनुष्य के लिये मौत से बदतर सजा है इस बात को पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित विद्वान नहीं जानते। कम से कम स्त्रियों के प्रति क्रूर अपराध रोकने के लिये ऐसी सजायें तो अपनानी होंगी।
                 हम एशियाई देशों में स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों को देखें तो ऐसी क्रूर सजाओं को अलावा कोई रास्ता नज़र नहीं आता। एशियाई देशों के अ्रग्रेजी संस्कृति समर्थक विद्वान अक्सर पश्चिमी और पूर्वीै समाज में अंतर नहीं करते। वह सोचते है कि जिस तरह वह पश्चिमी संस्कृति में ढले है वैसे ही पूरा एशियाई समाज भी हो गया है। हम शहरी भारतीय समाज को देखें तो यहां स्पष्टतः दो भागों में बंटा समाज है। एक तो वह जो पाश्चात्य ढंग का पहनावा अपनाने के साथ ही विचारधारा भी वैसी रखते हैं। दूसरा वह जो दिखता तो पश्चिमी सभ्यता से रंगा है पर उसकी मानसिकता ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली है। ऐसे नवपश्चात्यवादी उसी तरह ही खतरनाक हो रहे हैं जैसे कि नवधनाढ्य! हम ग्रामीण परिवेश में रहने वाले समाजों के लोगों की बात करें तो उनमें भी कुछ लोग नारियों के प्रति क्रूरता का व्यवहार करते हैं पर वह मारपीट तक ही सीमित होते हैं या हथियार से मारकर एक बार ही दर्द देने वाले होते हैं। जबकि नवपाश्चात्यवादी तेजाब फैंककर या बलात्कार ऐसी सजा स्त्री को देते हैं जो उसकी जिंदगी को मौत से बदतर बना देती हैं। पश्चिमी विचारधारा के विद्वान इस बात को नहीं देखते।
                    दूसरी यह भी बात है कि पाश्चात्य देशों की समशीतोष्ण जलवायु की बनिस्बत एशियाई देशों की ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण हमारे यहां के लोगों के दिमाग भी अधिक गर्म रहते हैं। ऐसा नहंी है कि पाश्चात्य देशों में स्त्रियों के प्रति अपराध नहीं होते पर वहां तेजाब डालकर असुंदर या अंधा बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी नहीं मिलती जबकि हमारे भारत में निरंतर ऐसी घटनायें हो रही हैं। हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों के कारणों पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि अब कठोर सजाओं की नहीं बल्कि क्रूर सजाओं की आवश्यकता है।
             हमारे देश में कुछ ऐसे कारण हैं जो देश में महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ा रहे हैं।
           1.कन्या भ्रुण हत्याओं की वजह से लिंग संतुलन बिगड़ा है, जिससे विवाहों के लिये सही वर वधु का चुनाव कठिन होता जा रहा है। जिससे युवाओं को बड़ी उम्र तक अविवाहित रहना पड़ता है। लड़कियों की शादी में दहेज भी एक समस्या है।
           2.ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण पश्चिम के समशीतोष्ण जलवायु में रहने वालो लोगों की बनिस्बत कामोतेजना यहां के लोगों में ज्यादा है।
           3.कानून का भय किसी को नहीं है। आजीवन कारावास से अपराधियों को कोई परेशानी नहंी है और फांसी मिल जाये तो एक बार में सारा दर्द खत्म हो जाता है। फांसी मिल भी जाये तो पहले तो बरसो लग जाते हैं और मिलने वाली हो तो मानवाधिकार कार्यकर्ता नायक बना देते हैं।
           4.हमारे मनोरंजन के साधन कामोतेजना के साथ ही पुरुष के अंदर पुरुषत्व का अहंकार बढ़ाने तथा नारी को उपभोग्या की मान्यता स्थापित करने वाले प्रकाशन और प्रसारण कर रहे हैं।
                कहने का अभिप्राय यह है कि जिस तरह कुछ नवपाश्चात्यवादी अपने आधुनिक होने के अहंकार तथा घर के बाहर की नारी को उपभोग की वस्तु मानकर चल रहे हैं उनके अंदर भय पैदा करने के लिये ऐसी क्रूर सजाऐं जरूरी हैं। यहां स्पष्ट कर दें कि पश्चिमी विद्वान यह दावा करते हैं कि कठोर सजाओं से अपराध नियंत्रित नहीं होते पर क्रूर सजाओं के बारे में उनकी राय साफ नहीं है हालांकि तब वह मानवाधिकारों की बात कर उसे विषय से भटका देते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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3/1/11

क्रिकेट मैच का टाई होना-हिन्दी लघु व्यंग्य (tie cricket match-hindi satire article)

अरे यह क्या? बीसीसीआई और इंग्लैंड की टीम के बीच विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता में खेले गये एक मैच की समाप्ति से पहले ही आस्ट्रेलिया के पूर्व स्पिनर शेन वार्न ने अपने ट्विटर पर भविष्यवाणी कर दी थी की मैच टाई होगा-यह जानकारी इंटरनेट की एक पत्रिका ने दी है। मैच के हारने जीतने की भविष्यवाणी तो कोई भी कर सकता है पर टाई, बराबर या अनिर्णीत होने की बात करने का दावा! वह भी सच निकले। वह भी ऐसे अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी की भविष्यवाणी जिसके बारे में कहा जाता है कि वह आनॅलाईन सट्टा चलाता है। यह मामला चौंकाने वाला है।
क्रिकेट के पीछे फिक्सिंग का भूत हमेशा ही पड़ा रहता है। इस भूत को खड़ा भी वही लोग करते हैं जो स्वयं इससे पैसा कमाते हैं। शेन वॉर्न अगर क्रिकेट नहीं खेलता तो शायद उसे दुनियां में कोई नहीं जानता। विश्व क्रिकेट प्रतियोगता 2011 में बीसीसीआई और इंग्लैंड की टीम के मैच के टाई होने की भविष्यवाणी की और ऐसा हुआ भी। एक पत्रिका में ही हमने पढ़ा था कि वह बाकायदा क्रिकेट पर ऑन लाईन सट्टा चलाता है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या वह अपने ट्विटर पर सट्टा लगाने वालों को कोई संदेश दे रहा था या अपनी वेबसाईट पर ऐसा कोई खेल कर रहा था जिसे कोई भारत में समझ नहीं पा रहा।
वैसे सामने गोरी टीम थी तो लोग शायद इस पर यकीन न करें कि उन्होंने ट्ाई फिक्स की होगी। यहां के लोगों का गोरों पर अंधा विश्वास है, पर हमारा मानना है कि वह दिन गये जब गोरों की छवि ईमानदार की थी। अब तो हमें यह भी शक होता है कि पाकिस्तान के जिन तीन खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग में लंदन में धरा गया वह भी एक फिक्स मामला था। इसका उपयोग भारतीय उपमहाद्वीप में 2011 में हो रहे विश्व कप क्रिकेट टूर्नामेंट में यह संदेश देने के लिये किया गया कि अब सारे मैच साफ सुथरे होंगे। इसके अलावा पकड़े गये एक खिलाड़ी की पोल उसकी पूर्व प्रेमिका से खुलवाई गयी। वह पाकिस्तान की एक अभिनेत्री है जिसे बाद में भारत के एक टीवी चैनल के बिग बॉस कार्यक्रम के लिये चुना गया। क्रिकेट वालों से पंगा लेकर भी वह भारतीय टीवी चैनल के कार्यक्रम में आयी, उसी समय शक हो गया था कि कहीं कुछ गड़बड़ है। देखा जाये तो क्रिकेट और मनोरंजन के खैरख्वाह एक ही हैं ऐसे में यह कैसे संभव है कि एक क्षेत्र को बदनाम करने वाला दूसरे में पांव जमा ले। अब वही अभिनेत्री फिर बिग टॉस कार्यक्रम करने यहां आयी है। उसकी छवि बनी इसलिये थी कि उसने एक अपराध क्रिकेट खिलाड़ी की पोल खोली थी।
मामला फिक्स न लगे इसलिये गोरी पुलिस को बीच में लाया गया। उसने तीन पाकिस्तानी खिलाड़ी पकड़े या उससे पकड़वाये गये यह कहना कठिन है पर इतना तय हो गया कि क्रिकेट में अभी फिक्सिंग यथावत है। अब यह शेन वार्न की भविष्यवाणी सामने आयी है। कुछ लोग उसकी तुलना उस समुद्री जीव ऑक्टोपस बाबा से कर रहे हैं जिसके बारे में कहा गया कि उसने विश्व कप फुटबाल प्रतियोगिता में सही भविष्यवाणी की। एक बात याद रखने लायक है कि उस कथित बाबा की चर्चा भी अनेक मैचों के बाद प्रारंभ हुई थी। अब शेनवार्न भी बाबा के भेस में आ गये हैं। गोरे हैं तो विश्वसीय तो माने ही जायेंगे पर यहां अंग्रेज गोरे क्रिकेट खिलाड़ी शक शुबहे में आ गये हैं। अंपायर भी गोरे थे। हैरानी इस बात की है कि उन्होंने ऐसा क्या गुणा भाग बिठाया कि मैच टाई हो गया और उसके फिक्स होने का आभास तक नहीं हुआ। इन गोरे अंपायरों ने ब्रिटेन के एक खिलाड़ी को पगबाधा नहीं दिया तो एक खिलाड़ी के आउट होने की अपील भारतीय खिलाड़ियों ने नहंी की। हो सकता है कि भारतीय खिलाड़ियों को मतिभ्रम हुआ हो पर जब एक खिलाड़ी को पगबाधा आउट होने की अपील तीसरे अंपायर की तरफ बढ़ायी गयी तो उसने टीवी देखकर भी गलत निर्णय दिया जबकि यह दृश्य पूरी दुनियां को दिखाई दिया कि वह गोरा खिलाड़ी आउट था।
इसके बावजूद भी यह यकीन नहीं होता कि कभी मैच टाई फिक्स हो सकता है। अगर शेन वार्न की भविष्यवाणी को मैच के पहले ही फिक्स होने की बात सोचें तो मानना पड़ेगा कि क्रिकेट खेल में गजब के अभिनेता और निर्देशक आ गये हैं। इतना कि जो मानते हैं कि सारे मैच फिक्स होते हैं वह भी इस मैच को फिक्स नहीं मानेंगे। अब ऑक्टोपस के नये अवतार शेन वार्न पर सारी दुनियां की नज़रे रहेंगी। हर मैच के खत्म होने के एक घंटै पहले उनको ट्विटर पर ढूंढा जायेगा। खासतौर से वह लोग जो क्रिकेट मैचों पर दाव लगाते हैं। ऐसे लोग इस देश में कम नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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11/30/10

विकिलीक्स के मनोरंजक खुलासे-हिन्दी लेख (wikileeks ke manoranjak khulase-hindi lekh)

हमारे देश में ऐसी बहुत बड़ी आबादी है जिसकी दिलचस्पी अमेरिका में इतनी नहीं है जितनी प्रचार माध्यम या विशिष्ट वर्ग के लोग लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जनसामान्य जागरुक नहीं है या समाचार पढ़ने या सुनने के उसके पास समय नहीं है। दरअसल देश के प्रचार माध्यम से जुड़े लोग यह मानकर चलते हैं कि गरीब, ठेले वाले, खोमचे वाले या तंागे वाले उनके प्रयोक्ता नहीं है और इसलिये वह पढ़े लिखे नौकरी या व्यवसाय करने वालों को ही लक्ष्य कर अपनी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यह उनका अज्ञान तथा अव्यवसायिक प्रवृत्ति का परिणाम है। शायद कुछ बुद्धिमान लोग बुरा मान जायें पर सच यह है कि समाचार पढ़ना तथा राजनीतिक ज्ञान रखना गरीबीया अमीरी से नहीं जुड़ा-यह तो ऐसा शौक है जिसको लग जाये तो वह छूटता नहीं है। चिंतन क्षमता केवल शिक्षित या शहरी लोगों के पास होने का उनका विचार खोखला है। कई बार तो ऐसा लगता है कि ग्रामीण और शिक्षित वर्ग का ज्ञान कहीं  अधिक है। सीधी बात कहें तो अमेरिका ने 1971 में भारत पाक युद्ध के समय अपना सातवां बेड़ा भारत के खिलाफ उतारने की घोषणा की थी और यह बात आज भी आम भारतीय के जेहन में है और वह उस पर यकीन नहीं करता। विकिलीक्स से बड़े शहरों के बुद्धिजीवी चौंक गये हैं पर उनमें कुछ ऐसा नहीं है कि आम भारतीय जनमानस प्रभावित या चिंतित हो।
विकिलीक्स ने अमेरिकी सरकार के गोपनीय दस्तावेजों का खुलासा किया है। यह एक बहुदेशीय वेबसाईट है। अनेक पत्रकार इसमें अपने पाठ या पोस्ट रखते हैं और उनकी जांच के बाद उनको प्रकाशित किया जाता है। अपनी भद्द पिटते देखकर अमेरिकी सरकार इसके विरुद्ध कार्यवाही करने में लगी है। वह अन्य देशों से इसे अनदेखा करने का आग्रह कर रही है। दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रचार की जिम्मेदारी लेने वाले अमेरिकी रणनीतिकार अब ठीक उलट बर्ताव कर रहे हैं।
अमेरिका की विदेश मंत्री हेनरी क्लिंटन ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारत के दावे का मखौल उड़ाने के साथ ही हमारे देश के विशिष्ट वर्ग की जासूसी करने को कहा है। बात तो यह है कि अमेरिका अपनी आर्थिक विवशताओं के चलते ही भारत को पुचकार रहा है वरना उसकी आत्मा तो खाड़ी देश और उनके मानस पुत्र पाकिस्तान में ही बसती है। इसलिए अपनी साम्राज्यवादी भूख मिटाने तथा हथियार बिकवाने के लिये पाकिस्तान को भी साथ रख रहा है। अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में फैले आतंकवाद से निपटने में भारतीय हितों की उसे परवाह नहीं है। उसका दोगलापन कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर चौंका जाये। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता भी अब कितनी प्रासंगिक है यह भी हमारे लिये विचार का विषय है। ब्राजील, जापान, जर्मनी के साथ भारत को इसमें स्थाई सदस्यता दी भी गयी तो उसमें वीटो पॉवर का अधिकार मिलेगा इसमें संदेह है-कुछ प्रचार माध्यमों में इस आशय का समाचार बहुत पहले पढ़ने को मिला था कि अब नये स्थाई सदस्यों को इस तरह का अधिकार नहीं मिलेगा। बिना वीटो पॉवर की स्थाई सदस्यता को कोई मतलब नहीं है। यह अलग बात है कि अमेरिकी मोह में अंधे हो रहे प्रचार कर्मी उसकी हर बात को ब्रह्म वाक्य की तरह उछालते हैं। तब ऐसा भी लगता है कि वह अपने देश के जनमानस की बजाय पश्चिमी अप्रवासी भारतीयों को लिये अपने प्रसारण कर रहे हैं। अभी हाल ही में भारत के सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता पर भी जिस तरह खुश होकर यह प्रचार माध्यम चीख रहे थे वह हास्यप्रद था क्योंकि यह क्रमवार आधार पर नियम से मिलनी ही थी। समाचारों पर बहुत समय से रुचि लेने वाले आम पाठक यह जानते हैं कि अनेक अवसरों पर भारत को यह सदस्यता मिली पर उसकी बात सुनी नहीं गयी।
इस चर्चा में विकीलीक्स के खुलासे चिंतन से अधिक मनोरंजन के लिये है। जिस तरह विदेशी राष्ट्रों के लिये संबोधन चुने गये हैं उससे भारतीय टीवी चैनलों के हास्य कलाकारों की याद आती है। यह अलग बात है कि यह कलाकार पेशेवर होने के कारण अमेरिकी रणनीतिकारों से अधिक शालीन और प्रभावी शब्द इस्तेमाल करते हैं। विकिलीक्स ने अमेरिकी रणनीतिकारों के दोहरेपन को प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया है जो कि एक असामान्य घटना है। अमेरिकी जो कहते हैं और सोचते हैं इस पर अधिक माथा पच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। सच तो यह है कि विकिलीक्स के खुलासे देखकर कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अमेरिका एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बल्कि पूंजीवाद का उपनिवेश है जो व्यापार या बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। चाहे किसी भी देश के पूंजीपति या विशिष्ट वर्ग के लोग हैं अपने क्षेत्र में उसे कितनी भी गालियां देते हों पर अपनी संतान या संपत्ति वहां स्थापित करने में उनको अपनी तथा भविष्य की पीढ़ी की सुरक्षा नज़र आती है। तय बात है कि वह कभी वहां के रणनीतिकारों के निर्देश पर चलते हैं तो कभी उनको चलाते हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों की भी क्या कहने? एक ग्राहक कुछ मांगता है दूसरे से उसकी आपूर्ति करवाते हैं। दूसरा कहे तो तीसरे से करवाते हैं। खुलासों से पता लगता है कि खाड़ी देश दूसरे के परमाणु संयत्र पर अमेरिका को हमले के लिये उकसा रहा है। मतलब यह कि अमेरिका अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा है या पूंजीतंत्र के शिखर पुरुष अपने क्षेत्र में उसे घसीट रहे हैं, यह अब चर्चा का विषय हो सकता है। ऐसे में अमेरिकी रणनीतिकारों के औपचारिक या अनौपचारिक बयानों, कमरे में या बाहर की गयी टिप्पणियों तथा कहने या करने में अंतर की चर्चा करना भी समय खराब करना लगती है।
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9/19/10

क्रिकेट में फिक्सिंग का मौसम और हिन्दी ब्लॉग-हिन्दी व्यंग्य (cricket match and hindi blog-hindi vyangya)

क्रिकेट शुरु हो गयी तो ब्लाग पिटना शुरु हो गये। हिन्दी दिवस के एक दिन पहले अनेक ब्लागों ने जमकर हिट पाये तब कहना पड़ा कि ‘थैंक्स हिन्दी, चलो एक दिन ही सही ब्लागों पर हिट तो दिलवाये। अगले दिन ब्लाग सामान्य स्थिति में लौटे पर फिर अचानक पाठ तथा पाठ पठन संख्या एकदम गिर गयी। समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हुआ? क्या यह तूफान गुज़र जाने के बाद की शांति है-जी हां तूफान आने से पहले शांति होती है तो उसके गुज़र जाने पर भी उन जगहों पर शांति दिखाई देती है जहां इंसान और पशु नहीं बसते। ब्लाग को पिटता देखकर कुछ ऐसा भी लगा कि जैसे तेज बरसात होने के बाद अचानक बंद हो जाती है और धूप निकलते ही गर्मी होने लगती है। उससे फिर बरसात होती है, फिर शीतलता का अहसास होने लगता पर ब्लाग पर अगले कुछ दिनों तक हिन्दी दिवस के एक दिन पूर्व जैसे हिट मिलने की संभावना अब नहींे है क्योंकि क्रिकेट का मौसम कम से कम एक या डेढ़ महीना चलेगा। पिछले तीन वर्षों का अनुभव यह बताता है कि हिन्दी अंतर्जाल का हिन्दी पाठकों एक बहुत बड़ा वर्ग उस समय कम हो जाता है जब कोई क्लब स्तरीय प्रतियोगिता-चाहे वह भारत में हो या बाहर-होती है।
इधर पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों का भी फिक्सिंग का मौसम चल रहा है। एक मैच से निकलते नहीं है कि दूसरा मैच फिक्स कर लेेते हैं। उन्होंने फिक्सिंग के नये नये तरीके ईजाद कर लिये हैं। हर बाल पर फिक्सिंग करने का उन्होंने जो तरीका निकाला है वह नया जरूर लगता है पर इसका अनुमान क्रिकेट के कुछ जानकार आम लोग पहले ही कर चुके थे जब अखबारों में यह समाचार आया था कि अब सट्टेबाज किसी मैच की बजाय उसकी गतिविधियों पर ही दांव खिलवायेंगे। जहां दो देश मैच खेलते हैं वहां की जनता की भावनायें भी जुड़ जाती हैं और जब पोल खुलती है तो खिलाड़ियों की इज्ज़त धूल मे मिल जाती है इसलिये उसकी गतिविधियों पर ही दांव खेले जाते हैं। फिर अंतर्राष्ट्रीय मैचों में खिलाड़ियों पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाये गये कि मोबाईल नहीं रख सकते या किसी से मिल नहीं सकते। इसलिये क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया-जिसमें खिलाड़ी अपनी मर्ज़ी के खुद मालिक होते हैं।  प्रचार माध्यमों ने उनका पूरा साथ देकर इन क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं को लोकप्रिय बना दिया ताकि उनको विज्ञापन से धन तथा विषय सामग्री प्रस्तुत करने के लिये दृश्य मिलते रहें-टीवी समाचार चैनलों का एक में से आधा घंटा क्रिकेट के दृश्यों तथा चर्चा पर ही आधारित होता है। अब इन पर सट्टा तो लगता है पर चूंकि इससे कोई भावनायें नहीं जुड़ी हैं इसलिये कोई ध्यान नहीं देता। ऐसे भी समाचार आये कि इन प्रतियोगिताओं के अनेक मैच फिक्स होते हैं पर कोई बावेला नहीं मचता।
बीस ओवरीय पद्धति पर आधारित इन मैचों के लिये दर्शक अब एक दिवसीय मैचों से अधिक हो गये हैं। इतना ही नहीं लोग राष्ट्रप्रेम की भावना से परे होकर केवल चौके छक्के देखने में मशगूल हो जाते है। सभी लोग दांव नहीं खेलते पर कुछ लोग तो शायद ऐसे हैं जिनका खेल में कम अपने लाभ में अधिक ध्यान रहता है। स्पॉट फिक्सिंग’ यानि मौके पर दांव लगाने के प्रचलन से खिलाड़ियों के साथ ही उनके अदृश्य प्रायोजकों को भी फायदा है। दूसरी बात यह कि फंस जाने पर आम जनता से नाराजगी का खतरा भी नहीं है। कह सकते हैें कि ‘हमने कोई देश की प्रतिष्ठा थोड़े ही दांव पर लगायी है।’
पिछली बार भारत में हुई क्लब स्तरीय प्रतियोगिता को लेकर इतना बावेला बचा। अनेक सरकारी विभाग सक्रिय हुए। राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट नियंत्रण करने वाले संगठन आग बबूला होते दिखे मगर नतीजा ढाक के तीन पात। एक मुर्गा है पाकिस्तान जिसको चाहे हलाल कर लिया जाता है क्योंकि वह आतंकवाद के नाम पर भी वैसे भी बदनाम है। अभी एक विदेशी अखबार ने दावा किया था कि दुनियां भर के 29 खिलाड़ी स्पॉट फिक्ंिसग में शामिल हैं और ये उन सभी देशों से संबंधित हैं जो क्रिकेट खेलते हैं। मतलब अकेले पाकिस्तानी इसमें शामिल नहीं हैं-इसका प्रमाण यह भी है कि इस मामले में दलाली करने वाले लोग दुबई और भारत में रहने वाले बताये जाते हैं।
पाकिस्तान का एक खिलाड़ी शाहिद अफ्रीदी काफी जीवट वाला माना जाता है। इंग्लैंड के खिलाफ एक दिवसीय श्रृंखला में कप्तानी करते हुए उसकी टीम दो एक दिवसीय मैच हार गया। पाकिस्तान की यह दोनों हार शक के दायरे में नहीं आयी। तीसरे एक दिवसीय मैच में पाकिस्तान जीता तो वह मैच शक के दायरे में आ गया। बताया गया कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की दौड़ दर यानि रन रेट शकशुबहे वाली है। इस मैच में अफरीदी रन आउट हो गया। हम फिक्स मैच देखने का मज़ा उठाने के ख्याल से आजकल पाकिस्तानियों के मैच देखते हैं पर अफ़रीदी का इस तरह आउट होना अपने को हज़म नहीं हुआ।
गेंद आसमान से उड़ती हुई विकेटकीपर के पास आ रही थी और अफ़रीदी बल्ला हवा में लहराते हुए दौड़ रहा था जैसे मन ही मन ही दुआ कर रहा हो कि विकेटकीपर जल्दी उसे आउट कर दे जिससे बाहर बैठे उसके अदृश्य प्रायोजक खुश हो जायें। फिर भी दौड़ने में कुछ जल्दी कर गया। वह तो गनीमत है कि तीसरे कैमरे की आंख ने उसे आउट न होने से बचा लिया। जब गेंद विकेट में लगी अफ़रीदी का बल्ला अंदर पर हवा में था। अफरीदी को संदेह का लाभ मिलने का खतरा था जो टल गया। कम से कम पाकिस्तानियों ने इस बार फिक्सिंग में देश भक्ति दिखाई और मैच जीत लिया। सारी दुनियां को भी बता दिया कि स्पॉट फिक्ंिसग के बावजूद मैच जीता जा सकता है। अन्य देशों के खिलाड़ी उससे सीख सकते हैं।
मैच समाप्ति पर जब इनाम बंट रहे थे तब उद्घोषक ने अफ़्रीदी से पूछा गया कि ‘क्या वह सुस्त दौड़ से रन आउट हुआ?’
उसने कहा-‘हां!
हमें यह सुस्ती भी उस समय फिक्स लगी थी जब वह दिखाई गयी थी। अब तो पूरा मैचा ही संदेह के घेरे में आ गया है। वैसे फिक्स मैच देखने में भी मज़ा है यह पहली बार पता चला। हमें यह पता था कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों के पास इस मैच में जीतने के अलावा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि पहले दो मैच हारने के बाद यह तीसरी हार बाकी श्रृंखला का मज़ा खराब कर देती। ऐसे में स्पॉट फिक्सिंग या रन रेट फिक्सिंग  में दांव लगाने वाले लोगों की संख्या कम हो जाती। लोग अक्सर एक सवाल पूछते हैं कि आखिर पाकिस्तानी खिलाड़ी ही क्यों फिक्ंिसग में फंसते हैं। इसका सीधा जवाब यह है कि उनके पास न तो विज्ञापन हैं न ही रैम्प में नाचने की सुविधा। अपने पड़ौसी देश भारत तथा मित्र देश श्रीलंका के खिलाड़ियों के मुकाबले उनके पास धन केवल इसी रास्ते आ सकता है। दूसरी बात यह कि वह मैच जीतने की कुब्बत रखते हैं इसलिये उनका हारना भी बिक जाता है। रन आउट होना फिक्स किया तो क्या मैच भी तो जीता। ऐसे कुब्बत भला कोई दूसरे देश के खिलाड़ी दिखा सकते हैं? पाकिस्तानियों को जीत भी फिक्स करना आती है! भला कौन उनकी इस चालाकी को चुनौती दे सकता है। एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि उनकी फिटनैस पर कोई सवाल नहीं उठाता जबकि भारतीय टीम में कभी पांच छह खिलाड़ियों के अनफिट होने की बात कही जाती है। इसका प्रमाण है कि 40 बरस के उनके कौच गैरी कर्स्टन ने स्टेडियम में छह चक्कर लगाये जबकि भारतीय धुरंधर एक दो में ही हांफने लगे थे। यह बात प्रचार माध्यम ही बताते हैं। पाकिस्तानियों के हारने के साथ जीतने का भी अभ्यास करना है इसलिये वह फिटनेस का ध्यान रखते होंगे। यही कारण है कि उन्होंने भीष्म पितामह की तरह अपनी इच्छा के बिना न हारने और न जीतने का वरदान ले लिया है।
आखिरी सवाल यह है कि कहीं तीसरे मैच में हारना कहीं गोरों ने भी तो फिक्स नहीं किया था? दोनों टीमों के खेल से तो ऐसा ही लगता है कि परिणाम का निर्धारण पाकिस्तानी ही कर सकते हैं। इस मामले में उनको चुनौती मिल सकती है तो आस्ट्रेलिया की टीम ही है जिसके कुछ खिलाड़ी हमेशा ही संदेह के दायरे में रहते हैं।
वैसे प्रचार माध्यमों में किसी प्रतियोगिता या मैच के बाद ही फिक्सिंग की चर्चा होती है। तब लगता है कि हमने वक्त बरबाद किया। वैसे यह मानकर चला जाये कि सारे मैच फिक्स होते हैं तो फिर उनको निष्काम भाव से देखा जा सकता है क्योंकि तब जीत की खुशी के भ्रम या हार के तनाव से आदमी मुक्त होता है। रहा ब्लागों के पिटने का सवाल तो क्लब स्तरीय प्रतियोगताओं के समय यह होना ही था। अलबत्ता हमें इन प्रतियोगताओं का ध्यान तब आता है जब ब्लाग पिटने लगते हैं और उसका देखते हुए चिंता लगती है। अब तो यह मान लिया है कि फिक्सिंग का मौसम हमारे ब्लाग के लिये विश्राम का मौसम होता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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8/27/10

किसान आंदोलनःज़मीन बचाना है या मुआवज़ा बढ़वाना-हिन्दी लेख (kisan andolan aur zamim ka muavaja-hindi lekh)

देश में चल रहे विभिन्न किसान आंदोलनों को लेकर टीवी समाचार चैनलों और समाचार पत्रों में आ रहे समाचार तथा चर्चायें दिग्भ्रमित करती हैं। समाचारों का अवलोकन करें तो संपादकीयों तथा चर्चाओं का उनसे कोई तारतम्य नहीं बैठता। सिद्धांतों और आदर्शों की बात करते हैं पर उनका मुद्दे से कोई संबंध नहीं दिखता। अगर गरीब किसानों को उनकी जमीन का सही मूल्य दिलाने की बात हो रही है तो फिर कृषि योग्य भूमि का महत्व किसलिये बखान किया जा रहा है? अगर पूरी बात को समझें तो लगता है कि ऐसे किसानों को भी आगे लाकर समूह में जुटाने का प्रयास किया जा रहा है जो जमीन बेचने को इच्छुक नहीं हैं और बेचने के इच्छुक लोगों के साथ मिलाकर बाद में वह स्वेच्छा से इसके लिये तैयार हो जायेंगे। कहीं यह आंदोलन इसलिये तो नहीं हो रहा कि बिखरे किसानों को एक मंच पर लाया जाये ताकि जमीन का कोई टुकड़ा बिकने से न रह जाये।
समाचार कहते हैं कि ‘किसान जमीन का उचित मूल्य न मिलने से नाराज हैं।’ मतलब वह जमीन बेचने के लिये तैयार हैं। अगर उनका आंदोलन उचित मुआवजे के लिये है तो उसमें कोई बुराई नहीं है। दूसरी बात यह भी कि किसी ने जबरन जमीन अधिग्रहण का आरोप नहीं लगाया है। पुराने कानून को बदलने की मांग हुई है पर पता नहीं उसका क्या उद्देश्य है? केवल दिल्ली ही नहीं कहीं भी किसानों का आंदोलन जमीन बचाने के लिये होता नहीं दिख रहा, अलबत्ता उचित मुआवजे की बात अखबारों में पढ़ने को मिली है। इधर चर्चाओं को देखें तो उसमें जमीन को मां बताते हुए उसे निजी औद्योगिक तथा व्यापारिक क्षेत्र को न बेचने की बात हो रही है। बताया जा रहा है कि निजी क्षेत्र केवल उपजाऊ क्षेत्र में ही अपनी आंखें गढ़ाये हुए हैं। आदि आदि।

अब सवाल यह है कि किसान आंदोलन पर चर्चायें उनकी मांगों के न्यायोचित होने पर हो रही हैं या जमीन के महत्व के प्रतिपादन पर! किसान अपनी ज़मीन बेचने के लिए तैयार हैं पर उनको उचित मुआवजा चाहिए तब जमीन को मां बताकर उनको क्या समझाया जा रहा है? आंदोलन से जुड़े कुछ लोग जमीन को लेकर इस तरह हल्ला मचा रहे हैं कि जैसे वह उसे बिकने से बचाने वाले हैं जबकि सच यह है वह उचित मूल्य की बात करते हैं।
हम यहां आंदोलन के औचित्य या अनौचित्य की चर्चा नहीं कर रहे न ही देश में कम होती जा रही कृषि तथा वन्य भूमि से भविष्य में उत्पन्न होने वाले संकटों पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं क्योंकि यह विषय आंदोलन और उसकी पृष्ठभूमि पर होने के साथ ही प्रचार माध्यमों के बौद्धिक ज्ञान पर भी है। अब यह अज्ञानता अध्ययन और चिंतन के अभाव में है या प्रयोजन के कारण ऐसा किया जा रहा है यह अलग विषय है।
जहां जमीनें हैं वहां हजारों किसान हैं जिनमें एक तो वह हैं जो मालिक है तो दूसरे वह भी जो कि कामगार हैं। शहरों में अनेक ऐसे लोग रहते है जो अपनी ज़मीन बंटाई पर देकर आते हैं और हर फसल में अपना हिस्सा उनको पहुंचता है। उनको अगर जमीन की एक मुश्त राशि अच्छी खासी मिल जाये तो वह प्रसन्न हो जायेंगे मगर कामगार के लिये तो सिवाय बेकारी के कुछ नहीं आने वाला। संभव है अनेक कामगार यह न जानते हों और ज़मीन बचाने की चर्चा के बीच वह भी भीड़ में शामिल हो गये हों। फिर कुछ किसान ऐसे भी हो सकते हैं जो अपनी तात्कालिक जरूरतों के लिये एक मुश्त रकम देकर खुश हो रहे हों और वह अगर बढ़ जाये तो कहना ही क्या? ऐसे किसान कोई भारी व्यापार नहीं करेंगे बल्कि अपने घरेलू कार्यक्रमों में-शादी तथा गमी की परंपराओं में हमारे देश के नागरिक अपनी ताकत से अधिक खर्च कर देते है-ही खर्च कर देंगे और फिर क्या करेंगे यह तो उनकी किस्मत ही जानती है। संभव है कुछ किसान ऐसे समझदार हों और वह एक ही दिन में मुर्गी के सारे अंडे निकालने की बजाय रोजाना खाना पंसद करते हों। देश में अज्ञान और ज्ञान की स्थिति है उससे देखकर यह तो लगता है कि कुछ लोग इस आंदोलन को ज़मीन बचाने का आंदोलन समझ रहे हैं जो कि वास्तव में प्रतीत नहीं होता क्योंकि उचित मुआबजा कोई इसके लिये नहीं हो सकता।
जहां तक कृषि व्यवसाय से लाभ का प्रश्न है तो सभी जानते हैं कि छोटे किसानों को खेती करने से इतना लाभ नहीं होता बल्कि उनको अपना पेट पालने के लिये उससे जुड़े व्यवसाय भी करने होते हैं जिनमें पशुपालन भी है। अकेले कृषि के दम पर अमीर बनने का ख्वाब कोई भी नहीं देखता यह अलग बात है कि आयकर से बचने के लिये अनेक अमीर इसकी आड़ लेते हैं। कृषि में आय से स्थिर रहती है और वृद्धि न होने की दशा में किसान कर्ज लेता है। यह कर्ज अधिकतर शादी और गमी जैसे कार्यक्रमों पर ही खर्च करता है। देश की सामाजिक स्थिति यह है कि घर बनाने, शादी और गमी में तेरहवीं में अच्छा खर्च करना सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय माना जाता है। रूढ़िवादिता में होने वाला अपव्यय आदमी करने से बाज़ नहंी आता क्योंकि वह गरीब होकर भी गरीब नहीं दिखना चाहता-अलबत्ता कहीं से कुछ मिलने वाला हो तो अपना नाम गरीबों की सूची में लिखा देगा।
ऐसे में एकमुश्त राशि सभी को आकर्षित कर रही है पर वह बढ़ जाये तो बुराई क्या है? जिनको जमीन से सीधे पैसा मिलना है वह तो इसमें शामिल हो गये पर उनके साथ ऐसे कामगार भी आ गये होंगे जो वहां काम करते हैं। अगर प्रचार माध्यमों में यह ज़मीन बचाने की मुहिम का प्रचार न होता तो प्रदर्शनकारियो की संख्या कम ही होती। फिर देश के अन्य भागों से सहानूभूति भी शायद नहीं मिल पाती। शायद इसलिये ही ‘ज़मीन बचाने’ वाला नारा इसमें शामिल होते दिखाया गया जबकि है नहीं।
अलबत्ता ऐसे किसान जो किसी भी कीमत में ज़मीन नहीं बेचना चाहते वह आंदोलन की छत्रछाया में आ गये हैं और अब उनको किसी किसी तरह आगे भी मुआवजा लेकर ज़मीन छोड़नी होगी। संभव कुछ मूल्य बढ़ जाये पर शायद इसे कम ही इसलिये रखा गया है कि कोई ऐसा आंदोलन चलवाया जाये जिससे सब किसान एक ही छत के नीचे आ जायें। जमीन मां है यह सच है। कृषि योग्य जमीन का कम होना अच्छी बात नहीं है पर मुआबजे के खेल में उसकी चर्चा करना व्यर्थ है। याद रहे यह लेख टीवी चैनलों और समाचार पत्रों के आधार पर लिखा गया है इसलिये हो सकता है सब वैसा न हो पर यह बात उनको साबित भी करनी होगी। अलबत्ता इस विचार से अलग भिन्नता ही सहृदयजनों को हो सकती है पर अंततः एक आम लेखक के पास अधिक स्त्रोत और समय नहीं होता कि वह व्यापक रूप से अन्वेषण कर सके।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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9/24/09

इसरो द्वारा ओशियनसैट-2 सहित सात उपग्रहों का प्रक्षेपण-आलेख (ocianset-2 setelite-hindi article)

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ‘इसरो- ने एक ही दिन में वह भी केवल बीस मिनट में सात उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किये जिसमें प्रमुख रूप से ओशियनसैट-2 भी शामिल है। ओशियनसैट-2 मौसम की जानकारी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा। चंद्रयान-1 की सफलता के बाद इसरो की यह दूसरी बड़ी सफलता है जिससे भारत का नाम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित होगा।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत अंतरिक्ष के रूप में एक महत्वपूर्ण शक्ति बन गया है और इससे उसकी सैन्य शक्ति का अंदाज भी लगाया जा सकता है। अनेक लोग सोचते होंगे कि अंतरिक्ष शक्ति का सैन्य शक्ति से क्या संबंध है तो उन्हें यह समझना चाहिये कि अंतरिक्ष की ताकत ही आजकल किसी भी देश की शक्ति की पहचान है। पहले युद्धों में पैदल सेना और फिर वायुसेना के द्वारा सफलतायें प्राप्त की जाती थीं पर आजकल बिना अंतरिक्ष क्षमता के यह संभव नहीं है। इधर इसरो दूसरा चंद्रयान-2 की तैयारी कर रहा है। इतना ही इसरो दूसरे देशों को भी अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने में मदद कर रहा है। भारत के पास चीन से इस विषय में बढ़त प्राप्त है क्योंकि चीन अभी भी अपना चंद्रयान नहीं भेज पाया है। वैसे भारत का चंद्रयान अवधि से पूरी किये बिना ही अपना अस्तित्व गंवा बैठा पर ऐसे अभियानों में ऐसे विफलता कोई बड़ी चिंता की बात नहीं होती। वैसे भी उसने 95 प्रतिशत काम पूरा कर लिया था। इसी अभियान से विश्व को यह पता लगा कि चंद्रमा पर पानी है।
कहते हैं न कि घर की मुर्गी दाल बराबर-कुछ यही स्थिति हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की अपने देशवासियों के लिये है। आमतौर से हम लोग चीन और पाकिस्तान की सैन्य शक्ति को लेकर चिंतित रहते हैं पर उस समय केवल जल, थल और नभ की शक्ति पर विचार करते हैं। जल, थल और वायु की शक्ति महत्वपूर्ण है पर अंतरिक्ष शक्ति के आगे फीकी लगती हैं। हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की वजह से ही आज हमें महाशक्ति माना जाता है न कि पंरपरागत सैन्य उपलब्धियों से कोई यह सम्मान मिल रहा है।
अभी पिछले दिनों चीनी सेना की घुसपैठ की खबरें आयी थी जिसमें एक चैनल ने बताया कि चीनी सैनिक अपने देश का नाम भारतीय सीमा में दो किलोमीटर तक घुसकर कुछ पत्थरों पर लिखकर चले गये इस कथित समाचार पर एक भारी चिंता व्यक्त की गयी। हालांकि यह खबर प्रमाणित नहीं हुई पर इससे एक बात तो लगती है कि इस देश का बौद्धिक वर्ग के कुछ लोग कितने संकीर्ण ढंग से सोचते हैं।
सच तो यह है कि अब वह समय गया जब कोई सेना कहीं पहुंच गयी तो वहां से बिना लड़े हटती नहीं थी। अब विश्व समाज में एक अघोषित आचार संहिता तो बन गयी है कि किसी भी देश का स्वरूप इतनी आसानी से नहीं बदला जा सकता।
अगर प्रसंग चीन का आया तो पता नहीं आशियान देशों में भारत और चीन के संबंध क्यों भुला दिये जाते हैं? बहुत पहले अखबारों में एक खबर पड़ी थी कि आशियान देशों के घोषणा पत्र में भारत और चीन ने भी हस्ताक्षर किये गये जिसमें सदस्य देशों की वर्तमान सीमाओं में बदलाव को स्वीकार न करने की बात कही गयी थी। पता नहीं बाद में इस पर कोई जानकारी नहीं आई जबकि उसके बाद पाकिस्तान भारत पर आरोप लगाता रहा है कि भारत उसे आशियान का सदस्य नहीं बनने दे रहा है। आशियान ग्रुप में भारत और चीन के साथ सोवियत संघ भी है और पश्चिमी देश उसकी गतिविधियों को बहुत सतर्कता से देखते हैं। वहां चीन भारत के साथ अपने संबंध बेहतर रखता है जिसकी वजह उसकी आर्थिक और राजनीतिक बाध्यताऐं भी हो सकती हैं। यह संबंध ऐसे हैं कि भारत की इच्छा के विरुद्ध पाकिस्तान को उसमें शामिल करने की चीन ने कभी पहल नहीं की।
अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी से दुश्मनी लेकर आज कोई भी देश चैन से नहीं बैठ सकता चाहे वह चीन ही क्यों न हो? कुछ अखबारों में 1962 के भारत-चीन युद्ध का इतिहास भी हमने पढ़ा है जिसमें बताया गया कि चीन अंदर तक घुस आया था पर अमेरिकी दबाव में वह बहुत पीछे हट गया था हालांकि तब भी वह एक बहुत बड़े इलाके पर काबिज रहा। इसका आशय यह है कि कहीं न कहीं चीन भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने टेक सकता है। आज की परिस्थिति में वह एक भी इंच जमीन पर अपना कब्जा नहीं जमा सकता। इसका कारण यह है कि जल, थल, और नभ क्षेत्र में भारतीय सेना चीन से कमतर मानी जाती है पर इतनी नहीं कि चीन उसे रसगुल्ले की तरह खा जाये। वियतनाम में पिट चुका चीन अब इतना साहस नहीं कर सकता कि भारत पर हमला करे। उस युद्ध में चीन की विश्व बिरादरी में बहुत किरकिरी हुई थी। फिर अपने अंतरिक्ष विज्ञान के कारण भारत उसके लिये कोई आसान लक्ष्य नहीं रह गया जिसकी बदौलत भारत विश्व में अपने मित्र बना रहा है।
इस अंतरिक्ष क्षमता की वजह से अमेरिका हमेशा विजेता बनता रहा है यह अलग बात है कि अपनी रणनीतिक गलतियों से जमीनी लड़ाई में फंस जाता है। चीन को पता है कि ऐसी गलतियां किसी भी देश की ताकत कम देती हैं। चीन न केवल अंतरिक्ष विज्ञान में भारत से पीछे हैं बल्कि कंप्यूटर साफ्टवेयर में भी उसकी भारत पर निर्भरता है। हमारे देश के प्रतिभाशाली युवाओं का माद्दा सभी मानते हैं। अपनी जनता में अपनी छबि बनाये रखने के लिये चीन के प्रचार माध्यम भले ही भारत की बुराई करते हैं पर भारत की ताकत को कमतर आंकन की गलती वहां के रणनीतिकार कभी नहीं करेंगे।

इसका सारा श्रेय भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को तो जाता ही है साथ ही निजी क्षेत्र के साफ्टवेयर इंजीनियों को भी इसके लिये प्रशंसा करना चाहिये जिन्होंने पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा लिया है। इस अवसर पर इसरो के वैज्ञानिकों को हार्दिक बधाई और चंद्रयान-2 के भविष्य में सफल प्रक्षेपण के लिये शुभकामनायें।
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6/3/09

इंसान की नस्ल और गुण-आलेख

शायद कुछ समाज सुधारकों को यह बुरा लगे पर सच यही है कि इस धरती पर पैदा हर जीव की नस्ल होती है और उसमें कुछ स्वाभाविक गुण जन्मजात होते हैं जिनमें इंसान भी शामिल है। इंसानों में नस्ल होती हैं यही कारण है कि शरीर विज्ञान के विशेषज्ञ अनेक प्रकार के जींसों की मौजूदगी अलग अलग लोगों में अलग अलग रूप से देखते हैं। हां, इतना अवश्य है कि अन्य जीवों से पृथक इंसान अपनी बुद्धि की व्यापकता के कारण अभ्यास से जन्मजात गुणों से प्रथक गुण भी प्राप्त करता है और दुर्गुणों से मुक्ति भी इनसे मिल जाती है।
जींसों के विषय में इस लेखक के मित्र ने लेख लिखा था उसमेें यह बताया गया था कि किस तरह कुछ जातियों के लोग गोरे और कुछ के काले होते हैं। इतना ही नहीं विचार और काम करने की शैलियां और तरीके भी अलग अलग स्थानों पर होने के बावजूद एक जैसे होते हैं जबकि उनका आपस में कोई संपर्क नहीं होता।
अगर कोई गोरा दंपत्ति ऐसे स्थान पर होता है जहां कालों की बहुतायत है उसके बच्चे भी गोरे होते हैं और कहीं काला दंपत्ति अगर गोरा बाहुल्य इलाके मेें हुआ तो उसका बच्चा भी काला होता है। उस मित्र से लेख पर चर्चा हुई थी तब इस लेखक ने उससे पूछा था कि-‘क्या जलवायु और अन्न जल मनुष्य के मूल स्वभाव को प्रभावित नहीं करता?
उसने कहा कि‘-नहीं।’
लेखक ने पूछा-‘क्या तुम्हारे मेरे स्वभाव में अंतर केवल जाति या नस्ल के कारण है या जलवायु भी इसमें शामिल है। वैसे इस समय हम दोनों एक ही स्थान का अन्न जल ग्रहण कर रहे हैं।’
मित्र हंस पड़ा और उसने कहा-‘शायद दोनो कारण से ही अंतर है। जाति और जन्म स्थान अलग अलग होने से हमारे स्वभाव और विचारों में अंतर हो सकता है।’
फिर कुछ देर बाद चुप रहने के बाद वह बोला-‘शिक्षा प्रणाली और धार्मिक साम्यता के कारण हम दोनों कई मसलों पर एक ढंग से सोचते हैं। कई मसलों पर सहमत हों सकते हैं पर अभिव्यक्ति की शैली में अंतर हो सकता है जो शायद जाति, जलवायु और के साथ हमारे वर्तमान जीवन स्तरों से कहीं न कही जरूर प्रभावित होगा।’
वह स्पष्ट जवाब नहीं दे रहा था पर उसने अपने लेख में जातियों की नस्ल को लेकर कहीं दूसरे स्थान से प्रकाशित लेख उठाकर उस पत्रिका में लिखा था जिसमें इस लेखक का व्यंग्य भी था। वह पत्रिका इस लेखक के पास अल्मारी में जमा है और ढूंढने पर वह लेख लिखने का प्रयास किया जायेगा। वह स्वयं उस लेख का महत्व नहीं समझ सका। उस दिन जब उससे उस लेख की तारीख मांगी तो उसने उस लेख का शीर्षक और विषय बताया जो इस लेखक का था। जब भी नस्ल को लेकर कहीं चर्चा होती है उस मित्र का लेख अक्सर याद आता है। उस लेख में नस्ल से मनुष्य की देह और बुद्धि के प्रभावित होने के सिद्धांत की पुष्टि करते हुए भारत के जातिगत ढांचे की सार्थकता प्रमाणित करने का प्रयास उसमें किया गया था पर लेखक स्वयं उसमें अपनी कोई राय नहीं दे सका।
बहरहाल नस्ल का संबंध देह से इसलिये उससे जुड़ी तीनों प्रकृतियां-बुद्धि, मन और अहंकार-प्रभावित होती हैं पर दूसरा सच यह है कि सभी जगह लोगों का स्वभाव एक जैसा नहीं होता। सभी जगह अपराधी नहीं होते तो सभी पुण्यात्मा भी नहीं होते। धोखा, मक्कारी, अपराध और अनावश्यक रूप से दूसरे को सताने की घटनायें सभी जगह होती है तो बचाने वाले भी सभी जगह होते हैं। हम कहते हैं कि अमुक जगह अमुक जाति, भाषा, क्षेत्र या धर्म से जुड़े लोगों पर हमले हो रहे हैं क्योंकि वह बाहर से वहां आये हैं। इसका आशय यह नहीं है कि सभी लोग हमला कर रहे हैं क्योंकि तब यह सवाल उठ सकता है कि स्थानीय लोगों की सहायता के बिना वहां बाहर के लोग कैसे पहुंच सकते हैं। तय बात है कि वहां एक समूह ऐसा भी है जो उनको अपने स्वार्थ की वजह से वहां रोके रहता है और वह ऐसे हमलों को पसंद नहीं करता।
मनुष्य के स्वभाव में कुछ गुण मूल रूप से होते हैं तो कुछ परिस्थितिजन्य भी उसे ऐसा कार्य कराते हैं जो वह सामान्य हालत में नहीं करता। कई बार वह भीड़ में शामिल होकर ऐसा काम करता है जो वह अकेले वह सोचता भी नहीं। तात्पर्य यह है कि किसी भी घटना को किसी समूह के स्वभाव से जोड़ना एक गलती है। दुनियां में हर देश, भाषा, जाति, धर्म और क्षेत्र में कवि पैदा होते हैं। उन समूहों में भी कवि मिल जाते हैं जिसके सदस्य आक्रामक माने जाते हैं।
इस लेखक का यह अनुभव रहा है कि जलवायु का प्रभाव आदमी के स्वभाव पर अवश्य पड़ता है-जिस मनुष्य का जन्म जिस स्थान पर हुआ है उसकी जलवायु का प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है। उसकी देह की नस्ल कोई भी हो मनुष्य पर जन्म वाले स्थान की जलवायु का प्रभाव अवश्य दृष्टिगोचर होता है। उसके स्वभाव का जाति,भाषा और धर्म से अधिक संबंध नहीं होता। हां, जन्म के बाद इंसान कर्म अपनी बुद्धि के अनुसार वैसे ही करता है जैसा कि उसका अन्न जल होता है। यही बात सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। श्रीगीता का अध्ययन करने से भी इस बात की प्रेरणा मिलती है कि जैसे आदमी भोजन करता है वैसे ही उसकी बुद्धि हो जाती है और फिर कर्म भी उसी के अनुसार होते हैं। ‘गुण ही गुणों को बरतते है’-यह एक ऐसा नियम है जिसको आधुनिक विज्ञान मान्य नहीं करता क्योंकि उसमें उसे धर्म की बू आती है मगर सच यही है। इस देह में जैसा अन्न जल अन्दर जायेगा वैसी ही प्रवृत्ति होगी। अन्न जल से भी दो आशय है-एक तो उसको पाने के लिये धन का स्त्रोत अगर पवित्र नहीं है तो भी उसके सेवन का भी बुरा प्रभाव होगा और दूसरा यह कि अगर वह मांस आदि खाने से भी देह में स्थित बुद्धि भ्रष्ट होने के साथ मन में क्रूरता का भाव पैदा होता है जो अहंकार को बढ़ाता है। उससे आदमी फिर दूसरों की बाह्य देह देखकर ही दूसरे के गुणों और दुर्गुणों का अनुमान करते हुए पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। शायद ‘गुण ही गुणों को बरतते’ का सिद्धांत पूरे विश्व में प्रचारित किया जाये तो लोग यह समझ पायेंगे कि किस तरह उनके समूह के शीर्षस्थ लोग उनको भ्रमित कर आपस में झगड़ा कराते हैं। शेष फिर कभी।
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12/14/08

भारतीय अध्यात्म ज्ञान रूपी हिमालय से निकल सकती है कोई भी धारा-आलेख

एक बात निश्चित है कि धर्म नितांत एक निजी विषय है और उस पर सार्वजनिक विषय पर चर्चा करना केवल एक दिखावा करना लगता है। दूसरी बात यह है कि किसी धर्म की स्थापना या प्रचार का कार्य एक व्यवसाय का रूप ले चुका है और आम आदमी इस बात को समझ गया है और वह इन प्रचारकों को गंभीरता ने नहीं लेता। फिर भी समूह में रहने के अभ्यस्त इंसानों के लिये यह आवश्यक है कि वह भाषा,जाति और धर्म के नाम पर बने समूहों के प्रति निष्ठा जताते रहें ताकि विपत्ति के समय उनकी सहायता की आशा की जा सके।

इन्हीं समूहों में बदलाव आते जाते हैं और कई जगह झगड़े चलते हुए भी उनको रोकना कठिन लगता है। धर्म और अध्यात्म में अंतर है। धर्म मनुष्य को बर्हिमुखी और अध्यात्म अंतर्मुखी बनता है। सारे विवादों के बावजूद एक बात अंतिम सत्य के रूप में सामने आ चुकी है कि भारतीय अध्यात्म ज्ञान में ही वह शक्ति है जिसको ग्रहण और धारण कर कोई भी व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से शक्तिशाली हो सकता हैं। इस अध्यात्म ज्ञान की वजह से हिंदू धर्म निर्मित हुआ है। लंबे समय तक हिंदू धर्म को लेकर अेनक सवाल उठते रहे हैं पर उनके उत्तर में केवल विवाद ही खड़े होते हैं।

इस लेखक ने अपने एक पाठ में लिखा था कि ‘ हिंदी हिदू और हिंदूत्व’ शब्द में एक ऐसा बोध है जिसे धारण कर कोई भी अपने को शक्तिशाली समझने लगता है क्योंकि उसमें एक आकर्षण है। एकतरफ जहां हिंदू धर्म के बचाने और विस्तार करने के प्रयास हो रहे हैं तो दूसरी तरफ उसके नाम पर बने एक बृहद समाज के स्वरूप में बदलाव आते जा रहे हैं जिस पर विद्वान दृष्टिपात नहीं कर पाते। पहला तो यह है कि हमारे समाज में पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव इतना पड़ चुका है कि पता ही नहीं लगता कि हम धर्म या अध्यात्म ज्ञान के विषय में कहां खड़े हैं? धार्मिक कर्मकांड और अध्यात्मिक ज्ञान के के प्रथक होने की अनुभूति नहीं होने के कारण विचारों में भटकाव होता है और यही समाज को भी भ्रमित कर रहा है।

कल एक ब्लाग पढ़ रहा था। उसके लेखक श्री रजनीश मंगला ने जर्मनी में हिंदू मंदिर और अफगान हिंदू मंदिर बने होने की चर्चा अत्यंत दिलचस्प ढंग से उठाई थी। उसमें लिखा गया था कि आतंक से परेशान अफगानी हिंदुओं ने जर्मनी में पनाह ली और वहां उन्होंने आकर्षक मंदिरों का निर्माण कराया है। मंदिर मनाने के मामले में वहां भारतीय हिंदूओं के मुकाबले अफगानी हिंदू आगे हैं। किसी उत्सव पर भारतीय हिंदू मंदिर के मुकाबले अफगानी हिंदू मंदिर में कम ही भीड़ होती हैं। अफगानी मंदिर कर्ज लेकर बनाये गये हैं जिसकी वापसी किश्तों में की जा रही है। उन मंदिरों में पुजारी भारत के ही हैं।
अफगानियों के मंदिरों पर ही लिखा गया है ‘अफगानी हिंदू मंदिर’। रजनीश मंगला ने इस आलेख में सवाल उठाया कि क्या अफगानी हिंदू मंदिरों से कभी अफगानी हट जायेगा या कोई ःअफगानी हिदू विचारधारा के रूप में अलग धारा बहेगी। रजनीश मंगला के इस आलेख को दो बार मैंने पढ़ा क्योंकि उसमें मेरी दिलचस्पी बहुत थी। जहां तक अलगा धारा का प्रश्न है तो लगता है कि वह आगे ही बढ़ेगी कम शायद ही हो। सच तो यह है कि अलग धारा बहनी ही चाहिये क्योंकि हिंदू अध्यात्म एक हिमालय की तरह है जहां से कई धारायें प्रवाहित होंगी। अभी नहीं तो आगे इसकी संभावना है। एक ही धारा की कल्पना कर हिंदू धर्म को ही सीमित दायरे मेेंें बांधना होगा।

आखिर अलग धारा का प्रश्न क्यों उठा? अगर हम भारत में हिंदू धर्म की बात करें तो यहां का समाज जातियों और उपजातियेां में बंटा हुआ है और यही उसके शक्तिशाली होने कारण भी है। फिर अफगान हिंदू धारा के बहने से होगा यह कि आगे चलकर अन्य देशों के हिंदू भी इसी तरह अपनी धारा बहायेंगे। इस बात की भी संभावना है कि जब विश्व में सामाजिक और धार्मिक बदलाव आयेंगे तो तो अपनी अध्यात्मिक ज्ञान की शक्ति के कारण हिंदू धर्म ही विस्तार रूप से लेगा। यह लेखक इतिहास को एक कूड़ेदान की तरह मानता है पर उसमें वर्णित घटनाओं पर विचार करें तो हर भारतीय हिंदूओ की कार्यपद्धति को देखें। हिंदू धर्म की रक्षा के लिये सभी तैयार बैठे हैं पर केवल इसी देश के अंदर। बाहर भी हिंदू रहते हैं पर उनके लिये किसी ने कार्य नहीं किया। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हिंदू धर्म से आशय उन सभी धर्मों से है जिनका उदय भारत में हुआ। यहां के शासकों का राज्य अफगानिस्तान तक फैला था पर धीरे धीरे वह सिकुड़ता गया। वजह यह है कि सीमावर्ती राज्यों पर आक्रमण होते रहे पर उनको अपने पीछे के क्षेत्रों से सहयोग न मिलने के कारण हारना पड़ा। इतिहास में इस बारे में बहुत सारे तथ्य दर्ज हैं। अंधविश्वास,कुप्रथाओं और अहंकार में फंसे हिंदू समाज के विभिन्न उपसमूहों में बंटे लोगों और उनके राजाओं ने कभी भी ईमानदारी से विचाराधारा और प्रजा की रक्षा का विचार ही नहीं किया। अपनी राज्य की सीमाओं को अंतिम और अखंड होने के अहंकार ने इस देश के पहले विदेशी आक्रमणकारियों और अब विचाराधाराओं के जाल में फंसा दिया। दो हजार वर्ष तक यह देश गुलाम रहा इस बात को भुलाया नहीं जा सकता।

स्वतंत्रता के बाद विदेशों से आयातित विचारधाराआों की आलोचना या समर्थन में समय नष्ट किया गया जिससे कुछ हाथ नहीं आना था न आया। सत्य यही है कि भौतिकतावाद से उपजे तनाव से बचने के लिये केवल शक्ति ‘भारतीय अध्यात्म ज्ञान’ में ही है। जिसका मूल मंत्र यही है कि प्रातः उठकर योगासन, प्राणायम,ध्यान और प्रार्थना के द्वारा अपने तन,मन और विचार के विकार बाहर निकालकर फिर नया दिन प्रारंभ किया जाये।
भारतीय अध्यात्म की सबसे बड़ी शक्ति ध्यान है। कुछ धार्मिक लोगों ने मूर्तिपूजा का विस्तार किया क्योंकि एक सामान्य आदमी के लिये एकदम ध्यान लगाना कठिन होता है। इसलिये किसी स्वरूप को मन में स्थापित कर उसकी आराधना करने से भी ध्यान का लाभ मिल सकता है। दरअसल ध्यान से आशय यह है कि अपने दिन प्रतिदिन के दैहिक कार्य से हटकर उसे कही अन्यत्र लगाया जाये। इसी मूर्तिपूजा का विरोध अन्य विचारधारा के लोगों ने ही नहीं बल्कि अनेक हिंदू भी करते हैं पर वह इसका महत्व नहीं समझते। विदेशी विचाराधारा से ओतप्रोत लोग भटकाव की स्थिति में दो ही मार्ग ढूंढते हैं-आत्म हत्या या दूसरे की हत्या। जबकि भारतीय निराशा की स्थिति में मंदिर की राह लेते हैं। हमारे देश में अपने अध्यात्म से दूर होने का कारण यहां भी हिंसा का प्रभाव बढ़ रहा है।

बहुत लंबे समय तक भारत के बाहर के हिंदूओं ने प्रतीक्षा की है कि वह भारत में रह रहे हिंदुओं से नैतिक समर्थन प्राप्त करें पर वह शायद नहीं मिल पाया। दूसरा यह है कि हम भारतीय हिंदूओं इस बात को समझ लें कि हमारी शक्ति धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि अध्यात्मिक ज्ञान है जिस पर अभी तक केवल हम अपना ही अधिकार सकझते हैं। अब वह विश्व में फैल रहा हैं। भारतीय योग परंपरा और श्रीगीता के बारे में अब पूरा विश्व जान चुका है। संत कबीर जी के संदेशों से विदेशी भी प्रभावित हैं-यहां याद रहे कि संत कबीर ने सभी प्रकार के धार्मिक अंधविश्वासों का विरोध किया और किसी भी धर्म को उन्होंने बख्शा नहीं।

देश में अधिक आबादी होने के कारण अतिविश्वास के कारण हम भारतीय हिंदू उस अध्यात्म ज्ञान को जानते हैंे पर जीवन में धारण करने से कतराते हैं। जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं वह इस ज्ञान का मतलब जानते हैं। अनेक भारतीय भी जो विदेशों मेेंं बहुत समय से रह रहे हैं वह भी इस बात को समझते हैं। यह अलग बात है कि उनके इसी भाव का दोहने अपने आर्थिक लाभ के लिये कथित साधु और संत करते हैं। ऐसे में विदेशी हिंदू अगर अपनी अलग धारा में बह रहे हैं तो एक उम्मीद तो बंधती है कि वह भी भारतीय अध्यात्म के हिमालय से निकल रही है। जहां ऐसी जगह पर भारतीय हिंदू हैं उनका मार्गदर्शन करना चाहिये। भारतीय अध्यात्म ज्ञान न तो गूढ़ हैं न ही व्यापक जैसा कि कुछ धार्मिक विद्वान कहते हैं। बस वह एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलकर देखा जा सकता है। भारतीय ज्ञान को गूढ या व्यापक कहना कुछ ऐसा ही है कि जैसे आप आगरा में खड़े होकर कहें कि मुझे दिल्ली जाना है क्योंंकि मुंबई दूर है या आप नासिक में खड़े होकर कहें कि मुझे मुंबई जाना है क्योंकि दिल्ली दूर है। ऐसे ही सत्य और माया के दो मार्ग हैं और सत्य का ज्ञान इतना दूर नहीं है जितना मायावी दूनियां की चाहत रखने वाले कथित संत और साधु कहते हैं।
अगर अफगानी लोगों ने लिख दिया है कि ‘अफगानी हिंदू मंदिर तो वह उसे शायद ही बदलें। इस धारा का बहना दिलचस्प भी है और इस बात का प्रमाण भी कि अब अन्य देशों में हिंदू भी खड़े होकर भारतीय अध्यात्म ज्ञान की रक्षा करेंगे। ऐसे में भारतीय हिंदूओं को उनका हौंसला बढ़ाना ही चाहिये। आखिर वह निकली तो भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान रूपी हिमालय से ही तो है।
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8/1/08

अध्यात्म और धर्म अलग अलग विषय हैं-आलेख (3)

धर्म क्या है? शायद कई लोग नहीं बता पायेंगे? अनेक युद्ध धर्म के नाम पर हुए पर किस धर्म के लिये। महाभारत युद्ध किस धर्म की रक्षा के लिये लड़ा गया था? इस पर अनेक व्याख्यायें मिल जायेंगी। वर्तमान में लोग अनेम धर्मों के नाम बताने लगेंगे-जो कि केवल भ्रम है। धर्म वह है जो मनुष्य द्वारा धारण किया जाता है। इसे हम इस तरह भी कह सकते हैं कि मनुष्य द्वारा अपनी इस देह धारण करने के बाद जो कर्तव्य अपने लिये स्वयं या स्वाभाविक रूप से स्वतः निर्धारित हो जाते हैं वही धर्म है कि न कर्मकांडों का निर्वहन जैसा प्रचारित किया जाता है। एक व्यक्ति के रूप में मनुष्य द्वारा स्वीकार यह स्वतः निर्धारित कर्तव्य या धर्म कई प्रकार का हो सकता है। एक पुरुष के लिये पिता,पुत्र,पति, भ्राता,मित्र तथा अन्य संबंधों के निर्वाह के लिये कर्तव्य का निर्वहन ही धर्म है। एक स्त्री के लिये माता, पुत्री,बहिन, पत्नी तथा अन्य रूप में कर्तव्य निर्वहन करना ही धर्म का स्वरूप कहा जा सकता है।

महाभारत युद्ध की बात करें तो देखा जाये सभी पक्ष कर्तव्य विमुख हो रहे थे। जिसका चर्म रूप था द्रोपदी का चीरहरण। महाभारत काल में परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का निर्वाह न करना ही अधर्म कहा गया है। धर्म की कोई अन्य संज्ञा वहां नहीं दिखाई देती-आशय यह है कि धर्म का कोई एक नाम नहीं है। भगवान श्रीराम ने भी धर्म की रक्षा के लिये ही युद्ध किये पर किसी धर्म विशेष का नाम रामायण मे भीं नहीं आता। रावण का विधर्मी इसलिये कहा जाता है कि वह अपनी शक्ति के अहंकार में इतना मतवाला हो रहा था कि यज्ञ और हवन करने वाले ऋषियों पर हमले कर उनका सहंार करता था। वह स्वयं भी भगवान शिव का उपासक था पर अन्य देवों के उपासकों पर हमले करने की प्रवृत्ति के कारण वह अधर्मी करार दिया गया। यहंा विचाराधाराओं का वैसा ही द्वंद्व दिखाई देता है जैसा आजकल हो रहा है। एक तरह वह स्वयं भगवान शिव की भक्ति कर रावण ने वरदान प्राप्त किया पर उसे अन्य लोगों द्वारा यज्ञ हवन और अन्य तरीके से पूजा करना सहन नहीं था। उसने उन पर हमला किया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अन्य देवों की उपासना हो। भगवान श्रीराम ने उसके अनेक राक्षसों को सीताहरण से पहले ही मार गिराया था और वह भी इसलिये क्योंकि वह दूसरों की पूजा विधि विधाने को रोकने का प्रयास कर रहे थे। इसका आशय यह नहीं है कि भगवान श्रीराम को उसके इष्ट भगवान शिव की उपासना से कोई द्वेष था बल्कि वह स्वयं ही भगवान शिव का सम्मान करते थे। तात्पर्य यह है कि धर्म का रूप यह भी कि कोई किसी की भी उपासना करे पर दूसरे के पूजा विधान से द्वेष न करे।

वर्तमान में जो प्रचलित धर्म हैं उनमें भी वह सब बातें हैं जो सदियों से कही जाती हैं पर उनको नाम दिये गये हैं ताकि उसे एक छत बनाकर लोगों की भीड़ वहां एकत्रित कर उनका आर्थिक और राजनीतिक दोहन किया जा सके। आम आदमी के पास इतना समय नहीं होता कि वह बड़े राजनीतिक ग्रंथ पढ़कर उनका अर्थ समझ सके इसलिये सभी धर्मों में कथित बिचोलिये हैं जो इन किताबों से पढ़कर उनके बारे में लोगों को बताते हैं। इनमें भी कर्मकांडों का वह भाग सुनाकर उसका अनुकरण इसलिये कराया जाता है कि ताकि वह एक समूह में रह सके और दूसरे समूह से अलग दिखें। जब कोई बड़ी वारदात होती है तो आपने सफाई सुनी होगी कि सभी धर्म प्रेम, दया, और अहिंसा का पाठ पढ़ाया जाता है, आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता, आतंकवादी की कोई जाति नहीं होती, उसकी कोई भाषा नहीं होती, आदि आदि। इसे आप उन समूहों के शीर्षस्थ लोगों की चालाकी भी कह सकते हैं जो वारदात के बाद उनको अपने समूहों या समाजों के बारे में अच्छा कहने का अवसर मिल जाता है।

सच तो यह है कि धारण किया जाने वाले धर्म का कोई नाम नहीं होता क्योंकि वह कर्तव्य के रूप में देह के साथ जुड़ा रहता है और जिसका नाम लेते हैं वह केवल एक भ्रम के अन्य कुछ भी नहीं है।

‘आध्यात्म अपने अंतर्मन की यात्रा है’ अनुरक्ति ब्लाग के ललित मोहन त्रिवेदी ने यही पिछले लेख में अपनी टिप्पणी करते हुए लिखा था। यह यात्रा बहुत सरल भी है और कठिन भी। कठिन यह तय करना है कि हम अपने अंतर्मन की यात्रा करें या नहीं और जब करने निकलें तो फिर बाहर के झंझटों से आदमी स्वतः परे हो जाता है। वह अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होता पर उनका तनाव अपने ऊपर नहीं आने देता। समय के अुनसार अपना धर्म निभाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने वाले का मन अपने निंयत्रण में रहता है इसलिये उसको कोई भटका नहीं सकता पर जिनको नहीं हैं वह अपने समाजों और समूहों के शीर्षस्थ लोगों को आव्हान पर चाहे जो करने को तैयार हो जाते हैंं। किसी भी धर्म में अध्यात्म ज्ञान का प्रावधान नहीं है। प्रेम, अहिंसा, और दया के उपदेश तो सभी में दिया गया है पर साथ ही अपनी सांसरिक परेशानियों में सर्वशक्तिमान को याद करने की सलाह भी दी जाती है। काम सिद्ध हो जाये तो उसका धन्यवाद नहीं हो तो कह देते हैं उसकी मर्जी पर किसका बस चलता हैं यह मनुष्य को मानसिक रूप से पंगु करने का प्रयास है जिसमें सभी धर्मों के प्रचारक सफल रहते हैं और इस संसार में धार्मिक कहलाकर अपनी पूजा कराते हैं। इसलिये भारतीय अध्यात्म विश्व में सभी जगह स्वीकार किया जा रहा है क्योंकि वह जीवन और सृष्टि के रहस्यों के ज्ञान से भरा पड़ा है-याद रखें भारतीय अध्यात्म में भी किसी भी धर्म का नाम नहीं दिया गया है न ही कर्मकांडों को ही सर्वोपरि बताया गया है। उनका सारांश यही है कि जीवन को सहज भाव से जीते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करो यही धर्म है और इसका ज्ञान ही अध्यात्म है। शेष फिर कभी
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3/23/08

अमेरिका विरोध का तार्किक आधार क्या है?

भारत में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग हमेशा अमेरिका का विरोध करता है और उसके तर्क हमेशा ही खोखले होते हैं। अमेरिका ने अमुक देश पर हमला किया और अमुक देश में वह दखल दे रहा है। वह एक पूंजीवादी देश है अपनी दादागीरी दिखाता है आदि-आदि तमाम तरह के तर्क देकर लोग उसका विरोध करते हैं। आजकल मध्य एशिया में उसकी उपस्थिति को मुद्दा बनाकर उसका विरोध हो रहा है।

मैं कोई अमेरिका का समर्थक नहीं हूँ और न ही उसका साथ भारत के राजनीतिक संबंधों का विश्लेषण कर रहा हूँ। मेरा इरादा तो अमेरिका के साथ सामाजिक, साँस्कृतिक और आर्थिक संबधों पर दृष्टिपात करना है जिसके कारण आज भी अनेक बुद्धिजीवियों के दुष्प्रचार के बावजूद इस देश के आम नागरिकों में अमेरिका की खराब छवि नहीं बन पायी है। अधिकतर उच्च शिक्षा प्राप्त लोग वहाँ जाकर रोजगार प्राप्त करने का सपना संजोये हुए रहते हैं।
अमेरिकी समाज खुलेपन का समर्थक है। वहाँ धर्म, जाति और भाषा के नाम पर कोई बन्धन नागरिकों पर जबरन थोपा नहीं जाता। वहाँ की व्यवस्था उदारीकरण की पोषक है। वह अपने यहाँ किसी संस्कृति और धर्म की आगमन पर विचलित नहीं होते। सबसे बड़ी बात भारत से गए लोगों को वहाँ आर्थिक, वैज्ञानिक, सामाजिक और साँस्कृतिक क्षेत्र में अपना मुकाम बनाने में जो सफलता मिली वह कहीं और नहीं मिली। अमेरिका का विरोध करने वाले किसी और देश का नाम बताएं तो जाने-हाँ ब्रिटेन और पश्चिमी रास्त्रों में कुछ लोगों को सफलता मिली है पर वह भी एक पश्चिमी राष्ट्र है और अमेरिका से उसका गठबंधन है। इसका अलावा अमेरिका और उसके सहयोगी राष्ट्र कभी किसी पर अपनी संस्कृति थोपते नहीं है जबकि मध्य एशिया के राष्ट्र अपने राज्य की ताकत का उपयोग इसके लिए करते हैं। किसी दूसरे की संस्कृति न पनप सके इसलिए लिए कानून बना रखे हैं। आज हम अपने देश में जो पाश्चात्य सभ्यता फैलती देख रहे हैं वह लोगों की स्वेच्छा से फ़ैल रही है न कि कोई उन पर दबाव डाल रहा है।

कहने को मध्य एशिया में भारतीय भी बहुत हैं पर क्या वह अमेरिका की तरह खुली हवा में साँस ले पा रहे हैं? उस दिन मैं एक अख़बार में एक लेख पढ़ रहा था जिसमें इजरायल के साथ मध्य एशिया के अन्य राष्ट्रों पर धर्म के आधार पर आतंकवाद बढाने का आरोप लगाया गया था। अमेरिका अपने यहाँ हमले के बाद आतंकवाद से लड़ रहा है। उसमें शक्ति है और वह अपने दुश्मनों को निपटा रहा है-अपने दुश्मन को निपटाने के लिए किसी को कहीं भी हमला करने का अधिकार है।
हमारे दर्शन के अनुसार राजनीति में अपने देश के प्रजा की रक्षा के लिए सजग रहते हुए साम,दाम, दंड और भेद चारों नीतियों को अपनाना चाहिए।हमारे दर्शन में व्यक्ति को अहिंसा की मार्ग पर चलने के लिए कहा जाता है पर राज्य को अपने शत्रु पर हमला कर उससे प्रजा और उसके धर्म की रक्षा का सन्देश भी उसमें है। कहने से सब अहिंसक और मानवतावादी नहीं हो जाते इसलिए राज्य और राजा को अपनी प्रजा की रक्षा के लिए हिंसा करनी ही पड़ती है। जिन विद्वानों ने लोगों को अहिंसक रहने का उपदेश दिया है उन्होने ही अपने देश की गुप्तचर व्यवस्था और सेना को मजबूत रखने का विचार दिया है। अपने गुप्तचरों के द्वारा शत्रु राष्ट्र की निगरानी करने का भी विचार दिया है।

अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है और उसे अहंकार है-यह मान लिया पर कहीं मानवाधिकारों का उल्लंघन का जिस ताकत से वह मामला उठाता है कोई अन्य नहीं उठता। वह जिन राष्ट्रों के खिलाफ लड़ रहा है मानवाधिकारों के मामले में उनका रिकार्ड बहुत खराब है।कहने को अमेरिका हमारे से दूर है पर हमारे आसपास पडोसी देश अपने यहाँ मानवाधिकारों का जिस तरह उल्लंघन कर रहे हैं उस पर भी वह उन देशों को धमकाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप किसी व्यक्ति को अहिंसा के मार्ग पर चलने और साधू की तरह रहने के लिया प्रेरित किया जा सकता है पर किसी देश के राज्य प्रमुख को ऐसा सन्देश नहीं दिया जा सकता है। अमेरिका भारत का मित्र देश इसलिए है क्योंकि भारत उसके हितों को हानि नहीं पहुंचता जो उसका हानि पहुँचाते हैं उनको वह छोड़ता नहीं है। वह किसी का मित्र नहीं है उसके मित्र है अपने हित और जब उनको हानि नहीं पहुंचा सकते और ऐसा करने से हमारे देश को कोई लाभ नहीं है तो उसके साथ संबंधों में दूरी क्यों बनायी जाये? इसके साथ वह जिन देशों से लड़ रहा है क्या वह हमारे वास्तव में मित्र हैं या दिखावा करते हैं-यह देखकर ही अमेरिका का विरोध किया जा सकता है। अमेरिका के विरोध का कोई ठोस तार्किक आधार यहाँ के लोगों को समझ में नहीं आता। वैसे भी कौटिल्य के अर्थशास्त्र कि अनुसार अपने से संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्र से संधि कर लेना चाहिऐ - क्या यह अमेरिका से मित्रता करने में लागू नहीं होता? अगर नहीं तो उसके ठोस विरोध का आधार क्या है? उसमें यह भी बताना चाहिए कि वह भारत को आगे किस तरह से हानि पहुंचा सकता है?

10/28/07

अमेरिका और भारत की मित्रता पर चर्चा

अमेरिका विश्व का इस समय सामरिक दृष्टि से सबसे शक्तिशाली और आर्थिक रूप से संपन्न राष्ट्र है। इसमें कोई संदेह नहीं है विश्व के राजनैतिक पटल पर उसके अभ्युदय के बाद तमाम तरह के परिवर्तन आये हैं और ब्रिटेन ने जहाँ अपनी सेना भेजकर राज्य किया वहीं अमेरिका ने यह काम अपनी आर्थिक और तकनीकी शक्ति के बल पर यह कर दिखाया।

प्रत्यक्ष रूप से भारत का उससे कोई विरोध नहीं रहा है। १९७१ में पाकिस्तान से युद्ध के अलावा वह कही भारत के विरुद्ध प्रत्यक्ष रूप से नहीं रहा। शीतयुद्ध के दौरान भारत की सोवियत संघ से निकटता के चलते उसने भारत पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान की सहायता की पर इस दौरान उसके भारत के साथ आर्थिक, सामरिक, तकनीकी और शैक्षणिक क्षेत्रो में संबंध बढ़ते ही रहे-इस दौरान उससे हथियार तक खरीदे गए। अक्सर कहा जाता है की भारत कर्ज में डूबा है तो उसमें अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, अन्य पश्चिमी राष्ट्रों के साथ अमेरिका का भी कर्जा रहा है। भारत के इनसेट उपग्रह तो अमेरिका से ही छोडे जाते रहे थे। बस सोवियत संघ से निकटता की वजह से राजनीतिक रूप से भारत उसकी आंखों में खटकता रहा। भारत और सोवियत संघ पर दबाव बनाए रखने के लिए उसने जो प्रयास किये उसका परिणाम क्या हुआ यह अलग से विचार का विषय है।

अब भारत और अमेरिका एक दुसरे के करीब आ रहे हैं तो यह वक्त की जरूरत है। कुछ लोग अमेरिका की दादागिरी की बात करते हैं और वास्तविकता यह है कि आज कोई भी देश उसकी इस प्रवृति को रोकने में सक्षम नहीं है। जो देश उसका विरोध कर रहे हैं वह अंदरूनी रूप से आर्थिक और सामरिक दृष्टि से इतने सक्षम नहीं है कि उसका सामना कर सकें। उनके देश में ही इतने अंतर्विरोध है कि उनकी समस्याएँ नहीं सुलझ पा रहीं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत का अमेरिका से प्रत्यक्ष रूप से ऐसा कौनसा विषय है जिस पर उसका विरोध करना चाहिऐ या ऐसी आशंका है कि भविष्य कि वह ऐसा कोई विरोध उत्पन्न होगा?

हमने देखा होगा कि जब कोई बात होती है तो कहा जाता है कि अमेरिका भविष्य में इस तरह के दबाव डालेगा और न मानने पर कार्यवाही करेगा। सवाल यह है कि हमारा देश सामरिक और आर्थिक दृष्टि से क्या वैसा ही कमजोर है जिन पर अमेरिका हमला कर चुका है। यहाँ एक बात याद रखें कि अमेरिका ने आज तक किसी परमाणु राष्ट्र पर हमला नहीं किया है। फिर उसने जिन पर हमला किया है वह कभी उसके ऐसे मित्र रहे हैं जिन्हें उसने खडा किया। भारत आज जहाँ खडा है तो उसके लिए यहाँ की आम जनता, वैज्ञानिक, शिक्षाविद और राजनीतिक नेताओं की इच्छा शक्ति की वजह से है-इसमें अमेरिका से भी सहयोग लिया गया है तो उसे दिया भी गया है। तोलमोल में उससे कम नहीं है फिर जिस तरह का डर प्रचारित किया जाता है वह किसी कमजोर राष्ट्र की निशानी है, और हमारा राष्ट्र आज की तारीख में कोई कमजोर राष्ट्र नहीं है।

भारत और अमेरिका में कई समानताएं हैं जिसकी वजह से दोनों एक दूसरे के स्वाभाविक मित्र बन सकते हैं। पहला दोनों देश लोकतांत्रिक हैं और दोनों तरफ खुले विचारधारा वाला समुदाय है। दूसरा दोनों किसी धर्म या खास आर्थिक विचारधारा से प्रभावित नहीं हैं। तीसरा दोनों ही घरेलू और बाह्य मोर्चों पर एक जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। चैथा दोनों ही तकनीकी दृष्टि से संपन्न हैं। मुख्य बात यह है कि दोनों की बीच कोई आर्थिक, सामरिक और वैचारिक विवाद नहीं है-जो कि दोनों को स्वाभाविक मित्र बना सकता है। हमारे यहाँ अक्सर कहा जाता है कि अमेरिका अमुक जगह यह कर रहा है और वह कर रहा है-यह गलत है। हमें यह देखना चाहिए कि अब क्या कर रहा है और आगे कर सकता है। जो उसकी नीति है कि सबसे बड़ा हित अपने देश के हित में होता है-यही नीति अपनाना चाहिए। अगर उसके दूसरे देशों में किये गए व्यवहार की बात करेंगे तो यहाँ यह भी सवाल आएगा कि दूसरे देश हमारे से कैसा व्यवहार करते आये है और क्या हमारे लिए अमेरिका जितने उपयोगी होंगें। अपने देश के हित देखकर ही इस पर विचार करना चाहिए। अमेरिका ने कई देशों पर हमला कर अपने लिये अनेक शत्रू बना लिये हैं पर भारत के लिये तो बिना किसी प्रकार का हमला किये वैसे ही अनेक शत्रू बने हुए हैं। इनमें से कई राष्ट्र वैसे तो भारत के साथ मित्रता का ढोग करते हैं पर यहां के प्रति उनके नेताओं में जो उनके मन में दुर्भावना है उसे भी सब जानते हैं।

इनमें कई देश हैं तो ऐसे हैं जो भारतीयों की आर्थिक और बौद्धिक शक्ति का उपयोग अपने हित में कर रहे हैं पर सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते पर अमेरिका सार्वजनिक रूप से भारत का महत्व स्वीकार करता है क्या उसके लिये उसकी प्रशंसा नहीं की जानी चाहिए।

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