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8/20/09

श्रीगीता की किसी अन्य ग्रंथ से तुलना ठीक नहीं-आलेख (shri gita and other holly books)

यह एक टिप्पणी जो उस ब्लाग पर नहीं रखी जा सकी जिसमें श्रीगीता के युद्ध की चर्चा करते हुए उस ब्लाग लेखक ने अपनी ही पवित्र पुस्तक में वर्णित युद्ध विषय से तुलना की थी। वह ब्लाग लेखक गैर हिन्दू धर्म-याद रहे यहां उसके लिये गैर हिन्दू शब्द उपयोग नहीं हो रहा-विचारधारा मानने वाला है। वह एक दिलचस्प आलेख था। लोग पूछेंगे कि आखिर यह टिप्पणी उस पर क्यों नहीं रखी गयी?
इसका जवाब यह है कि यहां टिप्पणी लिखने पर लोग कुछ का कुछ अर्थ समझ लेते हैं। ऐसे में दूसरे के ब्लाग पर चर्चा के लिये बड़ी टिप्पणी लिखने का अपना खतरा होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरे के घर जाकर अपनी बात कहने से अच्छा है कि अपने घर में ही बात की जाये। फिर श्री गीता जैसे गंभीर विषय पर किसी से वाद विवाद करना भी एक तरह से मजाक लगता है। यह दुनियां का इकलौता ग्रंथ है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान है और इसकी तुलना किसी अन्य ग्रंथ से करना ठीक नहीं प्रतीत होता।
यह रूढ़ता या अहंकार नहीं बल्कि श्रीकृष्ण जी का आदेश है कि उनके संदेश का प्रचार केवल अपने भक्तों में ही किया जाये। दूसरी बात यह है कि श्रीगीता के संदेश को पढ़ने, सुनने और समझने के लिये जिस धीरज की आवश्यकता है वह हरेक में नहीं होता। फिर जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के समक्ष जब अन्य विचारधारा को स्थापित करने के प्रयत्न कर रहे हों उनके सामने तो श्रीगीता के संदेश का प्रचार करना परेशानी का कारण भी बन जाता है।
मुख्य बात यह है कि मनुष्य का मन और स्वभाव! जिन लोगों ने तय कर लिया है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में अप्रासंगिक संदेशों का नकारात्मक प्रचार करेंगे उनको समझाने से अच्छा है अपनी बात उनसे कही जाये जो ऐसे प्रचार से विचलित हो जाते हैं।
श्रीगीता में मांसाहार तथा दूसरे की आजीविका छीनने का प्रयास तामसी माना गया है। इतना ही नहीं भगवान भक्ति के द्वारा स्वर्ग प्राप्त करने के मत का खंडन भी किया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीगीता में समग्र जीवन सहजता पूर्वक व्यतीत करने के लिये ज्ञान दिया गया है। अब लोगों को केवल युद्ध ही युद्ध दिख रहा है तो उनको समझाना मुश्किल है। श्रीगीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो मुझे जैसा भजता है वैसा ही फल उसे मिलता है। जिनको युद्ध ही युद्ध दिख रहा है उनके लिये फल भी युद्ध ही है। ऐसे में शांतिप्रिय मनुष्य के लिये यह आवश्यक है कि वह अपने सत्संगियों से ही ज्ञान चर्चा करे।
आपका लेख बहुत अच्छा लगा। आपके इस पाठ पर मैं आपके श्रीगीता संबंधी विषय का उत्तर दूंगा।
पहली बात तो यह है कि श्रीगीता में युद्ध से संबंधित सैंकड़ों श्लोक नहीं है। दूसरी बात यह है कि श्रीगीता विश्व की इकलौता ऐसा ग्रंथ है जिसमें तत्व ज्ञान के साथ ऐसा विज्ञान भी है जिससे संसार को समझा जा सकता है। इसका एक सिद्धांत हैं-‘गुण ही गुण को बरतते हैं।
श्रीकृष्ण जी जानते थे कि श्रीअर्जुन एक क्षत्रिय है और कभी न कभी अपने युद्ध कौशल के कारण यह युद्ध अवश्य करेंगे। श्रीकृष्ण यह नहीं चाहते थे कि यह युद्ध कौरवो के संपूर्ण सफाये के बिना समाप्त हो। अगर उस समय अर्जुन युद्ध नहीं करते तो वह बाद में भी इसके लिये आगे आते। वह क्षत्रिय थे और इससे दूर रहना संभव नहीं था पर श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति में वह कुछ कौरवों को छोड़ सकते थे। इससे पूर्व विराट नगर में हुए युद्ध में अकेले अर्जुन से कौरव पराजित होकर भाग निकले और श्रीकृष्ण अब ऐसा अवसर उनको महाभारत के युद्ध में नहीं देना चाहते थे-याद रहे उनकी अनन्य भक्त द्रोपदी ने उनसे कौरवों के सर्वनाश का वरदान मांगा था। यहां यह बता दें क्षत्रिय से आशय राज्य से मान्यता प्राप्त सैनिक से है न कि हर किसी हथियार पकड़ने वाले से। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दें कि आदमी अपने स्वाभाविक गुणों के आधार पर चले बिना रह नहीं सकता जैसे कि कुछ लोग भारतीय अध्यात्म में केवल जातिपाति और युद्ध ही ढूंढते हैं।
महाभारत युद्ध में निहत्थों और युद्ध न कर रहे व्यक्ति पर प्रहार न करने के नियम का पालन किया गया था। अभिमन्यु के शहीद होने के बाद इस नियम में ढील आ गयी। युद्ध में छिपकर वार करना भी वर्जित था।
बात नंबर दो। भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध का संदेश केवल अर्जुन को दिया था न कि आगे आने वाले हर भक्त को इसकी इजाजत दी या आव्हान किया। उन्होंने अर्जुन से कहा‘यह युद्ध तू मेरे लिये कर!’
वह जानते थे कि युद्ध और हिंसा अपराध है और इसका प्रायश्चित भी उन्होंने किया। युद्ध के बाद उन्होंने गांधारी का शाप ग्रहण किया जिससे उनके स्वयं के पूरे वंश का नाश हो गया। उनके पुत्र तथा परिवार में अन्य सदस्य भी न बचे। धर्म के लिऐ ऐसा निर्मोही इतिहास में हुआ हो इसका ज्ञान हमें नहीं है। फिर महाभारत के युद्ध का पाप अपने ऊपर लेेते हुए बहेलिये का बाण अपने पांव पर लेकर परमधाम गमन किया। ऐसा भी विश्व इतिहास में ऐसा कोई नहीं हुआ जिससे हिंसा और युद्ध का परिणाम स्वयं ग्रहण किया हो। वह इस युद्ध के द्वारा अपना संदेश देना चाहते थे वह भी अपने भक्तों में प्रचार के लिये न कि जबरन दूसरे को सुनाने के लिये।
उनके बाद का समाज उनके अहिंसा के संदेश के कारण ही हिंसा से दूर रहता है क्योंकि वह जानता है कि अब हिंसा के अपराध का दंड अपने ऊपर लेने के लिये कोई दूसरा नहीं है। इसके अलावा उन्होंने जो संदेश दिये उनके बारे में आपसे कहना क्या? तीन प्रकृत्ति के मनुष्य-सात्विक, राजस और तामस-इस धरती पर विचरेंगे। चार प्रकार के भक्त-आर्ती, अर्थार्थी,जिज्ञासु और ज्ञानी-भी होंगे। श्रीगीता हमारे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का आधार है और उसके अनुसार यह संभव नहीं है कि सभी लोग सात्विक और ज्ञानी बन जायें। ऐसी सुखद कल्पना सच्चे ज्ञानी नहीं करते। मनुष्य को ज्ञान ग्रहण कर स्वयं ही अपनी राह चलना चाहिये और दूसरे जिस प्रकार के हों उसके अनुरूप ही उनसे व्यवहार करना चाहिये न कि उनको अपने जैसा बनाने में अपनी जिंदगी बर्बाद करना चाहिये। अपनी भक्ति का अहंकार दिखाकर दूसरे को भी अपने जैसा दिखने के लिये प्रेरित या बाध्य करने वाले नष्ट हो जाते हैं।
स्पष्टतः श्रीगीता में युद्ध शब्द क्षत्रियों-राज्य से मान्यता प्राप्त सैनिकों के लिये-के लिये स्वाभाविक कर्म तो अन्य के लिये सामान्य कर्म से है। श्रीकृष्ण जी योगेश्वर थे और इसलिये उन्होंने इस बात का ध्यान रखा था कि श्री अर्जुन को युद्ध का संदेश इस तरह दिया जाये कि आगे आने वाले भक्त कर्म के रूप में ही समझें क्योंकि अहिंसा के संदेश के साथ ही उन्होंने आगे ऐसे किसी युद्ध की संभानायें समाप्त कर दीं।

अंत में यह कहना भी जरूरी है कि उनका यह पाठ पढ़कर बिल्कुल गुस्सा नहीं आया। श्रीगीता के ज्ञान की थोड़ी समझ रखने वाला व्यक्ति भी न तो दूसरे द्वारा निंदा करने पर दुःखी होता है न प्रशंसा पर फूल कर कुप्पा होता है। हां, हम इतना जरूर कहते हैं कि भई सारी दुनियां के धर्म ग्रंथ पवित्र हैं। उनका खूब आदर करो। आप चाहे किसी भी धर्म के हों अपने पवित्र किताब का खूब प्रचार करो। हमारी श्रीगीता की आलोचना करो तो भी दुःख नहीं है। प्रशंसा करो तो आपकी मर्जी! मगर तुलना करने से पहले इसका पूरा अध्ययन करना जरूरी है। दरअसल श्रीगीता का असली संदेश तो श्री अर्जुन को युद्ध करने का इसलिये दिया गया था क्योंकि उनका यह स्वाभाविक कर्म था। इसका आशय यह है कि श्रीकृष्ण हर भक्त को अपना स्वाभाविक कर्म करते भगवान भक्ति के साथ जीवन व्यतीत करने संदेश दे रहे थे। वैसे मनुष्य का स्वभाव आसानी से नहीं बदलता। जिसका जैसा स्वभाव है वैसा ही वह इस दुनियां को देखेगा भी। हां, उसमें परिवर्तन के लिये एक ही प्रयास हो सकता है वह योगासन और प्राणायम! जो लोग भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परे हैं उनसे ऐसी अपेक्षा करना नहीं चाहिये कि वह हमारे धर्म ग्रंथों का सम्मान करें और जितना उनमें ज्ञान है उसके रहते हुए वह किसी के मोहताज भी नहीं है। श्रीगीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसके लिये प्रशंसात्मक शब्द कहने की बजाय उसका अध्ययन किया जाना चाहिये। इसका थोड़ा अंश भी समझ पायें तो समझिये भगवान की बहुत कृपा है। हम उस ब्लाग लेखक के भी आभारी हैं जिनकी वजह से यह पाठ लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस लेख का आशय यह कतई नहीं है कि उससे हमारा कोई विरोध है। श्रीगीता पर लिखने की प्रेरणा देने वाले व्यक्ति का आभार व्यक्त न करना कृतघ्नता होगी। शेष फिर कभी!
नोट-इस पाठ पर किसी का नाम लेकर टिप्पणी करना स्वीकार्य नहीं होगा। अपना विचार व्यक्त करना ठीक है पर उसके लिये किसी व्यक्ति का नाम लेना उचित नहीं है।...........................................
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8/1/09

निष्काम भाव से आशय लक्ष्यहीन या सन्यासी जीवन नहीं-हिंदी लेख (shri gita ke nishkam bhav ka ashay-hindi lekh)

श्री गीता में निष्काम भाव को लेकर अधिकतर लोग भ्रमित रहते हैं। उनके लगता है कि यह कैसे संभव है कि हम कोई काम करें और फिर उससे फल की आशा न करें। कुछ विद्वान तो मानवीय स्वभाव की कमजोरियों का बहाना कर यह भी प्रचार करते हैं कि ‘निष्काम भाव’ से काम करना संभव नहीं है। लोग सोचते हैं कि निष्काम भाव से काम करने का मतलब यह है कि
1. अगर कहीं नौकरी या व्यवसाय करें तो वहां वेतन या दाम न भी मिले तो चुप होकर भगवान भरोसे बैठ जायें और किसी प्रकार का संघर्ष न करें।
2. अगर फल की कामना ही न हो तो कर्म शुरु ही क्यों करें?
3.अपने और परिवार का भरण भोषण करन अपनी जिम्मेदारी है और इसका निर्वाह करने के लिये कहीं से धन प्राप्त करने की आशा पर ही काम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर निष्काम होने में वह सन्यासत्व की अनुभूति करते हैं और उनको लगता है कि यह उनका विषय नहीं है। सच बात तो यह है कि हिन्दू धर्म के अधिकतर संत और साधु सकाम भक्ति के पोषक हैं। वह भक्तों से अपनी सेवा सुश्रुपा कराना चाहते हैं इसलिये वह निष्काम भक्ति का संदेश इस ढंग से देेते हैं कि भ्रम पैदा होता है। निष्काम भाव से जीवन गुजााने का मतलब लक्ष्यहीन और त्यागी जीवन बिताना नहीं है-यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये।
दरअसल निष्काम भाव से जीवन व्यतीत करने सुखमय हो जाता है और जब इसकी वजह से कोई सुखपूर्ण जीवन व्यतीत करेगा तो वह क्यों अपनी मानसिक अशांति से मुक्ति प्राप्त करने के लिये इन गुरुओं के पास जायेगा।
निष्काम भाव से तब तक नहीं रहा जा सकता जब तक फल का स्वरूप न जान लिया जाये। जब फल का स्वरूप जान लेते हैं तब स्वतः निष्काम भाव को प्राप्त हो जाते हैं।
निष्काम भाव से काम करना संभव है मगर पहले फल का स्वरूप समझा जाये। कोई भी कहीं नौकरी या व्यवसाय करता है तो उसे भौतिक परिलब्धियां प्राप्त होती हैं पर यह फल नहीं है क्योंकि उसका उपयोग तो हर कोई अपने और परिवार के भरण भोषण करता है। हमने एक जगह से धन लिया और दूसरी जगह खर्च किया तो उसे फल कैसे कहा जा सकता है। फल तो वह है जो हमारे पास रहे। हम जब भौतिक परिलब्धियों को फल मान लेते हैं तो अपना यह बृहद जीवन संकीर्ण दायरों में कैद कर लेते हैं। हमें अपने दैहिक आवश्यकताओं के लिये परिश्रम और व्यवसाय करना ही होता है और उसके लिये वेतन या दाम प्राप्त करना कर्म का हिस्सा है न कि फल का। जब फल है मन की शांति और मोक्ष। वह भक्ति से प्राप्त होता है। उसमें भी आपको निष्कर्म भाव से लगना चाहिये क्योंकि तभी आपका ध्यान अपनी आत्मा से साक्षात्कार पर केंद्रित हो सकेगा। यही ध्यान आपकी देह, मन और विचारों को शुद्ध करता है जिससे आप जीवन में हर पल नवीनता अनुभव कर सकते हैं। जहां आपने कामनायें स्थापित की वहां यह ध्यान नहीं लगेगा और मामला जस का तस।
ऐसे अनेक लोग हैं जो मंदिर नहीं जाते पर फिर भी निष्काम भाव से जीकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। कमाते हैं और अपने धन का उपयोग अपने पर जमकर करते हैं। वह इसलिये धन कमाते हैं क्योंकि उनका खर्च करना होता है। धन को लक्ष्य या फल मानना अपने स्वतंत्र मन को दायरों में कैद करना है और उससे वह विचलित होता है। हम अपने मन की शांति के लिये इधर उधर धन संग्रह के लिये जूझते हैं और फिर उसका खर्च भी करते हैं। यह तो अच्छे भले मनुष्य जीवन का धन के इर्दगिर्द घूमना हो गया। फिर उस पर कुछ विद्वान धार्मिक विद्वानोें ने मोक्ष की बजाय स्वर्ग की प्राप्ति की कामना का अविष्कार कर लिया और उसके लिये अनेक तरह के कर्मकांडों का प्रचार किया जिनमें धन खर्च करना पड़ता है। इसलिये ऐसे गुरु अपने शिष्यों को धन के आसपास ही चक्कर लगवाते हैं। निष्काम भक्ति के संदेश के बीच श्री गीता का गुरु सेवा का संदेश जरूर सुनाते हैं ताकि शिष्य धन के चक्कर से मुक्त न हो। श्री गीता में गुरुजनों की सेवा करने को कहा गया है पर उसका आशय शिक्षा प्राप्ति तक ही सीमित है। श्रीगीता में तो भगवान ध्यान में निरंकार स्वरूप की तरफ जाने की बात कहते हैं तब वह दैहिक गुरु की जीवन भर सेवा का संदेश कैसे दे सकते हैं?
जीवन में निष्काम भाव से रहते हुए निष्प्रयोजन दया करना चाहिये। मोह और माया से परे रहने का तात्पर्य यह कतई नही है कोई वस्तु या व्यक्ति त्यागना है। अपने कर्तव्यों से विमुख होने की भी बात कहीं श्रीगीता में नहीं कही गयी। मूल बात तो भाव से हैं। कोई भौतिक वस्तु या व्यक्ति न पकड़ना है न छोड़ना है। मुख्य विषय है कि किसी में भाव लिप्त नहीं करना।
आप कहेंगे यह संभव नहीं तो कोई जबरदस्ती नहीं है कि आप यह संदेश माने। आप कामनाओं से भरे रहिये। यह जीवन अनवरत धारा से बहता है आप चाहें या न चाहें-हां, आप इस खुशफहमी रहिये कि आप उसका संचालन कर रहे हैं। सबको देने वाला दाता है पर यह समझते रहें कि आप किसी को पाल रहे हैं। मगर यह भी समझ लीजिये हमारे जन्म से पहले भी यह दुनियां चल रही थी और हमारे बाद भी यह चलते रहेगी। यह कटु सत्य ही तत्वज्ञान है और इसी से लोग भागते हैं। वह कामनायें पालते हुए अपने कर्तापन के अहंकार में इसलिये डूबे रहना चाहते हैं क्योंकि उनको लगता है कि जिंदा रहने के लिये कोई बहाना चाहिये।
मुख्य बात हमारी देह नहीं मन का चलना है। हमारे शरीर की इंद्रियां स्वतः काम करती हैं। अगर कोई पत्थर आंख की तरफ उछलता है तो वह स्वतः बंद हो जाती है-हम यह भ्रम पालते हैं तो पालते रहें कि हमने बंद की। कहीं रास्ते में बदबू आती है तो नाक स्वयं ही सांस लेना बंद कर देती है ताकि उससे शरीर विषाक्त न हो-हम भले ही भ्रम पालें कि हमने बंद की। एक मित्र ब्लाग लेखक ने आज इस विषय को उठाया तो लिखने का मन हुआ। उनके पाठ पर हमने यह टिप्पणी भी लिखी जो कि प्रस्तुत है। शेष फिर कभी।
आपने अच्छा विषय उठाया है पर निष्काम भाव से काम करना तभी संभव है जब फल का स्वरूप समझा जाये। कोई भी कहीं नौकरी या व्यवसाय करता है तो उसे भौतिक परिलब्धियां प्राप्त होती हैं पर यह फल नहीं है क्योंकि उसका उपयोग तो हर कोई अपने और परिवार के भरण भोषण करता है। आपने एक जगह से धन लिया और दूसरी जगह खर्च किया तो उसे फल कैसे कहा जा सकता है। फल तो वह है जो आपके पास रहे। हम जब भौतिक परिलब्धियों को फल मान लेते हैं तो अपना यह बृहद जीवन संकीर्ण दायरों में कैद कर लेते हैं। हमें अपने दैहिक आवश्यकताओं के लिये परिश्रम और व्यवसाय करना ही होता है और उसके लिये वेतन या दाम प्राप्त करना कर्म का हिस्सा है न कि फल का। जब फल है मन की शांति और मोक्ष। वह भक्ति से प्राप्त होता है। उसमें भी आपको निष्कर्म भाव से लगना चाहिये क्योंकि तभी आपका ध्यान अपनी आत्मा से साक्षात्कार पर केंद्रित हो सकेगा। यही ध्यान आपकी देह, मन और विचारों को शुद्ध करता है जिससे आप जीवन में हर पल नवीनता अनुभव कर सकते हैं। जहां आपने कामनायें स्थापित की वहां यह ध्यान नहीं लगेगा और मामला जस का तस।
अपनी समझ के अनुसार जो संक्षिप्त व्याख्या थी वह प्रस्तुत की। बाकी कोई सिद्ध तो हूं नहीं कि दावा करूं कि यह सब ब्रह्म वाक्य है।
दीपक भारतदीप

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7/7/09

गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima)

             गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
               दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव
।।
           जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।  
      आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
           दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
          भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
         गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
          इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

        कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि 
              -----------------------------------
          जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
          अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।
        जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है। 
          बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
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2/17/09

श्रीगीता तो ज्ञान सहित विज्ञान से परिपूर्ण ग्रन्थ है-आलेख

धर्म को लेकर अब अधिक चर्चा हो रही है पर उसके मूल तत्वों के बारे में कम उससे मानने वाले लोगों के आचरण पर ही अधिक तथ्य रखे जा रहे हैं। आजकल तो चारों तरफ बहस हो रही है और एकता करने के लिये शोर मचाया जा रहा है। वाद और नारों के जाल में फंसे बुद्धिजीवियों की अपनी सीमायें हैं और भारतीय अध्यात्म ज्ञान से रहित होते हुए भी धर्म पर ऐसे बोलते हैं जैसे कि उनका लिखा या बोला ही अंतिम सत्य है। अभी एक जगह तीन धर्मों की पुस्तकों की चर्चा करते उनको भूल जाने और आपस में भाईचारा लाने की बात एक नारे के रूप में कही गयी-इसमें भारतीय अध्यात्म की मुख्य स्त्रोत गीता का नाम भी था। दो अन्य धर्मों की पुस्तकों का नाम भी था पर यहां हम केवल श्रीगीता के मसले पर ही चर्चा करेंगे क्योंकि आजकल जो वातावरण है कि उसमें किसी दूसरे धर्म की चर्चा करने पर वाद प्रतिवाद का जो दौर शुरु होता है तो वह किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता।
श्रीगीता अन्य धार्मिक ग्रंथों के मुकाबले शब्दों के मामले में कम है पर इस जीवन सृष्टि का सभी तत्वों का संपूर्ण सार केवल उसी में है। यह दुनियां की एकमात्र ऐसा ज्ञान संग्रह है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान की भी चर्चा है। इसे पढ़ने और समझने वाले ज्ञानी ही जानते हैं कि अत्यंत सरल शब्दों में जीवन और सृष्टि के रहस्यों का वर्णन करने वाले इस ग्रंथ में कोई लंबा चैड़ा ज्ञान नहीं है जो किसी के समझ मेें नही आये पर इसके महत्व को प्रतिपादित करने वाले ही इसके असली संदेश गोल कर जाते हैं ताकि वह सुनने वालों की नजरों में ज्ञानी भी कहलायें और दूसरा कोई ज्ञानी बनकर उनको चुनौती भी न दे।

जहां तक श्रीगीता के ज्ञान का प्रश्न है तो उसमें
1.कहीं भी हिंसा का समर्थन नहीं किया गया।
2.उसमें मनुष्य को योग और भक्ति के द्वारा स्वयं ही शक्ति संपन्न होने की प्रेरणा दी गयी है।
3.उसमें विज्ञान का महत्व प्रतिपादित किया गया है ताकि धर्म की रक्षा हो सके। एक तरह से मानव समाज के नित नये स्वरूपों के साथ जुड़ने के लिये प्रेरित किया गया है क्योंकि उसमें वर्णित ज्ञान की रक्षा तभी संभव है।
4.व्यक्ति किस और कितने तरह के होते हैं इसके लिये उसमें पहचान बताई गयी है और श्रेष्ठ मनुष्य के लिये जो मानदंड बताये गये हैं वह एक आईने का काम करते हैं।

उसमें कहीं भी
1. चमत्कारों के आकर्षण का वर्णन नहीं है
2. मनुष्य द्वारा मनुष्य को हेय देखने का संदेश नहीं दिया गया।
3.किसी प्रकार की पूजा पद्धति या देवता की उपासना या किसी व्यक्ति की महिमा का बखान नहीं किया गया। न ही किसी कर्मकांड या रूढि़यों की स्थापना उसमें की गयी है।
श्रीगीता की किसी अन्य पुस्तक से तुलना करना ही हैरानी की बात है। इस तरह वाद पर चलने और नारे लगाने वाले केवल अखबार पढ़ कर ही अपनी विचारधारा बना लेते हैं। देखा जाये तो अन्य सभी धार्मिक पुस्तक से श्रीमद्भागवत गीता की तुलना ही नहीं हैं। जिन लोगों को लगता है कि श्रीगीता का भुलाने से राष्ट्र में एकता स्थापित हो जायेगी तो उनको यह भी समझ लेना चाहिये कि बात केवल पुस्तक के नाम की नहीं बल्कि उसके ज्ञान उसे धारण करने की भी है। अन्य धार्मिक पुस्तकें इतनी बड़ी हैं कि आज के संघर्षमय युग में किसी को उसे फुरसत ही नहीं है और जो पढ़ते हैं वह अपने हिसाब से दूसरों को उनके निजी जीवन में निर्णय लेने के लिये पे्ररित करते हैं। कई बार तो पारिवारिक विवादों में भी उनसे उदाहरण लिये जाते हैं। कई धार्मिक पुस्तकें तो केवल समाज को सांसरिक संबंधों के बारे में संदेश देती हैं और साथ ही उनके सामने कर्मकांडों के निर्वहन की शर्त भी रखती हैं जबकि श्रीगीता के संदेशों में ऐसा नहीं है।
समस्या श्रीगीता को भूलने की नहीं बल्कि उसका ज्ञान धारण न करना ही हैं। धार्मिक पुस्तकों पर प्रतिकूल टिप्पणियां होने से सामान्य आदमी बौखला जाता है और अल्पज्ञानी उसमें से ज्ञान के अंश निकालकर उसके महत्व का प्रतिपादित करता है पर जो ज्ञानी हैं वह केवल सुनता है और पूछने पर यही कहता है कि -‘पहले पढ़ लो फिर आकर बात करना।’
श्रीगीता के ज्ञान के बाद महाभारत युद्ध हुआ था पर उसमें श्रीभगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि यह ‘युद्ध तू मेरे लिये कर और उसका परिणाम मेरे ऊपर छोड़’
उन्होंने अपना वादा निभाया। अर्जुन को पाप का भागी नहीं बनने दिया क्योंकि उनके उस भक्त ने अपनी देह का त्याग किसी का तीर खाकर नहीं छोड़ी, जबकि भगवान श्रीकृष्ण ने परमधाम गमन से पहले उसी हिंसा के प्रतिकार में एक बहेलिये का तीर अपने पांव पर लेकर यह स्पष्ट संदेश मानव समाज को दिया कि अहिंसा ही भविष्य की सभ्यताओं के लिये श्रेष्ठ मार्ग है। उन्होंने महाभारत में स्वयं कहीं भी हिंसा नहीं की पर उसका परिणाम स्वयं ही लेकर यह साबित किया कि वह एक योगेश्वर थे।
सच तो यह है कि लोग केवल भगवान श्रीकृष्ण का नाम लेते हैं पर उनके जीवन चरित्र से कुछ नहीं सीखते। लोगों को अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने नकारा बना दिया है। वह केवल बहसें करते हैं वह भी अर्थहीन। किसी निष्कर्ष पर तो आज तक कोई पहुंचा ही नहीं है-जिस तरह की बहसें चल रही हैं उससे तो लगता भी नहीं है कि किसी नतीजे पर पहुंचेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता के उपदेशों का प्रचार केवल अपने भक्तों में ही करने का निर्देश दिया है क्योंकि उस पर केवल चलने के लिये पहले यह जरूरी है कि उनकी निष्काम भक्ति की जाये।
आखिरी बात यह है कि अन्य धार्मिक ग्रंथ कथित रूप से कहते हैं कि ‘प्रेम करो’,‘अहिंसा धर्म का पालन करो’, परमार्थ करो और अपनी नीयत साफ रखो’, पर वह यह नहीं बताते है कि पांच तत्वों से बनी इस देह में जो शारीरिक,मानसिक और वैचारिक विकार एकत्रित होते हैं उनका निष्कासन कैसे हो? जब तक यह विकार है आदमी प्रेम कर ही नहीं सकता, हिंसा तो हमेशा उसके मन में रहेगी और परमार्थ भी करेगा तो दिखावे का।

श्रीगीता उसका उपाय बताती है कि उसके लिये लिये योगसाधना, ध्यान और गायत्री मंत्र का जाप करो। उससे शरीर के विकार निकल जाते हैं और आदमी स्वतः भी निष्काम भक्ति के भाव को प्राप्त होता है। उसे प्रेम करने के लिये सीखने की आवश्यकता नहीं होती। साथ ही परमार्थ करने के लिये वह किसी के संदेश का इंतजार नहीं करता। दूसरे धर्म ग्रंथो में आंखों से अच्छा देखने, कानों से सुनने और मन में अच्छा विचार करने का उपदेश देते हैं पर श्रीगीता तो मनुष्य के उस मन पर नियंत्रण करने का तरीका बताती है जिससे वह स्वचालित ढंग से इन सब बातों के लिये प्रेरित होता है। उसे किसी से कुछ सीखने या सुनने की आवश्यकता नहीं होती।

बाकी धर्म ग्रंथों की क्या महत्ता है यह तो उनको पढ़ने वाले जाने पर श्रीगीता को पढ़ने वाले इसके बारे में प्रतिकुल टिप्पणी होने पर भी नहीं बौखलाते क्योंकि वह जानते हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। स्पष्ट है कि जिस वातावरण में सामान्य आदमी रह रहा है, भोजन कर रहा है या पानी पी रहा है उसका उस प्रभाव होगा उसी के अनुसार ही वह दूसरे से अनुकूल प्रतिकूल व्यवहार करेगा। रहने वाले तो श्रीगीता का अध्ययन करने वाले भी कोई आसमान में नहीं रहते वह भी यहां पर्यावरण प्रदूषण झेल रहे हैं पर वह जब अपने सामने समस्याओं का जंगल देखते हैं तो यही कहते हैं कि ‘मुझे अपने पर नियंत्रण रखना चाहिये दूसरा ऐसा करे यह जरूरी नहीं है क्योंकि उसका ज्ञान कितना है उतना ही तो वह करेगा।
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