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9/2/10

श्रीकृष्ण का चरित्र बालक्रीड़ा तथा प्रेम लीला तक सीमित नहीं-जन्माष्टमी पर विशेष लेख (shri krishna and shri madbhavat geeta-janmashtami par vishesh lekh)

आज सारे देश में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनायी जा रही है। भगवान श्रीकृष्ण जी हमारे ‘अध्यात्मिक दर्शन’ के सबसे बड़े आधार स्तंभ हैं। इस अवसर पर उनकी बालक्रीड़ाओं और प्रेमलीलाओं को लेकर तमाम तरह की चर्चाऐं होती हैं। वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर में ढेर सारी भीड़ जुटती है। लोग आते जाते ‘राधे राधे' कहते हुए उनके मंदिरों में दर्शनों के लिये जाते हैं। अनेक संत तो भगवान श्रीकृष्ण की बालक्रीडाओं और प्रेमलीलाओं के प्रसंग को सुनाकर भक्तों को भाव विभोर करते हैं।
इस प्रसन्नता पूर्ण वातावरण में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो श्रीकृष्ण के महाभारत युद्ध के दौरान उनके उस स्वरूप का स्मरण करते हों जिसमें उनकी लीला से श्री मदभागवत गीता एक अलौकिक और अभौतिक अमृत के रूप में प्रकट हुई। समुद्र मंथन में निकला अमृत तो देवता पी गये और इस कारण दैत्यों से उनका बैर बंध गया जो आज भी जारी सा लगता है। अनेक लोग दैत्यों को उनका फल न मिलने के कारण देवताओं को मनुवादी और पूंजीवादी भी बता देते हैं। मगर श्री गीता में जो अमृत प्रकट हुआ हुआ वह न पीने योग्य है न ही खाने योग्य, उसका स्वाद तो पढ़कर उसे धारण करने पर ही अनुभव किया जा सकता है। इसके लिये अपने अंदर बस संकल्प और विश्वास होना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण का राधा के साथ आत्मीय संबंध था पर वह केवल प्रेम का नहीं  बल्कि निष्काम प्रेम का प्रतीक था। भले ही कुछ विद्वान इस प्रेम का उपयोग अपने लिये बड़े सुविधाजनक ढंग से समाज को निर्देशित करते हुए प्रेमभाव को दैहिक सीमाओं तक ही समेट देते हैं पर जिन्होंने श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने साथ ही उसे समझने का प्रयत्न किया है वही इस बात को जानते हैं कि प्रेम न केवल देह तक ही सीमित न मनुष्य रूप तक, बल्कि वह आत्मा की गहराई में रहने वाला ऐसा भाव है जो कामनाओं से रहित एक अनुभूति है। उससे मनुष्य की अध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है न कि दैहिक वासनायें। भगवान श्रीकृष्ण की बालक्रीड़ाओं तथा प्रेमलीलाओं का बखान ज्ञानी लोगों को रोमांचित करता है पर वहीं तक ही सीमित नहीं रखता क्योंकि महाभारत का युद्ध और उसमें प्रकट हुई श्रीगीता ही वह ग्रंथ है श्रीकृष्ण के रूप का सर्वश्रेष्ठ दर्शन कराती है जो कि भारतीय अध्यात्म दर्शन का वर्तमन में मुख्य केंद्र बिंदु है।
महाभारत युद्ध के मैदान में खड़े श्री अर्जुन को श्रीगीता का रहस्य बताते हुए एक बार भी भगवान श्रीकृष्ण ने अपने साथ दैहिक रूप से जुड़े किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया न राधा का, न रुकमणी का न सत्यभामा का। यहां तक कि अपने हाथ से गोवर्धन पर्वत उठाने की घटना का भी स्मरण नहीं किया जिससे उनको बाल्यकाल में कीर्ति मिल गयी थी। उस समय भगवान श्रीकृष्ण केवल धर्म की स्थापना का वह काम कर रहे थे जिसके लिये वह अवतरित हुए थे वह चमत्कारी लीलाओं के माध्यम से अपने भक्त बनाने की बजाये लोगों को धर्म पालन के प्रेरित करना चाहते थे। जिस वृंदावन में उन्होंने बाल कीड़ाओं और प्रेमलीलाओं से अपने आसपास के लोगों को रोमांचित किया वहां से एक बार वह निकले तो फिर नहीं लौटे बल्कि जीवन पर धर्म स्थापना के लिये द्वारका में रहकर जूझते रहे। महाभारत में स्वयं हथियार न उठाने की प्रतिज्ञा कर ‘अहिंसा’ के सिद्धांत की जो स्थापना की उसका कोई सानी आज तक नहीं मिलता। इस अहिंसा का संदेश कोई कायर नहीं वीर और योद्धा ही दे सकता है।
ज्ञानी लोगों को लिये वृंदावन अत्यंत रोमांचक स्थान होता है पर श्रीकृष्ण के सम्पूर्ण स्वरूप में आस्था के कारण उनका चिंतन केवल वहीं तक नहीं सिमटता क्योंकि वह जानते हैं कि धर्म स्थापना का काम तो उन्होंने वहां से निकलने के बाद ही किया था। कंस वध के बाद उन्होंने पांडवों की सहायता से उस समय के दुष्ट राजाओं का संहार किया पर स्वयं कहीं हथियार का प्रयोग नहीं किया। स्पष्टतः वह यही संदेश दे रहे थे कि सारे काम केवल भगवान के भरोसे नहीं छोड़े जाने चाहिए। युद्ध जिनका विषय हो वही उसें संलिप्त हों और यह भी कि राज्य का काम धर्म स्थापना नहीं बल्कि वह समाज में लोगों द्वारा स्वयं किया जाना चाहिए। वृंदावन से जाकर द्वारिका में बसने के बावजूद उन्होंने धर्म स्थापना का काम नहंी छोड़ा। केवल परिवार में बैठकर मस्ती नहीं की बल्कि समाज के लिये ऐसा काम किया जो आज भी नवीनतम लगता है। श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान का वह वह समंदर जो बाहर से सूक्ष्म लगता है पर उसके अंदर विराट खजाना है।
श्रीगीता में निष्काम कर्म तथा निष्प्रयोजन दया जैसे शब्द बहुत सीमित दिखते हैं पर उनका भाव इतना गहरा है कि जो इनको समझ ले उसका तो पूरा ही जीवन आनंदमय हो जाये। निष्कर्ष यह है कि श्री कृष्ण जी का चरित्र केवल बालक्रीडा़ओं और प्रेमलीला तक ही सीमित नहीं है बल्कि जीवन जीने का एक ऐसा तरीका इसमें बताया गया है जो कहीं नहीं मिलता। यही कारण है कि भारत के पुराने मनीषियों ने महाभारत से श्रीमद्भागवत गीता को प्रथक कर उसे समाज के सामने प्रस्तुत किया।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर अपने मित्र ब्लाग लेखकों तथा पाठकों को हार्दिक बधाई। 
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लेखक संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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7/25/10

गुरु की पहचान अवश्य करें-गुरु पूर्णिमा पर विशेष लेख (guru ki pahachan-guru purnima par vishesh lekh)

                  आज गुरुपूर्णिमा का पावन पर्व पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। हमारे अध्यात्म दर्शन में गुरु का बहुत महत्व है-इतना कि श्रीमद् भागवत् गीता में गुरुजनों की सेवा को धर्म का एक भाग माना गया है। शायद यही कारण है कि भारतीय जनमानस में गुरु भक्ति का भाव की इतने गहरे में पैठ है कि हर कोई अपने गुरु को भगवान के तुल्य मानता है। यह अलग बात है कि अनेक महान संत गुरु की पहचान बताकर चेताते हैं कि ढोंगियों और लालचियों को स्वीकार न करें तथा किसी को गुरु बनाने से पहले उसकी पहचान कर लेना चाहिए। भारतीय जनमानस की भलमानस का लाभ उठाकर हमेशा ही ऐसे ढोंगियों ने अपने घर भरे हैं जो ज्ञान से अधिक चमत्कारों के सहारे लोगों को मूर्ख बनाते हैं। ऐसे अनेक कथित गुरु आज अधिक सक्रिय हैं जो नाम तो श्रीगीता और भगवान श्रीकृष्ण का लेते हैं पर ज्ञान के बारे में पैदल होते हैं।
ऐसा सदियों से हो रहा है यही कारण है कि संत कबीर ने बरसों पहले कहा था कि
‘‘गुरु लोभी शिष लालची दोनों खेलें दांव।
दोनों बूड़े बापुरै, चढ़ि पाथर की नांव।।
              गुरु और शिष्य लालच में आकर दांव खेलते हैं और पत्थर की नाव पर चढ़कर पानी में डूब जाते हैं। संत कबीर को भी हमारे अध्यात्म दर्शन का एक स्तंभ माना जाता है पर उनकी इस चेतावनी का बरसों बाद भी कोई प्रभाव नहीं दिखाई देता। आजकल के गुरु निरंकार की उपासना करने का ज्ञान देने की बजाय पत्थरों की अपनी ही प्रतिमाऐं बनवाकर अपने शिष्यों से पुजवाते हैं। देखा जाये तो हमारे यहां समाधियां पूजने की कभी परंपरा नहीं रही पर गुरु परंपरा को पोषक लोग अपने ही गुरु के स्वर्गवास के बाद उनकी गद्दी पर बैठते हैं और फिर दिवंगत आत्मा के सम्मान में समाधि बनाकर अपने आश्रमों में शिष्यों के आने का क्रम बनाये रखने के लिये करते हैं।
               आजकल तत्वज्ञान से परिपूर्ण तो शायद ही कोई गुरु दिखता है। अगर ऐसा होता तो वह फाईव स्टार आश्रम नहीं बनवाते। संत कबीर दास जी कहते हैं कि-
‘‘सो गुरु निसदिन बन्दिये, जासों पाया राम।
नाम बिना घट अंध हैं, ज्यों दीपक बिना धाम।।’’
                    उस गुरु की हमेशा सेवा करें जिसने राम नाम का धन पाया है क्योंकि बिना राम के नाम हृदय में अंधेरा होता है।
                राम का नाम भी सारे गुरु लेते हैं पर उनके हृदय में सिवाय अपने लाभों के अलावा अन्य कोई भाव नहीं होता। राम का नाम पाने का मतलब यह है कि तत्व ज्ञान हो जाना जिससे सारे भ्रम मिट जाते हैं। अज्ञानी गुरु कभी भी अपने शिष्य का संशय नहीं मिटा सकता। संत कबीरदास जी कहते हैं कि-
‘‘जा गुरु से भ्रम न मिटै, भ्रान्ति न जिवकी जाय।
सौ गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय।।’’
                       जिस गुरु की शरण में जाकर भ्रम न मिटै तथा मनुष्य को लगे कि उसकी भ्रांतियां अभी भी बनी हुई है तब उसे यह समझ लेना चाहिए कि उसका गुरु झूठा है और उसका त्याग कर देना चाहिए।
आजकल तो संगठित धर्म प्रचारकों की बाढ़ आ गयी है। अनेक कथित गुरुओं के पास असंख्यक शिष्य हैं फिर भी देश में भ्रष्टाचार और अपराधों का बोलबाला इससे यह तो जाहिर होता है कि भारत में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रभाव सर्वथा अभाव है। व्यवसायिक धर्म प्रचाकर गुरु की खाल ओढ़कर शिष्य रूपी भेड़ों को एक तरह से चरा रहे हैं। मजे की बात यह है कि ऐसे लोग भगवान गुरु नानक देव, संत कबीर दास, कविवर रहीम तथा भक्ति साम्राज्ञी मीरा के नाम का भी आसरा लेते हैं जिनकी तपस्या तथा त्याग से भारतीय अध्यात्म फलाफूला और विश्व में इस देश को अध्यात्म गुरु माना गया। आज के कथित गुरु इसी छबि को भुनाते हैं और विदेशों में जाकर रटा हुआ ज्ञान सुनाकर डॉलरों से जेब भरते हैं।
                   आखिर गुरु और ज्ञान कैसे मिलें। वैसे तो आजकल सच्चे गुरुओं का मिलना कठिन है इसलिये स्वयं ही भगवान श्रीकृष्ण का चक्रधारी रूप मन में रखकर श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करें तो स्वतः ही ज्ञान आने लगेगा। दरअसल गुरु की जरूरत ज्ञान के लिये ही है पर भक्ति के लिये केवल स्वयं के संकल्प की आवश्यकता पड़ती है। भक्ति करने पर स्वतः ज्ञान आ जाता है। ऐसे में जिनको ज्ञान पाने की ललक है वह श्रीगीता का अध्ययन भगवान श्रीकृष्ण को इष्ट मानकर करें तो यकीनन उनका कल्याण होगा। गुरुपूर्णिमा के इस पावन पर्व पर ब्लाग लेखक मित्रों तथा पाठकों बधाई देते हुए हम आशा करते हैं कि उनका भविष्य मंगलमय हो तथा उन्हें तत्व ज्ञान के साथ ही भक्ति का भी वरदान मिले।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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4/13/10

पति-पत्नी, मियां-बीवी और समाज-हिन्दी लेख

श्रीमद्भागवत गीता ‘भेदात्मक बुद्धि’ रखने वालों को आसुरी प्रवृत्ति का मानती है। इसलिये किसी भी ज्ञानी ध्यानी को मनुष्यों के कर्म पर बोलते या लिखते समय उसकी जाति, भाषा या कथित धर्म-इनको भ्रम भी कहा जा सकता है-का उल्लेख नहीं करते। मुश्किल तब शुरु होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र के नाम से ही परिचय देकर इस बात की जिद्द करता है कि उसे अपने समूह से जोड़कर देखा जाये। ऐसी बाध्यता अगर सामने है तो फिर अपनी बात कहने में रुकना भी नहीं चाहिये।
यह लेखक पहली बार मुसलमान समाज पर इसलिये लिख रहा है क्योंकि इसके ब्लाग पर अनेक बार इसी समाज से जुड़े लोग टिप्पणी करते हैं। दूसरी बात यह कि उनमें भारतीय अध्यात्म के प्रति झुकाव भी देखा गया है। टिप्पणियाों की संख्या पाठकों की संख्या से बहुत कम होती है। ऐसे में यह मानना पड़ता है कि इस लेखक के पाठों पर मुस्लिम समाज के पाठकों की संख्या देश की आबादी के अनुरूप ही होगी। इसी विश्वास के कारण यह लिखा जा रहा है। इसमें आलोचना हो सकती है पर यह परंपरागत रूप से वैसी नहीं होगी जैसी अक्सर चिढ़ाने वाली होती है। कोई नाखुश बंदा इस लेख का गलत अर्थ न लगाये इसलिये यह सफाई लिखनी पड़ रही है।
हम पति पत्नी और मियां बीवी के-यह लेखक लकीर का फकीर है इसलिये जैसा कि धर्म के ठेकेदार भाषा से उसको जोड़ते हैं इसलिये यह बताना जरूरी है कि हिन्दू में पति पत्नी और मुसलमानों में मियां बीवी-रिश्तों में अक्सर धर्म के कथित तत्वों को देखना चाहते हैं। यह इच्छा दो ही कारण से पैदा होती है। एक तो अपने आंख, कान तथा दिमाग को दूसरे के घर में आग देखकर प्रसन्नता के कारण होती है। दूसरा स्वयं को ज्ञानी साबित करने के लिये पंच होकर जाने का अवसर मिलता है। हिन्दू धर्म कभी एक संगठन के रूप में नहीं रहा इसलिये उसमें किसी भी संस्था द्वारा नियम बनाने का प्रावधान नहीं है और न ही पति पत्नी के संबंधों में राज्य, समाज या किसी समूह द्वारा हस्तक्षेप का प्रावधान है। पति पत्नी के संबंध टूटें या जुड़ें इसके लिये वह जिम्मेदार होते हैं। सदियों तक तो यह कायदा रहा है कि घर से विवाह कर जाती हुई बेटी को बाप कहता है कि ‘बेटी, जिस घर तेरी डोली जा रही है, वहीं से तेरी अर्थी उठेगी।’
इसके बावजूद हिन्दुओं के लिये विवाह विच्छेद का कानून बना पर इसका किसी ने विरोध नहीं किया क्योंकि कोई व्यक्ति या संगठन ऐसा करने का न तो आधार रखता है और न उसके पास जनसमर्थन होता है। इसलिये ही हिन्दुओं के विवाह और तलाक के विषय आज के आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों के लिये कोई विषय नहीं बनते। मगर हाल ही में पाकिस्तान के एक दूल्हे को लेकर भारत की दो लड़कियों के बीच जो जंग हुई उसमें तलाक और शादी दोनों ही इसलिये ही प्रचार का विषय बने क्योंकि तीनों ही मुसलमान थे। इस पर नियम से काम करने वाला उनका संगठन है जिसमें शायद काजी और मौलवी होते हैं। मुसलमानों में तलाक जितनी आसानी से मुंहजबानी होता है वैसा हिन्दुओं में नहीं है। यह अच्छी बात है पर जिस तरह तलाक का नाटक उक्त प्रकरण में देखने को मिला उससे जरूर मुस्लिम ज्ञानी भी नाराज हुए होंगे। मगर उनको यह समझ लेना चाहिये कि उनके नियमों ने ही आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों को यह अवसर प्रदान किया। इस लेखक का मानना है कि जहां विवाह न निभता हो वहां तलाक आसानी से होने देना चाहिये पर जिस तरह पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी अपने मियां से तलाक लेकर दूसरी शादी करने के लिये दबाव बना रही थी और दूसरी होनी वाली बीवी पहली वाली का मजाक बना रही थी वह चर्चा का विषय बना। सच तो यह है कि जिस तरह इसमें क्रिकेट और मध्य एशिया देशों के नाम आये उससे लगा कि कहीं न कहीं इसमें प्रायोजन है-पाकिस्तानी क्रिकेटर पर दूसरी लड़की को प्रभावित करने के लिये 16 करोड़ का खर्च तथा तलाक के लिये पहली बीवी को पंद्रह करोड़ देने जैसी बातें यह समाचार माध्यम करेंगे तो यह शक होना स्वाभाविक है।
अब आते हैं असली बात पर! जब यह प्रकरण चल रहा था तब पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी ने तलाक न देने के कारण अपने ही देश की दूसरी लड़की से निकाह करने अपने ही शहर में आये उस शौहर पर ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दायर कर दिया। मामला पुलिसा तक ही रहा। इस मामले के अदालत में जाने की संभावना नगण्य ही थी क्योंकि तब यह पेचीदा हो जाता। चूंकि तलाक होना था और निकाह भी इसलिये पर्दे के पीछे खेल चलता रहा।
इधर बहस भी हो रही थी। जिसमें कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी, पत्रकार, तथा मुल्ला मौलवी भी शामिल थे। वह अपनी किताबों के अनुसार बहस कर रहे थे पर वह नहीं जानते थे कि वह ऐसा कर कानूनी संकट को न्यौता भी दे रहे थे। चलो यह प्रकरण तो चूंकि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त प्रायोजन था-यह भी संभव है कि इन दोनों की सयुक्त समर्थक कोई लॉबी इससे जुड़ी हुई हो-इसलिये यह सब चल गया। भविष्य में वह याद रखें कि भारत में अब दहेज विरोधी कानून तथा घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं जो पति पत्नी तथा मियां बीवी पर समान रूप से लागू होते हैं। दहेज एक्ट तो केवल परिवार तथा रिश्तेदारों तक ही सीमित रहता है पर यह घरेलू हिंसा कानून तो किसी को भी लपेटे में ले सकता है।
उक्त बहस में पहली बीवी की शादी की वैधानिकता पर सवाल उठाने वाले बहुत जोखिम ले रहे थे। एक पुराने अभिनेता की शायद मुराद थी कि क्रिकेटर की शादी दूसरी वाली लड़की से हो जाये इसलिये उसने पहली वाली पर सवाल उठाया कि ‘निकाह नामे में गवाहों की वल्दियत है पर दूल्हा दुल्हन का नाम नहीं है। इसलिये यह शादी नहीं मानी जा सकती।’
यह निकाहनामा दूल्हे ने पाकिस्तान में बनवाया था। मुस्लिम कानून के हिसाब से यह शादी अवैध भी होती तो भी वह घरेलू हिंसा के आरोप से बच नहीं सकता था उल्टे यही उसके खिलाफ सबूत भी बन सकता था कि उसने चालाकी की। बात यहीं नहीं रुकती। पीड़ित लड़की अगर उस समाचार की सीडी वगैरह लेकर अदालत में सीधे ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दूल्हे पर दायर करती और साथ में अभिनेता का भी नाम यह कहते हुए देती कि यह भी हैं हमारे पाकिस्तानी क्रिकेटर मियां के भारतीय अभिनेता समर्थक।’ तब उनके लिये मुश्किल हो सकती थी। बाद में फैसला चाहे जो भी होता पर फिलहाल उनको अदालत में तो जाना ही पड़ सकता था।
कुछ मुल्ला मौलवी भी पहली बीवी के निकाह पर शक कर रहे थे पर यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता था। कारण दहेज निरोध तथा घरेलू हिंसा कानून ऐसे हैं जिनमें किसी धर्म की पुस्तक का अध्ययन शामिल नहीं है। यही सही है कि इन कानूनों का दुरुपयोग इसलिये न्यायाधीश तथा पुलिस वाले बहुत सतर्कता पूर्वक विवेचना कर निर्णय तथा कार्यवाही करते हैं पर अगर उनको यकीन हो जाये कि महिला वाकई पीड़ित है तो उसके बाद जो होता है वह अभियुक्त के लिये तकलीफदेह हो सकता है।
इस प्रसंग में एक दिलचस्प बात पता चली कि पाकिस्तान में भी एक कानून है कि पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने पर वहां एक साल की सजा है। अनेक गैर मुस्लिम यहां ऐसा कानून न होने पर आपत्तियां कर रहे हैं। उनको शायद अंदाजा नहीं है कि घरेलू हिंसा तथा दहेज निरोध कानून ऐसे हैं जिनके चलते ऐसा कानून न होना कोई मायने नहीं रखता। अभी तक मुस्लिम समाज को लेकर अनेक ऐसे प्रायोजित समाचार और बहसें सुनने में आती हैं जिनका निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता। मुल्ला मौलवी भी वहां आकर अपने धार्मिक कानून की वकालत करते हैं। अब उनके पास ऐसे अवसर आये तो वह पहले इस बात की तहकीकात कर लें कि जिस बहस में वह जा रहे हैं वह तथा जिस समाचार के लिये हो रही है वह प्रायोजित है। यह भी पक्का कर लें कि वह न्यायालय में नहीं जायेगा। कहने का आशय यह है कि नकली मुठभेड़ हो। अगर कहीं असली वाक्या हुआ और वह इसी तरह ही बयानबाजी करते रहे, उधर कोई महिला अत्यंत दुःखी है और इस तरह का अपमान होने पर वह क्रुद्ध हो उठी तो यह दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं कि उनको भी दायरे में वह पति उसके परिवार तथा सहयोगियों को भी ले सकती है। वैसे मुस्लिम महिलाओं की स्थिति देखते हुए ऐसी संभावना कम ही लगती है क्योंकि अभी भी मुस्लिम महिलायें सामाजिक शिकंजे में फंसी है जो मुक्त है वह ऐसे प्रायोजित प्रचारकों के दायरे बाहर रहती हैं।
यह सही है कि मुसलमानों के लिये अलग से व्यक्तिगत कानून हैं पर दहेज एक्ट तथा घरेलू हिंसा कानून आने से महिलाओं पर दबाव बनाये रखने की मुस्लिम शिखर पुरुषों की शक्ति अब वैसी नहीं रही। वैसे इन दोनों कानूनों में अधिकतर मामले हिन्दू समाज के ही दर्ज होने का अनुमान लगता है-सच का पता किसी को नहीं है-पर उस पाकिस्तानी दूल्हे की एक लड़की से बेवफाई तथा दूसरी से प्यार के नाटक में ‘घरेलू हिंसा’ कानून का उल्लेख होने के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। सो न केवल बहसों से बचें बल्कि मियां बीवी के निजी मसलों पर लिखित रूप से भी न कहें क्योंकि उसका इस्तेमाल सबूत के रूप में किसी महिला को पीड़ित करने में सहयोग करने के आरोप को सिद्ध करने में हो सकता है। यह लेखक न वकील है न इसे कोई धार्मिक प्रचारक, केवल इधर उधर देखे गये मामलों पर यह लिखा गया है। इसका पाठ का एक उद्देश्य अपने मुस्लिम समुदाय के पाठकों को यह समझाना भी है कि वह देशकाल की स्थिति को देखकर ही आगे चलें। जहां तक हो सके अपने घर की महिलाओं के प्रति सद्भाव रखें तथा दूसरे के पारिवारिक झगड़ों में पंचायत करने से बचें क्योंकि यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता है। अब पुराना समय नहीं रहा और न चाहते हुए भी उनको अपनी सोच बदलनी होगी।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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12/4/09

भारतीय अध्यात्म ज्ञान की पहचान है सौम्यता का गुण -आलेख (bharatiya adhyatm-hindi lekh

विश्व में भर में अनेक धर्म प्रचारित है जिनमें हिन्दू धर्म भी एक माना जाता है। दरअसल इसको लेकर अनेक तरह के विवाद हैं क्योंकि सारे धर्मों की कोई न कोई पवित्र पुस्तक है जिसके आधार पर उनके अनुयायी चलते हैं पर हिन्दुत्व को धर्म के रूप में स्थापति करने वाला तो पुस्तकों का एक पूरा समूह है जिनका अगर संकलन किया जाये तो एक लघु वाचनालय बनाना पड़ता है। उसमें भी एक समस्या है कि किसी भी पौराणिक ग्रंथ में हिन्दू को धर्म की तरह स्थापित नहीं किया गया। बल्कि मनुष्य की उच्च प्रकृत्ति, सत्कर्म तथा पवित्र संकल्प को धर्म तथा इसके विपरीत होने पर उसे अधर्म माना गया है। बात उससे भी आगे जाती है क्योंकि भारतीय अध्यात्म का सार संकलित रखने वाली श्रीमद्भागवत गीता तो ज्ञान के साथ विज्ञान की जानकारी की भी प्रेरणा देती है। उससे भारतीय धर्म मानने वालों को नित प्रति समय, पर्यावरण तथा रहन सहन में आने वाले परिवर्तनों के साथ चलने का उपदेश मिलता है। उसमें भी किसी धर्म का नाम स्थापित नहीं किया। इसका आशय यह है कि हिन्दू को धर्म केवल विदेशी विद्वानों द्वारा ही माना गया है जिसे यहां के कथित बुद्धिजीवियों ने मान लिया।

कुछ लोग कहते हैं कि हिन्दुत्व तो एक जीवन शैली है। कोई मानता है कि हर आदमी पैदा तो हिन्दू के रूप में ही होता है और तब तक रहता है जब तक वह कोई दूसरा धर्म नहीं मान लेता। हिन्दुत्व वास्तव में मनुष्यत्व का ही रूप लगता है क्योंकि इसमें खानपान, रहन सहन, तथा नित्यक्रिया को लेकर कोई नियम तय नहीं है बल्कि हर स्थिति में अपने निश्चय, विचार, सत्कर्म तथा भक्ति पर दृढ़ रहने का संदेश है। इतना ही नहीं जहां अन्य विचाराधाराओं के विद्वान अपनी पुस्तकों की महिमा गाते हैं वहीं श्रीमद्भागवत गीता तो कहती है कि उसका ज्ञान केवल अपने भक्तों को ही सुनाया जाये। इतना ही नहीं हिंसक व्यक्ति को न केवल तामसी प्रवृत्ति का बताया गया है और उससे दूर रहने का भी संदेश दिया गया है। ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण श्रीमद्भागवत गीता समग्र ज्ञान का सार होने के बावजूद हिन्दूत्व की अकेली पहचान नहीं है-यह अलग बात है कि उस जैसा ग्रंथ विश्व में कोई दूसरा नहीं है जो मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाता है।

अगर हमने यह मान लिया है कि हमारा विचार और कर्ममार्ग ही श्रेष्ठ है और उसमें समय, पर्यावरण तथा विश्व समाज के अनुसार परिवर्तन नहीं करेंगे तो यह अहंकार का भाव है जो हमें जीवन को सही ढंग से जीने नहीं देता। विश्व में अनेक प्रकार के धर्म और विचारधारायें हैं जिनको मानने वाले लोग इस भाव से जीते हैं कि जैसे उनका जीवन उसी की ही देन है जबकि वास्तविकता यह है कि पांच तत्वों से बनी इस देह में तीन प्रकृतियां स्वतः प्रवेश कर उसका संचालन करती है। मुख्य रूप से अहंकार की प्रकृत्ति मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु है जिसके वशीभूत इंसान उस हर वस्तु को श्रेष्ठ समझता है और उस कर्म को ही सत्कर्म मानता है जिससे वह स्वयं क्रता है। इसके अलावा अपने ही इष्ट को सबसे अधिक पवित्र मानता है। विश्व में इसी अहंकार के वशीभूत सारे संघर्ष होते हैं क्योंकि श्रेष्ठता का भाव आदमी के अंदर ऐसा अहंकार पैदा करता है जो उसे हमेशा असंतुष्ट बनाये रखता है। यही असंतोष अनेक प्रकार के एतिहासिक संघर्षों का कारण बना है।

इसके बावजूद यह सत्य है कि भारतीय इतिहास में धार्मिक विवादों पर बहस चलती रही है पर यहां हिंसा नहीं हुई। किसी राजा ने किसी दूसरे राजा पर इसलिये हमला नहीं किया कि वहां की प्रजा उसके इष्ट को नहीं मानती। इतना ही नहीं बड़े बड़े धार्मिक संतों ने किसी भी प्रकार से सर्वशक्तिमान के किसी एक रूप को ही श्रेष्ठ बताने का प्रयास नहीं किया बल्कि सभी को एक ही परमात्मा का रूप माना है। किसी एक भाषा को भी सर्वशक्तिमान की नहीं माना। हर भाषा में अपने अपने ढंग से अध्यात्मिक विचार व्यक्त किये जाते रहे। अलबत्ता अंग्रेजी में पारंगत होकर नौकरी या व्यवसाय पाने की चाहत ने लोगों को अपनी देश की भाषाओं से दूर जरूर कर दिया है क्योंकि बदलते समय में अपने देश में आधुनिक प्रकार के रोज्रगार कम ही रहे हैं-जिनमें गुलामी साहब बनकर की जाती है। लोगों के रोजगार में नौकरी की महत्ता बड़ी तो उन्होंने विदेशी भाषाओं संस्कृति को आत्मसात करने का प्रयास किया है। कालांतर में यही प्रवृत्ति समाज के आंतरिक संघर्ष का कारण जरूर बनी पर अब समय के साथ लोगों को यह समझ में आ रही है कि पश्चिम का मायाजाल की राह भारत का आदमी नहीं चल सकता क्योंकि इन प्राचीन ग्रंथों में वर्णित कुछ अध्यात्मिक गुण उसके रक्त में ही रहते हैं जिससे वह धार्मिक भाव से दूर नहीं रह सकता।

इधर धर्म के आधार पर अनेक तरह के वाद विवाद चलते हैंें। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित कुछ संदेश -जो कि समय के साथ हिन्दू धर्म मानने वालों के लिये ही अप्रासंगिक हो गये हैं-गैर हिन्दू धर्म के विद्वानों की दृष्टि में वही बसे हैं जिनको लेकर वह आये दिन प्रतिकूल बोलकर अपनी श्रेष्ठता साबित करते हैं। इसका कारण यह है कि भारतीय प्रचार माध्यम अपने आपको निष्पक्ष साबित करने के लिये उनके बयान खूब छापते हैं। बाजार के उदारीकरण ने इसे अधिक बढ़ाया है। ऐसे में मुश्किल यह होती है कि समझाया किसे क्या जाये। वैसे हिन्दू धर्म वास्तव में एक जीवन शैली है क्योंकि समय के साथ परिवर्तन की प्रवृत्ति ही मनुष्य होने का प्रमाण है। दूसरी बात यह भी है कि अन्य विचाराधाराओं के मानने वालों की तो एक ही पुस्तक है और वह उनके आधार पर ही विश्व समाज को चलते देखना चाहते हैं। वह उसका प्रचार कर अपने को धार्मिक साबित करते है। हिन्दू लोग कहलाने वालों की पहले तो एक कोई पुस्तक नहीं है दूसरे श्रीगीता ने सभी पुस्तकों का सार अपने अंदर समाहित कर दिया है। उसका तत्वज्ञान अधिक विस्तृत नहीं है और निष्काम कर्म, निष्प्रयोजन दया और योग साधना कर जीवन को तनाव मुक्त कैसे किया जा सकता है इसके लिये अधिक लिखने या पढ़ने की जरूरत नहीं है। बच्चा बच्च इसे जानता है। इसलिये हिन्दू लोग उसे लेकर अधिक बहस नहीं करते। दूसरी बात यह है कि इन धार्मिक ग्रंथों को भले ही हिन्दू अधिक न पढ़ते हों पर घर परिवार तथा समाज में सत्संगों में सभी इसे जानते हैं। उनके अंदर अध्यात्मिक का स्त्रोत सदैव रहता है। वह अपने जीवन की परिशानियों के लिये किसी से राय लेने नहीं जाते। अपनी बुद्धि और विवेक के प्रति यह उनका स्वाभाविक आत्मविश्वास है कि अगर कोई अच्छी बात कहता भी है तो उसे किसी पुस्तक का हवाला देने की जरूरत नहीं होती जबकि अन्य विचाराधारा के लोगों को इसके लिये अपनी किताब का हवाला देना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि हिन्दू समाज में अंहकार की कमी है पर वह धर्म को लेकर कभी ऐसा प्रदर्शन नहीं करते कि उनका विचार ही सर्वश्रेष्ठ है या उनका ही इष्ट का स्वरूप ही प्रमाणिक है। यही कारण है कि धार्मिक विवादों में कटुता का भाव उनमें नहीं आता। कुछ लोग हिन्दुओं में सर्वशक्तिमान के किसी एक रूप को नहीं गलत मानते है पर यही इसी समाज की पहचान है क्योंकि वह सभी रूपों सर्वशक्तिमान को निरंकार रूप की कल्पना करता है। यही सौम्यता हिन्दुत्व की ताकत है।
आखिरी बात यह है कि जीवन और मृत्यु के मूल तत्व कभी नहीं बदलते। अलबत्ता इसके मध्य जो संसार है वह परिवर्तनशील है क्योंकि उसमें भी कुछ ऐसे तत्व है जो जीवन की परिधि में आते हैं जिससे बनने बिगड़ने की नियति से वह बच नहीं सकते। यह सत्य केवल भारतीय अध्यात्म ज्ञान में ही वर्णित है इसलिये हिन्दू समाज आगे बढ़ता जाता है जबकि अन्य विचारधारा वाले अपनी पुराने सिद्धांतों का गुणगान करते हैं यह अलग बात है कि यह उनका दिखावा ही होता है वरना वह स्वयं भी अपनी जीवन शैली बदलते हैं पर क्योंकि उनके पास नये समय में कहने के लिये कुछ नहीं होता पर अहंकार है कि इसके लिये बाध्य करता है कि वह अपनी बात को ठीक कहें। कम से कम भारतीय समाज अपने अध्यात्मिक गुणों के कारण इस प्रकार के झगड़ों से दूर ही रहता है यह खुशी की बात है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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11/8/09

योग साधना के व्यापक अर्थ हैं-चिंत्तन आलेख (yogsadhna-hindi lekh)

वह योगासन शिक्षक हैं न कि एक संपूर्ण योग गुरु-कम से कम योग के संबंध में उनका से कथन कि ‘योग तो एक सांस लेने की क्रिया  है’ यही समझा में आ सकता है। जिस भारतीय योग को हम जानते हैं उसके आठ भेद हैं-यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्यहार,धारणा,ध्यान और समाधि।
भारतीय योग एक विज्ञान है न कि एक सामान्य व्यायाम। योग का सामान्य अर्थ है ‘जोड़ना’ पर वास्तव में इसका भावार्थ है स्वयं को पहले आत्मा और फिर परमात्मा से जोड़ना। इसमें संकल्प का सबसे बड़ा खेल है। अगर साधक का संकल्प पवित्र और दृढ़ है तो वह समस्त प्रक्रियाओं को सहजता से पार करता है। योग जीवन जीने की एक कला है न कि केवल अपने को स्वस्थ रखने वाला व्यायाम।
पहले हम संकल्प की बात करें। सांस तो सभी लेते हैं। बुद्धिमान विक्षिप्त, ज्ञानी विज्ञानी, अपराधी फरियादी और विशिष्ट सामान्य मनुष्य हमेशा सांस लेते हैं। फिर भी सभी प्रकार के मनुष्यों में अंतर होता है जो उनके कर्म तथा व्यवहार से प्रकट होता है। इस संसार में दो ही मार्ग हैं एक है योग का दूसरा है रोग का। भोग तो सभी करते हैं पर योगी न केवल संयम बरतते हुए उसका पूरा आनंद उठाते हैं जबकि भोगों में ही अपना लक्ष्य देखने वाले रोग की तरफ अग्रसर होते हैं और उनका आनंद भी क्षणिक ही प्राप्त होता है।
मनुष्य का संकल्प हमेशा पवित्र होना चाहिये। उसके बाद आता है नियम। योग करने के लिये हमेशा साफ सुथरा स्थान चुनना चाहिये। जिन वस्तुओं के उपभोग को योग ज्ञान निषिद्ध बताता है उससे परे रहना चाहिये। योग हमेशा खाली पेट प्रातः करना चाहिये। अगर शाम को करना हो तो पांच घंटे पूर्व कोई वस्तु खाना नहीं चाहिए। अर्थात इसका नियम है। फिर आते हैं योगासन और प्राणायम पर। योगासन के माध्यम से अपनी देह के विकार निकालते हुए बाद में प्राणायाम के द्वारा अपने विकारों को ध्वस्त करना भी जरूरी है। फिर आता है धारणा, प्रत्याहार तथा समाधि। कहने का तात्पर्य यह है कि योग एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे गुजर कर मनुष्य अपने जीवन में प्रखरता और तीक्ष्ण बुद्धि प्राप्त करता है।
अब हम उन योग शिक्षक द्वारा दिये जा रहे प्रशिक्षण की बात करें तो निश्चित रूप से उनकी प्रशंसा करना चाहिये। सच तो यह है कि जो लोग योग करना चाहते हैं यह योगासन और प्राणायाम उनके अनुसार सीख लें। अब सवाल आता है कि फिर आखिर उनसे असहमति किस बात की है। हमारी असहमति तो केवल इस बात पर है कि योग साधना का इतना संकीर्ण उद्देश्य मत प्रचारित करिये कि पूरा विश्व उसे केवल दैहिक साधना मानकर रह जाये। बात थोड़ी आगे भी करें तो लगता है कि जब आदमी देह और मन के विकारों से मुक्त हो जाता है तो वह इतना प्रखर और बुद्धिमान हो जाता है कि उस पर कोई अपनी बात बिना प्रमाण के लाद नहीं सकता। वह मन और देह का ऐसा विशेषज्ञ हो जाता है जो अपने चित्त की अवस्था को भी दृष्टा की तरह देखता है। निद्रा और जाग्रतावस्था दोनों में वह सतर्क रहते हुए जीवन का आनंद आता है।
योग को व्यायाम या सांस लेने की क्रिया कहना अपना अज्ञान प्रदर्शन करना ही है। उसी तरह यह कहना कि योग से किसी धर्म को खतरा नहीं है, अपने आप में इसका प्रमाण है कि इसका अध्यात्मिक महत्व आपको नहीं मालुम है। योग साधना करते हुए आदमी आत्मकेंद्रित होता चला जाता है और जब वह दृष्टा की तरह चरम विचार के शिखर पर पहुंचता है तब उसे जो आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है उसके आगे आज के सारे मौजूदा धर्म एक भ्रम लगते हैं। तय बात है जो जितना परमात्मा के निकट जाकर निहारेगा उतना ही उसके नाम पर फैलाये भ्रम से मुंह फेरेगा। इस हिसाब से तो धर्म के नाम पर फैले कर्मकांड उसके लिये त्याज्य हो जायेंगे। इसे वह लोग जानते हैं जो योग साधना के प्रभाव को प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। खासतौर से जो श्रीगीता का अध्ययन कर ले उसके सामने तो सारे संसार  का सत्य खड़ा हो जाता है। एक बात जो साधकों को परेशान करती है कि वह अपने इस जीवन के उतार चढ़ाव की पहचान कैसे करें? इसके लिये उनको ज्ञान की जरूरत पड़ती है और यह उद्देश्य श्रीमद्भागवत गीता जैसे पवित्र और बहुत शानदार ग्रंथ का अध्ययन कर प्राप्त किया जा सकताहै। विश्व प्रसिद्ध योग शिक्षक योगासन और प्राणायम में अत्यंत दक्ष हैं पर श्री मद्भागवत गीता के संदेश का अर्थ अभी उनको समझना होगा। श्रीगीता का ज्ञान पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण करना भी जरूरी है जो कि योग का ही एक भाग है।
जो साधक दक्ष हो गये वह धर्म के नाम चल रही भ्रामक विचारों को त्याग देंगे। कर्मकांड उनको बेकार लगेंगे। श्रीमद्भागवत गीता में स्वर्ग पाने के विचार को त्यागने का स्पष्ट मत व्यक्त किया गया है और भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को छोड़ कर अन्य सभी विचाराधारायें स्वर्ग का सपना दिखाती हैं।
अब तो यह लगने लगा कि योग साधकों को श्रीमद्भागवत गीता को पढ़ने और समझने का विचार करना चाहिए। जब योगासन और प्राणायाम से देह और मन के विकार निकल जाते हैं तब एक स्फूर्ति आती है तब मन कुछ नया चाहता है। ऐसे में आदमी के अहंकार और प्रचार का मोह भी आ जाता है जो उसे ऐसे रास्ते पर ले जाता है जहां भटकाव के अलावा और कुछ नहीं होता। योग शिक्षक विश्व भर में लोक प्रिय हैं पर अभी भी शायद कहीं कुछ बाकी है जो अन्य विचाराधाराओं के समूहों में अपना लोहा मनवाना चाहते हैं। अपने समुदाय में शायद उनको लगता है कि अब इससे अधिक सम्मान प्राप्त नहीं कर सकते। अगर ऐसा न होता तो शायद वह ऐसी जगह न जाते जो बाद में उनके लिये बदनामी का कारण बनती। एक बाद तय रही कि योगासन और प्राणायाम करने से दैहिक और मानसिक रूप से स्वस्थ भले ही हो जाये पर ज्ञानी नहीं हो जाता है। उसके लिये जरूरी है श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन ताकि वह समझ सके कि जीवन का रहस्य क्या है?
दूसरी बात यह है कि योगसाधना ओउम शब्द तथा मंत्रों के जाप बिना अधूरी है-कम से गात्रत्री मंत्र तो अवश्य ही जाप करना चाहिये। श्रीगीता में ओउम शब्द तथा गायत्री मंत्र का महत्व प्रतिपादित किया गया है। याद रखिये श्रीमद्भागवत गीता का कथन भगवान श्रीकृष्णजी का है जिनको योगेश्वर भी कहा जाता है। चूंकि दूसरी विचाराधारा के लोग इसे स्वीकार नहीं करते इसलिये उनको आधीअधूरी योग साधना बताकर उनको भ्रमित करना ठीक नहीं है। फिर इस समय सबसे बड़ी बात तो यह है कि पहले अपने पूरे समुदाय में जाग्रति लाने का प्रयास ही जारी रखना चाहिये। यह काम खत्म नहीं हुआ है भले ही प्रचार माध्यमों में ऐसा प्रचार होते दिखता है। दूसरी बात यह है कि यह सम्मान इसलिये भी मिल रहा है क्योंकि आपका अपना समुदाय ही दे रहा है और जिसकी ताकत विश्व भर में फैली है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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11/2/09

आज श्री गुरुनानक जी का 541वां प्रकाश पर्व-आध्यात्मिक लेख (gurunanak jayanti and prakash parv-hindi lekh)

आज श्री गुरुनानक देव जी का 541वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। सच तो यह है कि समाज को अमृत संदेश देने वाले महापुरुष आत्मा को अजन्मा और अमर मानते हैं इसलिये उनकी जयंती का प्रकाशपर्व में रूप में ही मनाया जाना चाहिये क्योंकि वह प्रकट होकर फिर अपने परमधाम चल जाते हैं और उनकी देह ही केवल जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त होती है जबकि वह स्वयं अपने भक्तों के स्मरण में सदैव जीवंत रहते हैं।

श्री गुरुनानक देव जी ने स्वयं किसी धर्म की स्थापना नहीं की। उनके बाद आये गुरुओं से अपने समय की हालातों को देखकर सिख पंथ की स्थापना भी धर्म रक्षा के लिये की थी। श्री गुरुनानक देव जी का जीवन सदैव समाज चिंतन और सुधार में बीता। बहुत कम लोग हैं जो आज के सभ्य भारतीय समाज में उनकी भूमिका का सही आंकलन कर पाते हैं। उनके काल में भारतीय समाज अंधविश्वासों और कर्मकांडों के मकड़जाल में फंसा हुआ था। कहने को लोग भले ही समाज की रीतियां निभा रहे थे पर उसकी रक्षा के लिये उनके पास कोई योजना नहीं थी। राजनीतिक रूप से विदेशी आक्रांता अपना दबाव इस देश पर बड़ा रहे थे। उसके साथ ही उनके साथ आये कथित विद्वान लोगों को माया मोह की तरफ दौड़ाते दिखे। अधिकतर राजाओं का जीवन प्रजा की भलाई की बजाय अपने निजी राग द्वेष में बीत रहा था। वह राज्य के व्यवस्थापक का कर्तव्य निभाने की बजाय उसके उपभोग के अधिकार में अधिक संलग्न थे। यही कारण था कि जन असंतोष के चलते विदेशी राजाओं ने उनको हराने का सिलसिला जारी रखा। इधर सामान्य लोग भी अपने कर्मकांडो में ऐसे लिप्त रहे उनके लिये ‘कोई नृप हो हमें का हानि’ की नीति ही सदाबहार थी।

मुख्य विषय यह था कि समाज धीरे धीरे विदेशी मायावी लोगों के जाल में फंसता जा रहा था और अपने अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति उसका कोई रुझान नहीं था। ऐसे में महान संत श्री गुरुनानक देव जी ने प्रकट होकर समाज में अध्यात्मिक चेतना जगाने का जो काम किया वह अनुकरणीय है। वैसे महान संत कबीर भी इसी श्रेणी में आते हैं। हम इन दोनों महापुरुषों का जीवन देखें तो न वह केवल रोचक, प्रेरणादायक और समाज के लिये कल्याणकारी है बल्कि सन्यास के नाम पर समाज से बाहर रहने का ढोंग करते हुए उसकी भावनाओं का दोहन करने वाले ढोंगियों के लिये एक आईना भी है जिसमें वह तथा उनके भक्त असलियत देख सकते हैं। इन दोनों महापुरुषों ने पूरा जीवन समाज में रहकर समाज के साथ व्यतीत किया। भारतीय अध्यात्मिक संदेश अपने पांवों पर अनेक स्थानों घूमते हुए सभी जगह फैलाया। श्री गुरुनानक देव जी तो मध्य एशिया तक की यात्रा कर आये।
श्री गुरुनानक देव जी के सबसे निकटस्थ शिष्य मरदाना को माना जाता है जो कि जाति से मुसलमान थे। आप देखिये उन्होंने अपना पूरा जीवन गुरुनानक जी के सेवा में गुजारा। इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उसने कोई अपना धर्म छोड़ने या पकड़ने का नाटक किया। दरअसल उस समय तक धर्म शब्द के साथ कोई संज्ञा या नाम नहीं था। मनुष्य यौनि मिलने पर संयम, परोपकार, दया तथा समभाव से जीवन व्यतीत किया जाये-यही धर्म का आशय था। आज धर्मों के जो नाम मिलते हैं वह एक सोचीसमझी साजिश के तहत समाज को बांटकर उस पर शासन करने की नीति का परिणाम है।
श्री गुरुनानक देव जी के समय इस देश में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक दृष्टि से संक्रमण काल था। वह जानते थे कि भौतिकवाद की बढ़ती प्रवृत्ति ही इस समाज के लिये सबसे बड़ा खतरा है और जिसमें धार्मिक कर्मकांड और अंधविश्वास अपनी बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। इससे व्यक्ति की चिंतन क्षमता का हृास होता है और वह बहिर्मुखी होकर दूसरे का गुलाम बन जाता है। भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता मनुष्य को दास बना देती है। अधिक संचय की प्रवृत्ति से बचते हुए दान, सेवा और परोपकार करने से ही समाज समरसता आयेगी जिससे शांति और एकता का निर्माण होगा-यही उनके संदेशों का सार था। सबसे बड़ी बात उनका जोर व्यक्ति निर्माण पर था। हम अगर इस पर विचार करें तो पायेंगे कि व्यक्ति मानसिक रूप से परिपक्व, ज्ञानी और सजग होगा तो भले ही वह निर्धन हो उसे कोई भी बांध नहीं सकता। यदि व्यक्ति में अज्ञान, अहंकार तथा विलासिता का भाव होगा तो कोई भी उसे पशु की तरह बांध कर ले जा सकता है। आज हम देख सकते हैं कि टीवी चैनलों पर कल्पित पात्रों पर लोग किस तरह थिरक रहे हैं। उसी में अपने नये भगवान बना लेते हैं। कई युवक युवतियों यह कहते हुए टीवी पर देखे जा सकते हैं कि हम तो अमुक बड़ी हस्ती को प्यार करते हैं। यह अध्यात्मिक ज्ञान से दूरी का परिणाम है। इसलिये आवश्यकता इस बात है कि बजाय हम इस बात पर विचार करें कि दूसरे धर्म के लोग हमारे विरोधी हैं इस बात पर अधिक जोर देना चाहिये कि हमारे समाज का हर सदस्य दिमागी रूप से परिपक्व हो। अध्यात्मिक रूप से अपरिपक्व युवक हो युवती समाज रक्षा में सहयोगी नहीं बन सकते।

इस देश की मुख्य समस्या यह है कि मनुष्य ही मनुष्य का पशु रूप में दोहन करता है। श्री गुरुनानक देव जी ने इसी तरफ इशारा करते हुए कहा है कि
‘जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु।’
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य का ही रक्त पीता है उसका चित कैसे निर्मल हो सकता है।
‘खावहि खरचहि रलि मिलि भाई।
तोटि न आवै वधदो जाई।।;;
हिंदी में भावार्थ-
भाई, सभी मिलकर खर्च करो और खाओ। इससे टोटा नहीं पड़ता बल्कि वृद्धि होती है।’
ऐसे एक नहीं हजारों संदेश है जो आज के संदर्भ में ही उतने प्रासंगिक हैं जितने उनके इस धरती पर प्रकट रहते हुए थे। ऐस महान संत श्री गुरुनानक देव जी का स्मरण करने मात्र से हृदय प्र्फुल्लित हो उठता है। उनका जीवन इसलिये भी प्रेरक है क्योंकि उन्होंने उसे सामान्य मनुष्य की तरह बिताया। ऐसे महान संत को कोटि कोटि प्रणाम। वाहे गुरु की जय, वाहे गुरु की फतह।

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9/28/09

आज दशहरा है-आलेख (today dashahara-hindi lekh)

         आज पूरे देश में दशहरे का त्यौहार मनाया जा रहा है। जिस दिन भगवान श्रीराम जी ने रावण का वध किया उसी दिन को ‘दशहरा पर्व के रूप में मनाया जाता है। पर्व मनाना और उससे निकले संदेश को समझना अलग अलग विषय हैं। ऐसे अवसर पर अपने इष्ट का स्मरण कर उनके चरित्र का स्मरण करने से पर्व मनाने में मजा आता है। देखा यह गया है की धार्मिक चित्तक समाज के सदस्यों को समाज समय पर एकत्रित होकर आध्यात्मिक चित्तन के लिए पर्वों जैसे अवसरों का निर्माण करते हैं बाज़ार उसे उत्सव जैसा बनाकर उपभोग की वस्तुएं बेचने का मार्ग बना लेता है, इस कारण ही चित्तन की बजाय उल्लास मनाने की प्रवृति पैदा होती है।
क्या राम और रावण के बीच केवल सीता की मुक्ति के लिये हुआ था? इस प्रश्न का उत्तर एक प्रतिप्रश्न है कि क्या अगर रावण सीता का अपहरण नहीं करता तो उनके बीच युद्ध नहीं होता?
         अगर तत्कालीन स्थितियों का अध्ययन करें तो यह युद्ध अवश्यंभावी था और रावण ने सीता का अपहरण इसी कारण किया कि भगवान श्रीराम अगर सामान्य मनुष्य हैं तो पहले तो सीता जी को ढूंढ ही न पायेंगे और उनके विरह में अपने प्राण त्याग देंगे। यदि पता लग भी गया और उनको वापस लाने के युद्ध करने लंका तक आये तो उन्हें मार दिया जायेगा। अगर भगवान हैं तो भी उनकी आजमायश हो जायेगी।
         जब भगवान राम लंका तक पहुंच गये तब रावण को आभास हो गया था कि भगवान श्री राम असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी हैं पर तब वह उनसे समझौता करने की स्थिति में वह नहीं रहा था क्योंकि श्री हनुमान जी ने लंका दहन के समय उसके पुत्र अक्षयकुमार का वध कर दिया था। यह पीड़ा उसे शेष जीवन सहजता ने नहीं बिताने देती। ऐसे में युद्ध तो अवश्यंभावी था।
       अगर रावण श्रीसीता का अपहरण नहीं भी करता तो भी अपनी बनवास अवधि बिताने के लियें दक्षिण दिशा की ओर बढ़ रहे श्रीराम जी से उसका युद्ध होना ही था। आखिर यह युद्ध क्यों होना था? इसे जरा आज के संदर्भ में देखें तो पता चलेगा कि अब फिर वैसे ही हालत निमित हो गये हैं हालांकि अब कोई न रावण जैसा ताकतवर दुष्ट है न ही भगवान श्रीराम जैसा शक्तिशाली और पराक्रमी।
          दरअसल रावण भगवान शिव का भक्त था और उसे अनेक प्रकार वरदान मिले जिससे वह अजेय हो गया। अपने अहंकार में न वह केवल भगवान शिव को भूल गया बल्कि अन्य ऋषियों, मुनियों, और तपस्वियों की दिनचर्या में बाधा डालने लगा था। वह उनके यज्ञ और हवन कुंडों को नष्ट कर देता और परमात्मा के किसी अन्य स्वरूप का स्मरण नहीं करने पर मार डालता। इसके लिये उसने बकायदा अपने सेवक नियुक्त कर रखे थे जिनका वध भगवान श्री राम के हाथ से सीता हरण के पूर्व ही हो गया था।
         भगवान श्रीराम को रावण की पूजा पद्धति से कोई बैर नहीं था। वह तो भगवान शिव जी भी आराधना करते थे। वह दूसरे की पूजा पद्धति को हेय और इष्ट को निकृष्ट कहने की रावण प्रवृत्ति के विरुद्ध थे। भगवान श्रीराम की महानता देखिये उन्होंने रावण के शव को उसकी परंपराओं के अनुसार ही अंतिम संस्कार की अनुमति दी। कहने का तात्पर्य यह है कि अपना धर्म-उस समय धर्म का कोई नाम नहीं था इसलिये पूजा पद्धति भी कह सकते हैं-दूसरे पर लादने के विरुद्ध थे और यही कारण है कि उन्होंने अपने संदेशों में किसी खास पूजा पद्धति की बात नहीं कही है। इसके विरुद्ध अहंकारी रावण दूसरों की पूजा पद्धति में न केवल विघ्न डालता वरन् आश्रम और मंदिर भी तोड़ डालता था। श्री विश्वामित्र अपने यज्ञ और हवन में उसके अनुचरों की उद्दंडता को रोकने के लिये श्रीराम को दशरथ जी से मांग लाये थे और उसी दिन ये ही राम रावण का युद्ध शुरु हो गया था।
       रावण लोभ, लालच और दबाव के जरिये दूसरों पर अपना धर्म-पूजा पद्धति-लादना चाहता था। उसने दूसरी मान्यताएं मानने वाले समाजों की स्त्रियों का अपहरण कर उनको अपने राजमहल में जबरन रखा। उन पर लोभ, लालच, डर और मोह का जाल डालकर उनको अपने वश में किया ताकि दूसरा समाज तिरस्कृत हो। उसने श्रीसीता जी को भी साधारण स्त्री समझ लिया जो उसके आकर्षण मेें फंस सकती थी और यही गलती उसे ले डूबी पर इसका यह भी एक पक्ष भी है कि अन्य मान्यताओं के लोगों का वह जिस तरह विरोध कर रहा था अंततः उसे एक दिन श्रीराम जी समक्ष युद्ध करने जाना ही था।
         आज हम देखें तो हालत वैसे ही हैं। हमारे दर्शन के अनुसार अध्यात्मिक दर्शन ही धर्म हैं पर उसका कोई नाम नहीं है जबकि अन्य धर्मों में कर्मकांडों को भी उसके साथ जोड़ा जाता है। धर्म का अर्थ कोई विस्तृत नहीं है। निष्काम भाव से कर्म करना, निष्प्रयोजन दया करना, समस्त जीवों के प्रति समान भाव रखते हुए अपने इष्ट का ही स्मरण करना उसका एक रूप है। अन्य धर्मों में उससे मानने की अनेक शर्तें हैं और यह पहनने, ओढ़ने, नाम रखने और अभिवादन के तरीकों पर भी लागू होती हैं।
         इतिहास में हम देखें तो हमारे देश में किसी धर्म का नाम लेकर युद्ध नहीं हुआ बल्कि उसके तत्वों की स्थापना का प्रयास हुआ। धर्म के अनुसार ही राजनीति होना चाहिये पर राजनीतिक शक्ति सहारे धर्म चलाना गलत है। आज हो यह रहा है कि लालच, लोभ, मोह, और दबाव डालकर लोगों को न केवल अपना इष्ट बल्कि नाम तक बदलवा दिया जाता है। पूजा पद्धति बदलवा दी जाती है। यह सब अज्ञान और मोह के कारण होता है। इस तरह कौन खुश रह पाता है?
       चाणक्य और कबीर भी यही कहते हैं कि अपना इष्ट या वर्ग बदलने से आदमी तनाव में जीता है। हमने भी देखा है कि अनेक लोग अपना नाम, इष्ट और वर्ग बदल जाते हैं पर फिर भी उसकी चर्चा करते है जबकि होना चाहिये कि वह फिर अपने नाम, इष्ट और वर्ग की बात तक न करें। कहने को तो वह यह कहते हैं कि यह सब बदलाव की वजह से उनको धन, सफलता और सम्मान मिला पर भौतिक उपलब्धियों से भला कोई खुश रह सकता है?
       दशहरे के इस पावन पर्व पर हमें अपने इष्ट भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए उनके चरित्र पर भी विचार करना चाहिए तभी पर्व मनाने का मजा है। इस अवसर पर हम अपने पाठकों, ब्लाग मित्रों और सहृदय सज्जनों के बधाई देते हैं।यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

8/23/09

आज गणेश चतुर्थी है-आलेख (today ganesh chaturthi-hindi article

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में भगवान शिव को सत्य का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय अध्यात्म में अनेक प्रकार के भगवत् स्वरूपों की चर्चा आती है पर उनमें शायद ही कोई अन्य स्वरूप हो जिसके पूरे परिवार के समस्त सदस्य ही जनमानस द्वारा सहज रूप से भगवत्रूप मान लिये जाते हैं। भगवान शिव और पार्वती के साथ उनके पुत्र श्री कार्तिकेयन और श्री गणेश दोनों ही भगवतस्वरूप भारतीय जनमानस के हृदय में विद्यमान हैं। कार्तिकेयन को देवताओं का सेनापति माना जाता है और यही देवता इस प्रथ्वी का भरण भोषण करते हैं।
भगवान श्रीगणेश जी एक लीला की बहुत चर्चा होती है। वह यह है कि एक बार देवताओं में यह होड़ लगी कि उनमें कौन श्रेष्ठ है। तब यह तय हुआ कि जो प्रथ्वी का चक्कर पहले लगा लेगा उसे ही श्रेष्ठ माना जायेगा। दावेदारों में श्रीगणेश जी ने भी अपना नाम लिखाया। बाकी सभी देवता तो चक्कर लगाने चले गये पर महाराज गणेश जी वहीं जमे रहे। इधर उनके समर्थक इस बात को लेकर चिंतित थे कि श्री गणेश जी एक तो वैसे ही भारी है तिस पर बड़े आराम से अपने माता पिता के पास ही बैठकर आराम फरमा रहे हैं। ऐसे में यह जीतेंगे कैसे? आखिर जब बहुत देर हो गयी तो श्रीगणेश जी उठे और अपने माता पिता की प्रदक्षिणा कर फिर वही बैठ गये और कहा कि मैने तो पूरी सृष्टि का चक्क्र लगा लिया।
वह विजेता घोषित किये गये। यही कारण है कि कहीं भी पूजा करने से पहले भगवान श्रीगणेशजी की स्तुति गायी जाती है। मगर उपरोक्त कथा ही परिचय के रूप में पर्याप्त नहीं है। माता पिता की प्रदक्षिणा करने से अधिक महत्व का कार्य तो उन्होंने भगवान श्री वेदव्यास का महाभारत जैसा महाग्रंथ स्वयं लिख कर पूरा किया। सच बात तो यह है कि यही महाभारत जैसा महाग्रंथ-जिसमें शामिल श्री मद्भागवत् जैसा वह उपग्रंथ शामिल है जिसमें जीवन और सृष्टि के ऐसे रहस्य शामिल हैं जो आज भी प्रमाणिक माने जाते हैं-भारतीय जनमानस के लिये एक ऐसा ग्रंथ है जो उनके लिये एतिहासिक और अध्यात्मिक धरोहर है।
इस तरह भगवान श्री गणेशजी एक तरह से दिव्य लेखक हैं और उन्होंने अपनी उस महान रचना के लिये कोई पारिश्रमिक नहीं मांगा। महाभारत की रचना लिखवाने के लिये भगवान श्री वेदव्यास ने श्री गणेश की तपस्या की थी। जब वह प्रकट हुए तो वेदव्यास की समक्ष यह शर्त रखी कि ‘वह निरंतर लिखेंगे और अगर श्री वेदव्यास की वाणी कहीं अवरुद्ध हो गयी तो वह उसे बीच में ही छोड़ देंगे।’
इस तरह वह वह अनुपम ग्रंथ पूरा हुआ। सरस्वती देवी बुद्धि की देवी मानी जाती है और अनेक भक्त सदबुद्धि पाने के लिये उनकी आराधना करते हैं पर सच तो यह है कि अच्छी या बुरी बुद्धि के लिये सरस्वती देवी जी का न दायित्व है न दोष। वह तो सभी को बुद्धि प्रदान करने वाली हैं-अच्छी भी और बुरी भी- जिनको इससे वंचित रखती हैं उनका जीना न जीना बराबर हो जाता है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग मनुष्य के रूप में पैदा होते हैं पर उनकी बौद्धिक विकलांगता उनके साथ ही उनके परिवार के लिये भी कष्टदायक होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि सरस्वती देवी तो बुद्धि की देवी हैं। कभी कभी वह देवताओं के कहने पर बुद्धि को दोष पूर्ण भी बना सकती हैं जैसे देवताओं के आग्रह पर कैकयी की दासी मंथरा की बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी ताकि भगवान श्रीराम बनवास जाकर राक्षसों का संहार कर सकें।
इसी बुद्धि को नियंत्रण कर बड़े बड़े काम करने के लिये ही श्रीगणेश जी की उपासना की जाती है। हर अच्छा काम करने से पूर्व इसलिये ही श्रीगणेश जी की स्तुति की जाती है ताकि भक्त की बुद्धि और बल का समन्वय बना रहे। अगर बुद्धि में शुद्धता नहीं है तो कोई शुभ काम पूर्ण हो ही नहीं सकता-इसी कारण श्रीगणेश जी की स्तुति की जाती है।

देश में अनेक भगवत्स्वरूपों के स्मरण करते हुए पर्व मनाये जाते हैं पर इस दौरान केवल शोरशराबा कर भक्ति का दिखावा करना एक तरह से स्वयं को धोखा देना है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में वर्णित सभी भगवत्स्वरूपों में प्रथक प्रथक गुण हैं और शायद इसलिये ही सभी का स्मरण करने की परंपरा प्रारंभ हुई है कि उनके गुणों की चर्चा कर मनुष्य अपने अंदर उनको स्थापित करे पर इसके विपरीत केवल उनका नाम लेकर दिखावा कर स्वयं को भक्त होने का धोखा देते हैं। दरअसल यह अवसर होता है कि सत्संग कर उनके देवस्वरूपों की चर्चा कर उनके गुणों की चर्चा की जाये। इस तरह की चर्चा करने से भी गुणों का समावेश अपने अंदर होता है। बाहर से अंदर गुण ले जाने के लिये तीन प्रक्रियायें हैं, दर्शन(तस्वीर को देखते हुए भगवान के गुणों का स्मरण), अध्ययन और श्रवण। यह तभी संभव है जब ऐसा संकल्प हो।
कुछ लोग कहते हैं हिन्दू धर्म में ढेर सारे भगवान हैं यह गलत है। यह कहने वाले अज्ञानी हैं। सच तो यह है कि ऐसा करने से भक्तों को सत्संग की सुविधा मिल जाती है। सभी भगवत्स्वरूपों में अलग अलग गुण हैं। चूंकि सभी मानव लीला में रूप में प्रकट होते हैं तो उनमें इसलिये उनकी देह सर्वगुण संपन्न नहीं होती। सत्संग में उनके गुणों की चर्चा भी हो तो उनकी लीलाओं में मानवीय चूकों पर भी विचार हो जाता है। चूंकि होते तो सभी भक्त ही हैं और किसी न किसी स्वरूप पर उनका मस्तिष्क स्थिर रहता ही है इसलिये वार्तालाप युद्ध में नहीं बदलता। इसके विपरीत अन्य धर्मों में बस एक ही महापुरुष के नाम पर ही सारा समाज खड़ा है और वहां इसलिये सत्संग नहीं हो पाता क्योंकि उस दौरान किसी प्रकार की कमी की चर्चा अपराध हो जाता है। हमारे समाज में सत्संग की जो परंपरा है वही उसे एक किये रहती है। विभिन्न जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों और समूहों को सत्संग की छत्रछाया में बैठकर आनंद लेते हुए देखा जा सकता है।
इस अवसर पर सभी ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई इस संदेश के साथ कि भगवान श्रीगणेश की ध्यान अवश्य करें। उनके गुणों का स्मरण स्वयं करने के साथ ही अपने परिवार के सदस्यों को भी इसके लिये प्रेरित करें। वर्तमान युग में जो हालत हैं उनको हम नहीं बदल सकते पर उनसे होने वाले तनाव से मुक्ति तभी संभव है जब हमारा बुद्धि पर नियंत्रण हो।
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8/20/09

श्रीगीता की किसी अन्य ग्रंथ से तुलना ठीक नहीं-आलेख (shri gita and other holly books)

यह एक टिप्पणी जो उस ब्लाग पर नहीं रखी जा सकी जिसमें श्रीगीता के युद्ध की चर्चा करते हुए उस ब्लाग लेखक ने अपनी ही पवित्र पुस्तक में वर्णित युद्ध विषय से तुलना की थी। वह ब्लाग लेखक गैर हिन्दू धर्म-याद रहे यहां उसके लिये गैर हिन्दू शब्द उपयोग नहीं हो रहा-विचारधारा मानने वाला है। वह एक दिलचस्प आलेख था। लोग पूछेंगे कि आखिर यह टिप्पणी उस पर क्यों नहीं रखी गयी?
इसका जवाब यह है कि यहां टिप्पणी लिखने पर लोग कुछ का कुछ अर्थ समझ लेते हैं। ऐसे में दूसरे के ब्लाग पर चर्चा के लिये बड़ी टिप्पणी लिखने का अपना खतरा होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरे के घर जाकर अपनी बात कहने से अच्छा है कि अपने घर में ही बात की जाये। फिर श्री गीता जैसे गंभीर विषय पर किसी से वाद विवाद करना भी एक तरह से मजाक लगता है। यह दुनियां का इकलौता ग्रंथ है जिसमें ज्ञान सहित विज्ञान है और इसकी तुलना किसी अन्य ग्रंथ से करना ठीक नहीं प्रतीत होता।
यह रूढ़ता या अहंकार नहीं बल्कि श्रीकृष्ण जी का आदेश है कि उनके संदेश का प्रचार केवल अपने भक्तों में ही किया जाये। दूसरी बात यह है कि श्रीगीता के संदेश को पढ़ने, सुनने और समझने के लिये जिस धीरज की आवश्यकता है वह हरेक में नहीं होता। फिर जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के समक्ष जब अन्य विचारधारा को स्थापित करने के प्रयत्न कर रहे हों उनके सामने तो श्रीगीता के संदेश का प्रचार करना परेशानी का कारण भी बन जाता है।
मुख्य बात यह है कि मनुष्य का मन और स्वभाव! जिन लोगों ने तय कर लिया है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में अप्रासंगिक संदेशों का नकारात्मक प्रचार करेंगे उनको समझाने से अच्छा है अपनी बात उनसे कही जाये जो ऐसे प्रचार से विचलित हो जाते हैं।
श्रीगीता में मांसाहार तथा दूसरे की आजीविका छीनने का प्रयास तामसी माना गया है। इतना ही नहीं भगवान भक्ति के द्वारा स्वर्ग प्राप्त करने के मत का खंडन भी किया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि श्रीगीता में समग्र जीवन सहजता पूर्वक व्यतीत करने के लिये ज्ञान दिया गया है। अब लोगों को केवल युद्ध ही युद्ध दिख रहा है तो उनको समझाना मुश्किल है। श्रीगीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि जो मुझे जैसा भजता है वैसा ही फल उसे मिलता है। जिनको युद्ध ही युद्ध दिख रहा है उनके लिये फल भी युद्ध ही है। ऐसे में शांतिप्रिय मनुष्य के लिये यह आवश्यक है कि वह अपने सत्संगियों से ही ज्ञान चर्चा करे।
आपका लेख बहुत अच्छा लगा। आपके इस पाठ पर मैं आपके श्रीगीता संबंधी विषय का उत्तर दूंगा।
पहली बात तो यह है कि श्रीगीता में युद्ध से संबंधित सैंकड़ों श्लोक नहीं है। दूसरी बात यह है कि श्रीगीता विश्व की इकलौता ऐसा ग्रंथ है जिसमें तत्व ज्ञान के साथ ऐसा विज्ञान भी है जिससे संसार को समझा जा सकता है। इसका एक सिद्धांत हैं-‘गुण ही गुण को बरतते हैं।
श्रीकृष्ण जी जानते थे कि श्रीअर्जुन एक क्षत्रिय है और कभी न कभी अपने युद्ध कौशल के कारण यह युद्ध अवश्य करेंगे। श्रीकृष्ण यह नहीं चाहते थे कि यह युद्ध कौरवो के संपूर्ण सफाये के बिना समाप्त हो। अगर उस समय अर्जुन युद्ध नहीं करते तो वह बाद में भी इसके लिये आगे आते। वह क्षत्रिय थे और इससे दूर रहना संभव नहीं था पर श्रीकृष्ण की अनुपस्थिति में वह कुछ कौरवों को छोड़ सकते थे। इससे पूर्व विराट नगर में हुए युद्ध में अकेले अर्जुन से कौरव पराजित होकर भाग निकले और श्रीकृष्ण अब ऐसा अवसर उनको महाभारत के युद्ध में नहीं देना चाहते थे-याद रहे उनकी अनन्य भक्त द्रोपदी ने उनसे कौरवों के सर्वनाश का वरदान मांगा था। यहां यह बता दें क्षत्रिय से आशय राज्य से मान्यता प्राप्त सैनिक से है न कि हर किसी हथियार पकड़ने वाले से। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दें कि आदमी अपने स्वाभाविक गुणों के आधार पर चले बिना रह नहीं सकता जैसे कि कुछ लोग भारतीय अध्यात्म में केवल जातिपाति और युद्ध ही ढूंढते हैं।
महाभारत युद्ध में निहत्थों और युद्ध न कर रहे व्यक्ति पर प्रहार न करने के नियम का पालन किया गया था। अभिमन्यु के शहीद होने के बाद इस नियम में ढील आ गयी। युद्ध में छिपकर वार करना भी वर्जित था।
बात नंबर दो। भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध का संदेश केवल अर्जुन को दिया था न कि आगे आने वाले हर भक्त को इसकी इजाजत दी या आव्हान किया। उन्होंने अर्जुन से कहा‘यह युद्ध तू मेरे लिये कर!’
वह जानते थे कि युद्ध और हिंसा अपराध है और इसका प्रायश्चित भी उन्होंने किया। युद्ध के बाद उन्होंने गांधारी का शाप ग्रहण किया जिससे उनके स्वयं के पूरे वंश का नाश हो गया। उनके पुत्र तथा परिवार में अन्य सदस्य भी न बचे। धर्म के लिऐ ऐसा निर्मोही इतिहास में हुआ हो इसका ज्ञान हमें नहीं है। फिर महाभारत के युद्ध का पाप अपने ऊपर लेेते हुए बहेलिये का बाण अपने पांव पर लेकर परमधाम गमन किया। ऐसा भी विश्व इतिहास में ऐसा कोई नहीं हुआ जिससे हिंसा और युद्ध का परिणाम स्वयं ग्रहण किया हो। वह इस युद्ध के द्वारा अपना संदेश देना चाहते थे वह भी अपने भक्तों में प्रचार के लिये न कि जबरन दूसरे को सुनाने के लिये।
उनके बाद का समाज उनके अहिंसा के संदेश के कारण ही हिंसा से दूर रहता है क्योंकि वह जानता है कि अब हिंसा के अपराध का दंड अपने ऊपर लेने के लिये कोई दूसरा नहीं है। इसके अलावा उन्होंने जो संदेश दिये उनके बारे में आपसे कहना क्या? तीन प्रकृत्ति के मनुष्य-सात्विक, राजस और तामस-इस धरती पर विचरेंगे। चार प्रकार के भक्त-आर्ती, अर्थार्थी,जिज्ञासु और ज्ञानी-भी होंगे। श्रीगीता हमारे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का आधार है और उसके अनुसार यह संभव नहीं है कि सभी लोग सात्विक और ज्ञानी बन जायें। ऐसी सुखद कल्पना सच्चे ज्ञानी नहीं करते। मनुष्य को ज्ञान ग्रहण कर स्वयं ही अपनी राह चलना चाहिये और दूसरे जिस प्रकार के हों उसके अनुरूप ही उनसे व्यवहार करना चाहिये न कि उनको अपने जैसा बनाने में अपनी जिंदगी बर्बाद करना चाहिये। अपनी भक्ति का अहंकार दिखाकर दूसरे को भी अपने जैसा दिखने के लिये प्रेरित या बाध्य करने वाले नष्ट हो जाते हैं।
स्पष्टतः श्रीगीता में युद्ध शब्द क्षत्रियों-राज्य से मान्यता प्राप्त सैनिकों के लिये-के लिये स्वाभाविक कर्म तो अन्य के लिये सामान्य कर्म से है। श्रीकृष्ण जी योगेश्वर थे और इसलिये उन्होंने इस बात का ध्यान रखा था कि श्री अर्जुन को युद्ध का संदेश इस तरह दिया जाये कि आगे आने वाले भक्त कर्म के रूप में ही समझें क्योंकि अहिंसा के संदेश के साथ ही उन्होंने आगे ऐसे किसी युद्ध की संभानायें समाप्त कर दीं।

अंत में यह कहना भी जरूरी है कि उनका यह पाठ पढ़कर बिल्कुल गुस्सा नहीं आया। श्रीगीता के ज्ञान की थोड़ी समझ रखने वाला व्यक्ति भी न तो दूसरे द्वारा निंदा करने पर दुःखी होता है न प्रशंसा पर फूल कर कुप्पा होता है। हां, हम इतना जरूर कहते हैं कि भई सारी दुनियां के धर्म ग्रंथ पवित्र हैं। उनका खूब आदर करो। आप चाहे किसी भी धर्म के हों अपने पवित्र किताब का खूब प्रचार करो। हमारी श्रीगीता की आलोचना करो तो भी दुःख नहीं है। प्रशंसा करो तो आपकी मर्जी! मगर तुलना करने से पहले इसका पूरा अध्ययन करना जरूरी है। दरअसल श्रीगीता का असली संदेश तो श्री अर्जुन को युद्ध करने का इसलिये दिया गया था क्योंकि उनका यह स्वाभाविक कर्म था। इसका आशय यह है कि श्रीकृष्ण हर भक्त को अपना स्वाभाविक कर्म करते भगवान भक्ति के साथ जीवन व्यतीत करने संदेश दे रहे थे। वैसे मनुष्य का स्वभाव आसानी से नहीं बदलता। जिसका जैसा स्वभाव है वैसा ही वह इस दुनियां को देखेगा भी। हां, उसमें परिवर्तन के लिये एक ही प्रयास हो सकता है वह योगासन और प्राणायम! जो लोग भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परे हैं उनसे ऐसी अपेक्षा करना नहीं चाहिये कि वह हमारे धर्म ग्रंथों का सम्मान करें और जितना उनमें ज्ञान है उसके रहते हुए वह किसी के मोहताज भी नहीं है। श्रीगीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसके लिये प्रशंसात्मक शब्द कहने की बजाय उसका अध्ययन किया जाना चाहिये। इसका थोड़ा अंश भी समझ पायें तो समझिये भगवान की बहुत कृपा है। हम उस ब्लाग लेखक के भी आभारी हैं जिनकी वजह से यह पाठ लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस लेख का आशय यह कतई नहीं है कि उससे हमारा कोई विरोध है। श्रीगीता पर लिखने की प्रेरणा देने वाले व्यक्ति का आभार व्यक्त न करना कृतघ्नता होगी। शेष फिर कभी!
नोट-इस पाठ पर किसी का नाम लेकर टिप्पणी करना स्वीकार्य नहीं होगा। अपना विचार व्यक्त करना ठीक है पर उसके लिये किसी व्यक्ति का नाम लेना उचित नहीं है।...........................................
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8/1/09

निष्काम भाव से आशय लक्ष्यहीन या सन्यासी जीवन नहीं-हिंदी लेख (shri gita ke nishkam bhav ka ashay-hindi lekh)

श्री गीता में निष्काम भाव को लेकर अधिकतर लोग भ्रमित रहते हैं। उनके लगता है कि यह कैसे संभव है कि हम कोई काम करें और फिर उससे फल की आशा न करें। कुछ विद्वान तो मानवीय स्वभाव की कमजोरियों का बहाना कर यह भी प्रचार करते हैं कि ‘निष्काम भाव’ से काम करना संभव नहीं है। लोग सोचते हैं कि निष्काम भाव से काम करने का मतलब यह है कि
1. अगर कहीं नौकरी या व्यवसाय करें तो वहां वेतन या दाम न भी मिले तो चुप होकर भगवान भरोसे बैठ जायें और किसी प्रकार का संघर्ष न करें।
2. अगर फल की कामना ही न हो तो कर्म शुरु ही क्यों करें?
3.अपने और परिवार का भरण भोषण करन अपनी जिम्मेदारी है और इसका निर्वाह करने के लिये कहीं से धन प्राप्त करने की आशा पर ही काम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर निष्काम होने में वह सन्यासत्व की अनुभूति करते हैं और उनको लगता है कि यह उनका विषय नहीं है। सच बात तो यह है कि हिन्दू धर्म के अधिकतर संत और साधु सकाम भक्ति के पोषक हैं। वह भक्तों से अपनी सेवा सुश्रुपा कराना चाहते हैं इसलिये वह निष्काम भक्ति का संदेश इस ढंग से देेते हैं कि भ्रम पैदा होता है। निष्काम भाव से जीवन गुजााने का मतलब लक्ष्यहीन और त्यागी जीवन बिताना नहीं है-यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये।
दरअसल निष्काम भाव से जीवन व्यतीत करने सुखमय हो जाता है और जब इसकी वजह से कोई सुखपूर्ण जीवन व्यतीत करेगा तो वह क्यों अपनी मानसिक अशांति से मुक्ति प्राप्त करने के लिये इन गुरुओं के पास जायेगा।
निष्काम भाव से तब तक नहीं रहा जा सकता जब तक फल का स्वरूप न जान लिया जाये। जब फल का स्वरूप जान लेते हैं तब स्वतः निष्काम भाव को प्राप्त हो जाते हैं।
निष्काम भाव से काम करना संभव है मगर पहले फल का स्वरूप समझा जाये। कोई भी कहीं नौकरी या व्यवसाय करता है तो उसे भौतिक परिलब्धियां प्राप्त होती हैं पर यह फल नहीं है क्योंकि उसका उपयोग तो हर कोई अपने और परिवार के भरण भोषण करता है। हमने एक जगह से धन लिया और दूसरी जगह खर्च किया तो उसे फल कैसे कहा जा सकता है। फल तो वह है जो हमारे पास रहे। हम जब भौतिक परिलब्धियों को फल मान लेते हैं तो अपना यह बृहद जीवन संकीर्ण दायरों में कैद कर लेते हैं। हमें अपने दैहिक आवश्यकताओं के लिये परिश्रम और व्यवसाय करना ही होता है और उसके लिये वेतन या दाम प्राप्त करना कर्म का हिस्सा है न कि फल का। जब फल है मन की शांति और मोक्ष। वह भक्ति से प्राप्त होता है। उसमें भी आपको निष्कर्म भाव से लगना चाहिये क्योंकि तभी आपका ध्यान अपनी आत्मा से साक्षात्कार पर केंद्रित हो सकेगा। यही ध्यान आपकी देह, मन और विचारों को शुद्ध करता है जिससे आप जीवन में हर पल नवीनता अनुभव कर सकते हैं। जहां आपने कामनायें स्थापित की वहां यह ध्यान नहीं लगेगा और मामला जस का तस।
ऐसे अनेक लोग हैं जो मंदिर नहीं जाते पर फिर भी निष्काम भाव से जीकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। कमाते हैं और अपने धन का उपयोग अपने पर जमकर करते हैं। वह इसलिये धन कमाते हैं क्योंकि उनका खर्च करना होता है। धन को लक्ष्य या फल मानना अपने स्वतंत्र मन को दायरों में कैद करना है और उससे वह विचलित होता है। हम अपने मन की शांति के लिये इधर उधर धन संग्रह के लिये जूझते हैं और फिर उसका खर्च भी करते हैं। यह तो अच्छे भले मनुष्य जीवन का धन के इर्दगिर्द घूमना हो गया। फिर उस पर कुछ विद्वान धार्मिक विद्वानोें ने मोक्ष की बजाय स्वर्ग की प्राप्ति की कामना का अविष्कार कर लिया और उसके लिये अनेक तरह के कर्मकांडों का प्रचार किया जिनमें धन खर्च करना पड़ता है। इसलिये ऐसे गुरु अपने शिष्यों को धन के आसपास ही चक्कर लगवाते हैं। निष्काम भक्ति के संदेश के बीच श्री गीता का गुरु सेवा का संदेश जरूर सुनाते हैं ताकि शिष्य धन के चक्कर से मुक्त न हो। श्री गीता में गुरुजनों की सेवा करने को कहा गया है पर उसका आशय शिक्षा प्राप्ति तक ही सीमित है। श्रीगीता में तो भगवान ध्यान में निरंकार स्वरूप की तरफ जाने की बात कहते हैं तब वह दैहिक गुरु की जीवन भर सेवा का संदेश कैसे दे सकते हैं?
जीवन में निष्काम भाव से रहते हुए निष्प्रयोजन दया करना चाहिये। मोह और माया से परे रहने का तात्पर्य यह कतई नही है कोई वस्तु या व्यक्ति त्यागना है। अपने कर्तव्यों से विमुख होने की भी बात कहीं श्रीगीता में नहीं कही गयी। मूल बात तो भाव से हैं। कोई भौतिक वस्तु या व्यक्ति न पकड़ना है न छोड़ना है। मुख्य विषय है कि किसी में भाव लिप्त नहीं करना।
आप कहेंगे यह संभव नहीं तो कोई जबरदस्ती नहीं है कि आप यह संदेश माने। आप कामनाओं से भरे रहिये। यह जीवन अनवरत धारा से बहता है आप चाहें या न चाहें-हां, आप इस खुशफहमी रहिये कि आप उसका संचालन कर रहे हैं। सबको देने वाला दाता है पर यह समझते रहें कि आप किसी को पाल रहे हैं। मगर यह भी समझ लीजिये हमारे जन्म से पहले भी यह दुनियां चल रही थी और हमारे बाद भी यह चलते रहेगी। यह कटु सत्य ही तत्वज्ञान है और इसी से लोग भागते हैं। वह कामनायें पालते हुए अपने कर्तापन के अहंकार में इसलिये डूबे रहना चाहते हैं क्योंकि उनको लगता है कि जिंदा रहने के लिये कोई बहाना चाहिये।
मुख्य बात हमारी देह नहीं मन का चलना है। हमारे शरीर की इंद्रियां स्वतः काम करती हैं। अगर कोई पत्थर आंख की तरफ उछलता है तो वह स्वतः बंद हो जाती है-हम यह भ्रम पालते हैं तो पालते रहें कि हमने बंद की। कहीं रास्ते में बदबू आती है तो नाक स्वयं ही सांस लेना बंद कर देती है ताकि उससे शरीर विषाक्त न हो-हम भले ही भ्रम पालें कि हमने बंद की। एक मित्र ब्लाग लेखक ने आज इस विषय को उठाया तो लिखने का मन हुआ। उनके पाठ पर हमने यह टिप्पणी भी लिखी जो कि प्रस्तुत है। शेष फिर कभी।
आपने अच्छा विषय उठाया है पर निष्काम भाव से काम करना तभी संभव है जब फल का स्वरूप समझा जाये। कोई भी कहीं नौकरी या व्यवसाय करता है तो उसे भौतिक परिलब्धियां प्राप्त होती हैं पर यह फल नहीं है क्योंकि उसका उपयोग तो हर कोई अपने और परिवार के भरण भोषण करता है। आपने एक जगह से धन लिया और दूसरी जगह खर्च किया तो उसे फल कैसे कहा जा सकता है। फल तो वह है जो आपके पास रहे। हम जब भौतिक परिलब्धियों को फल मान लेते हैं तो अपना यह बृहद जीवन संकीर्ण दायरों में कैद कर लेते हैं। हमें अपने दैहिक आवश्यकताओं के लिये परिश्रम और व्यवसाय करना ही होता है और उसके लिये वेतन या दाम प्राप्त करना कर्म का हिस्सा है न कि फल का। जब फल है मन की शांति और मोक्ष। वह भक्ति से प्राप्त होता है। उसमें भी आपको निष्कर्म भाव से लगना चाहिये क्योंकि तभी आपका ध्यान अपनी आत्मा से साक्षात्कार पर केंद्रित हो सकेगा। यही ध्यान आपकी देह, मन और विचारों को शुद्ध करता है जिससे आप जीवन में हर पल नवीनता अनुभव कर सकते हैं। जहां आपने कामनायें स्थापित की वहां यह ध्यान नहीं लगेगा और मामला जस का तस।
अपनी समझ के अनुसार जो संक्षिप्त व्याख्या थी वह प्रस्तुत की। बाकी कोई सिद्ध तो हूं नहीं कि दावा करूं कि यह सब ब्रह्म वाक्य है।
दीपक भारतदीप

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7/28/09

श्री गुरु ग्रंथ साहिब-नासमझ से मित्रता अधिक नहीं चलती (shri guru granth sahib)

मनसुख सेती दोस्ती थोडड़िआ दिन चारि।
इसु परीति तुटंदी विलमु न होवई,
इतु दोस्ती चलनि विकार।
हिंदी में भावार्थ-
नासमझी और स्वार्थ से हुई मित्रता अधिक दिन नहीं चलता। उसके टूटने में विलंब नहीं होता। ऐसी मित्रता से प्रतिदिन नये विकार पैदा होते हैं।
दुस्टा नालि दोस्ती संता वैरु करंनि।
आपि डूबू कुटंब सिउ सगले कुल डोबंनि।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट व्यक्ति से मित्रता करना अपने लिये बैर स्थापित करना है। दुष्ट व्यक्ति स्वयं तो अपने कुटुंब समेत डूबता है मित्र और उसके परिवार के नाश का कारण बनता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-
सांसरिक मित्रता हमेशा स्वार्थ की वजह से होती है पर अगर मित्र नासमझ हुआ तो एक तरह से बैर की तरह आस्तीन में पलता है। ऐसा नहीं है कि इस संसार में सभी लोग मित्र नहीं बन सकते पर निस्वार्थी और ज्ञानी मित्र ऐसे होते हैं जो विपत्ति में सहायक बनते हैं। उनकी संख्या नगण्य है, अधिकतर तो मित्र केवल स्वार्थ की वजह से मित्र बनते हैं। शराब, जुआ, सट्टा या अपराध करने के लिये मित्र बहुत जल्दी मिल जाते हैं। एक बात कही भी जाती है कि बुरे लोगों का समूह बहुत जल्दी बनता है जबकि सज्जन लोग कभी समूह नहीं बनाते। साधु कभी समूह बनाकर नहीं चलते।
किसी को अपना मित्र बनाने से पहले उसका नैतिक आचरण देख लेना चाहिये। देखा तो यह गया है कि ठगी, धोखा या अन्य संकट का सामना मनुष्य को अपने ही लोगों के कारण करना पड़ता है। महिलाओं के विरुद्ध अभद्र व्यवहार की शिकायत उनके अपने जान पहचान और रिश्तेदारों के कारण ही अधिक होती है। बहुत कम ऐसे अपराध है जिनमें गैर का शामिल होना पाया जाता है। इसलिये स्त्री हो या पुरुष उसे किसी अन्य से संपर्क बढ़ाने के साथ मित्रता तभी कायम करना चाहिये जब उसके आचरण को पहले प्रमाणित कर ले।
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7/26/09

आज नागपंचमी है-आलेख (today nag panchami-hindi article)

आज नागपंचमी है जो कि भारतीय अध्यात्म की दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद इस दिन भी ऐसे कर्मकांड और अंधविश्वास देखने को मिलते हैं जिनको देखकर आश्चर्य और दुःख होता है।
सांप और नाग मनुष्य के ऐसे मित्र मित्र माने जाते हैं जो उसके साथ रहते नहीं है। सांप और नागों की खूबी यह है कि उनका भोजन मनुष्य से अलग है। आज के दिन सांप को दूध पिलाने के लिये अनेक लोग दान करते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि दूध एक तरह से सांप के लिये विष है जो उसकी हत्या कर देता है। सांप को वन्य प्रेमी एक तरह से संपदा मानते हैं तथा पर्यावरण विद् तो सांप प्रजातियां लुप्त होने पर निरंतर चिंता जताते आ रहे हैं। सांप मनुष्य के भोजन के लिये पैदा होने वाली वस्तुओं को नष्ट करने वाले चूहों और कीड़ मकोड़ों को खाकर मनुष्य की रक्षा करता है। इसके बावजूद इंसान सांप से डरता है। यह डर इतना भयानक है कि वह सांप को देखकर ही उसे मार डालता है कहीं वह दोबारा उसे रास्ते में डस न ले।

आधुनिक वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि अधिकतर सांप और नाग जहरीले नहीं होते मगर हमारे देश में इसके बावजूद अनेक निर्दोष सांप और नाग इसलिये जलाकर मार दिये जाते है कि वह इंसान के लिये खतरा है। यह इस देश में हो रहा है जिसमें नाग को देवता का दर्जा हासिल है और यह हमारे विचार, कथन और कर्म के विरोधाभासों को भी दर्शाता है कि हम एक दिन को छोड़कर सांप और नाग के प्रति डर का भाव रखते हैं। कहते हैं कि डर हमेशा क्रूरता को जन्म देता है और सांप के प्रति हम भारतीयों का व्यवहार इसका एक प्रमाण है।
हमारे देश के अध्यात्मिक दर्शन के अनसार शेष नाग ने इस धरती को धारण कर रखा है। महाभारत काल में जब दुर्योधन ने जहर देकर भीम को नदी में फिंकवा दिया था तब सांपों ने ही उनका विष निकाला था और बाद में वह सुरक्षित बाहर आये थे। जब वासुदेव महाराज अपने पुत्र श्रीकृष्ण के जन्म के बाद उनको वृंदावन छोड़ने जा रहे थे तब नाग ने ही उनके सिर पर रखी डलिया पर बरसात से बचाने के लिये छाया की थी। हमारे पौराणिक ग्रंथों में कहीं भी मनुष्य द्वारा सांप को भोजन कराने या दूध पिलवाने का जिक्र नहीं आता। इसका आशय यही है कि उनका भोजन जमीन पर फिरने वाले वह जीव जंतु हैं जो कि मनुष्य के लिये एक तरह शत्रु हैं। शायद यही कारण है कि हमारे ऋषि मुनि मनुष्य को अहिंसा के लिये प्रेरित करते हैं क्योंकि सृष्टि ने उसकी देह और भोजन की रक्षा के लिये अन्य जीवों का सृजन कर दिया है जिनमें प्रमुख रूप से सांप और नाग भी शामिल है।
देश में बढ़ती आबादी के साथ जंगल कम हो रहे हैं और इसलिये वन्य जीवों के लिये रहना दूभर हो गया है। जहां नई कालोनियां बनती हैं वहां शुरुआत में सांप निकलते हैं और लोग डर के बार में उनको मार डालते हैं। अधिकतर सांप और नाग जहरीले नहीं होते हैं पर जो होते भी हैं तो वह किसी को स्वतः डसने जायें यह संभव नहीं है। जहां तक हो सके वह इंसान से बचते हैं पर अनजाने वह उनके पास से निकल जाये तो वह भय के मारे वह डस देते हैं। इसके विपरीत इंसान के अंदर जो वैचारिक विष है उसकी तो किसी भी विषैले जीव से तुलना ही नहीं है। धन-संपदा, प्रतिष्ठा और बाहुबल प्राप्त होने पर वह किसी विषधर से कम नहीं रह जाता। वह उसका प्रमाणीकरण को लिये निरीह और बेबस मनुष्यों को शिकार के रूप में चुनता है। वह धन-संपदा, प्रतिष्ठा और शक्ति के शिखर पर पहुंचकर भी संतुष्ट नहीं होता बल्कि वह चाहता है कि लोग उसके सामने ही उसकी प्रशंसा करेें।
सांप और नाग हमारे ऐसे मित्र हैं जो दाम मांगने हमारे सामने नहीं आते और न ही हम धन्यवाद देने उनके पास जा सकते। वैसे भी उनकी नेकी शहर में बैठकर नहीं जानी जा सकती। वह तो खेतों और खलिहानों में चूहों तथा अन्य कीड़ों का खाकर अप्रत्यक्ष रूप से मित्रता दिखाते हैं। इस नागपंचमी पर सभी ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई। समस्त लोग प्रसन्न रहें इसकी कामना करते हुए हम यह अपेक्षा करते हैं कि वन्य प्राणियों की रक्षा के साथ पर्यावरण संतुलन बनाये रखने का उचित प्रयास करते रहें।
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7/5/09

पूरे समाज को मूर्ख समझने की प्रवृत्ति-आलेख (hindi article)

हम अगर भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की बात करें तो उसका सबसे बड़ा सूत्र हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं।’ इसका आशय है कि जो हमारी इंद्रियों का जो कार्य है वही उसका गुण भी है। कान का काम है सुनना तो वह सुनता है। आंख का काम देखना तो वह देखती हैं। अब सवाल यह है कि हम कौनसी वस्तु देखते हैं या कौनसा सुर सुनते हैं यह हालत के अनुसार तो है पर हमारे अंदर मौजूद इच्छायें भी इसके लिये जिम्मेदार हैं। यह इच्छायें मन में पैदा होती हैं जिसका संचालन बुद्धि से होती है और बुद्धि वैसी होती है जैसे हमारा खान पान और रहन सहन होता है।
बहरहाल यह तो केवल एक चर्चा की गयी। हमारा मुख्य उद्देश्य तो यह देखना है कि जिसे तत्वज्ञान हो जाता है वह बहस आदि से दूर रहकर केवल सार्थक चर्चाओं में अपना समय व्यतीत करते हैं और उनमें अहंकार कदापि नहीं रह जाता। कम से कम वह पूरे समाज को अज्ञानी नहीं समझते।
दरअसल समलैंगिक मुद्दे पर जिस तरह भारतीय अध्यात्म ज्ञान के कथित आधुनिक पुरुष बहस में भाग ले रहे हैं उससे तो यही लगता है कि उन लोगों ने तत्वज्ञान को रट लिया है पर धारण करने से परे हैं।
अगर समलैंगिक को कानूनी मान्यता मिल गयी तो जैसे देश के सारे युवक युवतियां इसी में लग जायेंगे-अगर यह कोई भय व्यक्त करता है तो न वह केवल तत्वज्ञान से अनभिज्ञ है बल्कि नंबर एक का ढोंगी है।
पूरा समाज! क्या बात करते हैं यह लोग? यह सही है कि इस देश के लोग भौतिक उपलब्धियेां के पीछे अधिक लगे हैं पर इसका मतलब नहीं है कि सभी मूर्ख हैं। समलैंगिकता के पक्षधर तो वह लोग हैं जिनके पास अधिक मात्रा में धन और सुविधाऐं हैं और शरीर से कम श्रम के कारण उनका दिमाग आलसी हो जाता है और फिर उसमें उल्टे सीधे विचार आते हैं। 110 करोड़ के इस देश में ऐसे लोगों की संख्या अगर एक लाख भी हो तो बहुत समझो जो समलैंगिक जीवन बिताने को तत्पर होंगे।
हमें अन्य धर्म के ठेकेदारों से कोई मतलब नहीं है पर भारतीय अध्यात्म के ठेकेदार ऐसी बात करें तो उन पर तरस आता है।
श्रीगीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि चार प्रकार के भक्त होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। इसका आशय यह है कि समाज में चार प्रकार के लोग रहेंगे ही चाहे जैसी भी हालत हो।
इधर प्रचार माध्यमों को अपने कार्यक्रम जारी रखने के लिये कुछ न कुछ मुद्दा चाहिये। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि इन प्रचार माध्यमों को जीवन बनाये रखने के लिये अनेक प्रकार के मुद्दे बनाये जाते हैं। ऐसे में सामाजिक मुद्दे उठाकर धार्मिक नेताओं को बुलाया जाता है। एक बात यहां याद रखने की है सामाजिक मुद्दों पर धार्मिक ज्ञानियों को बोलना ही नहीं चाहिये क्योंकि अगर समाज गलत रास्ते पर है तो वह अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण है पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह उससे शून्य है। वैसे अगर यह धार्मिक ज्ञानी बोलते हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिये कि क्या उनके शिष्य इस राह पर चले जायेंगे? अगर नहीं तो उसकी इनको चिंता क्यों है? फिर यह भी उनसे पूछा जाना चाहिये कि आप जब बरसों से सक्रिय हैं तो फिर भी यह आशंका बनी हुई है कि समाज समलैंगिक हो जायेगा तो क्या आपकी नाकामी नहीं है? ऐसा लग रहा है कि कुछ धार्मिक और अध्यात्म के शिखर पुरुष कैमरे के सामने आने के आदी हो चुके हैं और उनको ऐसा लगता है कि वह हर विषय पर बोलने के लिये अधिकारी हैं या कहें कि वह अपने आपको ब्रह्मा समझने लगते हैं। उनका अहंकार उनके सिर चढ़कर बोलता नजर आता है जो कि अज्ञान का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है।
वह इस तरह बात करते हैं जैसे कि समाज उनके लिये कोई पालतू पशु है जिसे वह चाहे जो चारा खिलायें उसे ही अच्छा समझे। मजे की बात यह है कि वह ऐसे लोगों को ज्ञान दे रहे हैं जो कभी समझेंगे ही नहीं। वह देह भक्तों के समक्ष श्रीगीता के उस ज्ञान को प्रस्तुत करते हैं जिसके बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि केवल उनके भक्तों को ही दिया जाना चाहिये।
चाहे कोई भी कितना तत्वज्ञानी क्यों न हो अगर वह इस तरह सभी लोगों को अज्ञानी और मूर्ख समझता है तो यह उसकी अज्ञानता का प्रमाण है। बुद्धि सभी में है पर अगर सही ढंग से समझाया जाये तो बात बन जाती है। जिस तरह धर्माचार्य हल्के विषयों पर बहसों में भाग लेते हैं उससे उनकी पोल देश के सामने खुल जाती है और उनके प्रति नकारात्मक संदेश जाता है।
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7/16/08

अध्यात्म और धर्म अलग अलग विषय हैं-आलेख (2)

अध्यात्मिक ज्ञान जिस व्यक्ति को होता है उसका मानसिक तथा बौद्धिक शोषण कतई नहीं किया जा सकता है। अध्यात्म ज्ञान कोई अधिक व्यापक नहीं है पर उसका अर्थ समझकर उसे धारण करना बहुत कठिन है। वैसे एक बात स्पष्ट है कि समस्त धार्मिक विचाराधाराऐं अध्यात्मिक ज्ञान के आधार को ही मजबूत करने का दावा करती हैं पर वह उसमें अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषय इस तरह जोड़ दिये गये हैं कि सामान्य मनुष्य भ्रमित हो जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान जो कि सत्य का साक्षी है उसकी चर्चा तो पूरे विश्व में होती है पर उसका अध्ययन, चिंतन और मनन कितने लोग करते हैं और उसमें भी कितने उसे धारण कर पाते हैं? यह अलग चर्चा का विषय है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार करने वाले कथित संतों ने अनेक प्रकार की चमत्करिक कहानियां तथा सांसरिक विषय उसमें इस तरह जोड़े हैं कि उसका मूल स्वरूप ही किसी की समझ में नहीं आता।

भारत में अध्यात्मिक ज्ञान का दावा रखने वाले तो बहुत मिल जायेंगे पर उसके सूक्ष्म रूप का किसी को पता नहीं है। अपने व्यवसाय, नौकरी तथा खेती से निराश होने पर अक्सर लोग कहते हैं कि ‘हमारा काम हैं कर्म करना और फल देना तो परमात्मा का का है।’ सुनने में यह कितना अच्छा लगता है। कहने वाले तो यही कहेंगे कि यह श्रीगीता में ऐसा ही कहा गया है।
श्रीगीता में केवल कर्म की बात नहीं कही गयी बल्कि निष्काम कर्म की बात कही गयी है। जब कोई कहता है कि ‘हमने अपना काम किया और फल देना तो परमात्मा का काम है’ तो यह उसके निष्काम होने का प्रमाण नहीं है क्योंकि अपने कर्म के साथ कहीं न कहीं उसके फल पाने की इच्छा प्रकट होती है।’

पहले तो कर्म का फल का स्वरूप ही समझ में आना चाहिये तभी तो आदमी निष्काम भाव से कार्य कर सकता है। दरअसल निष्काम भाव से कर्म करना ही जीवन से विषादों से मुक्ति दिलाने का उपाय है और लोग निष्काम भाव से काम न करें इसलिये उनको उसका उपदेश दिया जाता है पर प्रेरित तो उस सांसरिक फल के लिये ही किया जाता है जो उनके जीवन और विचारों को सीमित दायरों में बांध देता है। वह सांसरिक पदार्थों की फल समझते हैं जिनका उपयोग भी वह यही करते हैं। अगर कोई मनुष्य नौकरी कर रहा है तो उसका वेतन, व्यवसायी है तो उसका लाभ और मजदूर है तो उसकी मजदूरी क्या फल है? नहीं अगर यह फल है तो फिर वह इसका उपयोग वह अकेला कहां करता है? मनुष्य द्वारा भौतिक मुद्रा अर्जित करना फल नहीं है क्योंकि वह उसे भी तो अपने तथा परिवार के ऊपर ही व्यय करता है। कोई अपने बच्चे की फीस भर रहा है तो कोई अपनी पत्नी का इलाज करा रहा है तो कोई मकान बनवा रहा है। कोई अपने पिता को दे रहा है तो कोई माता को दे रहा है। कभी भाई की मदद कर रहा है। भला इस धनोपब्धि को फल कैसे कहा जाता है। जब वह अपने हाथ से कहीं से धन लेता है तो वह फल नहीं बल्कि अपने कर्तव्यों और दायित्वों के निर्वाह के लिये लेता है। यह धन लेना उसका कर्तव्य है न कि फल! धन प्राप्त करना आपका कर्म है और व्यय करना भी-उसे फल कैसे कहा जा सकता है।

दूसरी बात तो छोडिये जो दुनियां भर का ज्ञान बघार रहे हैं वह भी इसमें से अपने लिये दान मांगते हैं और बताते हैं कि यह आपकी धार्मिक जिम्मेदारी है। सीधा आशय यह है कि आपने जो धन कमाया वह तो आपके कर्म का दायित्व बढ़ाता है और आप उसे कहीं अन्य व्यय कर अपना कर्तव्य निबाहते हैं। जब तक देह है उसे बनाये रखने के लिये व्यय करते हैं पर यह तो हमारा कर्म है। यह फल कहां से कहा जा सकता है?

सवाल यह है कि फिर फल क्या है? फल है हम अपने जीवन में शांति से रह पायें और जब देह त्याग करने का समय आये तो शांति और संतोष के साथ मोक्ष प्राप्त करें। यही असली फल है जिसकी तरफ ले जाने की ताकत केवल भारतीय अध्यात्म के ज्ञान में ही हैं। पहले उस सांसरिक फल का स्वरूप भी समझ लें। अगर हमने किसी से माह भर कार्य करने, अथवा वस्तु बेचने या मजदूरी करने पर किसी से धन मांगा तो क्या वह फल मांगना है। नहीं! यह तो उसे अपने सांसरिक कर्तव्य का निर्वाह करने के लिये प्रेरित करने का प्रयास है जिससे हम अपने आगे के कर्तव्य का निर्वाह कर सकें। मतलब यह कि अगर कोई अध्यात्म का ज्ञान रखता है तो वह अपने कर्तव्य निर्वाह के लिये धन प्राप्त करना फल नहीं बल्कि कर्तव्य ही हैै। यह अलग बात है कि जिन लोगों को पैसा देना नहीं होता वह कह देते हैं-‘क्या, तुम ज्ञानी होकर पैसा मांगते हो।’ याद रखना अध्यात्म का ज्ञान होने का आशय यह कदापि नहीं कि आदमी सांसरिक विषयों को त्याग कर भागने की तैयारी कर ले। एक सामान्य व्यक्ति और अध्यात्मिक ज्ञानी व्यक्ति के बस दृष्टिकोण में अंतर होता है। सामान्य व्यक्ति अपनी धनोपब्धि पर ही प्रसन्न होकर रह जाता है तो उसके जाने पर उसे भारी कष्ट होता है। इसके विपरीत अध्यात्म का ज्ञान रखने वाला धन मिलने पर उसे फल मानते हुए उसमें लिप्त नहीं होता। सामान्य व्यक्ति एक के बाद दूसरी और दूसरी उपलब्धि के पीछे भागता है और अपने पूरे जीवन में शांति से नहीं बैठ पाता और न मनुष्य देह का सुख उठा पाता है जबकि ज्ञानी अपने लिये शांति से जीने के पल जुटा लेता है और फिर दृष्टा की तरह इस संसार में मानव देह होने का वह आनंद भी उठाता है।

अगर आप देखें तो सारे धर्म तमाम तरह के कर्मकांड प्रतिपादित करते हैं जिनका निर्वाह उसी धनोपलब्धि से किया जा सकता है जो हमने प्राप्त की है। सभी धर्मों के गुरू उसी धन पर अपनी नजरें गड़ाये हुए स्वर्ग में टिकिट रिजर्वेशन करने की गारंटी अपने भक्तो को देते हैं। उनका संदेश तो यही होता है कि ‘ला! माल ला! और ले जा स्वर्ग का टिकिट!

सभी आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि ‘देने वाला तो वही है’, ‘उसकी इच्छा के बिना यहां कुछ भी नहीं हो सकता’ और सभी के मन की इच्छा वही पूरी करता है’। ऐसा कहकर वह सांसरिक उपलब्धियोें को ही फल बताते हैं। कुल मिलाकर सभी धर्मों के कर्मकांड पैसा खर्च कर फल दिलाने के सिद्धांत पर आधारित हैं। जबकि भारतीय अध्यात्म बिना किसी सांसरिक फल के योग साधना और प्राणायम कर देह और मन के विकार दूर करने तथा ध्यान और प्रार्थना के आधार शांति का वह फल दिलाने वह ज्ञान है जो देह रहते और बाद में भी आदमी को संतोष प्रदान करता है। समस्या है गुरू की। श्रीगीता में भी गुरू का गुणगान है जिसका सबसे अधिक प्रचार वह कथित संत करते हैं जिन्होंने गीता के ज्ञान को समझा नहीं पर स्वयं गुरू बनने की लालसा में वह अपने भक्तों को वह अवश्य बताते हैं। अपने भक्तों का अध्यात्म का ज्ञान वह कभी नहीं देते। हां, अनेक कहानियां तथा सांसरिक विषयों में उलझा कर अपनी भक्त का हृदय फिर उसी सांसरिक दलदल में फंसा देते हैं जहां वह कमल की तरह खिलने की इच्छा रहकर आता है। यह केवल भारतीय धर्मगुरूओं का ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में यही हाल है। धर्म के नाम शोषण केवल इसलिये हो रहा है क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान को सभी दबाये रखना चाहते है ताकि उसके मूल स्वरूप से लोग अवगत न हों।
श्रीगीता में अध्यात्म का जो ज्ञान है वह अनुपम है पर उसे कथित साधु संत अपने हिसाब से व्याख्या इस तरह करते हैं कि वह स्वयं ही अपने भक्तों में भगवान के रूप में स्थापित रहें। अब यह उनकी चालाकी भी हो सकती है या ऐसा भी कि वह स्वयं ही उस ज्ञान को धारण नहीं कर पाते और अपनी यही कमी छिपाने के लिये तमाम तरह के चुटकुले, कहानियां तथा सांसरिक विषयों की प्रधानता पर ही अधिक प्रवचन करते हैं। शेष अगले अंक में

2/2/08

आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं (सर्वशक्तिमान-३)

भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और आध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ:: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता। मैं स्वयं ही इस बात का उदाहरण देता हूँ। तमाम तरह के आध्यात्म ग्रंथ मैने बचपन में ही पढ़े और आज भी बड़ी रूचि के साथ पढ्ता हूँ। जब मेरी उम्र आठ साल थी तबा पडोस में रहने वाले एक पन्डित जी की बहू से मेरी माताजी ने पढ़ने के लिए तुलसीदास जी की श्री राम चरितमानस ली थी। मैं भी उसे पढ़ने लगा। मैने उसे धार्मिक भावना से नहीं कहानी की दृष्टि से पढ़ा। उसे कई बार पढ़ा। एक दिन पन्डित जी ने अपनी बहू से वह माँगी तो उसने उनको बताया की ''वह पडोस का लड्का है न वह उसे पढता है।''
उन्होने मुझे बुलाया और कहा'जब पढ़ लो तो वापस कर देना, पर इसको आदर से रखना। तुम इससे बहुत कुछ सीखोगे।''

फिर कभी उन्होने वह मुझसे वापस नहीं माँगी और जब हमने वह मकान खाली किया तब मैं उनको वापस कर आया, पर तब तक मेरे अंदर वह बीज अनुकुरित हो चुका था जिसकी कल्पना भी मैंने नहीं की थी। फिर तो मैने वाल्मीकि रामायण को पढ़ना शुरू किया और अपने जेब खर्च से मैं वह सब धार्मिक किताबें ले आया जो भारतीय अध्यात्म का आधार स्तंभ हैं। आज जब मैं किसी आध्यात्म विषय पर लिखता या बोलता हूँ तो अधिकतर लोग विद्वान होने का अहसास पाल लेते हैं। अब यह मैं नहीं जानता की ऐसा है कि नहीं पर मुझे अपने तर्क भी गढने की आदत भी है और में भी कभी-कभी ऐसे सत्संगों में जाता हूँ पर कुछ नया सुनने से अधिक कोई विचार नहीं आता. कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इतना ज्ञान तो मैं किताबों में पड़ चुका हूँ पर फिर भी वहाँ जाना मुझे अच्छा लगता है। इसलिए जब आज कल के तथाकथित बाबा लोग भारत के प्राचीनतम परंपरा के महिमा की बात करते हैं तो ऐसा लगता है की कोई ग्राहकों का समूह उनके सामने खड़ा है जिसे वह भारतीय आध्यात्म- जिसका कोई पेटेंट नहीं है- उसे बेच रहे हैं। वह हमेशा ही शिष्य को सिखाते रहते हैं और वह सीखता नहीं है और हर ख़ास मौके पर उनके दर्शन करने चला जाता है और वहाँ हर कोई अपनी सामर्थ्य के अनुसार भेंट अपने धर्म का पालन करता है जिसका भारत की प्राचीन गुरु-परंपरा से कोई लेना-देना हो मुझे नहीं लगता। एक बात अपने निष्कर्ष के तौर पर कहना चाहता हूँ कि आज के तथाकथित गुरुओं को एकलव्य जैसा शिष्य चाहिऐ जो उनको आज के युग में अपना अंगूठा काटकर न भेंट करे-क्योंकि उससे उनकी आश्रम फाईव स्टार आश्रमों थोडे ही बन पायेगा- बल्कि दूसरों को अंगूठा दिखाकर जुटाए पैसे से उनको भेंट दे पर अर्जुन जैसा शिष्य नहीं चाहिए जो दुष्कर्म करने वालों का समर्थन करने पर उनका प्रतिवाद करे। इन संतो और भक्तों को पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं है भले ही कितना भी बखान कर लें. (क्रमश:)

12/29/07

मनुस्मृति:भोजन के समय दाहिना हाथ ऊपर उठाएं

मनु स्मृति के अनुसार

  • आग को किसी तरह के सामान के नीचे नहीं रखना चाहिए और न उसे लांघना चाहिए, पैरों को आग पर नहीं रखना चाहिऐ और न ही कोई ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे जीव हिंसा का भय हो।
  • संध्याकाळ में भोजन भक्षण, यात्रा और विश्राम नहीं करना चाहिऐ, धरती पर लकीर नहीं खींचनी चाहिए और अपने गले से पहनी हुई माला को नहीं उतारना चाहिए।
  • जल में मल-मूत्र, रक्त तथा विष आदि नहीं बहाना चाहिए, इससे पानी प्रदूषित हो जाता है, पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
  • जिस घर में कोई न हो वहाँ अकेले नहीं सोना चाहिऐ, सोये व्यक्ति को जगाना नहीं चाहिऐ रजस्वला स्त्री से बातचीत नहीं करना चाहिऐ। बिना आमंत्रण के किसी के यज्ञ में शामिल नहीं होना चाहिऐ।
  • अग्निहोत्र में, गायों के निवास स्थान में, विद्वानों के समीप, वेद-शास्त्र आदि पड़ते समय और भोजन के समय अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाएं(खाते समय बीच में उठाते रहें)।

12/1/07

कौटिल्य का अर्थशास्त्र:दुर्गुण संक्रामक रोग की तरह होते हैं

  • चंपा के साथ रहने पर तिलों में वैसे ही सुगन्ध आ जाती है, रस वैसी ही नहीं खाया जाता है पर उसकी गंध तिलों में आ जाती है इस कारण अपना प्रभाव अवश्य डालते हैं। वह संक्रामक माने जाते हैं।

अभिप्राय- किसी व्यक्ति में कोई अच्छा गुण है पर वह यदि बुरे लोगों की संगति में आ जाता है तो उनके दुर्गुणों का प्रभाव उस पर आ जाता है। इसलिए अगर कोई व्यक्ति अच्छा लगे तो यह भी देखना चाहिये कि वह किन लोगों के बीच रह रहा है और उसका उठाना बैठना किनके साथ है और उसका घर कैसा है। यदि उसकी पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि ठीक नहीं है तो यह मानना चाहिए कि उसमें वह दुर्गुण भी होंगे।

  • जल का गंगाजल का प्रवाह जब सागर में बह जाता है तब वह पीने योग्य नहीं रहता, विद्वान के लिए यह उचित है कि अशुभ गुण वाले का आश्रय कभी न ले अन्यथा वह भी समुद्र में मिल गए जल के समान होगा।

अभिप्राय -जिन लोगों के मन स्वच्छ हैं और जिन्हें हिंसा, पाप या अन्य अपराध करने से डर लगता है उन्हें दुष्ट प्रकृतियों के व्यक्तियों से दूर रहना चाहिऐ, अगर उनकी सोहबत करेंगे और सतत मिलते रहेंगे तो उन पर भी धीरे-धीरे इसका प्रभाव पडेगा। इसके अलावा संपर्क कायम करते हुए यह भी देखना चाहिऐ कि हमारे संस्कार और परिवार कैसा है और जिससे संपर्क कर रहे हैं उसका कैसा है , यह भी देखना चाहिए। ऊपर लिखे गए पहले पैराग्राफ में भी इसी बात की जानकारी दी गयी है।

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