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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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9/28/07

कौटिल्य अर्थशास्त्र:राजा का व्यसन भारी

  1. मंत्री और मित्र राज्य के सहायक हैं पर राज्य के व्यसन से अधिक भारी राजा का व्यसन है।
  2. जो राजा स्वयं व्यसन से ग्रस्त न हो वही राज्य के व्यसन दूर कर सकता है।
  3. वाणी का दण्ड, कठोरता, अर्थ दूषण यह तीन व्यसन क्रोध से उत्पन्न बताये हैं।
  4. जो पुरुष वाणी की कठोरता करता है उससे लोग उतेजित होते हैं, वह अनर्थकारी है, इस कारण ऎसी वाणी न बोले। मधुर वाणी से जगत को अपने वश में करे
  5. जो अकस्मात ही क्रोध से बहुत कुछ कहने लगता है उससे लोग विपरीत हो जाते हैं जैसे चिंगारी उड़ाने वाली से अग्नि से लोग उतेजित हो जाते हैं।

9/27/07

कौटिल्य अर्थशास्त्र:शत्रु पर माया,उपेक्षा और इन्द्रजाल का प्रयोग भी करें

  1. विशेष ज्ञान से संपन्न सत्त्वगुण और दैव की अनुकूलता लिए उधोग और सत असत का विचार का शत्रु पर उपाय का प्रयोग करे।
  2. चतुरंगिनी सेना को छोड़कर जहाँ कोष और मन्त्र से ही युद्ध होता वही श्रेष्ठ मन्त्र है, जिसमें कोष और मंत्री से ही शत्रु को जीता जा सकता है।

* यहाँ आशय यह है कि अगर कहीं शत्रु के की सेनाओं के साथ सीधे युद्ध नहीं हो रहा पर उसकी गतिविधियां ऎसी हैं जिससे देश को क्षति हो रही हो तो वहां धन और अपने चतुर सहयोगियों की चालाकी(मन्त्र) से भी शत्रु को हराया जा सकता है

३.साम, दाम, दण्ड, भेद, माया, उपेक्षा, इन्द्रजाल यह सात उपाय विजय के हैं।

*यहाँ कौटिल्य का आशय यह है साम, दाम, दण्ड और भेद के अलावा माया(छल-कपट और चालाकी) उपेक्षा का भाव दिखाकर और इन्द्रजाल (हाथ की सफाई) द्वारा भी शत्रु को हराया जा सकता है।

8/25/07

कौटिल्य अर्थशास्त्र:दुष्ट के साथ संधि न करें

  1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।
  2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।
  3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
  4. सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।
  5. डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम मैं वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।
  6. धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।
  7. संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। 'मैं वैर नहीं करूंगा' यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।
  8. समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।

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