समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label राजनीति. Show all posts
Showing posts with label राजनीति. Show all posts

10/22/11

लीबिया के तानाशाह गद्दाफी की मौत, राजसी वृत्ति और कर्म करने वाले लोगों के लिये सबक-हिन्दी लेख

                लीबिया के तानाशाह गद्दाफी को आज से 42 वर्ष पूर्व अगर कोई अपनी उस प्रकार की मृत्यु की तस्वीर खींचकर बता देता तो वह कतई राजनीति में नहीं आता। लीबिया के सर्वोच्च पद पर रहते हुए उसने ढेर सारे सुख भोगे होंगे। उन सुखों की कल्पना तक उसने बचपन में नही की होगी। वह बेखटके अपने राज्य सुख भोगता रहा। इस दौरान अपनी शक्ति में मदांध होकर उसने अनेक ऐसे भी काम किये होंगे जो कि राजस पुरुष के हाथ से अहंकारवश हो ही जाते हैं। अगर उसे कोई भविष्यवाणी कर यह बता देता कि राज्य प्रमुख पद पर प्रतिष्ठित होने से उसको इस तरह की मौत मिलेगी तो वह हर हाल में रहना मंजूर करता पर राजनीति में नहीं आता। मिठाई खाने वाले को अगर यह बताया जाये कि उसकी मिठाई में जहर है तो वह उसे नहीं खायेगा। इंसान कितना भी भूखा हो पर पर उसमें जहर होने की सूचना उसे विरक्त कर देती है।
         ऐसा हमेशा होता नहीं है कि आदमी अपने कर्म फल का अनुमान करे। विश्व भर में अनेक ज्योतिषवेता हैं पर वह ऐसी भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि किसी की मौत दर्दनाक होगी या सहज। अनुमान से किसी की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो जाये पर उसके लिये संयोग जिम्मेदार होता है। इसके बावजूद श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि अंततः राजस कर्म का परिणाम अहंकार, लोभ तथा काम के कारण दुःख के रूप में प्रकट होता है। पहले तो सात्विक लोग राजस कर्म करते नहीं पर अगर करें तो वह सात्विक मार्ग पर नहीं चल सकते। अक्सर लोगों को लगता है कि राजकाज में संलग्न रहना ही राजस कर्म है पर ज्ञानी जानते हैं कि राजस भाव अधिकतर सभी लोगों में रहता है-यह अलग बात है कि कुछ लोग सहजता से राजसी कर्म करते हैं तो कुछ तामस प्रवृत्ति की सहायत लेते हैं जैसा कि गद्दाफी ने किया।
        मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि वह अपने सांसरिक कर्म से अन्य मनुष्यों पर शासन करना चाहता है। सभी लोग राजा बनकर प्रजा पर शासन करे यह जरूरी नहीं है पर अपने आसपास के लोगों से प्रशंसा पाने के लिये लालायित रहना भी इसी प्रवृत्ति का प्रतीक है। यही राजस भाव है जो कि अंततः सुख के बाद दुःख का कारण बनता है।
गद्दाफी को एकदम बेरहमी से मारा गया। इतनी बेरहमी से कोई आवारा कुत्ते को भी नहीं मारता। उसके शरीर में गोलियां लग चुकी थीं। वह खून से सराबोर था। उसे जब अस्पताल ले जाने की आवश्यकता थी तब लोग उसे पीट रहे थे। अगर इस तरह कोई व्यक्ति राह पर दुर्घटना के बाद मिले तो अनजान लोग भी उसकी सहायता के लिये आयेंगे जबकि गद्दाफी पिट रहा था। उसीे घायल तस्वीरें टीवी चैनलों पर दिखाकर बताया गया कि उसका खून गोलियां लगने के कारण निकल रहा था। देखा जाये तो गोलियां ताजा लगी थीं और जिस तरह उसकी स्थिति थी उसे देखकर प्रतीत होता था कि अगर उस समय भी वह अस्पताल ले जाया जाता तो बचता नहीं क्योंकि कालांतर में गोलियों की पीड़ा बढ़ने और रक्त स्त्राव से उसका जीवन नष्ट होना था। गद्दाफी के 42 वर्ष के सौभाग्य ने साथ छोड़ा तो पलभर का दुर्भाग्य उसके लिये मौत का संदेश ले आया।
        गद्दाफी की यह मौत अच्छे खासे आदमी को राजकाज के कर्म में लिप्त होने से रोक सकती है। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि अमेरिका से मित्रता रखने वाले देशों के राज्यप्रमुखों को भी डरा सकती है। यह सभी जानते हैं कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका पूरे विश्व का खैरख्वाह बन गया हैं मध्यएशिया के तेल उत्पादक देशों पर उसका नियंत्रण रहा है। जो भी वहां तानाशह है वह अभी तक किसी न किसी रूप में उसके हितचिंतक ही रहे हैं। इराक के सद्दाम हुसैन अमेरिका तो गद्दाफी ब्रिटेन के प्रिय रहे पर अंततः दोनों को बुरी मौत मिली। ऐसे में जिन लोगों को अमेरिका और ब्रिटेन से राजनीतिक या आर्थिक मदद मिलती है उन्हें यह समझना चाहिए कि पश्चिमी देश किसी के सगे नहीं है। उल्टे उनके निकट रहने से सारी कमजोरियां उनकी नज़र में आ जाती हैं और समय आने पर वह पुराने मित्र को निपटाने के लिये नये शत्रु खड़े कर बुरी हालत कर देते हैं। सद्दाम हुसैन और गद्दाफी को निपटाने क्रे लिये उनके ही देश में विरोधी खड़े किये। फिर पश्चिमी देशों ने पहले उनकी सेना को तहस नहस किया जिससे विद्रोहियों ने उनको निपटाया। दूसरी बात यह कि अगर अमेरिका या ब्रिटेन का एक बात पल्लू पकड़ा तो फिर उसे छुड़ाने का प्रयास करने की बजाय नियमित रूप उसे उनके सामने अपनी उपयोगिता साबित करना चाहिए।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
5हिन्दी पत्रिका

६.ईपत्रिका
७.दीपक बापू कहिन
८.शब्द पत्रिका
९.जागरण पत्रिका
१०.हिन्दी सरिता पत्रिका 

4/9/11

अन्ना हजारे के आंदोलन पर विशेष लेख-अभी तो बहुत लंबा सफर है (anna hazare ke andolan par vishesh lekh=abhi to lamba safar hai)

                       जब सारे देश में गांधीवादी नेता श्री अन्ना हजारे की मांगें मान लेने पर मोमबत्तियां जलाकर जीत का जश्न मनाया जा रहा है तब अन्ना हजारे आगे ‘बड़े आंदोलन‘ की तरफ इशारा कर रहे हैं। अन्ना हजारे के के चेहरे पर कहीं भी विजय का उन्माद नहीं दिखाई दे रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि अन्ना हजारे जिन मांगों को लेकर अनशन पर बैठे उनका पूरा होना विजय का प्रतीक नहीं  हैं बल्कि बल्कि हज़ारे आंदोलन का बंद शिविर से युद्ध मैदान में आना भर है। इससे देश में कोई बदलाव नहीं आने वाला बल्कि यह ऐसा अस्त्र लोगों के हाथ में आ गया है कि जिसका इस्तेमाल भी करना सीखना होगा। जनता को संबोधित करते हुए अन्ना हजारे का चेहरा कोई पढ़ सके तो यह साफ पता लग जायेगा कि वह खुश होने की बजाय आगे के लिये चिंत्तन कर रहे हैं।
              देश में अच्छे या बुरे अवसर पर मोमबत्तियां जलाकर अपने दुःख और खुशी की भावनाऐं व्यक्त का प्रचलन पश्चिम के आधार पर शुरु हो गया है पर यह बौद्धिक चिंत्तन के अभाव का प्रतीक है। कोई भी जनआंदोलन नारों के इर्दगिर्द सिमट जाता है तब उसमें गंभीर बदलाव की सोच नहीं दिखती है इसलिये वहां घोषणायें ही सफलता मान ली जाती हैं भले ही वह प्रत्यक्ष रूप से परिणाम के रूप में प्रकट नहीं होती। ऐसे में देश में जो भ्रष्टाचार पनपा है वह समाज में चेतना और आत्मविश्वास की कमी का परिणाम है। यह बात अन्ना हज़ारे जानते हैं और शायद यही कारण है कि वह भविष्य की रूपरेखा तैयार करने में लग गये हैं। वह जानते हैं कि भले ही प्रचार माध्यम अपने विज्ञापनों के लिये उनकी जीत पर मोमबत्तियां जलती दिखाने के साथ विश्व कप में बीसीसीआई की टीम की-जिसे भारत का ही प्रतिनिधि मान लिया जाता है-विश्व विजय से तुलना कर रहे हैं पर यह सब चौंचले हैं। उनके जनआंदोलन को गंभीर दौर से गुजरना बाकी है। जब देश में बदलाव लाने की बात हो रही हो तो गंभीर चिंत्तन तथा सतत सक्रियता ही कोई नतीजा दे सकती है।
                   अभी अन्ना हजारे जी के आंदोलन पर अधिक लिखना ठीक नहीं लगता क्योंकि हमें परिणामों का इंतजार रहेगा। यह परिणाम मिलने में भी अभी समय लग सकता है। मांगों को पूरी करने की घोषणा तथा परिणामों के बीच एक बहुत लंबा मार्ग है। अन्ना हजारे के साथ आंदोलन में बहुत सारे लोग खड़े हैं पर सवाल यह है कि उनमें से कौन कौन उपनेतृत्व की भूमिका निभा रहे हैं। वह लोग कौन है जो जननेता की छवि रखने वाले अन्ना हज़ारे जी के प्रवक्ता और प्रतिनिधि के रूप में सक्रिय हैं। एक जन आंदोलन चलाने वाले नेता को ऐसा संगठन रखना पड़ता है। इस उपनेतृत्व की कार्यशैली आंदोलन की गतिविधियां प्रभावित होती है और ऐसे में मुख्य नेता के प्रबंधकीय कौशल की भी परीक्षा होती है कि वह कैसे उन पर सतत नियंत्रण करता है। जननेता वही बनता है जो वास्तव में समाज हित को समर्पित होने के साथ ही ईमानदार होता है पर जब वह बदलाव के लिये आंदोलन चलाता है तो उसे अपने सांगठनिक ढांचे को अपने सिद्धांतों के अनुरूप चलाने के लिये प्रबंधकीय कौशल का परिचय देना पड़ता है।
                  अन्ना हजारे ने स्वयं माना है कि जब वह महाराष्ट्र से दिल्ली आये तब उनको यह आशा बिल्कुल नहीं थी कि उनका आंदोलन पूरे देश में फैल जायेगा। हम जब उनको मिले जनसमर्थन की बात करते हैं तो वह केवल बौद्धिक समुदाय के इर्दगिर्द सिमटा दिखता है। आम आदमी के लिये हजारे कोई अच्छा कर रहे हैं पर क्या? उसे समझाना जरूरी है। वह परिणाम चाहते है। वह बदलाव की बयार तुरंत बहते देखना चाहते हैं और हम यह तो मानेंगे कि उसका समय अभी नहीं आया। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीत की घोषणा तो हो गयी पर उसे परिणाम के रूप में प्रकट होना शेष है। अन्ना सीधे, सच्चे और मस्त इंसान है। उनकी दृढ़ता प्रभावित करती है पर राजनीतिक कौशल का प्रमाणित होना बाकी है। अभी आंदोलन की शुरुआत है और उसके संगठन में अन्ना हज़ारे की बाद वाली पंक्ति के लोगों की योग्यता और बुद्धि के साथ ईमानादारी का प्रमाणित होना बाकी है। हमने जो नाम देखे हैं उनपर विवाद होना की संभावना पूरी है। वह कहीं न कहीं वर्तमान व्यवस्था से जुड़े हैं। कुछ लोग यह पूछ भी रहे हैं कि दूसरी पंक्ति के नेताओं की नियुक्ति क्या अन्ना हजारे ने की है या उपवास की कमजोरी के चलते कुछ लोगों ने अपने आप को स्थापित कर लिया है। याद रखें वह सभी लोग वर्तमान व्यवस्था से जुड़े रहकर लाभ लेते रहे हैं और उसमें मूल परिवर्तन की इच्छा अभी प्रमाणित नहीं है। ऐसे में इस जनआंदोलन के प्रति सशंकित हो सकते हैं पर निराशा नहीं  क्योंकि अभी तो बहुत सारे तूफानों से इस आंदोलन का गुजरना है फिर आज के शक्तिशाली प्रचार युग में कुछ छिपता नहीं है।
                       बहरहाल अन्ना हजारे के आंदोलन का मुंह खुला तो बहुत सारे जनआंदोलन उभरेंगे। कई नये चेहरे आयेंगे। अन्ना हजारे की मांगे मान लेने को विजय मान लेना सतही बौद्धिक चिंत्तन का प्रमाण है पर उनके साथ जो गंभीर चिंतक हैं वह खामोशी से सब देख रहे हैं। जो हाथ हिलाकर हिलाकर नाच रहे हैं उन्हें यह शायद अंदाज नहीं है कि आगे अभी और लड़ाई है। यहां अन्ना और उस संगठन के बीच अंतर की चर्चा नहंी की जिसके लोग उनके अनशन का लाभ उठाकर जनप्रतिनिधि बन गये हैं। ऐसा लगता है कि अन्ना एक व्यक्ति की तरह दिल्ली आये और उनके अनशन का नाम पर एक स्वयं सेवी संगठन उनका पिछलग्गू बनकर आगे आ गया। इस तरह एक जन आन्दोलनकारी नेता को पहले से ही मौजूद संगठन स्वाभाविक रूप से मिल गया हमें उनसे कोई शिकायत नहीं है पर इतना जरूर बता दें कि अन्ना हजारे एक आंदोलन है और उनका संगठन उसका प्रतिनिधि बन गया है पर जब यह आंदोलन बढ़ेगा तब अन्ना की बात ही अंतिम होगी न कि उनके संगठन की। यह सही है कि यह संगठन बहुत समय से भ्रष्टाचार के विरुद्ध जूझ रहा है पर वह अन्ना हजारे नहीं है। अन्ना हजारे के साथ देश के जागरुक लोग जुड़े हैं वह उन्हीं की राय को अंतिम मानेंगे। ऐसे में उनकी राय देखकर ही आगे चलें यही अच्छा रहेगा। इस पर शेष आगे के लेखों में।
--------------------------------
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
5हिन्दी पत्रिका

६.ईपत्रिका
७.दीपक बापू कहिन
८.शब्द पत्रिका
९.जागरण पत्रिका
१०.हिन्दी सरिता पत्रिका  

5/15/09

लोकसभा चुनाव 2009 के परिणामों में लोगों की दिलचस्पी-आलेख

कई लोग आज सोयेंगे नहीं और उनकी राते जागते हुए कटेंगी। सुबह घड़ी की सुईयां सात बजे ही उनके दिल की घड़कने तेज हो जायेंगी। भारतीय लोकतंत्र के लिये कल एक महान दिन रहने वाला है। मतदान महायज्ञ की कल एक तरह से पूर्णाहूति का समय होगा।
हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनावों के परिणाम कल मिल जायेंगे। उससे पहले टीवी चैनलों पर रुझानों का प्रदर्शन होगा और हमेशा की तरह उसे इतने टीवी दर्शक मिलेंगे जो पांच साल में एक ही बार मिलते हैं।
जब टीवी नहीं था तब लोग रेडियो से चिपक कर बैठ जाते थे। उस समय मशीन से चुनाव नहीं होते थे और कई बड़े चुनाव क्षेत्रों में तो दो दिन तक गिनती चलती थी। अब तो मशीनों से सब आसान कर दिया है।
ऐसा नहीं है कि केवल चुनावी राजनीति में सक्रिय लोग ही इन परिणामों में दिलचस्पी लेते हैं बल्कि देश का एक बहुत बड़ा तबका जो किसी दल विशेष में दिलचस्पी नहीं रखता वह भी चुनाव परिणामों को सुनने के लिये लालाचित रहता हैं।
चुनावों की अगर क्रिकेट से तुलना करें तो यकीनन उसके परिणाम क्रिकेट से अधिक दर्शक जुटाते हैं। क्रिकेट तो केवल शहरी और पढ़े लिखे तबके तक ही सीमित है पर चुनाव परिणामों पर पूरे देश के हर गांव में नजर रखी जायेगी। इस देश में एक बहुत बड़ा तबका है जो राजनीति में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय नहीं होता पर उसकी दिलचस्पी उसके समाचारों में रहती है और वह आपस में बहस करता है-इसमंें अमीर, गरीब, शिक्षित,अशिक्षित, शहरी और ग्रामीण-हर वर्ग का आदमी शामिल है। यह केवल एक भ्रम है कि गरीब अशिक्षित लोग चुनाव में दिलचस्पी नहीं लेते। जिन लोगों ने आजादी के बाद जन्म लिया है उन्होंने देखा होगा कि किस तरह गांवों में चैपालों और शहरों में चैराहों पर लोग राजनीतिक विषयों पर बहस करते हैं। विलासिता से जीवन व्यतीत करने वाला शहरी हो या मेहनत से संघर्षपूर्ण जीवन जीने वाला ग्रामीण हो जिनकी दिलचस्पी चुनावों में है वह परिणामों का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हैं।
हां, एक मजेदार बात यह है कि इनमें चुनाव परिणाम और राजनीति में दिलचस्पी लेने वाले कुछ लोग ऐसे हैं जो एकदम दृष्टा बन जाते हैं और अपन मत देने मतदान केंद्र परजायें यह जरूरी नहीं है जबकि ऐसे लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वह मतदान अवश्य करें। वह मत देने वाले मतदाता और चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को एक तरह से पर्दे पर पात्र की तरह देखते हुए अपनी भूमिका एक दर्शक तक ही सीमित रख देते हैं।
देश में कई जगह मतदान का कम प्रतिशत होना चिंताजनक है। अगर देखा जाये तो देश में राजनीतिक जागरुकता उससे अधिक है जितना मतदान होता है। कुछ बुद्धिमान और विद्वान लोग चर्चा करने तक ही अपना प्रदर्शन सीमित रखते हैं और मतदान करने की बात आये तो यही सोचते हैं कि ‘इतने सारे लोग हैं एक हमारा मत क्या कर लेगा?’ यह सोच उनकी संकीर्णता का परिचायक है।
भारत दुनियां का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और कल चुनाव परिणाम उसमें एक नया अध्याय जोड़ेंगे। एक सामान्य मतदाता की मतदान करने के बाद केवल चुनाव परिणाम में ही दिलचस्पी रह जाती है। केवल अपने क्षेत्र तक ही नहीं वरन् देश और प्रदेश के चुनाव परिणामों पर वह दृष्टि रखता है। राजनीतिक दलों के समर्थक अपने दलों के परिणामों के अनुसार अपनी प्रतिक्रिया देते हैं पर जो निष्पक्ष, स्वतंत्र और तथा किसी दल के समर्थक या विरोधी नहीं हैं उनकी सोच इतिहास को अपने सामने बनते देखने की होती है। ऐसे लोग टीवी और रेडियो से समाचार और विश्लेषण सुनने के बाद समाचार पत्रों की खबरों को पढ़ना भी नहीं भूलते।
हिंदी ब्लाग जगत के लिये यह एक तरह से पहला ऐसा लोकसभा चुनाव था जब कुछ लिखा गया। अनेक ब्लाग लेखकों ने अपने समर्थन और विरोध के विषयों के साथ अनेक पाठ लिखे। चुनावों के पूर्वानुमान प्रस्तुत किये। कड़ी बहसें होती दिखीं। वैसे हिंदी ब्लाग जगत चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं था पर ब्लाग लेखकों बहसों को देखते हुए ऐसा लगता था कि वह ऐसा करेंगे। हिंदी ब्लाग जगत किसी दल विशेष का समर्थन या विरोध का प्रचार अधिक पाठकों तक नहीं पहुंचा सका पर भविष्य में इसकी संभावना लगती है कि वह अपने उद्देश्य में सफल होंगे-जिन्होंने ऐसा करने का अपना लक्ष्य तय कर रखा है।
जिन लोगों की चुनाव से जुड़े राजनीतिक विषय पर लिखने की अधिक दिलचस्पी नहीं है वह भी इन ब्लाग लेखकों के पाठ पढ़ते रहे। बहरहाल कल एक दिलचस्प और एतिहासिक दिन है और इसका आनंद उठाने में चूकना नहीं चाहिए।
.....................................
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

9/28/07

कौटिल्य अर्थशास्त्र:राजा का व्यसन भारी

  1. मंत्री और मित्र राज्य के सहायक हैं पर राज्य के व्यसन से अधिक भारी राजा का व्यसन है।
  2. जो राजा स्वयं व्यसन से ग्रस्त न हो वही राज्य के व्यसन दूर कर सकता है।
  3. वाणी का दण्ड, कठोरता, अर्थ दूषण यह तीन व्यसन क्रोध से उत्पन्न बताये हैं।
  4. जो पुरुष वाणी की कठोरता करता है उससे लोग उतेजित होते हैं, वह अनर्थकारी है, इस कारण ऎसी वाणी न बोले। मधुर वाणी से जगत को अपने वश में करे
  5. जो अकस्मात ही क्रोध से बहुत कुछ कहने लगता है उससे लोग विपरीत हो जाते हैं जैसे चिंगारी उड़ाने वाली से अग्नि से लोग उतेजित हो जाते हैं।

8/25/07

कौटिल्य अर्थशास्त्र:दुष्ट के साथ संधि न करें

  1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।
  2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।
  3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
  4. सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।
  5. डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम मैं वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।
  6. धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।
  7. संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। 'मैं वैर नहीं करूंगा' यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।
  8. समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।

8/17/07

कौटिल्य अर्थशास्त्र: राजा से खुश जनता फल भी देती है

  1. राजप्रमुख को चाहिए कि वह अपने राज्य के दुष्ट और विद्रोही प्रवृति के लोगों की हमेशा निगरानी करे। विद्रोहियों से वार्ता का मार्ग न अपनाते हुए गुप्त शस्त्रों का प्रयोग करे।
  2. विश्वस्त गुप्तचरों के के द्वारा उनकी खोज करे तथा उनके ठिकानों का पता लगाए तथा उन्हें प्रकट करते हुए उन्हें नष्ट करे।
  3. इस प्रकार जनता जनता की भलाई के लिए दुष्ट और विद्रोही पुरुषों के अपराधों की सार्वजनिक घोषणा करते हुए उन्हें नष्ट करे।
  4. कठोरतम दण्ड से जनता विचलित हुने लगती है और कोमल दण्ड से तिरस्कार करने लगती है, इसलिये अपराध के वृति को दृष्टिगत मध्यमा वृति से किसी का पक्ष न लेकर, राजप्रमुख उचित दण्ड की व्यवस्था करे।
  5. जैसे सूक्ष्म बीजांकुर भी रक्षा करने से पुष्ट हो जाता और समय आने पर फल देता है, इसी प्रकार राजा से रक्षा होने पर प्रजा भी समय पर राजा को फल देती है।

8/16/07

मनुस्मृति: राजा को यमराज और पृथ्वी की तरह समान दृष्टि रखना चाहिए

  1. राज्य प्रमुख को अपने राज्य की जनता के लिए आश्वासन रूपी पदार्थों की वर्षा ठीक उसी प्रकार करनी चाहिए, जिस प्रकार इंद्र देव चार महीने वर्षा करते हैं।
  2. राज्य प्रमुख को अपनी जनता से वैसे ही कर प्राप्त करना चाहिए, जिस प्रकार सूर्य आठ महीने अपनी किरणों के माध्यम से जल ग्रहण करता।
  3. उसे अपनी जनता की मनोवृत्ति की जानकारी उसी प्रकार रखनी चाहिए, जिस प्रकार हवा सभी जीवों में प्रविष्ट होकर घूमती है।
  4. अपराध करने वाले मित्रों और शत्रुओं दोनों को समान रुप से दंड देना चाहिऐ, ठीक उसी प्रकार जैसे यमराज समय आने पर प्रिय या अप्रिय सभी को ऐक समान अपना ग्रास बनाते हैं।
  5. राज्य प्रमुख को चाहिए कि पापियों को उसी प्रकार बंदी बनाकर रखे जिस प्रकार वरुण देव धर्म को भ्रष्ट करने वाले को अपने पाश में बाँध कर रखते हैं।
  6. जिस प्रकार पृथ्वी सभी प्राणियों को समान रुप से ग्रहण करती है उसी प्रकार राजा द्वारा अपनी प्रजा का समान रुप से पालन करना 'पार्थिव व्रत' कहलाता है।

कौटिल्य अर्थशास्त्र:राजप्रमुख अपने पुत्रों पर दृष्टि रखें

  1. मदोन्मत्त हुए राजप्रमुख (राजा) के पुत्र निरंकुश हाथी का समान अभिमानी होकर भ्राता तथा पिता की ह्त्या कर डालते हैं।
  2. ऐसे पुत्र अनेक विषयों में अपने आग्रह करते हैं जिससे राज्य की रक्षा में बहुत कठिनाई आती है, जैसे व्याघ्र द्वारा भक्षित मांस की व्याघ्र के रहते हुए रक्षा नहीं हो सकती है।
  3. राजप्रमुख को चाहिए कि वह अपने पुत्रो तथा अपने सहायकों को विनम्रता सिखाये, यी वह विनम्र नहीं होंगे तो कुल और राज्य भी नष्ट हो सकता है।
  4. दुर्बुद्धि पुत्र का त्याग भी नहीं करना चाहिऐ। यदि उसे निकाला जायेगा तो शत्रु से मिलकर वह पिता की भी ह्त्या कर सकता है
  5. अगर राजपुत्र व्यसनों में पडा हो तो उसमें पडे अन्य व्यक्तियों के द्वारा उसे परेशान करवाए ताकि वह व्याकुल होकर उनसे विरक्त हो जाये।

नोट-इसमें राजा शब्द की जगह आज के संदर्भों में राजप्रमुख शब्द शब्द प्रयोग किया गया है।

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

विशिष्ट पत्रिकायें