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7/15/12

निर्मल बाबा से कौन डर रहा था-हिन्दी लेख (nirmal baba se kaun dar rahaa thaa-hindi lekh)

            निर्मल बाबा का प्रचार कम हो गया है। उनके समागमों का तूफानी गति से चलने वाला विज्ञापन अब अनेक चैनलों में दिखाई नहीं देता है। उनके बारे में कहा गया कि वह समाज में अंधविश्वास फैला रहे हैं। लोगों को उनकी समस्याओं के निराकरण के लिये आईस्क्रीम, रसगुल्ले और समौसा खाने के इलाज बता कर पैसा वसूल कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि निर्मल बाबा का प्रचार केवल उनके विज्ञापनों के कारण हो रहा था जिसके लिये वह सभी हिन्दी समाचार चैनलों को भारी भुगतान कर रहे थे। मतलब यह कि उनका प्रचार स्वप्रायोजित होने के साथ अतिरेक से परिपूर्ण था। अचानक ही हिन्दी समाचार चैनलों को लगा कि निर्मल बाबा तो अंधविश्वास फैला रहे हैं तो उन्होंने उनके विरुद्ध प्रचार शुरु किया। लंबे समय तक यह चैनल विरोधाभास में सांस लेते रहे। एक तरफ निर्मल बाबा का विज्ञापन चल रहा था तो दूसरी तरफ चैनल वाले अपना समय खर्च कर उस पर बहस कर रहे थे-यह अलग बात है कि उस समय भी निर्मल बाबा के खलनायक साबित करते हुए वह दूसरे विज्ञापन चला कर पैसा वसूल कर रहे थे। निर्मल बाबा को अंधविश्वास का प्रवर्तक बताकर इन चैनलों ने अपने ही प्रायोजित बुद्धिजीवियों से बहस कराकर व्यवसायिक सिद्धांतों के प्रतिकूल जाने का साहस करते हुए उनमें भी अतिरेक से पूर्ण सामग्री प्रस्तुत की।
              बहरहाल निर्मल बाबा का जलवा कम हो गया है और यह सब उन हिन्दी समाचार चैनलों की वजह से ही हुआ है जिन्होंने विज्ञापन लेते समय केवल अपना लाभ देखा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन टीवी चैनलों ने वास्तव में क्या कोई समाज के प्रति भक्ति दिखाते हुए निर्मल बाबा के विरुद्ध दुष्प्रचार कर कोई साहस का काम किया है या फिर निर्मल बाबा के प्रचार से मिलने वाले धन से अधिक कहीं उनकी हानि हो रही थी जिससे वह घबड़ा गये थे। इसी वजह से समाज को जाग्रत करने के लिये कथित रूप से अभियान छेड़ दिया था। 
           निर्मल बाबा पिछले कई महीनों से छाये हुए थे। हमने देखा कि उनकी चर्चा सार्वजनिक स्थानों पर होने लगी थी। स्थिति यह थी कि देश के ज्वलंत राजनीतिक विषयों से अधिक लोग निर्मल बाबा की चर्चा करने लगे थे। महंगाई और मिलावट से परेशान समाज के लिये निर्मल बाबा का समागम एक मन बहलाने वाला साधन बन गया था। देखने वालों की संख्या बहुत थी पर इसका मतलब यह कतई नहीं लिया जाना चाहिए कि सभी उनके शिष्य बन गये थे। फिर हम यह भी देख रहे थे महंगाई, बेरोजगारी, दहेजप्रथा तथा पारिवारिक वातावरण की प्रतिकूलता से परेशान लोगों की संख्या समाज में गुणात्मक रूप से बढ़ी है जिससे लोग राहत पाने के लिये इधर उधर ताक रहे थे। ऐसे में हर चैनल पर छाये हुए निर्मल बाबा की तरफ अगर एक बहुत दर्शक वर्ग आकर्षित हुआ तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं थी। इससे हमारे देश के बुद्धिजीवियों को कोई परेशानी भी नहीं थी मगर समस्या यह थी कि टीवी का एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग केवल निर्मलबाबा के समसमों की तरफ खिंच गया था। उस दौरान आईपीएल जैसी क्रिकेट प्रतियोगिता तथा टीवी के यस बॉस कार्यक्रम की चर्चा सार्वजनिक स्थानों से गायब हो गयी थी। निर्मल बाबा ने चैनलों से अपने समागमों के विज्ञापन का समय भी इस तरह लिया था कि वह एक न एक चैनल पर आते ही थे। स्थिति यह लग रही थी कि लोग चैनलों पर उन समागमों के प्रसारण का समय इस तरह याद रखते थे जैसे कि सारे चैनल ही निर्मलबाबा के खरीदे हुए हों। हमारा अनुमान तो यह है कि निर्मल बाबा से मिलने वाले आर्थिक लाभ से कहीं उनको अपने अन्य प्रसारणों पर हानि होने का डर था। उनके अन्य कार्यक्रम की लोकप्रियता इस कदर गिरी होगी कि उनके विज्ञापनादाताओं को लगा होगा कि वह बेकार का खर्च रहे हैं। प्रचार प्रबंधकों से स्पष्ट कहा होगा कि वह या तो निर्मल बाबा का विज्ञापन प्रसारित करें या हमारे लिये दर्शक बचायें। 
            हमने निर्मल बाबा के कार्यक्रंम देखे थे। हमारे अंदर केवल मनोरंजन का भाव रहता था। अगर अंधविश्वास की बात की जाये तो हिन्दी चैनल वाले स्वयं ही अनेक तरह के ऐसे प्रसारण कर रहे हैं जो विश्वास और आस्था की परिधि में नहीं आते। निर्मल बाबा को कोई सुझाव हमारे दिमाग में नहीं आता था। देखा और भूल गये। दरअसल इस विषय पर बहुत पहले लिखना था पर समय और हालातों ने रोक लिया। एक योगसाधक और गीता पाठक होने के नाते हमें पता है कि कोई भी मनुष्य अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बिना इस संसार में सहजता से संास नहीं ले सकता। संसार के विषयों में लिप्त आदमी सोचता है कि मैं कर्ता हूं यही से उसक भ्रम प्रारंभ होता है जो अंततः उसे अंधविश्वासों की तरफ ले जाता है। संसार के काम समय के अनुसार स्वतः होते हैं और उनके लिये अधिक सोचना अपनी सेहत और दिमाग खराब करना है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
http://rajlekh-patrika.blogspot.com

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5/28/09

मन को कैद करने वाले पिंजरे-आलेख

वह जो सभी तरफ दिखाया जा रहा है उसका मुख्य उद््देश्य तुम्हें भीड़ बनाना है। वह भीड़ जो समय पड़े तो उसे जाति, भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा सके। इसे बांटकर उन लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा सके जिनका काम ही भीड़ पर चला करता है। बदले में भीड़ जुटाने वाले सौंपते हैं उनको तमगे, कप, उपाधियां और सम्मान। भीड़ कभी एक न हो इसका पुख्ता इंतजाम कर लिया जाता है। भीड़ के एक हिस्से को इसलिये खुश किया जाता है कि दूसरा हिस्सा चिढ़े और इसकी अभिव्यक्ति के लिये साधन ढूंढे जो कि पैसे से बिकते हैं।
यह पूर्वनिर्धारित है पर लगता है कि स्वतः चल रहा है। दिखता तो यह स्वतः चलता है है पर इसका बौद्धिक ढांचा बरसों पहले से बनाया जा चुका है और इस पर नियंत्रण केवल खास लोग और उनके चाटुकारो का है। यकीन करो जो तुम कहीं भी कुछ देख और पढ़ रहे हो उसमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर है तो वह ऐसी है जैसे किसी फिल्म की होती है-एक काल्पनिक कहानी पर जिस तरह कुछ लोग अभिनय करते हैं। लोग फिल्मों को सच मानने लगे हैं। उनमें अभिनय करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को महानायक और महानायिका बना देते हैं। हालत यह है कि पर्दे का खलनायक भी बाहर नायक की तरह सम्मान पाता है और उसके बारे में कहते हैं कि ‘वह तो एक आम इंसान है।’ मगर नायक का पात्र तो महानता की उपाधि पाता है।

तयशुदा पात्र हैं। कोई हंसता दिख रहा है कोई रोता। फिल्म की तरह समाचार हैं और समाचार ही फिल्म बना रहे हैं। आजकल नई सभ्यता है। पहले तो राहजन हथियारों की दम पर लूट लेते थे पर इस नई सभ्यता में हिंसा वर्जित है क्योंकि आदमी की बुद्धि को तमाम तरह की लालच देकर और काल्पनिक सुख दिखाकर भ्रमित किया जा सकता है और मन के स्वामी होने की वजह से मनुष्य कहलाने वाला जीव बिना किसी रस्सी और जंजीर के पशु बनकर जिस आदमी के पास काल्पनिक रस्सी है उसके पीछे चला जाता है।

जिनके पास धन, पद और बाहुबल है उनको कुछ नहीं करना बस इंसानी मन को पकड़ लेने वाले पिंजरे-फिल्म,टीवी चैनल, अखबार और अंतर्जाल-पर कब्जा करना है। वहां से उसे समयानुसार भड़काने, बहलाने, और हड़काने वाले संदेश, समाचार, कहानियां और कविताओं का प्रसारण करना है। सारे दृश्य काल्पनिक और पूर्व रचित हैं। सर्वशक्तिमान ने यह सृष्टि रची है पर बाकी सब तो उसने इस धरती पर विचरने वाले जीवों पर छोड़ दिया है पर फिर भी ऐसे लोग हैं जो ‘भाग्य का खेल है’ या ‘जैसा
उसने रचा है’हमें देखना है जैसे जुमले कहते हैं पर उनके मन में यही है कि हम ही सब कर रहे हैं। दूसरे को दृष्टा बनने का उपदेश देने वाले लोग स्वतः ही अपनी अंर्तज्योति बुझी होने के कारण भीड़ की तरह हांके जा रहे हैं पर इसे नहीं जानते।

बिल्कुल उत्तेजित मत हो! यकीन करो यह योजना है एक व्यापार की। तुम जिन दृश्यों से चिढ़ते हो उनसे मूंह फेर लो। जिन शब्दों से तुम आहत होते हो उनको पढ़ना या सुनना भूल जाओ। जिन लोगों से तुम्हें दुःख मिलता है उनको याद भी मत करो। तुम उन समाचारों पर ध्यान न देते हुए उनकी चर्चा से दूर हो जाओ जिनसे कष्ट पहुंचता है। यह दृष्टा बनना ही है और फिर देखो उन लोगों का खेल! वह जो तुम्हें हड़काते हैं वह स्वयं ही हडकते नजर आयेंगे। वह जो तुम्हें झूठे खेल से बहला रहे हैं पर खुद दहलने लगेंगे। तुम जिन दृश्यों और समाचारों को सत्य समझ कर विचलित होते हुए उन पर बहसें करते हो उनके पीछे के सच पर जब विचार करने लगोगे तो तुम्हें हंसी आयेगी। जो बाजार में बिक रहा है या दिख रहा है-वह आदमी
हो याशय-उसका मूंह तुम्हारी जेब की तरफ है। जैसे पहले बहुरूपिये दिल बहलाकर पैसे ले जाते थे पर अब उनको आने की जरूरत नहीं है। उन्होंने तुम्हारे घर में पर्दे सजा दिये हैं। तुम्हें पता ही नहीं चलता कि तुम्हारा पैसा कैसे उनके पास जा रहा है।

वह तुम्हारा ध्यान किसी चेहरे की तरफ खींचे-चाहे वह हीरोईन का चेहरा हो या सर्वशक्मिान के किसी रूप का-तुम उसे मत देखो और आंखें बंद कर भृकुटि पर नजर रखो। वह तुम्हें संगीत सुनायें तुम ओम शब्द का जाप करने लग जाओ। वह फिल्म चर्चा करें तुम गायत्री मंत्र का जाप करने लगो। अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र अपने अंदर रखो। बाहर कोई सुने यह जरूरी नहीं। बस तुम अपने को सुनना शुरु कर दो। अपने को पढ़ो। अपने सत्य कर्म को देखो दूसरे के अभिनय में रुचि रखने से तुम्हारे मन को शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने शोर मचा रखा है तुम शंाति अपने अंदर ढूंढो। कहीं दूसरे से सुख और मनोरंजन की आस तुम्हें कमजोर बना रही है। अपने मन में अपने लिये ख्वाब और सपने देखो उसने दूसरे पिंजरे में मत फंसने दो।
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8/4/08

संतों की अंधभक्ति और अंधविरोध दोनों ही अनुचित-आलेख

आजकल के साधु संतों के प्रति अंधभक्त नहीं दिखाना चाहिए, यह बात मानने योग्य है पर उनका अंधविरोध भी करना कोई अच्छी बात नहीं है इसका भी विचार करना चाहिए।

अभी हाल ही में भारत एक प्रसिद्ध संत को गुरुकुलों में बच्चों की मौत का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। जांच एजंसियां इनकी जांच मेंं लगी हुई है पर ऐसा लगता है कि भारतीय प्रचार माध्यम अपना विवेक खो रहे हैं वह उस संत पर आक्षेप करते हुए तमाम ऐसी बातें कह रहे हैं जिसका उनको अधिकार नहीं है। अखबारों और टीवी चैनलों को अब हर मामले में अपने संवाददाताओं को वकील और स्वयं को जज मानकर फैसले देने की आदत हो गयी हैं और अंतर्जाल पर भी अनेक लेखक इसी मानसिकता का शिकार हो रहे हैं।

वह एक संत हैं। संतों को माया से दूर रहना चाहिए पर उन्होंने उसके विस्तारित रूप के साथ ही अपने अध्यात्म सम्राज्य का विस्तार किया है-इसमें केाई संदेह नहीं हैं। तमाम तरह के आरोप लगाते हुए लोग सड़कों पर आ गये, पर आखिर उन आरोपों की सच्चाई का निर्णय कौन करेगा? देश में तमाम तरह की जांच एजेंसियां हैं और कानून की रक्षा के लिये अने संस्थायें हैं पर लोग क्या चाहते हैं कि वहां कार्यरत अधिकारी उनके कहे अनुसार बहुमत से फैसले लें।

उन संत ने अध्यात्म का व्यवसाय की तरह अपनाया पर इसमें बुराई क्या है? इस देश में ऐसे भी संत हुए हैं जिन्होंने माया का दूर सेू नमस्कार करते हुए ही समाज को सत्य के रहस्य से अवगत कराया और उन्होंने ऐसे व्यवसायिक संतों से से दूर रहने की सलाह दी। फिर लोग जाते क्यों हैं उनके पास? संत कबीर ने तो ऐसे साधु संतों पर तीखे प्रहार किये हैं। इसका आशय यह है कि उनके समय में भी ऐसे लोग थे। हमारे देश के महान संत कबीर का संदेश जो पढ़कर धारण करे वह ऐसे संतों के पास नहीं जायेगा। संत कबीर का लिखा कोई अंग्रेजी में नहीं है कि लोग पढ़ते नहीं है पर फिर भी ऐसे लोगों के पास जाते हैं। वजह! कोई स्वयं चिंतन, मनन और अध्ययन के लिये अपने मस्तिष्क की नसों को तकलीफ देना नहीं चाहता। यहीं से शुरू होता है ऐसे व्यवसायिक संतों का कार्र्यक्षे+त्र। लोग उनके यहां जाते हैं और चाहे जैसे अपने मन का बोझ हल्का कर लेते हैं।

एक तरफ सभी कहते हैं कि प्रचार माध्यम जबरन सनसनी फैला रहे हैं और उनके द्वारा दी जा रही खबरों पर जो निष्कर्ष प्रस्तुत किये जाते हैं वह अविश्वसनीय हैं। ऐसा लगता है कि भारत के अनेक हिंदी लेखक भी अपने पुराने लेखकों की तरह पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं अगर प्रचार माध्यमों की कोई खबर और निष्कर्ष बुरा लगे तो अविश्वसनीय और अगर वह मनोमुताकिब हो तो उस पर लिखना शुरू कर देते हैं। टीवी चैनल और समाचार पत्र-पत्रिकाएं अपने दृष्टिकोण से जिस तरह निष्कर्ष प्रस्तुत कर रहें उससे तो यही लगता है कि वह निष्पक्षता की हदें पार कर रहें हैं। एक बार एक चैनल ने सात संतों को काला धन सफेद करते हुए रंगे हाथेां दिखाया था पर किसी अन्य चैनल ने उसको नहीं दिखाया क्योंकि वह किसी आधिकारिक पटल पर नही आया पर वर्तमान प्रकरण कानून की दृष्टि में है तो उस पर सब अपने हिसाब से बयानबाजी कर रहे हैं। कई लोग उन संत के बारे में दूसरों के मुख से कही गयी पुरानी घटनाओं को यहां दावे के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं? क्या वह यह कह सकते हैं कि जिस व्यक्ति ने उनको यह घटना बताई है वह सच है?

कुल मिलाकर किसी के विरुद्ध दुष्प्रचार करते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कहीं ऐसा करते हुए कुछ उंगलियां उनकी तरफ भी उठ सकती हैं। कुछ चैनल संत के आश्रमों के बारे में तमाम टिप्पणियां करे रहे हैं पर एक प्रश्न जो लोग पूछ रहे हैं कि आजकल कौनसा ऐसा निजी संस्थान है जो सफेद धन के सहारे खड़ा है? इसका उत्तर देने की न तो कोई आवश्यकता समझता है और दिया भी क्या जा सकता है? सबकी सच्चाई सभी जानते हैं।

संतों ने अध्यात्म के नाम पर मायाजाल का विस्तार किया है तो उनको कभी न कभी ऐसी हालातों का सामना करना है। उनके अनेक कार्यक्रमों से असहमति हो सकती है पर इस तरह बिना प्रमाण के आक्षेप करना शोभा नहीं देता। वैसे तो जो भगवान के सच्चे भक्त हैं वह किसी में दोष नहीं देखते पर वह ऐसे गुरू भी नहीं बनाते कि जो उनको अपनी अंधभक्ति के लिए प्रेरित करें। दूसरा यह भी सच है कि जो अंध विरोध कर रहे हैं वह इन्हीं संतों के भक्तों की भावनाओं को भी नहीं समझ रहे। इन संतों की अंध भक्ति करना ठीक नहीं है पर यह अंधविरोध भी कई ऐसे तनावों का जन्म दे सकता है जिन पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। अनेक संत हैं जो अपनी माया का विस्तार का करते हुए इन भक्तों के मन मेें अपनी जगह बनाये हुए हैं और उनकी भावनाओं को आहत करने का किसी को अधिकार नहीं है जब तक उसके लिये उसे कोई दूसरा मार्ग बताया जाये।

क्या प्रचार माध्यम चाहते हैं कि इन संतों को प्रवचन को सुनना छोड़कर टीवी चैनलों के सास-बहू के चैनल देखकर लोग अपनी मानसिकता को विकृत करें या समाचारों में सनसनी और वीभत्सता फैलाने वाले कार्यक्रम देख अपने ऊपर तनाव लायें। याद रखने वाली बात यह है कि लोग उनसे भी उकताये हुए हैं ऐसे में यह कथित संत अपनी वाणी से ही लोगों को मोहकर उनको कुछ देर के लिये तनाव मुक्ति तो देते हैंं। यह अलग बात है कि यह तनाव मुक्ति अधिक देर तक नहीं रहती। इसका स्थायी इलाज तो सत्य का तत्वज्ञान है और उसे संत कबीरदास तथा अन्य महापुरुष बता गये हैं और उसे धारण करने की जरूरत हैं।
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12/27/07

बेनजीर की हत्या कर दी गयी

टीवी चैनल आज तक पर प्रसारित खबर में बताया गया है कि पाकिस्तान की भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गयी है। बताया जाता है वह जब एक जलसे को संबोधित कर रहीं थी तब एक आत्मघाती हमलावर ने वहाँ विस्फोट किया उसमें लोग मारे गए। उसके बाद जब बेनजीर वहाँ से जा रही थी तब उन पर गोलिया चलाईं गयीं। उन्हें अस्पताल पहुचाया गया। अभी जो खबर दिखाई जा रही है उसमें उनकी मौत की पुष्टि की गयी है।

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