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10/31/10

बचपन से अध्यात्मिक ज्ञान देने का प्रयास अच्छा है-हिन्दी लेख (bachapan se adhyamik gyan dene ka prayas-hindi lekh)

बंबई में हिन्दी फिल्मों और टीवी धारावाहिकों की अभिनेत्री सोनाली बैंद्रे  अनुपम सौंदर्य के साथ कुशल अभिनय तथा मधुर स्वर की स्वामिनी मानी जाती है। हैरानी की बात है कि फिल्मों में उनको अधिक अभिनय का अवसर नहीं मिला। इसलिये उन्होंने फिल्मों में सक्रिय एक व्यक्ति से विवाह कर लिया। सौंदर्य के साथ हर किसी में विवेक और बुद्धि हो या आवश्यक नहीं है। जिस नारी में सौंदर्य के साथ बुद्धि और विवेक तत्व हो उसे ही सर्वाग सुंदरी माना जाता है और सोनाली बेंद्र इस पर खरी उतरती हैं। ऐसे में जब अखबार में उनके आध्यात्मिक प्रेम के बारे में पढ़ा तो सुखद आश्चर्य हुआ। प्रसंगवश सोनाली बेंद्रे ने टीवी पर बच्चों के साथ प्रसारित एक संगीत प्रतियोगिता के रूप में प्रसारित एक कार्यक्रम में उनके संचालन के तरीके ने इस लेखक को बहुत प्रभावित किया था। शांति के साथ अपने कुशल संचालन के प्रसारण से यह तो उन्होंने साबित कर ही दिया था कि उनमें बुद्धिमता का भी विलक्षण गुण है। सच बात कहें कि अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोड़पति के मुकाबले वह एक बेहतर प्रसारण लगा था।
अखबार में पढ़ने को मिला कि वह अभिनय के नये प्रस्ताव स्वीकार नहीं  कर रहीं। इसका कारण यह बताया कि वह अपने पांच वर्षीय बच्चे को संस्कारिक रूप से भी संपन्न बनाना चाहती हैं। उनका बच्चा जिस स्कूल में जाता है वहां श्रीमद्भागवत गीता का भी अध्ययन कराया जाता है। बहुत छोटे इस समाचार ने सोनाली बेंद्रे की याद दिला दी जो अब केवल कभी कभी बिजली के उपकरणों के विज्ञापन में दिखाई देती हैं। वैसे उसका अभिनय देखकर लगता था कि वह अन्य अभिनेत्रियों से कुछ अलग है पर अब इस बात का आभास होने लगा है कि वह अध्यात्मिक भाव से सराबोर रही होंगी और उनकी आंखों में हमेशा दिखाई देने वाला तेज उसी की परिणति होगी।
भारत की महान अदाकारा हेमा मालिनी भी अपनी सुंदरता का श्रेय योग साधना को देती हैं पर सोनाली बेंद्रे में कहीं न कहीं उस अध्यात्मिक भाव का आभास अब हो रहा है जो आमतौर से आम भारतीय के मन में स्वाभाविक रूप से रहता है।
जिस मां के मन में अध्यात्मिक भाव हो वही अपने बच्चे के लिये भी यही चाहती है कि उसमें अच्छे संस्कार आयें और इसके लिये बकायदा प्रयत्नशील रहती है। यहां यह भी याद रखें कि मां अगर ऐसे प्रयास करे तो वह सफल रहती है। अब यहां कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं कि अध्यात्मिक भाव रखने से क्या होता है?
श्रीमद्भागवत गीता कहती है कि इंद्रियां ही इंद्रियों में और गुण ही गुणों में बरत रहे हैं। साथ ही यह भी कि हर मनुष्य इस त्रिगुणमयी माया में बंधकर अपने कर्म के लिये बाध्य होता है। इस त्रिगुणमयी माया का मतलब यह है कि सात्विक, राजस तथा तामस प्रवृत्तियों मनुष्य में होती है और वह जो भी कर्म करता है उनसे प्रेरित होकर करता है। जब बच्चा छोटा होता है तो माता पिता का यह दायित्व होता है कि वह देखे कि उसका बच्चे में कौनसी प्रवृत्ति डालनी चाहिए। हर बच्चा अपने माता पिता के लिये गीली मिट्टी की तरह होता है-यह भी याद रखें कि यह केवल मनुष्य जीव के साथ ही है कि उसके बच्चे दस बारह साल तक तो पूर्ण रूप से परिपक्व नहीं हो पाते और उन्हें दैहिक, बौद्धिक, तथा मानसिक रूप से कर्म करने के लिये दूसरे पर निर्भर रहना ही होता है। इसके विपरीत पशु, पक्षियों तथा अन्य जीवों में बच्चे कहीं ज्यादा जल्दी आत्मनिर्भर हो जाते हैं। यह तो प्रकृति की महिमा है कि उसने मनुष्य को यह सुविधा दी है कि वह न केवल अपने बल्कि बच्चों के जीवन को भी स्वयं संवार सके। ऐसे में माता पिता अगर लापरवाही बरतते हैं तो बच्चों में तामस प्रवृत्ति आ ही जाती है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह व्यसन, दुराचरण तथा अभद्र भाषा की तरफ स्वाभाविक रूप ये आकर्षित होता है। अगर उसे विपरीत दिशा में जाना है तो अपनी बुद्धि को सक्रिय रखना आवश्यक है। उसी तरह बच्चों के लालन पालन में भी यह बात लागू होती है। जो माता पिता यह सोचकर बच्चों से बेपरवाह हो जाते हैं कि बड़ा होगा तो ठीक हो जायेगा। ऐसे लोग बाद में अपनी संतान के दृष्कृत्यों पर पछताते हुए अपनी किस्मत और समाज को दोष देते हैं। यह इसलिये होता है क्योंकि जब बच्चों में सात्विक या राजस पृवत्ति स्थापित करने का प्रयास नहीं होता तामस प्रवृत्तियां उसमें आ जाती हैं। बाहरी रूप से हम किसी बुरे काम के लिये इंसान को दोष देते हैं पर उसके अंदर पनपी तामसी प्रवृत्ति पर नज़र नहीं डालते। अध्यात्मिक ज्ञान में रुचि रखने वालों में स्वाभाविक रूप से सात्विकता का गुण रहते हैं और उनका तेज चेहरे और व्यवहार में दिखाई देता है।
सोनाली बेंद्रे और हेमामालिनी फिल्म और टीवी के कारण जनमानस के परिदृश्य में रहती हैं और योग साधना और अध्यात्म के उनके झुकाव पर बहुत कम लोग चर्चा करते हैं। हम उनके इन गुणों की चर्चा इसलिये कर रहे हैं क्योंकि श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार श्रेष्ठ या प्रसिद्ध व्यक्त्तिवों से ही आम लोग सीखते हैं-विज्ञापनों का बढ़ता प्रभाव इसी का प्रमाण है। इसका उल्लेख हमने इसलिये भी किया कि लोग समझते हैं कि भारतीय अध्यात्म का ज्ञान बुढ़ापे में अपनाने लायक हैं जबकि यह दोनों हस्तियां आज भी युवा पीढ़ी के परिदृश्य में उपस्थित हैं और इस बात प्रमाण है कि बचपन से ही अध्यात्म ज्ञान होना जरूरी है। सोनाली बेंद्रे तो अभी युवावस्था में है और उसका अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति झुकाव आज की युवतियों के लिये एक उदाहरण है। श्रीमद्भागवत गीता को लोग केवल सन्यासियों के लिए पढ़ने योग्य समझते हैं जबकि यह विज्ञान और ज्ञान से परिपूर्ण ग्रंथ हैं जिसे एक बार कोई समझ ले तो कुछ दूसरी बात समझने को शेष नहीं  रह जाती। इससे मनुष्य चालाक होने के साथ उदार, बुद्धिमान होने के साथ सहृदय, और सहनशील होने के साथ साहसी हो जाता है। सामान्य स्थिति में इन गुणों का आपसी अंतर्द्वंद्व दिखाई देता है पर ज्ञानी उससे मुक्त हो जाते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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7/4/10

कप्तान की शादी और प्रचार माध्यम-हिन्दी लेख (marrige of cricket captain and media-hindi lekh)

बीसीसीआई क्रिकेट टीम के कप्तान की शादी है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। हमने एक समाचार चैनल खोला था समाचार सुनने के लिये है पर कप्तान की शादी का प्रसंग सामने आ गया। इस लेखक ने अक्सर देखा है कि जब बाजार के उत्पादों के किसी विज्ञापन के माडल के-इनमें से अधिकतर क्रिकेट और फिल्म के होते हैं-शादी होने या राजनीति में आने की खबर होती है तो सभी चैनल उसे एक ही समय में प्रसारित करते हैं ताकि दर्शक भाग कर कहीं जा नहीं पाये और न ही उस माडल की आम आदमी उपेक्षा की जा सके। कहने को सारे चैनल अलग दिखते हैं ऐसे मौके पर एक हो जाते हैं। बाजार का उन पर कितना जोरदार नियंत्रण है यह ऐसे मौके पर देखा जा सकता है। इस लेखक ने कम से कम आठ समाचार चैनल बदले होंगे पर हर जगह बस वही बात! कप्तानी की शादी हो रही है इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। आज बाज़ार में घूमते हुए कहीं भी यह सुनाई नहीं दिया कि कप्तान की शादी हो रही है जबकि प्रचार माध्यम शोर मचाये हुए थे। ऐसे में व्यवसायिक प्रचार माध्यमों का यह दावा खोखला दिखता है कि वह तो दर्शकों की मांग के अनुरूप अपनी प्रस्तुति करते हैं। एक अभिनेता की राजनीति में आने की खबर पर भी ऐसा ही देखा गया था।
भारतीय प्रचार माध्यमों तथा आम नागरिकों के बीच अब एक लंबी मनोवैज्ञानिक खाई बन गयी है जिसे हम विश्वास का संकट भी कह सकते हैं। दरअसल प्रचार संगठनों में काम करने वाले लोग जहां अपनी अभिव्यक्ति की शक्ति का महत्व समझते हैं वहीं यह भूल जाते हैं कि अंततः आम आदमी की सहानुभूति के बिना उसका लाभ उठाना संभव नहीं है। एक तरफ प्रचार माध्यम आम आदमी को निहायत मूर्ख मानकर अपने आय अर्जन के इकलौते लक्ष्य पर काम कर रहे हैं वहीं आम आदमी उनको व्यवसायिक छल प्रपंच मानकर उनकी बात पर ध्यान नहीं देता।
ऐसे में अनेक बुद्धिजीवी आम आदमी के चेतना विहीन होने की शिकायत कर रहे हैं तो उन्हें यह भी देखना चाहिये कि उनकी सीमित सोच ने आदमी के दिमागी दायरे को अत्यंत सीमित कर दिया है। हम टीवी चैनलों और समाचार पत्रों कि महत्व को जानते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि हमें यह भी पता है कि उनकी समाज निर्माण में अत्यंत प्रभावी भूमिका हो्रती है। ऐसे में यह देखना आवश्यक है कि प्रचार माध्यमों की भूमिका किस तरह की है और अगर हम समाज को सुप्तावस्था में देख रहे हैं तो उसके पीछे उनकी कितनी जिम्मेदारी है?
सबसे बड़ी बात यह है कि व्यवसायिक प्रचार माध्यम मानते हैं कि जो लोग देखना, सुनना और पढ़ना चाहते हैं वही हम प्रस्तुत कर रहे हैं क्योंकि इसके बिना व्यवसाय नहीं चलता।
अगर वह इस तर्क पर काम करते हैं तो उससे जुड़े बुद्धिजीवियों को यह शिकायत नहीं करना चाहिए कि समाज सो रहा है।
समाचारों से जुड़े टीवी चैनलों और अखबारों के संचालकों को अब इस बात का आभास नहीं है कि उनका जिम्मा केवल अपने उपभोक्ताओं के सामने समाचार प्रस्तुत करना ही नहीं है वरन् संपादकीय, लेखों तथा चर्चाओं के द्वारा उनमें विचार निर्माण करने का काम भी है। यहां वह यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते कि हर आदमी पढ़ा लिखा है और वह स्वयं ही विचार कर सकता है। एक ब्लाग लेखक के रूप में हम भी यह देख रहे हैें कि अनेक स्तंभकार ब्लाग लेखकों की रचनाओं से विचार लेकर लिख रहे हैं। इसका आशय यह है कि विचारों का क्रमिक विकास तभी संभव है जब कहीं दूसरी जगह से पढ़ा, सुना और देखा जाये।
अब जरा समाचार टीवी चैनलों और अखबारों के समाज में विचार निर्माण के प्रयासों को देखा जाये तो यह नहीं लगता कि वह इस काम को गंभीरता से ले रहे हैं। इस मामले में दूरदर्शन के कुछ प्रयास गंभीरता लिये हुए लगते हैं जबकि व्यवसायिक चैनल पूरी तरह से लापरवाही दिखाते हैं। टीवी चैनलों ने कुछ खास मौकों के लिये दो चार विशेषज्ञ तय कर रखे हैं जो क्रिकेट, आतंकवाद, रेल या बस हादसों तथा महिला उत्पीड़न जैसे विषयों पर आकर रटी रटाई बातें बोलते हैं और खानापूरी हो जाती है। यही स्थिति अनेक समाचार पत्रों की है। उनके लेखों तथा संपादकीयों में समाचारों के दोहराव के अलावा थोड़ी बहुत राय होती है पर वह बेबाक नहीं लगती। इतना ही नहीं उनके विचारों का प्रस्तुतीकरण भी इतना कमजोर रहता है कि पाठक या दर्शक उसे अधिक देर तक ध्यान नहीं रख पाता। यही कारण है कि आजकल कहीं भी कोई बुद्धिमान किसी अखबार की राय का बयान कर अपनी बात नहीं रखता। अखबारों के समाचारों की चर्चा अक्सर मिलती है पर विचार एकदम लापता लगता है।
समाचार टीवी चैनलों ने तो बहुत निराश किया है? जब दूरदर्शन अकेला था तब उसके समाचार सुनने की आम लोगों में एक आदत हो गयी थी और व्यवसायिक समाचार चैनलों ने उसका दोहन भी खूब किया पर उसको नियमित बनाये रखने में नाकाम रहे। यही कारण है कि प्रतिदिन समाचार देखने वाले बहुत लोग अनेक दिन तक तो समाचार चैनल खोलकर देखते तक नहीं हैं। एक घंटे तक समाचार दिखाने का दावा करने वाले यह सभी चैनल बुमश्किल पांच मिनट समाचारों के लिये हैं-उनका शेष समय क्रिकेट, फिल्म और फूहड़ हास्य प्रस्तुत करने में बीत जाता है। यह विज्ञापन चैनल जैसे हो गये हैं। एक तरह से संदेश देते हैं कि यह समाचार और विचार देखना छोड़कर उस तरफ जाओ जो हमारे बाजार नियंत्रकों ने सजा रखा है।
ऐसे में निराश हाथ लगती है। स्थिति यह है कि समाज में चेतना लुप्त होती जा रही है और जिनमें चेतना है उनके पास ऐसे साधन नहीं है जिससे उसमें निरंतरता बनी रहे। हालांकि इधर हिन्दी ब्लाग जगत पर काफी बेबाक राय सामने आ रही है पर वहां जागरुक लोगों की पहुंच अधिक नहीं है। दूसरा यह भी है कि ब्लाग जगत को लेकर प्रचार माध्यम योजनापूर्वक इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि यहां बाजार के मुखौटे ही प्रसिद्ध बने न कि आम लेखक। यही कारण है कि क्रिकेट खिलाड़ियो, फिल्म अभिनेताओं तथा अभिनेत्रियों के ब्लाग तथा वेबसाईट या ब्लाग बनाने के समाचार देते हैं। इससे समाज में यह धारणा बनती जा रही है कि ब्लाग केवल खास लोगों की अभिव्यक्ति के लिये है।
इस लेखक ने अपने एक कार्टूनिस्ट मित्र को ब्लाग बनाने की राय दी तो उसका जवाब था कि मैं भला कोई एक्टर या क्रिकेट खिलाड़ी हूं जो कोई मेरा ब्लाग देखेगा।’
दूसरी मजे की बात यह है कि इस लेखक के अनेक पाठ बिना नाम के छापे जा रहे हैं। गांधी जयंती पर इस लेखक के लिखे गये पाठों का एक स्तंभकार ने उपयोग किया। इस लेखक के मित्र तथा पढ़ने वाले लोग जानते हैं कि उन पाठों में जो विचार व्यक्त किये गये थे वैसे किसी बुद्धिजीवी ने नहीं किये। जो लोग गांधी विषय पर विशारद होने का दावा करते हैं वह उन लेखों को पढेंगे तो हैरान रह जायेंगे-एक लेखक मित्र ने उनको पढ़कर यही कहा था। मगर यह आत्मप्रवंचना नहीं है बल्कि यह बताया जा रहा है कि समाचार में चिंतन और विचार का जो संकट है वह प्रचार माध्यमों की उपेक्षा तथा रूढ़ता के कारण है और हिन्दी ब्लाग जगत ही उसका सामना करने में सक्षम है और यह बेहतर होगा कि व्यवसायिक प्रचार माध्यम इस आशंका से परे हो जायें कि यहां ब्लाग लेखकों नाम सहित अपने यहां स्थान देने से कोई ऐसी लोकप्रियता मिल जायेगी कि बाजार की बड़ी कंपनियों के विज्ञापन उनको मिलने लगेंगे। अलबत्ता हिन्दी में चिंतन तथा विचार के क्षेत्र में जो जड़ता की स्थिति है उससे निपटने लिये उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि व्यवसायिक प्रचार माध्यम ब्लाग लेखकों से तारतम्य बनायें। अगर क्रिकेट खिलाड़ियों, फिल्म अभिनेताओ तथा अभिनेत्रियों की शादी तथा प्रेम प्रसंगों से समय काटने को ही वह अपना व्यवसायिक धर्म समझते हैं तो फिर हमें कुछ नहीं कहना है।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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2/6/10

सीधे प्रसारित होने वाली फिल्म की पटकथा लगती है अनेक घटनायें-हिन्दी आलेख (film aur patkatha-hindi lekh)

फिल्मों में सक्रिय एक अभिनेता ने स्वीकार किया कि ‘आज के फिल्मी माहौल’ में वह स्वयं को फिट नहीं पाते।  इस अभिनेता के पिता ने जहां अभिनय कर देश में लोकप्रियता हासिल की वहीं उसने स्वयं भी काम कर एक दबंग अभिनेता की छबि बनाई। पिता से अधिक पुत्र के अभिनय का यह लेखक कायल रहा। पंजाबी पृष्ठभूमि के इस अभिनेता ने सीधे कुछ नहीं कहा पर सांकेतिक शब्दों में यह समझा दिया कि आजकल फिल्म में अभिनय करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि कुछ विवाद खड़े कर उसकी आगे की विकास यात्रा भी करवाना भी जरूरी है।
आवाज और अदाकारी के धनी उस प्रतिभाशाली अभिनेता की अनेक दिनों से कोई फिल्म नहीं आयी है और ऐसा लगता भी नहीं है कि निकट भविष्य में आने वाली है।  उसके पिता का जीवन भले ही थोड़े बहुत विवादों से घिरा रहा है पर पुत्र ने तो केवल अभिनय से वास्ता रखा और उसे मजबूत अभिनेता माना जाता है। 
दरअसल आजकल फिल्म का व्यापार इतना हो गया है कि उसमें से पैसा कमाने का प्रयास और प्रयास ‘युद्धस्तर’ पर होता है।  एक फिल्म बनाने पर बहुत पैसा खर्च होता है पर उसके साथ अब कमाई की आकांक्षा बहुत बढ़ गयी है और केवल देश ही नहीं बल्कि विदेशों में उसके लिये दर्शक और प्रायोजक जुटाने का प्रयास किया जाता है।  फिल्मों की विषय वस्तु तथा दृश्य देखकर साफ लगता है कि उसमें विदेशी दर्शकों को लुभाने का प्रयास भी होता है।  देश के दर्शकों के बारे में तो यह मान लिया जाता है कि यहां फालतू लोग बहुत हैं और वह देखने आयेंगे ही। टीवी वीडियो की वजह से एक समय फिल्महाल खाली रहने लगे थे पर अब माल सिस्टम से उनकी वापसी हो रही है।  टिकिट महंगे हैं तो क्या खर्च करने वाले भी इस देश में कम नहीं हैं?
इतना ही नहीं इस देश का एक खास वर्ग चाहता है कि लोग अपनी समस्याओं की चर्चा करने की बजाय फिल्मी रंग में ही डूबे रहें ताकि उनका सम्राज्य बना रहे।  समाचार चैनलों की हालत तो देखने लायक हैं? उस दिन एक वरिष्ठ नागरिक पार्क की तरफ जाते हुए रास्ते में मिले।  उनको मालुम था कि हम समाचार सुनने के शौकीन हैं। बहुत पहले उन्होंने हमें बी.बी.सी. के समाचार रेडियो पर सुनते देखा था।  अनेक बार वह हमसे राजनीतिक विषयों पर भी चर्चा करते थे।  हमें देखकर कहने लगे कि ‘भई, यह बात बताओ कि आजकल तुम कौनसे समाचार देखते सुनते हो? कोई चैनल हो तो बताओ!’
हमने कहा कि ‘आजकल तो सभी चैनल एक जैसे हैं। सभी के पास टाईम पास करने के लिये बहुत सारे साधन हैं सिवाय समाचार प्रस्तुत करने के।’
वह बोले-‘‘क्या बतायें, चार मिनट के भी समाचार नहीं होते। इधर आंखों से कम दिखाई देता है तो अखबार कम पढ़ता हूं पर समाचार के नाम पर वही फिल्म, कामेडी, सास बहु और खेलों का प्रचार ही होता है।  कई बार पोती से कहता हूं कि समाचार चैनल लगाओ। वह लगाती है तो मैं उसको डांटता हूं कि यह कौनसा चैनल लगा दिया तो वह कहती है कि ‘जो समाचार आपने कहा था वही लगाया’। रेडियो पर तो वही है। किसी का जन्म दिन तो किसी का प्रेम प्रसंग, जाने क्या क्या समाचारों में सुनाते हैं।’’
फिल्म के रिलीज होने से पहले विवाद करने के लिये उसके अभिनेता का सक्रिय होना आवश्यक है।  कोई अफलातूनी बयान दे या फिर निजी जिंदगी के किसी ऐसी घटना का प्रचार कराये जिसकी चर्चा पहले नहीं हुई हो।  पहले वाला काम नहीं रहा कि फिल्म बनी और उसके पोस्टर हर शहर में लगा दिये।  कहने का तात्पर्य यह है कि फिल्म निर्माण के दौरान लटके झटके दिखाने के बाद उसके प्रचार के लिये अभिनय भी करना पड़ता हैं।  यह हर अभिनेता का बूता नहीं होता।  ऐसे में जो अभिनेता अभी चार पांच वर्ष तक ऊंचाई पर थे वह अब नीचे आ रहे हैं और उनकी हमउम्र के अभिनेता जो अतिरिक्त सक्रियता दिखाते हैं वह अपनी पहचान बचाने में सफल हैं। इनमें अधिकतर अभिनेता पैंतालीस की आयु पार कर चुके हैं पर उनके यौवन, देह सोष्ठव तथा प्रणय प्रसंगों की चर्चा खुलेआम टीवी चैनलों और रेडियो पर होती है।  इतना ही नहीं अभिनेताओं को टीवी पर अपनी फिल्म के प्रचार के लिये है अनेक कार्यक्रमों में नवयौवनाओं से चर्चा भी करनी पड़ती है। 
अभी एक नयी फिल्म आने वाली है। उसके  अभिनेता ने किसी फिल्म में एक अभिनेत्री को सगाई की अंगूठी पहनाई होगी।  अब उस अभिनेत्री से पूछा जा रहा था कि ‘क्या यही वह अंगूठी है जो उस अभिनेता ने पहनाई थी।’
हां-‘अभिनेत्री ने चहकते हुए कहा। गोया कि कोई वास्तविक सगाई हो। हमें तो यह भ्रम हो गया कि वह अभिनेता शायद दूसरा विवाह करने वाला है। बाद में लगा कि यह तो प्रचार है  पर सच तो यह है कि फिल्म और टीवी वाले एक साथ दो बीवियां रखने का फैशन चलाना चाहते हैं।  फैशन का प्रसंग आया तो जब फिल्मों का दौर बदल रहा था तो यह लगा कि कोई अभिनेता लंबे समय तक राज नहीं कर पायेगा पर दूसरे परिवर्तनों ने ऐसा नहीं होने दिया। अनेक फैशन बदल गये, उनके साथ काम करने वाली अभिनेत्रियों के बच्चे अब पांचवी क्लास में पढ़ते होंगे पर पुराने माडल के अभिनेता अभी चल रहे हैं।  कई बार तो टीवी चैनलों के कार्यक्रमों में लड़कियों के मुख से अंकल शब्द निकल जाता है।
अब जो तेल बेच रहा है वही फोन लगा रहा है और वही सौंदर्य प्रसाधन के सामान भी बना रहा है। उससे कमाकर वह  फिल्म और क्रिकेट में भी विनिवेश करता है।  एक तरह से  व्यवसायिक क्षेत्रों का घालमेल हो गया है।  कहंी न कहीं उनका संबंध टीवी चैनलों और रेडियो से भी होता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि ताकतवर लोगों का हर धंधे में दखल हो गया है।  इसलिये वह अपने हर क्षेत्र को एक दूसरे से जोड़कर रखते हैं। ऐसे में क्रिकेट और फिल्म के माडलों के द्वारा अभिनीत विज्ञापनों से उनके उत्पादों को बेचने में सुविधा होती है।  यही कारण है कि वह अभिनेताओं का बचाते हुए चलते हैं।  रहा विवादों का सवाल तो प्रचार माध्यमों में फिल्म और टीवी चैनलों को सहारा देने के लिये उनकी रचना करने वाले क्या कम है? फिर अभिनय केवल अभिनेता ही नहीं करते बल्कि प्रचार माध्यमों में नियमित रूप से दिखने वाला हर चैहरा ऐसा करता दिखता है-ऐसा आम लोग भी मानने लगे हैं।
हम अधिक नहीं जानते, पर अखबार और टीवी चैनलों में खबरों का रुख देखकर उनके परिणाम की कल्पना करते हैं और वह वैसा ही सामने आता है। इसके लिये हम अपने पत्रकार गुरुजी के आभारी हैं जिन्होंने कहा था कि जब कोई समाचार या संपादकीय लिखना हो तो तुम संबंधित प्रसंग के उस पहलू पर भी सोचो जो दिखाया नहीं जा रहा। उसे देखने का प्रयास करो नहीं तो अनुमान से काम चलाओ। 
हमारी दुनियां तो सिमटी हुई है इसलिये कहीं अन्यत्र संपर्क नहीं है सिवाय अपने रोजगार करने और ब्लाग लिखने के।  ऐसे में अखबार और टीवी चैनलों पर जो देखने या सुनने को मिलता है उसके आधार पर पीछे के परिदृश्य की कल्पना करने लगते हैं और वहां  तालमेल वाली कुश्तियां ही दिखाई देती हैं-हो सकता है कि हमारी कल्पना गलत हो।
सबसे ज्यादा बुद्धिजीवियों पर हंसी आती है जो इन मुद्दों को बहुत संवेदनशील बनाने में जुट जाते हैं।  दरअसल कुछ बुद्धिजीवी इस समाज पर संवेदनशील होने का आरोप लगाते हैं क्योंकि उनको जनसमर्थन नहीं मिलता पर सच यह है कि लोग भी अब इन दृश्यों को देखकर और कथनों को पढ़ और सुनकर ऐसा  महसूस करते हैं कि यह सब केवल नोट का खेल है।  अनेक आम लोग तो कह देते हैं कि यह सब नाटकबाजी है।  उनकी यह बातें सब सही निकलती हैं।  अगर सीधी बात कहें कि आप फिल्म नहीं देखते पर आप अगर आप टीवी, रेडियो, इंटरनेट और  समाचार पत्र पत्रिकाओं से नियमित रूप से जुड़े रहने के शौकीन है और फिल्म नहीं देखना चाहते तो आप समझिये कि वह आपको दिखाई जा रही है।  आप अगर किसी चर्चित विषय पर अपने विचार रख रहे हैं तो यकीन करिये कि आप एक फिल्म की चर्चा ही कर रहे हैं।  आपको जो घटनायें स्वाभाविक रूप से घटती दिख रही हैं दरअसल वह एक सीधे प्रसारित होने वाली फिल्म की पटकथा पर आधारित होती है जिसकी तैयारी कहीं न कहीं  की जाती है-यह हमारा सोचना है। बाकी सच क्या है? यह जानना कठिन काम है।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप
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10/12/09

काल्पनिक महानायक-हिंदी लेख (filmi mahanayak-hindi lekh)

किसी फिल्म अभिनेता को जब सदी का महानायक कहा जाता है तब उसके प्रशंसकों को बहुत अच्छा लगता है पर अगर थोड़ा चिंतन किया जाये तब इस बात का अहसास होता है कि वह एक काल्पनिक पात्र है। यह ठीक है कि फिल्म अभिनेता बनने का सपना वह हर युवक देखता है जिसका अत्यधिक शौक एक व्यसन बनकर उसके हृदय में स्थापित हो जाता है। अब समय बदल गया है या कहें ठहर गया है। पहले अनेक ऐसे युवक युवतियां फिल्म अभिनेता अभिनेत्री बन कर सफल रहे जो मामूली घरों से थे या उनका स्वयं का स्तर कोई अधिक ऊंचा नहीं था। अब वह समय नहीं है, पहले से ही स्थापित परिवारों के बच्चों को नायक बनने का अवसर मिलता है। जड़ हो चुके समाज में इस पर अधिक बहस करने का कोई मतलब नहीं है।
हम तो उन फिल्मों की बात कर रहे हैं जिनकी कहानी, पटकथा और संवाद काल्पनिक होते हैं और जिनको अभिनीत करने का कौशल ही जमीन के कलाकार को आकाश का काल्पनिक सितारा बना देता है।
ऐसे अनेक सितारे आये और गये। कुछ लोग अविचल भाव से खड़े रहे और उनमें भी कुछ महानायक कहलाने लगे। उनकी उपलब्धियां उनकी निजी है और समाज के लिये उनका कोई महत्व केवल इसलिये ही है क्योंकि इस समय देश भर में सक्रिय प्रचार माध्यम उसे हर पल गाते हैं और यह संभव नहीं है कि कोई आम आदमी उसे देखने सुनने से बच पाये। इस प्रचार का कोई प्रभाव नहीं होता यह मानना गलत होगा।
वैसे आज के इस सदी के मनोरंजन के महानायक को भी मानने से इंकार नहीं करते पर केवल हमारा आशय इतना ही है कि उनकी प्रशंसा की सीमा है। वह सदी के महानायक नहीं वरन् इस सदी के मनोरंजन के महानायक हैं। ऐसे महानायक जिनकी फिल्मों ने समाज को भीरु, चेतनाविहीन और मानसिक रूप से कमजोर बनाया। यह कोई आक्षेप नहीं है बल्कि तमाम तरह के अनुभवों से उपजी एक राय है।
एक तो हमारे समाज में पहले से ही आम आदमी में यह भावना घर कर चुकी है कि इस संसार में जब पाप बढ़ते हैं तब भगवान अवतार लेते हैं और तब तक उसको झेलना चाहिये। ऐसे मेें मनोरंजन के महानायक की फिल्मों से भी यह संदेश निकला कि अगर आप शारीरिक दम खम में अजेय या धनी हैं तभी आप किसी से पंगा ले सकते हैं वरना आपका हाल बुरा होगा। पहले तो समाज दैहिक रूप दूसरों के दर्द को दूर करने के मामले निष्क्रिय था पर महानायक की फिल्मों ने तो उसे मानसिक रूप से ऐसा जड़ बना दिया कि दूसरे को परेशान देखकर आदमी सोचता तक नहीं है।
हम मनोरंजन के महानायक की फिल्मों का शुरुआती दौर देखें तों उसकी कहानियां में अतिरंजना और संवादों में अतिनाटकीयता रही है। पहले फिल्मों में खलनायक को ही अमीर बनता दिखाया जाता था पर महानायक की फिल्मों में तो नायक को मजबूरीवश गलत रास्ते पर जाकर धन एवं यश अर्जित करते हुए दिखाया गया। एक मशहूर फिल्म में एक तस्कर की भूमिका दिखाई गयी। कहा जाता है कि वह उस समय के कुख्यात तस्कर की वह वास्तविक कहानी थी। कुछ लोगों का मानना है कि इसी दौर से अपराध जगत का पैसा फिल्मों में लगना प्रारंभ हुआ क्योंकि खलनायकों का नायक के रूप में महिमा मंडन बिना धन के लालच के संभव नहीं है। बाद में यह प्रमाणिक भी हुआ कि न अपराधी केवल फिल्मों में पैसा लगा रहे थे बल्कि कहानियों में भी हस्तक्षेप करते थे। महानायक की फिल्म आयी जिसमें एक ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर की हाथ काटने का दृश्य था। बाद में वह अपने दुश्मन से बदला लेता है। अगर आप किसी ईमानदार फिल्म इंस्पेक्टर का हाथ कटते हुए दिखायेंगे तो बाद में फिल्म की कहानी क्या है यह चर्चा का विषय नहीं होता? इससे आदमी तो डर जाता है न! हाथ कटा कर जीतना कौन चाहेगा? किसी फिल्म में नाजायज बच्चे की भूमिका इस तरह प्रस्तुत की गयी गोया कि हर नाजायज बच्चा इसी तरह होता है।
ऐसा नहीं है कि महानायक की फिल्मों में ऐसी कहानियां थी। बल्कि उनकी फिल्मों से ऐसा दौर शुरु हुआ जिसमें अपराधी को महिमामंडित किया गया। हर तीसरी फिल्में बिछड़ा हुआ या नाजायज बच्चा नायक होता था। कहने को तो फिल्म वाले दावा करते हैं समाज में जो दिख रहा है वही दिखाते हैं पर सच तो यह है कि इन फिल्म वालों ने अनेक ऐसी कहानियों वाली फिल्में बनाईं जिसमें ईमानदार, साहसी दयालु और परोपकारी व्यक्ति का अंग भंग करने के साथ ही उसका पूरा परिवार नेस्तानाबूद होते दिखाया गया। इन फिल्म वालों से यह पूछे तब कितने समाज में ऐसे किस्से थे जिनको वह दिखा रहे थे। इसी कारण यह हुआ कि कोई आदमी आज भला, मृदभाषी, दयालु और परोपकारी बनने की कोई सोच भी न पाता। साहस करने की तो कोई सोचता भी नहीं। कहने को कहा जाता है कि फिल्मों का प्रभाव समाज पर नहीं पड़ता पर मानसिकता पर पड़ता है। क्या जब हम राम रावण या अर्जुन कर्ण युद्ध का दृश्य मंच या पर्दे पर देखते हैं तब हमारे खून में तेजी नहीं आती? दृश्य और श्रवण का आदमी पर प्रभाव पड़ता है चाहे इसे कोई माने या नहीं। आंतरिक इंद्रियां ग्रहण करती हैं वैसा ही बाह्य इंद्रियां विसर्जन करती हैं। ऐसे में कई बरसों तक ऐसी फिल्में देखते रहना जिसमें सारा काम केवल एक नायक करता है वह समाज को जड़ न बनायेे यह संभव नहीं लगता। एक मजे की बात महानायक की फिल्मों की रही है। उसमें खलनायक तो गोलियों के दम पर सभी का नाश करता है पर नायक उसे केवल हाथ से ही मारता है। आखिर इन कहानियां में ऐसे दृश्य क्यों नहीं दिखाये गये जिसमें नायक एक ही झटके में खलनायक का कत्ल करता है। लंबे एक्शन दृश्य क्यों बनाये गये? इसलिये न कि कोई समाज के खलनायकों को उस तरह न मारे? स्पष्टतः फिल्म बनाने वाले जानते थे कि फिल्मों का प्रभाव जनता पर होता है और खलनायकों को गोली से एकदम मरवाने के दृश्य दिखाये गये तो समाज के खलनायकों की खैर नहीं होती-आखिर फिल्म वाले ऐसा करने से क्यों बचते रहे?
किसी महिला की इज्जत सड़क पर लूटना पहले इतना आसान नहीं था। राह चलते हुए कत्ल करने की भी हिम्मत किसी में नहीं होती थी। आज अपराधी इसलिये बेखौफ हैं क्योंकि उनको पता है कि सड़क की भीड़ में कोई ताकत नहीं है। उस भीड़ में कोई वास्तविक नायक नहीं पैदा हो सकता। अपराधियों की यह सोच कोई गलत नहीं है। काल्पनिक महानायक को देखते हुए वह भी कल्पना के नायक का इंतजार करती है।
सच बात तो यह है कि फिल्मों में अगर काल्पनिक महानायक नहीं बनाया होता तो अपने देश में वास्तविक महानायकों का जमावड़ा होता पर स्थापित परिवारों को वर्चस्व इस तरह नहीं रहता। अब एक काल्पनिक महानायक है पर वास्तविक खलनायकों की ऐसी भीड़ चारों तरफ बिखरी पड़ी है जिनका नाश करने के लिये शायद समय को खुद चलना पड़े।
कुछ लोगों ने महानायक की फिल्मों को समाज के लिये बहुत महत्वपूर्ण बताया था। हमारा मकसद उनका उत्साह भंग करना नहीं बल्कि यह बताना है कि सच्चा महानायक वही है जिसकी उपलब्धि समाज के लिये महत्वपूर्ण होती है और जिसका यथार्थ धरती पर बहने वाले जीवन में सात्विक परिवर्तन लाता है। भारतीय फिल्मों का इस देश के युवाओं में शराबखोरी,जुआ और लड़कियों पर सार्वजनिक रूप से हमले करने की प्रेरणा देने के अलावा कुछ नहीं किया। उन्होंने एक नहीं अनेक नायक खड़े किये और उनको देखते हुए यह समाज इतना जड़ हो गया कि यथार्थ में नायक मिलना ही मुश्किल हो गया।

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5/28/09

मन को कैद करने वाले पिंजरे-आलेख

वह जो सभी तरफ दिखाया जा रहा है उसका मुख्य उद््देश्य तुम्हें भीड़ बनाना है। वह भीड़ जो समय पड़े तो उसे जाति, भाषा,धर्म और क्षेत्र के आधार पर बांटा जा सके। इसे बांटकर उन लोगों के सामने प्रस्तुत किया जा सके जिनका काम ही भीड़ पर चला करता है। बदले में भीड़ जुटाने वाले सौंपते हैं उनको तमगे, कप, उपाधियां और सम्मान। भीड़ कभी एक न हो इसका पुख्ता इंतजाम कर लिया जाता है। भीड़ के एक हिस्से को इसलिये खुश किया जाता है कि दूसरा हिस्सा चिढ़े और इसकी अभिव्यक्ति के लिये साधन ढूंढे जो कि पैसे से बिकते हैं।
यह पूर्वनिर्धारित है पर लगता है कि स्वतः चल रहा है। दिखता तो यह स्वतः चलता है है पर इसका बौद्धिक ढांचा बरसों पहले से बनाया जा चुका है और इस पर नियंत्रण केवल खास लोग और उनके चाटुकारो का है। यकीन करो जो तुम कहीं भी कुछ देख और पढ़ रहे हो उसमें कोई सच्चाई नहीं है। अगर है तो वह ऐसी है जैसे किसी फिल्म की होती है-एक काल्पनिक कहानी पर जिस तरह कुछ लोग अभिनय करते हैं। लोग फिल्मों को सच मानने लगे हैं। उनमें अभिनय करने वाले अभिनेता और अभिनेत्रियों को महानायक और महानायिका बना देते हैं। हालत यह है कि पर्दे का खलनायक भी बाहर नायक की तरह सम्मान पाता है और उसके बारे में कहते हैं कि ‘वह तो एक आम इंसान है।’ मगर नायक का पात्र तो महानता की उपाधि पाता है।

तयशुदा पात्र हैं। कोई हंसता दिख रहा है कोई रोता। फिल्म की तरह समाचार हैं और समाचार ही फिल्म बना रहे हैं। आजकल नई सभ्यता है। पहले तो राहजन हथियारों की दम पर लूट लेते थे पर इस नई सभ्यता में हिंसा वर्जित है क्योंकि आदमी की बुद्धि को तमाम तरह की लालच देकर और काल्पनिक सुख दिखाकर भ्रमित किया जा सकता है और मन के स्वामी होने की वजह से मनुष्य कहलाने वाला जीव बिना किसी रस्सी और जंजीर के पशु बनकर जिस आदमी के पास काल्पनिक रस्सी है उसके पीछे चला जाता है।

जिनके पास धन, पद और बाहुबल है उनको कुछ नहीं करना बस इंसानी मन को पकड़ लेने वाले पिंजरे-फिल्म,टीवी चैनल, अखबार और अंतर्जाल-पर कब्जा करना है। वहां से उसे समयानुसार भड़काने, बहलाने, और हड़काने वाले संदेश, समाचार, कहानियां और कविताओं का प्रसारण करना है। सारे दृश्य काल्पनिक और पूर्व रचित हैं। सर्वशक्तिमान ने यह सृष्टि रची है पर बाकी सब तो उसने इस धरती पर विचरने वाले जीवों पर छोड़ दिया है पर फिर भी ऐसे लोग हैं जो ‘भाग्य का खेल है’ या ‘जैसा
उसने रचा है’हमें देखना है जैसे जुमले कहते हैं पर उनके मन में यही है कि हम ही सब कर रहे हैं। दूसरे को दृष्टा बनने का उपदेश देने वाले लोग स्वतः ही अपनी अंर्तज्योति बुझी होने के कारण भीड़ की तरह हांके जा रहे हैं पर इसे नहीं जानते।

बिल्कुल उत्तेजित मत हो! यकीन करो यह योजना है एक व्यापार की। तुम जिन दृश्यों से चिढ़ते हो उनसे मूंह फेर लो। जिन शब्दों से तुम आहत होते हो उनको पढ़ना या सुनना भूल जाओ। जिन लोगों से तुम्हें दुःख मिलता है उनको याद भी मत करो। तुम उन समाचारों पर ध्यान न देते हुए उनकी चर्चा से दूर हो जाओ जिनसे कष्ट पहुंचता है। यह दृष्टा बनना ही है और फिर देखो उन लोगों का खेल! वह जो तुम्हें हड़काते हैं वह स्वयं ही हडकते नजर आयेंगे। वह जो तुम्हें झूठे खेल से बहला रहे हैं पर खुद दहलने लगेंगे। तुम जिन दृश्यों और समाचारों को सत्य समझ कर विचलित होते हुए उन पर बहसें करते हो उनके पीछे के सच पर जब विचार करने लगोगे तो तुम्हें हंसी आयेगी। जो बाजार में बिक रहा है या दिख रहा है-वह आदमी
हो याशय-उसका मूंह तुम्हारी जेब की तरफ है। जैसे पहले बहुरूपिये दिल बहलाकर पैसे ले जाते थे पर अब उनको आने की जरूरत नहीं है। उन्होंने तुम्हारे घर में पर्दे सजा दिये हैं। तुम्हें पता ही नहीं चलता कि तुम्हारा पैसा कैसे उनके पास जा रहा है।

वह तुम्हारा ध्यान किसी चेहरे की तरफ खींचे-चाहे वह हीरोईन का चेहरा हो या सर्वशक्मिान के किसी रूप का-तुम उसे मत देखो और आंखें बंद कर भृकुटि पर नजर रखो। वह तुम्हें संगीत सुनायें तुम ओम शब्द का जाप करने लग जाओ। वह फिल्म चर्चा करें तुम गायत्री मंत्र का जाप करने लगो। अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र अपने अंदर रखो। बाहर कोई सुने यह जरूरी नहीं। बस तुम अपने को सुनना शुरु कर दो। अपने को पढ़ो। अपने सत्य कर्म को देखो दूसरे के अभिनय में रुचि रखने से तुम्हारे मन को शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने शोर मचा रखा है तुम शंाति अपने अंदर ढूंढो। कहीं दूसरे से सुख और मनोरंजन की आस तुम्हें कमजोर बना रही है। अपने मन में अपने लिये ख्वाब और सपने देखो उसने दूसरे पिंजरे में मत फंसने दो।
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4/1/09

हिंदी लेखन और प्रकाशन के बीच है अहंकार की दीवार-आलेख

हिंदी में स्तरीय गद्य रचना करने -नाटक, कहानी, निबंध और हास्य व्यंग्य- वाले लेखकों की कमी की शिकायत अक्सर सुनने में मिलती है। अनेक लोग फिल्मों में कथा, पटकथा और संवादों में दोहराव तथा पत्र पत्रिकाओं में भी स्तरीय साहित्य न पढ़ने की शिकायत करते हैं। कवितायें लिखने वाले बहुत मिल जायेंगे पर गद्य रचना करने वाले बड़ी कठिनाई से मिलते हैं। अगर मिलते भी हैं तो उनकी रचनाओं को स्तरीय रचनायें मानना कठिन होता है। यही कारण है कि आम पाठक के मन में यह बात घर कर गयी है कि हिंदी में लिखने वाले कम ही हैं। यह बात सच नहीं है बल्कि इसके पीछे जिम्मेदार है हमारे देश के फिल्म, प्रकाशन तथा अन्य व्यवसायिक संस्थाओं का प्रबंधन।

हिंदी में व्यवसायिक रूप से मौलिक तथा स्वतंत्र रचनायें लिखने का मतलब है कि अपने लिये ही लिखना। आज भी शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो हिंदी में गद्य लेखन को व्यवसायिक रूप से अपनाने का विचार करेगा। हां, स्वांत सुखाय कुछ लिख रहे हैं पर एक तो उनकी संख्या सीमित है दूसरा उनको प्रोत्साहन देने वाला कोई नहीं है। बड़ी विचित्र स्थिति है कि देश में अनेक किताबें हिंदी में प्रकाशित होती हैं और उनको पुरस्कार भी मिलते हैं पर आम पाठक की उनमें रुचि नहीं होती। आम पाठक जिस प्रकार की सामाजिक, जासूसी या अन्य सामग्री पढ़ता है उसे साहित्य नहीं माना जाता। इस देश में अनेक फिल्में बनी पर उनकी कहानियां भारतीय साहित्य का हिस्सा नहीं बनी। एक तयशुदा फार्मूले में बनने वाली फिल्मों ने देश में आम आदमी के अंदर डर और खौफ का माहौल ही पैदा किया। कहने वाले तो यही कहते हैं कि फिल्मों ने जिस तरह इस देश की मानसिकता को विकृतियां, कायरता और विलासी भाव का बनाया वह काम तो अंग्रेज भी नहीं कर सके। मगर यह अलग विषय है। हिंदी फिल्मों ने डटकर कमाई की पर इस समाज को कुछ दिया नहीं! हिंदी भाषा को तो कुछ भी नहीं दिया लेखकों को वह क्या देते?
फिल्म वालों के पास भी लेखक हैं पर उनका वहां क्या सम्मान है सभी जानते हैं। एक बात याद रखने वाली बात है कि लेखन ही ऐसा व्यवसाय है जहां व्यक्ति पैसे के साथ सम्मान भी चाहता है। जहां यह सोचकर उसका सम्मान न हो कि वह पैसा ले रहा है वहां लेखक अपनी आत्म अभिव्यक्ति के प्रति अपनी रुचि खोकर दूसरे के निर्देशों के अनुरूप अपनी रचना करता है और इस तरह वह समाज का दर्पण नहीं बल्कि किराये का दर्पण होकर रह जाता है।

समस्या यह नहीं है कि देश में हिंदी गद्य लेखकों की कमी है बल्कि प्रकाशक, फिल्म निर्माता और नाटककार चाहते हैं कि कोई फटेहाल बस्ता टांगे व्यक्ति उनके दरवाजे पर भीख मांगने केे अंदाज में खड़ा हो और उसकी रचना सस्ते मेें खरीद कर वह अपना नाम कर सकें-लेखन से अलग गतिविधियों के लिये प्रसिद्ध व्यक्तियों की रचनायें छापने के लिये हाथ जोड़े खड़े रहते हैं पर किसी आम लेखक को प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचाने का काम कभी नहीं कर पाते। फिल्म बनाने वाले अपने लिये हीरो का अभिनय करने वाला कोई लड़का और प्रकाशक अपनी पुस्तकें बेचने के लिये जुगाउ ढूंढ लेते हैं पर हिंदी का लेखक ढूंढने के लिये वह कोई प्रयास नहीं करते। आप देखिये देश में इतने सारे हिंदी प्रकाशन हैं और साथ में फिल्मों में भी अनेक गीतकार और कहानीकार हैं पर कोई अपने बेटे या बेटी को हिंदी का लेखक नहीं बनाता। स्थिति यह है कि हिंदी फिल्मों में काम करने वाले लेखकों और गीतकारों के बेटे अपने माता पिता के संबंधों का लाभ उठाकर नायक, नायिका,निर्देशक और निर्माता तो बन जाते हैं पर कोई लेखक नहीं बनता। जिस लेखक के सहारे समाज को मार्गदर्शन करने वाली रचनायें बन सकती हैं उसका सम्मान कोई नहीं करना चाहता।

जिनके पास धन बल है वह अपने अहंकार में चूर हैं। लेखक की मांग है पर उसका पेट भरना कोई नहीं चाहता। फिल्मी हीरो हीरोईन बनने के लिये अनेक लड़के घर से भागते हैं पर कोई लेखक होने के लिये घर से नहीं भागता। अगर कोई भूला भटका लेखक फटेहाल बगल में बसता लटकाये प्रकाशकों या फिल्म निर्माताओं के द्वार पर पहुंच भी जाये तो उसके लिये यह संभव नहीं है कि उसकी बात पर गौर किया जाये। फिल्म हो या हिंदी प्रकाशन आज भी इसी इंतजार मेें कि कोई चपले चटकाता हुआ लेखक उनके पास आये पर इस बात को भूल रहे हैं कि अब रोटी कमाना आसान नहीं है और जिनके पास बाप दादों की पूंजी नहीं है ऐसे हिंदी में गद्य या पद्य लिखने वालों के लिये रोटी का लंबे समय तक इंतजार करना संभव नहीं है। इसलिये लेखन से इतर वह अपने व्यवसाय से कमाने के बाद ही लिखते हैं। उनके पास इतना समय नहीं है कि वह प्रकाशकों को या फिल्म निर्माताओं के घर चक्कर लगा सकें। उसी तरह पांच या दस रुपये के टिकट लगाकर पत्र पत्रिकाओं में रचनायें भेजने के लिये भी अब कौन तैयार होगा जबकि उनका जवाब नहीं आता। आज भी यह बेरहम शर्त सभी प्रकाशक लगाये बैठें है कि अगर आप अपनी अस्वीकृत रचनायें वापस चाहते हैं तो साथ में टिकट लगा लिफाफा भेजें। यह प्रकाशन आज भी पुरानी मानसिकता में जी रहे हैं। यही कारण है कि उनके प्रकाशन विज्ञापनों के कारण जीवित हैं न कि पाठकों के कारण।

कुछ पाठक इस लेखक के आलेख पढ़कर अक्सर यह कहते हैं कि आप अपनी रचनायें पत्र पत्रिकाओं को क्यों नहीं भेजते। वह अपना जवाब इस आलेख में ढूंढ लें। अंतर्जाल पर हिंदी पाठकों का आवागमन कम है पर आगे बढ़ेगा। आज की नयी पीढ़ी पूरी तरह इंटरनेट की तरफ जा रही है। हिंदी में लेखक कोई पेड़ पर नहीं टंगे जो मिल जायेंगे। इंटरनेट पर ब्लाग पर आगे लोग लिखेंगे-उनमें व्यवसायिक भी होंगे और शौकिया भी। आखिर मौलिक और स्वतंत्र लेखन करना कोई आसान काम नहीं है। अनुवादक ढेर सारे मिल जायेंगे क्योंकि उसमें त्वरित गति से पैसा मिलता है। कवितायें लिखने वाले तो लाखों हैं पर गद्य लेखकों का लगभग टोटा है। इंटरनेट पर लिखते हुए यह लगता है कि भले ही किसी पाठ को प्रकाशित होने वाले दिन दस लोगों ने पढ़ा पर कालांतर में वह लाखों लोग पढ़ेंगे और पढ़ते ही रहेंगे। पत्र पत्रिकाओं में एक दिन में लाखों लोग पढ़ते हैं पर फिर कोई नहीं पढ़ता। कहने वाले कह भी सकते हैं कि ‘इस लेखक के लिये अंगूर खटटे हैं पर सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर लिखने से यह विश्वास पैदा हुआ है कि लोगों की उन विषयों में रुचि है जिन पर यह लेखक लिख रहा है।

अभी भी अनेक लोग हिंदी ब्लाग में स्तरीय लेखन न होने की बात करते हैं पर सच बात तो यह है कि यहां ऐसा बहुत पढ़ने और देखने को मिल रहा है जो बाहर नहीं मिल रहा। आगे चलकर बहुत सारे नये और युवा लेखक आयेंगे और फिल्म और प्रकाशन जगत को यहां आकर ही अपने लिये रचनाकार तलाशने होंगे। कोई रचनाकार या लेखक पहले ही दिन व्यवसायिक नहीं हो जाता। हर आदमी पहले स्वांत सुखाय लिखना प्रारंभ करता है और अब जो लोग ऐसा करेंगे वह इंटरनेट पर ही करेंगे। अभी तो हिंदी पर अपनी रोटी सैंकने वाले ब्लाग लेखकों को रिजेक्टेट पीस समझ रहे हैं पर वह यह न भूलें कि ब्लाग जगत के विस्तार के साथ उनके संस्थानों पर भी यही शब्द लागू होेगा। हिंदी लेखक और प्रकाशन के बीच एक अहंकार की दीवार है जिसे गिरना ही होगा। अभी तक प्रकाशन जगत में यह अहंकार है कि वह सवौपरि है और किसी लेखक को आवाज देकर बुलायेगा नहीं तो लेखक भी अब लेखन पर निर्भर नहीं है और उसे अपनी चप्पलें चटकाते हुए घूमने की जरूरत नहीं है। शेष फिर कभी।
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