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10/25/09

‘ब्लाग’ का ला़क्षणिक अर्थ ‘निज पत्रक’ या ‘निजी पत्रिका’-व्यंग्य आलेख (meaning in the hindi of blog word)

ब्लाग का अगर कोई लाक्षणिक अर्थ-इसका हिंदी में कोई शब्दिक अर्थ नहीं है ऐसा कहा जाता है-अगर कुछ हो सकता है तो वह ‘पत्रिका’ या ‘पत्रक’ ही है। यह इसलिये नहीं लिखा जा रहा कि इस ब्लाग लेखक ने अपने अधिकतर ब्लाग पर अनजाने में पत्रिका शब्द लिख दिया था बल्कि अब चारों तरफ इसका प्रयोग देखकर यही निष्कर्ष निकलता है। ‘चिट्ठा‘ शब्द का अंग्रेजी पर्याय बेलेन्सीशीट मौजूद है इसलिये किसी भी सूरत में ब्लाग का अर्थ वह तो हो ही नहीं सकता। यह चिट्ठा शब्द लेखाकारी से संबंधित है और शब्दिक भंडार के लिये इसका प्रयोग हिंदी के लिये असहजता का बोध कराने वाला है-इससे तो इस ‘ब्लाग’ शब्द ही ठीक लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि फिर तो ब्लाग को ही हिंदी के शब्द भंडार में शामिल करना चाहिये। वैसे तो ‘पत्रिका‘ के लिये भी अंग्रेजी में शब्द हैं मेगजीन-इसलिये कुछ लोग उस पर आपत्ति कर सकते हैं। तिस पर हम जैसे मामूली लेखक ने इसे ढूंढा है तो यह संभव नहीं है कि हिंदी के विद्वान इसे स्वीकार करें। हिंदी भाषा के साथ यही त्रासदी है कि उसके प्रमाणिक लेखक बनने के लिये कोई पद या पुरस्कार पीठ के साथ चिपका हो। यह इस लेखक के पास है और मित्रों को कहना है कि आगे भी ऐसी कोई आशा नहीं करना चाहिये।

पहले ब्लाग के लिये इस लेखक ने ‘निज पत्रक’ शब्द का प्रयोग किया था पर उसे प्रतिष्ठा नहीं मिल सकी। वैसे प्रसंगवश एक बात बता दें कि इस लेखक ने ही संभवतया पोस्ट शब्द के लिये पाठ शब्द लिखा था और आजकल गूगल भी उसका प्रयोग कर रहा है। अब यह पता नहीं कि वह इस लेखक की वजह से है या स्वाभाविक रूप से-संभव है पहले भी किसीने इसका प्रयोग किया हो। इधर पत्रिका शब्द का प्रयोग कई लोगों के लिये असहजता भी पैदा करता है। एक तो डोमेन लेकर पत्रिकायें प्रस्तुत हो रही हैं जिनको यह स्वीकार्य नहीं होगा कि कोई ब्लाग मुफ्त में पत्रिका बन जाये। दूसरा यह है कि अगर ब्लाग के लिये पत्रिका शब्द चल निकला तो फिर कागज पर छपने वाली पत्रिकाओं का के नाम की महत्ता कम हो सकती है। ब्लाग को पत्रिका मानने का आशय यह भी होगा कि भविष्य में इसे बनाने वालों पत्रकार मान लेना। तब तो यह हालत हो जायेगी कि जो भी ब्लाग बनायेगा वह कहेगा‘मैं भी पत्रकार हूं।’
यह लेखक यही सोचकर यह ‘निज पत्रक’ शब्द का प्रयोग करता रहा कि कहीं पत्रिका शब्द लोकप्रिय हो गया तो अनेक लोगों को अफसोस होगा। बहरहाल कल जब गूगल पर पाठ शब्द देखा तो अनुभव हुआ कि अगर हमारा पाठ शब्द वह अपना सकते हैं या संयोगवश मेल खाता है तो क्यों न हम ब्लाग शब्द का अपने द्वारा ईजाद किया गया ‘निज पत्रक’ या ‘निज पत्रिका’ शब्द के साथ आगे बढ़ें। एक बात तय रही कि हम या तो ब्लाग लिखते हैं या ‘निज पत्रक’(निज पत्रिका)-चिट्ठा तो कतई नहीं लिखते। चिट््ठा शब्द हमारे अंदर हीन भावना भी भरता है। वह यह कि हमने वाणिज्य स्नातक की उपाधि तृत्तीय श्रेणी में प्राप्त की। केवल तीन नबरों से द्वितीय श्रेणी रह गयी। हुआ यह कि वाणिज्य स्नातक के द्वित्तीय वर्ष में हमारा लेखा का पेपर बिगड़ गया था। उसमें सामान्य प्रविष्टी रोकड़ बही और लाभ हानि खाता हम सही कर गये पर कमबख्त ‘वार्षिक चिट्ठा बिगड़ गया। द्वितीय वर्ष का यह बोझ हमें तृतीय वर्ष में भी झेलना पड़ा। वहां भी वार्षिक चिट्ठा की प्रस्तुति बेहतरीन नहीं हुई। इस तरह तृतीय श्रेणी में हमारी वाणिज्य स्नातक की उपाधि सिमट गयी।
यह चिट्ठा शब्द सामान्य लोगों की जुबान पर चढ़ना कठिन भी है। कम से कम हम अपने इलाके के बारे में तो यही समझते हैं। हम हिंदी के भाषा विज्ञानी नहीं है पर इतने बेबस भी नहीं है कि तर्क न ढूंढ सकें। कम से कम वाद प्रतिवाद में अपनी बात रखने में हमारे महारथ को हमारे मित्र भी मानते हैं। अपने अनेक मित्रों से सलाह ली। हिंदी के ज्ञाता लोगों ने भी अपनी सहमति दी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि ब्लाग लिखने वाले ही एक हमारे पहले के मित्र ने कहा-‘मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं।’
इन्हीं मित्र ने हमसे कहा कि ‘तुम कविता मत लिखो। हमें पसंद नहीं आती। तुम तो गद्य लिखा करो। तुम अगर कहते हो कि यह पत्रिका है तो वह भी मान लेंगे क्योंकि यह कविता में नहीं कह रहे। फिर जहां तक चिट्ठा कहने का प्रश्न है तो हमें भी अच्छा नहीं लगता अलबत्ता ब्लाग जरूर कहेंगे।’
प्रसंगवश हमारे वह मित्र बहुत गजब की गजल और गीत लिखते हैं। ऐसे में कविता के मामले में उनसे बहस करना अपनी भद्द पिटवाना है। यह भी संयोग है कि हमें गद्य लिखने की प्रेरणा देने वाले उन सज्जन ने ब्लाग बना लिया। बहरहाल अपनी अपनी राय है।
चिट्ठा शब्द से उन हिंदी लेखकों को परेशानी होगी जिनका गणिक कमजोर है। यह चिट्ठा कहीं न कहीं लेखांकन की तरफ इशारा करता है। इस पर जिन्होंने वाणिज्य की पढ़ाई की और हमेशा अपने विषय को बोर अनुभव करते रहे उनके लिये भी ‘चिट्ठा शब्द’ पुरानी बुरी यादों को ताजा करेगा। फिर अनेक लोग ऐसे भी है कि कंप्यूटर पर लेखा कार्य करते हैं। जब वह चिट्ठा शब्द का स्मरण करेंगेे तो उनके लिये आंकड़ों का जाल सामने आकर संकट खड़ा करेगा। अचानक ही उनको याद आयेगा कि अमुक आदमी की रोकड़ बही बनाना है-सो लिख लिया चिट्ठा।
वैसे ब्लाग लेखन अभियान को आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाना है तो इसके लिये ‘निज पत्रक‘ या ‘निजी पत्रिका‘ शब्द भी कम आकर्षक नहीं है। हमसे कोई पूछता है कि ‘ब्लाग यानि क्या’?’ जवाब में हम कहते हैं कि ‘समझ लो अपनी निजी पत्रिका निकाल रहे हैं। वहां से पैसा वैसा नहीं मिलता यह भी समझ लेना।’
लोग संतुष्ट हो जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि ‘निज पत्रक’ या ‘निजी पत्रिका’ शब्द भी इसको लोकप्रियता दिलाने में सहायक हो सकता है। हालांकि यह भी है कि अनेक लोग यह बर्दाश्त नहीं करेंगे कि इस देश के ऐरे गैरे नत्थू खैरे हिंदी कलमकार उनके सामने फोकटिया संपादक या लेखक होकर उनको चुनौती दें। खासतौर से जब किसी फोकटिया ने ही ब्लाग शब्द का नामकरण ‘निज पत्रक’ या ‘निजी पत्रिका’ के रूप में किया हो उनकी भौहें तन जायेंगी। मगर इससे क्या? हमारा मानना है कि हिंदी के वर्तमान संगठित ढांचे में बदलाव अपेक्षित हैं और अंतर्जाल के अनेक लेखक इसके लिये जद्दोजेहद करते हुए दिख रहे हैं। यह पता नहीं अंतर्जाल पर लिखने वाले दूसरों को कितना पढ़ते हैं पर हमने देखा है कि अनेक ऐसे पाठ सामने आते हैं कि दिल खुश हो जाता है। एक बार किसी फोरम पर जाते हैं तो कुछ न कुछ नया पढ़ने को मिल ही जाता है। तब यह भ्रम भी समाप्त हो जाता है कि हम ही सबसे अच्छा लिख रहे हैं। शायद अनेक लोगों को मालुम है इसलिये अंतर्जाल पर हिंदी लेखन से मूंह फेरते हुए कहते हैं कि ‘वहां कूड़ा लिखा जा रहा है’। ऐसे में पत्रिका शब्द उनके लिये चिढ़ का कारण भी हो सकता है और कह सकते हैं कि ‘काहे की पत्रिका’, वह तो चिट्ठा है।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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6/26/09

मजाक करो या गुस्सा पर अनाम न रहो-आलेख

देश में सात करोड़ इंटरनेट कनेक्शन हैं पर सभी लोग नहीं लिख सकते क्योंकि यूनिकोड पर जानने वालों की बहुत कमी है। हिंदी ब्लाग जगत पर जो लिख रहे हैं उनमे कुछ लोग बहुत अपने ज्ञान पर इतराते हैं तो यही कहना पड़ता है कि उन्होंने बहुत आसानी से ब्लाग लिखना सीख लिया होगा। शायद अब ब्लाग की अच्छी जानकारी आ जाने पर कुछ लोगों के मन में उसके दुरुपयोग की बात आने लगी है जो अब बेनाम टिप्पणियों में रूप में प्रकट हो रही है।
इस लेखक को पाठकों के लिये पढ़ने योग्य ब्लाग लिखने में तीन महीने लग गये थे। हालत यह थी कि ब्लाग स्पाट के ब्लाग से शीर्षक कापी कर वर्डप्रेस के ब्लाग पर रख रहा था क्योंकि वहां हिंदी आना संभव नहीं थी। हिंदी लिखने का तरीका भी विचित्र था। कंप्यूटर पर एक आउटलुक सोफ्टवेयर दिया गया था। उसमें कृतिदेव फोंट सैट कर यूनिकोड टेक्स्ट के द्वारा लिखने पर हिंदी में लिखा वर्डप्रेस के एचटीएमएल में प्रकाशित तो हो जाता था पर उसे लेखक स्वयं ही पढ़ सकता था। बाकी ब्लाग लेखक चिल्ला रहे थे कि भई यह कौनसी भाषा में लिखा है।
उसके बाद ब्लाग स्पाट के यूनिकोड से छोटी कवितायें ही लिख रहा था। सच तो यह है कि ब्लाग लिखने के मामले में हताश हो चुका था। फिर हिम्मत कर रोमन लिपि में टाईप कर काम चलाता रहा। उस समय एक लेख लिखना पहाड़ जैसा लगता था। बाद में कृतिदेव का यूनिकोड मिला तब जाकर आसानी लगने लगी।
बड़े शहरों का पता नहीं पर छोटे शहरों में जहां तक इस लेखक को जानकारी है बहुत कम लोग लिखने की सोचते हैं और उससे भी कम ब्लाग तकनीकी के बारे में जानते हैं। चाहे कोई ब्लाग लेखक कितना भी दावा करे कि वह तो शुरु से ही सब कुछ जानता है पर सच तो यह है कि अनेक वरिष्ठ ब्लाग लेखकों को भी बहुत सारी जानकारी अभी हुई है। आज हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाने वाले नारद फोरम पर आप सूचना न भी दें तो वह आपका हिंदी ब्लाग लिंक कर लेता है पर इसी नारद से यह धमकी मिली थी कि ‘आपका ईमेल पर प्रतिबंध लगा देंगे क्योंकि आप ब्लाग का पता गलत दे रहे हैं। वह मिल नहीं रहा।’
पहले तो ब्लाग का शीर्षक उनको भेजा फिर बिना http:// लगाकर पता दिया। फिर www लगाकर भेजा। इस लेखक ने तय किया नारद पर पंजीकरण नहीं करायेंगे। इधर दो तीन ब्लाग पर गद्य लिखना प्रारंभ कर दिया तो आज के अनेक धुरंधर अपनी टिप्पणी में कहने लगे कि आप नारद पर पंजीकरण क्यों नहीं कराते। अब तो सभी हमारे मित्र हैं अब उनसे क्या पूछें कि आप खुद ही उस समय स्वयं ही क्यों नहीं पंजीकरण कर रहे थे? संभव है उस समय वह ब्लाग का पता कट पेस्ट करना भी नहीं जानते होंगे।
तय बात है कि उनको भी तब यह समझ में नहीं आ रहा होगा कि वर्डप्रेस पर सभी के सामने चमक रहा ब्लाग उनके यहां कैसे लिंक होगा जब तक दूसरा भेजेगा नहीं। वर्ड प्रेस पर किसी वेबसाईट की इमेज कैसे सैट करें यह अभी एक माह पहले हमें पता लगा।
हमारे एक मित्र ब्लाग लेखक मित्र श्री शास्त्री जी के ब्लाग पर कुछ ब्लाग लेखक हमारे मित्र के आई डी से ही टिप्पणी देकर बता रहे थे कि किस तरह उनके नाम का भी दुरुपयोग हो सकता है? हम तो हैरान हो गये यह देखकर! यह सोचकर डरे भी कि कोई हमारे ईमेल की चोरी न भी कर सका तो वह आई डी की चोरी तो आसानी से कर सकता है। हमारे एक मित्र श्री सुरेश चिपलूनकर इस तरह का झटका झेल चुके हैं।
इतना तय है कि इस तरह की हरकतें करने वाला ब्लाग लेखक कोई पुराना ही हो सकता है। हमारे शहर में जान पहचान के लोग ब्लाग लिखने का प्रयास कर रहे हैं और हमसे आग्रह करते हैं कि आप किसी दिन आकर हमारी मदद कर जाओ। कुछ लोगों को जब हिंदी का इंडिक टूल भेजते हैं तो वह गद्गद् हो जाते हैं-उनके लिये यह जादू की तरह है। हम सोचते हैं कि उन ब्लाग लेखकों को हमारे जितना ज्ञान पाने में ही एक वर्ष तो कम से कम लग ही जायेगा। ऐसे में इतना तय है कि कोई नया ब्लाग लेखक ऐसा नहीं कर सकता कि वह दूसरे के आई. डी. का इतनी आसानी से उपयोग करे।
ऐसे में हमारा तो समस्त अंतर्जाल लेखकों से यही आग्रह है कि भई, क्यों लोगों को आतंकित कर रहे हो। हमारे यहां के आम लोग और लेखक किसी झमेले में फंसने से बचते हैं। ऐसे में जहां पैसा एक भी नहीं मिलता हो और इस तरह फंसने की आशंका होगी तो फिर अच्छे खासे आदमी का हौंसला टूट जायेगा। हमारे सभी मित्र हैं, शायद इसलिये आशंकित हैं कि कहीं कुछ लोग इतिहास में अपना नाम जयचंद की तरह तो दर्ज नहीं कराने जा रहे।
वैसे हम तो सारे प्रसिद्ध ब्लाग लेखकों को पढ़ चुके हैं। इतना भी जान गये हैं कि तकनीकी रूप से कितना सक्षम है्-यह भी अनुमान कर लेते हैं कि कौन ऐसा कर सकता है? बिना प्रमाण किये कुछ कहना ठीक नहीं है फिर समस्या यह है कि सभी हमारे मित्र हैं और किसी पर संदेह करना अपराध जैसा है। ब्लाग से संबंधित कुछ समस्याओं का सामना करते हुए इस लेखक को लगता है कि कुछ लोग अब दूसरे को परेशान करने में सक्षम हो गये हैं।
बहरहाल इस तरह की अनाम या छद्मनाम टिप्पणियां करने का प्रचलन बढ़ रहा है पर दूसरे के नाम का दुरुपयोग कर ऐसे ब्लाग लेखक कोई हित नहीं कर रहे हैं। उनकी इस हरकत से होगा यह कि नये लेखकों को प्रोत्साहन देने कठिन हो जायेगा। अंततः इसके नतीजे उनको भी भोगने पड़ेंगे-क्योंकि जब हिंदी ब्लाग जगत इस तरह बदनाम होगा तो फिर नये लेखक नहीं जुड़ेंगे बल्कि पाठक भी कटने लगेंगे। जो अनाम या छद्म नाम से लिख रहे हैं वह भी कोई न कोई असली नाम से ब्लाग तो इस आशा में लिख ही रहे हैं कि कभी न कभी तो वह प्रसिद्ध होंगे पर अगर देश में नकारात्मक संदेश चला गया तो फिर उनकी यह आशा धरी की धरी रह जायेगी। अंत में यहां दोहरा देना ठीक है कि कि हमारे साथ तो सभी मित्रता निभाते आये हैं इसलिये उनसे करबद्ध प्रार्थना है कि वह इस बात को समझें। उनके इस कृत्य पर इस लेखक का मानना है कि यह अपराध नहीं बल्कि उनका बचपना है आशा है कि वह इसे समझकर इससे निहायत फूहड़ हरकत से परे रहेंगे। एक बात तय है कि हम सब आपस में ही हैं और संख्या में कम हैं इसलिये इधर उधर शिकायत करने की बजाय एक दूसरे को समझाकर या डांट कर साध लेते हैं पर यह संख्या बढ़ी और किसी के लिये यह असहनीय हुआ तो सभी जानते हैं कि फोन नंबर के माध्यम से कोई भी पकड़ा जा सकता है। इससे भी ज्यादा तो हिंदी ब्लाग जगत के बदनाम होने की आशंका है जिससे उन लोगों की भी मेहनत पानी में जायेगी जो अनाम टिप्पणियों से ब्लाग लेखकों के लिये तनाव पैदा कर रहे हैं-नये लेखकों को यहां लाने में मुश्किल होगी क्योंकि वैसे भी लोग अन्य प्रकार के आतंकों से डरे हुए हैं। ऐसे में सीधे इस तरह का आतंक झेलने का वह सोच भी नहीं सकते। इस लेखक का दावा है कि अपनी हरकत के बाद वह स्वयं भी बैचेनी अनुभव करते होंगे। हमारी तो स्पष्ट मान्यता है कि आप मजाक या गुस्से में भले ही टिप्पणी दो पर अनाम न रहो। बाकी किसी की मर्जी है जैसा करे।
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3/14/09

हिंदी दूसरों को कमाकर देती है, पर स्वयं गरीब रहती है-आलेख

अंतर्जाल पर हिंदी में सक्रिय कई ऐसे ब्लाग लेखक हैं जिन्हें लिखते हुए छह साल हो गये हैं। उन लोगों की प्रशंसा करना चाहिये कि उन्होंने अपने प्रयासों से हिंदी ब्लाग जगत को एक दिशा देने के लिये बहुत बड़ा काम किया है। इन ब्लाग लेखकों में कई हिंदी भाषा के विशारद हैं और उनकी विद्वता किसी को भी चिढ़ा सकती है। इसके बावजूद यह भी एक तथ्य है कि उनमें अनेक प्रकार के मतभेद हैं और इसी कारण होता यह है कि आज एक बात कह रहे हैं कल दूसरी बात कहने लगते हैं तब उनसे सीखने वाले ब्लाग लेखकों में मतिभ्रम हो जाता है।

दरअसल समस्या यह नहीं है कि हिंदी में लिखने वाले नहीं है या इच्छुक लोगों की कमी है। कुछ पुराने भावुक ब्लाग लेखक पहले विकिपीडिया और अब नाॅल पर लिखने के लिये अपीलें कर रहे हैं। उनकी अपीलों के कारण कारण कुछ ब्लाग लेखक कभी जिज्ञासावश तो कभी उत्सुकतावश वहां अपनी रचनायें और पाठ डाल देते हैं। इस लेखक ने भी कुछ पाठ इन पर रखे हैं। मगर कई ब्लाग लेखक विकिपीडिया और नाॅल पर लिखने के लिये की गयी अपीलों पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। ऐसे में बहस की दिशा समझ में नहीं आती। ऐसी ही एक बहस एक सुझाव आया है कि हिंदी के लिये सर्वर बनाया जाये। एक तरफ ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपने हिंदी प्रेम की वजह से विकिपीडिया में योगदान देते दूसरों से ऐसा करने का आग्रह करते हैं पर कुछ लेखक यह कहकर विरोध करते हैं कि विकिपीडिया और नाल विदेशी सर्वरों पर आधारित हैं और वह नियम बदलकर कभी हिंदी लेखकों का लिखा जब्त कर सकते हैं। समर्थक ब्लाग लेखक भी यह तर्क देते हैं कि अंतर्जाल पर लिखी गयी सामग्री की तो कोई भी नकल कर सकता है तो फिर विकिपीडिया के लिये लिखने में क्या बुराई है?
इस बहस से अलग विषय है हिंदी और देशी भाषाओं के सर्वर की। सच बात तो यह है कि हमारा देश न केवल अपने यहां बल्कि विदेशों के प्रचार माध्यमों मेंं भी अपना पैसा लगा रहा है। हिंदी के लिखने पढ़ने मेंं गूगल के योगदान पर अधिक क्या लिखना? उसके टूलों के कारण ही यहां हिंदी लिखी जा रही है। कुछ मुददे ऐसे हैं जिन पर बहस की गुंजायश नहीं है। जिस तरह भारत के पैसे ेसे विश्व में क्रिकेट चल रहा है वैसे ही अन्य प्रचार माध्यमों को भी इससे बहुत सारी सहायता मिल रही है। भारतीय केवल अपने देश में नहीं है बल्कि बाहर है। यही स्थिति पैसे की भी है। भारतीयों का पैसा कितना बाहर लगता है कोई नहीं जानता? अनेक भारतीय कंपनियां विदेशों में सक्रिय हैं और उनमें आम भारतीय निवेश करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि भारत एक बहुत बड़ी आर्थिक ताकत है पर उसका उपयोग करने के लिये कुशल प्रबंधन का अभाव है और अंतर्जाल पर हिंदी लिखने के मामले में पिछड़ना इसी बुराई का एक हिस्सा भर है। केवल धन में ही नहीं तकनीकी दृष्टि से भी भारत कितना सक्षम है इस पर विस्तार से लिखना सूरज को दिया दिखाने के बराबर है। फिर भी आखिर ऐसा क्या है कि हमारे पास हिंदी और देशी भाषाओं का सर्वर नहीं है।

प्रसंगवश याद आया। जब इंटरनेट शुरु हुआ था तब याहू के बारे में यह कहा गया कि उसकी स्थापना एक पुराने भारतीय अभिनेता ने की है। अनेक पाठकों को यह पता ही नहीं होगा कि यह भी एक विदेश में स्थित कंपनी ही है जिसका किसी भारतीय अभिनेता से संपर्क नहीं है-अंतर्जाल पर ढाई वर्ष से सक्रिय रहने पर इस ब्लाग लेखक को भी यही आभास बहुत समय तक रहा। याहू नाम का प्रचार कुछ इस तरह का है कि लोग आज भी इसे देशी समझते हैं और आम प्रयोक्ता अपना इमेल उसी पर ही बनाता है। इस लेखक ने भी गूगल पर तब ईमेल बनाया जब ब्लागस्पाट के ब्लाग के लिये उसकी आवश्यकता हुई। अंतर्जाल पर हिंदी के लिये समर्पित ब्लाग लेखक विकिपीडिया और नाॅल के लिये लिखने की अपील करते हैं इस पर आपत्ति करना तो ठीक नहीं है पर इसके प्रत्युत्तर में कुछ लोग बारबार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर इतने सारी धनी और तकनीशियन होते हुए भी हिंदी या देशी भाषाओं का लेखन विदेशियों के सहारे क्यों हैं? तय बात है कि यहां के धनपतियों में आत्ममुग्धता की स्थिति है। यहां का धनपति विनिवेश करते ही पैसा कमाना चाहता है जबकि विदेशी विनिवेश योजना के साथ करते हैं और उनमें अपने देश और भाषा के लगाव भी अनुकरणीय होता है। यहां के धनपति क्रिकेट,फिल्म और टीवी चैनलों में पैसा लगा रहे हैं ताकि तत्काल पैसा कमाया जा सके। टीवी चैनलों की हालत यह है कि किस अभिनेता ने रात को किसी अभिनेत्री के कान में क्या कहा? इसे प्रमुख खबर बनाते हैं। देश में पैसा कमाने वाले बहुत हैं पर अच्छे प्रबंधक हैं यह कहना गलत होगा। ऐसे धनपति चाहे अपने फोटो और बयान कितनी बार ही अखबारों या टीवी चैनलों पर दिखा लें पर वह सेठ नहीं है। सेठ वह होता है जो अपने धन से समाज,भाषा और सामूहिक विकास के लिये धन देता है या प्रायोजन करता है। इस देश के धनपतियों और धार्मिक ठेकेदारों का उद्देश्य केवल मौजूद साधनों का दोहन करना होता है निर्माण नहीं ।

इसका सबसे अच्छा उदाहरण है गंगा और यमुना का प्रदूषण। आप देखिये इन दोनों पवित्र नदियों के किनारे अनेक धार्मिक नगर हैं और वहां अनेक प्रकार के होटल और आश्रम हैं। अनेक धनपति समय समय पर वहां अपनी श्रद्धा दिखाने पहुंचते हैं तो अनेक साधु संतों ने वहां आश्रम बना लिये। मगर गंगा और यमुना दोनों ही प्रदूषित होती गयीं। क्या आपने सुना है कि किसी धनपति या प्रसिद्ध साधु ने इसके लिये कोई आंदोलन किया हो। कहने को बातें सभी करते हैं पर ठोस प्रयास किसी ने नहीं किया। समाज के शीर्षस्थ नेतृत्व का यह नकारापन जग जाहिर है। गंगा यमुना की संस्कृति के नारे लगते रहे पर वह दोनों मैली होती रहीं।

समाज और भाषा के शीर्षस्थ लोगों के नकारापन के कारण ही अनेक ब्लाग लेखक अपने हिंदी समर्पण की भावना के वशीभूत होकर ही विकिपीडिया और नाल में हिंदी भाषा के विकास के लिये लिखने की अपील करते हैं। यह अपील वह ब्लाग लेखकों से इसलिये करते हैं क्योंंकि वह उनको पढ़ते हैं पर हिंंदी सर्वर की बात करें तो धनपतियों और भाषा के ठेकेदारों को कहां इतना समय है कि वह इसके लिये सोचें। क्रिकेट,फिल्म और टीवी चैनलों पर उनके लिये इतना पैसा फैला है कि वह उनके दोनों हाथों से समेटा ही नहीं जाता। एक आम हिंदी भाषी ब्लाग लेखक को अंतर्जाल पर हिंदी लिखना अपना युद्ध लगता है जिसे सभी लड़ रहे हैं। फिर विकिपीडिया और नाल की बात ही क्या? ब्लाग स्पाठ और वर्डप्रेस के ब्लाग भी विदेशियों की ही देन है। कई बार ऐसा लगता है कि कितना ही अच्छा होता कि देश के धनपतियों और तकनीशियनों के समन्वय से ऐसे ही साफ्टवेयरों का निर्माण हुआ होता। विकिपीडिया और नाॅल की तरह कोई अपने देश के लोगों का बनाया मंच होता। वैसे नाल का प्रचार इतना है नहीं और विकिपीडिया पर अब हिंदी के लोगों की निर्भरता कम ही होती जा रही है। भारतीय विषयों पर अनेक समर्पित ब्लाग और वेबसाईट लेखकों ने भारतीय विषयों को अंतर्जाल पर चढ़ा दिया है। वैसे भी इस देश में लोग सर्च इंजिनों में शब्द डालकर ही अपने विषय ढूंढते हैं और कई जगह विकिपीडिया से पहले उनके ब्लाग या वेबसाईटें आ जाती हैं। फिर वर्डप्रेस,नारद,ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत, हिंदी ब्लाग जगत और वेबदुनियां की भी भूमिका सर्च इंजिनों में बढ़ती दिख रही है। मुश्किल यही है कि पाठकों की कमी और धनार्जन न होना लेखक को प्रोेत्साहित नहीं कर पाता। ऐसे में शौकिया लेखक ही लिखते हैं। जब पाठकों के साथ लेखकों की संख्या भी बढ़ेगी तो नाल और विकिपीडिया पर लिखने वालों की संख्या भी बढ़ेगी।
निष्कर्ष यह है कि अंतर्जाल पर हिंदी स्थापित करने के लिये एक समग्र आंदोलन की आवश्यकता है जिसमें देश के धनपति,तकनीशियनों और लेखकों के साथ अन्य प्रचार माध्यमों के समन्वित प्रयास होने चाहिये। उससे पाठक संख्या निश्चित रूप से बढ़ेगी। हालांकि यह केवल कल्पना ही है। हां, जब हिंदी के पाठक बढ़ने लगे और धनपतियों को लगा कि उससे तत्काल-दीर्घकाल में नहीं-लाभ उठाया जा सकता है तो एक क्या दस हिंदी के सर्वर बन जायेंगे। शायद यह दुनियां की इकलौती भाषा है जो सभी को कमाकर देती है पर स्वयं गरीब बनी रहती है। ऐसा नहीं है कि हिंदी से कोई कमा नहीं रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो गूगल हिंदी में लिखने वाले इतने बेहतर टूल नहीं लाता। यह क्रिकेट,फिल्म और टीवी चैनल हिंदी वालों से खूब कमा रहे हैं पर अपनी बढ़ती दौलत उन्हें अंध बना देती है और मातृभाषा उनको गरीब दिखाई देती है। कई तो कह भी देते हैं कि ‘आजकल हिंदी से काम नहीं चलता।’
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