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11/17/14

नये संकटमोचकों के नाटक-हिन्दी कविता(naye sankatmochokon ke natak-hindi poem)



सुनते थे संकट में

सर्वशक्तिमान हमेशा

भक्तों को बचाने आते हैं।


शायद यह सतयुग की बात होगी

कलियुग में इंसान से

 सर्वशक्तिमान बने लोग

अपने पाप छिपाने के लिये

भक्तों की भीड़

आश्रम पर लगाते हैं।


कहें दीपक बापू भक्ति का भ्रम

शराब और सिगरेट से

ज्यादा खराब होता है,

मन में बुरे इष्ट स्मरण से

मनुष्य का विवेक बर्बाद होता है,

मोह और माया के जाल में फंसे

कथित नये सर्वशक्तिमान

कभी संकट मोचक नहीं बनते

जब तक तबाह न हो जाये भक्त

बचाने का नाटक ही रचाते हैं।
------------------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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1/16/13

पाकिस्तान पर अपनी शैक्षणिक सामग्री में सुधार के लिये दबाव डालें-हिन्दी लेख (pakistan change his educational material-hindi lekh or article)

                           पाकिस्तान को लेकर ढेर सारी बातें होती हैं। जब दोनों के बीच माहौल थोड़ा ठंडा होता है तब खेल और फिल्म या संगीत में पाकिस्तानी लोगों को बुलाकर अच्छे रिश्ते बनाने की बात होती है।  कुछ समय तक सब चलता है फिर अचानक कुछ ऐसा होता है कि दोनों मामलों में बढ़े हुए  कदम वापस ले लिये जाते हैं।  भारत में कुछ रणनीतिकारों का मानना है कि राजनीति से अलग हटकर दोनों देशों के नागरिकों के आपसी संबंध बनाने पर जोर देना चाहिए।  यह प्रयास केवल पाकिस्तान से  क्रिकेट संबंध जोड़ने, टीवी कार्यक्रमों में पाकिस्तानी कलाकारो के अभिनय, भारतीय फिल्मों  में पाकिस्तानी गायकों के स्वर शामिल होने तथा कुछ बुद्धिमानों के आपसी मिलने से अधिक नहीं बढ़ पाते।  दरअसल हमारे देश के लोग पाकिस्तान की अंदरूनी स्थितियों को नज़रअंदाज करते हैं। वह इस बात को भूलते हैं कि पाकिस्तान की शैक्षणिक पुस्तकों में भारत तथा यहां के धर्मों पर प्रतिकूल सामग्री पढ़ाई जाती है।  हमारे देश और धर्मों के प्रति वहां नफरत के बीज बचपन में ही बो दिये जाते हैं। नागरिकों के आपसी संबंध बढ़ाने के प्रयास में चंद पाकिस्तानी जब यहां आते हैं तब उनको असलियत पता चलती है पर उनकी संख्या इतनी कम है कि वह वापस लौटकर अपने पूरे देश की मानसिकता नहीं बदल सकते।
          यही कारण है कि दोनों के नागरिकों के आपसी संबंधों का कोई फल नहीं निकलता।  इसके लिये यह आवश्यक है कि पाकिस्तान पर अपनी शैक्षणिक पुस्तकों में भारत था यहां के धर्मो के विरुद्ध सामग्री हटाने का दबाव डालना चाहिए।  दूसरी बात यह कि नागरिकों के आपसी संबंधों का विस्तार पाकिस्तान के सिंध, बलूचिस्तान, और पश्चिमी सीमा प्रांत में भी होना चाहिये जबकि वह अभी तक लाहौर तक ही सीमित रहता है। 
        पाकिस्तान के साथ जिस तरह भारत के संबंध रहे हैं उसे देखते हुए उसकी मित्रता की निरंतरता में हमेशा संदेह रहता है।  पाकिस्तान शुरुआत में धार्मिक पहचान वाला देश नहीं था पर धीरे धीरे वहां अन्य धर्मों के लोगों को पलायन अथवा धर्म परिवर्तन के लिये मजबूर किया गया।  दूसरी बात यह कि पाकिस्तान को मध्य एशिया के सहधर्मी राष्ट्रों से प्रथक करना आवश्यक है।  वह पाकिस्तान की जमीन को अपने धार्मिक लक्ष्यों के लिये उपयोग कर रहे हैं।  यह मध्य एशियाई  देश अपनी संपन्नता के कारण   पश्चिमी देशों से डर के कारण नहीं लड़ सकते इसलिये उनके विरोधियों को पाकिस्तान की जमीन दिलवाते हैं।  इसलिये कूटनीतिक ढंग से ऐसे प्रयास किये जायें जिससे वह पाकिस्तान का साथ छोड़ने के लिये मजबूर हों। यह बात तय है कि यह सब आग्रह करने से नहंी बल्कि कड़े कदमों से ही संभव है।  पाकिस्तान से संबंधों पर विचार करते समय इस बात का ध्यान करना चाहिये कि वह सर्वधर्मसमभाव मानने वाला देश नहीं है।  उसका धर्म ही उसकी सामरिक, आर्थिक, राजनीतिक और  सामाजिक शक्ति है।  वैचारिक रूप से वह कभी हमारे देश का वह सम्मान तब तक नहीं कर सकता जब तक उसके साथ सख्ती नहीं बरती जाती।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/3/13

क्रिकेट और फिल्म-हिन्दी व्यंग्य (cricketaur film-hindi vyangya or satire)

      कुछ लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि ‘आप कंप्यूटर पर इतना कैसे लिख लेते हैं? हमें कोई इसका जवाब नहीं सूझता।  सच बात तो यह है कि हमारे जैसे लोगों में इधर उधर की फालतु निंदा परनिंदा वाली बातों में समय बरबाद  करने की बजाय स्वस्थ मनोरंजन की चाहत होती है जिसके पूरा न होने पर वह स्वयं ही मनोरंजन का सृजन करने लगते हैं।  जब क्रिकेट की बातें हमारे दिमाग में भरी हुईं होती थीं उस दौर में हमारा लेखन कम हो गया था।  बाद में जब इसमें फिक्सिंग की बातें सामने आयी तो मन उचट गया।  उसी समय इंटरनेट कनेक्शन लिया था और पता नहीं यह ब्लॉगर और वर्डप्रेस के   ब्लॉग हमारे हाथ आ गये।  हमें पता नहीं था कि यह ब्लॉग हमें कहां ले जाने वाले हैं।  यकीनन वह क्रिकेट की जगह ले रहे थे।  यही कारण की इन पर हमारी शुरुआती रचनायें क्रिकेट का मखौल उड़ाने वाली थी। 
      सच बात तो  है कि अब तो हम यह मानने लगे हैं कि क्रिकेट कोई खेल नहीं है वरन् यह एक व्यवसाय है।  हमने यह देखा कि जब क्रिकेट का आकर्षण चरम पर था तब अनेक जगह इसका मनोरंजन की तरह वैसे ही आयोजन किया जाता जैसे फिल्मी गानों का आयोजन होता है।  गानों के कार्यक्रम में समस्या यह होती है कि जिसे गाना आता है वही माइक पर गा सकता है और बाकी लोगों को श्रोता बनना पड़ता है।  एसे में दर्शकों को गाना न आने का मलाल तो रहता ही है। क्रिकेट ने यह सुविधा दे दी कि इसे चाहे जो इसे खेल सकता है।  यही कारण है कि कहीं स्त्री- पुरुष, कहीं अधिकारी-कर्मचारी तो कहीं मालिक-नौकर के वर्ग बनाकर अवकाश के दिन मैच होते रहे।  जैसे ही फिक्सिंग के बाद क्रिकेट का आकर्षण कम हुआ यह सब बंद हो गया।
      हमारा मानना है कि क्रिकेट का आकर्षण अब न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है।  अगर अब यह चल रहा है तो केवल टीवी चैनलों की वजह से ही इसका अस्तित्व है।  बाज़ार और प्रचार प्रबंधक मिलकर क्रिकेट को पुनः लोकप्रिय बनाने का प्रयास कर रहे हैं।  इधर एक टीवी चैनल हिन्दी में भी कमेंट्री प्रसारित कर रहा है जो शुद्ध रूप से एक व्यवसायिक प्रयास है।  वरना तो क्रिकेट वाले भला कब हिन्दी बोलते हैं।  क्रिकेट के फिल्म जैसे ही मनोरंजक व्यवसाय होने का प्रमाण यह है कि पर्दे के अभिनेता अभिनेत्रियों जहां कहीं मैदान में इनाम लेते हैं तो  अंग्रेजी में ही बोलते है।  उनकी तरह  मैदान के खिलाड़ी भी  पर्दे पर आकर अंग्रेेजी में बोलते है। जो क्रिकेट में हिट हुआ उसका किसी किसी तरह से फिल्म के साथ नाता जुड़ ही जाता है।  सुपर क्रिकेट स्टार और सुपर फिल्म एक्ट्रेस के बीच इश्क का प्रायोजन कर उसे भी भुनाने के अनेक प्रयास हम देख चुके हैं। 
       बाज़ार के उत्पाद बेचने के लिये फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्रियों के साथ क्रिकेट के खिलाड़ी भी पर्दे पर उतरते हैं।  प्रचार प्रबंधक भी इनके साथ ऐसे ही जुड़े रहते हैं जैसे कि यह उनके अपने नायक हों।  क्रिकेट के मैदान पर कंपनियों के विज्ञापन बोर्ड पूरी कहानी बयान करते हैं। इसे समझने वाला कोई पाठक अर्थशास्त्री होना चाहिये।  जब बीसीसीआई की क्रिकेट टीम कभी कभी लगातार हारने लगती है तब कुछ आम क्रिकेट प्रेमी चिल्लाते हैं कि ‘उस खिलाड़ी को हटा दो’, ’उसे कप्तानी से हटा दो’ या ‘‘इस बॉलर को टीम में क्यों नहीं लिया, उस बल्लेबाज को क्यों रख लिया’, तब हमें हसंी आती है।  अब इन आलोचकों को यह कौन समझाये कि अगर क्रिकेट के खिलाड़ियों का चयन आम लोगों की दृष्टि से होगा तो कंपनियों के उत्पाद कौन खरीदेगा और कौन बेचेगा? कोई खिलाड़ी अगर किसी विज्ञापन में बना हुआ है और टीम से हटा दिया जाये तो जो उत्पाद का नुक्सान होगा उसे कौन भरेगा? पता नहीं भारत के आम क्रिकेट प्रेमियों को यह कैसा भ्रम है कि क्रिकेट खेल उनकी वजह से चल रहा है? भले ही कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जो अब विशेषज्ञ बन गये हैं यह दावा करते हैं कि आम आदमी के लिये क्रिकेट खेला जा रहा है पर यह सच नहीं है। हां, कुछ क्रिकेट खिलाड़ी जरूर तारीफ करने लायक हैं जो कि मानते है कि  क्रिकेट खिलाड़ियों को अच्छा खेलना चाहिए ताकि दर्शकों का मनोरंजन हो।  स्पष्टतः वह इस तर्क को ही हवा देते हैं कि यह खेल नहीं वरन् मनोरंजन है। यह अलग बात है कि अगर उनसे कहा जाये कि यह मनोरंजन है खेल नहीं तो वह उखड़ भी सकते हैं।
       भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बिगड़ते हैं तो क्रिकेट में सबसे पहले बिगड़ते हैं।  जब बनाने की बात आती है तो भी क्रिकेट मैच दोबारा खेलने से ही शुरुआत होती है।  भारत में कुछ लोग दावा करते हैं कि क्रिकेट में रिश्ते बढ़ाने से भारत पाकिस्तान की दोस्ती बढ़ेगी।  हैरानी होती है!  यह नुस्खा बीस सालों में पांच दस बार आजमाया जा चुका है पर कभी परिणाम पर खरा नहीं उतरा।  कभी कभी संगीत और फिल्म में भी इस तरह के संपर्क जोड़कर संबंध मधुर करने की  बात कही जाती है।  यह दोनों ऐसे व्यवसाय है जिनमें पैसा खूब है।  जब पाकिस्तान से भारत का रिश्ता खराब होता है तो चोट इन्हीं दो क्षेत्रों में होती है।  पाकिस्तान क्रिकेट टीम के साथ मैच न खेलने के साथ उसके गायकों और हास्य कलाकारों को मुंबई से भगा दिया जाता है। 
       हमें इन चीजों से कोई लेना देना नहीं है पर  जब पाकिस्तान इन कदमों से हताश होता नज़र आता है उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं उसके यहां के गायकों, नायकों और खिलाड़ियों के अलावा अन्य व्यवसायी भी  इससे लाभान्वित होते हैं।  इससे यह प्रमाण मिलता है कि क्रिकेट और फिल्म एक जैसे ही व्यवसाय है।  ऐसे में अगर बीसीसीआई की टीम कभी पाकिस्तान से हारती है तो वैसे ही अफसोस नहीं होता जैसे किसी फिल्म के पिट जाने पर कोई चिंता नहीं होती।  जीत जाती है तो भी हमें खुशी नहीं होती क्योंकि किसी की फिल्म हिट हो तो हमें क्या मिलता है।  क्रिकेट से हमारा ही नहीं अनेक मित्रों का मोह इतना भंग हुआ है कि अब तो वह क्रिकेट का नाम नहीं लेते पर हम जैसे लेखक के लिये यह भूलना कठिन होता है कि इस खेल ने हमारे पूरे पंद्रह वर्ष बरबाद किये। अगर हम क्रिकेट नहीं देखते तो यकीनन बहुत बड़े लेखक होते। 
    पहले इस क्रिकेट ने दुःखी किया तो हमने मैच देखने बंद या कम किये पर अब तो समाचार हो या मनोरंजन चैनल वह कहीं न कहीं क्रिकेट का विज्ञापन कर रहा है।  पहले हम इच्छा से देखते थे पर अब यह जबरन हम पर थोपा जा रहा है।  पाकिस्तान से दोस्ती का तो नाम भर है, टीवी चैनलों के  विज्ञापन देखें तो पता चलेगा कि दुश्मनी को भुनाया जा रहा है।  ऐसे में चिढ आती है तब ऐसे व्यंग्य लिखने का मन करता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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8/20/12

लाचार लोगों की उम्मीद-हिंदी व्यंग्य कविताएँ (lachar logon ki umeed-hindi vyangya kavitaen or satire poem's)



कोई न कोई किसी का यहां सगा है,
फिर भी हर जगह दगा है
कहें दीपक बापू
हमारे पास नहीं वफा खरीदने की ताकत
बाज़ार में हर कोई ज्यादा दाम मांगने लगा है।
-------------
बरसात हो या सूखा
उनके घर दौलत से भर जाते हैं,
मदद के लिये कागजी काफिले चलतें,
पाने वाले मौत से पहले मर जाते हैं।
कहें दीपक बापू
काली माया ने बना दिये ढेर सारे महल
बसे जिसमें भलाई के व्यापारी
नाउम्मीद होती है फिर भी
लाचार लोग वहां हाजिरी बजाते हैं
---------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/2/12

फोकट में ईमानदारी-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (fokat mein imandari-a short hindi comedy satire or short story,hindi kahani)

                विद्यालय के संचालक ने प्राचार्य को बुलाकर कहा कि-‘‘देखो मैंने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भाग लेने का फैसला किया है। तुम अपने साथ शिक्षकों को मेरे साथ रैली में भाग लेने के लिये तैयार रहने के लिये कहो। विद्यालय के छात्रों के लिये देश में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के संबंध में विशेष ज्ञान देने का प्रबंध करो। मैं चाहता हूं कि मेरे साथ मेरे विद्यालय का नाम भी प्रचार के शीर्ष पर पहुंचे।’’
           प्राचार्य ने कहा-‘‘महाशय, आपका आदेश सिर अंाखों पर! मगर इसी अंादोलन की वजह से हमारे विद्यालय के शिक्षक अब जागरुक हो गये हैं। आप जितने वेतन की रसीद पर हस्ताक्षर करते हो उसका चौथाई ही केवल भुगतान करते हैं। वह चाहते हैं कि कम से कम आधी रकम तो दें। विद्यार्थियों के पालक भी तयशुदा फीस से अलग चंदा या दान देकर नाराज होते हैं। ऐसे में आप स्वयं भले ही इस आंदोलन में सक्रियता दिखायें पर विद्यालय की सक्रियता पर विचार न करें, संभव है यह बातें आपके विरुद्ध प्रचार का कारण बने।’’
संचालक ने कहा-‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, यह भ्रष्टाचार है! कतई नहीं, यह तो मेरा निजी प्रबंधन है। हम तो केवल सरकारी भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं!’’
            प्राचार्य ने कहा-‘हमारे पास कुछ मदों मे सरकारी पैसा भी आता है।’’
संचालक ने कहा-‘‘वह मेरा निजी प्रभाव है। ऐसा लगता है कि तुम देश का भ्रष्टाचार रोकने की बजाय उसकी आड़ में तुम मेरे साथ दाव खेलना चाहते हो! तुम मेरा आदेश मानो अन्यथा अपनी नौकरी खोने के लिये तैयार हो जाओ।’’
             आखिर प्राचार्य ने कहा-‘‘आपका आदेश मानने पर मुझे क्या एतराज हो सकता है? पर संभव है कि छात्रों के पालक अपने बच्चों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध तिरस्कार का भाव देखकर नाराज हो जायें। आप तो जानते हैं कि अधिकतर माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर बड़े पद पर पहुंचे। बड़ा पद भी वह जो मलाईदार हो। ऐसे में अगर उसकी निष्ठा कहीं ईमानदारी से हो गयी तो संभव है वह अधिक पैसा न कमा पाये। भला कौन माता पिता चाहेगा कि उसका बेटा मलाई वाली जगह पर बैठकर माल न कमाये। सभी चाहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार खत्म हो पर उनके घर में ईमानदार पैदा हो यह कोई नहंीं चाहता। कहंी ऐसा न हो कि हमारे इस प्रयास पर पालक नाराज न होकर अपने बच्चों को दूसरे स्कूल पर भेजना शुरु करें और आपकी प्रसिद्धि ही विद्यालय की बदनामी बन जाये।’’
             संचालक कुछ देर खामोश रहा और फिर बोला-‘‘तुम क्या चाहते हो मैं भी वहां न जाऊं?’
प्राचार्य ने कहा-‘‘आप जाईये, पर अपने स्कूल का परिचय न दें। आप सारे देश में ईमानदारी लाने की बात अवश्य करें पर उसे अपने विद्यालय से दूर रखें।’’
           संचालक खुश हो गया। प्राचार्य बाहर आया तो एक अन्य शिक्षक जिसने दूसरे कमरे में यह वार्तालाप सुना था उससे कहा-‘‘आपने मना किया तो अच्छा लगा। बेकार में हमारे हिस्से एक ऐसा काम आ जाता जिसमें हमें कुछ नहीं मिलता। यह संचालक वैसे ही छात्रों से फीस जमकर वसूल करता है पर हम शिक्षकों को देने के नाम पर इसकी हवा निकल जाती है। वैसे आपके दिमाग में ऐसा बोलने का विचार कैसे आया?’’
         प्राचार्य ने कहा-‘‘अपनी जरूरतें जब पूरी न हों तो ईमानदारी की बात करना भी जहर जैसा लगता है। वैसे फोकट में भ्रष्टाचार का विरोध करना मैं भी ठीक नहीं समझता। खासतौर से जब इस आंदोलन को चलाने वाले घोषित रूप से चंदा लेने वाले हों। हमें अगर कोई पैसा दे तो एक बार क्या अनेक बार ऐसे आंदोलन में जाते। फोकट में टांगें तोड़ना या भाषण देना तो तब और भी मुश्किल हो जब हमें यही अपनी मेहनत का पैसा कम मिलता है।’’
------------------
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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11/5/11

एक पाठ ने ही अन्ना हजारे के ब्लॉग को उखाड़ दिया-हिन्दी लेख (one post destroyd anna hazare's blog-hindi lekh article)

                अन्ना हजारे ने अपना ब्लॉग बंद करने का निर्णय लिया है। वैसे तो इस देश में बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने उनका ब्लॉग देखा होगा क्योंकि उस पर पाठ प्रकाशित होता ही था कि प्रचार माध्यम उसे अपने मंच पर मुख्य समाचार की तरह उपयोग करते रहे जिसकी वजह से उसको देखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। ऐसे में ब्लॉग होने का प्रभाव बाजार समर्थित प्रचार माध्यमों पर ही पड़ेगा जिनके लिये सनसनी फैलाने वाला एक स्त्रोत कम हो जायेगा। वैसे यहां भी स्पष्ट कर दें कि इस देश में गहरा चिंत्तन करने वाले पहले अन्ना हजारे की टीम के सदस्यों पर वर्तमान बाज़ार से समर्थित होने का आरोप लगाते थे तो अब उनको अन्ना का संपूर्ण आंदोलन ही प्रायोजित दिख रहा है। श्री अन्ना हजारे का ब्लॉग बंद होने का फैसला उनकी दृढ़ मानसिक शक्ति पर प्रश्न खड़े करेगा इसमें संशय नहीं है।
         आखिर वह कौनसा पाठ है जिसमें ऐसा कुछ आ गया कि उनको लगा कि यह ब्लॉग बंद करना ही श्रेयस्कर है? अन्ना को अपने प्रचार के लिये वैसे ही किसी ब्लॉग की आवश्यकता नहीं थी तब क्या बाज़ार के प्रायोजन की वजह से उन्होंने इसे बनाया। दरअसल वर्तमान बाज़ार जिसे भी नायक बनाता है उसका ब्लॉग अवश्य फैशन के तौर पर जरूर बनवाता है। इससे वह एक तीर से दो शिकार करता है। एक तो नई पीढ़ी को अपने नायक की अंतर्जालीय छवि से घेरता है दूसरा यह कि टेलीफोन कंपनियों के कनेक्शन कम होने की संभावना बच जाते हैं जिनका खतरा उनको हमेशा बना रहता है। सीधी बात कहें तो अन्ना हजारे के पीछे कहीं न कहीं बाज़ार का प्रायोजन है और इसी कारण उनके यह ब्लॉग बना भी होगा। इसका लेखक भी उनका सहयोगी था जिसको वह अपनी बात लिख कर देते और वह उसे चिट्ठी के साथ टंकित कर प्रकाशित करता था। अनेक पाठ चर्चित हुए। जब अन्ना मौन थे तब ब्लॉग के माध्यम से वह जनता से जुड़े रहे। अब उनके ब्लॉगर सहयोगी ने उनकी एक अहस्ताक्षरित चिट्ठी के साथ एक पाठ प्रकाशित किया जिसमें अन्ना टीम के सदस्यों को अलोकतांत्रिक बताते हुए टीम में सदस्यों में बदलाव की बात कही है। अन्ना ने अपने ब्लॉगर से सहमत होने की बात से अब इंकार करते हुए बताया कि वह अपने विचार कहीं लिख लेते थे। एक समय उन्हें अपनी टीम के बारे में ऐसा विचार आया था तो लिख लिया पर उसे प्रेषित करने के लिये ब्लॉगर को नहीं दिया। उस ब्लॉगर को केवल हस्ताक्षरित पत्र प्रकाशित करने का अधिकार दिया था। अगर उनका यह स्पष्टीकरण सही माना जाये तो लगता है चूंकि वह ब्लॉगर उनका निकटस्थ है इसलिये ऐसा कागज उसके पास रह सकता है भले ही उसे प्रकाशन का अधिकार न मिला हो। अन्ना का यह विचार उसने अनाधिकार छापा है-यही स्पष्टीकरण अन्ना हजारे साहिब ने दिया है।
              गंभीर चिंतकों की नज़र में अन्ना ने पहली ऐसी रणनीतिक गलती की है जो उनके व्यक्तित्व में गिरावट दर्ज करेगी। जब देश में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात आती है तब अन्ना हजारे को एक महानायकत्व का दर्जा देने का प्रयास प्रचार माध्यम करते हैं। जब तक आंदोलन किनारे पर था तब लोगों ने उसका अधिक अध्ययन नहीं किया और उस समय अन्ना सारे निर्णय स्वयं करते हुए एक चतुर व्यक्ति लगे। जब यह लोगों की समंदरनुमा भीड़ में आया तब धीरे धीरे लगा कि अन्ना हजारे एक ऐसा शीर्षक है जिसमें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अनेक उपशीर्षकों के साथ एक बड़ा पाठ होगा। मतलब अन्ना हजारे एक नाम भर है। बाज़ार से प्रायोजित होने के प्रत्यक्ष प्रमाण भले न हो पर अन्ना टीम के सभी वरिष्ठ सदस्य ऐसे स्वयंसेवी संगठनों के कर्ताधर्ता हैं जो अपने कथित सामाजिक लक्ष्यों के लिये राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार से दान या चंदे के रूप में धन प्राप्त करते हैं। तय बात है कि बाज़ार का सामाजिक उद्देश्य लोगों को अपने हित में साधे रहना होता है। कम से कम आज के आधुनिक युग में कोई भी व्यवसायिक परिवार, संगठन या समूह धर्म के नाम दान या चंदा नहीं देता जब तब उसका कोई आर्थिक हित न पूरा होता हो। ऐसे में अन्ना की टीम के सहयोगी पेशेवर समाज सेवक हैं और उनसे यह अपेक्षा करना कि वह अपने चंदादाताओं का ध्यान नहीं रखेंगे यह सोचना गलत होगा।
          बहरहाल अन्ना के सहयोगी ब्लॉगर ने अन्ना टीम के उन्हीं सहयोगियों के बारे अन्ना के ही ऐसे विचार प्रकट किये जो प्रचार माध्यमों में समाचारों के दौरान उनकी मानसिक हलचल को बयान करते थे। हस्ताक्षर नहंी है इससे यह तो माना जा सकता है कि उनमें निर्णायक तत्व नहीं है पर इतना तय है कि उनके सहयोगियों की स्थिति अब डांवाडोल हो रही है। यह सच है कि मानसिक हलचल के समय विचारों का उतारचढ़ाव आता है। उनको स्थिर मानकर उन पर प्रतिक्रिया देना तब तक ठीक नहीं है जब उनमें व्यक्ति का निर्णायक तत्व प्रमाणित नहीं है। हम अन्ना साहब की सफाई को स्वीकार करते हैं पर ब्लॉग बंद करने का निर्णय इस बात को दर्शाता है कि वह डर गये हैं। जिन सहयोगियों की आलोचना ब्लॉग में है वह अगर तत्काल स्वयं ही अन्ना टीम से हट जायें तो उनका आंदोलन हाल ही टॉय टॉय फिस्स हो जायेगा। बाजार से पैसा जुटाने वाले उनके वर्तमान सहयोगियों को संगठित प्रचार समूह का समर्थन भी इसलिये मिला है क्योंकि कहीं न कहीं से उनको आपने धनदाताओं से ऐसे निर्देश मिले हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जनमानस में बना रहना चाहिए। इसके अलावा अन्य ने महानायकत्व की ऐसी छवि बना ली है जिसके निकट अन्य व्यक्तित्व पनप नहीं सकता। उन्होंने करीब करीब देश के सारे बड़े संगठनों से दूरी बना ली है। ऐसे में उनकी टीम के चार बलशाली सदस्य अगर उनका साथ छोड़ दें तो फिर अन्ना के लिये रालेगण सिद्धि से दिल्ली आना भी कठिन हो जायेगा। देश में सक्रिय बौद्धिक वर्ग तथा स्थापित सामाजिक संगठन अब अन्ना हजारे के आंदोलन को सक्रिय सहयोग  शायद ही दें।
         ऐसे में अपनी टीम के इन सदस्यों को प्रसन्न करने के लिये अन्ना हजारे ने ब्लॉग बंद करने का फैसला सुनाया पर इससे रूप से यह अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भी हमारे सामने आ गया है कि अन्ना अपने आंदोलन की स्थिति को जानते हैं। अपनी गांधी जैसी छवि बनते देखकर वह खुश हो रहे हैं और उनको लगता है कि उनकी वर्तमान टीम ही इसमें सबसे अधिक मददगार है। जहां तक आंदोलन के नतीजों का सवाल है इस पर हम पहले भी बहुत कुछ लिख चुके हैं। गांधीजी ने हिंसा होने पर अपना एक आंदोलन वापस ले लिया था पर इससे उनकी छवि एक अहिंसक रूप में बढ़ी थी जबकि अन्ना साहेब ने अपना ब्लॉग लेकर यह साबित किया कि एक पाठ ने ही उनके ब्लॉग को उखाड़ दिया जो कि उनकी मानसिक हलचल का परिणाम रहा।
अन्ना हज़ारे का ब्लॉग,अन्ना हजारे का ब्लॉग,राजू पारुलकर ,anna hazare blog,anna hazare ka blog,anna anti corruption mission and agitation,bharashtachar virodhi andolan
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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8/15/11

भ्रष्टाचार और चंदा-हास्य कविता (bharshtachar or corruption-hasya kavita or comic poem)

समाज सेवक को धनपति ने
अपनी शराब पार्टी में बुलाकर
अकेले में कहा
‘‘यार, अपनी कमाई बहुत हो रही है,
पर मजा नहीं आ रहा है,
लोगों के कल्याण के नाम पर
तुम्हें चंदा देते हैं
गरीबों की भीड़ कम नहीं हुई
कभी लोग भड़क न उठें
यह डर सता रहा है,
इसलिये तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाओ,
यहां जिंदा कौम रहती है यह
संदेश विदेशों में फैलाओ,
बस इतना ख्यान रखना
भ्रष्टाचार के खिलाफनारे लगाना,
किसी पर आरोप लगाकर
उसकी पहचान मत बताना,
तुम तो जानते हो
हमारा काम बिना रिश्वत
दिये बिना चलता नहीं,
टेबल के नीचे से न दो पैसे
तो किसी का पेन काम के लिये मचलता नहीं,
फिर कई बड़े लोग
तुम्हें जानते हैं,
उनका भी ख्याल रखना
तुमको वह अपना सबसे बड़ा दलाल मानते हैं
इसलिये
हवा में भाषणबाजी कर
अपना अभियान चलाना,
हमें भी है विदेश में
अपने देश की जिंदा पहचान बताना,
अब तुम रकम बताओ,
अपना चेक ले जाओ।

समाज सेवक ने चेक की रकम देखी
फिर वापस करते हुए कहा
‘यह क्या रकम भरते हो,
लड़ा रहे हो उस भ्रष्टाचार नाम के शेर से
जिसका पालन तुम ही करते हो,
पहले से कम से कम पांच गुना
रकम वाला चेक लिखो,
कम से कम हमारे सामने तो
ईमानदार दिखो,
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए
जब मैदान में आयेंगे,
भले किसी का नाम लें
पर हमारे कई प्रायोजक
डरकर साथ छोड़ जायेंगे,
बाल कल्याण और स्त्री उद्धार वाले हमारे धंधे
सब बंद हो जायेंगे,
भ्रष्टाचार विरोधी होकर
हमारी कमाई के दायरे तंग हो जायेंगे,
बंद हो जायेगा
शराब और जुआ खानों पर जाना,
बंद हो जायेगा वहां का नजराना,
जब चारों तरफ मचेगा कोहराम,
तुम्हारा बढ़ जायेगा दो नंबर का काम,
इसलिये हमारा चंदा बढ़ाओ,
वरना भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
हम कतई न उलझाओ।’’
------------
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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8/2/11

नार्वे में आतंकवादी हमला-भारतीय संदर्भों का विचार निरर्थक

             नार्वे में बहुसंस्कृतिवादी विरोधी एक व्यक्ति ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर अनेक लोगों का मार डाला। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों से प्राप्त जानकारी कुछ हैरान करने वाली है। कम से कम उससे एक बात प्रमाणित होती है कि आज के आधुनिक संचार माध्यमों के प्रसारणों और प्रकाशनों का प्रभाव आज की नयी पीढ़ी पर हाल होता है। जिस तरह उसने भारत के बारे में विचार व्यक्त किये हैं उससे साफ लगता है कि वह प्रचार माध्यमों के प्रसारणों और प्रकाशनों से प्रभावित है। साथ ही यह भी प्रमाणित होता है कि वह भारतीय क्षेत्र की धार्मिक, भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, भाषा, तथा सांस्कृतिक विविधता से परिचित नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि वह भारत की उस अध्यात्मिक शक्ति से तो उस बिल्कुल अनभिज्ञ जिसकी वजह से यह देश विश्व का अध्यात्मिक गुरू कहा जाता है।
          मूल बात यह है कि उसने अपनी जिस विचाराधारा के लिये यह कांड किया वह आगे कतई नहीं बढ़ने वाली। फिर उसने मार्क्सवादी तथा अन्य धर्मों के विरुद्ध जो अपनी कटु अभिव्यक्ति दी है वह प्रभाहीन तथा तर्कहीन है। मुख्य बात यह है कि आप जब किसी भी व्यक्ति, समूह या विचाराधारा की आलोचना करते हैं तो आपको ठीक उसके विपरीत अपनी व्यक्तिगत कार्यशैली और व्यवहार से अपनी सिद्धि साबित करनी होती है। सीधी बात कहें कि जब आप किसी व्यक्ति, समूह या विचाराधारा पर क्रूरता, हिंसक कायरता और और स्वार्थ सिद्ध होने का आरोप लगाते हैं तो आपको अपनी जीवन शैली से अपने अंदर की उदारता, अहिंसक, वीरता और परोपकार की भावना को बाहर लाकर प्रमाणित करना चाहिए। इसके विपरीत अगर आप अपने विपरीत चलने वालों का ही अनुसरण करते हैं तो फिर इसका आशय यह है कि आप भी उतने ही पाखंडी हैं जितना आप अपन विरोधियों के बारे में कह रहे हैं। उस व्यक्ति न हिंसा कर यही काम किया है। उसने किसी को निंदनीय कहा पर जिस मार्ग पर चला तो वह भी क्रूरता, मूर्खता तथा दंडनीय श्रेणी में ही आता है।
          हम भारतीय इतिहास की बात करें तो क्षुद्र स्वार्थों की खातिर राजकीय अहंकार की वजह से यहां अनेक युद्ध हुए हैं। अनेक राजाओं ने आपस ंमें केवल इसलिये युद्ध किये क्योंकि वह एक दूसरे का वैभव सहन नहीं कर सकते थे। इतना ही नहीं इन्हीं राजाओं की वजह से प्रजा त्रस्त भी रही और इसी कारण यहां राजनीतिक अशांति होने से आर्थिक, शैक्षणिक सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में हुए विकास का प्रभाव परिलक्षित नहीं हुआ-यह बात हम अभी तक ज्ञात इतिहास के आधार पर ही कह रहे हैं।
      मुगलकाल में भारतीय समाज संक्रमण काल से गुजरा पर उसी समय हमारे हिंन्दी साहित्य का भक्ति काल का दौर भी चला। उस समय धाार्मिक रूप से देश में बदलाव आया। मुगलकाल में सांस्कृतिक हªास होने की बात कही जाती है पर क्या यह सच नहीं है कि उस समय भी उसका हिंसा से प्रतिकार करने की बात सामने नहीं आयी बल्कि उस समय के शाब्दिक ऋषियों ने जो रचनाऐं की वह आज हमारे अध्यात्म की ऐसी अनमोल धरोहर बनी जिसका लोहा आज पूरा विश्व मानता है। इसी मुगल काल में तुलसीदास जी की महान रचना ‘रामचरितमानस’ प्रकट हुई और जिसका प्रभाव हम आज तक देख रहे हैं। हमारा मानना है कि रामचरित मानस के व्यंजना विधा में कहे गये कुछ दोहों पर कुछ लोग भले ही नाकभौं सिकोड़ें पर सच बात यह है कि उदारता, चिंतनशीलता और धार्मिक सहिष्णुत वाला जो हम अपना आज का समुदाय देख रहे हैं वह उनकी रचना से सकारात्मक रूप से प्रभावित हुआ है। उस समय भारतीय आस्थाओं पर आक्रमण को नाकाम करने में भक्ति काल के शाब्दिक ऋषियो का-कबीर, तुलसी, मीरा, सूरदास, रहीम तथा अन्य महान रचनाकार-महान योगदान रहा है और उनकी रचनाओं में कहीं भी हिंसा का तत्व शामिल नहीं है। सच बात तो यह है कि इन लोगों ने किसी धार्मिक, सांस्कृतिक तथा वैचारिक आक्रमण का प्रतिकार करने का लक्ष्य मानकर रचनायें नहीं की बल्कि समाज में चेतना लाने के लिये अपनी अभिव्यक्ति से ऐसा मार्ग दिखाया जिसमें राजकीय गतिविधियों की गंदगी से उनको दूर रखा।
        वैसे कहीं भी धार्मिक सांस्कृतिक या वैचारिक आक्रमण की बात वास्तव में एक भ्रम है पर फिर भी हमें अपने समाज की चिंतन क्षमता बनाये रखने के प्रयास हमें भक्तिकाल के रचनाकारों से सीखना चाहिए। जब हम यह मानते हैं कि हमारे समाज पर कहीं से धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा वैचारिक हमला हो रहा है तब उसका मुकाबला बुद्धि और विवेक से ही संभव है हिंसा से नहीं। भारत के मध्ययुगीन इतिहास में ही हिन्दी के स्वर्णकाल का चलना इस बात का प्रमाण है कि ऐसे संक्रमण काल में रचनाकार, कलाकार तथा अध्यात्मिक पुरुष ही समाज की रक्षा कर सकते हैं। यह अलग बात है कि आज के समाज के शिखर पुरुष किसी ऐसे रचनाकार या कलाकार को प्रश्रय नहीं देते जो उनका दरबारी न हो।
         नार्वे के आक्रमणकारी ने भारतीय समाज की स्थिति को रेखांकित किया है पर उसे इतिहास की जानकारी नहीं है। संभव है भारतीय समाज से जुड़े कुछ लोग उससे हमदर्दी दिखायें पर यह अज्ञान का प्रमाण है। हम यह दावा भले ही करें कि हमारे समाज की रक्षा तलवार वीरों ने की है पर सच यही है कि अध्यात्मिक पुरुषों के अथक प्रयासों से आज हम वर्तमान समाज को इतना सभ्य और शक्तिशाली देख रहे हैं पर जिस तरह विदेशी विचाराधाराओं को स्वीकार करने की मनोवृत्ति दिख रही है वह कोई देश के लिये अत्यंत दुःखदायी है। एक मजेदार बात यह है कि नार्वे के उस आक्रमणकारी का मानना है कि भारत से बाहर रह रहे अप्रवासी नागरिक बहुसांस्कृतिकवाद के उस संकट को समझ सकते हैं जो देश में रह रहे लोग समझ नहीं रहे। उसकी बात पर यकीन किया जाये तो यह कहना ही पड़ता है कि भारत से बाहर रह रहे लोग अपनी देश की धार्मिक और सांस्कृतिक शक्ति को नहीं जानते। वह धरा से कटे हुए हैं इसलिये पश्चिम में चल रहे धार्मिक संघर्षों में भारतीय संदर्भ ढूंढ रहे हैं। हम देखें तो इतिहास बताता है कि पश्चिम में धर्म के आधार पर संघर्ष चलता रहा है। पश्चिम और मध्यएशिया के देशों के बीच धार्मिक विवाद अभी का नहीं वरन् बहुत पुराना है। पहले परिवहन और संचार के साधन विकसित नहीं थे इसलिये भारतीय जनमानस उससे अनभिज्ञ रहा है पर जैसे उनका विकास हुआ और फिर भारतीय शिक्षित वर्ग दोनों ही विचारधाराओं से जुड़ा वैसे वैसे वही वैचारिक विवाद भी यहां आ गया है।
अब भारत में वैचारिक जगत में यह संघर्ष इसलिये चलता दिख रहा है क्योंकि चाहे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी दोनों ही प्रकार के विचारक विदेशियों के इतिहास में अपने देश के संदर्भ ढूंढ रहे हैं। सामान्य लोगों में उनका प्रभाव इतना ही होता है कि वह चर्चाओं में उनके तथ्यों का उल्लेख करते हैं पर व्यवहार में सब जानते हैं कि स्वार्थों की वजह से सबसे संबंध रखना पड़ता है। इसलिये सामान्य जीवन में आमतौर से लोग धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक तथा भाषाई भेदों से दूर ही रहते हैं।
       दरअसल इस लेखक को यह प्रेरणा अपने ही लेख से मिली। हुआ यूं कि हिंसा के अव्यवाहारि होने के संबंध में लिखे एक लेख को नार्वे की हिंसा के बाद कुछ लोगों को पढ़ते हुए देखा। यह लेख नीचे प्रस्तुत है और अब भी प्रासांगिक है। मायावी लोग हिंसा के लिये प्रेरित करते हैं पर उनका लक्ष्य वह नहीं होता जो बताते हैं। यह अलग बात है कि कमजोर दिमाग वाले लोग उनके प्रभाव में आ जाते हैं। मूलतः हिंसा कभी निर्णायक नहीं होती और जिन लोगों को लगता है कि यह सब बकवास है उनको भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। हम तो यह मानते हैं कि नार्वे की आतंकवादी घटना में भारतीय संदर्भ आये हैं पर इतना तय है कि इसका प्रेरक हमारा दर्शन नहीं है।
हिंसा में उद्भव है तो पराभव भी-हिन्दी लेख (gandhiji ki ahinsa niti-hindi article)
            जब किसी व्यक्ति के हाथ में हथियार होता है तो वह उसे चलाकर दिखाना चाहता है कि वह एक योद्धा है। उसका मन स्वाभाविक रूप से हिंसा के लिये प्रवृत्त होता है। जब लोग उससे डरते हैं तो उसे विजय की अनुभूति होती है पर दरअसल ऐसा करके वह अपने लिये संकट बुलाता है। जब उसे हिंसा के लिये तत्पर देखकर भीड़ में लोग चुप हैं तो उनमें उसे जैसे ही कुछ लोग भी जरूर होंगे जो यह हथियार जुटाकर उसे चुनौती देने का अपना सोच बनायें। ऐसा करके वह अपने विरोधी बना रहा होता है।
हिंसा चाहे हाथ से या वाणी से, तात्कालिक रूप से लाभदायक भले लगे कालांतर में अपने पतन का कारण भी होती है।
          इसे देश में बुद्धिजीवियों में हिटलर और गांधीजी को लेकर हमेशा बहस चलती है। अनेक लोग गांधी को अहिंसा नीति का यह कहते हुए विरोध करते हैं कि उससे समाज की रक्षा नहंी हो सकती पर जब देश में एक संविधान और सेना है तो समाज को हिंसा से रक्षित बनाने का ख्याल ही बेमानी है। दरअसल गांधी ने अहिंसा के रूप में कोई नया विचार व्यक्त नहीं किया था क्योंकि वह भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में सदियों से मौजूद है। उन्होंने आधुनिक सभ्यता- जिसमें देशों के गठन और उनके संविधानों के कारण समाजों वाद विवाद से पनपने वाली हिंसक संघर्षों की परंपरा कम हो रही थी-में अहिंसा की राजनीति करना सिखाया।
पहले हिटलर की बात करें। हिटलर का अंत क्या हुआ? उसने आत्महत्या की थी। उसने अपने देश के लिये अनेक युद्ध किये पर उससे अपने देश को क्या मिला? एक विभाजन! हिटलर मर गया उसके बाद भी जर्मनी खड़ा रहा और अब तो दोनों जर्मनी भी एक हो गये। उसी हिटलर को आज जर्मनी में नफरत से देखा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जो हिटलर की चाल चलेगा, वैसी ही मौत मरेगा।
वैसे तो गांधीजी के इस देश में भक्त बहुत हैं पर वह अहिंसा की उनकी नीति की व्याख्या कम ही लोग कर पाये हैं। वह उनकी नीतियों की बात तो करते हैं पर उसके परिणामों का सकारात्मक पक्ष नहीं रखते। गांधीजी ने अंग्रेजों को मानसिक रूप से इतना तंग किया होगा इसका अंदाजा उनके भक्त भी नहीं लगा सकते। एक तरफ पूरा विश्व गांधी जी को सराहता है और हिटलर के नाम से हर कोई नफरत करता है। सच तो यह है कि हिंसा या हिंसक आंदोलन करना हमेशा ही विरोधियों और शत्रुओं को जीत का आसानी से अवसर देना ही है। किसी वस्तु या बहिष्कार की अहिंसक कोशिश और हिंसक कोशिश में अंतर होता है।
            गांधी जी ने लोगों को विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने की अपील की। तब अनेक लोगों ने अपने ही घर से विदेशी वस्तुऐं निकालकर आग के हवाले की। इतिहास में ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता कि उस समय लोगों ने विदेशी वस्तुओं के विक्रय केंद्र जलाये या उनके इस्तेमाल करने वालों को पीटा। इस बात का भी उल्लेख नहीं मिलता कि कितने लोगों ने तब भी विदेशी वस्तुओं का उपयोग जारी रखा। मान लीजिये अगर उस समय गांधी समर्थकों ने हिंसा का सहारा लिया होता तो क्या होता? प्रचार माध्यम बता रहे होते कि किस तरह अभी भी ऐसे लोग हैं जो विदेशी वस्तुओं का उपयेाग कर रहे हैं? हो सकता है कि कुछ यह भी कहते कि ‘देखिये गांधी जी को जनता करारा जवाब’।
       उस महान विभूति को अपने ही देश में अप्रासंगिक बनाने के लिये अनेक विदेशी ताकतें सक्रिय हैं और उनका मुख्य उद्देश्य गांधीजी को विश्व मसीहा को तोड़ते रहना है। हमारे यहां के अनेक बुद्धिजीवी हिटलर की प्रशंसा करते हुए नहीं अघाते। एक आत्महत्या करने वाला व्यक्ति उनका प्रेरक है, तब उनकी बुद्धि की स्तर समझा जा सकता है। हिटलर कभी विजेता न बन सका और गांधी जी के नाम की प्रसिद्धि इतनी है कि उसके सामने जीत हार का विचार ही नहीं आता। हिंसा में उद्भव है तो पराभव भी है। अहिंसा की राजनीति भी कोई ऐसे वैसे लोग नहीं कर सकते। जिनके पास बुद्धि, बल और धैर्य है उन्हीं के बूते ही इस पथ पर चलना।
हमारे यहां अनेक आंदोलन होते हैं जिनके व्यक्ति, फिल्म, वस्तु, समाज या भाषा के बहिष्कार का आह्वान होता है। उनकी सबसे बड़ी कमी यही होती है कि वह हिंसा से ओतप्रोत होकर जनसमर्थन से दूर हो जाते हैं। ऐसे आंदोलन करने वाले अपने बहिष्कार के साथ दूसरे पर दबाव डालने लगते हैं। तय बात है कि हिंसा होती है। इस कारण सैद्धांतिक रूप से सहमत होने वाले भी दूर हो जाते हैं और उससे विरोधियों को भी अवसर मिल जाता है। तब यह बात दब जाती है कि कितने लोगों ने बहिष्कार किया बल्कि कितने लोगों ने नहीं किया यह सिद्ध कर आंदोलन की हवा निकाल दी जाती है।
         सच तो यह है कि इस देश में जो हिंसक आंदोलन चल रहे हैं उनकी सफलता इसलिये संदिग्ध रही है क्योंकि वह हिंसक हो उठते हैं-दूसरे शब्दों में कहें तो येनकेन प्रकरेण उनकी विरोधी ही उनका लाभ उठाते हैं। भारत का जनमानस कभी हिंसा का साथ नहीं देता, यही कारण है कि इस देश पर विदेशी काबिज हो गये क्योंकि देश के शिखर पुरुष आपस में हिंसा करते थे और जनता का समर्थन कम हो गया होगा।
अंतिम बात यह कि हिंसा चाहे तलवार से हो वाणी से दोनों ही स्वयं के लिये खतरनाक है। किसी के लिये अभद्र और आक्रामक शब्द लिख कर हम यह सोचकर भले ही प्रसन्न हों कि हमने अपनी भड़ास निकाल ली पर अंततोगत्वा वह अपने लिये ही खतरनाक है। तब आपके अपने भी यह सोचकर डर जाते हैं कि कहीं ऐसे ही शब्दों का प्रयोग कहीं उनके विरुद्ध भी न करने लगें। हिटलर पराजित हुआ, उसने आत्म हत्या की क्योंकि वह हिंसा में लीन था जबकि गांधीजी ने अपना जीवन सहजता से व्यतीत किया क्योंकि उनको अपने प्रति कहीं भी हिंसा का भय नहीं था। नाथूराम गोडसे उनके शरीर को नष्ट कर सका पर उनके व्यक्तित्व को नहीं जो हमेशा ही सूरज की तरह चमकता रहने वाला था। भले ही कुछ लोग इस बात को न माने पर सच यह है कि उनकी अहिंसा की राजनीति आज के समाज के लिये उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उस समय थी। गांधीजी को संत कहा जाता है पर इसका अर्थ कतई नहीं है कि उनमें राजनीतिक चतुराई का अभाव था, और उनके द्वारा चलाया गया अहिंसक आंदोलन इसी का ही प्रमाण है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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7/19/11

मनुष्य की स्मृतियां-हिन्दी लेख और कविता (manushya ki smrityan-hindi article and poem)

               स्मृति मनुष्य का गुण है तो दोष भी है। हम स्मृतियां तो चयन करके अपने मस्तिष्क में नहीं रख सकते। अगर किसी ने प्यार किया है तो वह भी स्मृति बनेगा तो किसी ने गाली दी है वह भी स्मृति में अपना स्तंभ बनायेगी। जितनी स्मृतियां मानस पटल पर होंगी उतना ही अधिक ंिचंतन होगा। कालांतर में यह चिंताओं का पिता बन जाता है।
               हमारा मस्तिष्क स्मृतियों का भंडार है। वही उसमें चिंतन और चिंताओं की संवाहक हैं। कुछ विद्वासन मनुष्य में स्मृति का गुण होना अच्छी बात मानते हैं पर कुछ दार्शनिक इस विशेषता को दुर्गुण भी मानते हैं। जिन स्मृतियों से देह में रोमांच पैदा होता है वह अच्छी लगती हैं पर जिनसे निराशा और अवसाद की धारा बहती हैं उनको भुलाना भी कठिन लगता है। मुश्किल यह है कि मनुष्य यह तय नहीं करता कि वह कौनसी स्मृति भुलाये और किसे याद रखे। स्मृतियों पर उसका नियंत्रण नहीं है।
             वैसे कष्टकारक तो वह भी स्मृतियां हैं जिनमें हमें मिली प्रसन्नता का इतिहास दर्ज है। उन खुशी के पलों का दोहराव न होना भी बुरा लगता है। कुल मिलाकर स्मृति मनुष्य की पहचान है पर वह उसकी शक्ति और कमजोरी भी है।
स्मृति पर प्रस्तुत है यह कविता
-----------
हृदय में स्थित स्मृतियां
कभी कभी आंखों के सामने
घूमती लगती हैं,
जिनमें मिलन है तो विरह भी है,
प्रेम भी है, घृणा भी है,
आशा है तो निराशा भी है,
मान है तो अपमान भी है
व्यथित पलों को भुलाना आसान नहीं है
फिर खुशनुमा अहसासों के
पुनः आगमन की प्रतीक्षा में
आंखों भी थकने लगती हैं।
यूं ही स्मृतियां हमेशा ही
मन को विचलित करती हैं।

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6/30/11

चाणक्य नीति-प्रतिदिन एक श्लोक नहीं तो आधे का ही अध्ययन करें

            भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में अनेक ग्रंथ हैं। अक्सर लोग कहते हें कि सभी को पढ़ना मुश्किल है या वह इतने बड़े हैं कि उनका अध्ययन करने का हमारे पास समय नहीं है। कुछ लोग तो भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनेक ग्रंथों का होना भी दोषपूर्ण मानते हैं । उनका कहना है कि जिस तरह अन्य धर्मों की तरह हमारे धर्म एक किताब होती है उसी तरह हमारे धर्म की भी होती तो समाज के विचारों में इतना विरोधाभास नहीं होता। दरअसल यह सब अपने अज्ञान तथा आलस्य को छिपाने के लिये पैदा किये गये तर्क हैं। अनेक विद्वान यह बात कह चुके है कि समय मिले तो अन्य ग्रंथों का अध्ययन किया जाये वरना तो चारों वेदों का सार श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी ने व्यक्त कर दिया है। जिसे पढ़कर जीवन और परमात्मा के रहस्य को समझा जा सकता है। उसमें भगवान श्रीकृष्ण जी ने वेदों में स्वर्ग से प्रीति रखने वाले संदर्भों को स्पष्ट रूप से खारिज करते हुए अन्य सामग्री का संक्षिप्त और सार गर्भित संदेश प्रस्तुत किया है। अगर श्रीमद्भावगत गीता का एक श्लोक भी प्रतिदिन कोई पढ़ा जाये तो वह तत्वज्ञान को समझ सकते हैं। श्रीमद्भागवत गीता विश्व का अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान भी है। जिन लोगों को अध्यात्म में रुचि है वह उसका अध्ययन किये बिना नहंी रह सकते। कई लोग तो प्रतिदिन एक पाठ तो कई कुछ श्लोक पढ़कर उसे समझने का प्रयास करते हैं।
       चाणक्य नीति में कहा गया है कि
          -----------------
          श्लोकेन वा तदर्थेन पादेनैकाक्षरेण वा।
         अबन्ध्यं दिवसं कुर्याद् दानाध्ययन कर्मभिः।।
           ‘‘एक श्लोक का अध्ययन और मनन अथवा आधे श्लोक अथवा एक पद अथवा एक अक्षर का ही नित्य स्वाध्याय करना चाहिए।’’
      मुख्य बात मानव हृदय की है। मन में यह विचार होना चाहिए कि हम अपने अंदर बाहर के विकारों को किसी तरह बाहर निकालें। भारतीय अध्यात्म में श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन इसलिये महत्वपूर्ण बताया गया है कि उसमें सांसरिक विषयों की चर्चा कदापि नहीं है। उसके अध्ययन करने पर अन्य विषयों से ध्यान स्वतः हट जाता है और इस तरह पाठक के अंदर नयी स्फूर्ति और नये विचार पैदा होते हैं। समय न हो तो भले ही उसका एक श्लोक रोज पढ़ें उससे भी ज्ञान प्राप्त होता है।
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6/11/11

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-ऊंचे पद से गिरने का भय पतन का कारण बनता है(kautilya ka arthshastra-unche pad se girane ka bhay patan ka karan)

          यह संसार बड़ा विचित्र है। हर मनुष्य यह इच्छा करता है कि वह अपने स्वाजातीय बंधुओं में महान कहलाये। इसके लिये वह धन, प्रतिष्ठा, उच्च पद और शारीरिक शक्ति का संचय करता है ताकि वह अपने निकटस्थ मानवीय समाज पर शासन कर सके। सभी लोग उसके सामनेे ऐसे पेश आयें जैसे कि प्रजा राजा के समक्ष पेश आती है। पूज्यता का यह भाव उसे संसार के ऐसे कर्मों में लिप्त कर देता है जो पहले उसके उत्थान और बाद में पतन का कारण बनते है। मूलतः यह स्थिति राजस भाव वाले लोगों में देखी जाती है। राजस भाव वाले लोग समाज पर नियंत्रण कर अपनी पूजा कराने के बहुत इच्छुक रहते हैं।
        कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
            ------------------
          उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदयायच्छते महान्।
            नचैर्नीचैस्तरां याति निपातभ्यशशकया।।
           ‘‘ऊंचे पद की इच्छा करता हुआ मनुष्य महान हो जाता है पर अपने महापद से गिरने के भय की आशंका से नीचे आने लगता है। अंततः उसका पतन हो जाता है।
          समाज पर नियंत्रण करने के प्रयासों को राजनीति कर्म कहा जाता है पर देखा जाये तो हर मनुष्य कहीं न कहीं पूज्यता को बोध से ग्रसित रहता है और कहीं न कहीं वह ऐसे प्रयास करता है जिससे समाज में उसका सम्मान बढ़े। भले ही कोई मनुष्य परमार्थ भाव से निष्काम कर्म न करे पर वह ऐसा जाहिर करता है कि वह तो पूरे समाज के लिये काम प्रयास करता है। राजस भाव की दृष्टि से आज की लोकतांत्रिक प्रणाली में सक्रियता तो एक सामान्य कर्म है जिसमें अनेक लोग शामिल नेता कहलाते हैं पर देखा जाये तो हर मनुष्य चाहे वह किसी राजनीतिक पद पर नहीं हो वह भी राजसी कर्म में लिप्त रहता ही है। धनपति, कलाकार, संगीतकार, अभिनेता और लेखक भी समाज में पुजने का मन में भाव लिये अपने कर्म करते हैं। इनमें से कुछ सफल रहते हैं तो कुछ नहीं।
         एक मजे की बात यह है कि आदमी अपने प्रयासों से बड़ा बन जाता है। यहां तक कि वह ऐसे कर्म भी कर लेता है कि अगर वह कुछ अन्य कर्म न भी करे तो भी उसका नाम इतिहास में दर्ज हो जाये पर प्रतिष्ठा का मोह ऐसा रहता है कि आदमी निरंतर इस भय से सक्रिय रहता है कि वह कहंी कम न हो जाये। लोग कहीं उसे भूल न जायें। इस कारण वह अतिसक्रियता दिखाता है और यही प्रयास उसका मानसिक संतुलन बिगाड़ देता है और फिर वह ऐसी गलतियां भी करता है जो उसकी छवि घूमिल करती हैं और पहले की कमाई सारी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाती है।
         ऐसा लगता है कि आधुनिक युग में राजनीति, कला, साहित्य, व्यापार तथा अन्य सामाजिक क्षेत्रों में कार्यरत कम लोग ही कौटिल्य का अर्थशास्त्र पढ़ते हैं। जो पढ़ते हैं उनमें शायद ही कोई इतना सक्रिय रहता है। जो सक्रिय हैं उन्होंने शायद ही कौटिल्य का अर्थशास्त्र का अध्ययन किया हो। यही कारण है कि हम अक्सर यह देखते हैं कि प्रतिष्ठित से प्रतिष्ठित लोग अनेक बार अपनी छवि धूमिल कर लेते हैं। तब लगता है कि लोगों को कौटिल्य का अर्थशास्त्र का अध्ययन कर उसके ज्ञान को धारण कर ही अपने क्षेत्र में सक्रिय रहना चाहिए।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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7/22/10

नारियों को अपने अंदर ही आत्मविश्वास लाना चाहिए-हिन्दी लेख (nariyon men atmavishvas jaroori-hindi lekh)

भारतीय महिला हॉकी खिलाड़ियों के यौन शोषण की घटना अत्यंत शर्मनाक है। इस घटना को सुनकर एक फिल्म की याद आ रही है जिसमें एक कल्पित कहानी पर बनी फिल्म की याद रही है जिसमें भारतीय महिला हॉकी टीम को विश्व विजेता बनाया गया था। वह फिल्म हिट रही थी। उसके गाने के बोल ‘चक दे इंडिया’ का भारतीय प्रचार माध्यमों में अपने विज्ञापनो के साथ ही कार्यक्रमों में तब तक इसका इस्तेमाल  किया जब तक करोड़पति फिल्म का गाने के ‘जय हो’ बोल प्रचलित नहीं हुए थे।
इससे पहले भी हरियाणा की एक युवती खिलाड़ी के यौन शोषण के कारण आत्महत्या करने का प्रकरण काफी चर्चा में रहा है जिसके लिये एक पुलिस अधिकारी को कई वर्षों बाद कानून का शिकंजा कसा गया। ऐ्रसी अनेक घटनायें हैं जिसमें महिलाओं का यौन शोषण करने के आरोप सामने आते हैं। इनमें कुछ पर कार्यवाही होती है तो कुछ पर नहीं जबकि आवश्यकता इस बात की है कि इसे अत्यंत गंभीरत से लिया जाना चाहिए। इस घटना से यह तो सिद्ध हो जाता है कि चाहे किसी भी क्षेत्र में थोड़ा बहुत आकर्षण है तो वहां बैठे शिखर पुरुष कुछ भी कर सकते हैं ।
वैसे देखा जाये तो प्रचार माध्यमों से जनचर्चा में आये यौन शोषण के प्रकरणों से अधिक उनकी संख्या है जो समाज के सामने नहीं आते। इसमें यौन शोषक तो खैर स्वयं सामने आने से रहा पर पीड़िता भी चुप रह जाती हैं और इसमें उनके परिवार वाले भी इज्जत के मारे अपनी जिम्मेदारी निभाने से कतराते हैं। हम यहां यौन शोषण की घटनाओं को एकांगी या एकतरफा प्रयास मानकर चलते हैं पर हमे यहां यह भी देखना चाहिए कि आखिर कथित रूप से सभ्य हो रहा समाज आखिर कथित रूप इस पर संवेदनहीन क्यों होता जा रहा है कि उसमें दौलत, ओहदा तथा शौहरत पाने वालों में अनेक लोग औरत को खिलौना समझने से बाज नहीं आते।
वैसे देखा जाये तो भारत में जब स्त्रियों की दशा को लेकर अनेक प्रकार की चर्चायें होती हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि भारत में स्त्रियों को दबाकर रखा जाता है। हम इस तर्क से इंकार नहीं कर सकते पर सच यह भी है कि महिलाओं के यौन शोषण की घटनायें पहले इतनी नहीं होती थी जितनी आज हो रही है। आधुनिक शिक्षा पद्धति के चलते महिलायें हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं पर उनकी संख्या पर्याप्त नहीं है क्योंकि हम शिक्षा को नौकरी से जोड़कर देखते हैं। पहले सरकारी नौकरियों और अब निजी क्षेत्र में नौकरियों की संख्या कम है और मांगने वाले बेरोजगारों की अधिक। फिर इधर शिक्षित महिलाओं की संख्या बढ़ी है और यकीनन रोजगार का संकट उनके सामने वैसा ही ही है जैसा पुरुषों के लिये। फिर एक बात है कि नौकरी की सुरक्षा के चलते सरकारी क्षेत्र में यौन शोषण की घटनायें येनकेन प्रकरेण ही होती हैं पर निजी क्षेत्र के बढ़ते दायरे के साथ ऐसी घटनायें बढ़ती जा रही है। जहां भी किसी व्यवसाय में थोड़ा आकर्षण हैं वहां महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा यौन शोषण की शर्मनाक घटनायें हो जाती हैं। अखबारों तथा अंतर्जाल पर लगातार ऐसा पढ़ने कों मिलता है जिससे लगता है कि टीवी चैनल, पत्रकारिता फिल्म तथा खेलों में महिलाओं का यौन शोषण एक आम बात हो गयी है। एक फिल्म अभिनेता का तो बकायदा स्टिंग ऑपरेशन किया गया था। जिस पर बहुत बहस होती रही थी।
यौन शोषण के आरोपों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि घटना के बहुत समय बाद सामने आते हैं। इसके विपरीत बलात्कार की शिकायत तत्काल सामने आती है। ऐसे में यौन शोषण के मामलों में पीड़िता को लोग सहानुभूति तो देते हैं पर पर विलंब से आई खबर उनको सोचने के लिये मजबूर कर देती है कि कहीं किसी हद तक किसी लालच या लोभ में पीड़िता कहीं शोषण के जाल में स्वयं तो नहीं फंस गयी।
यही सोचकर यह बात मन में आती है कि आधुनिक युवतियों और महिलाओं को सफलता के लिये ‘संक्षिप्त मार्ग’  (short cut root) अपनाने बचने के साथ ही अपनी प्रतिभा और योग्यता पर भरोसा रखने तथा उसे निखारते रहने का प्रयास करने की राय भी दी जानी चाहिए। बच्चियों को शुरुआत में ही यह समझाना चाहिए कि अगर वह अपने बजाय किसी अन्य पर भरोसा करने के अपनी योग्यता और प्रतिभा निखारने के लिये न केवल अपने कार्य का अभ्यास करें बल्कि अपनी प्रतिबद्धता भी उसी से रखें।
हर मनुष्य में देवता और राक्षस रहता है। अब यह अलग बात है कि अपने कर्म से कौन अपनी पहचान कैसी बनाता है? उसस्रे भी अलग एक स्थित यह है कि मनुष्य सामान्य जीवन एक आम व्यक्ति के रूप में गुजारता है। लेखक, पत्रकार, फिल्म कलाकर, चित्रकार, राजनीतिक व्यक्ति, प्रशानस में उच्च पद पर बैठे लोगों के प्रति स्वाभाविक रूप से आकर्षण होता है क्योंकि उनका चरित्र लोगों की आंखों के सामने सक्रिय रहता है। इनमें अधिकतर भले हैं पर इनमें कुछ लोगों को सफलता हज़म नहीं हो्रती और वह जब शिखर पर पहंुचते हैं तो फिर दूसरों के गुरु-आजकल धर्मपिता यानि गॉडफादर बनने की को्रशिश करते हैं। सच बात तो यह लोग शिखर पर पहुंचते ही चालाकियों से हैं इसलिये उनमें देवत्व ढूंढना अपने आपको धोखा देना है। सबसे बड़ी बात यह कि वह किसी दूसरे को शिखर पर पहुंचा दें यह उनकी न तो नीयत में होता है और न ही क्षमता के अनुकूल। दूसरी बात यह है कि अपनी प्रतिभा पर यकीन न करने वाले युवक युवतियों ही इनकी शरण लेते हैं न कि प्रतिभाशाली।
ऐसे में देश की युवतियों और महिलाओं को एक बात यह भी सोचना चाहिए कि प्रतिभा तो पत्थर का पहाड़ हो या लोहे का छप्पर उसे फाड़कर बाहर आती है। जहां तक हो सके अपने लक्ष्य पर ही नज़र रखें। यह सच है कि देश के सभी प्रकार के सामाजिक, आर्थिक तथा खेल नियंत्रण प्रतिष्ठानों में ऐसे कुछ शिखर पुरुघ हैं जो दूसरों को सफलता दिलाने का दावा करते हैं पर आप गौर करें तो शायद ही कोई ऐसा कर पाया हो। अलबत्ता अल्प योग्य प्रतिभाओं का दोहन वह खूब कर लेते हैं।
जीवन की सफलता का मूलमंत्र परिश्रम, लगन, एकाग्रता तथा अपने कर्म से प्रतिबद्धता से ही संभव है। अपने माता पिता के अलावा किसी को गॉडफादर बनाना अपने आपको धोखा देना है। दरअसल जब यौन शोषण की घटनायें सामने आती हैं तब मासूम पीड़िताओं की व्यथा मन को व्यग्र कर देती है और तब लगता है कि जीवन के यथार्थ का ज्ञान होना सभी को जरूरी है ताकि इस देश की महिलायें और युवतयों दृढ़ता पूर्वक जीवन यापन करते हुए सफलता की सीढ़यां चढें। अपने माता पिता तथा परिवार के सानिध्य में पली बढ़ी लढ़कियां आज के युग मे आगे बढ़ें ताकि समाज का आधा अधूरापन खत्म हो। इसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने अंदर दृढ़ संकल्प और परिश्रम से प्रतिबद्धता मन में रखें।
दूसरी बात यह है कि यौन शोषकों को अपनी औकात समाज की बतलाये और उनका सामाजिक बहिष्कार करे। चाहे वह कितने भी बड़ा दौलतमंद, उच्च पदस्थ या प्रतिष्ठित हो उसका सम्मान न करें तभी इस समस्या से छुटकारा मिल सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बारे में पहल बुद्धिमान महिलाओं को ही करनी होगी क्योंकि पुरुषों में अनेक इस मामले में केवल दिखावटी हमदर्दी दिखाते हैं।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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