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9/19/10

क्रिकेट में फिक्सिंग का मौसम और हिन्दी ब्लॉग-हिन्दी व्यंग्य (cricket match and hindi blog-hindi vyangya)

क्रिकेट शुरु हो गयी तो ब्लाग पिटना शुरु हो गये। हिन्दी दिवस के एक दिन पहले अनेक ब्लागों ने जमकर हिट पाये तब कहना पड़ा कि ‘थैंक्स हिन्दी, चलो एक दिन ही सही ब्लागों पर हिट तो दिलवाये। अगले दिन ब्लाग सामान्य स्थिति में लौटे पर फिर अचानक पाठ तथा पाठ पठन संख्या एकदम गिर गयी। समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हुआ? क्या यह तूफान गुज़र जाने के बाद की शांति है-जी हां तूफान आने से पहले शांति होती है तो उसके गुज़र जाने पर भी उन जगहों पर शांति दिखाई देती है जहां इंसान और पशु नहीं बसते। ब्लाग को पिटता देखकर कुछ ऐसा भी लगा कि जैसे तेज बरसात होने के बाद अचानक बंद हो जाती है और धूप निकलते ही गर्मी होने लगती है। उससे फिर बरसात होती है, फिर शीतलता का अहसास होने लगता पर ब्लाग पर अगले कुछ दिनों तक हिन्दी दिवस के एक दिन पूर्व जैसे हिट मिलने की संभावना अब नहींे है क्योंकि क्रिकेट का मौसम कम से कम एक या डेढ़ महीना चलेगा। पिछले तीन वर्षों का अनुभव यह बताता है कि हिन्दी अंतर्जाल का हिन्दी पाठकों एक बहुत बड़ा वर्ग उस समय कम हो जाता है जब कोई क्लब स्तरीय प्रतियोगिता-चाहे वह भारत में हो या बाहर-होती है।
इधर पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ियों का भी फिक्सिंग का मौसम चल रहा है। एक मैच से निकलते नहीं है कि दूसरा मैच फिक्स कर लेेते हैं। उन्होंने फिक्सिंग के नये नये तरीके ईजाद कर लिये हैं। हर बाल पर फिक्सिंग करने का उन्होंने जो तरीका निकाला है वह नया जरूर लगता है पर इसका अनुमान क्रिकेट के कुछ जानकार आम लोग पहले ही कर चुके थे जब अखबारों में यह समाचार आया था कि अब सट्टेबाज किसी मैच की बजाय उसकी गतिविधियों पर ही दांव खिलवायेंगे। जहां दो देश मैच खेलते हैं वहां की जनता की भावनायें भी जुड़ जाती हैं और जब पोल खुलती है तो खिलाड़ियों की इज्ज़त धूल मे मिल जाती है इसलिये उसकी गतिविधियों पर ही दांव खेले जाते हैं। फिर अंतर्राष्ट्रीय मैचों में खिलाड़ियों पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाये गये कि मोबाईल नहीं रख सकते या किसी से मिल नहीं सकते। इसलिये क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया-जिसमें खिलाड़ी अपनी मर्ज़ी के खुद मालिक होते हैं।  प्रचार माध्यमों ने उनका पूरा साथ देकर इन क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं को लोकप्रिय बना दिया ताकि उनको विज्ञापन से धन तथा विषय सामग्री प्रस्तुत करने के लिये दृश्य मिलते रहें-टीवी समाचार चैनलों का एक में से आधा घंटा क्रिकेट के दृश्यों तथा चर्चा पर ही आधारित होता है। अब इन पर सट्टा तो लगता है पर चूंकि इससे कोई भावनायें नहीं जुड़ी हैं इसलिये कोई ध्यान नहीं देता। ऐसे भी समाचार आये कि इन प्रतियोगिताओं के अनेक मैच फिक्स होते हैं पर कोई बावेला नहीं मचता।
बीस ओवरीय पद्धति पर आधारित इन मैचों के लिये दर्शक अब एक दिवसीय मैचों से अधिक हो गये हैं। इतना ही नहीं लोग राष्ट्रप्रेम की भावना से परे होकर केवल चौके छक्के देखने में मशगूल हो जाते है। सभी लोग दांव नहीं खेलते पर कुछ लोग तो शायद ऐसे हैं जिनका खेल में कम अपने लाभ में अधिक ध्यान रहता है। स्पॉट फिक्सिंग’ यानि मौके पर दांव लगाने के प्रचलन से खिलाड़ियों के साथ ही उनके अदृश्य प्रायोजकों को भी फायदा है। दूसरी बात यह कि फंस जाने पर आम जनता से नाराजगी का खतरा भी नहीं है। कह सकते हैें कि ‘हमने कोई देश की प्रतिष्ठा थोड़े ही दांव पर लगायी है।’
पिछली बार भारत में हुई क्लब स्तरीय प्रतियोगिता को लेकर इतना बावेला बचा। अनेक सरकारी विभाग सक्रिय हुए। राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट नियंत्रण करने वाले संगठन आग बबूला होते दिखे मगर नतीजा ढाक के तीन पात। एक मुर्गा है पाकिस्तान जिसको चाहे हलाल कर लिया जाता है क्योंकि वह आतंकवाद के नाम पर भी वैसे भी बदनाम है। अभी एक विदेशी अखबार ने दावा किया था कि दुनियां भर के 29 खिलाड़ी स्पॉट फिक्ंिसग में शामिल हैं और ये उन सभी देशों से संबंधित हैं जो क्रिकेट खेलते हैं। मतलब अकेले पाकिस्तानी इसमें शामिल नहीं हैं-इसका प्रमाण यह भी है कि इस मामले में दलाली करने वाले लोग दुबई और भारत में रहने वाले बताये जाते हैं।
पाकिस्तान का एक खिलाड़ी शाहिद अफ्रीदी काफी जीवट वाला माना जाता है। इंग्लैंड के खिलाफ एक दिवसीय श्रृंखला में कप्तानी करते हुए उसकी टीम दो एक दिवसीय मैच हार गया। पाकिस्तान की यह दोनों हार शक के दायरे में नहीं आयी। तीसरे एक दिवसीय मैच में पाकिस्तान जीता तो वह मैच शक के दायरे में आ गया। बताया गया कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों की दौड़ दर यानि रन रेट शकशुबहे वाली है। इस मैच में अफरीदी रन आउट हो गया। हम फिक्स मैच देखने का मज़ा उठाने के ख्याल से आजकल पाकिस्तानियों के मैच देखते हैं पर अफ़रीदी का इस तरह आउट होना अपने को हज़म नहीं हुआ।
गेंद आसमान से उड़ती हुई विकेटकीपर के पास आ रही थी और अफ़रीदी बल्ला हवा में लहराते हुए दौड़ रहा था जैसे मन ही मन ही दुआ कर रहा हो कि विकेटकीपर जल्दी उसे आउट कर दे जिससे बाहर बैठे उसके अदृश्य प्रायोजक खुश हो जायें। फिर भी दौड़ने में कुछ जल्दी कर गया। वह तो गनीमत है कि तीसरे कैमरे की आंख ने उसे आउट न होने से बचा लिया। जब गेंद विकेट में लगी अफ़रीदी का बल्ला अंदर पर हवा में था। अफरीदी को संदेह का लाभ मिलने का खतरा था जो टल गया। कम से कम पाकिस्तानियों ने इस बार फिक्सिंग में देश भक्ति दिखाई और मैच जीत लिया। सारी दुनियां को भी बता दिया कि स्पॉट फिक्ंिसग के बावजूद मैच जीता जा सकता है। अन्य देशों के खिलाड़ी उससे सीख सकते हैं।
मैच समाप्ति पर जब इनाम बंट रहे थे तब उद्घोषक ने अफ़्रीदी से पूछा गया कि ‘क्या वह सुस्त दौड़ से रन आउट हुआ?’
उसने कहा-‘हां!
हमें यह सुस्ती भी उस समय फिक्स लगी थी जब वह दिखाई गयी थी। अब तो पूरा मैचा ही संदेह के घेरे में आ गया है। वैसे फिक्स मैच देखने में भी मज़ा है यह पहली बार पता चला। हमें यह पता था कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों के पास इस मैच में जीतने के अलावा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि पहले दो मैच हारने के बाद यह तीसरी हार बाकी श्रृंखला का मज़ा खराब कर देती। ऐसे में स्पॉट फिक्सिंग या रन रेट फिक्सिंग  में दांव लगाने वाले लोगों की संख्या कम हो जाती। लोग अक्सर एक सवाल पूछते हैं कि आखिर पाकिस्तानी खिलाड़ी ही क्यों फिक्ंिसग में फंसते हैं। इसका सीधा जवाब यह है कि उनके पास न तो विज्ञापन हैं न ही रैम्प में नाचने की सुविधा। अपने पड़ौसी देश भारत तथा मित्र देश श्रीलंका के खिलाड़ियों के मुकाबले उनके पास धन केवल इसी रास्ते आ सकता है। दूसरी बात यह कि वह मैच जीतने की कुब्बत रखते हैं इसलिये उनका हारना भी बिक जाता है। रन आउट होना फिक्स किया तो क्या मैच भी तो जीता। ऐसे कुब्बत भला कोई दूसरे देश के खिलाड़ी दिखा सकते हैं? पाकिस्तानियों को जीत भी फिक्स करना आती है! भला कौन उनकी इस चालाकी को चुनौती दे सकता है। एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है वह यह कि उनकी फिटनैस पर कोई सवाल नहीं उठाता जबकि भारतीय टीम में कभी पांच छह खिलाड़ियों के अनफिट होने की बात कही जाती है। इसका प्रमाण है कि 40 बरस के उनके कौच गैरी कर्स्टन ने स्टेडियम में छह चक्कर लगाये जबकि भारतीय धुरंधर एक दो में ही हांफने लगे थे। यह बात प्रचार माध्यम ही बताते हैं। पाकिस्तानियों के हारने के साथ जीतने का भी अभ्यास करना है इसलिये वह फिटनेस का ध्यान रखते होंगे। यही कारण है कि उन्होंने भीष्म पितामह की तरह अपनी इच्छा के बिना न हारने और न जीतने का वरदान ले लिया है।
आखिरी सवाल यह है कि कहीं तीसरे मैच में हारना कहीं गोरों ने भी तो फिक्स नहीं किया था? दोनों टीमों के खेल से तो ऐसा ही लगता है कि परिणाम का निर्धारण पाकिस्तानी ही कर सकते हैं। इस मामले में उनको चुनौती मिल सकती है तो आस्ट्रेलिया की टीम ही है जिसके कुछ खिलाड़ी हमेशा ही संदेह के दायरे में रहते हैं।
वैसे प्रचार माध्यमों में किसी प्रतियोगिता या मैच के बाद ही फिक्सिंग की चर्चा होती है। तब लगता है कि हमने वक्त बरबाद किया। वैसे यह मानकर चला जाये कि सारे मैच फिक्स होते हैं तो फिर उनको निष्काम भाव से देखा जा सकता है क्योंकि तब जीत की खुशी के भ्रम या हार के तनाव से आदमी मुक्त होता है। रहा ब्लागों के पिटने का सवाल तो क्लब स्तरीय प्रतियोगताओं के समय यह होना ही था। अलबत्ता हमें इन प्रतियोगताओं का ध्यान तब आता है जब ब्लाग पिटने लगते हैं और उसका देखते हुए चिंता लगती है। अब तो यह मान लिया है कि फिक्सिंग का मौसम हमारे ब्लाग के लिये विश्राम का मौसम होता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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7/4/10

कप्तान की शादी और प्रचार माध्यम-हिन्दी लेख (marrige of cricket captain and media-hindi lekh)

बीसीसीआई क्रिकेट टीम के कप्तान की शादी है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। हमने एक समाचार चैनल खोला था समाचार सुनने के लिये है पर कप्तान की शादी का प्रसंग सामने आ गया। इस लेखक ने अक्सर देखा है कि जब बाजार के उत्पादों के किसी विज्ञापन के माडल के-इनमें से अधिकतर क्रिकेट और फिल्म के होते हैं-शादी होने या राजनीति में आने की खबर होती है तो सभी चैनल उसे एक ही समय में प्रसारित करते हैं ताकि दर्शक भाग कर कहीं जा नहीं पाये और न ही उस माडल की आम आदमी उपेक्षा की जा सके। कहने को सारे चैनल अलग दिखते हैं ऐसे मौके पर एक हो जाते हैं। बाजार का उन पर कितना जोरदार नियंत्रण है यह ऐसे मौके पर देखा जा सकता है। इस लेखक ने कम से कम आठ समाचार चैनल बदले होंगे पर हर जगह बस वही बात! कप्तानी की शादी हो रही है इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। आज बाज़ार में घूमते हुए कहीं भी यह सुनाई नहीं दिया कि कप्तान की शादी हो रही है जबकि प्रचार माध्यम शोर मचाये हुए थे। ऐसे में व्यवसायिक प्रचार माध्यमों का यह दावा खोखला दिखता है कि वह तो दर्शकों की मांग के अनुरूप अपनी प्रस्तुति करते हैं। एक अभिनेता की राजनीति में आने की खबर पर भी ऐसा ही देखा गया था।
भारतीय प्रचार माध्यमों तथा आम नागरिकों के बीच अब एक लंबी मनोवैज्ञानिक खाई बन गयी है जिसे हम विश्वास का संकट भी कह सकते हैं। दरअसल प्रचार संगठनों में काम करने वाले लोग जहां अपनी अभिव्यक्ति की शक्ति का महत्व समझते हैं वहीं यह भूल जाते हैं कि अंततः आम आदमी की सहानुभूति के बिना उसका लाभ उठाना संभव नहीं है। एक तरफ प्रचार माध्यम आम आदमी को निहायत मूर्ख मानकर अपने आय अर्जन के इकलौते लक्ष्य पर काम कर रहे हैं वहीं आम आदमी उनको व्यवसायिक छल प्रपंच मानकर उनकी बात पर ध्यान नहीं देता।
ऐसे में अनेक बुद्धिजीवी आम आदमी के चेतना विहीन होने की शिकायत कर रहे हैं तो उन्हें यह भी देखना चाहिये कि उनकी सीमित सोच ने आदमी के दिमागी दायरे को अत्यंत सीमित कर दिया है। हम टीवी चैनलों और समाचार पत्रों कि महत्व को जानते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि हमें यह भी पता है कि उनकी समाज निर्माण में अत्यंत प्रभावी भूमिका हो्रती है। ऐसे में यह देखना आवश्यक है कि प्रचार माध्यमों की भूमिका किस तरह की है और अगर हम समाज को सुप्तावस्था में देख रहे हैं तो उसके पीछे उनकी कितनी जिम्मेदारी है?
सबसे बड़ी बात यह है कि व्यवसायिक प्रचार माध्यम मानते हैं कि जो लोग देखना, सुनना और पढ़ना चाहते हैं वही हम प्रस्तुत कर रहे हैं क्योंकि इसके बिना व्यवसाय नहीं चलता।
अगर वह इस तर्क पर काम करते हैं तो उससे जुड़े बुद्धिजीवियों को यह शिकायत नहीं करना चाहिए कि समाज सो रहा है।
समाचारों से जुड़े टीवी चैनलों और अखबारों के संचालकों को अब इस बात का आभास नहीं है कि उनका जिम्मा केवल अपने उपभोक्ताओं के सामने समाचार प्रस्तुत करना ही नहीं है वरन् संपादकीय, लेखों तथा चर्चाओं के द्वारा उनमें विचार निर्माण करने का काम भी है। यहां वह यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते कि हर आदमी पढ़ा लिखा है और वह स्वयं ही विचार कर सकता है। एक ब्लाग लेखक के रूप में हम भी यह देख रहे हैें कि अनेक स्तंभकार ब्लाग लेखकों की रचनाओं से विचार लेकर लिख रहे हैं। इसका आशय यह है कि विचारों का क्रमिक विकास तभी संभव है जब कहीं दूसरी जगह से पढ़ा, सुना और देखा जाये।
अब जरा समाचार टीवी चैनलों और अखबारों के समाज में विचार निर्माण के प्रयासों को देखा जाये तो यह नहीं लगता कि वह इस काम को गंभीरता से ले रहे हैं। इस मामले में दूरदर्शन के कुछ प्रयास गंभीरता लिये हुए लगते हैं जबकि व्यवसायिक चैनल पूरी तरह से लापरवाही दिखाते हैं। टीवी चैनलों ने कुछ खास मौकों के लिये दो चार विशेषज्ञ तय कर रखे हैं जो क्रिकेट, आतंकवाद, रेल या बस हादसों तथा महिला उत्पीड़न जैसे विषयों पर आकर रटी रटाई बातें बोलते हैं और खानापूरी हो जाती है। यही स्थिति अनेक समाचार पत्रों की है। उनके लेखों तथा संपादकीयों में समाचारों के दोहराव के अलावा थोड़ी बहुत राय होती है पर वह बेबाक नहीं लगती। इतना ही नहीं उनके विचारों का प्रस्तुतीकरण भी इतना कमजोर रहता है कि पाठक या दर्शक उसे अधिक देर तक ध्यान नहीं रख पाता। यही कारण है कि आजकल कहीं भी कोई बुद्धिमान किसी अखबार की राय का बयान कर अपनी बात नहीं रखता। अखबारों के समाचारों की चर्चा अक्सर मिलती है पर विचार एकदम लापता लगता है।
समाचार टीवी चैनलों ने तो बहुत निराश किया है? जब दूरदर्शन अकेला था तब उसके समाचार सुनने की आम लोगों में एक आदत हो गयी थी और व्यवसायिक समाचार चैनलों ने उसका दोहन भी खूब किया पर उसको नियमित बनाये रखने में नाकाम रहे। यही कारण है कि प्रतिदिन समाचार देखने वाले बहुत लोग अनेक दिन तक तो समाचार चैनल खोलकर देखते तक नहीं हैं। एक घंटे तक समाचार दिखाने का दावा करने वाले यह सभी चैनल बुमश्किल पांच मिनट समाचारों के लिये हैं-उनका शेष समय क्रिकेट, फिल्म और फूहड़ हास्य प्रस्तुत करने में बीत जाता है। यह विज्ञापन चैनल जैसे हो गये हैं। एक तरह से संदेश देते हैं कि यह समाचार और विचार देखना छोड़कर उस तरफ जाओ जो हमारे बाजार नियंत्रकों ने सजा रखा है।
ऐसे में निराश हाथ लगती है। स्थिति यह है कि समाज में चेतना लुप्त होती जा रही है और जिनमें चेतना है उनके पास ऐसे साधन नहीं है जिससे उसमें निरंतरता बनी रहे। हालांकि इधर हिन्दी ब्लाग जगत पर काफी बेबाक राय सामने आ रही है पर वहां जागरुक लोगों की पहुंच अधिक नहीं है। दूसरा यह भी है कि ब्लाग जगत को लेकर प्रचार माध्यम योजनापूर्वक इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि यहां बाजार के मुखौटे ही प्रसिद्ध बने न कि आम लेखक। यही कारण है कि क्रिकेट खिलाड़ियो, फिल्म अभिनेताओं तथा अभिनेत्रियों के ब्लाग तथा वेबसाईट या ब्लाग बनाने के समाचार देते हैं। इससे समाज में यह धारणा बनती जा रही है कि ब्लाग केवल खास लोगों की अभिव्यक्ति के लिये है।
इस लेखक ने अपने एक कार्टूनिस्ट मित्र को ब्लाग बनाने की राय दी तो उसका जवाब था कि मैं भला कोई एक्टर या क्रिकेट खिलाड़ी हूं जो कोई मेरा ब्लाग देखेगा।’
दूसरी मजे की बात यह है कि इस लेखक के अनेक पाठ बिना नाम के छापे जा रहे हैं। गांधी जयंती पर इस लेखक के लिखे गये पाठों का एक स्तंभकार ने उपयोग किया। इस लेखक के मित्र तथा पढ़ने वाले लोग जानते हैं कि उन पाठों में जो विचार व्यक्त किये गये थे वैसे किसी बुद्धिजीवी ने नहीं किये। जो लोग गांधी विषय पर विशारद होने का दावा करते हैं वह उन लेखों को पढेंगे तो हैरान रह जायेंगे-एक लेखक मित्र ने उनको पढ़कर यही कहा था। मगर यह आत्मप्रवंचना नहीं है बल्कि यह बताया जा रहा है कि समाचार में चिंतन और विचार का जो संकट है वह प्रचार माध्यमों की उपेक्षा तथा रूढ़ता के कारण है और हिन्दी ब्लाग जगत ही उसका सामना करने में सक्षम है और यह बेहतर होगा कि व्यवसायिक प्रचार माध्यम इस आशंका से परे हो जायें कि यहां ब्लाग लेखकों नाम सहित अपने यहां स्थान देने से कोई ऐसी लोकप्रियता मिल जायेगी कि बाजार की बड़ी कंपनियों के विज्ञापन उनको मिलने लगेंगे। अलबत्ता हिन्दी में चिंतन तथा विचार के क्षेत्र में जो जड़ता की स्थिति है उससे निपटने लिये उनके पास इसके अलावा कोई चारा नहीं है कि व्यवसायिक प्रचार माध्यम ब्लाग लेखकों से तारतम्य बनायें। अगर क्रिकेट खिलाड़ियों, फिल्म अभिनेताओ तथा अभिनेत्रियों की शादी तथा प्रेम प्रसंगों से समय काटने को ही वह अपना व्यवसायिक धर्म समझते हैं तो फिर हमें कुछ नहीं कहना है।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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4/18/10

प्रचार माध्यमों का राष्ट्रनिरपेक्ष भाव-हिन्दी आलेख (thought of nationalism-hindi article)

संगठित प्रचार माध्यमों की-यथा टीवी, समाचार पत्र पत्रिकायें तथा रेडियो- राष्ट्रनिरपेक्षता बहुत दुःखद और चिंताजनक है। कालांतर में जब वह इसके परिणाम देखेंगे तब उनको बहुत निराशा होगी। जब इन प्रचार माध्यमों को देश हित में किसी अभियान जारी करने की आवयकता प्रतीत होगी तब पायेंगे कि उनके पाठक तथा दर्शक तो राष्ट्रनिरपेक्ष हो चुके हैं और वह उनकी देशभक्ति अभियान से प्रभावित नहीं हो रहे । जिस तरह देश के कानून की धज्जियां उड़ाने वालों तथा अपने संदिग्ध आचरण से समाज को विस्मित करने वालों के दोषों को अनदेखा कर ‘किन्तु परंतु’ शब्दों के साथ उनकी उपलब्धियां यह प्रचार माध्यम गिना रहे हैं उस पर कभी हंसी आती है तो कभी निराशा लगती है।
जिस तरह लिखने वाले सभी लेखक नहीं हो पाते उसी तरह प्रचार माध्यमों में काम करने वाले भी सभी पत्रकार नहीं कहला सकते। जिस तरह सरकारी तथा निजी कार्यालयों में पत्र लिखने वाले लेखक लिपिक ही कहलाते हैं लेखक नहीं। उसी तरह पत्रकार वही है जो समाचार, विचार तथा प्रस्तुति में अपना प्रत्यक्ष मौलिक योगदान देता है-इसके इतर जो केवल समाचार का दर्शक या पाठक के बीच पुल का काम करते हैं पत्रकार नहीं हो सकते बल्कि उनकी भूमिका लिपिक से अधिक नहीं रह जाती। इसमें सुधार तब तक नहीं हो सकता जब तक वह अपनी प्रस्तुति में अपने प्रयास से मौलिक उपस्थिति दर्ज नहीं कराते।
संगठित प्रचार माध्यमों में सक्रिय अनेक महानुभाव तो अब लिपिकीय या उद्घोषक से अधिक भूमिका नहीं निभाते-हालांकि उनको इसके लिये पूरी तरह जिम्मेदारी ठहराना गलत है क्योंकि उनके अधिकारी भी उनसे ऐसी ही अपेक्षा करते हैं। जब हम प्रचार कर्म में लगे लोगों के कार्यक्रमों या समाचारों की मीमांसा कर रहे हैं तो उस पूरे समूह की ही जिम्मेदारी है जो उनके प्रसारण या प्रकाशन में लगा है।
अभी क्रिकेट की एक क्लबस्तरीय प्रतियोगिता को लेकर भारत शासन के कुछ विभागों ने कानून की अवहेलना को लेकर कार्यवाही प्रारंभ की है। उसमें एक प्रसिद्ध व्यक्ति की तरफ उंगलियां उठ रही हैं जिसके कार्यालय में आयकर का छापा पड़ चुका है-बताया जाता है कि पूर्व में प्रवर्तन निदेशालय भी उनसे जानकारी मांग चुका है। इसमें कोई शक नहीं क्रिकेट की यह क्लब स्तरीय न केवल कानूनी दांव पैंचों में फंसी है बल्कि एक टीम के खेल पर तो सट्टे वालों के दबाव में खेलने का भी शक पुलिस ने जताया है। जिस व्यक्ति को इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के आयोजन का श्रेय देकर श्रेष्ठ प्रबंधक का प्रशस्ति पत्र दिया जा रहा है उस पर नियम तोड़ने का आरोप है।
अब जरा प्रचार माध्यमों की उस व्यक्ति पर राय देखिए
‘भले ही उन पर आरोप लग रहे हैं पर सच यह है कि उन्होंने क्रिकेट के साथ मनोरंजन जोड़ने जैसा बड़ा काम कर दिखाया। उसको बड़े पर्दे के लोगों को जोड़ा।’
‘उसकी वजह से नये क्रिकेटरों को अवसर मिल रहा है।’
अब ऐसे प्रचार पर क्या कहा जाये? वह किसका महिमा मंडन कर रहे हैं और कैसे? 1983 में भारत ने विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता जीती उसके बाद यहां यह खेल स्वाभाविक रूप से अधिक प्रसिद्ध हो गया। लोग खेलने वाले कम देखने वाले अधिक थे। मगर यह खेल था इसलिये आयकर से छूट मिलती रही पर जब यह मनोरंजन जोड़ा गया तो वह छूट नहीं मिल सकती-यह बात संगठित प्रचार माध्यमों में हुई चर्चाओं के आधार पर लिखी जा रही है। अब तो अनेक लोग मानने लगे हैं कि यह क्रिकेट प्रतियोगिता खेल नहीं बल्कि मनोरंजन है। मनोरंजन पर करों का हिसाब अलग है। उसमें कई जगह पहले पैसा अग्रिम रूप से कम के रूप में जमा करना पड़ता है। जो खिलाड़ी खेल रहे हैं उन पर आयकर में शायद ही छूट मिल पाये। दूसरी बात यह कि आयकर नियमों के अनुसार तो नियोक्ता को ही अपने अधीन काम करने वाले व्यक्ति को मिलने वाली देय रकम पर आयकर की राशि कटौती कर जमा करना चाहिए। क्या उनके उस ऊंचे व्यक्तित्व के स्वामी प्रबंधक ने ऐसा किया? इस प्रतियोगिता में करोड़ों की आयकर चोरी का शक किया जा रहा है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि यह मैच राष्ट्रीय यह अंतर्राष्ट्रीय खेल का हिस्सा नहीं बल्कि मनोरंजन हैं इसलिये खिलाड़ियों तथा आयोजकों से ऐसे ही कर वसूलना चाहिये जैसे मनोरंजन उद्योग से वसूला जाता है।
हैरानी की बात है कि संगठित प्रचार माध्यम कानून के प्रावधानों को लेकर अपने निष्कर्ष निकलाने से बच रहे हैं या उनको इसका आभास नहीं है कि यह प्रकरण इतना संगीन है जहां चंद नये क्रिकेट खिलाड़ियों को मौका देने जैसा या उसमें मनोरंजन शामिल करने जैसा कार्य कोई महत्व नहीं रखता। हजारों करोड़ों के करचोरी के संदेह से घिरी यह प्रतियोगिता पचास से सौ खिलाड़ियों को अवसर देने के नाम पर कोई पवित्र नहीं हो जाती। वैसे क्या इससे पहले नये खिलाड़ियों को अवसर नहीं मिलते थे। देश की राजस्व की हानि एक बहुत बड़ा अपराध है।
किसी भी देश अस्तित्व उसके संविधान से होता है जिसके अनुसार चलने के लिये सरकार को धन की आवश्यकता होती है। यह धन सरकार अपनी ही प्रजा पर अप्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर लगाकर वसूल करती है। इस प्रतियोगिता में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कौन आयोजित कर रहा है बल्कि यह देखा जाना चाहिए कि मनोंरजन के रूप में चलने के बावजूद इसको कृषि की तरह करमुक्त नहीं माना जा सकता है। सुनने में आया है कि करों से बचने के लिये इसमें समाज सेवा जैसे शब्द भी जोड़े जा रहे। अभी तक यह पता नहीं चल पाया कि इस प्रतियोगिता से कहीं राजकीय तौर पर कर जमा किया गया या नहीं।
कहने का अभिप्राय यह है कि चाहे कोई व्यक्ति कितना भी अच्छा प्रबंधक या समाज सेवक क्यों न हो अगर वह सार्वजनिक रूप से ऐसा प्रायोजन करते हैं जो कर के दायरे में और वह उससे बचते हैं तो उनकी प्रशंसा तो कतई नहीं की जा सकती। देश में कानून का पालन होना चाहिये यह देखना हर नागरिक का दायित्व है इसलिये उसे ऐसे तत्वों की प्रशंसा कभी नहीं करना चाहिये जो नियमों को ताक पर रखते हैं। अगर ऐसा नहंी करते तो यह राष्ट्रनिरपेक्ष का भाव है जो खतरनाक है। आज कितने भी अच्छे निष्पक्ष दिखने का प्रयास करें पर जब ऐसे व्यक्तित्वों की प्रशंसा में एक भी शब्द कहते हैं तो यह निष्पक्षता नहीं बल्कि निरपेक्षता है जिसका सीधा सबंध राष्ट्र की अनदेखी करना है। यह ठीक है कि अभी तक आरोप है और उनकी जांच होनी है पर जिस तरह प्रचार माध्यम उसे अनदेखा कर रहे हैं वह कोई उचित नहीं कहा जा सकता।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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12/30/07

कपिल क्रिकेट के साथ लोगों के जजबातों को भी भुनाएं

कपिल देव की आई.सी.एल.अभी भी कोई कमाल नहीं कर पा रही है। इसकी वजह यह है कि कपिल अभी क्रिकेट को एक ऐसा खेल समझ रहे हैं जिससे व्यापार किया जा सकता है, जबकि उन्हें यह भी सोचना चाहिऐ कि यह लोगों के जजबात इससे जुडे हुए हैं और जब तक उनका इस्तेमाल नहीं किया जायेगा तब वह अपनी संस्था को लोगों में लोकप्रिय नहीं बना सकते।
कपिल देव ने अभी हाल ही में दुनिया भर की टीमों के पुराने और सेवानिवृत खिलाडियों को लेकर टीमें बनाईं और मैच करवाए. उनके बारे में देश के समाचार माध्यमों में उनको स्थान मिला पर खेलप्रेमियों ने उनको महत्त्व नहीं दिया इसका कारण यह कि उन टीमों के नाम देश के स्थानीय बडे शहरों के नाम पर रखे। शायद आयोजकों को लगा होगा कि बडे और प्रसिद्ध खिलाडियों की वजह से लोग टूट पड़ेंगे और उनकी दिलचस्पी की वजह से उनको आर्थिक लाभ मिलेगा। ऐसा हुआ नहीं।
कपिल देव और उनके साथी आज इस देश में क्रिकेट का स्वरूप देख रहे हैं उसके पीछे लोगों के मन में जो देश के प्रति जजबात हैं उसे नहीं देख रहे। कहने को यह बी.सी.सी.आई.की टीम है पर इसे भारतीय टीम भी कहा जाता है। कपिल ने १९८३ में जब इस टीम को शिखर पर पहुंचाया तो पूरा देश क्रिकेट का मुरीद हो गया। इसलिए नहीं कि क्रिकेट एक खेल है बल्कि इसलिए कि उनका देश उसमें विश्व विजेता है।
कपिलदेव सोच रहे हैं की स्टार खिलाडी लेकर अपना अभियाय चलते रहें तो गलती पर हैं, उन्हें नये खिलाड़ी जिनको अभी भारतीय टीम में जगह मिलने की आशा नहीं है अपने साथ लेकर अपनी टीम बनाने चाहिए। इतना नहीं अपने विदेशी मित्रों से कहकर हर देश में ऐसी टीम बनवानी चाहिए। वह अगर यह सोच रहे हैं आई।सी।सी।आई की इसी संस्था के माध्यम से वह उससे जुड़ जायेंगे तो गलती कर रहे हैं। उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी संस्था बनानी होंगी। जब वह सभी देशों के बीच उनके बैनर तले मुकाबले होंगे तभी पूरे विश्व के आम खेलप्रेमियों का ध्यान उनकी तरफ ध्यान जायेगा। जब वहाँ खिलाड़ी अच्छा खेलंगे तब लोगों के स्टार भी बनेंगे। नये लड़के कम इनामी राशि में भी खेलने के लिए तैयार हो जायेंगे। वैसे भी आजकल क्रिकेट खिलाड़ी खेल से कम विज्ञापन से अधिक कमाते हैं। इसे ही कहा जाता है जजबातों को भुनाना। हालांकि इस चक्कर में हो यह रहा है कि इस प्रयास में लोगों पर वही खिलाड़ी जबरन थोपे जा रहे हैं जिनको अनफिट हुए पांच वर्ष से अधिक हो गए हैं। लोगों का कपिल को समर्थन भी इसलिए मिला कि लोगों को लगा कि कपिल अब नये स्टारों को लायेंगे पर ऐसा हुआ नहीं।

कपिल अगर विश्व में मौजूद क्रिकेट की नियंत्रक संस्थाओं (format) के स्वरूप में ही बढ़ना चाहते हैं तो नहीं लगता कि उनको कोई अधिक सफलता मिलने वाली है। वह शायद सोच रहे थे कि भारत के कुछ स्टार खिलाडी उनसे जुड़ जाएं तो वह आगे बढ़ें तो एक तो इतनी अधिक आर्थिक उपलब्धियाँ छोड़कर उनके पास आयेंगे नहीं और आ गए तो नयेपन की चाह रखने वाले लोग उनसे दूर हो जायेंगे। इसलिए कपिल देव को केवल क्रिकेट को खेल समझते हुए भी इस बात का ध्यान रखें कि अंतत: इसका आर्थिक लाभ लोगों के उसके प्रति मौजूद जजबातों को भुनाने में है। व्यावसायिक क्षेत्रों में आजकल यही हो रहा है। बात अगर है तो बस इतनी कि भारत के लोग थके खिलाडियों और आधे बूढे हो चुके अभिनेताओं की जगह नये चेहरे देखना चाहते हैं वह नही हो रहा है और जो ऐसा करेगा उसे सफलता मिलेगी। आज के भौतिक युग में किसी व्यक्ति को इस आधार पर कभी सम्मान नहीं मिलता कि उसमें अभिनय, कला और खेल में कितनी काबलियत है बल्कि उसकी आर्थिक उपलब्धियाँ ही देखीं जातीं हैं।

10/20/07

बीस ओवर में भारतीय टीम की जीत

भारत पचास ओवर के मैचों की श्रंखला आस्ट्रेलिया से हार गया पर बीस ओवर के मैच में उसने फिर आस्ट्रेलिया को सात विकेट से हरा दिया। एक दिवसीय मैचों में जिस तरह आस्ट्रेलिया भारत पर हावी था वैसे ही इस बीस ओवर के मैच में भारत के खिलाड़ी उस पर हावी थे । दक्षिण अफ्रीका में बीस ओवर के विश्वकप के सेमीफाइनल में जिस तरह आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी हैरान हो रहे थे वैसे ही आज के मैच में भी हुए। अपने वरिष्ठ खिलाडियों के बोझ से मुक्त होने के बाद भारत के खिलाड़ी किस तरह खतरनाक हो जाते हैं यह इन बीस ओवर के मैचों से जाहिर होता है।
भारत के खिलाडियों को देखकर नहीं लगता कि वह कोई आस्ट्रेलिया की परवाह करते हैं। चाहे जो गेंदबाज आ रहा है उसको मारने के लिए तैयार हो जाते हैं। किसी खिलाडी के आउट होने की चिंता नहीं दिखाते। चाहे जो क्षेत्र रक्षक हो उसके सामने से रन ले जाते हैं। अगर हम यह कहते हैं कि पचास ओवर और बीस ओवर की मैच की तकनीकी में अंतर है तो हमने तो आस्ट्रेलिया को पचास ओवर के मैच भी बीस ओवर की तरह खेलते देखा है-फिर भारत के खिलाडियों को उसमें क्या दिक्कत आती है? अब यह बात साफ हो गई कि भारत के खिलाडियों पर पचास ओवर के मैच में कुछ ऐसे दबाव हैं जो वह झेल नहीं पाते। वैसे यह दाव अच्छा लग गया है। पचास ओवर के मैच में पिटने के बावजूद भारत में बीस ओवर की आड़ में क्रिकेट लोकप्रिय हो रहा है और इसलिए अनफिट खिलाड़ी पचास ओवर के मैच खेलकर अपना काम चलाते रहेंगे और युवा खिलाडी बीस ओवर में मैच जितवा कर भी पचास ओवर की टीम में जूनियर की तरह खेलेंगे।
हालांकि भारत की फील्डिंग बहुत खराब थी पर कोई आस्ट्रेलिया वाले भी इस मामले में खरे नहीं उतरे और उन्होने ओवर थ्रो कर भारत का बोझ हल्का किया। वह भी इस दबाव में थे कि अब तो भारतीय खिलाड़ी खुलकर प्रहार करेंगे और उनसे डरने वाला कोई नहीं है और न ही कोई बैट से गेंद को आगे धकेल कर पीछे भागने वाला है। जो भी खेलेगा वह रन के लिए भाग लेगा सो अंधाधुंध थ्रो किये जिसे भारतीय खिलाडियों को कम से कम बारह रन अधिक मिले और वह आराम से जीत गए। कुल मिलाकर क्रिकेट अब चाहे बीस ओवर का हो या पचास ओवर का बहुत फास्ट हो गया है और अब इसे नये खिलाड़ी खेल सकते हैं। में टीवी पर पुराने क्रिकेट खिलाडियों के बातें सुन रहा था और मुझे नहीं लगता कि वह इस खेल से ज्यादा वाकिफ है क्योंकि सभी पचास ओवर में अनुभव को जरूरी बता रहे हैं। उनकी बातों को सुनकर नहीं लगता कि उन्हें विश्व की अन्य टीमों का ज्ञान है। वह सिर्फ भारत के खिलाडियों को ही देखकर अपने विचार रखते हैं और एक दिवसीय विश्व कप में भारतीय खिलाडियों ने निहायत खराब प्रदर्शन किया उसका उन्हें ध्यान है। बंगलादेश से हार को आज भी पुराने क्रिकेट प्रेमी पचा नहीं पा रहे।
भारतीय टीम के युवा खिलाडियों को इस जीत पर बधाई। वास्तव में जिस तरह वह एक जुट होकर वह बीस ओवरों के मैचों में खेलते हैं वह तारीफ के योग्य हैं। अभी पचास ओवर में भारतीय टीम बहुत पीछे है और उम्मीद करते हैं कि युवाओं को उसमें मौका मिलेगा तो उसमें भी वह ऐसा ही खेलेंगे।

9/24/07

क्रिकेट टीम को विश्वकप जीतने पर बधाई

बीस ओवरीय क्रिकेट विश्वकप जीतने पर भारतीय क्रिकेट टीम को हार्दिक बधाई। अभी से कुछ देर पहले ही जोहानसबर्ग में समाप्त हुए फाइनल मैच में भारत ने पाकिस्तान को पांच रन से हराकर कप जीता। धोनी के नेतृत्व में सभी खिलाडियों ने एकजुट होकर खेला और यह साबित किया कि अगर सभी खिलाड़ी लगन से खेलें तो कोई काम मुशिकल नहीं है। इस जीत का श्रेय किसी एक खिलाड़ी को नहीं दिया जा सकता क्योंकि यह टीम की एकता की जीत है। सभी देशवासियों और अपने मित्रों को इस जीत पर बधाई। एक क्रिकेट प्रेमी होने के नाते मैं यह कप ही अपनी टीम जो जीतते देखना चाहता था। २००३ में भारत के फाइनल तक पहुँचने की मुझे ख़ुशी नहीं हुई थी क्योंकि वह हारी थी। इसके साथ ही धोनी ने कपिलदेव के समान स्थान भी प्राप्त कर लिया और शायद कपिल इस बात से बहुत खुश हुए होंगे कि उन्हें यह चुनौती मिली। इससे देश के लोगों में आत्म विश्वास बढेगा ऎसी मुझे आशा है।

पाकिस्तान के खिलाड़ियों ने भी जीवटता के साथ भारत का मुकाबला किया और इस खेल को भारतीय उप महाद्वीप में पुन: स्थापित करने में अपनी भूमिका निभाई। आगे उनके लिए और भी अवसर आएंगे, क्योंकि यह खेल तो चलता रहेगा।

4/30/07

आस्ट्रेलिया की जीत:पैसे से सबकुछ नही होता

क्रिकेट में आस्ट्रेलिया ने अपनी ताकत दिखा दीं है, उसके हर खिलाड़ी में जो खेलने का जज्बा है उसकी हमें प्रशसा ही करनी चाहिए। अगर यह टीम कहीं विश्व कप नहीं जीत पाती तो लोगों को अफ़सोस होता, क्योंकि खेल की तकनीकी और नीयत की दृष्टि से उसके खिलाड़ी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों मैं हैं। वह न केवल शक्ति से भरपूर हैं वरन बुध्दिमान हैं और खेल की तकनीकी और रणनीतिक कौशल में उनका कोई सानी नहीं है। कम से कम कोई एशिया की टीम उनकी बराबरी की तो नहीं लगती । यह केवल उनकी विजय पर ओप्चारिकता की दृष्टि से नहीं कह रहा हूँ बल्कि यह उनके खेल को देख कर ही ख रहा हूँ। जब वह खेले हैं तो बस उनका ध्यान अपने खेल पर ही रहता है। क्रिकेट में फिटनेस का पता बैटिंग और बोलिंग से नहीं चलता, बल्कि क्षेत्ररक्षण और रन के लिए विकेटों के बीच दौड़ने से उसे देखा जाता है। इस दृष्टि से उसके खिलाड़ी एक टीम के रुप में दुनियां के सर्वश्रेष्ठ टीम बनाते हैं। हम भारतवासी चूंकि एकदम भावुक होते हैं इसीलिये अपनी टीम में दोष नहीं देख पाते, और यही कारण है कि कभी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कहलाने वाले टीम आज बुरी तरह से पतन के गर्त में समां चुकी है। निकट भविष्य में इसके उत्थान की कोई संभावना भी नहीं दिखती। यहां कोई खिलाड़ी एक दो मैच में अच्छा प्रदर्शन करता है तो लोग लंबे समय तक उसे अपनी टीम में खेलते देखना चाहते हैं और इसी कारण चयनकर्ता भी आलोचना की वजह से मजबूर हो जाते हैं। आजकल विज्ञापन के युग में चूंकि खिलाड़ी जनता में देवता बन जाते हैं और अनेक बड़ी कंपनियां अपने उत्पाद बेचने के लिए उनका इस्तेमाल करती है और वह मैचों का प्रायोजन भी करती हैं तो उनके अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष दबाव में भी टीम बनाई जाती है और यह स्वाभाविक है। आख़िर हम लोग भी तो उनके द्वारा सुझाए गये उत्पादों को न केवल खरीदते हैं और उनके द्वारा की गयी एक्टिंग को भी सराहते हैं। उनके विज्ञापनों की लोगों में चर्चा होती है और इसी से होती है रेटिंग जो खिलाड़ियों के लिए वरदायी सिध्द होती है।
विश्व कप से पहले कुछ लोग कहते थे कि पूरी विश्व की क्रिकेट भारत कई पैसे से चल रही है -इसकी समस्त प्रायोजक कंपनियाँ भारत में कारोबार करती हैं । इसका प्रमाण यह है कि उनके उत्पादों के लिए भारत ही नहीं वरन आस्ट्रेलिया, वेस्ट इंडीज ,पाकिस्तान और श्रीलंका के खिलाडियों ने भी उनके लिए विज्ञापनों में काम किया। इस समय इंडियन क्रिकेट बोर्ड दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्डों में है, भारतीय खिलाड़ी भी अन्य देशों के क्रिकेट खिलाडियों से कहीं ज्यादा अमीर हैं, और आस्ट्रेलिया की इस जीत ने साबित कर दिया कि पैसा ही सब कुछ नहीं होता। भारत में बैठे क्रिकेट रणनीतिकार विश्व कप से पहले सोच रहे थे कि क्रिकेट हमारी दम से है तो उनका भरम टूट गया है। उनकी यह खुश्फमी दूर हो गये है कि पैसे से क्रिकेट खेला जाता है -जबकि उनको यह बात समझनी चाहिए थी कि क्रिकेट से पैसा आता है न कि उससे खेला जाता है। भारतीय खिलाड़ियों में भी अपने पैसे का कहीं न कहीं गरूर था जो उन्हें ले डूबा। अब जो कंपनियां भारतीय टीम पर पैसा लगा रही थी वह धीरे-धीरे किनारा कर रहीं हैं और जो हैं वह भी आगी इसी नीति पर चलेंगे। १९७३ से से लेकर २००७ तक जो क्रिकेट का जूनून था वह आम लोगों की सद्भावना के कारण था पूंजीपतियों की वजह से नहीं था। वह तो सद्भाव्नाओं का दोहन कर कर उनसे पैसा कमाने के लिए क्रिकेट से जुडे थे जो अब साथ छोड़ देंगे। (शेष अगले अंक में)

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