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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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12/6/07

रौशनी की तलाश अँधेरी गले में करता है

इधर-उधर दौड़ते और भागते
लोगों का समूह
दिल का चैन पाने के लिए
भटकता है
जैसे कोई ऐसा पेड़ हो
जिस पर सुकून का फल लटकता है
जुबान के चसके को ही
पेट की भूख समझता है
भर जाये जो पेट सुखी रोटी से
अकारण चाशनी के लिए तरसता है
दिमाग में पलते ख्यालों को
दिल की ख्वाहिश समझता है
और अपना ईमान
बैईमानों के बाजार में
कौडी के भाव बिकने के लिए रखता है
इंसान अगर अपने अन्दर बैठे
इन्सान को ही समझ ले
तो रूह की रौशनी से उसकी
जिन्दगी हो जाये रोशन
पर वह तो उससे दूर
रौशनी की तलाश में
अंधेरी गली में करता है

12/2/07

सच तन्हाँ लगता है

आँख के अंधे अगर हाथी को
पकड कर उसके अंगों को
पकड लें
अपने बुद्धि के अनुसार
उसके अंगों का बयान
कुछ का कुछ कर लें
तो चल भी सकता है
पर अगर अक्ल के अंधे
रबड़ के हाथी को पकड़ कर
असल समझने लगें तो
कैसे हजम हो सकता है

कभी सोचा भी नहीं था कि
नक़ल इतना असल हो जायेगा
आदमी की अक्ल पर
विज्ञापन का राज हो जायेगा
हीरा तो हो जायेगा नजरों से दूर
पत्थर उसके भाव में बिकता नजर आएगा
कौन कहता है कि
झूठ से सच हमेशा जीत सकता है
छिपा हो परदे में तो ठीक
यहाँ तो भीड़ भरे बाजार में
सच तन्हाँ लगता है
इस रंग-बिरंगी दुनिया का हर रंग भी
नकली हो गया है
काले रंग से भी काला
आदमी के मन का लगता है

11/30/07

रिश्तों की ग़लतफ़हमी

उनके पास आते ही सुखद
अहसास पास आ जाते हैं
सारे गिले-शिकवे हम
पल भर में भूल जाते हैं
इसीलिए कहते हैं कि
जो शरीर के पास है
वही दिल के पास है
क्योंकि दिल ही है वह
जो आदमी को अपने चाहने वालों के
पास ले जाता है
वरना तो पास रहने वाले से ही
बहुत दूर अपने को पाते हैं
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अपनों के मुहँ से बोला गया
सहानुभूति का एक शब्द भी
दिल में उम्मीद की रोशनी जगाता है
और गैरों की ढेर सारी दुआओं से
अधिक विश्वास जगाता है
शायद इसलिए ही
अपने भी इतराते हैं
हमदर्दी के शब्दों को जुबान पर
लाने से कतराते हैं
अपने दिल को अपने से ही छिपाते हैं
रिश्तों की यही ग़लतफ़हमी है
जिनके दिल टूटते हैं
वह उसे गैरों में लगाते हैं
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11/22/07

जब निहारते हैं जमीन पर

कुछ पल की खुशी की चाहत भी
कभी पूरी नहीं होती
क्या कोई दिल लगायेगा हमसे
चीजो से भरकर भी अपना घर लोगों की
ख्वाहिशों की भूख मरी नहीं होती
पानी की प्यास हो जिसे
ओक से पीकर भी तसल्ली कर ले
जो प्यासे हैं चांदी के
उसके ग्लास में पानी पीते हैं
पर उनकी प्यास कभी नहीं मरी होती
हमने सडको पर चलते हुए
देखे हैं दुनिया के रंग
लोहे की बंद गाड़ियों में
जो घूमे है हमेशा
क्या करेंगे हमसे संग
जिनके मन में दुनिया लूटने की चाह
वह क्या किसी को इनाम देंगे
जो लुटाते हैं दौलत ज्ञान की
कुछ पाने की चाह उनके मन में नहीं होती
गगन चुम्बी इमारतों में रहने वालों के
मन में होती है चुभन
जब उनके बीच झौंपडियों की बस्ती होती
जमीन पर खडे होकर जब देखते हैं
हम आकाश की तरफ
कहीं खुशी लटकी नहीं होती
निहारते हैं जब जमीन पर दिल से
तब यहीं कहीं बिखरी होती
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11/13/07

अपने शब्दों को कागज़ पर आने दो

मन में घुमड़ते शब्द
जब सताने लगें तब समझना
अपना अर्थ समझाने के लिए
जमीन पर उतरना चाहते हैं
जब मन में हो अकेलापन
ख्यालों में हो हो सूनापन
तब समझना कुछ शब्द हैं
तुम्हारे मन में
जो किसी अर्थ का साथ ढूंढना चाहते हैं

उन्हें जितना अपने अन्दर रोकोगे
विष बनकर डसने लगेंगे
तुम्हारे खालीपन में बीभत्स
आवाज करने लगेंगे
जब कहीं मन न लगता हो
कलम को अपना साथी बना लो
सत् साहित्य की किताबों को
अपना गुरु बना लो
जब अकेलेपन का अहसास हो
समझ लेना तुम्हारे शब्द
कागज़ पर अपना घर बनाना चाहते हैं
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