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6/30/11

पुरानी कहानी-हिन्दी क्षणिकायें (purani kahani-hindi kshaniaen)

विकास की इमारत में
किसी मजदूर का खून
पसीना बनकर बह रहा है,
वह फिर भी गरीब है
उसका अभाव
पुराने शोषण की पुरानी कहानी कह रहा है।
------------
दौलतमंदों की तिजोरी में
जैसे जैसे रकम बढ़ती जायेगी,
कागजों पर पर गरीबी की रेखा
उससे ज्यादा चढ़ती नज़र आयेगी।
------------
यकीनन विकास बहुत हुआ है
पर हम वहीं खड़े हैं,
सभी कह रहे हैं
देश विकास की राह पर
दौड़ता जा रहा है
हम यकीन कर लेते है
देश बड़ा है
हम थोड़े ही बड़े हैं।
----------
विकास में अमीर
जमीन से आकाश पर चढ़ते हैं,
मगर गरीब हमेशा
अपनी पुरानी रोटी की
लड़ाई पुराने ढंग से ही लड़ते हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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5/11/10

एक गैर के वास्ते-हिन्दी शायरी (paraye ke vastei-hindi shayari)

नगर में
पर्दे पर महानगर को तैरता देखकर
उसमें उतरने के लिये
हर युवा दिल मचलता है
मालुम न था उसे पत्थर के इस जंगल में
कातिल बीज भी पलता है,
जो साथ लेकर बुरा समय फलता है,
सौंदर्य के सौदागर हर मोल पर
खरीदने कौ तैयार हैं,
दरियालदिल दिखते पर सब मतलब के यार हैं,
जज़्बात की कीमत चुकाते हुए करते प्यार
पैसे भी देकर करें दिल का व्यापार
धोखे की साथ लेकर परछाई।

कहते हैं लोग
जिंदगी के मीठे और कड़वे स्वाद तो
गंवार भी जानते हैं
फिर वह पढ़ी लिखी क्यों न समझ पाई।

कौन समझाये कि पढ़े लिखे होने का मतलब
ज्ञानी होना नहीं होता,
जिंदगी के रस में अंग्रेजी पढ़ा लिखा ही
आम की जगह बबूल के पेड़ बोता,
दिमाग से बडा दिल मानते
रूह से नासमझ हैं पढ़े लिखे लोग
मस्ती का है लाइलाज रोग,
जिसका इलाज नहीं
जहां आये मजा जम गये वहीं
अच्छे बुरे की पहचान अंग्रेजी पढ़ते गंवाई।

मगर कब तक चलता यह सब
भांडा फूटना था अब
उसने अपने गले के लिये रस्सी बनाई
छोड़ गयी अपने लोगों के लिये
वह लड़की जगहंसाई।।
एक गैर के वास्ते
अपनों की महंगी जिंदगी
सस्ते प्यार के जुए में दाव पर लगाई।
-----------

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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1/8/10

लेखक कभी बिचारे नहीं होते-हिन्दी शायरी (lekhak kabhi bichare nahin hote-hindi shayri)

कागज को स्याही से रंगने वाले

शब्दों की मय पीने वाले

लेखक कभी बिचारे नहीं होते।

कलम को चलाकर  घिसें

या टंकण पटल पर उंगलियां नचायें,

पढ़ने वालों का अच्छे लगें या बुरे

पर लिखने वाले का दिल बहलायें

शब्द कभी बिना सहारे नहीं होते।

बहा रहे हैं पसीना,

चुन रहे हैं शब्दों का नगीना,

उनकी मेहनत को नकारा न समझो

सच्चे लेखक ही दुनियां को प्यार करते

भले ही खुद किसी को प्यारे नहीं होते।

-----------



आंखें गढ़ाये

उंगलियों को नचाते हुए

शब्द रचने वाले लेखक पर

मत हंसो

क्योंकि जिंदगी को वही जी पाते हैं।

अकेले बैठे लिखते हुए

उस लेखक को तन्हा न समझो

अपनी कलम से

शब्दों को अपना साथी वह बनाते हैं।

तुम अपनी जुबां से

किसी के लिये बुरा बोलते हो,

हर बात में अपना मतलब तोलते हो,

सिक्कों में खुशी देखने वालों

शब्द रचयिता अपनी शायरियों में

अनमोल मजा पी जाते,

सभी करते हैं अपना वक्त खराब

पर लेखक ही सभी को नकारा  नजर आते,

बोलना आसान है

उससे ज्यादा आसान है चिल्लाना

यह तो सभी लोग करते

पर अपने शब्दों को तीर की तरह लेखक चलायें,

जरूरत हो तो  चिराग की तरह भी जलायें,

लोग करते हैं एक दूसरे पर जख्म

पर लेखक बांटते हमदर्दी

अपने घाव वह पी जाते हैं।

दूसरों को भले ही कुछ भी लगें

पर लेखक कभी खुद को बिचारा नहीं पाते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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12/26/09

दिन का दावा, रात का छलावा-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (din ka dava,rat ka chhalava-hindi vyangya kavieaen)

करते हैं जो दिन में

नैतिक आदर्श की बात,

बेशर्म बना देती है

उनको अंधियारी काली रात।

चेहरे की लालिमा को

उनके अंतर्मन का तेज न समझना

मेकअप भी निभाता है

चमकने में उनका साथ,

सूरज की रौशनी में

जिस सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरते

उसी की इज्जत पर रखते हैं रात को लात।।

---------------
खुल रही है समाज के ठेकेदारों की कलई

शरीर पर हैं सफेद कपड़े, नीयत में नंगई।

बरसों तक ढो रहा है समाज, सरदार समझकर

हाथ जोड़े खड़े मुस्कराते रहे, दिल जिनसे कुचले कई।।

नारी उद्धार को लेकर, मचाया हमेशा बवाल

मेहनताने में मांगी, हर बार रात को एक कली नई।

-------------

टूट रहा है विश्वास

मर रही है आस।

जिन्होंने दिये हैं नारी उद्धार पर

कई बार दिन में प्रवचन,

करते रहे वही हमेशा

काली रात के अंधियारे में काम का भजन,

देवी की तरह पूजने का दावा करते दिन में

रात को छलावा खेलें ऐसे, जैसे कि हो वह तास। 
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12/10/09

स्वर्ग और परियां किसने देखी-हिन्दी व्यंग्य कविता (svarg aur pariyan-hindi satire poem)



स्वर्ग की परियां किसने देखी

स्वयं जाकर

बस एक पुराना ख्याल है।

धरती पर जो मिल सकते हैं,

तमाम तरह के सामान

ऊपर और चमकदार होंगे

यह भी एक पुराना ख्याल है।

मिल भी जायें तो

क्या सुगंध का मजा लेने के लिये

नाक भी होगी,

मधुर स्वर सुनने के लिये

क्या यह कान भी होंगे,

सोना, चांदी या हीरे को

छूने के लिये हाथ भी होंगे,

परियों को देखने के लिये

क्या यह आंख  भी होगी,

ये भी  जरूरी  सवाल है।

धरती से कोई चीज साथ नहीं जाती

यह भी सच है

फिर स्वर्ग के मजे लेने के लिये

कौनसा सामान साथ होगा

यह किसी ने नहीं बताया

इसलिये लगता है स्वर्ग और परियां

बस एक ख्याल है।



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11/18/09

अखबार की सुर्खियों में-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (akhbar ke surkhiyan-hindi vyangya kavitaen)

 हमने कहा था

‘जख्म पर मरहम लगा दो’

उन्होंने नमक छिड़क दिया।

पीड़ा से हम कराहते रहे

उन्होंने कहा

‘कुछ जोर से कराहो

ताकि हम मरहम लगाकर

जमाने को बता सकें कि

हमने किसी का दर्द कम किया’।

------------

नजारे तो इस दुनियां में बहुत हैं

मगर लोगों को बस दंगल ही भाता ।

अपने मंगल की बजाय

दूसरे के अमंगल पर मजा आता।

जिंदगी खेल है नजरिये का

जैसी नजर

वैसा ही जमाना हो जाता।

तारीफ के लिये कौन करे

इंसानों का भला

शिकायत के लिये

मजबूर करने वालों का नाम

अखबार की सुर्खियों में ही नजर आता।

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11/14/09

राहत और परेशानी-व्यंग्य कवितायें (rahat aur pareshani- hindi vyangya kavitaen)

आसमान से बादल बरस रहे हैं
क्योंकि पेड़ पौधे, पक्षु और पक्षी
पानी को तरस रहे हैं।
आम इंसान को खुशफहमी है कि
देवता उस पर मेहरबान है
उनकी पूजा पर ही ध्यान है,
कुछ इनमें ऐसे भी है
जो राहत का करते हैं व्यापार
सूखा जाता देख उनका दिल झूलस रहे हैं।
-----------
अपने हर ख्वाब को
सच में बदलता देखकर भी
इंसान हताश हो जाता है,
अब नया कौनसा देखे
यह सोचकर परेशानी जुटाता है।

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11/9/09

हमदर्दी जताने की कला-व्यंग्य कविता (hamdardi ke kala-vyangya kavita)

हमदर्दी जताने की कला
हमें कभी नहीं आई
किसी का दर्द देखकर
मन रोया मन भर आंसु
पर आंखें दरिया न बन पाई।
शायद लोग दिमाग से सोचते हैं
इसलिये हमदर्दी के शब्द जल्दी ढूंढ लेते
दिल तक नहीं पहुंचता
दूसरे का दर्द
कर लेते हैं दिखावे में कमाई।
नहीं करना सीखा पाखंड
इसलिये दूसरे के घाव पर मरहम लगाकर भी
अपने लिये ओढ़ लेते हैं तन्हाई।

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10/26/09

मतलब के पैंतरे अधिक दिन नहीं चलते-व्यंग्य कविता (matlab ke dav-hindi kavita)

जो दूसरे का आशियाना उजाड़कर
उस जमीन पर अपना महल बनाते हैं।
समाज सेवा के लिये वही
भरी भीड़ में पुरस्कार पाते हैं।
करते हैं जो अपने कदम तले
मासूम जज़्बातों का कत्ल
वही देश भक्ति का नारा
बड़े जोर शोर से लगाते हैं।

जमाने के बदलाव की बात करने वाले
अपने सिर पर पुरानी किताबें ढोते हुए
तरक्की का संदेश सुनाते हैं।
रोज जमाने से बेवफाई करने वाले
लोगों का वफा के लिये जगाते हैं।
चीख रहे बड़े बड़े लोग
अपनी चैन की नींद के लिये
भीड़ में चेतना लाते हैं।
मतलब के पैंतरे अधिक दिन नहीं चलते
शायद इसलिये सभी लोग अनसुनी कर जाते हैं।
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10/22/09

प्रश्न वन-त्रिपदम (prashna van-tripadam)

मन में विष
किसमें नहीं होता
शुद्धि कहां है।

सोच से जड़
हो गये ये इंसान
बुद्धि कहां है।

जले शब्द
उगलते चूल्हे
वाणी कहां है।

सभी भिखारी
ढूंढ रहे हैं माल
दानी कहां है।

लंगड़ी भाषा
सिखाई गुरुओं ने
बोध कहां है।

शिक्षित झुंड
शहर में घूमता
शोध कहां है।

दर्द की दवा
मिलती कभी कभी
रोज कहां है।

प्रश्न वन
घना है चारों ओर
खोज कहां है।

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10/16/09

तरक्की और तबाही-व्यंग्य कविता (taraqi aur tabahi-hindi vyangya kavita)


जरुरतों की शयों का रोज शक्ल बदलना
दौलत के पहाड़ पर
इंसानों की चाहतों का चढ़ना
तरक्की का यह पैमाना नहीं होता।
इंसानों के जज़्बातों की उम्र
समय के साथ न बदलती हो
ख्यालों का चैहरा भी
हालातों के साथ नया नज़र न आये
तब यह तरक्की एक वहम होती है
चलती दुनियां तो दिखती
पर जमाना वहीं का वहीं होता है।
-----------------
घर में लाते जब कोई नया सामान
उसकी जगह छोड़ता हुआ
पुराना कबाड़ कहलाता है।
कमरे में दिखती है तरक्की
बुखारी में तबाही का मंजर नज़र आता है।
फिर भी किसे फिक्र है
तरक्की दिखाते है सभी को
तबाही का मंजर तो पर्दे में छिपाया जाता है।
.......................................

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10/14/09

बाज़ार के लिखे शब्दों पर होंठ हिलाते-व्यंग्य कविता (bazar ke shabd-hindi vyangya kavita)

अख़बारों में छपे बड़े बड़े शख्सों के
बयान अब आखों से आगे बढ़कर
दिल की गहराई में नहीं जाते.
ढेर सारा कागज़ का भंडार है चारों तरफ
उसे खाने के लिए अक्षर पक्षी चाहिए
स्याही की बह रही हैं धारा,
मिलना जरूरी है उसको भी किनारा,
बाज़ार के सौदागर केवल शय ही नहीं बेचते,
ज़माने पर काबू रखने का भी खेल खेलते,
उनका खामोश रहना जरूरी है
इसलिए बोलने के लिए वह इंसानी बुत लाते.
जो बाज़ार के लिखे शब्दों पर बस होंठ हिलाते.

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8/27/09

गरम कुर्सी-हिंदी हास्य कविता (hot seat of sach ka samana-hindi hasya kavita)

इश्क परवान चढ़ जाये
माशुका बीवी बन साथ निभाये
इसलिये आशिक ने कमाने के लिये
सच की पहचान करने वाली मशीन की
दुकान लगाई
और यह खबर माशुका को सुनाई।
सुनकर वह हो गयी पसीना पसीना
पूछने पर बोली
‘’यह कैसी दुकान लगायी।
अरे, तुमने सुना नहीं
इसके चक्कर में अमेरिका में
कितने घर बरबाद हुए हैं
फिर अपने देश में भी हो चुकी
कई लोगों की जगहंसाई।
कोई और काम ढूंढो
कहीं काम नहीं चला तो तुम
कभी खुद गरम कुर्सी (हाट सीट) पर बैठोगे
कभी मुझसे बैठने को कहोगे
कहीं हो न जाये तुम्हारे और मेरे बीच लड़ाई।’’

सुनकर आशिक हंसा और बोला
‘‘अरे, यह बात नहीं है
यह एकदम नयी चीज है
अपने देश का आदमी बस
नयी चीज चाहता है
अपने पुराने ज्ञान से भागता है
अभी तो दुकान पर बोर्ड ही लगा है
तब ढेर सारे लोग तो आ रहे हैं
अपनों का सच जानने उनको ला रहे हैं
जानते हैं सब
सच कड़वा होता है
कभी कभी दुश्मनी का बीज भी बोता है
फिर भी अंधे होकर
फैशन की दौड़ में जा रहे हैं
किसी का घर बिगड़े हमें क्या
अपनी रोजी निकलनी चाहिये
जहां तक तुम्हारे और मेरे बैठने की बात है
भला कोई हलवाई अपनी मिठाई खाता है
जो हम गरम कुर्सी पर बैठेंगे
बहुत सोचकर समझकर ही मैंने यह योजना बनाई।"

..................................
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8/7/09

ईमानदारी फिर कौनसी शय है-हास्य कविताएँ (imandari kaunsi shay hai-hasya kavita)

जैसे जैसे दौलत बढ़ती गयी
विश्वास कम होता गया।
वफादारी बिकती है बाजार में
फिर भी इंसान वफा से
महरूम होता गया।
................................
कहते हैं पैसे से बाजार में
सब मिलता है।
फिर भी खुश क्यों नहीं इंसान
दुनियां की हर शय मयस्सर है
गमों में डूबा दिखता है।
हर इंसान दिल की बात
कहते हुए रोते शब्द लिखता है।
.............................
सुना है बाजार में जो चीज कम दिखती
उसकी कीमत ऊंची मिलती।
कमबख्त! ईमानदारी फिर कौनसी शय है
जो लापता है फिर भी
किसी भाव में नहीं बिकती।
.........................

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7/4/09

इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम-हिंदी शायरी (hindi shayri)

अपने पेट के लिये करते हो काम
लेते हो पूरा दाम।
अपने खून को पसीने की तरह
बहते क्यों कराहते हो
कोई आकर हमदर्दी दिखाये
क्यों चाहते हो
दौलत के पत्थरों से
दया की उम्मीद क्यों जगाते हो
ओ! मेहनतकशों को
इज्जत दिलाने की ख्वाहिश रखने वालों
बसते हैं जहां जज्बातफरोश
उस महफिल में उनको
चमकाने का झूठा दिलासा क्यों दिलाते हो
अपने लहू से सींचते हैं जो
अपने ही रोटियों का गुलशन
उनको इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम।
...............................

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4/12/08

जिस्म की भूख पर हैं सब खामोश-हिन्दी शायरी

किसी भूखे को रोटी खिलाने का
उनकी किताबों में कोई इलाज नहीं
ढेर सारे कसूरों की सजाएं है
कसूरवार की मजबूरी समझने का
कोई कहीं रिवाज नहीं
जमाने को सिखाते हैं तमाम तरीके
जन्नत में जाने के
अपनी हकीकतो से दूर
ख्वाबों में जाने के
सर्वशक्तिमान ने कोई कानून नहीं बनाया
फिर भी उसके नाम पर सुनाते हैं
चंद किताबें पढ़कर फैसले
इंसान की भूख को पढ़ने का
कहीं कोई मिजाज नहीं
सभी को मोहब्बत का पैगाम देते हैं
पर जिस्म की भूख पर है खामोश
क्योंकि उस पर किसी का बस नहीं
अरे, ऊपर वाले का नाम लेकर
दुनियो को उसके दस्तूर पर चलाने वालों
उससे पूछ का बताओ
भूखा अगर रोटी की चोरी करे
तो उसकी सजा क्यों होना चाहिए
अगर वह इंसान के पेट में भूख नहीं बनाता तो
मान लेते उसका होगा वजूद
इस धरती पर भी कहीं

12/6/07

रौशनी की तलाश अँधेरी गले में करता है

इधर-उधर दौड़ते और भागते
लोगों का समूह
दिल का चैन पाने के लिए
भटकता है
जैसे कोई ऐसा पेड़ हो
जिस पर सुकून का फल लटकता है
जुबान के चसके को ही
पेट की भूख समझता है
भर जाये जो पेट सुखी रोटी से
अकारण चाशनी के लिए तरसता है
दिमाग में पलते ख्यालों को
दिल की ख्वाहिश समझता है
और अपना ईमान
बैईमानों के बाजार में
कौडी के भाव बिकने के लिए रखता है
इंसान अगर अपने अन्दर बैठे
इन्सान को ही समझ ले
तो रूह की रौशनी से उसकी
जिन्दगी हो जाये रोशन
पर वह तो उससे दूर
रौशनी की तलाश में
अंधेरी गली में करता है

12/2/07

सच तन्हाँ लगता है

आँख के अंधे अगर हाथी को
पकड कर उसके अंगों को
पकड लें
अपने बुद्धि के अनुसार
उसके अंगों का बयान
कुछ का कुछ कर लें
तो चल भी सकता है
पर अगर अक्ल के अंधे
रबड़ के हाथी को पकड़ कर
असल समझने लगें तो
कैसे हजम हो सकता है

कभी सोचा भी नहीं था कि
नक़ल इतना असल हो जायेगा
आदमी की अक्ल पर
विज्ञापन का राज हो जायेगा
हीरा तो हो जायेगा नजरों से दूर
पत्थर उसके भाव में बिकता नजर आएगा
कौन कहता है कि
झूठ से सच हमेशा जीत सकता है
छिपा हो परदे में तो ठीक
यहाँ तो भीड़ भरे बाजार में
सच तन्हाँ लगता है
इस रंग-बिरंगी दुनिया का हर रंग भी
नकली हो गया है
काले रंग से भी काला
आदमी के मन का लगता है

11/30/07

रिश्तों की ग़लतफ़हमी

उनके पास आते ही सुखद
अहसास पास आ जाते हैं
सारे गिले-शिकवे हम
पल भर में भूल जाते हैं
इसीलिए कहते हैं कि
जो शरीर के पास है
वही दिल के पास है
क्योंकि दिल ही है वह
जो आदमी को अपने चाहने वालों के
पास ले जाता है
वरना तो पास रहने वाले से ही
बहुत दूर अपने को पाते हैं
----------------------------

अपनों के मुहँ से बोला गया
सहानुभूति का एक शब्द भी
दिल में उम्मीद की रोशनी जगाता है
और गैरों की ढेर सारी दुआओं से
अधिक विश्वास जगाता है
शायद इसलिए ही
अपने भी इतराते हैं
हमदर्दी के शब्दों को जुबान पर
लाने से कतराते हैं
अपने दिल को अपने से ही छिपाते हैं
रिश्तों की यही ग़लतफ़हमी है
जिनके दिल टूटते हैं
वह उसे गैरों में लगाते हैं
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11/26/07

यह हमने सोचा ही नहीं था

कभी चले थे हम साथ-साथ
थामें रहते थे एक-दूसरे का हाथ
एक दूसरे के दिल थे इतने पास
कभी अलग होंगे
यह हमने सोचा ही नहीं था

वक्त गुजरते-गुजरते दूर होते गए
हम पाले रहे याद उनकी
उनके बिना लम्हें खालीपन के साथ
यूं ही गुजरते रहे
कभी दिल भी इतनी दूर होंगे
यह हमने सोचा ही नहीं था

उनकी याद में हमें दिल में
चिराग उम्मीद के जगाये रखे
जब भी उनकी याद आयी
अधरों पर मुस्कान उभर आयी
हम अपने अंधेरों में भी
उनसे रौशनी उधर मांगें
यह हमने सोचा ही नहीं था

जो एक बार उनके
घर के बाहर रोशनी देखी
उस दिन कदम खिंच गए
वहीं अपनी खुशी में
वह हमें भूल जायेंगे
यह हमने कभी सोचा ही नहीं था
हमें देखकर भी उनके चेहरे पर
मुस्कान नहीं आयी
आखें थी उनकी पथराई
हम खडे थे स्तब्ध
उनके मेहमानों की फेहस्त में
हमारा नाम नहीं था
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