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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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2/22/08

वह रोकना चाहते बाहर से आगमन-साहित्यक कविता

अपने स्वाभिमान की रक्षा की बात
चाहते अपने लिए आजाद रात
ऊंचे दिखाते अरमान
अपने आप को समझें महान
पर खौफ के साए में ही जीते वह लोग
अपने इलाकों में आते पंछियों पर करते घात
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

अपने घर से बाहर जाते लोगों पर बस नहीं
जाकर तरक्की करेंगे कहीं
उनके नाम पर अपने घर में जश्न मनाएंगे
सबको अपने सामने चमकाएंगे
अपने घर का पलायन उन्हें सुहाता
पर घर पर किसी पंछी का चहचहाना उनको नहीं भाता
आदमी को पहचानने का दावा
देख नहीं पाते उसका मन
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

सच से परे जीते वह लोग
दिमाग में हैं लड़ने का रोग
जिस सर्वशक्तिमान ने बनायी
यह धरती और इंसान
वह भी नहीं कर पाता
अपने कब्जे में इंसान का मन
नहीं रोक सकता
इधर से पलायन और उधर से आगमन
सजाये बैठे हैं अपने लिए लोहे के महल
करते हैं भ्रम फैलाने की पहल
दुनिया के इस सच से परे
आदमी नहीं चलाता है उसे उसका मन
घूमती दुनिया और घड़ी कभी नहीं रुकती
कहीं उजड़ता तो कहीं बसता है चमन
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

12/21/07

उदासी का साया

मन से मनुष्य कहलाया
चलता है उसी के इशारों पर
अन्दर बैठे अहंकार ने
स्वयं ही चलने का अहसास कराया
कह गए बडे-बडे सिद्ध
अपने मन को पहचानो
कभी नाचता है
कभी भागता है
कभी भक्ति भी चाहता है
स्वयं मनस्वी होकर चलो
यही सभी ने समझाया

पर आदमी नहीं समझता
अपनी बुद्धि और अंहकारवश
दूसरों में तलाशता अपने लिए अक्ल
माया के सिंहासन पर बैठे
बुतों के इर्दगिर्द देकर परिक्रमा देकर
बहुत सुकून अनुभव करता
तन की खुशी को ही मन की समझता
इसलिए हांक कर ले जाते है
इस ज़माने के उसे नये खैरख्वाह
रुपहले परदे पर देखे दृश्य को
असली समझता
नाम के मनुष्य बहुत हैं पर
सबका मन मुरझाया
जब तक चलते हैं दृश्य
गूंजता हैं कानों में भयानक शोर
तब तक चलता है
अकेले में छा जाता है उस पर उदासी का साया
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12/18/07

रुग्ण साहित्य

लिख कर प्रशंसा और पैसा
पाने की चाहत
शब्दों का व्यापारी बना देती है
न साहित्य से वास्ता
न समाज के लिए बनाना रास्ता
कलम उगलती है नाश्ता
शौहरत की बुलंदी
थोडी सी आलोचना भी
भृकुटी तना देती हैं

लिखते हैं बहुत लोग
उनको पढ़ कर वाह-वाह करने
वाली भीड़ भी जुट जाती
शब्दों पर नहीं
अदाओं पर तालिया बजाती
अनर्थ से भरे
भाव से परे
लिखते हुए लोग
इलाज की बजाय ला रहे रोग
रुग्ण साहित्य न पढों
हर माँ इसलिए बच्चे को बताती
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12/14/07

अपने बुलाए दर्द को झेलते हैं

जब दिल में प्यार नहीं होगा
तब जुबान से निकले शब्दों में
कैसे झलकेगा
जब खून में नहीं हैं हमदर्दी तो
सुर में दर्द कैसे लगेगा
यूं ही हवा में बाते करते हुए
बीत गए बरसों
अब क्या उम्मीदों का
आसरा लगेगा
अपने जजबातों से ही जो खेलते हैं

आंखों से खूबसूरत नजारे देखने की बजाय
खून से रंगे स्याह पन्नों को
पढ़ने में उनको ठेलते हैं

हादसों को देखने-सुनाने की चाह में
आदमी भूल गया है यह बात
जैसे देखेंगे ख्वाब
वैसे ही नजारे सामने आयेंगे
फिर भी दूसरों के दर्द को देखकर
हमदर्दी की बजाय
यही होती है ख्वाहिश कि
किसी को दर्द पैदा हो
तो उसे हम सहलाएं
लोग इस जहाँ में अपने दिल से
बुलाए दर्द को ही झेलते हैं

11/30/07

रिश्तों की ग़लतफ़हमी

उनके पास आते ही सुखद
अहसास पास आ जाते हैं
सारे गिले-शिकवे हम
पल भर में भूल जाते हैं
इसीलिए कहते हैं कि
जो शरीर के पास है
वही दिल के पास है
क्योंकि दिल ही है वह
जो आदमी को अपने चाहने वालों के
पास ले जाता है
वरना तो पास रहने वाले से ही
बहुत दूर अपने को पाते हैं
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अपनों के मुहँ से बोला गया
सहानुभूति का एक शब्द भी
दिल में उम्मीद की रोशनी जगाता है
और गैरों की ढेर सारी दुआओं से
अधिक विश्वास जगाता है
शायद इसलिए ही
अपने भी इतराते हैं
हमदर्दी के शब्दों को जुबान पर
लाने से कतराते हैं
अपने दिल को अपने से ही छिपाते हैं
रिश्तों की यही ग़लतफ़हमी है
जिनके दिल टूटते हैं
वह उसे गैरों में लगाते हैं
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11/13/07

आदमी और शराब का रिश्ता

बोतल से निकली मय
मुहँ से चलकर गले में उतर आयी
एक-दो पैग में ही गम और दर्द की
गायब हो गई परछाई
ऐसे मदहोश हुए कि आकाश में
उड़ते और जमीन से हो जाती थी
दिमाग की विदाई
जितना पीते उतना ही तेज भगाती
सपनों के महल बडे-बडे सजाते
ख्याली पुलाव पकाते
उतर जाती जब सिर से
हताश हो जाती थी तरुणाई

गजल के शेर को
ख्याली पिंजडे में बंद कर दिया
शायरी को नशे की हद में तंग कर दिया
चलती रही जंग कई बरस
और निकला शेर उस पिंजडे से
छोड़ आयी हद शायरी जब नशे की
बज उठी लफ्जों की शहनाई
शराब चीज ही ऐसी है
पहले पीता आदमी
फिर पीती वह आदमी को
पर आदमी भी ऐसा है एक बार
पीता है तो छोड़ नहीं पाता
आदतन शराबी बन जाता
छोड़ दे फिर हाथ नहीं लगाता
पर फिर भी
उसकी याद को शायरी में सजाता
आदमी और मय का रिश्ता
कभी भी समझ में नहीं आता
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11/6/07

हकीकत

जिस विश्वास को पाले रहते हैं
कई बरस तक मन में
जब टूट कर बिखरते हैं कांच की तरह
डूब जाते हैं गम में
कुछ भ्रम होते हैं
जिन्हें हम विश्वास का नाम देते हैं
किसी प्रमाण के बिना हम अजनबियों को
आत्मीय होने का नाम देते हैं
किसी के अपन होने का
अपने को खूब दिलासा दें
हकीकत यह है कि
सैर करने के लिए कई लोग मिलते हैं
पर हम अकेले ही होते हैं चमन में

10/30/07

प्यार और यकीन

प्यार में कभी-कभी धोखे भी हो जाते हैं
हर आदमी जिंदा है अपने यकीन के साथ
मिलन के बाद अपना यकीन
एक दूसरे पर थोपते नज़र आते हैं
जो जीता वही विजेता कहलाता है
जो हारा गुलाम हो जाता है
इसलिए होती है रिश्तों में जंग
हो जाता है हारने वाला तंग
पहले प्यार करने वाले
एक दूसरे के यकीन का कत्ल
करते नजर आते हैं
मोहब्बत तो होती है पल भर
रिश्ते रहते हैं जिन्दगी भर
इसलिए हम ख्यालों के साथ ही
रिश्ते जोड़े जाते हैं
वही दूर तक चल पाते हैं
प्रश्न यह नहीं कि यकीन कैसा है
जो जीते हैं अपने यकीन के साथ
वही ले पाते हैं खुली हवा में सांस
जो ओढ़ते हैं मजबूरी में
प्यार और मोहब्बत के नाम
पराये यकीन का साथ
वह जिंदगी में गुलाम हो जाते हैं
प्यार और मोहब्बत के ख्वाब तो
पल में हवा होते हैं
पर यकीन के बिना
साथ नहीं निभाए जाते हैं

10/25/07

फिसलना जुबान का

अपने कहे से लोग पलट जाते
या अपना कहा याद नहीं रख पाते
खुदगर्जी का आलम यह कि
लफ्जों के मायने लोग अपने ही
हिसाब से सुनाते
बोलने से पहले सोचते नहीं
और सोचते हैं तो बोलने के लिए
सही लफ्ज भी नहीं ढूंढ पाते
अपने ही बुने जाल में
लगाते हैं पैबंद
बिछाते हैं दूसरे के लिए
पर खुद ही फंस जाते
चमड़े की जुबान कब और कहाँ फिसली
कौन रखता है हिसाब
सुनने वाले भी कौन याद रखते हैं
जो कभी मांगेंगे जवाब
पर निकलना फिर भी
बहुत मुश्किल होता है
अपने कहे से फंसने पर
निकलना हर हाल में
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10/24/07

सुनता कोई किसी की नहीं

अपने दिल पर हुए घावों को
हम छिपाएं कब तक
दूसरे के दर्द को सहलाएं कब तक
हमसे पूछते हैं हाल
और अपनी कहानी सुनाने लगते हैं
रुकते नहीं वह हमारे जवाब आने तक
अपने दर्द अधिक है उनको
या सहने की ताकत कम है उनमें
यह तो वही जाने
दर्द इतना है कि छलक जाता है
कि किसी के मिलते ही सब्र का प्याला
या डर लगता है कहीं सामने वाला
लगे न अपने हाल सुनाने
किसी के दर्द का कोई इलाज क्या करे
सुनता कोई किसी की नहीं
सब लगते हैं अपना हाल बताने

10/23/07

भूख और फ़रिश्ते

सुबह लगती है
दोपहर को उबलती है
शाम ढलती है
पर मन में उफनती हैं
रात को भी नहीं हैं विराम
भूख ऐसी आदत हैं इंसान की
जो तन की मिट जाये
पर मन की कभी नहीं भरती है
अगर वह नहीं होती तो
आसमान में फ़रिश्ते बेकार होते
धरती पर उनके लिए
कभी कोई नहीं होता काम
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