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5/25/17

पतझड़ में सावन का सपना बिक जाता है-फेसबुक पर लिखी गयी व्यंग्य कवितायें (peom writhing ong Fecebook)

वह सजते हैं
बाज़ार में उन्हें जो सजना है।
सूरत चमकानी है
अपनी काली नीयत से जो बचना है।
---
मन का क्या
उसे तो मचलना है।
पैरों के इरादे जरूर देखना
कठिन राह पर जिन्हें चलना है।
-----
अपनी मस्ती में जीने की
आदत पुरानी हो गयी है
नयी अदा दिखाने की
चाहत ही खो गयी है।

पतझड़ में
सावन का सपना
बिक जाता है।
अभावों में
हमदर्दी के बाज़ार में
वादा ही टिक पाता है।
---
दूरदराज के अपने किस्से
सुनाकर भरमाते हैं।
अपने घर के हाल पर
वही बोलने में शरमाते हैं।
--
नया मुखौटा लगाकर
रोज नया वादा कर जाते हैं।
हर बार माल पार
पहले से ज्यादा कर जाते हैं।
-------
चंद चेहरे होते
जिनकी एक पल की नज़र
निहाल कर देती है।
पर थोड़ी तसल्ली भी
बेहाल कर देती है।
-----
अब कोई साथ निभाये
बड़ी बात होती है।
वरना तो यकीन की
रोज मात होती है।
------
सभी के अपने दाव हैं
कोई छिपकर कोई दिखकर
लगाता है।
जो जीता वहीं
सिकंदर कहलाता है।
--
महलों के मरीज-हिन्दी व्यंग्य कविता
----
शीत यंत्र में
अपनी देह
गर्मी से बचा रहे हैं।
दवा से
खाना पचा रहे हैं।
कहें दीपकबापू
पंचतारा अस्पतालों में
चिकित्सा के व्यवसायी
महलों के मरीज नचा रहे हैं।
-----------
उधारीकरण के दौर में
ठगों के भी मजे हैं।
मन के बीमार
ब्याज पर
शिकार की तरह सजे हैं।
-------
तश्तरी में सजाकर
कोई तोहफे की तरह
सम्मान नहीं देता।
नरक के भय बिना
कोई दान नहीं देता।
------
दौलत सब कुछ होती
अमीर चिंता में नहीं जीते।
मेहनतकश जिंदा नहीं होते
केवल हवा खाते पानी पीते।
--

1/14/12

चंद पल की मुलाकात-हिन्दी शायरियाँ (chand pal ki mulakat-hindi shayriyan kavitaen or poem)

चंद पलों की मुलाकात
ज़िंदगी भर का रिश्ता नहीं बनाती,
इंसानों की नीयत और ख्याल
बदलते देर नहीं लगती,
पल भर में मिलने की खुशी
हक़ीक़तों के सामने आते ही होती काफ़ूर
फिर हमेशा सताती।
कहें दीपक बापू
फिर भी बेजुबानों पर भरोसा किया जा सकता है
जुबान वालों  का क्या
पल भर में उनकी बात बदल  जाती,
किसी की नीयत समझने का दावा करना बेकार है
जो बार बार मतलब देखकर बदल जाती।
-----------------
इश्क में आशिक
आसमान से तारे तोड़ने की
बात कुछ यूं करते हैं,
गोया उसके खरीदने के लिए
ज़मीन पर किस्तें भरते हैं।
कहें दीपक बापू
वादों का क्या
चाहे जब जिससे जितने कर लो,
बस अपना भरोसा किसी के दिल में भर लो,
कहने वालों का क्या
भले बाद में फँसने वाले
वादाखिलाफी पर आहें भरते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
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7/12/11

गुमशुदा-हिन्दी शायरी (gumshuda-hindi shayari)

सर्दी, गर्मी और बरसात में
रास्ते अपने चेहरा बदलते जाते हैं,
सर्दी की शीतलता से बर्फ जैसे,
गर्मी में बरसती आग से अंगारे जैसे,
बादलों से लेकर नदिया हो जाते है।
चलने का सलीका
आंखों में नजरिया
पैरों में अहसास हो जिनके पास
रास्ते उन्हीं से दोस्ती निभाते हैं।
________________
वह रास्ते में गुम हो गये
या उनका रास्ता गुम हो गया
पता नहीं चला
अलबत्ता गुमशुदाओं में
उनका नाम लिखा पाते हैं।
उनके दिल की वही जाने
हम तो उनको अपनी आंखों में
तस्वीर की तरह बसाये
बस, यूं ही ढूंढने जाते हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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6/30/11

पुरानी कहानी-हिन्दी क्षणिकायें (purani kahani-hindi kshaniaen)

विकास की इमारत में
किसी मजदूर का खून
पसीना बनकर बह रहा है,
वह फिर भी गरीब है
उसका अभाव
पुराने शोषण की पुरानी कहानी कह रहा है।
------------
दौलतमंदों की तिजोरी में
जैसे जैसे रकम बढ़ती जायेगी,
कागजों पर पर गरीबी की रेखा
उससे ज्यादा चढ़ती नज़र आयेगी।
------------
यकीनन विकास बहुत हुआ है
पर हम वहीं खड़े हैं,
सभी कह रहे हैं
देश विकास की राह पर
दौड़ता जा रहा है
हम यकीन कर लेते है
देश बड़ा है
हम थोड़े ही बड़े हैं।
----------
विकास में अमीर
जमीन से आकाश पर चढ़ते हैं,
मगर गरीब हमेशा
अपनी पुरानी रोटी की
लड़ाई पुराने ढंग से ही लड़ते हैं।

लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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5/11/10

एक गैर के वास्ते-हिन्दी शायरी (paraye ke vastei-hindi shayari)

नगर में
पर्दे पर महानगर को तैरता देखकर
उसमें उतरने के लिये
हर युवा दिल मचलता है
मालुम न था उसे पत्थर के इस जंगल में
कातिल बीज भी पलता है,
जो साथ लेकर बुरा समय फलता है,
सौंदर्य के सौदागर हर मोल पर
खरीदने कौ तैयार हैं,
दरियालदिल दिखते पर सब मतलब के यार हैं,
जज़्बात की कीमत चुकाते हुए करते प्यार
पैसे भी देकर करें दिल का व्यापार
धोखे की साथ लेकर परछाई।

कहते हैं लोग
जिंदगी के मीठे और कड़वे स्वाद तो
गंवार भी जानते हैं
फिर वह पढ़ी लिखी क्यों न समझ पाई।

कौन समझाये कि पढ़े लिखे होने का मतलब
ज्ञानी होना नहीं होता,
जिंदगी के रस में अंग्रेजी पढ़ा लिखा ही
आम की जगह बबूल के पेड़ बोता,
दिमाग से बडा दिल मानते
रूह से नासमझ हैं पढ़े लिखे लोग
मस्ती का है लाइलाज रोग,
जिसका इलाज नहीं
जहां आये मजा जम गये वहीं
अच्छे बुरे की पहचान अंग्रेजी पढ़ते गंवाई।

मगर कब तक चलता यह सब
भांडा फूटना था अब
उसने अपने गले के लिये रस्सी बनाई
छोड़ गयी अपने लोगों के लिये
वह लड़की जगहंसाई।।
एक गैर के वास्ते
अपनों की महंगी जिंदगी
सस्ते प्यार के जुए में दाव पर लगाई।
-----------

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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4/6/10

इश्क और डॉलर-हास्य व्यंग्य कवितायें (ishq aur dollar-hasya vyangya kavita)

सच्चा प्यार जो दिल से मिले
अब कहां मिलता है,
अब तो वह डालरों में बिकता है।
आशिक हो मालामाल
माशुका हो खूबसूरत तो
दिल से दिल जरूर मिलता है।
----------
आज के शायर गा रहे हैं
इश्क पर लिखे पुराने शायरों के कलाम,
लिखने के जिनके बाद
गुज़र गयी सदियां
पता नहीं कितनी बीती सुबह और शाम।
बताते हैं वह कि
इश्क नहीं देखता देस और परदेस
बना देता है आदमी को दीवाना,
देना नहीं उसे कोई ताना,
तरस आता है उनके बयानों पर,
ढूंढते हैं अमन जाकर मयखानों पर,
जिस इश्क की गालिब सुना गये
वह दिल से नहीं होता,
डालरों से करे आशिक जो
माशुका को सराबोर
उसी से प्यार होता,
क्यों पाक रिश्ते ढूंढ रह हो
आजकल के इश्क में
होता है जो रोज यहां नीलाम।
----------

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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12/21/09

किश्तों में डूब न जायें जिंदगी-काव्यात्मक चिंतन (kishton par zindagi-kavay chitan)

आजकल कर्जे लेकर सामान खरीदने का एक रिवाज चल रहा है। अमीर न होने पर भी वैसा दिखने वालों की चाहत पूरा करना आसान हो गया है। किश्तों पर अपने लक्ष्य की किश्ती चलाना आसान लगता है पर उसे निभाना उतना सहज नहीं रह जाता। एक आम मध्यम या निम्न वर्गीय व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह अपनी आयसीमा आसानी से बढ़ा सके। उल्टे बढ़ती महंगाई से सभी का किचन व्यय बढ़ जाता है इधर किश्त और ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी आने से संकट कभी भी गहरा सकता है।
दरअसल पाश्चात्य सभ्यता पूरी तरह से उपभोक्तावाद पर आधारित है। इसमें अमीर होने से अधिक वैसा दिखने के विश्वास पर आधारित है। कहा जाता है कि आकर्षक, चमत्कारी तथा चतुर दिखोगे तो दुनियां जीत लोगे। वैसे अपने यहां कहा जाता है कि चार्वाक ऋषि कह गये हैं कि ‘कर्ज लेकर खूब घी पियो’। उनका आशय कतई वैसा नहीं रहा होगा जैसा बताया जाता है। ऐसा लगता है कि उन्होंने व्यंग्य विनोद में किसी से कहा होगा जिसे एक कथन मान लिया गया। कर्ज लेकर घी पीना आसान नहीं है। आजकल तो कर्जे देने वाले उसके वसूल करने के तरीके भी जानते हैं। कई लोगों ने अग्रिम में ही अपने चैकों पर हस्ताक्षर कर कर्ज लिये और बाद में उनको सींखचों के पीछे जाना पड़ा।
दरअसल समाज में अमीर या आकर्षक दिखने की ललक एक भ्रम है। भले ही लोग कहते हैं कि ‘आजकल अमीरों की इज्जत है’, या ‘गरीब की भला कैसी इज्जत’, पर यह केवल छलावा है। दरअसल अगर आप जीवन सहजता से गुजारें और अपने अंदर कोई कला या गुण पैदा करें तो निश्चित रूप से आपका सम्मान होगा। जब सारी दुनियां पैसे के पीछे भाग रही है और आप भी तो फिर यह आशा क्यों करते है कि कोई आपका सम्मान करे।
आप ऐसी महफिलों में जाते हैं जहां दिखावा पंसद लोग अपनी हांकते हैं और आप भी हांक रहे हैं पर आपका कोई ऐसा गुण नहीं जिसे वहां दिखा सकें तब सम्मान की आशा क्यों करते हैं?
दरअसल आज के समय सबसे अधिक सुखी व्यक्ति वही है जो स्वतंत्रता पूर्वक सोचता और रहता है। वरना तो लोगों का मान, सम्मान तथा स्वाभिमान अपने से अधिक अमीर के यहां गिरवी है। सभी के ऊपर कोई न कोई है। अगर ऐसा न हो तो अमीर लोग क्यों मंदिरों में जाकर मत्था टेकते हैं।
कई बार मंदिरों में ऐसे लोगों को देखकर आश्चर्य होता है जिनके पास धन और वैभव का भंडार है पर वह मत्था टेकने वहां आते हैं। तब मन में ख्याल आता है कि ‘जब इस आदमी के पास सभी कुछ है फिर यह यहां क्यों आता है?’ तय बात है कि उनके पास मन की शांति नहीं है। यही मन की शांति जिसके पास है वही सबसे अधिक धनी है।
कहते हैं न कि आप बिस्तर खरीद सकते हो पर नींद नहीं! भोजन खरीद सकते हो पर भूख नहीं। मकान खरीद सकते हो पर आनंद नहीं। यह एक विचारणीय बात है। अंतिम सत्य यह है कि अगर आपको नींद अच्छी आती है, खाना जैसा भी मिले पच जाता है और जहां बैठे हैं वही आराम मिल रहा है तो फिर किसी प्रकार की अन्य अमीर रूप की कल्पना नहीं करें क्योंकि अमीर होने पर ऐसे सुख विदा भी हो जाते हैं। इस पर कहीं कर्जे ले लिये तो फिर जिंदगी भी दांव पर लग सकती है।
 इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां
ऊंची इमारत में माचिस जैसा
बड़ा खरीदने में डर लगता है।
रोज चढ़ूंगा सीढ़ियां
सिर पर कर्जे का बोझ लेकर
यह डर सताता है
ब्याज भी शत्रु जैसा नजर आता है
किश्तों में डूब न जायें
जिंदगी की किश्ती
भंवर सामने आता लगता है।
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12/19/09

कायर और कातिल-हिन्दी व्यंग्य कविता (kayar aur katil-hindi vyangya kavita)

 बंदूक बनाने वाले को

उसके विक्रय सलाहकार ने

बिक्री बढ़ाने का

मशविरा कुछ इस तरह दिया

‘शहर भर के कातिलों और लुटेरों को

अपनी बंदूकें इस्तेमाल के लिये

मुफ्त प्रदान कर दो,

चाहो तो कमीशन से भी उनका मुंह भर दो,

उनको अपना पेशा तो उनको करना है,

किसी तरह पेट भरना है,

जहां वारदात  होगी,

तुम्हारे बंदूक के इस्तेमाल की भी खबर होगी,

मुफ्त में विज्ञापन हो जायेगा,

हर कायर अपनी सुरक्षा के लिये

तुम्हारी बंदूक खरीदने आयेगा।

कत्ल और लूट की एक वारदात में

एक बंदूक का इस्तेमाल होगी

पर तुम्हारे यहां लाखों का सौदा चला आयेगा।।’’
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12/10/09

स्वर्ग और परियां किसने देखी-हिन्दी व्यंग्य कविता (svarg aur pariyan-hindi satire poem)



स्वर्ग की परियां किसने देखी

स्वयं जाकर

बस एक पुराना ख्याल है।

धरती पर जो मिल सकते हैं,

तमाम तरह के सामान

ऊपर और चमकदार होंगे

यह भी एक पुराना ख्याल है।

मिल भी जायें तो

क्या सुगंध का मजा लेने के लिये

नाक भी होगी,

मधुर स्वर सुनने के लिये

क्या यह कान भी होंगे,

सोना, चांदी या हीरे को

छूने के लिये हाथ भी होंगे,

परियों को देखने के लिये

क्या यह आंख  भी होगी,

ये भी  जरूरी  सवाल है।

धरती से कोई चीज साथ नहीं जाती

यह भी सच है

फिर स्वर्ग के मजे लेने के लिये

कौनसा सामान साथ होगा

यह किसी ने नहीं बताया

इसलिये लगता है स्वर्ग और परियां

बस एक ख्याल है।



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11/18/09

अखबार की सुर्खियों में-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ (akhbar ke surkhiyan-hindi vyangya kavitaen)

 हमने कहा था

‘जख्म पर मरहम लगा दो’

उन्होंने नमक छिड़क दिया।

पीड़ा से हम कराहते रहे

उन्होंने कहा

‘कुछ जोर से कराहो

ताकि हम मरहम लगाकर

जमाने को बता सकें कि

हमने किसी का दर्द कम किया’।

------------

नजारे तो इस दुनियां में बहुत हैं

मगर लोगों को बस दंगल ही भाता ।

अपने मंगल की बजाय

दूसरे के अमंगल पर मजा आता।

जिंदगी खेल है नजरिये का

जैसी नजर

वैसा ही जमाना हो जाता।

तारीफ के लिये कौन करे

इंसानों का भला

शिकायत के लिये

मजबूर करने वालों का नाम

अखबार की सुर्खियों में ही नजर आता।

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11/14/09

राहत और परेशानी-व्यंग्य कवितायें (rahat aur pareshani- hindi vyangya kavitaen)

आसमान से बादल बरस रहे हैं
क्योंकि पेड़ पौधे, पक्षु और पक्षी
पानी को तरस रहे हैं।
आम इंसान को खुशफहमी है कि
देवता उस पर मेहरबान है
उनकी पूजा पर ही ध्यान है,
कुछ इनमें ऐसे भी है
जो राहत का करते हैं व्यापार
सूखा जाता देख उनका दिल झूलस रहे हैं।
-----------
अपने हर ख्वाब को
सच में बदलता देखकर भी
इंसान हताश हो जाता है,
अब नया कौनसा देखे
यह सोचकर परेशानी जुटाता है।

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11/9/09

हमदर्दी जताने की कला-व्यंग्य कविता (hamdardi ke kala-vyangya kavita)

हमदर्दी जताने की कला
हमें कभी नहीं आई
किसी का दर्द देखकर
मन रोया मन भर आंसु
पर आंखें दरिया न बन पाई।
शायद लोग दिमाग से सोचते हैं
इसलिये हमदर्दी के शब्द जल्दी ढूंढ लेते
दिल तक नहीं पहुंचता
दूसरे का दर्द
कर लेते हैं दिखावे में कमाई।
नहीं करना सीखा पाखंड
इसलिये दूसरे के घाव पर मरहम लगाकर भी
अपने लिये ओढ़ लेते हैं तन्हाई।

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10/26/09

मतलब के पैंतरे अधिक दिन नहीं चलते-व्यंग्य कविता (matlab ke dav-hindi kavita)

जो दूसरे का आशियाना उजाड़कर
उस जमीन पर अपना महल बनाते हैं।
समाज सेवा के लिये वही
भरी भीड़ में पुरस्कार पाते हैं।
करते हैं जो अपने कदम तले
मासूम जज़्बातों का कत्ल
वही देश भक्ति का नारा
बड़े जोर शोर से लगाते हैं।

जमाने के बदलाव की बात करने वाले
अपने सिर पर पुरानी किताबें ढोते हुए
तरक्की का संदेश सुनाते हैं।
रोज जमाने से बेवफाई करने वाले
लोगों का वफा के लिये जगाते हैं।
चीख रहे बड़े बड़े लोग
अपनी चैन की नींद के लिये
भीड़ में चेतना लाते हैं।
मतलब के पैंतरे अधिक दिन नहीं चलते
शायद इसलिये सभी लोग अनसुनी कर जाते हैं।
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10/22/09

प्रश्न वन-त्रिपदम (prashna van-tripadam)

मन में विष
किसमें नहीं होता
शुद्धि कहां है।

सोच से जड़
हो गये ये इंसान
बुद्धि कहां है।

जले शब्द
उगलते चूल्हे
वाणी कहां है।

सभी भिखारी
ढूंढ रहे हैं माल
दानी कहां है।

लंगड़ी भाषा
सिखाई गुरुओं ने
बोध कहां है।

शिक्षित झुंड
शहर में घूमता
शोध कहां है।

दर्द की दवा
मिलती कभी कभी
रोज कहां है।

प्रश्न वन
घना है चारों ओर
खोज कहां है।

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10/16/09

तरक्की और तबाही-व्यंग्य कविता (taraqi aur tabahi-hindi vyangya kavita)


जरुरतों की शयों का रोज शक्ल बदलना
दौलत के पहाड़ पर
इंसानों की चाहतों का चढ़ना
तरक्की का यह पैमाना नहीं होता।
इंसानों के जज़्बातों की उम्र
समय के साथ न बदलती हो
ख्यालों का चैहरा भी
हालातों के साथ नया नज़र न आये
तब यह तरक्की एक वहम होती है
चलती दुनियां तो दिखती
पर जमाना वहीं का वहीं होता है।
-----------------
घर में लाते जब कोई नया सामान
उसकी जगह छोड़ता हुआ
पुराना कबाड़ कहलाता है।
कमरे में दिखती है तरक्की
बुखारी में तबाही का मंजर नज़र आता है।
फिर भी किसे फिक्र है
तरक्की दिखाते है सभी को
तबाही का मंजर तो पर्दे में छिपाया जाता है।
.......................................

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10/14/09

बाज़ार के लिखे शब्दों पर होंठ हिलाते-व्यंग्य कविता (bazar ke shabd-hindi vyangya kavita)

अख़बारों में छपे बड़े बड़े शख्सों के
बयान अब आखों से आगे बढ़कर
दिल की गहराई में नहीं जाते.
ढेर सारा कागज़ का भंडार है चारों तरफ
उसे खाने के लिए अक्षर पक्षी चाहिए
स्याही की बह रही हैं धारा,
मिलना जरूरी है उसको भी किनारा,
बाज़ार के सौदागर केवल शय ही नहीं बेचते,
ज़माने पर काबू रखने का भी खेल खेलते,
उनका खामोश रहना जरूरी है
इसलिए बोलने के लिए वह इंसानी बुत लाते.
जो बाज़ार के लिखे शब्दों पर बस होंठ हिलाते.

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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8/27/09

गरम कुर्सी-हिंदी हास्य कविता (hot seat of sach ka samana-hindi hasya kavita)

इश्क परवान चढ़ जाये
माशुका बीवी बन साथ निभाये
इसलिये आशिक ने कमाने के लिये
सच की पहचान करने वाली मशीन की
दुकान लगाई
और यह खबर माशुका को सुनाई।
सुनकर वह हो गयी पसीना पसीना
पूछने पर बोली
‘’यह कैसी दुकान लगायी।
अरे, तुमने सुना नहीं
इसके चक्कर में अमेरिका में
कितने घर बरबाद हुए हैं
फिर अपने देश में भी हो चुकी
कई लोगों की जगहंसाई।
कोई और काम ढूंढो
कहीं काम नहीं चला तो तुम
कभी खुद गरम कुर्सी (हाट सीट) पर बैठोगे
कभी मुझसे बैठने को कहोगे
कहीं हो न जाये तुम्हारे और मेरे बीच लड़ाई।’’

सुनकर आशिक हंसा और बोला
‘‘अरे, यह बात नहीं है
यह एकदम नयी चीज है
अपने देश का आदमी बस
नयी चीज चाहता है
अपने पुराने ज्ञान से भागता है
अभी तो दुकान पर बोर्ड ही लगा है
तब ढेर सारे लोग तो आ रहे हैं
अपनों का सच जानने उनको ला रहे हैं
जानते हैं सब
सच कड़वा होता है
कभी कभी दुश्मनी का बीज भी बोता है
फिर भी अंधे होकर
फैशन की दौड़ में जा रहे हैं
किसी का घर बिगड़े हमें क्या
अपनी रोजी निकलनी चाहिये
जहां तक तुम्हारे और मेरे बैठने की बात है
भला कोई हलवाई अपनी मिठाई खाता है
जो हम गरम कुर्सी पर बैठेंगे
बहुत सोचकर समझकर ही मैंने यह योजना बनाई।"

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8/7/09

ईमानदारी फिर कौनसी शय है-हास्य कविताएँ (imandari kaunsi shay hai-hasya kavita)

जैसे जैसे दौलत बढ़ती गयी
विश्वास कम होता गया।
वफादारी बिकती है बाजार में
फिर भी इंसान वफा से
महरूम होता गया।
................................
कहते हैं पैसे से बाजार में
सब मिलता है।
फिर भी खुश क्यों नहीं इंसान
दुनियां की हर शय मयस्सर है
गमों में डूबा दिखता है।
हर इंसान दिल की बात
कहते हुए रोते शब्द लिखता है।
.............................
सुना है बाजार में जो चीज कम दिखती
उसकी कीमत ऊंची मिलती।
कमबख्त! ईमानदारी फिर कौनसी शय है
जो लापता है फिर भी
किसी भाव में नहीं बिकती।
.........................

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7/4/09

इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम-हिंदी शायरी (hindi shayri)

अपने पेट के लिये करते हो काम
लेते हो पूरा दाम।
अपने खून को पसीने की तरह
बहते क्यों कराहते हो
कोई आकर हमदर्दी दिखाये
क्यों चाहते हो
दौलत के पत्थरों से
दया की उम्मीद क्यों जगाते हो
ओ! मेहनतकशों को
इज्जत दिलाने की ख्वाहिश रखने वालों
बसते हैं जहां जज्बातफरोश
उस महफिल में उनको
चमकाने का झूठा दिलासा क्यों दिलाते हो
अपने लहू से सींचते हैं जो
अपने ही रोटियों का गुलशन
उनको इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम।
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2/22/08

वह रोकना चाहते बाहर से आगमन-साहित्यक कविता

अपने स्वाभिमान की रक्षा की बात
चाहते अपने लिए आजाद रात
ऊंचे दिखाते अरमान
अपने आप को समझें महान
पर खौफ के साए में ही जीते वह लोग
अपने इलाकों में आते पंछियों पर करते घात
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

अपने घर से बाहर जाते लोगों पर बस नहीं
जाकर तरक्की करेंगे कहीं
उनके नाम पर अपने घर में जश्न मनाएंगे
सबको अपने सामने चमकाएंगे
अपने घर का पलायन उन्हें सुहाता
पर घर पर किसी पंछी का चहचहाना उनको नहीं भाता
आदमी को पहचानने का दावा
देख नहीं पाते उसका मन
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

सच से परे जीते वह लोग
दिमाग में हैं लड़ने का रोग
जिस सर्वशक्तिमान ने बनायी
यह धरती और इंसान
वह भी नहीं कर पाता
अपने कब्जे में इंसान का मन
नहीं रोक सकता
इधर से पलायन और उधर से आगमन
सजाये बैठे हैं अपने लिए लोहे के महल
करते हैं भ्रम फैलाने की पहल
दुनिया के इस सच से परे
आदमी नहीं चलाता है उसे उसका मन
घूमती दुनिया और घड़ी कभी नहीं रुकती
कहीं उजड़ता तो कहीं बसता है चमन
वह रोकना चाहते बाहर से आगमन

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