समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label manoranjan. Show all posts
Showing posts with label manoranjan. Show all posts

3/26/15

यह विश्व कप है या अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट प्रतियोगिता-हिन्दी चिंत्तन लेख(it is A international tournament no world cricket cup-A hindi thought article)




          आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में खेली जा रही क्रिकेट प्रतियोगिता को विश्व स्तरीय मानना चाहिये कि अंतर्राष्ट्रीय! यह प्रश्न हमारे दिमाग में तब आया एक क्रिकेट विशेषज्ञ ने एक चर्चा में कहा कि इसे विश्व कप कहना ही गलत है, यह ता आठ राष्ट्रों के बीच की स्पर्धा है। उनकी बात सही लगती है।  विश्व कप तो फुटबाल या हॉकी का ही हो सकता है।  हमारे प्रचार माध्यम अपने व्यवसायिक कारणों से वर्तमान  क्रिकेट प्रतियोगिता को विश्व कप कहकर अपने उपभोक्ताओं को यह अनुभूति दिलाते हैं कि वह एक विश्व स्तरीय मुकाबले को देख रहे हैं जबकि यह आठ राष्ट्रों में दो के बीच का होता है।  विश्व स्तरीय खेलों में बैडमिंटन, टेनिस,शतरंज, फुटबाल, हाकी तथा अन्य ऐसे खेल होते हैं जिन्हें अधिकतर देशों में खेला जाता है।  इसमें बैडमिंटन, टेनिस, शतरंज  और हाकी में ही हमारे देश के खिलाड़ियों ने पहचान बनाई है। कभी फुटबाल में हमारी टीम का नाम था पर अब वहां हमारी छवि लापता है।
          अन्य खेलों के खिलाड़ियों की चर्चा-जैसे साईना नेहवाल और आनंद-की उसी दिन ही होती है जिस दिन वहा कोई बड़ा मैच या प्रतियोगिता जीतते हैं।  इसके विपरीत क्रिकेट खिलाड़ियों की चर्चा तो उस दिन भी होती है जिस दिन मैच न हो। कभी पार्टी तो कभी रैम्प पर नाचते हुए दिखाया जाता है। कभी कभी उनको टीवी कें जनभागीदारी वाले कार्यक्रमों में भी दिखाया जाता है।  एक तरह से क्रिकेट खेल अनेक लोगों की जेब भरने वाला है इसलिये प्रचार माध्यम इसकी छवि इस तरह बनाये रखते है जैसे कि यह विश्व स्तरीय हो। हम तो मैच देखते हैं पर यह भ्रम कभी नहीं पालते कि कोई विश्व स्तरीय मैच देख रहे हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

3/21/15

बीबीसी की बला भारत का गला-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन(bbc ki bala bharat ka gala-hindi satire thought article)



    
          यह बीबीसी क्या बला है? संभवतः अंग्रेजों का कोई भोंपू है जिसका स्वर और दृश्य भारतीय भोंपू ही हमें सुनाते हैं।  इस विश्व की जनसंख्या छह अरब करीब है जिसमें से आधी तो चीन और भारत की है।  हमारे देशी भोंपू यह बताते हैं कि बीबीसी नाम का भोंपू विश्व में सबसे अधिक सुना और देखा जाता है पर जनसंख्या की दृष्टि से यह बात सही नहीं लगती।  डेढ़ करोड़ चीनी और सवा करोड़ भारतीयों में कम से कम बीबीसी की कोई छवि नहीं है।
          भारतीय भोंपू पहले बीबीसी का रुदन सुनाते हैं फिर उस बहस करते हैं-दोनों ही स्थिति में उनका विज्ञापन का समय पास होता है। हमारा मानना है कि भारतीय प्रचार कर्मियों में आत्म सम्मान और विश्वास दोनों की कमी है।  खाते हिन्दी से है बजाते अंग्रेजी की हैं।  बीबीसी और सीएनएन की बातें अपने चैनल या समाचार पत्र में प्रकाशित कर यही दर्शाते हैं कि उनके पास उधार के मसले ही प्रसारण के लिये हैं।  भारत के लोगों को अपने ही मसलों से फुर्सत नहीं है।  उसे यह पता नहीं कि बीबीसी और सीएनएन जैसे अंग्रेजी प्रसारण संस्थानों को हिन्दी चैनल वाले उसी तरह अपना पितामह मानते हैं जैसे कि देशी विद्वान विदेशी विचारकों मानते हैं।
          बीबीसी जब कोई भारतीय समाचार प्रसारित करता है तो उसका उद्देश्य अपने ही राष्ट्रीय हित की रक्षा करते उसमें ऐसी बातें शामिल करता है जिससे विवाद बढ़े।   स्वयं को लोकतांत्रिक, मानवाधिकारों की रक्षा का पहरेदार तथा अभिव्यक्ति का शहंशाह समझने की प्रवृत्ति अंग्रेजों में स्वाभाविक रूप से है और बीबीसी उसी को ही प्रतिबिंबित करता है।  भारतीय सस्कृति को लघु और अपनी संस्कृति को महान साबित करने में उसे सफलता भारत के दोहरी मानसिकता वाले विद्वानों के कारण ही मिलती है। यह विद्वान मानते हैं कि न खाता न बही, बीबीसी जो कहे वही सही।
          सच यह है कि बीबीसी का नाम अब भारत में अधिक लोकप्रिय नहीं है और भारतीय प्रचार माध्यम उसे केवल उसका नाम केवल अपनी वैश्विम स्तर पर संबद्धता दिखाने के लिये ही लेते हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

3/15/15

मानवीय पराक्रम के बिना महिला सुरक्षा की बात व्यर्थ-हिन्दी चिंत्तन लेख(without men power security of women-hindi thoght)



 हमारे देश में धार्मिक, सामाजिक तथा साहित्यक क्षेत्र के लोगों के पास प्रचार में लोकप्रियता प्राप्त करने के लिये महिलाओं के हितचिंतक दिखने की सहज प्रवृत्ति देखी जाती है।  वैसे तो कहा जाता है कि समाज पुरुष प्रधान है पर यह भी माना जाता है कि अंततः परिवार के अंदर महिलाओं का प्रभाव कम नहीं होता।  यह प्रभाव इतना होता है कि महिलाओं को प्रभावित कर समूचे परिवार पर नियंत्रण किया जा सकता है।  यही कारण है कि धार्मिक तथा सामाजिक पेशेवर सदैव ऐसे संदेश देते हैं जिससे महिलायेें प्रभावित हों। हमारे यहां महिलाओं के विकास, सुरक्षा तथा सामाजिक बराबरी का दर्जा दिलाने का नारा प्रचलित हैं।  कहीं बाल, वृद्ध तथा असहायों की मदद के नारे भी लगते हैं पर महिलाओं के हित चिंतक नारे सहजता से बाज़ार में बिक जाते हैं इसलिये ही प्रचार के माध्यम से अपना पेशा चलाने वाले लोग इसका उपयोग करते हैं।
    आजकल महिलाओं की सुरक्षा की बात अधिक की जा रही है पर इस बात पर कोई चर्चा नहीं करता कि सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में व्याप्त वैमन्यस्य ही नर नारी दोनों के लिये संकट का कारण है। आक्रमण का भय सभी में व्याप्त है। दूसरी समस्या यह है कि अपराधियों के राजदंड का  भय नहीं रहा।  ऐसे  में अगर पुरुष की रक्षा नहीं हो सकती तो महिलाओं की सुरक्षा कैसे हो जायेगी यह तो नारे लगाने वाले ही बता सकते हैं?
    एक मजेदार बात यह है कि सार्वजनिक स्थानों, सड़कों तथा शैक्षणिक संस्थानों में कैमरे लगाकर महिलाओं की रक्षा करने का दावा इस तरह किया जा सकता है जैसे निर्जीव बुत विद्युत संपर्क होने पर रोबोट बनकर महिलाओं की रक्षा कर लेंगे। सभी जानते हैं कि नर या नारी पर जब कोई दैत्य आक्रमण करता है तो उसे रोकने के लिये उसे स्वयं या अन्य पुरुष को दैहिक पराक्रम प्रकट करना ही होता है।  घटना के बाद कैमरे से अपराधी की पहचान कर उसे ढूंढने में भी पराक्रम चाहिये।  यह पराक्रम मानवीय शक्ति के बिना संभव नहीं है। अपराध के विरुद्ध पराक्रम ही उपाय है। हमारे यहां इसी का अभाव है। पराक्रम प्रकट करने के लिये समाज के लोगों के पास दैहिक शक्ति, पराक्रम तथा उसके उपयोग की बुद्धि का होना आवश्यक है। अगर समाज में पराक्रमी लोगों की संख्या अधिक हो तो नर के साथ नारी भी रक्षित हो सकती है वरना तो जो हो रहा है वह हो ही रहा है। मानवीय पराक्रम की प्रेरणा देने के लिये प्रयास न करते हुए अनेक शिखर पुरुष केवल सतही उपायों की बात करते हैं।
    इस तरह के पराक्रम में जिस  प्रेरणा की आवश्यकता है उसके लिये समाज में आर्थिक दृढ़ता, वैचारिक पवित्रता तथा सामाजिक सामंजस्य की आवश्यकता है। हम इन तत्वों का अभाव देख रहे हैं। हमारे यहां पेशेवर विद्वानों के पास अभिव्यक्ति के माध्यम उपलब्ध हैं पर अपने सतही नारों के माध्यम से वह उसका सीमित उपयोग ही कर पाते हैं।  कोई समूचे समाज और राष्ट्र की सुरक्षा की बात नहीं करता क्योंकि उससे लोकप्रियता नहीं मिलती। इसलिये महिलाओं की सुरक्षा के नारे तथा बहसों पर व्यर्थ बहस होती दिखती है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

9/17/13

जिंदगी सस्ती जीना महंगा-हिन्दी व्यंग्य कविता (zinagi sasti zeena mahanga-hindi vyangya kavita)




जरूरत की चीजें महंगी हो गयी
जिंदगी सस्ती होती जा रही है,
तरक्की का पैमाना है महंगाई
क्या उन्होंने खूब कहीं है,
बैठकर वातानुकूलित कक्षों में
आम इंसानों की रोज की जिंदगी का हिसाब
लिख रहे हैं वह लोग
जिन्होंने कभी तकलीफ नहीं सही है।
कहें दीपक बापू
पढ़ते हैं रोज अखबार,
बेगाना लगता है अपना ही घरबार,
कोई बना रहा है योजना
कोई बेच रहा है सपना
कोई वादे बांट रहा है,
आम इंसानों को बहलाने के
नये नये तरीके छांट रहा है,
हम भी मानते हैं
रोटी का भूख से
पानी का प्यास से
गरीब का दौलत की आस से
कोई रिश्ता नहंी है,
सच यह भी है कि इनके बिना
आदमी जिंदगी की चक्की में पिसता यहीं है,
मुश्किल यह है कि
जीना हो रहा है महंगा
जिंदगी सस्ती हो रही है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

7/25/13

कोई कोई होता है योगी-हिन्दी कविता (koyee koyee hota hia yogi-hindi poem or kavita)




भूखे हो तो रोटी
खुद तुम्हें जुटानी होगी,
बीमार हो तो तुम्हें अपनी दवा
खुद जुटानी होगी,
अगर घर से निकले बाहर
अपनी जरूरत पूरी करने के वास्ते,
ख्वाबों का बाज़ार सजा मिलेगा पूरे रास्ते,
सौदागरों को पैसा दो या बेचो पसीना
कोई तुम्हारा मालिक नहीं है
सभी हैं खून के भोगी।
कहें दीपक बापू
कोई नारे लगा रहा है,
कोई कागज पर शब्द नचा रहा है,
ज़माने का भला करने के लिये
जुलूस रोज निकल रहे हैं,
जिन्होंने कभी झंडे उठाकर
शिखरों पर सजा दिये बुत
खाली हाथ रहे उनके
दिल अभी तक जल रहे हैं,
न लूटे पैसा,
न मांगे पसीना,
न कभी खून चूसे
दर्द दूर करे सभी का
ऐसा होता है सदियों में कोई योगी।
---------------------


-------------------


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

6/2/13

क्रिकेट और इस्तीफे का ड्रामा रविवार के दिन-विशिष्ट रविवारीय हिन्दी व्यंग्य रचना (drama on cricketi and president resion on sunday-special hindi comedy satire on sandey(



       टीवी चैनलों पर बार बार यह दोहराया जा रहा है कि क्रिकेट देश एक धर्म बन गया है। इसका एक भगवान भी इन प्रचार माध्यमों ने बना रखा है जिसे कभी कभी भारत रत्न सम्मान देने की बात भी उठायी जाती है।  हमारे एक मित्र ने हमसे पूछा कि ‘‘यार, इतने सारे पाठ तुम ब्लॉग पर लिखते हो फिर भी तुम्हें कोई जानता नहीं है।’’
  हमने कहा कि ‘‘हम वहां जिन विषयों पर लिखते हैं वह बाज़ार में बिकने वाले नहीं है।’’
उसने कहा कि ‘तुम फिर बाज़ार के विषय पर ही लिखा करो। कहीं किसी अखबार में छपने के लिये भेजो और वहां छपे तो हमें तुम्हारे पाठ पढ़ने को मिलेंगे।  हम भी तुम्हें पढकर मजे ले ़ पायेंगे। कंप्यूटर पर हम तो इधर उधर की बातें देखते हैं।  वहां तुम्हें पढ़ना समय नष्ट करना लगता है।’’
 हमने कहा-‘‘अच्छा, तुम ही बता दो कि बाज़ार के किस विषय पर लिखें?’
    वह तपाक से बोले-‘‘क्रिकेट के विषय पर लिखो। आईपीएल पर लिखो। फिल्म पर लिखो। इन विषयों पर लोग बड़ी रुचि के साथ पढ़ते हैं।
        उसकी बात सुनकर हम हंस पड़े। आजकल क्रिकेट को कथित भगवान को भारत रत्न देने की बात कम आती है। वजह यह कि उसने पहले एक दिवसीय क्रिकेट छोड़ी। अब आई पी एल को भी विदा कह दिया।  अगर वह न कहता तो भी वह भगवान बना ही रहता। यह अलग बात है कि उसे वैसे ही बाज़ार की निंदा का सामना करना पड़ता जैसे कभी किसी की मनोकामना पूरी न होने पर कोई भक्त भगवान से नाराज हो जाता है।  वह फार्म में नहीं चल रहा था ऐसे में उसके बुरे खेल से बहसों में उसे खलनायक बन दिया जाता। दूसरी बात यह कि यह फिक्सिंग वाला मामला सामने आया तो बहुत दिन तक कुछ नहीं बोला पर जब आई पी एल खत्म हुआ तब देश के प्रचाकर उसे नाराज हुए। आई पी एल छोड़ने के चार दिन बार फिक्सिंग की बात पर दुःख जताया।  प्रचारकों ने अपने भगवान के प्र्रवचन को जस का तस दिखाकर विज्ञापन का समय पास किया। 
    आज हम सोच रहे थे कि अगर हम उस भगवान को भारत रत्न देने की बात ब्लॉग पर जोर छोड़ से उठायें तो शायद कुछ अधिक पाठक पढ़ने को मिल जायेंगे।  संभव है उस भगवान के पुराने प्रशंसक जो कि प्रचारक भी हैं हमारा नाम कहीं अपने पर्दो पर चमकायें।  देखो आ गयी भगवान को भारत रत्न देने की मांग।
        इधर बीसीसीआई जो कि कथित रूप से भारत में क्रिकेट खेल पर नियंत्रण करने वाली एकमात्र संस्था है, उसके अध्यक्ष के इस्तीफे का मामला प्रचार माध्यमों पर छाया हुआ है।  वह देगा कि नहीं। देगा तो कब देगा। कितने दिन में देगा। प्रचार माध्यमों पर बहस जारी है और प्रचारकों की बात माने तो उस भी सट्टा लग रहा है।  मतलब सट्टा लगना है तो किसी भी विषय पर लगना है पर क्रिकेट के सट्टे पर विवाद ज्यादा ही चल रहा है। यह बात भी तय है कि जो मैचों पर सट्टा लगवाते हैं वही इस इस्तीफे के ड्रामे पर भी लगवायेंगे। दूसरे विषय वाले इस तरफ नहीं आयेंगे। यह प्रचारक एक तरफ क्रिकेट से कमाते हैं तो उस पर फिक्सिंग के आरोप लेकर बरसते भी हैं।  कहीं मैच हुआ उस भी विशेषज्ञ वही बुलाते हैं जिनको फिक्सिंग के समय बुलाया जाता है। क्रिकेट की कमेंट्री करने वाले एक पुराने खिलाड़ी ने एक मैच पर कमेंट्री की थी। पता चला कि वह फिक्स था।  प्रतिक्रिया में उसेन कहा कि ‘‘मैं तो  गंेंदबाज के पिट जाने पर बल्लेबाज की तारीफ कर रहा था तब मुझे  पता नहीं था कि गेंदबाज ने गेंद ही पिटने के लिये फैंकी थी। इससे तो मेरा विश्वास क्रिकेट से उठ गया है।’’
       जब मैचों के बीच में और बाद में उनके फिक्सिंग होने पर रुदन तथा बहस के प्रसारण बीच भी विज्ञापन आता है  तब सारा मामला ही फिक्स नजर आता है। आईपीएल खत्म हो गया पर उसका नाम भी चल रहा है।  खेल के बाद फिक्सिंग के समाचार जोरों पर चल रहे हैं। बीसीसीआई के पदाधिकारियों की बैठक चल रही हैं। प्रचारक लोग कह रहे हैं कि दाल में काला नहीं यहां तो दाल ही काली है।  क्रिकेट इस देश में धर्म है जिसे कलंकित कर दिया गया है।
       इधर हम अपने आसपास ऐसे लोगों को ढूंढते हैं जिनका धर्म क्रिकेट हो पर मिलते नहीं। हां, कभी पार्क, बाज़ार, सब्जी मंडी या रास्ते में कुछ युवा लड़कों को क्रिकेट पर सट्टे की बातें करते हुए देखते हैं। यह पंद्रह सौ हार गया। वह पांच सो जीत गया।  उनके चेहरे देखते हैं। यकीन नहीं आता कि उनमें से कोई क्रिकेट स्वयं खेलता होगा। अपने मित्रों से कई ऐसे लोगों के बारे में पता चलता रहता है जो किकेट पर सट्टा लगाकर पैसा बरबाद करते हैं। कहीं मां तो कहीं पिता परेशान है।  जब प्रचार माध्यम ऊपर का प्रचार दिखाते हैं तब हम जमीन पर भी उसका प्रभाव देखते हैं। क्रिकेट खेल अब सट्टे की भेंट चढ़ गया है। इसके प्रति इतनी दीवानगी आज के लड़कों में नहीं है और जहां तक सट्टा लगाने वालों की बात है वह खेल देखने की बजाय अपने पैसे का खेल देखते हैं।  जब कोई कहता है कि अमुक खिलाड़ी ने क्रिकेट को बर्बाद किया तो हम कहते हैं कि बर्बाद तो इसे उन लोगों ने किया जो सट्टा लगाते हैं। लगवाने वालों का काम ही यही है वह तो करेंगे। हम दोष तो सट्टा लगाने वालों को देते हैं।  हालांकि यह लगता है कि उन पर बरसना भ  गलत है। सट्टा में घुसने वाला आदमी अपनी विवेक शक्ति खो देता है। तब हम सोचते है कि ऐसे तत्वों की तरफ देखना चाहिये जिससे उसें विवेक पैदा नही हुआ। हुआ तो नष्ट हो गया। उनका विश्लेषण उनके परिवार वालों को करना चाहिये।
       बहरहाल क्रिकेट इस समय भारी कमाई देने वाला विषय है।  आम लोगों में इसकी लोकप्रियता कम हुई है पर जनसंख्या की वृद्धि के चलते वह दिखाई नहीं देती क्योंकि उसका प्रचार ज्यादा है।  फिक्सिंग की बात सामने आती है तो ऐसा लगता है कि पटकथा लिखकर खेल हो रहा है। अब तो फिल्म वाले भी इससे प्रत्यक्ष जुड़ गये हैं।  एक क्रिकेट खिलाड़ी तथा फिल्म अभिनेता में कोई अंतर नहीं रहा।  स्थिति यह है कि यह प्रयास किया जाता है कि क्रिकेट खबरों में बना रहे।  वह मैच हो या फिक्सिंग पर बहस, किकेट पर्दे पर चमकना चाहिये ताकि दर्शक देखें, वह कागज पर छपता मिले ताकि लोग पढ़ें और उसके बारे में स्वर भी रेडियो पर भी गूंजना चाहिये ताकि लोग सुने।  पता नहीं क्रिकेट में वाकई फिक्सिंग कितनी होती है, पर इतना तय है कि जब कहीं मैच नहीं होता तब उस पर बहस चलाकर जिस तरह विज्ञापन का समय पास होता है उससे तो लगता है कि सब कुछ फिक्स है।
  क्रिकेट पर कहीं एक बैठक चल रही है उस पर जिस तरह समाचार आ रहे हैं उससे तो यही लगता है कि सब कुछ फिक्स है।  उसे लेकर हम एक कल्पित दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं। जरा पढ़े।
        होटल में अध्यक्ष जी ने प्रवेश किया। वहां कुर्सियों पर सभी लोग पसरे थे।  अध्यक्ष ने अपने निजी सचिव से पूछा-‘‘भई यह क्या बात है? हम बैठक से तीन घंटे पहले आये। यह सोचकर कि हम पहले जाकर वहां सोयें। यहां परप्रांत वाले तो  हम से भी पहले आ गये।’’
    निजी सचिव ने कहा-‘‘महाराज, आप ही ने तो संक्षिप्त सूचना पर सभी को बुला लिया।  यह सूचना मिलते ही यह सभी अपने घरों से रात अंधेरे में भाग निकले।  नहीं तो देश भर के प्रचारक इनके पीछे कैमरे लेकर पड़ जाते।  तमाम तरह के सवाल करते।’’
      अध्यक्ष महोदय ने परप्रांत एक प्रतिनिधि के पास जाकर अपनी कुर्सी संभाली। परप्रांत वाले ने उसकी तरफ देखा भी नहीं!
अध्यक्ष ने कहा-‘‘क्यों रे पापे? ऐसे मुंह क्यों फुलाये बैठा है?’’
    परप्रांत वाले ने कहा‘‘यार, माफ करना! मैने प्रचारकों के सामने कह दिया कि तुम्हें इस्तीफा देना चाहिये। यह खबर लगातर चल रही है।’’
      अध्यक्ष महोदय ने कहा‘‘अरे यार, यह भी कोई नाराज होनें वाली बात है! मुझसे भी प्रचारक कहलवाते रहते हैं कि इस्तीफा नहीं दूंगा। मै इसे प्रंद्रह दिन से दोहरा रहा हूं।’
     परप्रांत वाले ने कहा-‘‘हां यार, कोई मुझे अध्यक्ष का दावेदार भी बता रहा है।’’
      अध्यक्ष ने कहा-‘‘यार, यह बताओ आखिर होगा क्या? मुझे इस्तीफा देना पड़ेगा।  अगर देना पड़ेगा तो लिखेगा कौन? उसमें क्या लिखा होगा?’’
       परप्रांत वाले ने कहा-‘‘बॉस लोगों ने क्या तुम्हें पटकथा लिखकर ही भेजी नहीं है क्या?
     अध्यक्ष महोदय ने कहा-‘‘नहीं यार, उनको भी बहुत काम है।  संभव है पटकथा लिखने वालों के अभी समझ में नहीं आ रहा हो कि क्या लिखें। वह भी टीवी देख रहे होंगे। फिर मोबाइल पर भाव भी तो लेते होंगे। वैसे तुम्हारे अध्यक्ष बनने पर भाव कमजोर है।  इसलिये संभावना लगती नहीं है।’’
    परप्रांत वाले ने कहा‘-अब यह तो बॉस लोगों पर है। अभी टीवी पर नाम चलवा लें। मेरे नाम का भाव मजबूत हो जायेगा।
       अध्यक्ष ने निजी सचिव से कहा-‘‘देखो, अब तुम जाओ हम भी अब कुसी पर सोते हैं। देखो बाहर क्या चल रहा है। अगर बॉस लोगों का कोई संदेश वाहक आये तो पटकथा हाथ में लेकर यहां ले आना। उसकी भी जरूरत नहीं है। वैसी ही खबर बाहर दे देना। यहां कौन माथा पच्ची करेगा। सभी सो रहे हैं।  हां, बाद में सभी को अपने डायलाग जरूर बता देना ताकि बाहर प्रचारकों को सुना सकें।’’
      अब इस दृश्य की पर्दे पर खबर इस तरह आ रही होगी-‘अध्यक्ष ने इस्तीफा देने से इंकार किया’, ‘अध्यक्ष ने पद छोड़ने के लिये शर्ते रखीं’ और ‘अध्यक्ष अभी विचार कर रहे है’।ं
   सच बात क्या है हम नहीं जानते। हमारे समझ में भी नहीं आ रहा। आपके समझ में भी नहीं आयेगा। सच तो यह है कि हमारी कल्पना ही हमारी समझ से बाहर जा रही है।  रविवार के दिन विशिष्ट व्यंग्य रचना में रूप में इतना ही समझ में आया कि कुछ लिखा जाये।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

4/4/13

सपने बेचने का व्यापार-व्यंग्य कविता

सपने बेचने का व्यापार
बहुत सरल है
हल्दी लगे न फिटकरी
रंग चोखा आये।
जिदंगी के कड़वे सच से
उकताये ज़माने में
हर रोज  दिल बहलाने का
ख्याल पैदा कर
जेब बस यूं ही भरती जाये।
कहें दीपक बापू
दौलत के पहाड़ पर  चढ़े लोग
ज़माने के लिये बहुत फिक्रमंद दिखते हैं,
कलमकार कागज पर
उनकी मासूम अदाओं पर गीत लिखते हैं,
उगलती ज़मीन जो सोना
अब बंजर हो गयी
कदम कदम पर छाया दर्द और कड़वाहट
ऐसे में बहार लाने का सपनां
देखते देखते बाज़ार में
महंगे दाम में बिक जाये।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

2/7/13

जज़्बातों के व्यापार में-हिन्दी कविता

कहीं रौशनी इतनी ज्यादा
उसे अंधेरों की तलाश है
कहीं अंधेरे घर खड़े हैं
उसके इंतजार में।
बाहर से दुनियां एक गेंद की तरह लगती जरूर
अंदर बंटी  नफरत और प्यार मे।
कहें दीपक बापू
जिन चीजों में दिल लगता है
महंगी मिलती बाज़ार में
अपने घाव सहलाने के लिये क्यों हमदर्द ढूंढे
अमीर हो गये बहुत लोग
जज़्बातों के व्यापार में।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

8/20/12

लाचार लोगों की उम्मीद-हिंदी व्यंग्य कविताएँ (lachar logon ki umeed-hindi vyangya kavitaen or satire poem's)



कोई न कोई किसी का यहां सगा है,
फिर भी हर जगह दगा है
कहें दीपक बापू
हमारे पास नहीं वफा खरीदने की ताकत
बाज़ार में हर कोई ज्यादा दाम मांगने लगा है।
-------------
बरसात हो या सूखा
उनके घर दौलत से भर जाते हैं,
मदद के लिये कागजी काफिले चलतें,
पाने वाले मौत से पहले मर जाते हैं।
कहें दीपक बापू
काली माया ने बना दिये ढेर सारे महल
बसे जिसमें भलाई के व्यापारी
नाउम्मीद होती है फिर भी
लाचार लोग वहां हाजिरी बजाते हैं
---------------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
          यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

2/12/12

वेलेंटाईन डे (शुभेच्छु दिवस)आशिक और माशुका का मोबाइल प्रेम-हिन्दी हास्य कविता (valeltien day or valentain or velantien day par hasya kavita, comedy poem)

माशुका ने आशिक से कहा
"इस वेलेंटाइन डे पर
मुझे नया मोबाइल लाकर देना,
देखना नए मॉडल का हो
किसी अच्छी दुकान से लेना,
पिछली बार वेलेंटाइन डे पर
जो तुमने यह मोबाइल दिया था,
लगता है फुटपाथ से लिया था,
मेरी चेतावनी अपने ध्यान में रखना,
वरना पड़ेगा मज़ा चखना।"

सुनकर सकपकाया आशिक
फी रूआँसा होकर बोला
"लगता है यह वेलेंटाइन डे
मेरे शुभ को अशुभ करने आया है,
मैं तुम्हारा पहला प्यार हूँ
यह तुमने मेरे प्रेम पत्र के जवाब में बताया है,
हमारी प्रेम की पींगे केवल चार माह पुरानी है,
अभी तो मेरी पहले गिफ्ट तुम्हारे पास आनी है,
यह पिछले साल के आशिक का तोहफा
तुम्हें मेरा कैसे नज़र आया,
उस मासूम को तुमने कैसे भुलाया,
अच्छा हुआ तुमने मुझे बता दिया
अब मुझे तुमसे कोई संबंध नहीं रखना।"
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका

1/9/12

फेसबुक पर वार्तालाप में भाषा का तोतलापन अखरता है-हिन्दी लेख (fecebook par vartalap mein bhasha ka totlapan akharta hai-hindi lkeh)

        फेसबुक पर आज की पीढ़ी ही नहीं बल्कि पुराने लोग भी सक्रिय हैं पर उनमें अधिकतर लेखक नहीं है इसलिये हिन्दी साहित्य की परंपराओं के ज्ञान का उनमें अभाव है। ऐसे में नयी पीढ़ी के लोगों से यह अपेक्षा तो करना कठिन है कि वह उन्हें समझ सकें खासतौर से जब वह स्वरचनाकर्म से अधिक कट पेस्ट यानि किसी का पाठ उठाकर अपने पृष्ठ पर रखने के आदी हों। हमारे प्रचार माध्यमों ने तो नयी पीढ़ी में यह बात स्थापित कर दी है कि ब्लॉग, ट्विटर या फेसबुक पर केवल आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, फिल्म, टीवी तथा कला क्षेत्र के शिखर पुरुष ही लिखते हैं और उनकी ही परवाह करना चाहिए। आम लेखक तो फोकटिया हैं और उनकी कोई बात सम्मानीय या पठनीय नहीं है।
       यही कारण कि फेसबुक तथा ब्लॉग पर जब हमने अपनी रचनायें बिना नाम के देखीं तो वहां प्रतिकूल टिप्पणियां लिखीं। ऐसा लगता है कि बजाय प्रतिकूल टिप्पणियां करने के साथ उनको यह बात समझाना चाहिए कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता में साभार रचनायें लेने की परंपरा है। उसमें लेखक का नाम अवश्य दिया जाता है। जिन टीवी चैनलों के पास किसी खास समाचार का दृश्यव्य प्रसारण नहीं है वह दूसरे से साभार लेते हैं। हालांकि यह उदाहरण समझाने के लिये पर्याप्त या उचित नहीं है। हिन्दी टीवी चैनल साभार प्रसारण लेते हैं पर वह या तो विदेशी चैनल का या फिर देश का अंग्रेजी चैनल हो। मतलब यह कि हिन्दी वाले की हिन्दी से सोतिया डाह तो रहती ही है। यह बात इंटरनेट पर भी दिखाई देती है जब चोरी के पाठ प्रकाशित होते दिखते हैं।
         बहरहाल फेसबुक पर एक वेबसाईट संचालिका ने हमसे अपने पाठ प्रकाशित करने की अनुमति मांगी तो हमने उसे सहर्ष नाम प्रकाशित करने की शर्त पर दी। उसने ऐसा किया भी! उसकी इस क्रिया पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। दरअसल उसने भ्रष्टाचार पर उस कविता को ही लिया जो कि हमारी इस विषय पर लिखी गयी सबसे हिट कविता है। इसी कविता ने एक नहीं दो ब्लॉग को हिट बना रखा है। हमें यह देखकर हैरानी हो रही है कि केवल ब्लॉग को नियमित या अपडेट बनाये रखने के लिये लिखी गयीं कविताओं ने अधिक पाठक जुटायें हैं बनिस्बत उन बड़े लेखों के जो बड़े मनोयोग से लिखे गये। इसका कारण यह भी है कि नयी पीढ़ी के युवा ज्यादा समय खराब करने के थोड़े समय में अधिक पढ़ना चाहता है। वह कहानी भी कविता में पढ़ना चाहता है। अगर विषय गंभीर हो तो एक लघु कथा लिखने से काम चल सकता है पर हास्य हो तो कविता ही ठीक जमती है।
          हमें इंटरनेट पर सक्रियता से जहां खुशी मिली वहीं इस बात का दुःख भी होने लगा है कि नयी पीढ़ी भाषा के लिहाज से तोतली हो रही है। रोमन लिपि में अंग्रेजी और हिन्दी का मिश्रण प्रसन्नता नहीं दे सकता। हैरानी की बात है कि हिन्दी टूलों की उपलब्धता के चलते यह हो रहा है। खासतौर से जब यह जीमेल पर ही उपलब्ध हो और प्रयोक्ता उसके उपयोग में असमर्थ हों। लड़के लड़कियां अगर यह सोच रहे हैं कि वह अभिव्यक्त होकर कोई बड़ा नाम करेंगे तो वह गलतफहमी में हैं। फेसबुक पर लिखने के बाद प्रतिक्रियायें मिल जाती हैं पर कालांतर में वह भी बोरियत लगने लगेगी। फेसबुक पर तो यह आशा करना ही बेकार है कि कोई अपने अभिव्यक्त होने की लंबी पारी खेल सकता है। इससे अच्छा तो यह है कि ब्लॉगर या वर्डप्रेस पर ब्लॉग लिखकर प्रयास करना श्रेयस्कर है। फेसबुक में केवल अपने समूहों से जुड़े हुए लोग ही साथी होते हैं जबकि ब्लॉग एक सार्वजनिक पत्रिका की तरह उपयोग में लाये जा सकते हैं। जिन युवक युवतियों में मन में हिन्दी लिखने का आनंद प्राप्त करने की इच्छा है वह फेसबुक के साथ ही ब्लॉग जरूर बनायें। कुछ समय तक उनको टिप्पणियां मिलेंगी पर बाद में बंद हो जायेंगी मगर सर्च इंजिनों में वह हमेशा जीवंत बना रहेगा। ऐसे में अगर केवल अपने अंदर बैठे लेखक को जिंदा रखने के लिये एकांत यात्रा करनी होगी। हालांकि ब्लॉग पर फेसबुक की तरह लिखना अधिक परिणामदायक नहीं रहेगा ऐसे में हिन्दी टूलों के साथ प्रभावी हिन्दी का भी ज्ञान रखना होगा। वह केवल पुराने लेखकों की रचनाओं से मिल सकता है। नये लेखकों ने तो अंग्रेजी का मिश्रण करना प्रारंभ कर दिया है।      
              फेसबुक पर पिछले एक दो महीने से हम अधिक सक्रिय रहे हैं। वहां अपने ब्लॉग के लिंक देखने अक्सर जाना होता है। अनेक महानुभावों ने संपर्क किया है। उनसे चैट में भाषा का तोतलापन अखरता है। हम आपसी संवाद पर अपने साथियों पर कोई आक्षेप नहीं कर रहे पर इतना तय है कि यह रोमन लिपि में लिखना या पढ़ना हमको तोतलापन लगता है। चूंकि लेखक हमेशा भावुक होता है इसलिये हमारे लिये वार्तालाप के समय टिप्पणियां करना ठीक नहीं लगता। यह सही है कि ऐसे संवाद के समय शीघ्रता होती है इसलिये कही दूसरी जगह से कट पेस्ट करने में देरी करना अच्छा नहीं लगता है पर अभ्यास हो जाये तो कुछ भी असहज नहीं है। हिन्दी तो फिर भी सरलता से लिखी जाती है पर चीनी लिखने में कठिन है मगर फिर भी चीन के नागरिक उसमें लिखते हुए संकोच नहीं करते। हमारा उद्देश्य आक्षेप करना नहीं बल्कि नयी पीढ़ी के लोगों को यह समझाना है कि भाषा की कमी उनकी अभिव्यक्ति को कमजोर बनाने के साथ विचार को क्षणिक आवेग के रूप में प्रकट करती है। सबसे बड़ी बात आत्मीयता का वैसा संबंध वह कभी नहीं बना सकती जैसे कि हमारे अपने साथ ब्लॉग लेखकों के साथ प्रभावी हिन्दी के कारण बने।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

1/2/12

फोकट में ईमानदारी-लघु हिन्दी हास्य व्यंग्य (fokat mein imandari-a short hindi comedy satire or short story,hindi kahani)

                विद्यालय के संचालक ने प्राचार्य को बुलाकर कहा कि-‘‘देखो मैंने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में भाग लेने का फैसला किया है। तुम अपने साथ शिक्षकों को मेरे साथ रैली में भाग लेने के लिये तैयार रहने के लिये कहो। विद्यालय के छात्रों के लिये देश में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के संबंध में विशेष ज्ञान देने का प्रबंध करो। मैं चाहता हूं कि मेरे साथ मेरे विद्यालय का नाम भी प्रचार के शीर्ष पर पहुंचे।’’
           प्राचार्य ने कहा-‘‘महाशय, आपका आदेश सिर अंाखों पर! मगर इसी अंादोलन की वजह से हमारे विद्यालय के शिक्षक अब जागरुक हो गये हैं। आप जितने वेतन की रसीद पर हस्ताक्षर करते हो उसका चौथाई ही केवल भुगतान करते हैं। वह चाहते हैं कि कम से कम आधी रकम तो दें। विद्यार्थियों के पालक भी तयशुदा फीस से अलग चंदा या दान देकर नाराज होते हैं। ऐसे में आप स्वयं भले ही इस आंदोलन में सक्रियता दिखायें पर विद्यालय की सक्रियता पर विचार न करें, संभव है यह बातें आपके विरुद्ध प्रचार का कारण बने।’’
संचालक ने कहा-‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, यह भ्रष्टाचार है! कतई नहीं, यह तो मेरा निजी प्रबंधन है। हम तो केवल सरकारी भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैं!’’
            प्राचार्य ने कहा-‘हमारे पास कुछ मदों मे सरकारी पैसा भी आता है।’’
संचालक ने कहा-‘‘वह मेरा निजी प्रभाव है। ऐसा लगता है कि तुम देश का भ्रष्टाचार रोकने की बजाय उसकी आड़ में तुम मेरे साथ दाव खेलना चाहते हो! तुम मेरा आदेश मानो अन्यथा अपनी नौकरी खोने के लिये तैयार हो जाओ।’’
             आखिर प्राचार्य ने कहा-‘‘आपका आदेश मानने पर मुझे क्या एतराज हो सकता है? पर संभव है कि छात्रों के पालक अपने बच्चों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध तिरस्कार का भाव देखकर नाराज हो जायें। आप तो जानते हैं कि अधिकतर माता पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ लिखकर बड़े पद पर पहुंचे। बड़ा पद भी वह जो मलाईदार हो। ऐसे में अगर उसकी निष्ठा कहीं ईमानदारी से हो गयी तो संभव है वह अधिक पैसा न कमा पाये। भला कौन माता पिता चाहेगा कि उसका बेटा मलाई वाली जगह पर बैठकर माल न कमाये। सभी चाहते हैं कि देश में भ्रष्टाचार खत्म हो पर उनके घर में ईमानदार पैदा हो यह कोई नहंीं चाहता। कहंी ऐसा न हो कि हमारे इस प्रयास पर पालक नाराज न होकर अपने बच्चों को दूसरे स्कूल पर भेजना शुरु करें और आपकी प्रसिद्धि ही विद्यालय की बदनामी बन जाये।’’
             संचालक कुछ देर खामोश रहा और फिर बोला-‘‘तुम क्या चाहते हो मैं भी वहां न जाऊं?’
प्राचार्य ने कहा-‘‘आप जाईये, पर अपने स्कूल का परिचय न दें। आप सारे देश में ईमानदारी लाने की बात अवश्य करें पर उसे अपने विद्यालय से दूर रखें।’’
           संचालक खुश हो गया। प्राचार्य बाहर आया तो एक अन्य शिक्षक जिसने दूसरे कमरे में यह वार्तालाप सुना था उससे कहा-‘‘आपने मना किया तो अच्छा लगा। बेकार में हमारे हिस्से एक ऐसा काम आ जाता जिसमें हमें कुछ नहीं मिलता। यह संचालक वैसे ही छात्रों से फीस जमकर वसूल करता है पर हम शिक्षकों को देने के नाम पर इसकी हवा निकल जाती है। वैसे आपके दिमाग में ऐसा बोलने का विचार कैसे आया?’’
         प्राचार्य ने कहा-‘‘अपनी जरूरतें जब पूरी न हों तो ईमानदारी की बात करना भी जहर जैसा लगता है। वैसे फोकट में भ्रष्टाचार का विरोध करना मैं भी ठीक नहीं समझता। खासतौर से जब इस आंदोलन को चलाने वाले घोषित रूप से चंदा लेने वाले हों। हमें अगर कोई पैसा दे तो एक बार क्या अनेक बार ऐसे आंदोलन में जाते। फोकट में टांगें तोड़ना या भाषण देना तो तब और भी मुश्किल हो जब हमें यही अपनी मेहनत का पैसा कम मिलता है।’’
------------------
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

12/9/11

फेसबुक, ब्लॉग और ट्विटर पर सक्रियता में खास और आम जनमानस-हिन्दी लेख (facebook,blog,twitter and coman man-hindi lekh or article)

            अगर हम व्यक्ति की अभिव्यक्ति को उसके अंतर्मन की सही स्थिति माने तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि वह वैसा ही जैसा शब्द लिखता है या बोलता है। बोलना लिखने से ज्यादा आसान है इसलिये लोग बोलते ज्यादा लिखते कम हैं। इस पर जब लिखने की बाध्यता हो तब कोई भी आदमी चिंता में पड़ जाता है और उसका चिंत्तन हवा होकर उसे शून्य में धकेल देता है। हम बात कर रहे है इंटरनेट पर अभद्र शब्द लिखकर नाम कमाने वालों की उस प्रवृत्ति का, जो अब आम हो गयी है। गाली गलौच और या खालीपीली का मजाक इस बात को दर्शाता है कि आदमी में विवेक की कमी है। फेसबुक, ट्विटर, ब्लाग या वेबसाईटों पर अनेक बार ऐसे शब्द देखने को मिलते है जब लगता है कि अविवेकी लोगों का एक बहुत बड़ा समूह इंटरनेट पर अपनी भड़ास निकालने के लिये सक्रिय हो गया है। इनसे निजात पाना संभव नहीं है पर इतना तो अवश्य किया जा सकता है कि इनकी टिप्पणियों को अपने पृष्ठों पर जगह ही नहीं दी जाये।
             पहले ब्लाग, फिर ट्विटर और ऑरकुट पर लोगों की सक्रियता इतनी नहीं थी पर अब फेसबुक ने एक तरह से आम जनमानस को इससे जोड़ दिया है। देखा जाये तो ब्लॉग पर लोगों की सक्रियता कम हो गयी है पर वास्तव में अपनी बात को प्रमाणिक ढंग से कहने वालों के लिये वही एक जोरदार जगह बनी हुई है। जिन लोगों को टिप्पणियों का इंतजार नहीं है और न ही व्यवसायिक रूप से अपनी सफलता दिखाने की बाध्यता है उनके लिये ब्लॉग पर लिखना स्वयं की रचना करने की भूख शांत करने का एक शानदार माध्यम है। फेसबुक ने नयी पीढ़ी को तेजी से इंटरनेट की तरफ आकर्षित किया है। इसका कारण यह है कि उसमें आपसी संपर्क, संवाद, तथा संदेश प्रेषण का यह एक जोरदार माध्यम बना है। त्वरित प्रतिक्रिया के साथ ही अपने आत्मीय, प्रिय तथा मैत्री संपर्कों को निरंतर सक्रियता देखकर एक प्रसन्नता का अनुभव होता है। इस लेखक ने बहुत दिनों तक फेसबुक पर खाता बनाकर उसे देखा तक नहीं पर अपने कुछ प्रियजनों के साथ जब संपर्क हुआ तो ऐसा कोई दिन नहीं होता कि उसे न देखते हों। पहले फेसबुक के प्रति उदासीनता का भाव इसलिये था क्योंकि वहां अपने खालीपन को बिताने का कोई विषय नहीं था। कुछ आत्मीय जनों की सक्रियता देखकर प्रसन्नता होती है। यह एक आम व्यक्ति की स्थिति है पर जब हम अपने लेखकीय स्वरूप के साथ इंटरनेट पर आते हैं तब फेसबुक एकदम सीमित साधन लगता है। आत्मीय, प्रिय तथा मै़त्री भाव वाले लोग हमारे साहित्यरूप से स्नेह नहीं करते बल्कि व्यक्तिगत व्यवहार के प्रति उनका आकर्षण होता है। ऐसे में उनके साथ हास्य कवितायें, निबंध, लेख तथा व्यंग्य जैसे विषय साझा करना अपने को ही मजाक लगता है। हमारी रचना का उद्देश्य अपने साथ जुड़े पाठकों तक अपना संदेश पहुंचाना होता है जो हमारी व्यक्तिगत छवि नहीं देख पाते। एक लेखक वाह वाह या हाय हाय की परवाह किये बिना ही आगे बढ़ सकता है। ऐसे में व्यक्तिगत संपर्क उसके लिये सीमित दायरा होता है पर आम जनमानस अपने समूह के साथ जुड़ना ही एक जोरदार माध्यम बन जाता है।
          बहरहाल फेसबुक ने अनेक प्रकार के समूह बनाये हैं। इन समूहों की वजह से व्यवसायिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक संगठनों ने इसमें घुसकर अपना हित साधने का लक्ष्य बना लिया है। तय बात है कि यह संगठन आपस में प्रतिस्पर्धा रखते है और उनके अनुयायी एक दूसरे के साथ शाब्दिक द्वैरथ करते हुए कभी कभार मर्यादा का उल्लंघन कर जाते हैं। इन संगठनों के साथ जुड़े लोगों में आमजनमानस के मुकाबले कहीं अधिक आत्मविश्वास है इसलिये वह अपनी अभिव्यक्ति में गुस्सा खुलकर व्यक्त करते हैं तो गाली गलौच और मजाक भी कर जाते हैं। आम जनमानस ऐसा नहीं कर सकता। खासतौर से प्रबुद्ध वर्ग का व्यक्ति हमेशा अपनी छवि को लेकर जस तरह सतर्क रहता है इसलिये वह ऐसी हरकतें नहीं कर सकता। हम अपनी छह साल के अनुभव इंटरनेट पर सबकुछ जानने का दावा तो नहीं कर सकते पर इतना अवश्य कहेंगे कि इंटरनेट पर पेशेवर वर्ग ने ही अश्लीलता को प्रोत्साहन दिया है। एक तरह से उन्होंने यह संदेश दिया है कि अगर आप गाली गलौच कहीं नहीं दे सकते या गुस्सा व्यक्त करने का आपके पास कोई मंच नहीं है तो आप इंटरनेट पर इसके लिये एकांत साधना कर सकते हैं। यह अलग बात है कि इस एकांत साधना पर इन्हीं व्यवसायिक इंटरनेट कर्मियों की नज़र रहती है। संभवत यह पेशेवर इंटरनेट कंपनियों, टेलीफोन उपक्रमों तथा प्रचार समितियों के हो सकते हैं जो शायद ब्लॉग, टिवट्र और फेसबुक पर प्रारंम्भिक टिप्पणियां कर प्रयोक्ता को प्रोत्साहित करने का काम करते हैं। इसके बाद आता है राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा साहित्यक संगठनों तथा उनके शिखर पुरुषों के अनुयायियों का जो अपने द्वैरथ का संचालन यहां कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि इन लोगों ने मर्यादा की सीमाओं का उल्लंघन किया है इसलिये अब इंटरनेट पर पर नियंत्रण की बात कर रही है। कुछ लोगों को लगता है कि यह नियंत्रण इस हद तक जा सकता है कि आमआदमी की प्रतिक्रिया का मंच-ब्लॉग, ट्विटर, फेसबुक, ऑरकुट, तथा वेबसाईटें-टूट भी सकता है। अगर ऐसा है तो दुर्भाग्यपूर्ण होगा क्योंकि अंततः संगठित इंटरनेट प्रयोक्ता तो फिर अपने पुराने मंच-टीवी, अखबार तथा आम सभाऐं-ढूंढ लेंगे पर आम आदमी का क्या होगा जो ऐसे द्वैरथों में पहले तो पड़ता नहीं अगर पड़ता है तो अपनी औकात में रहता है। वह मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता पर उसके साथ अमर्यादित विषय सामग्री इस तरह साझा की जाती है कि उसे समझ में नहीं आता कि वह उसे कैसे रोके-याद रखने वाली बात यह है कि अनेक लोग इस बात को नहीं जानते कि वह अपने यहां आयी सामग्री को प्रतिबंधित कैसे करें?
     वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने अपनी छवि से ढेर सारे ऐसे इंटरनेट प्रयोक्ताओं को जोड़ रखा है जो आम श्रेणी में आते हैं। ऐसे लोग इन पर इन दोनों महानुभावों पर इंटरनेट के चश्में से नज़र रखते हैं पर वह इनके समर्थन में अमर्यादित सीमाओं के पार नहीं जा सकते। अगर कोई सीमा के पार जा रहा है तो यह बात तय है कि वह संगठित क्षेत्र का प्रयोक्ता है जिसे अपने साथ अनेक लोगों के साथ होने का आत्मविश्वास है। आमजनमानस में यह आत्मविश्वास नहीं होता कि वह गाली गलौच का इस्तेमाल करे या फिर किसी बड़ी हस्ती की मजाक उड़ाये। अतः इंटरनेट पर नियंत्रण करते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि आम जनमानस के मन में कोई आतंक न पैदा हो। अगर ऐसा हुआ तो इंटरनेट से लोग दूर होना प्रारंभ कर देंगे तब जो हानि होगी उसका आभास अभी नहीं है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

9/30/11

बीमारी, इलाज और परहेज की चर्चा का फैशन-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (bimari, alaj aur parhej ki charcha ka fashan-hindi vyangya kavitaen or satire poem)

अपनी बीमारियां साथ लेकर
शहर में घूम रहे लोग
दवाईयों के साथ परहेज के
नुस्खे मिलने वालों में बांट रहे हैं,
दिल और दिमाग से बीमार समाज में
हमारे चारों तरफ भीड़ है
मगर हम ख्यालों से तंदुरस्त
लोगों को दोस्ती के लिये छांट रहे है।
--------
वह चारों लोग आपस में
बात कर रहे थे
हम उनके पास जाते जाते
चर्चा के विषय के अनुमान कर रहे थे।
शायद वह राजनीति पर बोलते होंगे,
किसी फिल्म की कहानी को तोलते होंगे,
क्रिकेट के स्कोर पर चर्चा होती होगी,
सुना रहा होगा अपने खाने का स्वाद
सभी लग रहे थे भोगी,
जब पास जाकर सुना और देखा
तब पाया
वह तो बीमारी, इलाज और
परहेज पर बात कर रहे थे।
-------------
बीमारियां अब फैशन गयी हैं
लोग बीमारी, इलाज और फैशन
पर सरेआम चर्चा करते हैं,
अपनी बीमारी को अपनी काबलियत
इलाज और परहेज सभी को बताना
शान समझते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

8/15/11

भ्रष्टाचार और चंदा-हास्य कविता (bharshtachar or corruption-hasya kavita or comic poem)

समाज सेवक को धनपति ने
अपनी शराब पार्टी में बुलाकर
अकेले में कहा
‘‘यार, अपनी कमाई बहुत हो रही है,
पर मजा नहीं आ रहा है,
लोगों के कल्याण के नाम पर
तुम्हें चंदा देते हैं
गरीबों की भीड़ कम नहीं हुई
कभी लोग भड़क न उठें
यह डर सता रहा है,
इसलिये तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाओ,
यहां जिंदा कौम रहती है यह
संदेश विदेशों में फैलाओ,
बस इतना ख्यान रखना
भ्रष्टाचार के खिलाफनारे लगाना,
किसी पर आरोप लगाकर
उसकी पहचान मत बताना,
तुम तो जानते हो
हमारा काम बिना रिश्वत
दिये बिना चलता नहीं,
टेबल के नीचे से न दो पैसे
तो किसी का पेन काम के लिये मचलता नहीं,
फिर कई बड़े लोग
तुम्हें जानते हैं,
उनका भी ख्याल रखना
तुमको वह अपना सबसे बड़ा दलाल मानते हैं
इसलिये
हवा में भाषणबाजी कर
अपना अभियान चलाना,
हमें भी है विदेश में
अपने देश की जिंदा पहचान बताना,
अब तुम रकम बताओ,
अपना चेक ले जाओ।

समाज सेवक ने चेक की रकम देखी
फिर वापस करते हुए कहा
‘यह क्या रकम भरते हो,
लड़ा रहे हो उस भ्रष्टाचार नाम के शेर से
जिसका पालन तुम ही करते हो,
पहले से कम से कम पांच गुना
रकम वाला चेक लिखो,
कम से कम हमारे सामने तो
ईमानदार दिखो,
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए
जब मैदान में आयेंगे,
भले किसी का नाम लें
पर हमारे कई प्रायोजक
डरकर साथ छोड़ जायेंगे,
बाल कल्याण और स्त्री उद्धार वाले हमारे धंधे
सब बंद हो जायेंगे,
भ्रष्टाचार विरोधी होकर
हमारी कमाई के दायरे तंग हो जायेंगे,
बंद हो जायेगा
शराब और जुआ खानों पर जाना,
बंद हो जायेगा वहां का नजराना,
जब चारों तरफ मचेगा कोहराम,
तुम्हारा बढ़ जायेगा दो नंबर का काम,
इसलिये हमारा चंदा बढ़ाओ,
वरना भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
हम कतई न उलझाओ।’’
------------
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
5हिन्दी पत्रिका

६.ईपत्रिका
७.दीपक बापू कहिन
८.शब्द पत्रिका
९.जागरण पत्रिका
१०.हिन्दी सरिता पत्रिका 

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

विशिष्ट पत्रिकायें