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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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8/11/14

नारों से चिंगारी नहीं निकलती-हिन्दी कविता(naron se chingari nahin nikaltee-hindi poem)




नारे कोई दियासलाई नहीं होते
जिनसे निकली चिंगारी
समाज में कोई बदलाव कर दे।

जिंदा रहने के लिये सभी संघर्षरत
संभव नहीं है
मतलबपरस्त इंसानों में
कोई ज़माने के लिये
वफा का भाव भर दे।

कहें दीपक बापू प्रेम का संदेश
सुनाते हुए प्रचार बहुत मिल जाता है,
दर्दनाक हादसों पर लगती भीड़
हमदर्दी दिखाते हर कोई हिल जाता है,
मिलता कभी  कोई ही विरले फरिश्ता
जो बिना दाम लिये
किसी का घाव भर दे।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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8/3/14

दावे से कहना मुश्किल है-हिन्दी कविता(dawe se kahana mushkil hai-hindi poem)




पैसे के लिये अपराध होता है
या पैसा अपराध कराता है
दावे से कहना मुश्किल है।

कोई पैसे के पीछे भाग रहा है
या पर्दा बनाकर पीछे से नचा रहा है
दावे से कहना मुश्किल है।

कोई थामे  बंदूक कोई डंडा घुमा रहा है
स्वप्रेरित है या  पैसे का इशारा पा रहा है
दावे से कहना मुश्किल है।

कहें दीपक बापू  आदमी की नीयत
अब बाज़ार में सौदे की चीज बन गयी
सभी जुबान से शब्द खर्च खूब करते हैं
कौन देगा धोखा कौन निभायेगा वादा
दावे से कहना मुश्किल है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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7/25/14

अपनी शख्सियत पर आसरा-हिन्दी कविता(apni shakhsiyat par aasra-hindi poem or hindi kavita)



पेड़ के पत्तों ने रुख बदलकर
हिलना शुरु किया
पर बहती हवा वही है।

पिछले साल भी बरसे थे बादल
अब दूसरे आये हैं
मगर पानी का रूप वही है।

रोज धूप पड़ती है
कभी जलाती कभी सहलाती
मगर सूरज वही है।

कभी रात में अंधेरा बरसता
कभी  हो जाता  उजाला
मगर चंद्रमा वही है।

कहें दीपक बापू अपना आसरा
स्वयं की  ही शख्सियत पर रखना
चेहरे बदलते रहेंगे हमेशा यहां
सभी का भला करने का वादा वही है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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7/15/14

विलासिता में फंसा समाज-हिन्दी व्यंग्य कविता(vilasita mein fansa samaj)



एकरसता में जीने का आदी विलासिता में फंसा समाज,
मौसम के बदलने से परेशान हो रहा है आज।
वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अपनी ऊंची हैसियत पर
इतराते लोग भूख पर बहस में होते मशगूल,
बेबात के विषय को देते जोरदार तूल,
जिनके पेट चिकनी रोटी से भरे हैं,
महंगाई पर चर्चा करते हुए उनकी आंखों में आंसु भरे हैं,
कहें दीपक बापू सभी दे रहे हैं अपने अपने बयान
किसके हाथ में है हालातों पर काबू करने की ताकत
यह अभी तक बना हुआ राज है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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6/7/14

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में हिंसक घटनायें दुःखद-हिन्दी लेख(amritsir ke swarn mandir mien hinsak ghatnaen dukhad-hindi article)



           
            अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में जिस तरह छह जून 2014 को वहां मौजूद कुछ लोगों का आपसी संघर्ष टीवी चैनलों पर दिखा वह अत्यंत दुःखद है।  वैसे तो स्वर्ण मंदिर को मूलतः सिखों का तीर्थस्थान कहा जा सैद्धांतिकर रूप से कहा जा सकता है पर चूंकि अनेक हिन्दू तथा अन्य धर्म के लोग भी उसका सम्मान करते हैं इसलिये इसे संपूर्ण भारतीय समाज के लिये श्रद्धा का केंद्र माना जाता है। वहां अन्य धर्मों के लोग भी उसी श्रद्धा से जाते हैं जैसे कि सिख जाते हैं।  इसलिये समूचे भारत के धार्मिक तथा अध्यात्मिक साधकों ने लिये यह घटना अत्यंत दर्द पैदा करने वाली है।
            देश में अनेक ऐसे प्रयास होते रहे हैं जिसमें सिख तथा अन्य भारतीय धर्मों को अलग बताकर भारतीय समाज को बांटने का प्रयास किया जाता है पर इतिहास गवाह है कि सिख धर्म का प्रादुर्भाव हिन्दू धर्म के रक्षा के लिये हुआ था।  सिख गुरुओं ने सदैव संपूर्ण भारतीय समाज की रक्षा करने की बात कही है।  इसलिये ही गुरुग्रंथ साहिब को संपूर्ण भारतीय समाज वैसे ही सम्मानीय मानता है जैसे श्रीमद्भागवत गीता को माना जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि स्वर्ण मंदिर  में हुई इस तरह की घटना से संपूर्ण भारतीय समाज आहत हुआ है।  जिन लोगों ने वहां इस तरह की निंदनीय घटना में सक्रिय भागीदारी की उन्हें कतई सिख धर्म का रक्षक नहीं माना जा सकता हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में पूरे विश्व से श्रद्धालू आते हैं। यकीनन इसका लाभ वहां के व्यापार तथा सेवाओं में रत लोगों को मिलता है।  अगर इस तरह की घटना से अगर कहीं वहां जाने पर असुरक्षा का भाव पैदा होता रहा तो बाहर के श्रद्धालूओं का आना काम हो सकता है।  इसका प्रभाव पूरे शहर पर पड़ सकता है।
            हम आशा करते हैं कि आगे ऐसी घटनायें नहीं होंगी। जिन महान गुरुनानक देव को सिख धर्म का प्रवर्तक माना जाता है वह इस तरह की घटनाओं को समूचे समाज के लिये खतरनाक मानते थे।  उन्होंने प्रेम, भक्ति तथा सहिष्णुता का जो संदेश दिया उसे पूरा विश्व अनुकरणीय मानता है।  इसलिये चाहे किसी भी बात पर स्वर्णमंदिर में विवाद हुआ वहां तलवारें और डंडे चलाने का तर्क किसी भी हालत में तर्कसंगत नहीं माना जा सकता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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5/18/14

जिंदगी का सफरनामा-हिन्दी कवितायें(zindagi ka safarnama-hindi kavitaen)



जिंदगी का सफर में कई हमराह साथ आ जाते है।
अपने मुकाम पर वह रूकते उनकी याद हम साथ लाते हैं।
कहें दीपक कुछ के चेहरे तो कुछ की अदायें होती अनोखी
उनको भूलना होता कठिन बाकी को भूल जाते हैं।
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जिंदगी की खुशियों को हम बांट लेते हैं,
दर्द के छाये  बादल अपनी हमदर्दी से ही छांट लेते हैं।
कहें दीपक बापू लोग अपनी जिंदगी से ही लाचार हैं
कौन संभाले हमें अपनी गलती पर खुद को ही डांट लेते हैं।
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जिंदगी का सफरनामा जब हम लिखते हैं,
आईने देखते तो अपनी आंखों में ही लाचार दिखते हैं।
कहें दीपक बापू सपने की देखे नहीं इसलिये टूटे नहीं
जमीन पर रखे ख्याल इसलिये पांव वहीं टिकते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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5/11/14

जैसी नीयत वैसी दुनियां-हिन्दी क्षणिकायें(jaise neeyat vaise duniya-three short poem's)



विश्वास की कच्ची मिट्टी में ढले थे,
रूह की रौशनी में चिराग की तरह जले थे।
कहें दीपक बापू चलते रहे यायावर की तरह
नहीं रहा वह पता याद जहां से हम चले थे।
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कभी ख्वाहिश थी आसमान से तारे तोड़कर जमीन पर लायेंगे,
कुछ खास है हमारी शख्सियत में सभी को बतायेंगे।
कहें दीपक बापू जल्दी टूटे सपने जमीन पर जब गिरे
मुश्किल यह है कि अब अपने दिल को कैसे मनायेंगे।
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धरती पर बिखरे हैं फूल भी कांटे भी चाहे जो चुन लो,
ख्याल हो खुश होने का तो रुकना नहीं वरना सिर धुन लो।
कहें दीपक बापू दिमाग में पिरोये हुए है सोच के धागे,
नीयत है तुम्हारी चमकदार या डरावनी दुनियां बुन लो।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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4/28/14

बेदर्द लोगों के हमदर्द-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(bedard logon ke hamdard-hindi vyangya kavitaen)



शहर में झगड़े का अंदेशा लोगों को डरा देता है,
लुट जाने के भय से कांपते हैं सभी
रक्षा का सौदा पेशेवर फसादियों के घर भरा देता है।
कहें दीपक बापू  खून खराबे का दौर कभी नहीं थमता,
बेकसूरों पर हमले में बेदर्द दिलों का दिल रमता,
मिलती हो दलाली अफरातफरी फैलाने में
तो माल कौन छोड़ेगा
खतरे का झूठा अहसास लोगों को कराना भी
शहर में नाम मशहूर करा देता है।
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किसके हाल काले धन से रंगे हैं,
कौन जानता है किसी के दिल के ख्याल
जुबान पर सभी के शब्द चंगे हैं।
कहें दीपक बापू बेदर्द लोगों के हमदर्द
दिखाते हैं अपना चेहरा चमकाकर
घर के बाहर शैतान
उनकी पहरेदार बनकर टंगे हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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4/19/14

अपने आशियाने की दीवार-हिन्दी लघु कविता(apne ashiyane ki deewar-hindi vyangya kavita)

अपने दिल के दर्द पर हम जब चीखे
हमदर्द कोई मिला नहीं
ज़माने ने हमेशा मजाक  बनाया,
बनाते रहे जिंदगी में ख्वाबी किले
सच्चाई ने गिराकर हमेशा सताया।
कहें दीपक बापू अब तो अपने ही दर्द पर
हम खुद ही हंसते हैं,
हमदर्दों के जाल में नहीं फंसते हैं,
महलों में झांकने की कोशिश छोड़ दी है,
अपने आसरे से ही अपनी उम्मीद जोड़ दी है,
अपने आशियाने की दीवारों में जब से दिल लगाया।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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4/12/14

इच्छा पुरानी-हिन्दी व्यंग्य कविता(ichchha purani-hindi satire poem)



घर घर में रोशनी हो

हर गली में चमकती सड़क बनी हो

हर आवासीय क्षेत्र में उद्यान हो

मिल जाये हर जगह शुद्ध पानी,

हर बुद्धिमान ने विकसित समाज की

यही कल्पना सुखद मानी।

कहें दीपक बापू देश के विकास की बातें

बरसों से रोज हम सुनते हैं,

अनेक सपने अपने दिल में बुनते हैं,

इंतजार की कोई अवधि बताता नहीं,

बुरे हालातों के हम हो गये आदी

दर्द अब कोई सताता नहीं,

नये चेहरे नये वादे और नये शब्दों के साथ

पर्दे पर  चमकते नज़र आते है,

ज़माने में उम्मीद  जगाते हैं,

कभी नहीं बदलता कोई दृश्य

कुछ ही दिन में 

हो जाती हमारी इच्छा भी पुरानी।

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4/6/14

मजदूर और विशिष्ट पुरुष-हिन्दी मुक्त कविता(mazdoor aur vishisht purush-hindi frelansare poem)


भरी दोपहर में

मैले कपड़े पहने

पसीने से नहाया

ठेले पर केले बेचता वह आदमी

आवाज देकर अपने ग्राहक की तलाश कर रहा है,

प्यास दबाने के लिये

पास रखी बोतल से गले में पानी भर रहा है।

कहें दीपक बापू सुनते हैं गरीबों के भले के लिये

बड़ी बड़ी बातें श्रीमानों के मुख से

पढ़ते हैं बड़ी क्रांतियों की कथायें बड़े सुख से,

मजदूर नहीं मांगते किसी से भीख,

मेहनत से जिंदा रहने की देते हैं जमाने को सीख,

हमने देखा है हमेशा उनको अपनी बेचैनी के साथ

 पसीने के हथियार से जंग लड़ते हुए

कभी नहीं दिखाई दिया कोई विशिष्ट पुरुष

जो उनकी सांसों में ताजगी भर रहा है।

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