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1/28/15

शहीद वीरों का कि अपना नाम-हिन्दी कविता(shahid veeron ka ki apna nam-hindi poem) शहीद वीरों का

शहीद वीरों का गुणगान
जोरदार भाषणों के साथ
बहुत किया जाता हैं

वह इनाम मांगने
कभी स्वयं नहीं आते
बल्कि उनके नाम पर
अपने शब्दों का बखान कर
अपना नाम किया जाता है।

कहें दीपक बापू आडम्बर से
भरा है पूरा ज़माना,
देशभक्ति और समाज सेवा के
सहारे सरल लगता है
सभी को कमाना,
शहीद कभी आकर
सवाल नहीं कर सकते
इसलिये उनके नाम का
लाजवाब इस्तेमाल किया जाता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/18/15

सही चाल वाली राह मिली नहीं-हिन्दी कविता(aisee rah mili nahin-hindi poem)



ऐसा कोई आईना
नहीं बना अब तक
जो इंसान को
अंदर की तस्वीर दिखा सके।

दो पांव पर चलना
शुरु कर देता है इंसान खुद
मगर ऐसी कोई राह मिली नहीं
जो सही चाल सिखा सके।

कहें दीपक बापू घमंड पर
चल रहा है पूरा ज़माना
मगर कोई ऐसा इंसान
दुनियां में नहीं मिलता
प्यार के पन्नों में
फरिश्ते की तरह नाम लिख सके।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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12/31/14

नववर्ष और नव संवत्-हिन्दी कविता(nava varsh-nav sanvat-hindi poem)




शराब पीते नहीं
मांस खाना आया नहीं
वह अंग्रेजी नये वर्ष का
स्वागत कहां कर पाते हैं।

भारतीय नव संवत् के
आगमन पर पकवान खाकर
प्रसन्न मन होता है
मजेदार मौसम का
आनंद भी उठाते हैं।

कहें दीपक बापू विकास के मद में,
पैसे के बड़े कद में,
ताकत के ऊंचे पद मे
जिनकी आंखें मायावी प्रवाह से
 बहक जाती हैं,
सुबह उगता सूरज
देखते से होते वंचित
रात के अंधेरे को खाती
कृत्रिम रौशनी उनको बहुत भाती है,
प्राचीन पर्वों से
जिनका मन अभी भरा नहीं है,
मस्तिष्क में स्वदेशी का
सपना अभी मरा नहीं है,
अंग्रेजी के नशे से
वही बचकर खड़े रह पाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
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11/26/14

योग से अकेलापन दूर होता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(yog se akelapan door hota hai-hindi thought article)



            किसी समाज के शक्तिशाली होने का प्रमाण उसके यहां उपलब्ध धन या जन संपदा से नहीं वरन् उसके दृश्यव्य स्वरूप से होता है।  अगर किसी देश में धन और जनसंख्या अधिक पर वहां स्वास्थ्य तथा चरित्र का स्तर निम्न है तो वह शक्तिशाली नहीं हो सकता।  हम आज पूरे विश्व में जहां भौतिक संपदा के साथ ही बढ़ती जनसंख्या का दुष्प्रभाव यह देख रहे हैं कि अपराध तथा बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। जिस तरह रोज नये अविष्ककार की खबर आती उसी तरह नयी बीमारियां भी लाती हैं। उसी तरह समाज के लिये उच्च तकनीकी का अविष्कार होते ही उसका अपराध जगत में उपयोग भी देखा जाता है।  हम देख रहे हैं कि मोबाइल, कंप्यूटर तथा तीव्रगति के वाहनों का उपयोेग जनसामान्य में बढ़ा है तो अपराधियों ने भी उनसे अपना काम सरल कर लिया है।  अनेक उपकरणों का उपयोग तो अपराधी इस तरह सुधार के साथ करते हैं कि अविष्कारकर्ता भी दंग रह जाये।
            हमारे देश में जनसंख्या का बढ़ना थमा नहीं है पर रोजगार तथा सुरक्षा के प्रति अविश्वास ने यहां लोगों का मानसिक तनाव बढ़ा दिया हैै।  स्थिति यह है कि मनुष्य एकाकी जीवन बिता रहा है-उसके साथ कितने लोग रहते हैं यह प्रश्न अब महत्वपूर्ण नहीं रहा।  रिश्ता निभाने से अधिक उपयोग करने का विषय बन गया है।  निस्वार्थ प्रेम या सहानुभूति मिलने की आशा ही व्यर्थ दिखती है।  हम बाहर से बृहद दिख रहे समाज में व्यक्ति के एकाकी हो जाने को अज्ञान के कारण नहीं देख पा रहे-यह अलग बात है कि एकांत चिंत्तन में यह बात हमारे सामने आती है कि हम अकेले हैं।
            एक योग साधक एकांत में बैठा था।  एक सज्जन उनसे बात करने आये और बोले-आप अकेले बैठे साधना कर रहे हैं अच्छी बात है। चलिये आपके पास बैठकर मैं अपना अकेलापन दूर कर देता हूं।
            साधक ने कहा-‘नहीं मैं अकेला कहा हूं?’’
            उन सज्जन ने आश्चर्य के साथ पूछा-‘‘आपके साथ कोई दिख नहीं रहा?’’
            साधक ने कहा-‘‘यहां एक मेरा मन है दूसरा मैं आत्मा हूं। मुझे कभी एकाकीपन नहीं लगता।  योग साधना से दृष्टा बनने का अभ्यास हो जाता है। मैं अपनी इंद्रियों की सक्रियता को देखता हूं। करता कुछ नहीं हूं। इंद्रियां कर्ता है वह मेरी देह का हिस्सा है। दृष्टा होने की वजह से  मैं कभी अकेला नहीं होता।’’
            योग साधना के अभ्यास में ध्यान की क्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।  उस समय इंद्रियों और पुरुष की भिन्नता देखी जा सकती है।  ध्यान के समय मन, बुद्धि तथा शरीर का मौन उस पुरुष के दर्शन करता है जो हम स्वयं होते हैं।  तब हम दो होते हैंे-एक देह और दूसरा आत्मा। जिन्होंने ध्यान नहीं किया वह कभी मौन नहीं रहे। मौन नहीं रहे तो कभी आत्मा को जाना ही नहीं।  भीड़ में चलते हुए अपना एकांत दूर किया जा सकता है पर अकेलापन नहीं।  योग करो तो जानो। नहीं किया तो जानने की आवश्यकता नहीं क्योंकि एक बार अगर योग साधना का नशा चढ़ गया तो भीड़ में भी एकांत लगता है। भीड़ की रवैया अकेलापन दिखाता है।  सबसे अलग होते दिखने में भी डर लगता है पर जब योग का अभ्यास हो जाता है तब यही अकेलापन रुचिकर लगता है। हम लोगों को अकेले दिखते हैं पर होते नहीं।  लोग भीड़ में होते हैं पर अकेलापन साथ होता है यह योग का अभ्यास करने वाला ही देख पता है। इसलिये कहते हैं कि योग करो तो जानो।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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10/25/14

परमात्मा के हार्दिक स्मरण से ही भय दूर होता है-श्रीगुरुग्रंथ साहिब के आधार पर चिंत्तन लेख(paramatma ke hardik smaran se hi bhay door hota hai-A religion message based on shri guru granth sahib)



      हमारे भारत देश  के अध्यात्मिक दर्शन भंडार अनेक महापुरुषों ने अपने स्वर्णिम संदेश उपहार के रूप में देकर इतना समृद्ध किया है कि विश्व में उसकी मिसाल अन्य कहीं नहीं मिलती।  अध्यात्मिक पुरुष श्री गुरूनानक देव का नाम पूरे भारतीय जनमानस के हृदय पटल पर स्वर्णिम शब्दों से  अंकित है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के आधार ग्रंथ मनुष्य के न केवल दैहिक वरन् मानसिक तथा वैचारिक रूप से शक्तिशाली होने का संदेश देते हैं।  एक बात निश्चित है कि जो मनुष्य अध्यात्मिक रूप से कच्चा है वह सासंरिक विषयों में चाहे जितना सिद्धहस्त हो जाये आंतरिक रूप से भयग्रस्त ही रहता है।  उसे अपने धन, वैभव, प्रतिष्ठा तथा अन्य सामानों के छिन जाने का भय रहता है।  वह जिस भौतिक शक्ति को एकत्रित करता है उसके क्षीण या नष्ट होने की आशंकायें उसके मस्तिष्क में हमेशा रहती हैं।  अनेक लोग स्वयं को परमात्मा की भक्ति इस तरह करते हैं जैसे कि एक औपचारिक दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।  सांसरिक विषयों में उनका मन इस तरह लिप्त रहता है कि वह भक्ति के समय भी अपना पूरा ध्यान न उसमें लगा पाते हैं वरन् कहीं न कहीं उनके अंदर सांसरिक विषयों पर विचार का दौर चलता रहता है।  इसी कारण भक्ति से होने वाले वैचारिक तथा मानसिक लाभ से वंचित रह जाते हैं।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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भै महि रचिओ संभ संसारा।
तिसु भउ नाही जिसु नामु अधारा।।
भउ न विआपै तेरी सरणा।
जो तुधु भावै सोई करुणा।।
सोग हरखा महि आवण जाणा।
तिनि सुखु पाइआ जो प्रभ भाणा।
            हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में सभी के मन में भय व्याप्त है मगर जिसके मन में परमात्मा के प्रति आस्था है वह निर्भय होकर विचरता है। जिसने परमात्मा के नाम स्मरण से अध्यात्मिक परिपक्पता प्राप्त की है वह निर्भयता के साथ आनंद में  रहता है।  संसार के विषयों उसे अधिक उसे नाम स्मरण में सुख मिलता है।
            एक योग तथा ज्ञान साधक होने के नाते हमारा अनुभव यह रहा है कि परमात्मा के नाम स्मरण, योग साधना तथा सत्संग से कभी भी सांसरिक विषयों में फलीभूत होने की कामना करनी ही नहीं चाहिए।  इस तरह की क्रियाओं से हम दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रूप से शक्तिशाली हो सकते हैं जिससे सांसरिक विषयों में भी सहजता से बने रह सकते हैं।
            अनेक लोग यह पूछते हैं कि परमात्मा के नाम स्मरण से क्या लाभ होता है? इसका जवाब केवल यही है कि कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं होता और जो अप्रत्यक्ष रूप से मिलता है उसका मूल्य किसी भी मुद्रा में आंका नहीं जा सकता।  हम यह भी देख रहे हैं कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के प्रभाव में हमारा वर्तमान समाज भारतीय देवी देवताओं के नाम स्मरण को एक पुराना विचार मानते हैं।  इतना ही नहीं समाज के अनेक लोगों यह भ्रम भी पालते हैं कि भगवान के नाम जपने से संसार के विषयों में भारी उपलब्धि मिल जाती है।  भक्ति से मानसिक लाभ होने की कोई कल्पना तक नहीं करता।  जबकि हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार मनुष्य के संकल्प के अनुसार ही उस निजी संसार निर्मित होता है।
            इसलिये हमें अपनी भक्ति निष्काम भाव से ही करना चाहिये। सृष्टि की रचना परमात्मा का कार्य है पर संसार का खेल तो माया रचती है।  परमात्मा के नाम स्मरण से हम कुछ देर के लिये संसार चक्र से हम दूर हो जाते हैं और इस दौरान मिले विराम से मन को राहत मिलती है।  वह मन जो अंततः हमारा स्वामी होने के कारण सांसरिक विषयों में हमें भगाता रहता है।


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10/20/14

शब्दों की समीक्षा-हिन्दी कविता(shabodn ki samiksha-hindi kavita)



सत्य छिपाने के लिये
अनेक झूठ बोले जाते हैं।

अपने शब्द फैंकते हैं
लोग पत्थर की  तरह
दूसरे के वक्तव्य पर
समीक्षाओं का पिटारा
यूं ही खोले जाते हैं।

कहें दीपक बापू अपनी भाषा में
लोग बतियाते हैं,
परायी में गरियाते हैं,
मौन सबसे बड़ा
हथियार लगता है
जब सार्थक पर सभ्य शब्द
खड़े हैं एक तरफ
निरर्थक और सभ्य शब्द
महंगे भाव तोले जाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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9/27/14

फेसबुक पर देवनागरी लिपि का उपयोग ही प्रभावी हो सकता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(facebook par devnagari ka hee upyogi ho sakta hai-hindi chinntan lekh,hindi thought article)




            हमारा मानना है कि फेसबुक पर हिन्दी रोमन लिपि लिखने वाले निष्प्रभावी हो रहे हैं। हमारी सलाह है कि इससे बेहतर तो यह है कि वह अंग्रेजी भाषा में  ही लिखें ताकि हम उसे अपने मस्तिष्क के अंग्रेजी सर्वर से सहजता से पढ़ सकें भले ही वह अल्प क्षमता वाला है।  हम जैसे पाठकों के लिये यह बहुत कष्टप्रद है कि दूसरें के  विचार शब्द को रोमन  में vichar  सहजता से पढ़ लें। इससे बेहतर तो यह होगा कि वह thoght, thingking, think ही लिखें।  एक बात दूसरी भी है कि रोमन लिपि में हिन्दी लिखने वाले अपने अंतर्जालीय ज्ञान पर इतरा जरूर लें पर उससे हिन्दी भाषा में उनकी कमजोरी हंसने को ही बाध्य कर देती है।  खासतौर से जब वह किसी पाठ या टिप्पणी पर प्रतिकूल शब्द लिखने वालों को यह समझ लेना चाहिये कि उनकी बात इतने लोग पढ़ नहीं रहे हैं जो पढ़ रहे हैं  तो समझ नहीं रहे।
            खासतौर से विचाराधाराओं से जुड़े लोगों को हमारी सलाह है कि वह स्वतंत्र तथा मौलिक लेखकों और पाठकों से अन्याय न कर हिन्दी देवनागरी लिपि में ही लिखें।  इसके लिये साधन अंतर्जाल पर उपस्थित हैं।  हमारे देश में तीन धाराओं से जुड़े लेखक हैं-जनवादी, प्रगतिशील और राष्ट्रवादी। इनमें राष्ट्रवादी अंतर्जाल पर हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखकर बढ़त बना लेते हैं।  इतना ही नहीं यह राष्ट्रवादी अपने प्रतिंद्वंद्वियों के पाठों पर टिप्पणियां भी हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखकर उनकी रचनाओं से ज्यादा प्रभाव कायम कर जाते हैं।  कई बार पाठ तो रोमन में होता है और यह राष्ट्रवादी देवनागरी में टिप्पणी हिन्दी देवनागरी में इस तरह करते हैं कि पाठक का ध्यान पाठ की तरफ कम उनकी टिप्पणियों पर अधिक जाता हैं।  उधर जब अन्य विचारधारा के कुछ लेखकों के पाठ या टिप्पणियां रोमन में होते हैं तो हम जैसे पढ़ाकू का दिमाग लटकने लगता है।  इधर हिन्दी से पढ़े कि उधर अंग्रेजी का सर्वर चालू करें, यह तय करना कठिन लगता है।  हमारी उत्सुकता सभी को पढ़ने में रहती है पर रोमन लिपि दीवार की तरह रास्ता रोक लेती है।  जब पढ़ते हैं तो शब्द दिमाग में ऐसे ही घुसते हैं जैसे डिस्क का कनेक्शन खराब होने पर टीवी के दृश्य आते हैं।  रोमन लिपि में पढ़ने के बाद आह और वाह करने लायक हमारा मस्तिष्क नहीं रह पाता।
            हम उन मौलिक तथा स्वतंत्र लेखकों में है जो आलोचकों की बात पर ध्यान देते है क्योंकि वही आगे की रचना का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।  हिन्दी को देवनागरी तथा अंग्रेजी को रोमन लिपि में पढ़ने का ऐसा अभ्यास है कि यह तीसरा मार्ग हमें सहज नहीं लगता।  अभी हाल ही में हिन्दी दिवस बीता तब टीवी चैनलों पर बहस हुई कि तब अनेक विद्वानों ने समझाया कि हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का अनावश्यक इस्तेमाल न हो।  मगर सब बेकार।  अब तो टीवी वाले खुलकर अंग्रेजी का उपयोग कर रहे हैं। हमें लगता है कि हिन्दी के प्रचार माध्यमों के पास योग्य हिन्दी वाचकों और लेखकों की कमी है। इस हिंग्लिश का प्रचलन इसलिये ही प्रारंभ किया गया ताकि प्रचार प्रबंधकों के प्रबंध कौशल पर किसी की दृष्टि नहीं जाये जो हिन्दी में योग्य लोगों की तलाश नहीं कर पाते
            प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्रसंघ में अपना भाषण हिन्दी में देंगे। इस पर हमारे टीवी चैनल यह कहते हुए इतरा रहे है कि पीएम अपनी स्पीच हिन्दी में देंगे।  यह एक वाक्य कानों में ही सहजता से नहीं पहुंचता। पहुंचता है तो बहुत देर बार हमारा मस्तिष्क इसे यूं ग्रहण करता है कि प्रधानंमत्री अपना उद्बोधन हिन्दी में करेंगे। रोमन लिपि में हिन्दी और देवनागरी में हिंग्लिश वाक्य अपने मस्तिष्क में स्थापित करने के लिये उसके परिष्कृत करना पड़ता है।  अगर सीधा हो तो बिना बाधा के तो वह सहज गेय होता है। 
            हिन्दी के जिन महानुभावों ने जो यूनिकोड बनाया हैे उनके लिये   पद्मश्री जैसा सम्मान भी छोटा लगता है।  हमें जब हिन्दी के देव परिवार का यूनिकोड में परिवर्तित करने का साधन मिला तो प्रसन्नता का ठिकाना नहंी रहा था।  यही कारण है कि हम जब कोई पाठ लिखने बैठते हैं तो वह लंबा हो ही जाता है।  हालांकि रोमन लिपि से भी देवनागरी में परिवर्तित कर हिन्दी में लिखने का भी साधन है पर वह जल्दी थका देता है। अपनी बात कहकर जल्द समाप्त करने की इच्छा होती है और जब पाठ पूरा होता है तो लंबी लंबी सांसे लेते हैं।  हिन्दी साधन से हम जैसे लेखकों को अपनी बात सहजता से लिखने की जो सुविधा है उसने एक पाठक के रूप में रोमन लिपि पढ़ने में असहज बना दिया है।
            इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि यह हमारी समस्या है। हमारा मानना है कि हम जैसे अनेक लोग ऐसे होंगे। यह अलग बात है कि अपनी बात कहने में उनको संकोच यह सोचकर होता होगा कि जब स्वयं के अंदर ही हिन्दी देवनागरी लिखने में सामर्थ्य नहीं है तो दूसरे से कैसे कहें? एक बात तय है कि अंतर्जाल पर-फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग-जिनको अपनी बात हिन्दी में लिखकर प्रभावी होना है उन्हें देवनागरी का मार्ग अपनाना चाहिए।  खासतौर से अगर वह अर्थ, समाज, राजनीति, कला, फिल्म, साहित्य और खेलकूद के क्षेत्र में शिखर पर न हों तब यह अनिवार्यता ही होगी।  शिखर पुरुषों पर तो प्रचार माध्यम टकटकी लगाये बैठे रहते हैं कि कब वह कोई शब्द किसी भी भाषा में अंतर्जाल पर टपकायें और उसे लपक लें। आम लेखक को ऐसी अपेक्षा कभी नहीं करना चाहिये।


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6/15/11

खग्रास चंद्रग्रहण एक सामान्य प्राकृतिक घटना है-हिन्दी महालेख (khagras chandragrahan-hindi mahalekh

    दुनियां में सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण आते रहते हैं। बरसों से हम देख रहे हैं पर इतनी चर्चा कभी नहीं होती थी। बचपन में बुजुर्गों के पहले ही पता चल जाता था कि अमुक तारीख को सूर्य ग्रहण या चंद्रग्रहण है। उस दिन कुछ सावधानी बरतने की बात कही जाती पर वह आज के टीवी चैनलों की तरह महाबहस का विषय नहीं होती थी। सच कहें तो सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण को सामान्य घटना ही माना जाता था। कहीं आतंक या डर का माहौल नहीं देखा। आजकल   टीवी चैनलों ने दोनों ग्रहणों का बाज़ारीकरण कर दिया है।
         कह रहे हैं कि डरो नहीं, खूब देखो। कुछ परेशानी नहीं है। इन चैनलों पर बहस के लिये आने वाले वही लोग होते हैं जो पहले भी आते रहे हैं। खगोलशास्त्र से जुड़ी इन घटनाओं पर चर्चा करने के लिये ज्योतिषी बुलाये जाते हैं। फिर उनका मुकाबला करने के लिये कुछ आधुनिक विज्ञान समर्थक भी होते हैं। प्रचार इस तरह किया जाता है कि जैसे हिन्दू समाज में ही अंधविश्वास हो और पश्चिमी विज्ञान एकदम प्रमाणिक है। यह सब देखकर हम तो यह सोचते हैं कि भारतीय हिन्दू समाज इतना अविकसित ओर पिछड़ा नहीं है जितना आधुनिक ज्ञानी समझते हैं। देखा जाये तो हमारी श्रीमद्भागवत गीता के प्रचलन में आने के बाद भारतीय समाज शायद दुनियां का इकलौता समाज है जो समय के साथ आगे बढ़ता जाता है। यह अलग बात है कि प्रगतिशील और जनवाद से जुड़े विद्वानों का सभी जगह बाहुल्य है जिनकी यह मनोवृत्ति है कि संपूर्ण भारतीय अध्यात्म दर्शन को अवैज्ञानिक तथा समाज को जड़ साबित कर अपनी चेतना की व्यवसायिक धारा प्रवाहित की जाये। फिर उनके साथ बहस करने वाले भारतीय अध्यात्म के ज्ञानी भी कुछ इस तरह पेश आते हैं जैसे कि अंधविश्वास का समर्थन कर रहे हों। पेशेवर ज्योतिषी अपने प्रचार क्रे लिये आते हैं तो उनका मुकाबला करने पेशेवर बहसकर्ता आते हैं। चर्चा कराने वाले उद्घोषक का तो कहना भी क्या? निरपेक्ष दिखने की कोशिश इस तरह करते हैं जैसे कि लग रहा हो कि किसी विषय पर सहमति या असहमति न देना ही उनकी योग्यता का प्रमाण हो।
       भारत के हिन्दी टीवी चैनलों में कार्यरत उद्घोषकों का यह भाग्य है कि भारतीय अध्यात्म की व्यापकता ही उनको इस तरह के कार्यक्रम प्रदान करती है। जिसमें ढेर सारे ग्रंथ हैं और उसमें जीवन के हर पक्ष के साथ -जिसमें मनुष्य तथा अन्य जीव भी शािमल हैं-प्रकृति के रहस्यों पर भी प्रकाश डाला गया है। जबकि अन्य दर्शनों में अन्य जीवों की उपेक्षा कर केवल मानव जीवन पर ही अधिक लिखा और बोला जाता हैं। कुछ बातें मनुष्य समाज के संचालन से संबंधित होती हैं।
        प्रकृति के रहस्यों पर पश्चिम तो अब दृष्टिपात कर रहा है जबकि भारतीय अध्यात्म दर्शन में बहुत पहले ही इस पर लिखा गया है। हमने पंचांगों में सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण की तारीखें देखी हैं जो कि यकीनन पश्चिमी विज्ञान से नहीं ली गयीं। पहले लोग अखबार पढ़े बिना बताते थे कि अमुक दिन चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण है।
बहरहाल भारत के टीवी चैनल अपने व्यवसायिक उद्देश्यों की पूर्ति अपने अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर कर लेते हैं यह अलग बात है कि अपने चश्में से समाज को अधंविश्वासी समझने वाले उद्घोषक अपने को भले ही चालाक समझें पर हम सब जानते हैं कि उनकी अदायें ऐसी न हों तो शायद उनका काम भी न चले।
       पिछली बार के पूर्ण सूर्यग्रहण की याद आती है जब कहा गया है कि उसे देखना ठीक नहीं है और देखना है तो विशेष प्रकार के चश्में से देखें। सामान्य रंगीन चश्में से काम नहीं चलेगा। हम आज भी सामान्य काले चश्में से दोपहर मेें तपते हुए सूर्य को आसानी से देख पाते हैं। तब यह सवाल आता है कि ग्रहण के समय जब सूर्य का प्रकाश कम हो जाता है तो वह सामान्य से अधिक खतरनाक कैसे हो सकता है। उस समय खूब सूर्यगं्रहण देखने वालेचश्में बिके थे उसमें कुछ तो नकली भी बताये गये थे। तय बात है कि बाज़ार ने ही ऐसा प्रचार करवाया होगा ताकि वह अपने उत्पाद बेच सके। वैसे तो इष्ट दिवस, मित्र दिवस, पितृदिवस, मातृदिवस तथा प्रेम दिवस जैसे पश्चिमी दिवसों को भारतीय प्रचार माध्यम अपने प्रायोजक बाज़ार के लिये विज्ञापन प्रसारित कर उसके लिये ग्राहक जुटाते हैं। वैसे ही भारतीय त्यौहारों के साथ सूर्यग्रहण तथा चंद्रग्रहण भी उनके लिये विज्ञापन प्रसारण के बीच में कार्यक्रम की सामग्री बन जाते हैं।
      वैसे चर्चाओं में शामिल लोग भारतीय समाज को फालतु समझते हैं पर लोगों को लगते स्वयं फालतू हैं-हम नहंी मानते क्योंकि पता है कि यह सब कमाई करने और प्रचार पाने के लिये बहस करने आते हैं।
हम यह खग्रास चंद्रग्रहण देख पायेंगे कि पता नहीं। यह लेख लिखने के तत्काल बाद ही सोने का प्रयास करेंगे। अगर बीच में नींद टूटी तो छत पर देखने जायेंगे कि कैसा है खग्रास चंद्रग्रहण। जहां हानि लाभ, दुःख सुख, और जीवन मरण का सवाल है तो वह इस संसार का हिस्सा हैं। जब तक देह हैं तो विकार आयेंगें। भूख लगेगी, प्यास लगेगी। कभी जीभ किसी नये स्वाद के लिये चीत्कार करेगी। जिस तरह सत्य अनंत है वैसे ही माया भी अनंत है। सत्य सूक्ष्म है और उसे ध्यान आदि के माध्यम से अनुभव किया जा सकता है तो माया इतनी व्यापक है कि उसके चक्र में फंसे तो सभी हैं पर समझ नहीं पाते। खेलती माया है और आदमी सोचता है कि मैं खेल रहा हूं।
      जहां तक चर्चाओं का सवाल है तो भारतीय अध्यात्म इतना विशाल है कि जिस विषय पर चाहो बहस कर लो। जहां चार बुजुर्ग मिलते हैं किसी न किसी धर्मग्रंथ पर बहस करने लगते हैं। सभी अपना ज्ञान सुनाते हैं पर सुनता कौन है पता नहीं। सभी बोलते हैं। यही हाल टीवी चैनलों का है पर वहां के उद्घोषक तमाम तरह के तामझाम और आकर्षण मे घिरे होते हैं इसलिये उनको विद्वान माना जाता है। यह अलग बात है कि उनकी महाबहस-यह शब्द आज तक हमारे समझ में नहीं आया-अध्यात्मिक में वास्तविक रुचि रखने वालों के लिये हास्य का विषय होती है।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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