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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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12/23/07

शांति लाने का दावा

बारूद के ढेर चारों और लगाकर
हर समस्या के इलाज के लिए
नये-नयी चीजें बनाकर
आदमी में लालच का भूत जगाकर
वह करते हैं दुनिया में शांति लाने का दावा

बंद कमरों में मिलते अपने देश की
कुर्सियों पर सजे बुत
चर्चाओं के दौर चलते
प्रस्ताव पारित होते बहुत
पर जंग का कारवाँ भी
चल रहा है फिर भी हर जगह
होती कुछ और
बताते और कुछ वजह
जब सब चीज बिकाऊ है
तो कैसे मिल सकता है
कहीं से मुफ्त में शांति का वादा
बहाने तो बहुत मिल जाते हैं
पर कुछ लोग का व्यवसाय ही है
देना अशांति को बढावा

एक दुकान से खरीदेंगे शांति
दूसरा अपनी बेचने के लिए
जोर-जोर से चिल्लाएगा
फैलेगी फिर अशांति
जब फूल अब मुफ्त नहीं मिलते
तो बंदूक और गोली कैसे
उनके हाथ आते हैं
जहाँ से चूहा भी नहीं निकल सकता आजादी से
वहाँ कोहराम मचाकर
वह कैसे निकल जाते हैं
विकास के लिए बहता दौलत का दरिया
कुछ बूँदें वहाँ भी पहुंचा देता है
जहाँ कहीं शांति का ठेकेदार
कुछ समेट लेता है
जानते सब हैं पर
दुनिया को देते हैं भुलावा
न दें तो कैसे करेंगे शांति लाने का दावा

12/21/07

उदासी का साया

मन से मनुष्य कहलाया
चलता है उसी के इशारों पर
अन्दर बैठे अहंकार ने
स्वयं ही चलने का अहसास कराया
कह गए बडे-बडे सिद्ध
अपने मन को पहचानो
कभी नाचता है
कभी भागता है
कभी भक्ति भी चाहता है
स्वयं मनस्वी होकर चलो
यही सभी ने समझाया

पर आदमी नहीं समझता
अपनी बुद्धि और अंहकारवश
दूसरों में तलाशता अपने लिए अक्ल
माया के सिंहासन पर बैठे
बुतों के इर्दगिर्द देकर परिक्रमा देकर
बहुत सुकून अनुभव करता
तन की खुशी को ही मन की समझता
इसलिए हांक कर ले जाते है
इस ज़माने के उसे नये खैरख्वाह
रुपहले परदे पर देखे दृश्य को
असली समझता
नाम के मनुष्य बहुत हैं पर
सबका मन मुरझाया
जब तक चलते हैं दृश्य
गूंजता हैं कानों में भयानक शोर
तब तक चलता है
अकेले में छा जाता है उस पर उदासी का साया
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12/19/07

सुबह-चलते चलते

रात को लिखा और पढा
उसका सुबह तक हिसाब नहीं रखा
प्रात:काल के शुद्ध पवन को जो स्वाद चखा
विकार रहित तन और मन
इससे बड़ा क्या हो सकता है धन
अगर भोगा होता तो जान पाते सखा

योग साधना, प्राणायाम, ध्यान और प्रार्थना से
चित्तवृति में अपूर्व शांति आती है
चेहरे पर कांति आती है
विचारों में अच्छी खुशबू छा जाती है
जब करोगे धारण यह सन्देश
तब जान पाओगे इस जीवन में
क्या चमत्कार रखा

मन में दर्द और पीडाओं का
विस्तार होता है अनंत
सुबह ही कर दो उनका अंत
फिर दिन भर तो उसके साथ रहना है
दिन भर उनको सहना है
अपनी साँसों में भर लो ताजगी
फिर दिन में कुछ ताजा नहीं रखा
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पुन्छ्ला टिप्पणी-कौन क्या लिखता है, क्या बोलता है, क्या देखना चाहता है यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह पढता कैसा है, सुनता क्या है , उसके संस्कार कैसे है और उसकी संगत कैसी है। इसलिए अच्छा पढो, अच्छा सुनो, अच्छे विचार करो तो स्वयं अपने गुरु बन जाओगे और अपने आपको पढाओगे.

8/23/07

भाव, भावना और शब्द

जब हृदय के भाव शब्द बन जाते हैं
तब ऐक तस्वीर की तरह भाते हैं
अपनी भावनाओं को जो समझते हैं
वही उसे शब्दों के सुन्दरता से सजाते हैं
शब्द और भाव का सामंजस्य
इतना आसान नहीं है जितना लगता है
जब भाव होते हैं तब शब्दों के
मस्तिष्क में स्थित भण्डार पर
नजर नहीं जाती
पर जब शब्द लिखने या कहने का मन हो
तब भावों को अपने से परे पाते हैं

हर कहा और बोला गया शब्द
हमारे भावों का प्रतिबिंब कहलाता है
पर जिनको हम समझें
कोई और अर्थ वैसा न समझे
हमारे व्यक्तित्व का स्वरूप
लोगों की दृष्टि में बदल जाता हैं
तोल कर न बोले और कहे शब्द
हमें ही जिन्दगी में उलझाते हैं

जैसे भाव हैं हमारे
वैसे व्यक्त शब्द न हो पायें
तो भी लगता है कि हमने
जो कुछ लिखा और कहा
उससे बात नहीं बनी
अपने ही हृदय की तस्वीर
अस्पष्ट नजर आती है
अव्यक्त भाव धीरे-धीरे
दुर्गन्ध देने लगते हैं
और हम भीड़ में भी
स्वयं को अकेला पाते हैं
खेल सब नियत का है
अपने शब्द और बोलने के
साथ ही उसमें अमरत्व और अमृत का
प्रकट होते देखना चाहते
उसका कोइ अर्थ समझे इसका
इन्तजार नहीं कर पाते
अपने भाव और शब्द जोड़ नहीं पाते
अगर अपने शब्द और भावों को
जोड़ने में धैर्य धारण करें और
सहजता से उनके मिलन का दृश्य
अपने ही अंतर्मन में देखें
तभी अभिव्यक्ति कर पाएंगे
नहीं तो बोलने और लिखने का
मतलब स्वयं ही नहीं समझ पायेंगे
पता नहीं क्यों हम
इतनी बात क्यों नहीं समझ पाते हैं

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