समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label धर्म संदेश. Show all posts
Showing posts with label धर्म संदेश. Show all posts

6/12/15

म्यांमार में भारतीय सेना का सराहनीय कदम-हिन्दी चिंत्तन लेख(indian milatry action in myamaar-hindi thought article)


                                    म्यांमार भारतीय सेना ने अभी म्यांमार में घुसकर उग्रवादियों के शिविरों को नष्ट कर अपने 18 साथियों को मौत का बदला लिया वह प्रशंसनीय है। इसे लेकर अनेक प्रतिक्रियायें सामने आयी हैं पर एक बात तय है कि आगे भी इस तरह की कार्यवाही करना ही होंगी तभी भारत की शक्तिशाली देश की छवि बनेगी।  भारत के पास एक विशाल पेशेवर सेना है।  भारतीय जनता से प्राप्त राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा हथियार खरीदने पर भी किया जाता है। पिछले कुछ समय से पड़ौसी देशों ने भारत के आंतरिक संघर्षों को आधार बनाकर आतंकवाद का निर्यात बढ़ाया है।  लगातार हो रही आतंकी घटनाओं से भारतीय जनमानस निराशा था पर इस घटना ने यकीनन आत्मविश्वास बढ़ाया है।
                                    उत्तर पूर्व में चीन आतंकवादियों का सहायक है पर न कभी भारत ने यह आरोप सीधे लगाया न ही प्रचार माध्यमों ने इस पर खोज की। म्यांमार में कार्यवाही के बाद चीन ने अपना पल्ला झाड़ा है पर यह दिखावा ही लगता है। अलबत्ता एक बात तय है कि म्यांमार के बाद पाकिस्तान और चीन सहम गये हैं।  कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि म्यांमार में घुसकर कार्यवाही करने की घटना को इतना तूल देना कूटनीतिक गलती है पर हम इसे नहीं मानते। आज का दौर दूसरा है।  शक्तिशाली होना ही पर्याप्त नहीं है उसका दिखावा करना भी जरूरी है। एक बात हम साफ कर दें कि पाकिस्तान और चीन ही नहीं वरन् दुनियां के किसी देश में सामरिक ताकत कितनी भी हो पर सामाजिक तथा आर्थिक स्थितियां ऐसी नहीं है कि वह लंबा युद्ध कर सके।  यही कारण है कि अनेक देश छद्म युद्ध की नीति के तहत अन्य के विरुद्ध आतंकवाद का प्रायोजन करते हैं।  चीन और पाकिस्तान गठजोड़ कर भारत को चुनौती दे रहे हैं पर अंतर्राष्ट्रीय सामरिक विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों मिलकर भी भारत का कुछ बिगाड़ नहीं सकते।  चीन बराबर भारतीय क्षेत्रों पर वक्र दृष्टि डालता है।  वह भारत से ढेर सारा रुपया कमा रहा है पर मौका पड़ने पर आंख भी दिखाता है। उसकी इस हुंकार का आधार ही वही आतंकवाद रहा है जिसे वह प्रायोजित करता है। अब उसे अपनी नीति बदलना होगी।
                                    महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान इस कार्यवाही से घबड़ा गया है।  इसका कारण यह कि उसके नेताओं के काले धंधे बड़े आराम से चल रहे हैं। भारत के विरुद्ध  आतंकवादी अभियान चलाकर वह अपनी उस जनता का ध्यान बंटाये रखते हैं जो कि अनेक समस्याओं से ग्रस्त है।  अगर कहीं भारत ने पाकिस्तान में घुसकर कार्यवाही की तो वहां के नेता अपनी जनता को क्या मुंह दिखायेंगे? उस कार्यवाही के बाद जनता उन पर भारत के विरुद्ध आक्रामक कार्यवाही का दबाव डालेगी जिसे सहन करना कठिन होगा। कार्यवाही करते हैं तो बड़े युद्ध की स्थिति उनके लिये ही खतरनाक हो सकती है। मतलब अब दक्षिण एशिया में यथास्थिति नहीं रहने वाली और उसकी चाहत रखने वालों के लिये अब दोनों हाथों में लड्डू नहीं रह सकते। इधर आतंकवाद फैलाना उधर कमाना-यह अब ज्यादा नहीं चल पायेगा। म्यांमार में भारतीय सेना की कार्यवाही एक एतिहासिक घटना है जिसके कालाांतर में अधिक सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
------------------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

6/7/15

आहार के विषय में जाग्रति लाना महत्वपूर्ण-हिन्दी चिंत्तन लेख(ahar ki vishay mein jagrati lana mahatvpoorn-hindi thought aritcle)

अभी हाल ही में हमारे देश में बड़े उत्पाद संगठनों के खाद्य उत्पादों पर विवाद उठ खड़ा हुआ था जो अब थमता नज़र आ रहा है। इन खाद्य उत्पादों के उपयोग से बच्चों और स्त्रियों पर हानिकारक बताया गया है।  देखा यह जाता है कि इन विषैले पदार्थों के उपभोग में महिलाऐं और बच्चे भी शािमल हैं।  आमतौर से बच्चों को खिलाने पिलाने के लिये माता पिता बाज़ार के सामानों का उपयोग करते हैं। उनके लिये दूध तक अब बड़ी उत्पाद कंपनियों के नाम से बेचा जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि बच्चों के लिये खान पान के लिये समाज में जाग्रति लाने को विषय को महत्वपूर्ण नहीं मानना चाहिये?
नार्वे की एक संस्था विभिन्न विषयों में श्रेष्ठता प्रमाणित करने वाले को नोबल पुरस्कार देती है। आमतौर से हमारे यहां के वामपंथी तथा दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी इन पुरस्कारों का मजाक बनाते हैं।  अलबत्ता प्रगतिशील बुद्धिमानों के लिये यह पश्चिमी पुरस्कार अत्यंत रुचिकर रहते हैं।  नार्वे के इन पुरस्कारों को पश्चिमी देशों की राजनीतिक सोच का एक भाग भी माना जाता है। जिन विषयों के लिये यह दिया जाता है वह पूरी तरह पश्चिमी विचाराधारा के प्रवाहक होते हैं।  अभी हाल ही में भारत के एक महान व्यक्तित्व को बाल श्रम के लिये काम करने पर नोबल दिया गया।  भारत में बालश्रम एक बहुत बड़ी समस्या है और उसके अनेक कारण है।  हम यह तो मानते हैं कि बालकों तब तक कोई काम नहीं लेना चाहिये जब तक वह युवा न हो जायें। इस सोच के पीछे हमारा दृष्टिकोण मानवीय सिद्धांत से जुड़ा है।  पश्चिम के बालश्रम के विरुद्ध झुकाव वैसे तो मानवीय पक्ष लगता है पर जिस तरह वहां कंपनियों का प्रभुत्व है उसे देेखकर संदेह भी पैदा होता है।  बालकों की समस्या के केवल इस तरह का श्रम करना नहीं है वरन् उनकी शिक्षा तथा आहार से भी जुड़ी हैं। हमारे पुराने संस्कारों में बच्चे के लिये मां का दूध सर्वोपरि माना जाता है पर अब डिब्बे का दूध उसकी जगह ले रहा है। नाश्ते में बड़ी कंपनियों के उत्पाद की परंपरा बन गयी है जिनमें अभक्ष्य पदार्थ शामिल होने का संदेह है। देखा जाये तो बड़े उत्पाद संगठनों के बढ़ते प्रभाव के चलते अब स्त्रियों और बालकों की शिक्षा तथा आहार के लिये जाग्रति का काम भी एक महान सेवा का काम बन गया है पर क्या नोबल देने वाले कभी ऐसे व्यक्ति को सम्मानित करेंगे? यकीनन नहीं! क्योंकि पश्चिम की कथित सामाजिक संस्थायें कभी भी बड़े उत्पाद संगठनों की अपेक्षा नहीं कर सकती। आप देखिये कोई भी संगठन नारियों में घरेलू कार्य का प्रचार करने का जिम्मा नहीं लेता। इसका कारण यह है कि वह चाहते हैं कि नारियां बाहर काम कर कमायें और बाहर होटलों में जाकर भोजन करें या फिर बड़ी कंपनियों के दो मिनट वाले भोजन का सेवन करे। यही स्थिति बालश्रम की है।  दरअसल विदेशी चंदे से चलने वाले संगठन बालश्रम का विरोध मानवीय पक्ष से अधिक इस आशय से करते हैं वह काम न करें और भारत के देश में पैदा वस्तुओं का उत्पादन गिरे और सेवायें कमजोर हों। देशी उत्पादन तथा सेवाओं में महिलाओं तथा बालकों के श्रम का बहुत बड़ा योगदान है। गृहस्थ महिलाओं का तो मामला ही अजीब है। अमेरिका की ही एक संस्था का कहना है कि भारतीय गृहस्थ महिलायें अपने पुरुषों से ज्यादा कमाती हैं। उनके घरेलू कार्य की उत्पादन कीमत अपने पुरुष सदस्य की बाहर कमाई गयी रकम से अधिक होती है। इसलिये हम किसी गृहस्थ महिला को अनुत्पादक सदस्य नहीं मान सकते।
     अभी हाल ही में एक बड़ी उत्पाद कंपनी के भोज्य पदार्थ पर विवाद हुआ तब हमें पता चला कि वह तो एक बृहद समाज के उपभोग का भाग बन गया है। शायद ऐसी ही कपंनियों को विस्तारित रूप देने के लिये पूंजी तथा श्रम प्रदान करने के साथ ही उपभोक्ता प्रदान करने के लिये योजनाबद्ध ढंग से भारतीय समाज में जागरुकता के नाम पर ऐसे विषय लाये जाते हैं जो उस कर्मठता से अकर्मण्यता की तरफ ले जाते हैं।  ऐसे में आहार के विषय जाग्रति लाने का भी अभियान प्रारंभ करना चाहिये। हालांकि इस विषय पर पश्चिम या देश में किसी सम्मान की आशा करना गलत होगा।
-------------------------

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

5/31/15

दिल का रिमोट ध्यान-हिन्दी व्यंग्य कविता(DIL KA REMOT DHYAN-HIDN SATIRE POEM)


रिमोट से  टीवी पर
चैनल लोग यूं ही
बदलते जाते हैं।

दिल का हाल
बदलने के लिये
कोई रिमोट बना नहीं
यह सोच परेशान हुए जाते हैं।

कहें दीपक बापू कोई पूछे हमसे
आंखें बंद कर ध्यान से
कैसे दिल के चैनल बदले जाते हैं,
यह अलग बात है कि
बाहर कुछ दिखता नहीं
अंदर अहसास किये जाते हैं।
---------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

5/26/15

अस्पताल और महल-हिन्दी कविता(hospital and palace-poem,asapatal aur mahal-hindi poem)

जिनके पास
मतलबपरस्तों का
कोई दल नहीं है,
जिंदगी की जंग में
वह कभी सफल नहीं है।

जो कर रहे हैं
समाज कल्याण का सौदा
दाम का तय करते मसौदा
दुआयें उनके लिये फल नहीं है।

कहें दीपक बापू सुनते रहो
सफल लोगों का गाथायें
मौन रखो अपनी व्यथायें
अपनी दवा स्वयं ढूंढो
अस्पताल पंच सितारा
बाहर से निहारते रहें
दानदाताओं के महल नहीं हैं।
------------------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

5/20/15

पश्चिम की प्रशस्ति छोड़ें पूर्व की तरफ दौड़ें-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन(pashchim ki prashasti chhoden poorva ke taraf dauden-hindi satire thought article)

अब भारतीय प्रचार माध्यमों की नज़र पूर्व की तरफ गयी है वरना तो अभी तक वह पश्चिम की तरफ बैठकर वहां की सांस्कृतिक आराधना करते थे। इतना ही नहीं विकास का प्रारूप उनको यूरोपीय देशों से ही मिलता था। अब धीरे धीरे उनको बीजिंग और दक्षिण कोरिया का विकास नज़र आ रहा है। इन्हीं प्रचार माध्यमों के अनुसार आबादी पर कड़े  नियंत्रण की वजह से चीन में अब मजदूरों की कमी पड़ने वाली है और हमारे विद्वानों के अनुसार हमारे यहां से ही श्रम आधारित  आपूर्ति की संभावना हो सकती है। तय बात है कि मजदूरों के साथ लिपिक और रोकड़िया के पद भी भारतीय ही भरेंगे। वैसे सामाजिक विशेषज्ञ चीन की मुरझा चुकी पारंपरिक संस्था के कमजोर होने की बात भी कहते हैं। शायद यही कारण है कि वहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपतियों ने बौद्ध मंदिरों की यात्रा की तस्वीरें वहां के प्रचार माध्यमों इसलिये छपने दी ताकि वहां एक अध्यात्मिक वातावरण भी बने जो वामपंथ की वक्रदृष्टि लगभग समाप्त हो गया है। इस कार्य में भी उन्हें भारत की आवश्यकता पड़ी और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को साथ लेकर वहां गये या कहें उनके साथ गये। भले ही उनके मंदिर जाने के कदम को  मेहमानवाजी के सिद्धांत का हवाला दें पर इसके संभावित परिणाम अत्यंत दिलचस्प हो सकते हैं। हमारा मानना है कि चीन में संभवत पहली बार अपने शिखर पुरुषों के मंदिर जाने के चित्र सार्वजनिक रूप से पहली बार देखे गये होंगे।
यूरोप तथा अन्य पश्चिमी विकसित राष्ट्रों में एशियाई देशों से मानव श्रमिक जाते रहे हैं पर वहां अब मंदी का दौर चल रहा है। इसलिये भारत से विदेश जाना अब कठिन होता जा रहा है। जब विदेश जाने का दौर तेजी से चल रहा था तब भारत में अंग्रेजी पढ़ाने पर जोर दिया जाता रहा है। आमतौर से पूर्वी देश भाषा और धर्म को लेकर ज्यादा संवेदनशील हैं। इसलिये वहां अंग्रेजी भाषा और सभ्यता का प्रभाव नगण्य है।  ऐसे में अगर वहां भारत से लोग जाना है तो उन्हें चीनी भाषा सीखनी होगी। हमने चैनलों पर देखा था वहां कैमरा लिये चैनल वाले अंग्रेजी बोलने वालों को ढूंढ रहे थे पर निराश हुए। ऐसे में अंग्रेजीदां लोगों के लिये काम करना सहज नहीं होगा। सबसे बड़ी बात यह कि चीनी लोग अंग्रेजी को अधिक पसंद नहीं करते और हिन्दी के प्रति अगर उनका सद्भाव न भी हो तो भी दुर्भाव कतई नहीं हो सकता।

भारत में हिन्दी शब्दकोष में अंग्रेजी शब्द ठूंसकर उसे आधुनिक तथा वैश्वक भाषा बनाने का सपना देखने वालों के लिये अब यह समस्या आने वाली है कि उनकी इस कथित हिंग्लिश से चीन में गलत असर पड़ेगा। इस लेखक ने एक बार चीनी रेडियो पर हिन्दी सुनी थी। वह शुद्ध हिन्दी बोलते हैं। अब जब पूर्वी देशों की तरफ भविष्य में अच्छे संबंधों के लिये हमारा देश देख रहा है तब अंग्रेजी की बजाय चीनी या जापानी भाषायें ही हमारे लोगों का सहारा बन सकती हैं।
इसलिये अब नारा होना चाहिये ‘पश्चिमी जगत की प्रशस्ति छोड़े, पूर्व दिशा  की तरफ दौड़ें’। जहां तक हम जैसे जड़ प्रकृत्ति के लोगों की बात है उन्हें अपने सामने ऐसे परिवर्तन अध्यात्मिक रूप से बड़े मजेदार लगते हैं क्योंकि कहीं न कहीं इसमें ऐसे मानसिक तत्व होते हैं जिन पर शोध किया जा सकता है।
---------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

5/13/15

प्रचार मे तो भूकंप का विषय भी बिक सकता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(now arthquake a saleble item in media-A Hindi thought article)

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन और पाश्चात्य अर्थशास्त्र के अनुसार जब मनुष्य स्वयं जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं करता और प्रथ्वी पर उपभोग का बोझ बढ़ने लगता है तब वह स्वयं ही अपनी रक्षा का उपाय करती है।  भारतीय अध्यात्म दर्शन जहां संपूर्ण प्रकृति के समस्त विषयों पर सामग्री आत्मसात किये हुए हैं वहीं पाश्चात्य विचाराधारा के अनुसार दर्शन शास्त्र के अलावा अर्थशास्त्र में अन्य सभी शास्त्रो का अध्ययन किया जा सकता है। इस तरह वहां जीवन दर्शन को समाज से अलग रखकर विचार किया जाता है। इसका सीधा आशय यह है कि वहां भौतिकता तथा अध्यात्म के बीच तारतम्य स्थापित करने की बात सोची भी नहीं जाती।  यही कारण है कि प्राकृतिक प्रकोपों पर पश्चिमी तथा पूर्वी विचाराकों की राय बदल जाती है। बहरहाल इस समय नेपाल में भूकंप की वजह से वहां भारी तबाही हुई है। सारा विश्व वहां मदद के लिये जुटा हुआ है।
एक बात समझ में नहीं आ रही कि प्रचार माध्यम तथा विज्ञान विशारद भूकंप से सतर्कता रखने का जो प्रचार कर रहे हैं उससे लोगों में चेतना बढ़ रही है या भय अधिक पैदा हो रहा है। यह सही है कि भूकंप आने की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती पर आज के विज्ञान ने इतना तो पता ही कर लिया है कि भूकंप के केंद्र बिंदु कहां है? केंद्र बिंदुओं पर भूकंप आने पर वहां उसकी तीव्रता अधिक होने से भारी हानि होती है पर जैसे जैसे दूरी बढ़ती जाती है वैसे उसका पैमाना कम हो जाता है। इमारते हिलती हैं पर गिरती नहंी हैं। अलबत्ता पुराने जर्जर ढांचे कम तीव्रता पर भी ढह जाते हैं। हमें यह बात बहुत पहले से ही पता है कि हिमालयीन क्षेत्र में भूकंप के पंक्तिबद्ध केंद्रबिन्दू हैं। इसलिये उसकी सीमा से लगे भारतीय क्षेत्रों में यह भयानक त्रासदी की आशंका हमेशा बनी रहती है मगर शेष भारत में अभी ऐसी आशंकायें कम ही हैं।
आमतौर से भूंकप से जब इमारते हिलती हैं तो बाहर आ जाना चाहिये पर मुश्किल यह है कि भूकंप के झटके न करें तो कुछ भी न हो पर कर दें तो क्षण में ढांचा गिरा दें। अब वैज्ञानिक कहते रहें कि झटका लगते ही बाहर आ जाओ। फिर आजकल बड़ी बड़ी इमारतें इतनी बन गयी हैं कि उनमें  से निकलने ही में दस मिनट लग सकते हैं। एक आदमी ने हिलती इमारत से कूद कर अपना बचाव करते हुए जान दे दी।  दो लोगों भागमभाग में हृदय गति रुक जाने से मौत हो गयी।
स्थिति यह है कि हिमालयीन क्षेत्र में भूकंप आ रहे हैं पर दहशत पूरे देश में फैल रही है। ऐसा नहीं है कि पहले भूकंप नहीं आते थे पर लोग परवाह नहीं करते थे। झटके के बाद भी अपनी जगह पर डटे रहे थे। अब आधुनिक प्रचार माध्यमों ने भूकंप को विक्रय योग्य विषय बना लिया है जिससे सतर्कता की जगह भय का वातावरण बन रहा है। भूकंप से डरे सहमे लोगों का साक्षात्कार जब टीवी चैनलों पर आता है तो लगता है कि वह भूकंप के क्षणिक झटके से भयग्रस्त होकर इमारत से बाहर निकल आना जैसे वीरता का कार्य है।  वह प्राण जिनका जाना ईश्वर की तरह से अभी तय नहीं था वह उन्होंने स्वयं बचाये हैं। धन्य है भूकंप की महिमा मंडन तथा  प्रचार से लोगों में चेतना कम चिंता अधिक आ रही है।
-----------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

5/6/15

प्रातःकाल ही दिन भर की ऊर्जा का संग्रह करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(pratkal he din bhar ka sangrah karen-hindi thought article)


गरीबों की चिंता करना फैशन बन गया  है या उसे व्यक्त करना, यह कहना कठिन है मगर प्रचार माध्यमों से अपनी छवि बनानी है तो व्यक्त करना ही बहुत है। टीवी पर सब्जी महंगी होने पर आमजनों के साक्षात्कार दे रहे थे।  शहरों में मध्यम वर्ग भी सब्जी खरीदने के लिये मंडी जाता है फिर उसका पहनवा ही ऐसा होता है कि टीवी पर उसका चेहरा दिखाने के लिये सौंदर्य प्रसाधन तथा कार्यकर्ता की आवश्यकता नहीं होती।  बहरहाल मध्यमवर्गीय लोग टीवी के सामने साक्षात्कार देते हुए सब्जी के महंगे होने पर रुंआसा होते हुए ‘गरीब कैसे खा सकता है’, ‘गरीब कैसे खायेगा’ तथा ‘गरीब के लिये तो जीना कठिन है’, जैसे जुमले  भी सुना रहे थे’। आजादी की लड़ाई के दौरान गरीब से उद्धार भी एक नारा था। आजादी के बाद भी यह नारा चलता रहा और लगता है अब यह पूरे देश के खून में घुल गया है।
मध्यम वर्ग स्वयं कम संघर्ष नहीं करता पर उसे अपने गरीब होने का अहसास नहीं होता। हमारा मानना है कि नये आर्थिक परिवेश में अनेक मध्यम वर्गीय परिवार गरीब की श्रेणी में आ गये हैं पर मानते नहीं है। वह निरंतर अमीरों के कार्यकलापों से होड़ करने के लिये कर्जे लेते हैं और अंततः हार जाते हैं।  बहरहाल यह गर्मी का दौर अक्टूबर तक चलना है। सब्जियां महंगी होते हुए लापता होने की स्थिति में आ सकती हैं-यहां तक कि जेब में पैसा हो और बाज़ार में उनका अभाव इतना हो कि देखना भी कठिन हो जाये। यह अलग बात है कि हमारी धरती उपजाऊ है-विश्व में भूमि का जलस्तर की दृष्टि भारत का स्थान बहुत अच्छा है-इस कारण पूर्णतः कभी अकाल नहीं होता। दोपहर की गर्मी जरूर डरावनी होती है पर प्रातःकाल जल्दी उठकर सैर सपाटा या योग साधना की जाये तो फिर दिन भर के लिये देह में ऊर्जा एकत्रित की जा सकती है। कहा जाता है कि किसी कार्य की शुरुआत अच्छी हो तो अंत भी अच्छा ही होता है।
अगर गर्मी में सुबह की प्रातःबेला में शीतल हवा का स्पर्श हो जाये तो फिर दिन में गर्मी यह सोचकर झेली जा सकती है कि जब वह नहीं रही तो यह भी नहीं रहेगी।  जब तक जिंदगी है संघर्ष करना ही है।  चिंता तो चिता की मनुष्य के लिये चिता समान हैं और चिंत्तन उस चेतना का जन्मदाता है जो हर प्रकार की स्थिति के लिये तैयार करती है। इसलिये कम से कम सुबह तो मन, वाणी और इंद्रियों को मौन रखकर अपनी अध्यात्मिक शक्ति बढ़ानी चाहिये न कि नींद से उठते ही जीवन के विषयों का स्मरण किया जाये जो वैसे ही सारे दिन परेशान करने वाले होते हैं। जय श्री कृष्ण!
---------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

5/1/15

विज्ञापन विच भूकंप समाचार-लघु हास्य व्यंग्य रचना(advertisment withtin earthquacke news on tv chainal)


प्रचार प्रबंधक देर रात घर आया। अगले दिन सुबह देर तक सोता रहा। पत्नी ने बहुत आवाज दी पर वह उठ नहीं रहा था। घर में काम करने वाली बाई ने स्वामिनी से कहा-‘‘साहब के पलंग के पास जोर से स्टील की कटोरी पटक दो। उसकी आवाज से उठ जायेंगे।’
स्वामिनी ने पूछा-‘‘ऐसा क्यों?
बाई ने कहा-‘‘आपकी आवाज तो रोज ही सुनते हैं पर बाकी आवाजों की आदत नहीं है। स्टील की कटोरी की आवाज अलग होगी।  साहब के दिमाग में हमेशा ही अपने प्रचार उपक्रम के लिये कुछ अलग करने का विचार रहता है।  इसलिये उसकी आवाज की धमक उनके दिमाग को उत्तेजित कर सकती है।’’
गृहस्वामिनी ने उसकी बात मान ली और स्टील की कटोरी उसके पलंग के पास जाकर दे मारी।  उसकी आवाज से प्रचार प्रबंध जाग गये और तत्काल पलंग से उतरकर खड़े हो गये। अपनी पत्नी से बोले-भागवान, मेरा मोबाइल ले आओ। मेें अपने कार्यालय में प्रातःकालीन संपादक से बात कर उसे सचेत करना चाहता हूं कि फिर भूकंप आ गया है।  वह अपने कर्तव्य स्थान पर सजग होकर भूकंप भूकंप करता रहे और बीच में ब्रेक लेकर विज्ञापन चलवाये।’
पत्नी ने कहा-‘‘मगर भूकंप कहां आया है?’’
प्रचार प्रबंधक ने कहा-‘‘लगता है तुम बहरी हो गयी हो। मैं आवाज सुंनकर नींद से खड़ा हो गया और तुम जागते हुए भी सो रही हो।’
पत्नी ने कहा-‘‘पर यह तो तुम्हें नींद से जगाने के लिये कटोरी ज़मीन पर फैंकी थी। यह आईडिया मुझे इस बाई ने दिया था।’’
प्रचार प्रबंधक नाराज हो गया और बोला-‘‘तुमने मेरे दिमाग का कचड़ा कर दिया। मैं कितना खुश हो गया था कि आज विज्ञापन का समय पास करने के लिये हो जायेगा पर तुमने हवा निकाल दी।’’
ऐसा कहकर वह फिर सो गये। गृहस्वामिनी ने काम वाली बाई से कहा-‘‘अब क्या करें?’’
काम वाली बाई न कहा-‘‘अगला भूकंप करने का इंतजार!
-----------------------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

4/26/15

प्रचार में पैसे की चमक-हिन्दी कविता(prachar mein paise ki chamak-hindi poem)

चेहरे पर सौंदर्य प्रसाधन की चमक
प्रचार में पैसे की धमक
छवि तो बन ही जाती है।

छू लिये जिन्होंने शिखर
कितने भी विनम्र हो
अपनों से ठन ही जाती है।

कहें दीपक बापू मित्रता के अर्थ
बहुत छोटे समझ लिये ज़माने ने
रहते साथ बरसों लोग
फिर भी स्वार्थ निकलते ही
सभी की भौहें तन ही जाती हैं।
------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

4/16/15

कश्मीर के अलगाववादियों के साथ उपेक्षासन के हथियार से निपटें-हिन्दी लेख(kashmir ka alagavvadiyon sa satha upekshasan ke hathiyar se nipten-hindi article)

भारतीय प्रचार माध्यमों को बिना मांगे यह हमारी तरफ से सलाह है कि वह कश्मीर के कतिपय अलगाववादियों की क्रियाओं का प्रचार कर उन्हें खलनायक की भूमिका के साथ प्रसिद्ध न बनायें। जिस तरह फिल्मों में खलपात्र का अभिनय  करने पर भी अभिनेता का नाम होता ही उसी तरह कतिपय अलगाववादी भी संभवत प्रचार के लिये ऐसे काम करते हैं कि भारतीय प्रचार माध्यमों में उनको जगह मिले और भारतीय जनमानस हताश हो।  सच बात तो यह है कि भारत का आम दर्शक इस बात से नहीं नाराज कि कश्मीर के अलगाववादी देशद्रोह के काम कर रहे हैं बल्कि उसे इस बात पर गुस्सा आता है कि भारतीय प्रचार माध्यम अपना विज्ञापन समय पास करने के लिये उनकी क्रियाओं का प्रचार करते हैं।  एक अध्यात्मिक ज्ञान साधक के नाते अपने अभ्यास से हमने यह सीखा है कि किसी विषय पर उपेक्षासन करना बेहतर रहता है।  कई झगड़ों में मौन हथियार का काम करता है।  भारतीय प्रचार माध्यमों में सक्रिय बौद्धिक पता क्यों इन खलनायकों को प्रचार देकर भारतीय जनमानस को उद्वेलित करते हैं।
अगर इस तरह कश्मीर के अलगाववादियों को भारतीय प्रचार माध्यम प्रचार देते रहे तो वह समाचारों के प्रति निष्पक्षता की वजह से नहीं वरन् देशभक्ति के भाव निरपेक्ष भाव रखने का संदेह भारतीय जनमानस कर सकता है।  हमारा मानना है कि उपेक्षासन के माध्यम से ही इन कथित सफेदपोश कायर योद्धाओं से निपटा जा सकता है। यह नुस्खा आजमा कर तो देखें।
--------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

4/4/15

सिगरेट के धूऐं से दूसरे का तो नुक्सान होता ही है-हिन्दी लेख(sigret's smoking dengarus for other-hindi article)

सिगरेट पीने से कैंसर होता है-यह स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि यह तर्क गलत है। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि सिगरेट पीने वालों को कुछ हो या नहीं पर वह अपने धूऐं से दूसरों में बीमारी जरूर पैदा करते हैं। सिगरेट प्रथा का समर्थन वाले अब स्वास्थ्य विशेषज्ञों के इस तर्क को चुनौती दे रहे हैं कि सिगरेट पीने वालों को कैंसर होता है।  हम उनकी बात मान लेते हैं पर अपने धूऐं से दूसरों को बीमारी देने के तर्क का क्या जवाब है? स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि सिगरेट पीने वाले अपना धुआं  मुंह से फूंककर दूर ढकेल देते हैं और वह पास में मौजूद लोगों के सांसों के साथ फेफड़ों में घुस जाता है। इतना ही नहीं सिगरेट पीने वाले अपने उस परिवार के लोगों के अप्रत्यक्ष शत्रु होते हैं जिनके हित चिंता वह करते हैं।
जब उद्यान में घूमते, सड़क पर चलते तथा रेल या बस में यात्रा करते हुए जब सिगरेट का धूंआ उस व्यक्ति की सांस में आता है जो इसे पीता ही नहीं है तब वह कितना दुःखी होता है, यह वही जानता है। हमें यह लगता है कि तंबाकू उत्पादों के प्रचारक यकीनन इतने उच्च स्तर पर सांस ले रहे हैं जहां वह सामान्य आदमी का दर्द अनुभव कर सकें तभी ऐसी बातें कर रहे हैं जिन पर आश्चर्य होता है। वैसे आजकल बने बनाये पाउच बाज़ार में बिकने से सिगरेट के धूऐं से कम ही सामना होता है पर उसके विक्रय पर जिस तरह प्रतिबंध लगाया जा रहा है उससे तो लगता है कि सिगरेट का प्रचलन अधिक मात्रा में लाने का कोई प्रयास हो रहा है।  शुद्ध सांस लेने के आदी अनेक लोग  तो उन पाउच वाले तंबाकु युक्त उत्पादको का व्यंग्यात्मक लहजे में  आभार भी व्यक्त करते हैं जिन्होंने सिगरेट का प्रचलन कम कर धूंऐ से बचाया है। इसका आशय यह कदापि नहीं है कि हम पाउच वाले तंबाकू उत्पादों के प्रयोग का समर्थन कर रहे हैं जो कभी कभी सिगरेट से ज्यादा घातक लगते हैं।  बहरहाल हम इस लेख के माध्यम से सिगरेट विरोधियों से यह आग्रह पहुंचा रहे हैं कि सिगरेट से कैंसर होने के तर्क पर ही न रहें वरन् उससे न पीने वालों को होने वाली की चर्चा कर मुखर हों।
----------------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

3/31/15

झूठ भी सच जैसा छपवाते-हिन्दी गज़ल(jhooth bhi sach jaisa chhapwate-hindi gazal)

सर्वशक्तिमान का नाम भक्तों मेंचलवाते।
गुरु माला अपनी तस्वीर पर डलवाते।

भूख और बेबसी मिटाने ढेर सारे निकले सेवक,
स्वामी की तरह अपना नाम प्रचार में छपवाते।

मिले जिनको बड़े पद, उनके रहे छोटे कद
अपनी लंबाई अपने ही आईने से नपवाते।

कहें दीपक बापू सपनों को लगा बाज़ार
सौदागर अपना झूठ भी सच जैसा बनवाते।
----------------------
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kurkeja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

विशिष्ट पत्रिकायें