समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label योग साधना. Show all posts
Showing posts with label योग साधना. Show all posts

8/30/09

जो कह न सके-आलेख (yogsadhna and shri gita-hindi article

उस पिकनिक हम सब आम लोग ही थे पर दूसरों से कुछ अलग! हम सभी नियमित योग साधना करने वाले लोग थे। योगी कहना कठिन है क्योंकि हम में से कोई गेहुंआ वस्त्रधारी नहीं था। इतना जरूर है कि सामान्य लोगों से अलग होने का अहसास इस तरह की पिकनिक में लगता है क्योंकि वहां केवल योग से संबंधित विषय पर ही आपस चर्चा होती है।

यह पिकनिक योग सीखने और सिखाने वाले शिक्षकों और साधकों को आपसी मेल मिलाप के लिये आयोजित की जाती है। कुछ अंतर इस पिकनिक अन्य के मुकाबले नजर आया। पैंतालीस पैंतालीस मिनट के तीन सत्रों की चर्चा के दौरान कवितायें, विचार, चुटकुले और योग संबंधी चर्चायें हुईं। दूसरा खाना लेट होने या उससे परेशान होने की बात लोगों में नहीं दिखाई दी। खाने खाते समय ऐसा नहीं लगा कि लोग उस पर टूट पड़े हों। यह सिद्ध लोगों की बैठक नहीं थी-क्योंकि इसमें नौकरी और व्यापार के साथ अन्य व्यवसाय करने वाले लोग शामिल थे। सबसे बड़ी बात यह है कि वहां कोई अपनी बीमारी की चर्चा कोई नहीं कर रहा था जो कि इसका प्रमाण था कि वहां योग साधक लोग ही आये थे।
इसके आयोजक वह लोग थे जो निष्काम भाव से न केवल योग शिविरों में जाकर सिखाते हैं बल्कि उसके प्रचार के लिये भी कार्य करते हैं। उनकी साधना का तेज उनकी बातों में देखा जा सकता है।
एक महिला ने ध्यान करवाया और उसने शरीर के सात चक्रों पर अपना प्रकाश डाला। उसकी बातें सुनकर तो ऐसा लगा कि लोग पता नहीं क्यों अपनी बीमारियों के लिये चिकित्सकों के यहां चक्कर लगाते हैं जबकि उसको सही करने के साधन ही अपने अंदर मौजूद हैं। एक महिला ने सूर्य नमस्कार पर प्रकाश डाला।

इस पिकनिक में एक ऐसी महिला भी दिखाई दी जिसे हम बहुत पहले जानते थे। वह बहुत मोटी थी। एक विवाह समारोह में वह मिली थी तो वह अन्य भद्र महिला से अपनी मधुमेह की बीमारी का जिक्र कर रही थी। अब उसे शायद पांच वर्ष बाद देखा होगा। वह हमें पहचान नहीं पायी पर हमें उसका चेहरा याद था। अब वह उतनी मोटी नहीं दिख रही थी न उसके चेहरे पर निराशा का भाव दिख रहा था जो शादी में देखा था। उम्रदराज हैं पर पहले के मुकाबले अधिक ढंग से मजबूत दिख रही थी। कहने का तात्पर्य यह है कि नियमित योगसाधना का लाभ उनके चेहरे पर दिखाई दे रहा था।
एक मित्र से चर्चा हुई। वह इस बात से निराशा थे कि वहां एक भी नवयुवक या नवयुवती नहीं दिखाई दे रही। उनका कहना था कि
1.आजकल के लड़के लड़कियां योग का महत्व नहीं समझते। अगर कहो तो कहेंगे कि जिम जायें या हैल्थ क्ल्ब में शामिल हों। मतलब वह पैसे खर्च करने की बात करेंगे।
2.उनको सुबह योग साधना के लिये बुलाना भी कठिन है क्योंकि वह शिक्षा के बोझ तले हैं। दिन में विद्यालय महाविद्यालय जाने के साथ उन पर चार चार जगह ट्यूशन जाने का भी बोझ है। बिचारे थक जाते हैं।’
जब वह अपनी बात कह चुके तब हमने उनसे कहा कि
1. ठीक है! यह जरूरी है क्या कि सभी योग शिविरों में सुबह आयें। लड़के लड़कियां तो वैसे भी हाथ पांव बहुत मारते हैं। इसलिये अगर वह योगसन और प्राणायम के लिये सुबह नहीं आते तो कोई बात नहीं। जब बाहर से घर वापस आते हैं तो उनसे भृकुटि पर नजर रखते हुए ध्यान रखने के लिये कहो। उस समय वह शरीर को ढीला छोड़ दे तो विद्यालय महाविद्यालय और ट्यूशन के दौरान जो शारीरिक मानसिक थकवाट दूर हो जायेगी। वह उठते बैठते और चलते फिरते तनाव में जीने के इस कदर आदी है कि उनको पता ही नहीं कि विश्राम क्या होता है? जब ध्यान से विश्राम अनुभव होगा तब उनको पता लगेगा कि योग साधना क्या चीज है और फिर वह योग शिविर में भी आयेंगे। योग साधना का चरम ध्यान ही है और जो इस विद्या में पारंगत हो जायेगा उसका तो कहना ही क्या?
2. उन्हें समझाओ कि जिम या हैल्थ क्लब दैहिक के लिये अस्थाई रूप से लाभ दायक हैं जबकि योगासन, प्राणायम और ध्यान से देह, मन और शरीर के विकार तो निकलते ही है बल्कि प्रभावपूर्ण वाणी और पवित्र व्यवहार से दूसरे पर भी प्रभाव पड़ता है और साथ ही चेहरे पर सुंदरता आती है जिसे आज की युवा पीढ़ी सबसे अधिक जरूरी मानती है।
एक महिला ने कविता गायी। वह न केवल योग शिक्षिका है बल्कि बरसों से निष्काम भाव से कार्य करते रहने के कारण सभी उसका सम्मान भी करते हैं। उसने देश भक्ति और नारी स्वाभिमान से पूर्ण अपनी कविता में एक जगह नारी के लिये सकारात्मक रूप से ‘रणचंडी’ शब्द का प्रयोग किया।
सब कुछ ठीक था पर उसकी कविता समाप्त होते ही एक पुरुष सज्जन ने कहा कि ‘रणचंडी बने पर ऐसी नहीं कि जैसे वह...............थी। कार्यक्रम का संचालन करने वाले ने कहा कि इस पर बहस होना चाहिये। उसने पुरुष सदस्य से कहा कि आप थोड़ा विस्तार से बात करें। उस पुरुष सदस्य से अपनी बात दोहराई और फिर दूसरी बात भी करने लगा।
तब संचालक ने उस महिला से कहा कि ‘आप भी कुछ कहिये। हम इस विषय पर चर्चा बढ़ाना चाहेंगे।’
उस महिला ने कहा कि‘यह जिस तरह बात कर रहे हैं। मेरी बात समझेंगे नहीं।’
यह पता नहीं कि वह महिला और पुरुष एक दूसरे को पहले से जानते थे पर ऐसा लगा कि हम ब्लाग और कमेंट के खेल में फंस रहे हैं। एक बार हमने सोचा कि उठकर उस महिला से अपनी बात कहें पर लगा कि कहीं अर्थ का अनर्थ न हो जाये। उस समय ब्लाग जगत की याद आ रही थी कि कमेंट दें कि नहीं। सबसे बड़ी बात यह थी कि वह महिला योग साधना विषयक ज्ञान में हमसे अधिक प्रवीण थी इस बात ने हमें चुप रहने को विवश किया। तमाम तरह की बातें हमने वहां सुनी और लगा कि संभव है कि कभी हमारे शिक्षक रहे सभी गुणीजन योग साधना में बहुत प्रवीण है पर वह ऐसे मार्ग पर खड़े हैं जहां से श्रीगीता का द्वार खुलता है। जब हम बोलने का मन बना रहे थे तब यह तय था कि हम श्रीगीता के संदेश के साथ ही अपनी बात कहते पर फिर खामोश रहे।
खाने के समय वह भद्र महिला हमारे से कुछ ही दूर बैठी थी। सोचा अब कहें पर फिर चुप रहे। हम कहना यही चाहते थे कि ‘आप कुशल योग शिक्षिका हैं और आपकी वाणी के साथ विचारों के तेज की अनुभूति तो कविता से हो गयी थी। मगर अब कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं चल रहा जिसमें रणचंडी या रणबांकुरे चाहिये बल्कि योग और योगिनियों की जरूरत है क्योंकि युद्ध कौशल और जीवन का तत्व ज्ञान यह दोनों ही गुण उसमें हो सकते हैं। इस समय देश मेें युद्ध नहीं बल्कि विवेक जगाने के लिये एक अभियान की आवश्यकता है जो काम उन जैसे लोग इतनी सहजता से कर सकते हैं कि हम जैसे आदमी को तो पसीना ही आ जाये। आप 1983 से योग साधना से जुड़ी हैं और इसका मतलब यह है कि आप में वह शक्ति है जो आम आदमी या स्त्री में नहीं हो सकती। मुख्य बात यह है कि हमें अपने विषय और लक्ष्य के स्वरूप को समझना होगा।’
इस बार नहीं कहा पर जल्दी उनसे कहीं न कहीं मुलाकात होने की संभावना है तब यह बात कहेंगे। बहरहाल हमें वहां एक बात लगी कि योग साधना, प्राणायम और ध्यान के बाद आदमी के लिये श्रीगीता का अध्ययन ही शेष रह जाता है जो किसी को पूर्ण योगी बनाता है और इसका मतलब सन्यासी होना कतई नहीं है।
.....................................
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

1/6/08

बाबा रामदेव को चुनौती देने से अच्छा है उनसे इलाज करवाएं

इंडियन मेडिकल एसोसियेशन I.M.A. ने योग गुरु रामदेव के इस बयान का विरोध किया है जिसमें उन्होने कहा था की डाक्टर लोगों की बीमारियों को बढाचढा का बताते हैं। ई।M।आ। ने बाबा को चुनौती भी दी है कि वह अस्पतालों में जाकर केंसर पीडितों का इलाज करके बताएं।

यहाँ पहले स्पष्ट कर दूं कि मैं प्रतिदिन योग साधना करता हूँ पर बाबा रामदेव का मैं शिष्य नहीं हूँ पर वह जिस तरह लोगों में योग साधना और अन्य विषयों पर चेनता जागृत कर कर रहे हैं उसका समर्थक हूँ और कुछ ऐसे विषय भी हैं जिनसे मेरी सहमति नहीं होती पर इसके बावजूद मानता हूँ कि वह इस भारतीय समाज के लिए जो कर रहे हैं वह बहुत आवश्यक है। इसलिए जब मैंने I.M.A.आ।द्वारा उनकी आलोचना पढी तो मुझे लगा कि शायद वह उनकी bat समझ नहीं पाए। बाबा ने जो कहा है वही आम लोग भी कहते हैं और उन्होने तो केवल दोहराया भर है।

ऐसा नहीं है कि पहले लोग बीमार नहीं पड़ते थे पर अपने गली मोहल्लों में ही इलाज कराकर सही होते और आज भी लोग उनके पास जाते हैं। वजह यह है कि छोटी-मोटी बीमारी वही ठीक हो जाती है। अगर अधिक पढे-लिखे डाक्टर होते हैं तो तमाम तरह के टेस्ट कराने में लोगों का समय और पैसे बर्बाद कर देते हैं। हर बार बीमारी बड़ी होने का अंदेशा डाल देते हैं और आदमी उनके पास जाने से घबडाता है। उच्च रक्तचाप और मधुमेह तो वैसे भी दिमागी तनाव से होते हैं और अगर किसी को अपनी इन बीमारियों के बारे में पता चले तो वैसे ही उसका मनोबल गिर जाता है। इधर डाक्टर दवाएं लिखते जाते और कहते भी जाते-''आप चिंता मत करो'।

मधुमेह के मरीज जो मरीज खाने के पहले और बाद गोली लेने के चिंता करते हैं और चिंता तो वैसे भी शरीर की दुश्मन मानी जाती है-ऐसे में यह समझ में नहीं आता कि गोली क्या काम करेगी। चिकित्सा विज्ञान कहता है कि हमारा शरीर बहुत लोचदार है और कई तरह के समायोजन स्वयं ही करता है अगर गोली लेने के बाद किसी को खाना पचा तो वह गोली लेने के कारण पचा या 'अब खाना पच जायेगा' इस चिता से मुक्त होने के कारण पचा कोई नहीं बता सकता।

यह सब दिमागी खेल है यह तो सभी मानते हैं। फिर I.M.A. के पास इस बात की क्या गारंटी है कि देश के सभी डाक्टर दूध के धुले हैं और अपने व्यवसाय के लिए बीमारी को बढाचढा कर नही बताते। इसलिए उन्हें बाबा रामदेव की आलोचना से पहले देश में जो डाक्टरों के बारे में धारणा व्याप्त है उस पर विचार करना चाहिए।
बाबा रामदेव को कैसर अस्पतालों में जाकर मरीजो को इलाज करने की चुनौती देने से पहले तो उनको इस बात का जवाब देना चाहिए कि क्या वह अपने अस्पतालों में आये मरीजों के अलावा कहीं किसी का इलाज करने जाते हैं?क्या उनको जब पता लगता है कि दूर-दराज के गावों में कोई कैसर का मरीज है तो वहाँ जाते हैं? वैसे भी जिसको डाक्टरों ने कैंसर बता दिया तो उसका मनोबल तो वैसे ही टूट जाता है और बिना मनोबल के योग साधना शुरू कोई नहीं कर सकता। अगर वह बाबा को यह कहकर चुनौती देते हैं कि 'वह तो योगी हैं और उन्हें जाना चाहिए' तो मैं उनको बता तूं जिस भारतीय दर्शन की ईजाद योग है वह यह भी कहता है कि अगर 'कमल जल से दूर है तो सूर्य भी उसको जीवन प्रदान नहीं कर सकता'। आदमी के जीवन के लिए यह मनोबल भी जल की तरह है और बाबा को चुनौती देने वाले अपने यहाँ से ही ऐसे मरीज जिनके बारे में डाक्टरों को पता लगता है कि उसे कैंसर है तो उसे बिना बताये ही बाबा रामदेव के शिविर में ले जाएं और अपनी दवाईयां देकर वहाँ योगासन के साथ उसका इलाज करें तब उनकी विश्वसनीयता बढेगी-जैसा कि खुद I.M.A.ने कहा भी है कि वह योग के प्रभाव को स्वीकार करती हैं।

12/12/07

जो ब्लोगर थक रहें हों वह योग साधना शुरू करें

अगर विश्व के वर्तमान हालातों पर दृष्टि डालें तो देखेंगे कई मामलों के हल शांति से हो सकते हैं और लोग आपस में सदभाव के साथ रह सकते हैं पर ऐसा हो नहीं क्योंकि अंहकार के कारण लोग के नहीं हो पाते और उनकी फ़ुट का लाभ स्वार्थी तत्व उठाते हैं। कई बार लगता है कि इतनी अशांति बेवजह है और लोग उसमें लिप्त होकर सुख का अनुभव करते हैं। अगर लोगों की रूचि आध्यात्म में हो तो शायद इससे बचा जा सकता है यही कारण है भारतीय योग सब जगह लोकप्रिय हो रहा है।

विश्व में भारतीय योग विद्या के निरंतर लोकप्रिय होने का ऐक कारण यह भी है कि मानव जीवन धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होता जा रहा है और ऎसी वस्तुओं का उपयोग बढ़ता जा रहा है जो हमारे शरीर के लिए तकलीफ देह होतीं है। मैं यहाँ किसी अन्य की बात न करते हुए सीधे कंप्यूटर की बात करूंगा, क्योंकि इसकी वजह से जो भारी शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचती है उसकी चर्चा विशेषज्ञ अक्सर करते हैं। इधर मैं कुछ दिनों से ब्लोग लेखकों की निराशाजनक अभिव्यक्ति को भी देख रहा हू। इसलिये मैंने सोचा कि आज यह बात स्पष्ट कर दूं कि अच्छा या बुरा जैसे भी लिख पा रहा हू उसका कारण मेरे द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली योग साधना से मिलने वाली शारीरिक और मानसिक ऊर्जा ही है। हालांकि ब्लोग लेखन की वजह से मेरे कुछ आसन और अवधि कम जरूर हुई है पर ऐक बात साफ देखता हूँ कि इस कम अवधि में भी प्रतिदिन अपने उत्पन्न होने वाले विकारों को निकालने में सफल हो जाता हूँ। जब कंप्यूटर पर आता हूँ तो ऐसा लगता ही नहीं है कि कल मैंने इस पर कुछ काम किया था। ऐसा नहीं है कि मुझे कोई स्मृति दोष है जो भूल जाता हूँ ।
मेरा आशय यह है कि जो थकावट मुझे कल प्राप्त हुई थी उसे भूल चुका होता हूँ और आप में कई लोग होंगे जिन्हे याद होगा कि कल कितना थक गए होंगे, इसका मतलब है कि अब आपको योग साधना शुरू कर देना चाहिऐ। मनुष्य को प्रतिदिन मानसिक और शारीरिक रुप से ताजगी देने के लिए इसके अलावा और भी कोई उपाय है इस पर मैं यकीन नहीं करता। पहले मैं यहाँ स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई योग शिक्षक नहीं हूँ और यह योग साधना पिछले साढ़े चार वर्षों से कर रहा हूँ और मेरे गुरू ऐक सरकारी कर्मचारी हैं और बाकायदा पेंट शर्ट पहनकर घूमने वाले आदमी हैं। मतलब यह जरूरी नहीं है कि धार्मिक भगवा धारी संत ही योग साधना सिखाते हैं बल्कि कुछ लोग ऐसे हैं भी हैं जो सामान्य जीवन में रहते हुए भी योग साधना सिखा रहे हैं।

हमारे देश में इस समय बाबा रामदेव ने इसका बहुत प्रचार किया है और उनकी वजह से भारतीय योग को विश्व में बहुत प्रसिद्धि भी मिली है। उनके अलावा भी कई संत हैं जो इसमे अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं, इनमे श्री लाल जीं महाराज भी हैं। इसके अलावा भारतीय योग संस्थान भी इसमे बहुत सक्रिय है और मैंने उनके शिविर में ही योग साधना करना सीखा था। इसकी शाखाए देश में कई स्थानों पर लगतीं है और जो इस लेख को पढ़कर योग साधना करने के इच्छुक हौं वह अगर पता करेंगे तो उन्हें अपने आसपास इससे संबंधित शिविर जरूर मिल जायेंगे। हम टीवी पर संत बाबा रामदेव और श्री लाल महाराज को बहुत समय तक योग साधना कराते हुए देखते हैं तो यह वहम हो जाता है कि सारे आसन कर ही हम अपनी शारीरिक व्याधियों से छुटकारा पा सकते हैं, और दो घंटे का कार्यक्रम करना हमें मुशिकल लगता है। दूसरा यह भी लगता है कि योग केवल व्याधियों से छुटकारा पाने के लिए है और हम तो ठीकठाक हैं फिर क्यों करें। यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं कि ऐक तो हम सुबह ज्यादा नहीं तो पन्द्रह मिनट ही प्राणायाम करें तो भी हमें बहुत राहत मिलती है। दूसरा यह कि यह कि योग साधना से शरीर की व्याधिया दूर होती हैं यह ऐक छोटी बात है। वास्तविकता तो यह है जीवन में प्रसन्न रहने का इसके अलावा अन्य कोइ उपाय मैं तो नहीं देखता। यह तो जीवन जीने की कला है। इस ब्लोग पर मैं इसी विषय पर आगे लिखूंगा पर अभी यहाँ बताना जरूरी हैं योगासन से शरीर, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचारों के विकार दूर होते हैं।
सुबह उठकर खुली जगह पर कुछ बिछाकर उस पर बैठ जाना चाहिऐ और धीरे-धीरे पेट को पिचकना चाहिऐ और अनुलोम-विलोम प्राणायाम करना चाहिऐ। जिन लोगों को उच्च रक्तचाप या अन्य कोई बिमारी न हो तो इसी दौरान अन्दर और बाहर कुछ क्षणों के लिए सांस रोक सकते हैं तो यही नाडी शोधन प्राणायाम कहलाता है। जब हम थोडा पेट पिच्कयायेंगे तो ऐसा लगेगा कि हमारे शरीर में रक्तप्रवाह तेज हो रहा है और कुछ देर में आंखों को सुख की अनुभूति होने लगेगी । कंप्यूटर में काम करते हुए हमारे मस्तिष्क और आंखों बहुत कष्ट उठाना पडता है, और केवल निद्रा से उसे राहत नहीं मिल सकती और ना ही सुबह घूमने से कोइ अधिक लाभ हो पाता है। इसके अलावा कम करते हुए कुछ देर ध्यान लगाएं तो भी थकावट दूर हो जाएगी। इस ब्लोग पर मैं आगे भी लिखने का प्रयास करूंगा। इस समय तो बस यही कहना चाहूँगा कि अगर आप कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो खुश रहने के लिए योग साधना और ध्यान अवश्य करो -इससे ज्यादा और जल्द लाभ होगा। जो ब्लोगर अपने को थका हुआ अनुभव कर रहे है वह इसे अपनाएं-अधिक नहीं तो सुबह १५ मिनट से आधा घंटे अनुलोम-विलोम प्राणायाम अवश्य करें । इस पर एक लेख कल इसी ब्लोग पर लिखूंगा।
नोट-भारतीय योग संस्थान द्वारा प्रकशित पत्रिका 'योग मंजरी' के ताजा अंक में इस विषय पर मेरा एक लेख 'दीपक राज के नाम से प्रकाशित हुआ है जिन सज्जनों को उपलब्ध हो वह इसे अवश्य पढें।

9/12/07

स्मृतियां तो तनाव पैदा करती है

काल का विभाजन तीन प्रकारों -भूत, भविष्य, और वर्तमान-में किया गया है। इनमें भविष्य का हमें पता ही नहीं होता कि क्या होने वाला है, इसी तरह वर्तमान इतनी तेजी से भूतकाल में परिवर्तित हो रहा है कि हमें पता ही नहीं लगता कि प्रत्येक क्षण भूतकाल में चला जाता है। इसीलिये कभी-कभी सन्देह होता है कि वर्तमान काल को माना भी जाये कि नहीं। इस हालत में ले-देकर विचार करने के लिए हमारे पास भूतकाल ही रह जाता है।

अगर हम थोडा मनन करें तो लगेगा के हम तो केवल भूतकाल के बारे में ही अधिक सोचते हैं या फिर भविष्य की चिंताओं में ही खोये रहते हैं। इसलिये कहा भी जाता है कि मन के पक्षी के दो पंख है-भूत और भविष्य जिसके सहारे वह उड़ता है। अगर उसके यह दो पंख काट दो तो वह उड़ना बंद कर देगा और मनुष्य कालातीत स्थिति में पहुच जायेगा। यह कालातीत स्थिति ही स्वरूप स्थिति (आत्म साक्षात्कार ) की स्थिति है।

अगर थोडा विचार किया जाये कि किस प्रकार भूतकाल की स्मृतियों से अपने को मुक्त करें? हम भूतकाल की अपने लिए प्रिय और सुखद स्मृतियों को सदैव याद रखना चाहते और जो दु:खद स्मृतियां हैं उन्हें भूलना चाहते हैं, यह संभव नहीं है। जिस तरह हम इन्टरनेट पर कोई एक शब्द टाईप का रख दें तो उससे संबधित सारी वेब साईट आ जाती है और उनमें कई सारी हमारे काम की नहीं होती और हम उन्हें अनदेखा करने का प्रयास करते हैं। मस्तिष्क भी एक तरह से प्राकृतिक कंप्यूटर है यह हम सब जानते हैं। जब हम उसमें अपने अन्दर मौजूद स्मृतियों का बटन दबाते हैं तो वह भी स्मृतियां भी चली आती हैं जो हमें अच्छी नहीं लगती और जिनसे हमारे दिमाग में तनाव उत्पन्न होता है। इसलिये हमें सब स्मृतियों को भूलना होगा-अच्छी और बुरी दोनों । महर्षि अष्टावक्र कहते हैं -'सर्वविस्मरणादृते' सब कुछ भूलना होगा। आचार्य रजनीश स्मृति को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु मानते थे।

स्मृति हमेशा भूतकाल की होती है। जो बातें बीत चुकी हैं, जो विषय समाप्त हो चुके हैं, जो लोग हमारे सामने से जा चुके हैं या जिनका निधन हो गया है उन्हीं की स्मृति हमारे मानस पटल पर होती है। यह स्मृति हमेशा ही हमें परेशान करती है। भूतकाल के क्षणों में अर्थात मरे क्षणों में ही अपना समय बिताना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। हमारे प्रत्येक कार्य में ऊर्जा का क्षरण होता है और भूतकाल के चिन्तन और मनन में हमारी ऊर्जा व्यर्थ ही जाती है। यदि हम इसी ऊर्जा का प्रयोग ध्यान में करें तो हमें बहुत लाभ हो सकता है। हमको मन को रोकने में, ध्यान करने में बहुत ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो भूतकाल के चिन्तन में व्यर्थ चली जाती है।

अब विचार इस बात का उठता है कि हम अपनी इन भूतकाल की स्मृतियों से कैसे मुक्ति पायें।इसका उपाय यह है कि जैसे-जैसे मन में ये स्मृतियां आयें उन्हें ध्यान से देखते रहें। केवल ध्यान दें और उनके अच्छे या बुरे होने का विचार ना करें। यह नित्य ध्यान से देखें कि ये तो बीती हुईं है अर्थात यह तो मरी हुईं है इनकी अब कोई दैहिक या भौतिक सत्ता नहीं। यह तभी संभव है जब आपका चित्त शांत हो और चित्त तभी शांत रह सकता है जब हम ध्यान करें। ऐसा करने पर ही वह कालातीत अवस्था ( आत्म साक्षात्कार) की स्थिति प्राप्त होगी। यह एक सर्वश्रेष्ठ उपाय है अगर किया जाये तो जीवन में प्रसन्नता का अनुभव किया जा सकता है।

9/3/07

कंप्यूटर चलाने वालो को योग जरूर करना चाहिए

विश्व में भारतीय योग विद्या के निरंतर लोकप्रिय होने का ऐक कारण यह भी है कि मानव जीवन धीरे-धीरे प्रकृति से दूर होता जा रहा है और ऎसी वस्तुओं का उपयोग बढ़ता जा रहा है जो हमारे शरीर के लिए तकलीफ देह होतीं है। मैं यहाँ किसी अन्य के बात ना करते हुए सीधे कंप्यूटर की बात करूंगा, क्योंकि इसकी वजह से जो भारी शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचती है उसकी चर्चा विशेषज्ञ अक्सर करते हैं। इधर मैं कुछ दिनों से ब्लोग लेखकों की निराशाजनक अभिव्यक्ति को भी देख रहा हू। इसलिये मैंने सोचा कि आज यह बात स्पष्ट कर दूं कि मैं अच्छा या बुरा जैसे भी लिख पा रहा हू उसका कारण मेरे द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली योग साधना से मिलने वाली शारीरिक और मानसिक ऊर्जा ही है। हालांकि ब्लोग लेखन की वजह से मेरे कुछ आसन और अवधि कम जरूर हुई है पर ऐक बात साफ देखता हूँ कि इस कम अवधि में भी प्रतिदिन अपने उत्पन्न होने वाले विकारों को निकालने में सफल हो जाता हूँ। जब कंप्यूटर पर आता हूँ तो ऐसा लगता ही नहीं है कि कल मैंने इस पर कुछ काम किया था। ऐसा नहीं है कि मुझे कोई स्मृति दोष है जो भूल जाता हूँ । मेरा आशय यह है कि जो थकावट मुझे कल प्राप्त हुई थी उसे भूल चुका होता हूँ और आप में कई लोग होंगे जिन्हे याद होगा कि कल कितना थक गए होंगे, इसका मतलब है कि अब आपको योग साधना शुरू कर देना चाहिऐ। मनुष्य को प्रतिदिन मानसिक और शारीरिक रुप से ताजगी देने के लिए इसके अलावा और भी कोई उपाय है इस पर मैं यकीन नहीं करता।
पहले मैं यहाँ स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई योग शिक्षक नहीं हूँ और मैं यह योग साधना पिछले साढ़े चार वर्षों से कर रहा हूँ और मेरे गुरू ऐक सरकारी कर्मचारी हैं और बाकायदा पेंट शर्ट पहनकर घूमने वाले आदमी हैं। मतलब यह जरूरी नहीं है कि धार्मिक भगवा धारी संत ही योग साधना सिखाते हैं बल्कि कुछ लोग ऐसे हैं भी हैं जो सामान्य जीवन में रहते हुए भी योग साधना सीखा रहे हैं।
हमारे देश में इस समय बाबा रामदेव ने इसका बहुत प्रचार किया है और उनकी वजह से भारतीय योग को विश्व में बहुत प्रसिद्धि भी मिली है। उनके अलावा भी कई संत हैं जो इसमे अपनी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं, इनमे श्री लाल जीं महाराज भी हैं।
इसके अलावा भारतीय योग संस्थान भी इसमे बहुत सक्रिय है और मैंने उनके शिविर में ही योग साधना करना सीखा था। इसकी शाखाए देश में कई स्थानों पर लगतीं है और जो इस लेख को पढ़कर योग साधना करने के इच्छुक हौं वह अगर पता करेंगे तो उन्हें अपने आसपास इससे संबंधित शिविर जरूर मिल जायेंगे।
हम टीवी पर संत बाबा रामदेव और श्री लाल महाराज को बहुत समय तक योग साधना कराते हुए देखते हैं तो यह वहम हो जाता है कि सारे आसन कर ही हम अपनी शारीरिक व्याधियों से छुटकारा पा सकते हैं, और दो घंटे का कार्यक्रम करना हमें मुशिकल लगता है। दूसरा यह भी लगता है कि योग केवल व्याधियों से छुटकारा पाने के लिए है और हम तो ठीकठाक हैं फिर क्यों करें। यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं कि ऐक तो हम सुबह ज्यादा नहीं तो पन्द्रह मिनट ही प्राणायाम करें तो भी हमें बहुत राहत मिलती है। दूसरा यह कि यह कि योग साधना से शरीर की व्याधिया दूर होती हैं यह ऐक छोटी बात है वास्तविकता तो यह है है जीवन में प्रसन्न रहने का इसके अलावा अन्य कोइ उपाय मैं तो नहीं देखता। यह तो जीवन जीने की कला है।
इस ब्लोग पर मैं इसी विषय पर आगे लिखूंगा पर अभी यहाँ बताना जरूरी हैं योगासन से शरीर, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचारों के विकार दूर होते हैं। हमें सुबह उठकर खुली जगह पर कुछ बिछाकर उस पर बैठ जाना चाहिऐ और धीरे-धीरे पेट को पिचकना चाहिऐ और अनुलोम-विलोम प्राणायाम करना चाहिऐ। जिन लोगों को उच्च रक्तचाप या अन्य कोई बिमारी न हो तो इसी दौरान अन्दर और बाहर कुछ क्षणों के लिए सांस रोक सकते हैं तो यही नादी शोधन प्राणायाम कहलायेगा। जब हम थोडा पेट पिच्काएंगे तो ऐसा लगेगा कि हमारे शरीर में रक्तप्रवाह तेज हो रहा है और कुछ देर में आंखों को सुख की अनुभूति होने लगेगी । कंप्यूटर में काम करते हुए
हमारे मस्तिष्क और आंखों बहुत कष्ट उठाना पडता है, और केवल निद्रा से उसे राहत नहीं मिल सकती और ना ही सुबह घूमने से कोइ अधिक लाभ हो पाता है। इसके अलावा कम करते हुए कुछ देर ध्यान लगाएं तो भी थकावट दूर हो जाएगी। इस ब्लोग पर मैं आगे भी लिखने का प्रयास करूंगा। इस समय तो बस यही कहना चाहूँगा कि अगर आप कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं तो खुश रहने के लिए योग साधना और ध्यान अवश्य करो -इससे ज्यादा और जल्द लाभ होगा।

4/29/07

जीवन को प्रसन्नता से जीने की कला है योग साधना

जब हमें यह लगे कि हम किसी विषय में पारंगत हो गये हैं तब यह समझना चाहिए कि हम पर अहंकार का हमला हो गया है जो कि मनुष्य का सबसे बुरा गुण है। इस दुनियां में कोई भी किसी विषय में सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। जिस तरह परमात्मा का विस्तार अनंत है उसी तरह माया का विस्तार भी अनंत है। हाँ परमात्मा की अगर सहजता से भक्ती की जाये और अपना समय प्रतिदिन नियमितता से योगासन, प्राणायाम, ध्यान और मंत्रोच्चार कर अपने शरीर, मन और विचारों के विकार निकाले जाएँ तो हम उसके दर्शन प्रतिदिन अपने मन में कर सकते हैं और उसका आनंद भी उठा सकते हैं। परमात्मा का विस्तार अनंत है पर उसे जानने के लिया ज्ञान- जिसे आध्यात्म के नाम से जाना जाता है-एकदम सूक्ष्म है, उसके लिए कोई बहुत बड़ी किताबें खरीद कर पढने की जरूरत नहीं है, पर हम विषयों का ज्ञान-जिसे माया कहा जाता है -उसका विस्तार बहुत हैं । जब हम कहते हैं की अमुक आदमी काबिल है तो उसका आशय किसी विषय में उसे बहुत ज्ञान होने से है। परमात्मा का एक ही रुप है माया के रुप अनेक हैं इसीलिये हमें वह भरमा सकती है और हम अपने अहंकार में उसका आसान शिकार हो जाते हैं। विषयों के ज्ञान में कभी भी अपने सम्पूर्ण होने का दावा नहीं करना चाहिए, क्योंकि जिस तरह माया के अपने रुप बदलते है वैसे ही उसके विषय भी । आपने देखा होगा कि हम अनेक प्रकार के डाक्टर देखते हैं -हड्डी, ह्रदय,दिमाग,कान,नाक और आंख आदि के अलग -अलग डाक्टर होते है। उनमें भी कुछ डाक्टर ऐसे होते हैं जो ज्यादा सफल माने जाते हैं और कुछ सामान्य। जो ज्यादा सफल होते हैं एक दिन वह भी पुराने होकर रह जाते है और उनकी जगह नये युवा डाक्टर लेते हैं- उनके बारे में कहा जाता है उन्होने नवीन ज्ञान प्राप्त किया है और अच्छा इलाज करते हैं। यही स्थिति इंजीनियर के साथ होती है, उनमें भी कयी तरह के होते हैं। बिजली, कंप्यूटर , मकान, और तमाम तरह के विषयों पर पारंगत लोग उससे संबंधित व्यवसाय ही अपनाते हैं । कंप्यूटर में भी सॉफ्ट वेयर और हार्ड वेयर के इंजीनियर अलग-अलग होते हैं। मतलब यह है कि विषयों का विस्तार है और उनमें भी परिवर्तन आते रहते है, जबकी परमात्मा को जानने के लिए जो अध्यात्मिक ज्ञान है उसके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं आता, वह सूक्ष्म और स्थिर है। हम इस पर ज्यादा बहस करते हैं कि उसे जानने और पाने के लिए कौनसा रास्ता उपर्युक्त है, जबकि ऎसी बहस हमें फिर एक बार विषयों की ओर ले जाती है।
हमें तो परमात्मा को जानने और पाने के लिए ज्यादा प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। बस प्रात: उठकर योग्साध्ना, प्राणायाम, ध्यान और गायत्री मात्र का जाप करें , साथ ही यह भी अपने को यह अनुभव कराते जाये कि हमारे शरीर, मन और विचारों में जो विकार है वह निकल रहे हैं। ऐसा करने से अगले चौबीस घंटे शरीर, मन और विचारों में स्फूर्ति अनुभव करेंगे। याद रखिये योगासाधना केवल बीमारी दूर करने के लिए ही नहीं है जैसा कि प्रचारित हो रहा है , यह जीवन को प्रसन्नता से जीने की कला है। (शेष अगले अकों में)

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर

विशिष्ट पत्रिकायें