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7/27/10

ज़िदंगी के कांटे और गुलाब-हिन्दी शायरी (zindagi ke kaanti aur fool-hindi shayari)

जब तक कांटों के साथ था
गुलाब जिंदा रहा
अलग हुआ तो मुरझा गया,
वह चिराग क्या अपना दर्द बयान करे
जिसको जलाने वाला ही बुझा गया।
पल पल रंग बदलती इस जिंदगी में
कभी खुशनुमा पल तो
कभी हादसे भी पेश आते हैं,
उम्मीद में छा जाता ग़म का अंधेरा
जहां टूटे सपने चुभोते हैं नश्तर
वहां तिनके भी फरिश्ते बन जाते हैं,
अपनों ने बढ़ायी हैं जहां उलझने
वहां कोई गैर मसले सुलझा गया।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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5/26/10

महल और सिंहासन पर विराजमान लोग-हिन्दी शायरी (mahal aur sinhasan par virajman log)

अपनी खुशी पर हंसने की बजाय
दूसरे के सुख रोते
इसलिये इंसान कभी फरिश्ते नहीं होते।
मुखौटे लगा लेते हैं खूबसूरत लफ़्जों का
दरअसल काली नीयत लोग छिपा रहे होते।
दौलत के महल में बसने वाले
खुश दिखते हैं,

 मगर  गरीब की पल भर की खुशी पर वह भी रोते।
सोने के सिंहासन पर विराजमान
उसके छिन जाने के खौफ के साये में
जीते लोग
कभी किसी के वफादार नहीं होते।
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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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5/14/10

हाशिए के हीरो-हिन्दी शायरी (hashie ke heero-hindi shayri)

अनेक संस्थानों के छपे हुए पत्रों के
हाशिए पर उनका नाम भी नज़र आता है,
दाव पैंच में हैं वह माहिर,
नहीं करते अपनी चालाकी जाहिर,
कहीं न कहीं उनको पद मिल ही जाता है।
जनाब! हाशिए के हीरो बहुत अपने देश में
चंद कदम चलते हैं
तो अखबार में फोटो उनका छप जाता है।
यही वजह है कि
सभी चाहते हैं हाशिए पर चमकना
लक्ष्य के लिये संक्षिप्त मार्ग पकड़ना
जिनकी ख्वाहिश बड़ी है,
पर काम करने की इच्छा हाशिए पर खड़ी है
मेहनत करते हुए उनका सीना हांफ जाता है।
ज़माना भी चलता   टेढ़ी है चाल
चरित्र हो गया है बेहाल
इसलिये हाशिए का हीरो कोई भी बन जाता है।

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3/15/10

जिंदगी का हिसाब-हिन्दी शायरियां (zindgi ka hisab-hindi shayriyan)

अपने शब्दों से वह
हमारे दिल में कांटे चुभोते रहे,
हमने खामोशी अख्तियार कर ली
यह सोचकर कि समय और हालत
इंसान को बेवफा बना देते हैं।
जब होगी खरीदने की ताकत
हम भी खरीद लेंगे उनको
जैसे लोग वफा खरीद लेते हैं
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प्यार के कितने पैगाम उनको भेजे
पर जवाब कभी नहीं आया।
जो झांककर देखा उनकी जिंदगी में
अपने लिये कोई रिश्ता वहां नहीं पाया।
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अपने घर की तंगहाली
और दिल की बदहाली का
बयान किससे करें
सभी को परेशान हाल देखा है हमने।
तोला जो जिंदगी का हिसाब तराजू में
हमसे अधिक लोगों को घेरा था गम ने।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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1/17/10

तटस्थता-हिन्दी शायरी (Nutural coman men-hindi poem

आंगन में सांपों की

आपसी ज़ंग  देखकर

हम खामोश रहे।

हमें मालुम था कुछ देर बाद

दोनों ही थक कर चले जायेंगे

या आपस में लड़ते मुर्दे का रूप पायेंगे

अब समझ में आया कि

इतिहास की ज़ंगों में

आम इंसान तटस्थ क्यों रहे।

--------



एक मुकुट पहनेगा तभी

जब दूसरा सिंहासन से हटेगा।

इतिहास गवाह है कि

हुक्म करने की जंग में

जमाने का भला करने का दावा

हमेशा धोखा रहा है

आम इंसान के सामने खड़ा रहेगा

हमेशा तलवार का खौफ

लड़ा तो कोई ताज नहीं मिलेगा,

मरा तो कहीं नाम नहीं दिखेगा,

तटस्थ रहकर जान बचा ले आम इंसान

यही है बेहतर

जीत का फल

केवल इज्जतदारों में बंटेगा।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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1/8/10

लेखक कभी बिचारे नहीं होते-हिन्दी शायरी (lekhak kabhi bichare nahin hote-hindi shayri)

कागज को स्याही से रंगने वाले

शब्दों की मय पीने वाले

लेखक कभी बिचारे नहीं होते।

कलम को चलाकर  घिसें

या टंकण पटल पर उंगलियां नचायें,

पढ़ने वालों का अच्छे लगें या बुरे

पर लिखने वाले का दिल बहलायें

शब्द कभी बिना सहारे नहीं होते।

बहा रहे हैं पसीना,

चुन रहे हैं शब्दों का नगीना,

उनकी मेहनत को नकारा न समझो

सच्चे लेखक ही दुनियां को प्यार करते

भले ही खुद किसी को प्यारे नहीं होते।

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आंखें गढ़ाये

उंगलियों को नचाते हुए

शब्द रचने वाले लेखक पर

मत हंसो

क्योंकि जिंदगी को वही जी पाते हैं।

अकेले बैठे लिखते हुए

उस लेखक को तन्हा न समझो

अपनी कलम से

शब्दों को अपना साथी वह बनाते हैं।

तुम अपनी जुबां से

किसी के लिये बुरा बोलते हो,

हर बात में अपना मतलब तोलते हो,

सिक्कों में खुशी देखने वालों

शब्द रचयिता अपनी शायरियों में

अनमोल मजा पी जाते,

सभी करते हैं अपना वक्त खराब

पर लेखक ही सभी को नकारा  नजर आते,

बोलना आसान है

उससे ज्यादा आसान है चिल्लाना

यह तो सभी लोग करते

पर अपने शब्दों को तीर की तरह लेखक चलायें,

जरूरत हो तो  चिराग की तरह भी जलायें,

लोग करते हैं एक दूसरे पर जख्म

पर लेखक बांटते हमदर्दी

अपने घाव वह पी जाते हैं।

दूसरों को भले ही कुछ भी लगें

पर लेखक कभी खुद को बिचारा नहीं पाते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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8/27/09

गरम कुर्सी-हिंदी हास्य कविता (hot seat of sach ka samana-hindi hasya kavita)

इश्क परवान चढ़ जाये
माशुका बीवी बन साथ निभाये
इसलिये आशिक ने कमाने के लिये
सच की पहचान करने वाली मशीन की
दुकान लगाई
और यह खबर माशुका को सुनाई।
सुनकर वह हो गयी पसीना पसीना
पूछने पर बोली
‘’यह कैसी दुकान लगायी।
अरे, तुमने सुना नहीं
इसके चक्कर में अमेरिका में
कितने घर बरबाद हुए हैं
फिर अपने देश में भी हो चुकी
कई लोगों की जगहंसाई।
कोई और काम ढूंढो
कहीं काम नहीं चला तो तुम
कभी खुद गरम कुर्सी (हाट सीट) पर बैठोगे
कभी मुझसे बैठने को कहोगे
कहीं हो न जाये तुम्हारे और मेरे बीच लड़ाई।’’

सुनकर आशिक हंसा और बोला
‘‘अरे, यह बात नहीं है
यह एकदम नयी चीज है
अपने देश का आदमी बस
नयी चीज चाहता है
अपने पुराने ज्ञान से भागता है
अभी तो दुकान पर बोर्ड ही लगा है
तब ढेर सारे लोग तो आ रहे हैं
अपनों का सच जानने उनको ला रहे हैं
जानते हैं सब
सच कड़वा होता है
कभी कभी दुश्मनी का बीज भी बोता है
फिर भी अंधे होकर
फैशन की दौड़ में जा रहे हैं
किसी का घर बिगड़े हमें क्या
अपनी रोजी निकलनी चाहिये
जहां तक तुम्हारे और मेरे बैठने की बात है
भला कोई हलवाई अपनी मिठाई खाता है
जो हम गरम कुर्सी पर बैठेंगे
बहुत सोचकर समझकर ही मैंने यह योजना बनाई।"

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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

7/4/09

इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम-हिंदी शायरी (hindi shayri)

अपने पेट के लिये करते हो काम
लेते हो पूरा दाम।
अपने खून को पसीने की तरह
बहते क्यों कराहते हो
कोई आकर हमदर्दी दिखाये
क्यों चाहते हो
दौलत के पत्थरों से
दया की उम्मीद क्यों जगाते हो
ओ! मेहनतकशों को
इज्जत दिलाने की ख्वाहिश रखने वालों
बसते हैं जहां जज्बातफरोश
उस महफिल में उनको
चमकाने का झूठा दिलासा क्यों दिलाते हो
अपने लहू से सींचते हैं जो
अपने ही रोटियों का गुलशन
उनको इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम।
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