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6/19/11

धर्म उद्योग को पहचानना जरूरी-हिन्दी लेख (dharam udyog or religion industry ki pahachan jaroori-hindi article or lekh)

          टीवी और अखबारों के समाचारों के अनुसार एक स्वर्गीय संत के कमरे से 11.56 करोड़ की नकदी, 307 किलोग्राम चांदी, और 98 किलोग्राम सोना मिलने की बात कही गयी है। नकदी को गिनने के लिये तीन मशीने लाई गयीं। अपने चमत्कारों की वजह से अपने भक्त बनाने वाले उन संता का पूरा जीवन चरित्र विवादों से घिरा रहा था। उनकी अध्यात्मिक शक्ति का अनुमान तो हम कभी नहीं कर पाये पर उनकी आर्थिक शक्ति की चर्चा पूरे विश्व में रही ह यहै। यही कारण है कि उनकी संस्था को विदेशी प्रचार माध्यमों एक शक्तिशाली संस्था माना गया। वैसे कहा जाता है कि स्वर्गीय व्यक्ति की चर्चा में कभी उसकी बुराई नहीं करना चाहिए और हम करेंगे भी नहीं पर मुश्किल यह है कि निर्जीव सोना, चांदी और रुपये कुछ न कुछ बोल रहे हैं। यह संसार की माया विचित्र है। मजे की बात यह कि सत्य सांसें लेता है पर विस्तार नहीं लेता और माया सांस नहीं लेती पर विस्तार रूप लेती है। बंगला, गाड़ी, रुपया, चांदी, सोना, हीरा तथा जवाहरात कभी सांस नहीं लेते मगर हर इंसान इनकी वजह से ही सांस ले रहा है। सांसें नहीं लेने के बावजूद माया बोलती है, आदमी को बुलाती है। उसकी आवाज कोई नहीं सुन सकता क्योंकि उसका आकर्षण ऐसा ही है कि आदमी उसे देखते हुए उसके पीछे दौड़ता है।
           अक्सर हमने अपने लेखों में एक बात दोहराई है कि भारतीय मनीषियों ने सत्य का अन्वेषण किया है और इसलिये भारत देश विश्व में अध्यात्मिक गुरु माना जाता है। यह भी लिखा है कि भारतीय मनीषियों का यह सुविधा इसलिये मिली क्योंकि माया का सर्वाधिक प्रकोप भी यहीं रहा हे। जिस तरह कांटों में गुलाब और कीचड़ में कमल खिलता है लगभग वैसे ही अज्ञान के अंधेरे में ही कोई ज्ञान का दीपक जला सकता है। हम उन भारतीय मनीषियों के ऋणी हैं जिन्होंने सत्य की खोज कर हमारे सामने प्रस्तुत किया पर यह भी कहने का मन करता है कि कौनसे उन्होंने तीर मारे क्योंकि उनको अपने सत्य का प्रकाश फैलाने के लिये यहां अज्ञान का अंधेरा भी तो मिला। अगर हमारे यहां ज्ञान का सूरज आरंभ काल से ही चमकता रहता तो क्या कोई ऐसे छोटे दीपक जलाने की सोच सकता था? कदापि नहीं, क्योंकि तब हमारे मनीषी नहीं जान पाते त्याग क्या होता है क्योकि सभी त्यागी होते। ज्ञान क्या है? इसकी खोज कोई नहीं करता क्योंकि सभी ज्ञानी होते। हमारे देश में आम लोग माया के कुछ अधिक ही दीवाने रहे हैं और यह बात मनीषियों ने जानी होगी तभी तो वह सत्य की खोज कर सके।
         यह व्यंग्यात्मक बातें आजकल संतों की संपत्तियों के खुलासे होने के बाद मन में आ रही हैं। आज जड़ हो रहे समाज में इतनी विसंगतियां हैं कि लगता नहीं है कि कोई इस बात को समझ पायेगा कि हमारे मन, बुद्धि और अहंकार का वह चालाक व्यापारी लाभ उठा रहे हैं जिनको धार्मिक, जातीय, भाषा के आधार भावनाओं का दोहन करने की कला आती है। इनमें कोई गेरुए वस्त्र पहन लेता है तो कोई सफेद, पर उनके मन में लालच, लोभ और अज्ञान का विकट अंधेरा है। मजे की बात यह है कि कोई ज्ञानी स्वयं कहे कि मैं बहुत बड़ा ज्ञानी हूं तो लोग उससे पूछेंगे कि क्या तुम्हारे पास अमुक संत जितना पैसा है जो दावा कर रहे हो कि बडे़ ज्ञानी हो।
          आजकल देश के शिक्षण संस्थानों में अनेक छात्र छात्रायें पढ़ रहे हैं। उनका उद्देश्य केवल नौकरी पाना होता है। शायद ही कोई युवक युवती स्वयं उद्योगपति बनना चाहता है क्योंकि उनको पता है कि वहां उनके लिये कोई जगह नहीं है। व्यवसायी तो कोई बनना ही नहीं चाहता क्योंकि हमारे यहां उसको अब असम्मानीय माना जाने लगा है। वैसे भी व्यवसाय करना एक कठिन काम हो गया है पर इसका कारण यह है कि सरकार तथा समाज की प्रवृत्तियां इस तरह की है जिसमें व्यवसायी को दलाल मान लिया जाता है। अगर देखा जाये तो हम लड़के लड़कियों को विकास के नाम पर गुलामी की तरफ ढकेल रहे हैं। उससे भी अधिक चिंता की बात यह कि देश में नहीं तो विदेशों में जाने का मोह पैदा कर रहे हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह कि जहां वह हैं वहां उसके लिये जिंदा रहने का अवसर नहीं है। अगर है तो वह आवश्यकताओं की पूर्ति लायक नहीं है।
             इस संघर्ष के चलते भारतीय युवा जनमानस अपने अध्यात्मिक ज्ञान से दूर हो गया है और इसका लाभ उन कथित धार्मिक ठेकेदारों को मिल रहा है जिन्होंने ग्रंथों को रट लिया है। एक बात तय है कि भारतीय जनमानस का मन बिना अध्यात्मिक ज्ञान के बहुत गरीब होता है और अंततः वह उसकी तरफ आकर्षित होने लगता है तब यह तोते की तरह रटे रटाये ज्ञानी उसे अपने जाल में फंसा लेते हैं। फिर संधर्ष कठिन है तो नौकरी, बीमारी, और अन्य परेशानियों के हल के लिये चमत्कार होने का दावा करने का दावा कर यह लोग समाज के बौद्धिक रूप से कमजोर लोगों को भ्रम में डालते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि जहां कहीं उनके चेले और चेलियां मिलें तो अपने गुरु के सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करते हुए लड़ पड़ते हैं।
        अब तो यह स्थिति यह है कि अनेक धार्मिक संतों की संपत्ति देश के उद्योगपतियों से भी अधिक दिखती है। उनके आश्रम तथा संगठनों का काम कंपनी की तरह चलता दिखता है। जब देश के कुछ बड़े  उद्योगपति संतों के पास जाते हैं तो समझ में नहीं आता कि ‘धन का वास्तविक स्वामी’ कौन है? संत या सेठ! कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि धनपति अपनी कंपनियां इन्हीं संतों की आड़ में चलाकर छूट का लाभ ले रहे हैं। शक भी होता है। कोई भी सामान्य व्यवसायी उसी वस्तु के विनिमिय का कार्य करता है जिसमें वह प्रवीण हो मगर अपने देश के संतों ने तो पेन, दवाई, कैलेंडर,चाबी के गुच्छे, चटाई, तथा पत्रिका प्रकाशन के काम भी शुरु कर रखे हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि बरसों तक तपस्या का दावा करने वालों को इतना सारा अनुभव कैसे हो गया कि चाहे जो भी काम कर लेते हैं।
          निश्चित ही धर्म के नाम पर छूट का लाभ लिया जा रहा है। सभी धर्मों के ठेकेदार जिस तरह के कार्य कर रहे हैं उससे तो देखकर यही लगता है कि वह दोहरी भूमिका हैं। एक तरह वह अपनी पवित्र पुस्तकों के ज्ञान का दावा करते हुए सर्वज्ञानी बनने का दिखावा कर अपने समाज को काबू में रखते हैं दूसरी तरफ उसका लाभ वह धर्म के नाम पर छूट के लिये उठाते हैं। इन्हीं धार्मिक संतों के आश्रमों या दरबारों में मत्था टेकने कोई अभिनेता, अभिनेत्री और उद्योगपति परिवार समेत जाता है तो उसका समाचार सभी जगह आता है। अभी तक तो हम मानते थे कि बाज़ार और प्रचार के अलावा भ्रष्ट समाज सेवकों का समूह मिलकर पूरे विश्व में आम आदमी पर राज कर रहा है पर ऐसा लगता है कि यह धार्मिक ठेकेदार भी उनके साथ शामिल हैं। शायद सभी के बॉस भी हों क्योंकि सभी क्षेत्रों के खास लोग इनके पास जाते हैं। आम आदमी भी जाता है पर वह उनके लिये एक संख्या बढ़ाने वाला हथियार होता है जिसे दिखाकर वह अपने श्रेष्ठ होने का दावा करते हैं। आम आदमी की संख्या बहुत ज्यादा है इसलिये गरीबों के नाम पर कहीं भोजन तो कहीं स्वास्थ्य की सुविधा पर कुछ खर्च कर यह लोग अपनी देवता जैसी छवि भी बनाते हैं। अनेक ने शैक्षणिक संस्थान भी खोल लिये हैं। इस तरह यह धर्म उद्योग बन गया है जिसका किसी धर्म से केवल इतना ही नाता होता है कि उसका मुखिया उसकी पवित्र किताबों से ज्ञान पढ़कर सुनाता है या फिर किसी आदमी के स्वाभाविक रूप से कोई काम होने पर उसे अपना चमत्कार बताता है।
        धर्म शब्द इतना संवेदनशील है कि कोई इस धर्म उद्योग के रूप में पहचानने को तैयार नहीं है। अभी हाल ही में ब्रिटेन के एक विशेषज्ञ ने कहा था कि भारत में धार्मिक संगठन एकदम बाज़ार की तर्ज पर चलते हैं और अपने भक्त बनाये रखने के लिये वैसे ही साधन अपनाते हैं जैसे कि कोई कंपनी करती है। जब हम पूरी तरह से अंग्रेजों के मानसिक रूप से गुलाम हैं तो फिर क्यों नहीं इस धर्म उद्योग के अस्तित्व को स्वीकार करते?
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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11/17/10

अभिव्यक्ति की आज़ादी का व्यवसायिक प्रचार माध्यमों पर (बिग बॉस सीजन 4 तथा राखी का इंसाफ) नियंत्रण से संबंध नहीं-हिन्दी लेख (abhivyakti ki azadi aur bigg boss session 4 and rakhi ka insaf)

आखिर सरकार ने बिग बॉस तथा राखी का इंसाफ पर अपना चाबुक चला दिया। दोनों ही कार्यक्रम रात 11 बजे से सुबह पांच बजे तक ही प्रसारित करने का प्रतिबंध लगाकर सरकार ने यह तो साबित कर दिया कि वह अनियंत्रित हो रहे प्रचार माध्यमों पर कुछ नियंत्रण करना आवश्यक समझती है। इस पर बहस होगी। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला होने जैसे जुमले सामने आयेंगे। खासतौर से भौंदू समाज की पुरानी परंपराओं का हवाला देकर रूढ़िवादियों पर हमला किया जायेगा।
एक टीवी चैनल में इस बहस की शुरुआत हो चुकी है। जिसमें एक सभ्य शिक्षक ने कहा कि ‘सरकार ने सही काम किया।’
नियमन विरोधी ने कहा कि‘सरकार को बस यही नज़र आ रहा है। बाकी समस्यायें नहीं दिखती।’
विद्वान ने कहा कि ‘ सरकार का जनता के प्रति जवाबदेह होती है। आखिर दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र की सरकार है।
प्रतिवादी ने कहा कि ‘काहे की सरकार, बाकी जगह तो नहीं दिखती।’
विद्वान ने कहा कि-आप ऐसी बात न करें, अगर हमारे यहां सरकार न होती या जवाबदेही से भागती तो हमारा देश अफगानिस्तान जैसा होता।’
बहरहाल बहसें जारी रहेंगी। सरकार ने इन बिग बॉस-सीजन 4 और राखी का इंसाफ पर नियंत्रण नहीं बल्कि उसके समय का नियमन किया है। अच्छा किया या बुरा इसका फैसला हम जैसे मामूली लोग नहीं कर सकते क्योंकि इस देश में बहसों के लिये ढेर सारे प्रयोजित विद्वान है। अलबत्ता आज़ादी पर हमले वालों के लिये अपने पास ढेर सारे जवाब हैं।
सबसे बड़ी बात यह कि यह सभी कार्यक्रम अभिव्यक्ति का नहीं व्यवसाय का प्रतीक हैं। मनोरंजन कर कमाने के लिये बनाये जाते हैं न कि किसी भी कला या कौशल को अभिव्यक्त रूप देने के लिये इनको प्रायोजित किया जाता है। जब कोई व्यवसाय होता है तो राज्य का काम है कि वह उसकी अच्छाई और बुराई पर नज़र रखे। नियंत्रण या नियमन जो जरूरी समझे।
इन धारावाहिकों से समस्या यह थी कि यह उस मुख्य समय में चलाये जा रहे थे जब भारत का एक वर्ग कोई कार्यक्रम देखना चाहता है। ऐसे में रिमोट पर उंगली फिराते हुए यह कार्यक्रम उसके सामने आ ही जाते हैं और चाहे अनचाहे वह इनको देखने लगता है। टीवी चैनल मनोरंजन के नाम पर उसके सामने हिंसा परोसते हैं तो वह निराश भी होता है और उसका ध्यान फिर अन्य कार्यक्रमों पर नहीं जाता। प्रचार प्रबंधक इसका लाभ किस तरह उठाया जाता है यह राखी के इंसाफ में देखने को मिला। उसके कार्यक्रम में शामिल एक युवक अवसाद में मर गया। यह खबर सभी समाचार चैनलों पर थी। ऐसे में उस दिन यह कार्यक्रम प्रसारित करने वाला टीवी चैनल पूरे दिन राखी के इंसाफ का नया कार्यक्रम प्रसारित करता रहा ताकि समाचार चैनलों की चर्चा सुनने के बाद रिामोट पर उंगलियां नचाते हुए दर्शक उसकी पकड़ में आये। वरना क्या उसके पास दूसरे कार्यक्रम नहंी थे। सुबह, शाम और रात तक वही कार्यक्रम! यह व्यवसायिक बेईमानी का मामला है न कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का। बिग बॉस सीजन चार में फिक्सिंग की बात तो अब उसमें शामिल लोग भी कहने लगे हैं। मतलब एक तरफ आप दावा करे हैं कि यह वास्तविक प्रसारण है दूसरे उसमें पूरी तरह नाटकीयता है जिनकी पटकथा लिखी गयी है। यह झूठ व्यवसायिक ठगी का विषय है जिसकी लोकतंत्र के नाम पर इज़ाजत नहीं दी जा सकती। राखी का इंसाफ धारवाहिक किस रूप में न्याय का विषय छूता है जरा बताईये, यह तो अफवाह फैलाने जैसा विषय है जिस पर नियंत्रण करना जरूरी है।
सबसे ज्यादा दिलचस्प यह है कि यह नियमन समाचार चैनलों पर भी लागू किया गया है जो इसके अंश दिखाकर अपनी प्रसिद्ध बढ़ाते हैं। यह बात एक समाचार चैनल ने बताई पर इसे अधिक महत्व नहंी दे रहे। यह नियमन ऐसे चैनलों के लिये कैसा रहेगा यह तो बाद में पता चलेगा? हां एक बात बड़ी अज़ीब लगी। एक तरफ नियमन विरोधी कह रहे हैं कि सरकार के कदम से इन दोनों धारवाहिकों पर कोई असर नहीं पड़ेगा बल्कि उसने तो अनजाने में टी. आर. पी. बढ़ाने का काम किया है क्योंकि जिसे देखना है वह तो देखेगा।
विद्वान ने पूछा-‘फिर इस नियमन को विरोध क्यों कर रहे हो भाई।’
जवाब उसी अभिव्यक्ति की आज़ादी का। समाचार चैनलों में जब यह बहस होगी तो बार बार यही बात आयेगी क्योंकि अब उन पर भी नियमन की तलवार लटकाई गयी है। इन दोनों चैनलों की कोई समाज में छवि है इसका आभास हमें तो नहीं हुआ अलबत्ता समाचार चैनल उनके अंश बार बार हमारे सामने लाते रहे जो कि ऐसा ही है कि हलवाई से हम कचौड़ी मागें और वह समोसा पकड़ा दे। हम उसे मना कर सकते हैं पर इन प्रचार माध्यमों पर आम आदमी का नियंत्रण नहीं है इसलिये यह काम तो सरकार को ही करना है क्योंकि यह व्यवसायिक चालाकी है कि हम समाचार देखने के लिये चैनल पर जायें और मनोरंजन परोस दें। ऐसे में सरकार से ही तो आसरा है कि वह अपने देश के नागरिकों को प्रचार स्वामियों शोषण से बचाने के लिये यह व्यवस्था करे कि वह जो देखना चाहे वही देखने को मिले न कि मनोरंजन में झगड़ा और समाचारों में उनके अंश!
इन चैनलों को लोग देखना चाहते हैं, ऐसा दावा करने वालों को इसकी असलियत बहुत जल्द पता लग जायेगी। पहली बात तो यह कि आदमी चाहे कितना भी युवा और दमदार हो रात उसे थका देती है। शरीर नहीं तो दिमाग से वह उदास हो ही जाता है। वैसे भी यह कार्यक्रम थोपे गये थे। दूसरा यह कि समाचार चैनलों के अंश ही इस कार्यक्रम की प्रसिद्धि बढ़ाने में सहायक थे। वरना तो इनकी प्रसिद्धि समाज में न की बराबर है। इनकी क्या, अमिताभ बच्चन का कौन बनेगा करोड़पति भी अब वैसा चर्चित नहीं है। हैरानी इस बात की है कि स्वस्थ और मनोरंजन से सराबोर सब टीवी के किसी कार्यक्रम की चर्चा प्रचार माध्यमों में नहीं होती जबकि समाज में उनका प्रभाव दिखता है। सीधी बात कहें तो टी. आर. पी. अपने आप में एक भ्रामक प्रचार है और उसमें भी बहुत सारे धोखे हैं। अगर ऐसा न होता तो पहले देश की बदनाम हस्तियों और अब विदेश से पामेला एंडरसेन को बुलाया गया है ताकि बिग बॉस को वास्तविक रूप से लोकप्रियता मिले जिसे अभी भ्रामक टी.आर.पी. के सहारे समाचार चैनल चला रहे हैं। अंत में यह भी एक बात कहेंगे कि हम इसमें श्लीलत और अश्लीलता की चर्चा भी नहीं करेंगे क्योंकि इन कार्यक्रमों के निर्माण तथा प्रचार में होने वाली चालाकियां अधिक महत्वपूर्ण हैं।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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9/12/09

प्रतिक्रियात्मक लेखन-व्यंग्य आलेख (Reflective writing in hindi - satire article)

आजकल एक नारा बहुत कम सुनाई देता है‘प्रतिक्रियावादी ताकतों से बचें।’ आजकल यह नारा कम ही सुनाई देता है इसका कारण यह है कि यहां तो अब प्रतिक्रियात्मक लेखन ही साहित्य हो गया है। यह नारा पहले विकासवादियों ने लगाया था जिनको यह यकीन था कि वह अपने कार्य अपनी मौलिक सोच से कर रहे हैं और जो उनके विरोधी है वह केवल विरोध करते हैं जबकि उनका अपना कोई मूल सोच नहंी है। अब हालत यह है कि प्रतिक्रियात्मक लेखक ही सभी जगह छाये हुए हैं ऐसे में मौलिक विचारधाराओं को अब स्थान मिलना ही नहीं है। इसका कारण यह है कि अखबारों और टीवी चैनलों पर नाम केवल प्रतिक्रियात्मक लेखन से ही मिलता है और साहित्य लिखने वालों के लिये वहां कोई अधिक स्थान नहीं है दूसरा साहित्यकारों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वह अपने पैसे से किताबें छपवा सकें।
जी हां, यह देश आजादी के समय से ही नारों और वाद पर चलता रहा है। हालत यह है कि आजादी तो मिल गयी पर गुलामी की मानसिकता यथावत है। इस देश का इतिहास सदियों पुराना है पर आजादी की जंग के इर्दगिर्द ही सारे विचारक घूम रहे हैं। कहते हैं कि यह देश दो हजार वर्ष तक गुलाम रहा पर जिस तरह देश की हालत है अब भी आजादी दूर की कौड़ी लगती है। अगर हम देश के बुद्धिजीवियों के विचार देखें तो तो उनके लिये आजादी का मतलब यही है कि दूसरे देश की बजाय अपने ही देश के लोग अपना शोषण करें।
ऐसा नहीं है कि इस देश में चिंतक नहीं है और उनको पता नहीं कि प्रतिक्रियावादी क्या होते हैं पर चूंकि वह स्वयं ही भी उसी राह पर चल रहे हैं तो यह संभव नहीं है कि सोते हुए समाज को जगाकर बतायें कि प्रतिक्रियावाद किस बला का नाम है। आजादी का संघर्ष इस देश का इतिहास है पर सभी कुछ वह नहीं है। आप भारतवर्ष की भौतिक आजादी की बात कर रहे हैं वह अभी बहुत छोटा है। एक समय इस देश के राजाओं की सीमा तिब्बत तक फैली हुई थी और आज हम जिस चीनी ड्रैगन से डर रहे हैं इसी इतिहास से खौफ खाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि यह आजादी एक सीमित उद्देश्य की पूर्ति करती है न किस इससे कोई बृहद लक्ष्य हासिल हुआ है। इसी आजादी के संघर्ष में कई योद्धा हुए जिनका आजादी के बाद इस देश को बनाने की अपनी एक योजना और विचार थे। इनमें कई शहीद हो गये तो कई आजादी के बाद विस्मृत हो गये। हम उनको नमन करते हैं पर अब जिस तरह उन शहीदों और योद्धाओं के नाम पर लोग अपने लिये उपयोग कर रहे हैं चिंतन और मनन का विषय है। मुख्य बात यह है कि जब किसी भी महापुरुष का जीवन सुनाया जाता है तो उसका महत्व और उसके विचारों का महत्व समान नहीं रहता। महापुरुषों के चरित्र पर कोई विवाद नहीं होना चाहिए पर विचारों में इसकी गुंजायश होती है। हो सकता है कि हम किसी महापुरुष के जीवन से प्रभावित हों पर यह जरूरी नहीं है कि हम उसके विचारों का भी समर्थन करें खासतौर से जब आजादी के बाद का अनुभव उनके पास नहीं रहा हो। फिर यह सवाल यह है कि आजादी के योद्धाओें के मन में जो संघर्ष का भाव था मातृभूमि से प्रेम के कारण उपजा था पर उनके विचारों का स्त्रोत क्या था, यह भी देखने वाली बात होती है।
अब हो यह रहा है कि अनेक लोग आजादी या आजादी के तत्काल बाद के महान विचारकों के प्रति सम्मान का भाव प्रदर्शन करते हुए उनके विचारों का भी बोझ उठा रहे हैं और यहीं से प्रारंभ हो जाता है प्रतिक्रियात्मक लेखन जो कि किसी भी दशा में साहित्य और भाषा की वृद्धि में सहायक नहीं होता। प्रतिक्रियात्मक लेखन से आशय यह है कि समाज में घटित होने वाली घटनायें और समाचारों पर ही अपनी टिप्पणी, कहानी, व्यंग्य या कविता लिखना। ऐसा लेखन समय के साथ अप्रासंगिक हो जाता है। इनके प्रासंगिक होने की केवल एक ही शर्त है कि पात्रों, वस्तुओं या स्थितियों में ऐसे तत्व अपनी सामग्री में शामिल करें जो कभी भी पुरानी न पड़ें। मान लीजिये भाई ने भाई को धोखा दिया तो आप केवल उस घटना पर ही लिख रहे हैं जबकि उसमें ऐसी हालातों, दोनों के मानसिक उतार चढ़ाव और चरित्र को भी विस्तार दें क्योंकि उनमें दोहराव संभव है जबकि पात्रों का नहीं। मतलब यह है कि एक भाई दूसरे को धोखा फिर कहीं देगा उस समय आपका लिखा तभी याद किया जायेगा जब उसमें कुछ दोहराने लायक संदेश होगा। प्रतिक्रियात्मक लेखन के मुकाबले संदेशात्मक लेखन बहुत उपयोगी होता है हालांकि उसके परिणाम दीर्घकाल में मिलते हैं। प्रतिक्रियावादी ताकतों से बचाव का कोई उपाय नजर नहीं आ रहा क्योंकि उसे अब कोई ललकारता ही नहीं बल्कि टीवी और अखबार उनका उपयोग करते हुए उनको प्रचार दे रहे हैं।
किसी घटना या समाचार पर लिखने वाले इतने हैं कि उनके बीच बैठकर मौलिक और स्वतंत्र लिखने वालों को असहजता अनुभव होती है। एक बाद दूसरी भी है कि भारत में हर कोई अपने लिखे से समाज बदलना चाहता है। समाज बदलना है इसलिये लिखते हैं। ऐसे प्रतितक्रियात्मक लेखन से कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि वह एक बार पढ़ते ही पुराना हो जाता है। दूसरी बात यह है कि हमारे देश के अधिकतर लेखक विचाराधाराओं के जाल में फंसे हैं जो कि केवल नारों पर आधारित हैं। यह सभी विचाराधारायें पश्चिम से आई हैं। कहने को भले ही लोग कहें कि हमें अंग्रेजियत से परहेज है पर उनकी लिखने और काम करने की शैली वही हैं जो अंग्रेजों की दी हुई हैं।

हिंदी के महान रचनाकार प्रेमचंद का मुकाबला आज तक कोई भी नहीं कर सका क्योंकि उनका लेखन कभी प्रतिक्रियात्मकवाद नहीं रहा। गुलाम देश में सरकारी मुलाजिम होने के बावजूद उन्होंने सामाजिक संदर्भों को अपनी रचनाओं में स्थान दिया। उनकी रचनाओं में देश की आजादी या गुलामी की चर्चा अधिक पढ़ने में नहीं आती। इसका सीधा आशय यह है कि वह हिंदी साहित्य में सामाजिक संदर्भ देखना चाहते थे। हालांकि इस लेखक ने प्रेमचंद की ढेर सारी रचनायें पढ़ी हैं पर यह नहीं जान पाया कि आजादी और उसके संघर्ष पर उनकी क्या राय थी? जहां तक हमारी जानकारी है प्रेमचंद जी ने आजादी के संबंध में कोई बड़ी रचना नहीं लिखी। संभवतः वह जानते थे कि आजादी के बाद वह पुरानी पड़ जायेंगी। यह संभव नहीं है कि इतने बड़े साहित्यकार ने आखिर इस आजादी और उसके संघर्ष के कुछ न सोचा हो पर उसकी चर्चा न होना इस बात का प्रमाण है कि एक साहित्यकार की दृष्टि से आजादी के विषय में उनके मायने इतने संक्षिप्त नहीं रहे होंगे जितने अन्य विद्वानों के दिखते हैं।
सच बात तो यह है कि प्रतिक्रियात्मक लेखन के बिना चलना भी कठिन है। साहित्य लिखने वाले दूसरों का लिखा साहित्य कम बल्कि प्रतिक्रियात्मक लेखन अधिक पढ़ते हैं क्योंकि उनमें ही उनके लिये नये विषय होते हैं। प्रतिक्रियात्मक लेखकों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह समाज को तत्काल अपने शब्दों से जागरुक करने को भ्रम पाल लेते हैं। ऐसा न होने पर झल्लाते हैं। इसके विपरीत साहित्य लिखने वाले इस बात से बेपरवाह होते हैं। वैसे देश के प्रतिक्रियात्मक लेखन करने वालों को यह समझ लेना चाहिये कि वह नारों और वाद की धारा में लिख रहे हैं और समाज को जागृत करने के लिये जिस अध्ययन और चिंतन-आज के दौर में गहन और गंभीर नहीं है बल्कि सूक्ष्म और संक्षिप्त भी चलेगा- की आवश्यकता है उसके बिना कोई भी शब्द सामग्री प्रभावी नहीं होती। एक मुश्किल दूसरी भी है कि लोग सोच तो देशी लेते हैं पर कार्यशैली की वकालत विदेशी की करते हैं और यहीं से उनका तारतम्य बिगड़ जाता है। हमें वही करना चाहिये जैसा कि वह-अंग्रेज और अन्य पश्चिमी जगत-कर रहें है यह सोच उनकी राह में भटकाव लाती है।
आखिरी बात यह है कि अंग्रेजी और अंग्रेजियत से मोह रखने वाले यहां हर विषय पर कानून बनाने की मांग करते हैं पर उनको पता नहीं है कि अंग्रेज कभी भी लिखित कानून पर नहीं चलते। यह उनका आत्मविश्वास है। भारत के कुछ विचारक-जो वाकई धन्य है जो ऐसी बात कह गये-कहते हैं कि अंग्रेज तो क्रिश्नियिटी पर चलते हैं जो हमारी ही कृष्ण नीति है। शायद वह सच कहते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने सहज योग का संदेश दिया पर लगता है कि वह ंअंग्रेजों के पास पहुंच गया। इसलिये वह स्वयं हमेशा अलिखित संविधान के सहजता से चलते जा रहे हैं पर अपनी हरकतों से पूरे विश्व में असहजता फैला रखी है। लोग उनको देखकर असहज हुए जाते हैं कि हम भी उनकी तरह हो जायें पर इस चक्कर में सभी असहज हुए जा रहे हैं। इसी असहजता का परिणाम यह है कि किसी घटना या समाचार में हर कोई अपने विचार तो रख लेता है ताकि उस पर जल्दी प्रतिक्रिया मिल जाये पर दीर्घकालीन स्थिति तक प्रभाव रहे ऐसा बहुत कम ही लोग लिख पाते हैं। अंग्रेज स्वयं कई खेल खेलते हैं जबकि भारत को क्रिकेट ही सौंप गये ताकि वह उसी पर उलझा रहे। शेष फिर कभी
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7/4/09

इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम-हिंदी शायरी (hindi shayri)

अपने पेट के लिये करते हो काम
लेते हो पूरा दाम।
अपने खून को पसीने की तरह
बहते क्यों कराहते हो
कोई आकर हमदर्दी दिखाये
क्यों चाहते हो
दौलत के पत्थरों से
दया की उम्मीद क्यों जगाते हो
ओ! मेहनतकशों को
इज्जत दिलाने की ख्वाहिश रखने वालों
बसते हैं जहां जज्बातफरोश
उस महफिल में उनको
चमकाने का झूठा दिलासा क्यों दिलाते हो
अपने लहू से सींचते हैं जो
अपने ही रोटियों का गुलशन
उनको इज्जत की ख्याली गोटियों से क्या काम।
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1/1/08

पैसा खर्च कर खुशी खरीदने की प्रवृत्ति

आज ईसवी सन २००८ प्रारंभ हो गया है। कहते हैं कि अंग्रेज यहाँ से चले गए पर अपनी अंग्रेजियत यहाँ छोड़ गए पर मुझे नहीं लगता कि इसके लिए उनको जिम्मेदार ठहरना ठीक होगा। जब भारत के आजादी दीवाने उनके पीछे पड़ गए और उन्होने यहाँ से भागने में ही अपनी भलाई समझी होगी और जल्दबाजी से घबडाहट में यहाँ कुछ छूट गया तो उन्हें दोष देना गलत होगा। पर वह अपने संस्कारों के बीज जो यहाँ छोड़ गए उससे उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षा प्रणाली ने उनको खाद पानी देकर विशाल वृक्ष बना दिया है।

अब तो वेलनटाइन डे और फ्रेंड्स डे भी यहाँ मनाये जाने लगे हैं। अभी भी पुरानी पीढ़ी है जो बसंत पंचमी दीपावली और होली जैसे मस्ती वाले त्यौहार संजोये बैठी है वरना बहुत कम लोग इसका कम आनंद उठा पाते हैं। पहले जब मैं छोटा था तो बुजुर्ग लोगों के मुख से सुनता था-''अब क्या त्यौहार का मजा रह गया है। सब पैसे वालों का खेल रह गया है?''

जब अंग्रेजी त्योहारों का सुनते थे तो लगता कि वह खाली-पीली मुफ्त से मनाने वाले त्यौहार होंगे पर जैसे-जैसे उनका रंग देखा तो लगा कि दुनिया में कोई भी त्यौहार हो वह पैसे के बिना नहीं मनाया जा सकता है। यह जरूरी नहीं है कि सब पैसे वाले खर्च कर त्यौहार मनाये पर जिन्हें मनाना है उन्हें अपनी जेब ढीली करना जरूरी है। वैसे अपने देश के त्यौहार देखें तो वह सब परिवार के साथ मिलकर मनाने के लिए बने हैं पर अंग्रेजी त्यौहार जिस तरह मनाये जा रहे हैं उसमें तो केवल रोमांस की प्रधानता नजर जाती है। कम से कम भारत के टीवी चैनलों पर इसे दिखाया जाता है तो उससे यही लगता है कि इन त्योहारों में युवक-युवतियों को परिवार से स्वच्छंद होकर ऐसे त्यौहार होटलों और अन्य व्यावसायिक स्थानों पर मनाना चाहिए।

अपने देश में कहा जाता है कि लड़के की इज्जत पीतल के लोटे की तरह होती है और कितना भी गंदा हो जाये साफ करने पर वैसा का वैसा हो जाता है। और लडकी की इज्जत मिट्टी के बर्तन की तरह होती है एक बार टूटा सो टूटा। अपने संस्कारों से दूर होते समाज में इसकी कोई चिंता नहीं कर रहा है पर जब इन्हीं टीवी चैनलों पर खबरें देखें तो यह भी पता चल जाता है कि आखिर किस तरह लड़कियों को ही अपनी तथाकथित आजादी के दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं। मजे की बात यह है कि देश में अपराधों की बढ़ती स्थिति पर चिंता करने वाले लोग उसके वास्तविक कारणों से मुहँ फेर लेते हैं। आज शौक तो सबको है पर सबके पास धन नहीं है। समाज में आर्थिक विषमता किस तरह बढ़ती जा रही है इसे भोगने वाले भी नहीं बता पाते क्योंकि उनका पूरा ध्यान अपनी समस्याओं के हल में ही लगा रहता है।

आजकल प्रचार माध्यमों को अपनी छबि बनाए रखने के लिए आखिर कुछ न कुछ तो करना है और उसने पश्चिम के सारे त्यौहार गोद ले लिए हैं-उसकी व्यवासायिक मजबूरियों के मद्देनजर उस पर उंगली उठाना व्यर्थ है। अत अब लोगों को खुद इस बात पर विचार करना होगा कि क्या उनके पास अब केवल खर्च कर ही खुशियाँ आ सकतीं हैं और क्या इससे समाज के आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्ग के लोगों में कुंठा नहीं पनपती। बेहतर यही है कि अपनी आने वाली पीढी में अपने लिए खर्च कर खुशिया अर्जित करने की बजाय गरीबों और मासूम बच्चों की मदद कर आत्मिक सुख उठाने की प्रवृति का निर्माण करें।

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